विधिशास्त्र का परिचय

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Jurisprudence
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यह लेख  Arkodeep Gorai द्वारा लिखा गया है, जिन्होंने कानून के क्षेत्र में विधिशास्त्र (ज्यूरिस्प्रूडेंस) का संक्षिप्त विवरण दिया है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है। 

Table of Contents

परिचय

विधिशास्त्र एक व्यक्ति को कानून के अर्थ को अच्छे से समझने में मदद करता है। विधिशास्त्र कानून का एक अभिन्न अंग है जो सिद्धांतों और विभिन्न विश्लेषणों पर आधारित है। विधिशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों, समाज, मनुष्य और प्रकृति के साथ कानून के संबंध के बारे में बात करता है।

अर्थ

विधिशास्त्र का अर्थ, तार्किक (लॉजिकल) और दार्शनिक (फिलोसॉफिकल) तरीके से कानून का अध्ययन है। विधिशास्त्र यानी की ज्यूरिस्प्रूडेंस शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द ज्यूरिस प्रूडेंशिया से हुई है जिसे दो भागों में विभाजित किया जा सकता है, और वह है ज्यूरिस, जो कि ‘जस’ शब्द से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ कानून है और शब्द ‘प्रूडेंशियल’ जिसका अर्थ बुद्धिमानी, पूर्वविवेक (फोरथॉट) या विवेक है।

विधिशास्त्र को कानूनी सिद्धांत के रूप में भी संदर्भित किया जा सकता है। विधिशास्त्र हमें कानून और समाज में कानून की भूमिका की गहन समझ और एक सिंहावलोकन (ओवरव्यू) प्रदान करता है। विधिशास्त्र कानूनी तर्क, कानूनी संस्थानों और कानूनी प्रणालियों से संबंधित है।

विधिशास्त्र को पढ़ने का महत्व

विधिशास्त्र को पढ़ने का एक प्रमुख महत्व इसका मौलिक मूल्य है। विधिशास्त्र में मुख्य रूप से अनुसंधान (रिसर्च) और कानून की बुनियादी अवधारणाओं को बनाने और स्पष्ट करने का तरीका शामिल है। विधिशास्त्र का संबंध नए कानूनों को बनाने से नहीं है; बल्कि, यह व्यवस्था और विधिशास्त्र में मौजूद कानूनों पर ध्यान केंद्रित करता है, और इसके सिद्धांत वकीलों को एक बेहतर अभ्यास बनाने में मदद कर सकते हैं।

विधिशास्त्र छात्रों की भी मदद कर सकता है। छात्रों के जीवन में इसका अपना शैक्षिक मूल्य है। विधिशास्त्र न केवल प्राथमिक कानूनी नियमों पर केंद्रित है, बल्कि यह कानूनों के सामाजिक प्रभाव के बारे में भी बात करता है। विधिशास्त्र कानूनी अवधारणाओं के तार्किक और सैद्धांतिक (थियोरिटिकल) विश्लेषण को जोड़ता है। तो यह एक छात्र के विश्लेषणात्मक तरीकों और तकनीकों का प्रसार (प्रोलिफिरेट) करता है।

विधिशास्त्र कानून और उसके सामाजिक मूल्य पर भी केंद्रित है। यह निष्पक्षता और कानून की अभिव्यक्ति (एक्सप्रेशन) के बारे में बात करता है। विधिशास्त्र कानून के बुनियादी सिद्धांतों से संबंधित है और यह कानून का नेत्र है। यह एक व्यक्ति को कानून के विचारों और विभाजनों (डिवीजन) को समझाने में मदद करता है।

विधिशास्त्र कानून के नियम भी बताता है। यह एक व्यक्ति को कानून की भाषा और उसके नियमों को समझने में मदद करता है। सामान्य भाषा की तुलना में कानूनी भाषा और नियम बहुत भिन्न होते हैं, इसलिए विधिशास्त्र एक वकील के दिमाग को प्रशिक्षित (ट्रेन) करता है ताकि वह उचित कानूनी शब्दावली और अभिव्यक्तियों का उपयोग कर सके।

विधिशास्त्र व्याख्या के नियम प्रदान करता है और उसके परिणामस्वरूप, यह न्यायाधीशों और वकीलों को विधायकों द्वारा पारित कानूनों के महत्व को समझाने में मदद करता है।

