जमानत के प्रकार

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Criminal Procedure Code

यह लेख यूनिवर्सिटी पंचवर्षीय लॉ कॉलेज, राजस्थान विश्वविद्यालय के कानून के छात्र Tushar Singh Samota द्वारा लिखा गया है। यह लेख “जमानत” शब्द और इसके प्रकारों का विस्तृत विवरण देता है, जिसमें प्रत्येक प्रकार की जमानत की गहराई से चर्चा की गई है, साथ ही यह इसकी कानूनी स्थिति और इसके रद्दीकरण (कैंसिलेशन) के बारे में भी बात करता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja द्वारा किया गया है।

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परिचय

“हर फौजदारी (क्रिमिनल) अपराध राज्य के खिलाफ एक अपराध है; इस प्रकार, इस विषय पर चर्चा करना समाज की एक महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है कि क्या जमानत दी जानी चाहिए या अस्वीकार कर दी जानी चाहिए। व्यक्तिगत स्वतंत्रता की पवित्रता और समाज के हितों को, जमानत देने या देने से अस्वीकार करने के निर्णय में पूरी तरह से संतुलित होना चाहिए।”

“जमानत” जिसे अंग्रेजी में बेल कहते है, शब्द को पुराने फ्रांसीसी शब्द “बेलियर” से खोजा जा सकता है। इसका सही अर्थ कुछ देना या सौंपना है। शब्द “जमानत” को भारत की आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (सी.आर.पी.सी.) में परिभाषित नहीं किया गया है। ब्लैक्स लॉ डिक्शनरी जमानत को एक प्रतिभूति (सिक्योरिटी) जैसे धन या बॉन्ड के रूप में वर्णित करती है, जिसको अदालत द्वारा आवश्यक समझा जाता है ताकि एक कैदी जिसकी रिहाई की जा रही है उसे विशेष रूप से भविष्य की तारीख में पेश किया जा सके। कमलापति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1978) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने ज़मानत को एक ऐसे तंत्र के रूप में परिभाषित किया जो मानव मूल्य की दो आवश्यक अवधारणाओं अर्थात्, एक जो अभियुक्त (एक्यूज़्ड) की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है और दूसरा सार्वजनिक हित, जिसमें एक व्यक्ति की रिहाई इस तथ्य पर सशर्त है की ज़मानतदार (श्योरिटी) अभियुक्त व्यक्ति को अदालत में मुकदमें के दौरान पेश करेगा, के संश्लेषण (सिंथेसिस) को प्राप्त करने के लिए स्थापित किया गया है।

“जमानत” एक व्यक्ति को कानूनी हिरासत से रिहा करने के लिए संदर्भित करता है। कानून की नीति सामान्य तरीकों से जमानत पर रोक लगाने के बजाय जमानत की अनुमति देना है। इस प्रकार, जमानत एक मानक (नॉर्म) के रूप में दी जाती है, जबकि इसकी अस्वीकृति एक अपवाद है, जैसा कि सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो (2022) (सी.बी.आई.) मामले में आयोजित किया गया था। इस लेख में लेखक ने जमानत की अवधारणा और इसके प्रकारों पर चर्चा की है। यह लेख जमानत के उद्देश्यों के लिए अपराधों के वर्गीकरण (क्लासोफिकेशन) के साथ-साथ जमानत रद्द करने की अवधारणा पर भी चर्चा करेगा।

जमानत की कानूनी स्थिति

जमानत ने निम्नलिखित स्रोतों (सोर्सेज) से अपनी कानूनी स्थिति प्राप्त की है:

  1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21: अनुच्छेद 21 सभी को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। यह मानवीय गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ जीने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है, जो हमें किसी भी कानून प्रवर्तन (एनफोर्समेंट) संस्था द्वारा हिरासत में लिए जाने पर जमानत लेने का अधिकार देता है।
  2. अपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 438: सी.आर.पी.सी. की धारा 438 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अग्रिम (एंटीसिपेटरी) जमानत केवल गैर-जमानती अपराधों के मामले में दी जाती है। जमानत शब्द को सी.आर.पी.सी. में परिभाषित नहीं किया गया है। धारा 2 (a) केवल “जमानती अपराध” और “गैर-जमानती अपराध” शब्दों को परिभाषित करती है। यह भारत के विधि आयोग (लॉ कमीशन) की 41वीं रिपोर्ट के प्रस्ताव पर आधारित है, जिसमें अग्रिम जमानत के प्रावधान को शामिल करने का सुझाव दिया गया था। 
  3. मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स) का अनुच्छेद 11: जमानत, विशेष रूप से अग्रिम जमानत, निर्दोषता (इनोसेंस) की धारणा की कानूनी अवधारणा पर स्थापित है, जिसमें कहा गया है कि अपराध के सभी अभियुक्तों को दोषी साबित होने तक निर्दोष माना जाता है। यह मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 11 में स्थापित एक मौलिक मूल्य है।

जमानत के उद्देश्यों के लिए अपराधों का वर्गीकरण

जमानत के उद्देश्य से निम्नलिखित अपराधों को वर्गीकृत किया गया है:

  1. जमानती अपराध: अपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 2(a) जमानती अपराधों को परिभाषित करती है। एक अपराध जिसे जमानती के रूप में वर्गीकृत किया गया है, उसे जमानती अपराध कहा जाता है। इस तरह के अपराध की स्थिति में, सी.आर.पी.सी. की धारा 436 के तहत कानून के मामले में ज़मानत दी जा सकती है, जब ऐसी पूर्वापेक्षाएँ (प्रीरिक्विजाइट) पूरी हो जाती हैं। जमानती अपराधों के मामले में, पुलिस अपराधी को गिरफ्तारी या हिरासत के समय जमानत दे सकती है।
  2. गैर-जमानती: गैर-जमानती अपराध वह है जिसमें एक सक्षम अदालत द्वारा आदेश दिए जाने तक जमानत को अधिकार के रूप में नहीं दिया जा सकता है। ऐसे मामलों में, अभियुक्त 1973 की अपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 437 और धारा 439 के तहत जमानत की मांग कर सकता है। जमानती अपराधों के विपरीत ये गंभीर अपराध हैं। गैर-जमानती अपराधों की स्थिति में तीन साल या उससे अधिक की सजा होती है।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि न्यायालय का न्यायिक विवेक गैर-जमानती अपराधों के लिए जमानत के मुद्दे को नियंत्रित करता है।

जमानत का वर्गीकरण

आपराधिक कार्यवाही के चरण के आधार पर, भारत मे एक व्यक्ति चार प्रकार की जमानत के लिए आवेदन कर सकता है:

  1. नियमित (रेगुलर) जमानत: नियमित जमानत अक्सर ऐसे व्यक्ति को दी जाती है जिसे पहले पुलिस द्वारा गिरफ्तार और हिरासत में लिया गया हो। अभियुक्त को सी.आर.पी.सी. की धारा 437 और धारा 439 के तहत इस तरह के कारावास से मुक्त होने का अधिकार है। इसलिए, मुकदमे में अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए एक नियमित जमानत केवल एक अभियुक्त को जेल से रिहा करना है।
  2. अंतरिम (इंटेरिम) जमानत: अंतरिम जमानत एक छोटी अवधि के लिए जारी की गई जमानत है। नियमित या अग्रिम जमानत के लिए सुनवाई से पहले अभियुक्त को अंतरिम जमानत दी जाती है।
  3. अग्रिम जमानत: यदि किसी व्यक्ति को संदेह है कि उसे गैर-जमानती अपराध के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है, तो वह अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर कर सकता है। हाल के वर्षों में, यह एक महत्वपूर्ण समस्या बन गई है क्योंकि कॉर्पोरेट प्रतियोगी और अन्य प्रमुख व्यक्ति कभी-कभी अपने विरोधियों को झूठे आरोपों से फंसाने की कोशिश करते हैं। यह सी.आर.पी.सी. की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत प्राप्त करने जैसा है। धारा 438 के तहत गिरफ्तारी से पहले जमानत हो सकती है, और अगर अदालत ने अग्रिम जमानत दे दी है तो किसी व्यक्ति को पुलिस द्वारा गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है।
  4. वैधानिक जमानत: वैधानिक जमानत का उपाय, जिसे डिफ़ॉल्ट जमानत के रूप में भी जाना जाता है, सी.आर.पी.सी. की धारा 437, 438, और 439 के तहत सामान्य प्रक्रिया में प्राप्त जमानत से अलग है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, वैधानिक जमानत तब दी जाती है जब एक निश्चित समय सीमा के भीतर अपनी रिपोर्ट/शिकायत दर्ज करने के लिए पुलिस या जांच एजेंसी विफल हो जाती है।

जमानत के लिए आवेदन कैसे करें

जमानत के लिए आवेदन करने के लिए, अभियुक्त को जमानत बॉन्ड पर हस्ताक्षर करना चाहिए, जो एक कानूनी साधन है, और जमानत बॉन्ड में बताई गई राशि प्रदान करनी चाहिए। दो ज़मानतदार भी होने चाहिए जो अभियुक्त का वादा लेते हैं कि जब भी अभियुक्त को अदालती कार्यवाही की जाँच के लिए उपस्थित होने की आवश्यकता होगी, वह अदालत में या पुलिस थाने में उपस्थित होगा।

जमानत बॉन्ड

एक जमानत बॉन्ड अभियुक्त द्वारा अदालत में पेश होने और शुल्क के बदले जांच में सहयोग करने के लिए किया गया एक समझौता है। अन्य प्रतिबंध, जैसे जमानत पर रहते हुए व्यक्ति की देश छोड़ने में असमर्थता, जमानत बॉन्ड में शामिल होती हैं। यदि व्यक्ति जमानत बॉन्ड का पालन करने में विफल रहता है, तो उसकी गिरफ्तारी का वारंट जारी किया जा सकता है।

नियमित जमानत

नियमित जमानत एक कानूनी तंत्र है जिसके द्वारा एक अदालत अपराध करने के संदेह में हिरासत में रह रहे किसी व्यक्ति को रिहा करने का आदेश दे सकती है, आम तौर पर इस शर्त पर कि वह व्यक्ति देश नही छोड़ता है और न ही न्याय प्रदान करने में बाधा डालता है। इन आवश्यकताओं के लिए “व्यक्तिगत बॉन्ड” के निष्पादन (एग्जिक्यूशन) की आवश्यकता हो सकती है या अदालत ज़मानतदार के साथ एक बॉन्ड के निष्पादन को बाध्य कर सकती है। जब किसी व्यक्ति को जमानती अपराध करने के संदेह में हिरासत में लिया जाता है, तो जमानत एक अधिकार बन जाता है, और व्यक्ति को सी.आर.पी.सी. की धारा 436 में उल्लिखित प्रक्रियाओं के अनुसार रिहा किया जा सकता है। हालांकि जब किसी व्यक्ति को गैर-जमानती अपराध करने के संदेह में जेल मे ले जाया जाता है, तो जमानत विवेकाधीन होती है, और व्यक्ति को तभी रिहा किया जा सकता है जब कोई अच्छा मामला बनता है। 

धारा 437, मजिस्ट्रेट की अदालतों में जमा की गई जमानत याचिकाओं पर लागू होती है, जबकि धारा 439 सत्र या उच्च न्यायालय की अदालतों में दायर जमानत याचिकाओं पर लागू होती है। साधारण जमानत देना या अस्वीकार करना न्यायिक विवेक का एक प्रयोग है जो सी.आर.पी.सी. की धारा 437 में प्रदान किए गए मानकों और कुछ स्पष्ट विनियमों (रेगुलेशन) द्वारा शासित होता है।

गैर-जमानती अपराधों में जमानत देते समय किन कारकों को ध्यान में रखा जाता है

न्यायालय के पास गैर-जमानती अपराध के मामले में जमानत देने का विवेकाधिकार है; इसलिए, एक अभियुक्त व्यक्ति ज़मानतदार और बॉन्ड दाखिल करने पर ज़मानत पर रिहा होने का हकदार नहीं है। अदालत और पुलिस अधिकारियों को तय करना होगा कि उन्हें रिहा करना है या नहीं। यह विवेकाधिकार कितनी दूर तक विस्तारित है, यह निर्धारित करते समय, निम्नलिखित कारकों पर विचार किया जाना चाहिए:

  1. अपराध की गंभीरता; उदाहरण के लिए, यदि अपराध गंभीर है और मृत्यु या आजीवन कारावास की सजा दी जाती है, तो जमानत मिलने की संभावना कम होती है।
  2. आरोप की प्रकृति, जैसे कि यह गंभीर, भरोसेमंद या तुच्छ है;
  3. दंड की कठोरता, सजा की अवधि और मृत्युदंड की संभावना।
  4. साक्ष्य की विश्वसनीयता, चाहे वह विश्वसनीय हो या नहीं;
  5. रिहा होने पर अभियुक्त के भाग जाने का जोखिम;
  6. लंबे समय तक चलने वाले परीक्षण जो आवश्यकता से ज्यादा और परे जाते हैं;
  7. याचिकाकर्ता को अपना बचाव तैयार करने की अनुमति देना;
  8. अभियुक्त का स्वास्थ्य, आयु और लिंग; उदाहरण के लिए, 16 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति, एक महिला, या बीमार या दुर्बल व्यक्ति को मुक्त किया जा सकता है।
  9. अपराध से संबंधित परिस्थितियों की प्रकृति और गंभीरता;
  10. अभियुक्त की स्थिति और गवाहों के संबंध में सामाजिक प्रतिष्ठा, विशेष रूप से यदि अभियुक्त रिहाई के बाद गवाहों को हेरफेर करने की क्षमता रखता है;
  11. जनता के हित और प्रसार (डिसेमिनेशन) के बाद आपराधिक कार्रवाई जारी रखने की संभावना।

अधिकारियों को सी.आर.पी.सी. की धारा 437 के तहत जमानत देने का अधिकार है

धारा 437 अदालत और थाने के प्रभारी अधिकारी को अधिकार देती है जो किसी को बिना वारंट के गिरफ्तार करता है या हिरासत में लेता है या जिस व्यक्ति पर गैर-जमानती अपराध करने का आरोप लगाया गया है या संदेह है की उसने अपराध किया है, यह निर्धारित करने का अधिकार है कि जमानत दी जाए या नहीं। हालांकि यह धारा गैर-जमानती अपराधों में जमानत जारी करने के लिए एक अदालत और एक पुलिस थाने के प्रभारी पुलिस अधिकारी की शक्ति या विवेक को शामिल करती है, यह एक पुलिस अधिकारी की जमानत जारी करने की क्षमता को भी सीमित करती है और एक अभियुक्त व्यक्ति के जमानत पाने के विशिष्ट अधिकारों को परिभाषित करता है जब उस पर मजिस्ट्रेट द्वारा मुकदमा चलाया जा रहा हो।