विधिशास्त्र और अन्य सामाजिक विज्ञानों के साथ इसका संबंध, छात्रों को एक व्यापक विस्तार प्रदान करता है ताकि उन्हें यह समझने में मदद मिले कि कानून कैसे अन्य सिद्धांतो से संबंधित है और जुड़ा है।

विधिशास्त्र लोगों को सिखाता है कि कानूनी समस्या का उत्तर अतीत में छिपा नहीं है या भविष्य में प्रतीक्षा नहीं कर रहा है, बल्कि कानूनी अध्ययन के मूल सिद्धांतों में, उनके चारों ओर एक कानूनी समस्या का उत्तर छिपा है।

विधिशास्त्र राजनीतिक अधिकारों और कानूनी अधिकारों के बारे में भी बात करता है और यह भी बताता है कि प्रणाली उन्हें कैसे संतुलित करने का प्रयास कर सकती है। एक छात्र इसे विधिशास्त्र की सहायता से भी देख सकता है।

विधिशास्त्र और अन्य विज्ञानों के साथ इसका संबंध

1. समाजशास्त्र (सोशियोलॉजी) और विधिशास्त्र

विधिशास्त्र के लिए समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण, विधिशास्त्र और अन्य विज्ञानों के बीच सबसे महत्वपूर्ण संबंध है। यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है इसका कारण यह है कि समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण कानून के मूल सिद्धांतों और मूल बातों के बजाय कानून के कामकाज से अधिक संबंधित है।

समाजशास्त्रीय न्यायविद (ज्यूरिस्ट), हमारे समाज में कानून के प्रभाव और कानून और समाज एक साथ कैसे काम करते हैं, यह जानना चाहते हैं। समाजशास्त्रीय विधिशास्त्र कानून को एक संस्था के रूप में देखता है।

समाजशास्त्रीय विधिशास्त्र सोचता है कि समाज की जरूरतों के अनुसार कानूनों को बनाया, बदला और परिवर्तित किया जा सकता है। मूल रूप से, इसका मतलब यह है कि कानून को सामाजिक जरूरतों के अनुसार बदला जा सकता है।

2. अर्थशास्त्र (इकोनॉमिक्स) और विधिशास्त्र

आर्थिक अध्ययन, राज्य के लोगों के जीवन को विनियमित (रेगुलेट) करने के उद्देश्य से समाज में धन और उसके वितरण पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इसी तरह, कानून भी नियमों और विनियमों के माध्यम से लोगों के जीवन को विनियमित करने पर केंद्रित है। प्रारंभ में, विधिशास्त्र और अर्थशास्त्र के बीच संबंधों को लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया था जब तक कि न्यायविदों को कानून में अर्थशास्त्र के महत्व का एहसास नहीं हुआ।

मानक (नॉर्मेटिव) विधिशास्त्र समाज में संसाधनों (रिसोर्सेज) के स्थिर आर्थिक आवंटन (एलोकेशन) के बारे में बात करता है और यह कैसे उपभोक्ता वरीयता (प्रीफेरेंस) को प्रतिबिंबित (रिफ्लेक्ट) करेगा।

3. इतिहास और विधिशास्त्र

ऐतिहासिक विधिशास्त्र मुख्य रूप से एक विषय के रूप में कानूनी इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कानून सदियों से मौजूद है, और जैसा कि हम जानते हैं कि विधिशास्त्र कानून का अध्ययन है, इसलिए यदि हम कानूनों की उत्पत्ति और विकास का पता नहीं लगाते हैं, तो इसका मतलब हम विधिशास्त्र के एक सैद्धांतिक पहलू को नजरंदाज करते हैं।

वर्षों से कानून का विकास हमें एक अंतर्दृष्टि (इनसाइट) देता है, और हमें इसके बारे में और अधिक शोध करने में मदद करता है। ऐतिहासिक विधिशास्त्र उन प्रभावों पर प्रकाश डालता है जिनके कारण एक विशेष कानून का विकास हुआ है।

4. नैतिकता (एथिक्स) और विधिशास्त्र

नैतिकता इस तथ्य के बारे में बात करती है कि एक आदर्श स्थिति में कानून कैसा होना चाहिए। नैतिक विधिशास्त्र इस तथ्य पर केंद्रित है कि सकारात्मक नैतिकता की पुष्टि के लिए कानून को एक उपकरण के रूप में कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है।

नैतिकता और विधिशास्त्र कहता है कि कानून नैतिक सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए और इसे अन्यथा नहीं माना जाना चाहिए। नैतिकता उन कानूनों की आलोचना करने में मदद करती है जो प्रकृति में अनैतिक हैं।

5. राजनीति और विधिशास्त्र

राजनीतिक विधिशास्त्र कहता है कि लोगों के लिए बनाए गए कानून निष्पक्ष होने चाहिए। कानून में कोई छिपा राजनीतिक एजेंडा नहीं होना चाहिए। यदि कोई कानून राजनीति से प्रेरित है तो यह स्पष्ट है कि ऐसे कानूनों का हमारे समाज में कोई स्थान नहीं होगा।

कानून किसी देश के राजनीतिक वातावरण से प्रभावित होने चाहिए और इसलिए देश अपना संविधान विकसित करते हैं जो किसी देश की वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक जरूरतों को प्रदर्शित करता है।

विधिशास्त्र में कानून के सिद्धांत

प्राकृतिक कानून

प्राकृतिक कानून विधिशास्त्र का एक हिस्सा है, और स्पष्ट रूप से देखा जाए तो प्राकृतिक कानून को परिभाषित करने का कोई निश्चित तरीका नहीं है। प्राकृतिक कानून को किसी भी तरह के कानूनों के रूप में कहा जा सकता है जो अन्य-सांसारिक या कुछ ईश्वर-समान स्रोत से उत्पन्न हुए हैं, मूल रूप से, प्राकृतिक कानून किसी राजनीतिक प्राधिकरण (अथॉरिटी) या किसी विधायिका से उत्पन्न नहीं हुआ है।

विधिशास्त्र में, यह माना जाता है कि प्राकृतिक कानून दुनिया में कहीं भी लागू किया जा सकता है यानी प्राकृतिक कानून की सार्वभौमिक प्रयोज्यता (यूनिवर्सल एप्लीकेबिलिट) है। जब भी हम अच्छे कानून के बारे में बात करते हैं तो यह कहा जा सकता है कि प्रकृति में अनिवार्य कानूनों को अच्छा कानून कहा जाता है, इसलिए इस विश्लेषण से हम कह सकते हैं कि प्राकृतिक कानून एक अच्छा कानून नहीं है।

प्राकृतिक कानून एक अच्छा कानून नहीं है, इसका कारण यह है की प्राकृतिक कानून अपने सही अर्थों में अनिवार्य नहीं है। प्राकृतिक कानून नैतिक सापेक्षवाद (रिलेटिविज्म) के बचाव के रूप में कार्य करता है। नैतिक निर्णय एक स्थान से धर्म और धर्म से संस्‍कृति में भिन्न होता है और इस सिद्धांत को ग्रीक दार्शनिकों (फिलोसॉफर) द्वारा आगे बढ़ाया गया था। दार्शनिकों ने प्रकृति के नियम और पारंपरिक मानव विकल्पों के बीच अंतर किया और यह भेद प्राकृतिक कानून के खिलाफ काम करता था।

इसलिए प्राकृतिक कानून का उद्देश्य विभिन्न संस्कृतियों और विभिन्न धर्मों के लिए एक सामान्य नैतिक आधार खोजना है। लेकिन फिर भी, प्राकृतिक कानून का विचार बहुत सारे प्रश्न उठाता है और सबसे बड़ा और प्रासंगिक यह है कि क्या तथ्यों के प्रस्ताव से नैतिक प्रस्ताव प्राप्त किया जा सकता है।

इस प्रश्न का एक प्रमुख उदाहरण यह होगा कि लोग इच्छामृत्यु के उचित या अनुचित होने पर सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन फिर लोग किसी अपराध पर सजा के औचित्य (जस्टिफिकेशन) पर बहस नहीं करेंगे। इसलिए आधार की पुष्टि करना और निष्कर्ष को अस्वीकार करना असंभव है। मूल रूप से, अभी भी प्राकृतिक कानून से संबंधित लाखों नकली सिद्धांत हैं और उनमें से ज्यादातर यथार्थवादी (रियलिस्टिक) नहीं हैं।

इसलिए यथार्थवाद और कुछ मामलों में एक यथार्थवादी दृष्टिकोण के आने से प्राकृतिक कानून, कानून और नैतिकता के बीच विवाद उत्पन्न करता है। अगर हम प्राकृतिक कानून के सिद्धांत पर विचार करें तो कुछ मौजूदा कानून अमानवीय हैं। इसलिए एक कानून का विश्लेषण उसकी दक्षता (एफिशिएंसी), सादगी और क्या कानून न्याय और नैतिकता के सही संयोजन का काम करता है, के आधार पर किया जाना चाहिए।