सी.आर.पी.सी. की धारा 437 के अनुसार, विचारणीय (ट्रायल) न्यायालय और मजिस्ट्रेट के पास किसी ऐसे व्यक्ति को जमानत देने या अस्वीकार करने का अधिकार है जिस पर अपराध करने का आरोप लगाया गया है या जिसके लिए कोई बॉन्ड उपलब्ध नहीं है। केवल एक प्रकार के पुलिस अधिकारी, यानी पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी को इसके तहत अधिकृत (ऑथराइज) किया जाता है की वह गैर-जमानती अपराध के अभियुक्त व्यक्ति को जमानत पर रिहा कर सकता है। इसमें शामिल जोखिम और दांव को देखते हुए, ज़मानत जारी करने के निर्णय का अत्यधिक सावधानी के साथ उपयोग किया जाना चाहिए क्योंकि यह अनिवार्य होने के बजाय अनुमति देने वाला है। कार्रवाई करने से पहले, एक पुलिस थाने अधिकारी को आश्वस्त होना चाहिए कि उसकी शक्ति का उपयोग करने से अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) पक्ष की यह साबित करने की क्षमता खतरे में नहीं पड़ेगी कि अभियुक्त दोषी है। प्रभारी अधिकारी को ज़मानत बॉन्ड को तब तक बनाए रखना चाहिए जब तक वे या तो अदालत में पेश होने वाले अभियुक्त द्वारा या एक सक्षम अदालत के फैसले से रिहा नहीं हो जाता हैं, और मामले की नोटबुक में अभियुक्त को रिहा करने के कारणों या असाधारण आधारों को रिकॉर्ड करना चाहिए। 

जमानत के उद्देश्य से, कानून ने गैर-जमानती अपराधों को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया है:

  1. जिन्हें मृत्यु या आजीवन कारावास की सजा दी गई हो; और
  2. जिन्हें मृत्यु या आजीवन कारावास की सजा ना दी गई हो; 

यदि किसी पुलिस थाने अधिकारी के पास यह मानने का उचित आधार है कि किसी व्यक्ति ने मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध किया है, तो अपराधी को जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता है। जमानत देना है या नहीं देने का आकलन (एसेस) करते समय, एक पुलिस अधिकारी को अभियुक्त की उम्र, लिंग, बीमारी पर विचार करने की अनुमति नहीं है। इन समस्याओं पर केवल एक अदालत द्वारा विचार किया जा सकता है। पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी केवल तभी जमानत जारी कर सकते हैं जहां यह मानने का कोई उचित आधार नहीं है कि अभियुक्त ने एक गैर-जमानती अपराध किया है या जब गैर-जमानती अपराध मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय नहीं है।

सी.आर.पी.सी. की धारा 439 के तहत उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय की शक्ति

सी.आर.पी.सी. की धारा 439 उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय को जमानत देने का अधिकार देती है। सी.आर.पी.सी. की धारा 437 मृत्यु या आजीवन कारावास की सजा वाले अपराधों की स्थितियों में जमानत देने पर रोक लगाती है, जब तक कि यह संदेह से परे न हो कि अभियुक्त दोषी है; हालाँकि, धारा 439 सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय को ऐसे मामलों में भी जमानत देने की अनुमति देती है। जब किसी ऐसे व्यक्ति को जमानत देने की बात आती है जिस पर किसी अपराध का आरोप लगाया गया है और वह हिरासत में है, तो उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय के पास सी.आर.पी.सी., 1973 की धारा 439 के तहत कुछ विशिष्ट प्राधिकरण (अथॉरिटी) हैं। यदि एक मजिस्ट्रेट किसी अभियुक्त व्यक्ति को जमानत देने से इनकार करता है, तो उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय उचित मामलों में जमानत दे सकता है। सी.आर.पी.सी. की धारा 439(1) के अनुसार, एक उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय निम्नलिखित आदेश दे सकता है:

  1. किसी अपराध का आरोप लगने के बाद हिरासत में लिए गए किसी व्यक्ति को जमानत पर रिहा कर दिया जाता है;
  2. कि यदि अपराध धारा 437(3) में सूचीबद्ध प्रकार का है, तो किसी व्यक्ति को जमानत पर रिहा करते समय मजिस्ट्रेट द्वारा लगाए गए किसी भी प्रतिबंध को पलट दिया जाए या बदल दिया जाए।

हालांकि, किसी ऐसे अपराध के अभियुक्त को जमानत देने से पहले जिस पर केवल सत्र न्यायालय द्वारा मुकदमा चलाया जा सकता है या, भले ही वह आजीवन कारावास की सजा के साथ दंडनीय हो, उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय को लोक अभियोजक को आवेदन के बारे में सूचित करना चाहिए। यह तब तक सही है जब तक कि उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय यह न समझे कि ऐसा करना उन कारणों से संभव नहीं है जिन्हें लिखित रूप में प्रलेखित (डॉक्यूमेंट) किया जाना चाहिए। एक उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय यह तय कर सकता है कि अध्याय XXXIII (जमानत के संबंध में) के तहत जमानत पर रिहा किए गए व्यक्ति को सी.आर.पी.सी. की धारा 439 (2) के तहत गिरफ्तार किया जाए और जेल में डाल दिया जाए। भले ही उच्च न्यायालय के पास ज़मानत जारी करने का व्यापक विवेक है, लेकिन गैर-जमानती अपराधों से जुड़ी स्थितियों में विभिन्न शर्तो पर विचार किया जाना चाहिए।

सी.आर.पी.सी. की धारा 439 का दायरा

धारा 439 की सीमांत टिप्पणी (मार्जिनल नोट) स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करती है कि धारा में “विशेष शक्ति” वाक्यांश का उपयोग किया गया है, जो एक अर्थ में “विशेष या अधिक,” जिसका अर्थ है कि इन अदालतों, विशेष रूप से उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय के पास जमानत देने और रद्द करने की अधिक क्षमता है। उनके पास जमानत की शर्तों को बदलने और धारा 437 के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा लगाए गए किसी भी अतिरिक्त प्रतिबंध को लागू करने का अधिकार है। धारा 439 के सीमांत टिप्पणी से यह भी पता चलता है कि जमानत खंड समवर्ती क्षेत्राधिकार (कंकर्रेंट ज्यूरिस्डिक्शन) की अनुमति देता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अभियुक्त एक ही समय में दोनों अदालतों में आवेदन दायर कर सकता है। नतीजतन, ज्यादातर परिस्थितियों में, एक आवेदन पहले सत्र न्यायालय में और फिर उच्च न्यायालय में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, यदि सत्र न्यायालय इसे अस्वीकार करता है।

धारा 439 की शक्तियाँ उस बाधा के अलावा किसी भी बाधा से अप्रतिबंधित हैं जो न्यायालय द्वारा प्रदान की गई सभी विवेकाधीन शक्तियों को नियंत्रित करती हैं। हालांकि धारा 439 का विवेक कुछ पहलुओं में मुक्त है और सबसे गंभीर गैर-जमानती अपराध के मामले में जमानत प्रदान करने के लिए पर्याप्त व्यापक है, इसे अच्छी तरह से स्थापित मानकों के अनुरूप न्यायिक रूप से लागू किया जाना चाहिए। न्यायालय ने कंवर सिंह मीणा बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2012) में टिप्पणी की कि, जबकि संहिता की धारा 439 सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय को ज़मानत देने और रद्द करने में अतिरिक्त क्षेत्राधिकार प्रदान करती है, ये न्यायालय भी उन्हीं कारकों का पालन करते हैं , अर्थात् 

  • आरोपी का चरित्र, सबूत, और स्थिति। 
  • अपराध की गंभीरता,
  • अभियुक्त के न्याय से बचने की संभावना और 
  • सबूतों के साथ छेड़छाड़ और गवाहों के साथ छेड़छाड़ और अन्य बातों की संभावना।

न्यायालय ने आगे कहा कि प्रत्येक आपराधिक मामला एक अनोखा तथ्यात्मक परिदृश्य (फैक्चुअल सिनेरियो) प्रदान करता है जो अदालत के जमानत के फैसले को निर्धारित करता है।

समवर्ती क्षेत्राधिकार

अब यह अच्छी तरह से माना जाता है कि उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय में सी.आर.पी.सी. की धारा 439 के तहत साधारण जमानत के लिए आवेदन करने वाले पक्ष के लिए कोई कानूनी बाधा नहीं है। यह धारा उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय पर स्वतंत्र अधिकार प्रदान करती है, और जब उच्च न्यायालय ऐसी शक्ति का उपयोग करता है, तो यह किसी पुनरीक्षण (रिविजनल) क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं करता है, बल्कि जमानत जारी करने के अपने मूल क्षेत्राधिकार का प्रयोग करता है। नतीजतन, भले ही उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय के पास इस प्रावधान के तहत समवर्ती क्षेत्राधिकार है, तथ्य यह है कि सत्र न्यायालय ने इस धारा के तहत जमानत से इनकार कर दिया है, उच्च न्यायालय को समान तथ्यों के आधार पर और उसी आरोप के लिए तुलनीय आवेदन पर विचार करने से नहीं रोकता है।

हालांकि, यदि पक्ष पहले उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए चुनता है और उच्च न्यायालय के द्वार आवेदन को खारिज कर दिया जाता है, तो मामला खारिज कर दिया जाएगा यदि समान परिस्थितियों के आधार पर एक तुलनीय आवेदन के साथ सत्र न्यायालय से संपर्क किया जाता है। अभियुक्त एक ही समय में सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों में जमानत के लिए आवेदन नहीं कर सकता है।

वैधानिक जमानत

इस प्रकार की जमानत को अनिवार्य जमानत या डिफ़ॉल्ट जमानत के रूप में भी जाना जाता है। यह जमानत का अधिकार है जो तब उत्पन्न होता है जब पुलिस एक निश्चित समय सीमा के भीतर न्यायिक हिरासत में किसी व्यक्ति के संबंध में जांच पूरी करने में विफल रहती है। यह सी.आर.पी.सी. की धारा 167(2) में संहिताबद्ध (कोडिफाइड) है। बिक्रमजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य (2020) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि एक अभियुक्त को “डिफ़ॉल्ट जमानत” का एक अयोग्य अधिकार है यदि वह अपराध की जांच के लिए निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद लेकिन आरोप पत्र (चार्ज शीट) जमा होने से पहले आवेदन करता है। सी.आर.पी.सी. की धारा 167(2) के तहत डिफ़ॉल्ट जमानत का अधिकार सिर्फ एक विधायी अधिकार नहीं है; यह अनुच्छेद 21 के तहत बनाई गई कानूनी प्रणाली का भी हिस्सा है। सामान्य तौर पर, जांच एजेंसी की चूक पर जमानत का अधिकार “अविच्छेद्य (अनएलिनेबल) अधिकार” माना जाता है, हालांकि इसका उपयोग उचित समय पर किया जाना चाहिए।

अपराध की प्रकृति के बावजूद, डिफ़ॉल्ट जमानत एक कानूनी अधिकार है। आरोप पत्र दाखिल करने की समय सीमा उस दिन से शुरू होती है जिस दिन अभियुक्त को पहली बार हिरासत में लिया जाता है। सी.आर.पी.सी. की धारा 173 में एक पुलिस अधिकारी को एक अपराध की उचित जांच पूरी करने के बाद एक रिपोर्ट दर्ज करने की आवश्यकता होती है। सामान्य उपयोग में, इस रिपोर्ट को “आरोप पत्र” के रूप में जाना जाता है।

वैधानिक जमानत का प्रावधान

सी.आर.पी.सी. की धारा 167(2)(a) के तहत वैधानिक जमानत से संबंधित प्रावधान दिए गए है। इसमें कहा गया है कि मजिस्ट्रेट अभियुक्त व्यक्ति को 15 दिनों तक की अवधि के लिए पुलिस हिरासत के अलावा हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है, लेकिन 90 दिनों की अवधि से अधिक नहीं, अगर जांच मृत्यु, आजीवन कारावास या दस साल की जेल से अधिक के दंडनीय अपराध से संबंधित है और 60 दिन की अवधि अगर पूछताछ किसी और अपराध के बारे में है। यदि 90 या 60 दिनों के बाद जांच पूरी नहीं होती है, तो अभियुक्त को जमानत पर रिहा कर दिया जाना चाहिए। फिर भी, अदालत ज़मानत देते समय इस तरह के प्रतिबंध लगा सकती है जैसा कि अदालत आवश्यक समझे।

वैधानिक जमानत कहां प्रस्तुत की जाएगी  

सी.आर.पी.सी. की धारा 190 के अनुसार, हालांकि अपराध विभिन्न अदालतों में विचारणीय हो सकते हैं, लेकिन विशेष रूप से सशक्त प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट और द्वितीय श्रेणी के मजिस्ट्रेट के अलावा कोई भी अदालत अपराध का संज्ञान (कॉग्निजेंस) नहीं लेगी। निचली अदालत किसी भी शिकायत, पुलिस रिपोर्ट या स्वत: संज्ञान पर अपराध का संज्ञान लेने के बाद मामले को सत्र न्यायालय में प्रस्तुत करेगी। चूंकि यह प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट और द्वितीय श्रेणी के मजिस्ट्रेट की अदालत है, जो अपराध का संज्ञान लेते हैं और जांच के लंबित रहने के दौरान अभियुक्त को पुलिस या न्यायिक हिरासत में भेजने के लिए सभी शक्तियों का प्रयोग करते हैं, इसलिए इन अदालतों के पास केवल धारा 167 (2)(a) के तहत डिफ़ॉल्ट जमानत देने की शक्ति है।

अभियुक्त वैधानिक जमानत के अपने अधिकार का उपयोग करने में कब सक्षम होता है

जब किसी व्यक्ति को वारंट के बिना हिरासत में लिया जाता है, तो पुलिस को उसे मजिस्ट्रेट के सामने लाने के लिए बाध्य किया जाता है यदि जांच 24 घंटे के भीतर समाप्त नहीं होती है और बिना किसी देरी के जांच पूरी कर लेती है। हालांकि कानून में निर्दिष्ट कोई समय प्रतिबंध नहीं है जिसमें सी.आर.पी.सी. की धारा 173(1A) में निर्दिष्ट बाल बलात्कार से संबंधित स्थितियों को छोड़कर जांच पूरी की जानी चाहिए, यह सी.आर.पी.सी. की धारा 167(2)(a) के तहत निर्दिष्ट किया गया है कि अगर 90 या 60 दिनों के भीतर जांच पूरी नहीं होती है, तो परिस्थितियों के आधार पर, अभियुक्त व्यक्ति जमानत तैयार करने और प्रस्तुत करने पर बॉन्ड पर मुक्त हो जाएगा। इसलिए यह 90 दिनों या 60 दिनों की अवधि के समापन पर है, जैसा भी मामला हो, कि अभियुक्त डिफ़ॉल्ट जमानत का अधिकार प्राप्त करता है।