अनिवार्य कानून

अनिवार्य कानून सीधे प्राकृतिक कानून का विरोध करता है। जब प्राकृतिक कानून की तुलना की जाती है तो अनिवार्य कानून यथार्थवाद पर अधिक केंद्रित होता है। यहाँ इस लेख में, हम अनिवार्य कानून पर ऑस्टिन के दृष्टिकोण पर चर्चा करेंगे।

अनिवार्य कानून किसी देश के संप्रभु (सोवरेन) द्वारा निर्धारित किया जाता है और इसे अनुमोदन (अप्रूवल) द्वारा लागू किया जाता है, और अनिवार्य कानून एक प्रकार का आदेश होता है।

आदेश और कानून के बीच एक अलग अंतर है और एक आदेश के लिए कानून के रूप में मन्यता प्राप्त करने के लिए एक राजनीतिक वरिष्ठ (सुपीरियर) या संप्रभु द्वारा दिया जाना चाहिए। चूंकि यह सिद्धांत कानून को आदेश, संप्रभुता और अनुमोदन के संदर्भ में परिभाषित करता है, इसलिए हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि अनिवार्य सिद्धांत मानक (स्टैंडर्ड) कानून के लिए पर्याप्त विश्लेषण प्रदान नहीं कर सकता है।

कानूनी यथार्थवाद (लीगल रियलिज्म)

कानूनी यथार्थवाद और अनिवार्य कानून के सिद्धांतों के बीच एक निश्चित समानता है और वह समानता यह है कि दोनों सिद्धांत कानून को एक प्रकार के आदेश के रूप में देखते हैं।

लेकिन कानूनी यथार्थवाद के सिद्धांत के मामले में, यह कानून को एक प्रकार के आदेश के रूप में देखता है जिसे विधायिका द्वारा दिया जाना चाहिए और कानूनी यथार्थवाद के लिए, सर्वोच्च न्यायालय, संप्रभु है। इस दृष्टिकोण का उपयोग संयुक्त राज्य अमेरिका में होम्स द्वारा किया गया था ताकि इसे और अधिक किया जा सके। होम्स आगे कहते हैं कि कानून, वास्तव में, न्यायाधीश द्वारा बनाया गया है और किसी सर्वोच्च शक्ति द्वारा नहीं बनाया गया है और अदालतों के कार्यों को विधियों और पुस्तकों द्वारा आवश्यक रूप से नहीं निकाला जाता है।

कर्त्तव्य का कानून (लॉ ऑफ ऑब्लिगेशन)

कानूनी अर्थों में कर्त्तव्य का कानून रोमन कानून से लिया गया है। कर्त्तव्य के कानून को उसके मूल अर्थ में कानूनी आवश्यकता का संबंध कहा जा सकता है। कर्त्तव्य के सभी कानून अपने आप में मालिकाना अधिकार होने से संबंधित हैं।

विधिशास्त्र में, एक व्यक्ति जो कर्तव्य के कानून से लाभ प्राप्त करता है उसे लेनदार कहा जाता है और वह व्यक्ति जो कर्त्तव्य के कानून से बाध्य होता है उसे देनदार कहा जाता है।

विधिशास्त्र में विचार के स्कूल

दार्शनिक (फिलोसॉफिकल) स्कूल

फिलॉसॉफिकल स्कूल प्राकृतिक कानून के सिद्धांत में बहुत अधिक ध्यान केंद्रित करता है। यह स्कूल यह पता लगाने का प्रयास करता है कि कानून क्यों बनाया जाता है और हमारे समाज में इस तरह के कानून का क्या प्रभाव पड़ता है। उनका मानना ​​है कि कानून का उद्देश्य मानवता की महानता को बढ़ाना है। दार्शनिक स्कूल, कानून के विश्लेषणात्मक और ऐतिहासिक पहलू से संबंधित नहीं है।

विश्लेषणात्मक (एनालिटिकल) स्कूल

विश्लेषणात्मक स्कूल अनिवार्य कानून के सिद्धांत पर अधिक केंद्रित है। विश्लेषणात्मक स्कूल नागरिक कानून की उत्पत्ति से संबंधित है। विश्लेषणात्मक स्कूल अधिकारों और कर्तव्यों की अवधारणा के बारे में बात करता है और कानूनी मॉडल जैसे कार्यों और संविदा (कॉन्ट्रेक्ट) की जांच करता है।