हालांकि धारा 167 को साधारण रूप से पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि यदि 90 या 60 दिनों की अवधि के बाद जांच पूरी नहीं की जाती है तो अभियुक्त को जमानत पर मुक्त होने का मूल अधिकार है, यह सवाल कि क्या अधिकार को अभियुक्त के पक्ष में अर्जित किया गया है, यह निम्नलिखित परिस्थितियों में उत्पन्न होता है, सबसे पहले, जब जांच रिपोर्ट 60 या 90 दिनों की समाप्ति के बाद प्राप्त होती है, मामले पर निर्भर करता है, लेकिन उसी दिन जब अभियुक्त डिफ़ॉल्ट जमानत के लिए आवेदन करता है। ऐसे में अभियुक्त का अधिकार रद्द नहीं किया जाएगा। एक बार अधिकार प्राप्त हो जाने के बाद, यह अभेद्य (अनएसेलेबल) है, और जांच एजेंसी द्वारा जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने से अभियुक्त को डिफ़ॉल्ट जमानत के अपने अधिकार का प्रयोग करने से नहीं रोका जा सकेगा।

एक और मुद्दा तब उठता है, जब अभियुक्त को डिफ़ॉल्ट जमानत का अधिकार होने के बावजूद, वह इसकी मांग नहीं करता है। ऐसे मामले में, धारा 167 स्पष्ट रूप से कहती है कि अभियुक्त को तब तक जेल से मुक्त नहीं किया जा सकता है जब तक की वह जमानत नहीं देता। हालांकि, किसी लिखित आवेदन की आवश्यकता नहीं होती है, और धारा 167 के तहत विशेषाधिकार (प्रिविलेज) का प्रयोग करने के लिए एक मौखिक बयान पर्याप्त है। मुद्दा तब भी उठता है जब अभियुक्त परिश्रमपूर्वक डिफ़ॉल्ट जमानत के अपने अधिकार का प्रयोग करता है और इसके लिए आवेदन करता है, लेकिन आवेदन को अस्वीकार कर दिया जाता है, और यदि अभियुक्त अपीलीय अदालत में अपील दायर करता है और मामले के लंबित रहने के दौरान आरोप पत्र पूरा हो जाता है, तो अभियुक्त डिफ़ॉल्ट जमानत के अपने अधिकार को खो देता है क्योंकि अपीलीय अदालत में याचिका केवल उच्च न्यायालय के समक्ष कार्रवाई की निरंतरता है।

अग्रिम जमानत

1973 की आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 438 भारतीय आपराधिक कानून में अग्रिम जमानत का प्रावधान प्रदान करती है। भारत के विधि आयोग ने अपनी 41वीं रिपोर्ट में उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय को “अग्रिम जमानत” देने के लिए अपराधिक प्रक्रिया संहिता में एक प्रावधान अपनाने के महत्व पर प्रकाश डाला था। यह धारा एक व्यक्ति को गैर-जमानती अपराध के संदेह में गिरफ्तारी से पहले जमानत का अनुरोध करने की अनुमति देती है। इस धारा को शामिल करने का सबसे पहला लक्ष्य यह सुनिश्चित करना था कि किसी भी व्यक्ति को तब तक किसी भी रूप में कैद न किया जाए जब तक कि वह दोषी न पाया जाए।

सी.आर.पी.सी. के तहत अग्रिम जमानत

यदि किसी व्यक्ति के पास यह विश्वास करने का कारण है कि उसे एक गैर-जमानती अपराध करने के संदेह में गिरफ्तार किया जा सकता है, तो वह इस धारा के तहत एक निर्देश के लिए उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय में आवेदन कर सकता है कि ऐसी गिरफ्तारी की स्थिति में, उसे जमानत पर रिहा कर दिया जाए, और अदालत उसे अग्रिम जमानत दे देगी। आपराधिक प्रक्रिया (संशोधन) अधिनियम, 2005 की धारा 438(1A) निम्नलिखित तत्वों को संबोधित करती है जिन्हें अदालत अग्रिम जमानत देने से पहले ध्यान में रखती है:

  1. आरोप की प्रकृति और गंभीरता।
  2. आवेदक की पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड), विशेष रूप से क्या उसने कभी किसी संज्ञेय अपराध के लिए अदालत द्वारा सजा देने के बाद जेल में समय बिताया है।
  3. आवेदक की न्याय से भागने की क्षमता।
  4. यदि आवेदक को गिरफ्तार कर उसे चोट पहुँचाने या अपमानित करने के इरादे से आरोप लगाया गया है, तो या तो आवेदन को तुरंत अस्वीकार कर दें या अग्रिम जमानत देने का अंतरिम आदेश दें।

यदि उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय आवेदक को अंतरिम जमानत देता है, तो अदालत लोक अभियोजक और पुलिस अधीक्षक (सुप्रिटेंडेंट) को तुरंत आदेश की एक प्रति के साथ कारण बताओ नोटिस जारी करेगी, और लोक अभियोजक को सुनवाई का एक उचित अवसर प्रदान करेगी, जब आवेदन को अदालत द्वारा अंतिम रूप से सुना जाएगा। अग्रिम जमानत की मांग करने वाले आवेदक को आवेदन की अंतिम सुनवाई और अदालत द्वारा अंतिम आदेश जारी करने के समय उपस्थित होना चाहिए।

अग्रिम जमानत प्राप्त करने की पात्रता

जब किसी व्यक्ति के पास यह संदेह करने का आधार हो कि उसे किसी से दुश्मनी के कारण झूठे आरोपों में गिरफ्तार किया जाएगा या उसे चिंता है कि उसके खिलाफ एक झूठा मामला स्थापित किया जा सकता है, तो उसे सी.आर.पी.सी. की धारा 438 के तहत जमानत देने के लिए, सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने का अधिकार है, और अदालत यदि उचित समझे, तो उसे जमानत पर रिहा करने का निर्देश दे सकती है। जैसा कि मध्य प्रदेश राज्य बनाम प्रदीप शर्मा (2013) के मामले में कहा गया है, एक अभियुक्त जिसे सी.आर.पी.सी. की धारा 82 के तहत भगोड़ा/घोषित अपराधी नामित किया गया है और जिसने जांच में सहयोग नहीं किया है, उसे अग्रिम रिहाई नहीं दी जाएगी। इस प्रकार, अग्रिम जमानत पाने के लिए निम्नलिखित शर्तों को पूरा किया जाना चाहिए:

  1. एक आवश्यकता कि व्यक्ति आवश्यकतानुसार एक पुलिस अधिकारी द्वारा पूछताछ के लिए खुद को आसानी से उपलब्ध बनाता है;
  2. एक शर्त कि वह व्यक्ति, प्रत्यक्ष (डायरेक्ट) या अप्रत्यक्ष (इनडायरेक्ट) रूप से, मामले के तथ्यों से परिचित किसी भी व्यक्ति को अदालत या किसी पुलिस अधिकारी को इस तरह के विवरण का खुलासा न करने के लिए राजी करने के लिए कोई प्रलोभन, धमकी या वादा प्रदान नहीं करता है;
  3. एक आवश्यकता कि व्यक्ति को अदालत की पूर्व स्वीकृति के बिना भारत नहीं छोड़ना चाहिए।

इसके अलावा, सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य (1980) के मामले में यह कहा गया कि राहत के एक सामान्य आदेश और अग्रिम जमानत के आदेश के बीच का अंतर यह है कि गिरफ्तारी के बाद सामान्य आदेश प्रदान किया जाता है और परिणामस्वरूप इसका मतलब पुलिस की हिरासत से रिहाई होता है, अग्रिम जमानत को गिरफ्तारी से पहले जारी किया जाता है और इसलिए, यह गिरफ्तारी के एक ही समय में प्रभावी होती है। एक अन्य मामले रुक्मणी महतो बनाम झारखंड राज्य (2017), में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने विचारणीय अदालतों को सलाह दी कि यदि किसी अभियुक्त को पहले से ही एक उच्च न्यायालय से अंतरिम अग्रिम ज़मानत मिल चुकी है और मामला अभी भी उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है, तो उसे नियमित जमानत नहीं दी जानी चाहिए।

अंतरिम जमानत

अंतरिम जमानत अदालत द्वारा जारी एक अस्थायी जमानत है, जब कोई आवेदन चल रहा है या जब तक अदालत द्वारा अग्रिम जमानत या नियमित जमानत याचिका पर सुनवाई नहीं हो जाती है। यह मामले की आवश्यकताओं के अनुसार जारी किया जाता है। अंतरिम जमानत का समय बढ़ाया जा सकता है, लेकिन अगर अभियुक्त व्यक्ति अंतरिम जमानत की पुष्टि और/या जारी रखने के लिए अदालत को भुगतान करने में विफल रहता है, तो उसकी स्वतंत्रता खो जाएगी, और उसे जेल में डाल दिया जाएगा, या उसके खिलाफ वारंट जारी किया जाएगा। 

यह अग्रिम जमानत के समान नहीं है, जो जमानत अर्जी के लंबित रहने के दौरान दी जाती है। अंतरिम जमानत केवल उन अभियुक्तों की सहायता कर सकती है जो मानते हैं कि उन पर अपराध का झूठा आरोप लगाया गया है और वे जल्द से जल्द जेल से या जमानत पर बाहर निकलना चाहते हैं। अंतरिम जमानत के लिए सी.आर.पी.सी. में कोई अलग धारा नहीं है, लेकिन इस उदाहरण में भी वही प्रतिबंध लागू होते हैं।

अंतरिम जमानत – अदालत की अंतर्निहित (इन्हेरेंट) शक्ति

जब कोई व्यक्ति सामान्य जमानत या नियमित जमानत मांगता है, तो अदालत आमतौर पर कुछ दिनों के बाद आवेदन करती है ताकि वह केस डायरी की समीक्षा (रिव्यू) कर सके, जो पुलिस अधिकारियों से प्राप्त होनी चाहिए, और आवेदक को अंतरिम रूप से जेल में रहना चाहिए। भले ही आवेदक को बाद में बॉन्ड पर मुक्त कर दिया गया हो, समाज में उसकी छवि को अपरिवर्तनीय रूप से नुकसान हो सकता है। एक व्यक्ति की प्रतिष्ठा एक मूल्यवान संपत्ति है और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके अधिकार का एक घटक है। 

नतीजतन, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जमानत देने के अधिकार में संबंधित अदालत के अंतर्निहित क्षेत्राधिकार में किसी व्यक्ति को जमानत आवेदन के अंतिम निपटारे तक अंतरिम रिहाई देना शामिल है। हालांकि अंतरिम जमानत देना अदालत के विवेक पर है, यह विकल्प मौजूद है।

अंतरिम जमानत की अनिवार्यताएं/विशेषताएं

अंतरिम जमानत की निम्नलिखित विशेषताएं हैं:

  1. यह केवल अस्थायी रूप से या थोड़े समय के लिए पेश की जाती है।
  2. यह तब जारी की जाती है जब अग्रिम जमानत या नियमित जमानत के लिए आवेदन अदालत में लंबित हो।
  3. जमानत की अवधि समाप्त होते ही अपराधी को बिना वारंट के गिरफ्तार कर लिया जाता है।
  4. अंतरिम जमानत रद्द करने की कोई निर्धारित प्रक्रिया नहीं है।

अंतरिम जमानत की अवधारणा और दायरा

जैसा कि पहले कहा गया है, अंतरिम रिहाई एक सीमित समय के लिए दी जाती है जबकि अदालत में अग्रिम और नियमित जमानत की सुनवाई चल रही है। धारा 438 एक लंबित अग्रिम जमानत सुनवाई के संदर्भ में एक अंतरिम आदेश जारी करने के लिए अदालत के अधिकार को संदर्भित करता है। हालांकि सी.आर.पी.सी. में कहीं भी अंतरिम जमानत निर्दिष्ट नहीं है, अदालतों ने अक्सर अपने निर्णयों के माध्यम से अंतरिम जमानत के अर्थ और सीमा की व्याख्या करने का प्रयास किया है। सुखवंत सिंह और अन्य बनाम पंजाब राज्य (1995) के मामले में अंतरिम जमानत की विशेषता, अभियुक्त की छवि की रक्षा के उपाय के रूप में थी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में निष्कर्ष निकाला कि अंतरिम राहत देने के लिए अदालतों का अधिकार जमानत देने की उनकी शक्ति में निहित है। अंतरिम ज़मानत का विचार महत्वपूर्ण है क्योंकि एक अभियुक्त अपनी ज़मानत पर फ़ैसला जारी होने से पहले ही गिरफ़्तारी का जोखिम उठा सकता है। अंतरिम जमानत तब दी जाती है जब अदालत को समझा दिया जाता है कि अभियुक्त को गलत तरीके से गिरफ्तार या जेल जाने से बचाना आवश्यक है। लाल कमलेंद्र प्रताप सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2009) के मामले में, अदालत ने फैसला सुनाया कि अंतिम ज़मानत के आवेदन के परिणाम की प्रतीक्षा करते हुए उचित परिस्थितियों में अंतरिम ज़मानत दी जानी चाहिए क्योंकि गिरफ्तारी और कारावास किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकते हैं। 

अंतरिम जमानत देने के लिए सामान्य आधार 

परमिंदर सिंह और अन्य बनाम पंजाब राज्य (2001), के मामले में माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि निम्नलिखित परिस्थितियों में अंतरिम जमानत दी जानी चाहिए:

  1. जब अभियुक्त के अभियोजन से बचने की कोई संभावना न हो; और
  2. जब कोई संभावना नहीं है कि प्रतिवादी साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ करेगा।
  3. जब विवश पूछताछ का कोई औचित्य (जस्टिफिकेशन) नहीं है, और
  4. जब अग्रिम जमानत की सुनवाई को पुनर्निर्धारित किया जाना चाहिए।

सत्र न्यायाधीशों और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीशों के लिए यह आवश्यक है कि वे उपयुक्त मामलों में अभियुक्तों को रिहा करने के निर्देश में सतर्क रहें, जहां उच्च न्यायालय द्वारा अंतरिम जमानत पर अभियुक्तों को रिहा करने के लिए विशेष निर्देश जारी किए गए हों। ऐसी परिस्थितियों में, सत्र न्यायाधीशों/अतिरिक्त सत्र न्यायाधीशों को अपने आदेशों में अनिवार्य रूप से यह उल्लेख करना चाहिए कि अभियुक्त लोगों को जल्द से जल्द रिहा किया जाना चाहिए और केवल ज़मानतदार सत्यापित (वेरिफाई) करने के लिए नहीं रखा जाना चाहिए।

सी.आर.पी.सी. में जमानत के महत्वपूर्ण प्रावधान

धारा प्रावधान
436 किन परिस्थितियों में जमानत मिलनी चाहिए
436A  विचारण से पहले कैदियों के लिए क़ैद का अधिकतम समय
437 अगर अपराध जमानती नहीं है तो जमानत
438 गिरफ्तारी का सामना कर रहे व्यक्ति को जमानत देने का निर्देश (अग्रिम जमानत)
439 उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय की विशेष जमानत शक्तियां
446A  बॉन्ड रद्दीकरण और जमानत बॉन्ड