विश्लेषणात्मक स्कूल का मानना ​​​​है कि कानून को संहिताबद्ध (कोडिफाइड) किया जाना चाहिए और लोगों के लाभ के उद्देश्य से कानून को राज्य द्वारा शासित किया जाना चाहिए।

ऐतिहासिक स्कूल

ऐतिहासिक स्कूल का मानना ​​​​है कि कानून हमारे समाज के विकास के वर्षों का परिणाम है। ऐतिहासिक स्कूल का मानना ​​​​है कि कानून के स्रोत रीति-रिवाज, धार्मिक दर्शन और सामाजिक नियम हैं।

ऐतिहासिक स्कूल अतीत में बहुत अधिक निर्भर है और परिणामस्वरूप, यह बहुत अधिक रूढ़िवादी होता है लेकिन फिर भी इस तरह के रूढ़िवाद के बाद, ऐतिहासिक स्कूल कहता है कि कानून को लोगों के साथ बदलना चाहिए।

यथार्थवादी स्कूल

यथार्थवादी स्कूल तकनीकी रूप से विधिशास्त्र का स्कूल नहीं है; बल्कि यथार्थवादी स्कूल विचारों का शिक्षण है। यथार्थवादी स्कूल में, अदालत के कार्यों और वे क्या बनाते हैं, इस पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं। यथार्थवादी स्कूल सामान्य कानून से केवल तार्किक धारणाएँ बनाता है।

समाजशास्त्रीय स्कूल

समाजशास्त्रीय स्कूल ने अपनी अमूर्त (इंटेंजिबल) सामग्री के बजाय कानून के कार्य पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। न्यायविदों के विभिन्न विचारों के संचय (एक्युमुएशन) के कारण समाजशास्त्रीय स्कूल अस्तित्व में आया था। समाजशास्त्रीय स्कूल कानून को समाज से जोड़ना चाहता था और कानून को समाज की जरूरतों के अनुसार बदला जा सकता है। समाजशास्त्रीय स्कूल कानूनी संस्थानों, सिद्धांतों और कानून के अन्य सैद्धांतिक पहलुओं के बारे में बात करता है।

विधिशास्त्र में प्रसिद्ध न्यायविद

  1. अरस्तु (एरिस्टोटल) को प्राकृतिक नियम का जनक (फादर) भी कहा जाता है। उन्होंने समाज में प्राकृतिक कानून के महत्व के बारे में बात की और जैसा कि हम जानते हैं कि वह सही थे क्योंकि आधुनिक समय में भी दुनिया भर में कई न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) प्राकृतिक कानून और प्राकृतिक न्याय के आधार पर कार्य करते हैं।
  2. थॉमस एक्विनस ने चार प्रकार के कानून को विभाजित किया और वे शाश्वत (एटरनल) कानून, प्राकृतिक कानून, मानव कानून और ईश्वरीय कानून थे। शाश्वत कानून स्वयं भगवान द्वारा बनाया गया था और प्राकृतिक कानून की खोज शाश्वत (इटरनल) कानून की प्रेरणा से हुई है। ईश्वरीय कानून वे कानून हैं जो ईश्वर के ग्रंथ हैं और मानव कानून मनुष्य द्वारा बनाया गया है।
  3. जॉन ऑस्टिन ने प्राकृतिक कानून के सिद्धांत का विरोध किया था। वह कानून को विज्ञान में बदलना चाहते थे और वे प्रत्यक्षवादी (पोज्टिविस्ट) थे। उनके प्रत्यक्षवादी होने का मुख्य कारण यह था कि उनका मानना ​​​​था कि आज मौजूद सभी कानून नश्वर (मोर्टल) सांसदों के लिए वापस लाए जा सकते हैं।

निष्कर्ष

इस लेख में, हमने देखा कि विधिशास्त्र उस कानून से कैसे भिन्न है जिसका हम सामान्य रूप से पालन करते हैं। विधिशास्त्र वकीलों और न्यायाधीशों को कानून की वास्तविक समझ खोजने में मदद करता है। हमने विभिन्न कानूनी सिद्धांत और उन्होंने समाज और कानून को कैसे प्रभावित किया, के बारे मे पढ़ा है। विधिशास्त्र कानून का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे कभी भी इससे अलग नहीं किया जा सकता है।

2 टिप्पणी

  1. बहुत ही सुन्दर प्रयास किया गया इस लेख को पढ़ कर विधिशास्त्र का सारभूत मूल उद्देश्य विधि परप्रेक्ष्य में क्या है समझने में सहायता मिलती है l

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