जमानत रद्द करना

सी.आर.पी.सी. के तहत प्रावधान है कि अभियुक्त, लोक अभियोजक, शिकायतकर्ता, या कोई अन्य पीड़ित व्यक्ति जमानत समाप्त करने या रद्द करने की शक्ति का उपयोग कर सकता है। इसके साथ ही, उच्च न्यायालय, सत्र न्यायालय और मजिस्ट्रेट सहित विभिन्न निचली अदालतों को पूर्व में दी गई जमानत को रद्द करने का अधिकार है। दूसरी ओर, उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय के अलावा अन्य न्यायालय केवल उनके द्वारा दी गई जमानत को रद्द कर सकते हैं। उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय के पास रद्द करने की अधिक शक्तियाँ हैं, और वे निचली अदालतों द्वारा जारी जमानत को भी रद्द कर सकते हैं। मजिस्ट्रेट सहित निचली अदालतों के पास संहिता की धारा 437(5) के तहत जमानत रद्द करने का अधिकार है, जबकि उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय के पास संहिता की धारा 439(2) के तहत अधिकार है।

सी.आर.पी.सी. की धारा 439(2) के तहत सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार  समवर्ती है। पीड़ित पक्ष मजिस्ट्रेट की जमानत रद्द करने के लिए सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सकता है। रुबीना जहीर अंसारी बनाम शरीफ अल्ताफ फर्नीचरवाला (2014) के मामले में यह कहा गया कि यदि इस तरह की याचिका सत्र न्यायालय के बजाय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई तो यह न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं होगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने महिपाल बनाम राजेश कुमार @ पोलिया और अन्य (2019) में स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि जारी किया गया निर्णय पूरी तरह से तर्कहीन और पूरी तरह से अनुचित है, तो अदालत प्रतिवादी के पक्ष में दी गई जमानत को रद्द करने के लिए सी.आर.पी.सी. की धारा 439(2) के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सकती है। इसके अलावा, जमानत रद्द करने की शक्ति का उपयोग निम्नलिखित परिस्थितियों में किया जा सकता है:

  1. किसी मामले के गुण-दोष पर, विशेष रूप से इस आधार पर कि ज़मानत देने का आदेश विकृत था, उचित विचार के बिना दिया गया था, या किसी मूल या प्रक्रियात्मक कानून का उल्लंघन था; और
  2. जमानत या अन्य पर्यवेक्षण (सुपरवाइजिंग) परिस्थितियों के जारी होने के बाद स्वतंत्रता के दुरुपयोग के आधार पर।

इस प्रकार, यदि जमानत रद्द करने का अनुरोध किसी अधीक्षण (सुपरवेनिंग) घटना या अभियोजन पक्ष और अदालत के लिए अज्ञात तथ्य के आधार पर किया जाता है, जब जमानत दी गई थी, तो धारा 439(2) या धारा 437(5) के तहत याचिका एक ही अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जा सकती है। हालांकि, अगर धारा 439(2) के तहत एक याचिका के माध्यम से जमानत देने के फैसले की संवैधानिकता को चुनौती दी जाती है, तो न्यायिक पदानुक्रम (हायरार्की) में उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका दायर की जानी चाहिए। यानी अगर मजिस्ट्रेट का आदेश जमानत की अनुमति देता है, तो धारा 439(2) के तहत सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका दायर की जा सकती है। हालाँकि, यदि जमानत आदेश सत्र न्यायालय द्वारा जारी किया गया था, तो इसकी वैधता पर केवल उच्च न्यायालय में ही सवाल उठाया जा सकता है। यदि उच्च न्यायालय जमानत देता है, तो इस तरह के फैसले की संवैधानिकता को केवल सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील की जा सकती है। यहां तक ​​कि सर्वोच्च न्यायालय, जिसके पास अपार शक्तियां हैं, को भी उन्हीं मानदंडों से निर्देशित किया जाता है, जो सी.आर.पी.सी. की धारा 437(5) या 439(2) के तहत आवेदनों का मूल्यांकन करते समय निचली अदालतों को बाध्य करते हैं।

रद्द करने के लिए आधार 

अब यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि जमानत रद्द करना एक ऐसा आदेश है जो किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है। नतीजतन, इसे लापरवाही से इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यह जमानत नामंजूरी की तुलना में एक अलग आधार पर खड़ा है, और इसलिए दोनों परिस्थितियों में उपयोग किए जाने वाले मानक अलग-अलग हैं। असलम बाबालाल देसाई बनाम महाराष्ट्र राज्य (1992) में, सर्वोच्च न्यायालय ने एक जमानती और गैर-जमानती अपराध के बीच अंतर किया। अदालत के अनुसार, गैर-जमानती मामले में जमानत के आवेदन को खारिज करना पहले से दी जा चुकी जमानत को रद्द करने से ज्यादा आसान है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जमानत रद्द करना अभियुक्त की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करता है, जिसकी गारंटी पहले से ही अदालत के विवेक या कानून के बल द्वारा दी जा चुकी है। 

अधिक सटीक रूप से, जमानत पर रिहा अभियुक्त को फिर से गिरफ्तार करने के अधिकार का उपयोग सावधानी और विवेक के साथ किया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णयों की बहुलता में निगरानी करने वाले कारकों की एक सूची को मान्यता दी है और उसकी व्याख्या की है, जिसके परिणामस्वरूप अदालत से एक आदेश की आवश्यकता हो सकती है, जिसके परिणामस्वरूप जमानत रद्द हो सकती है, लेकिन यह सूची निदर्शी (इलस्ट्रेटिव) है और संपूर्ण नहीं है, जैसा कि मोहम्मद अब्दुल कादिर चौधरी बनाम अब्दुल बासित (2013) के मामले में आयोजित किया गया था। जमानत रद्द करने के सामान्य आधार निम्नलिखित हैं:

  1. अभियुक्त इसी प्रकार के अवैध कार्यों में संलिप्त (इंगेज) होकर अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करता है।
  2. जांच की प्रगति में बाधा डालता है,
  3. साक्ष्य या गवाहों के साथ छेड़छाड़ करता है।
  4. गवाहों को धमकाता है या ऐसे कार्यों में संलग्न होता है जो एक कुशल जांच को बाधित कर सकते हैं,
  5. उसके दूसरे देश में भाग जाने की आशंका है।
  6. भूमिगत (अंडरग्राउंड) होकर या जांच एजेंसी की पहुंच से बाहर रहकर पता लगाने से बचने की कोशिश करता है।
  7. खुद को अपने ज़मानतदार की पहुंच से बाहर रखने की कोशिश करता है, इत्यादि।

भारत के विधि आयोग ने अपनी 268वीं रिपोर्ट में भी इस सूची का उल्लेख किया है। उपरोक्त सूची उन आधारों की विशिष्ट है जिनके लिए रद्द करने का आदेश बार-बार जारी किया जाता है। ये ज्यादातर बाद की घटनाओं या जमानत मिलने के बाद हुई घटनाओं से संबंधित हैं। हालाँकि, न्यायिक निर्णयों ने धारा 439(2) के तहत न्यायालय के क्षेत्राधिकार  की सीमाओं का विस्तार किया है।

अब यह स्पष्ट है कि जमानत देने वाला आदेश जो स्पष्ट अवैधता या विकृति से दूषित है और फैसले के लिए आधार प्रदान नहीं करता है, उपरोक्त धारा के तहत कार्यवाही में उलटा जा सकता है। इसी खंड के तहत, अप्रासंगिक साक्ष्य के आधार पर जमानत देने का आदेश या प्रासंगिक सामग्री को ध्यान में नहीं रखने वाला आदेश निरस्त किया जा सकता है। प्रकाश कदम बनाम राम प्रसाद विश्वनाथ गुप्ता (2011) में, अदालत ने फैसला सुनाया कि यदि अभियुक्त पर महत्वपूर्ण आरोप हैं, तो उसकी जमानत रद्द की जा सकती है, भले ही उसने उसे दी गई जमानत का फायदा नहीं उठाया हो। सर्वोच्च न्यायालय तो यहां तक ​​चला गया है कि जमानत देने के फैसले की अवैधता या विकृति जमानत रद्द करने के लिए एक “स्वतंत्र आधार” है। इसी प्रकार, यदि अभियोजन पक्ष आरोप पत्र जमा करके या अन्यथा अपने दोष/चूक को ठीक करता है, तो सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय को संहिता की धारा 167(2) के तहत जमानत को समाप्त करने और अभियुक्त को जेल में ले जाने का अधिकार है। 

पिछली चर्चा से यह स्पष्ट है कि ऐसे मामलों में जहां ज़मानत आदेश की वैधता को चुनौती दी जा रही है, ज़मानत रद्द करने के लिए एक आवेदन उस अदालत से ऊपर प्रस्तुत किया जाना चाहिए जिसने रिहाई दी थी। हालाँकि, उच्च न्यायालय ज़मानत आदेशों की अपीलों की सुनवाई नहीं करता है, विशेष रूप से तब जब अभियुक्तों पर जाँच में हस्तक्षेप करने या गवाहों/साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने का कोई आरोप नहीं होता है। याचिकाकर्ता को ज़मानत रद्द करने के लिए अकाट्य और भारी कारण प्रदान करने चाहिए। राज्य बनाम इमरान खान (2017) के मामले में, राज्य ने न्यायिक मुद्दों के कारण विशेष अदालत द्वारा प्राप्त जमानत के फैसले को रद्द करने के लिए बॉम्बे उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। उच्च न्यायालय ने इसे प्रस्तुत करने में देरी के साथ-साथ इस तरह के रद्दीकरण को उचित ठहराने वाले बाध्यकारी और जबरदस्त कारणों की अनुपस्थिति का हवाला देते हुए याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। यह भी प्रतीत होता है कि यदि जमानत प्रदान करने वाले न्यायाधीश ने जमानत देते समय कुछ प्रासंगिक सूचनाओं की जांच नहीं की, तो यह अभियुक्त द्वारा जमानत आवश्यकताओं के स्पष्ट अनुपालन के विरुद्ध होगा। जब अदालत में रद्दीकरण का मामला दायर करने की बात आती है, तो अदालतों ने अभियोजन पक्ष को कुछ लचीलापन दिया है।

रद्द करने के लिए उपरोक्त आधार बनाने वाले तथ्यों को उचित संदेह से परे स्थापित करने की आवश्यकता नहीं है। 

निष्कर्ष

अंत में, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को नजरअंदाज करना इतना महत्वपूर्ण है। भारतीय न्यायिक और कानूनी प्रणालियों ने अक्सर व्यक्तियों के ऐसे अविच्छेद्य अधिकारों के महत्व पर जोर दिया है, विशेष रूप से जमानत स्वीकृति और इनकार की परिस्थितियों में। हालांकि, अदालतों को सावधान रहना चाहिए कि बेईमान वादियों और लोगों के साथ क्रूरता से पेश आना चाहिए जब वे न्यायिक उपकरणों का शोषण और दुरुपयोग करते हैं। कानून निस्संदेह सीधे लोगों की मदद और समर्थन करता है, लेकिन इसे आगे बढ़ाने या किसी भ्रामक साजिश को अंजाम देने के लिए नियोजित नहीं किया जा सकता है।

जमानत प्रणाली के व्यापक सुधार की भी महत्वपूर्ण इच्छा है जो हमारी आबादी के बड़े हिस्से की सामाजिक आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखे। ज़मानत देते समय, अदालत को अभियुक्त की सामाजिक आर्थिक स्थिति पर विचार करना चाहिए और उनके प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए। यह पता लगाने के लिए गहन जांच की जा सकती है कि क्या अभियुक्त की जड़ें उस समुदाय में हैं जो उसे अदालत से भागने से रोकेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या अग्रिम जमानत रद्द की जा सकती है?

हां, अग्रिम जमानत देते समय, अदालत विभिन्न नियम और प्रतिबंध निर्धारित करती है, जिनका उल्लंघन करने पर ऐसी अग्रिम जमानत रद्द हो सकती है। दूसरा, यदि अदालत को शिकायतकर्ता या अभियोजन पक्ष से आवेदन प्राप्त होता है, तो अग्रिम जमानत समाप्त की जा सकती है।

एक विचाराधीन कैदी के लिए हिरासत की अधिकतम अवधि क्या है?

सी.आर.पी.सी. की धारा 436A के अनुसार, एक विचारण कैदी को अदालत द्वारा ज़मानत पर रिहा किया जाना चाहिए, अगर उसने कारावास की अधिकतम लंबाई का आधा हिस्सा काट लिया है, तो ऐसे व्यक्ति को दोषी ठहराए जाने पर सजा के रूप में बिताना होगा।

अदालत कब जमानत से इनकार कर सकती है?

एक अभियुक्त व्यक्ति को रिहा नहीं किया जाना चाहिए अगर यह विश्वास करने के लिए उचित आधार हैं कि वह मौत या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध का दोषी है। एक व्यक्ति को रिहा नहीं किया जा सकता है यदि अपराध संज्ञेय है और उसे पहले मौत, आजीवन कारावास, या सात साल या उससे अधिक के कारावास की सजा का दोषी ठहराया गया है या यदि उसे पहले दो या अधिक बार दोषी ठहराया गया है।

यदि किसी व्यक्ति पर गैर-जमानती अपराध का आरोप लगाया गया है तो क्या उसे जमानत दी जा सकती है?

हाँ, गैर जमानती अपराध में अभियुक्त को जमानत मिल सकती है। अपराध की गंभीरता और न्यायालय के विवेक के आधार पर सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय से जमानत दी जा सकती है।

क्या व्यक्ति के लिए नियमित जमानत प्राप्त करना आवश्यक है जबकि उसके पास पहले से ही अग्रिम जमानत है?

नहीं, व्यक्ति को नियमित ज़मानत देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उसकी अग्रिम ज़मानत तब तक मान्य होगी जब तक कि परीक्षण प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती जब तक कि न्यायाधीश इसे रद्द नहीं कर देता। ऐसी परिस्थितियों में, अदालत के अनुरोध पर अग्रिम जमानत को नियमित जमानत में बदल दिया जाता है।

जमानत रद्द करने की अवधारणा क्या है?

अदालत के पास किसी भी समय जमानत रद्द करने का अधिकार है। अदालत के पास सी.आर.पी.सी. की धारा 437(5) और 439(2) के तहत यह अधिकार है। अदालत उसके द्वारा दी गई जमानत को रद्द कर सकती है और पुलिस को उसके कारणों का दस्तावेजीकरण करके व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए कह सकती है।

संदर्भ

  • Janak Raj Jai, Bail Law and Procedures, Universal Law Publishing, 6th edition, 2015
  • Asim Pandey, Law of Practice and Procedure, Second Edition, 2015, LexisNexis.

 

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