बीच बचाव और मध्यस्थता के बीच अंतर

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Difference between Arbitration and Mediation

यह लेख इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कानून की छात्रा Taniya Yadav द्वारा लिखा गया है। यह लेख बीच बचाव (मिडिएशन) और मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) के बीच अंतर और वैकल्पिक विवाद तंत्र (अल्टरनेटिव डिस्प्यूट मैकेनिज्म) के विभिन्न अन्य पहलुओं के बारे में बात करता है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय

भारतीय न्यायिक प्रणाली दुनिया की सबसे पुरानी न्यायिक प्रणालियों में से एक है। यह कोई रहस्य नहीं है कि 1.4 अरब लोगों की आबादी वाले देश में न्यायिक प्रणाली को भारी संख्या में मामलों से निपटना पड़ता है। राज्यसभा के 2022 के मानसून सत्र में केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री द्वारा बताया गया कि देश की विभिन्न अदालतों में 4.7 करोड़ मामले लंबित हैं, जिनमें से 71,000 सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं, 42 लाख विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित हैं और 2.7 करोड़ अधीनस्थ (सबॉर्डिनेट) न्यायालयों में लंबित हैं। 

न्यायिक प्रणाली में अक्षमता के कारण मामलों की लम्बितता बढ़ रही है, जिसके कारण न्यायपालिका पर मामलों का बोझ बढ़ता जा रहा है। न्यायिक प्रणाली पर बोझ को कम करने के लिए एक वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र शुरू किया गया था। मध्यस्थता और बीच बचाव दो ऐसे तंत्र हैं। ये देखने में एक जैसे लगते हैं, लेकिन इनमें बहुत अंतर है। यह लेख बीच बचाव और मध्यस्थता की अवधारणाओं और उन्हें अलग करने वाले अंतरो को सरल बनाने का एक प्रयास है।

वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र

वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र विवादों को सुलझाने का एक वैकल्पिक तरीका है। इसमें मध्यस्थता, बीच बचाव, सुलह (कॉन्सिलिएशन), लोक अदालत, न्यायिक समझौता, और कोई अन्य प्रक्रिया शामिल है जिसमें विवादों को बातचीत के माध्यम से सुलझाना शामिल है न कि मुकदमेबाजी के पारंपरिक रूप के माध्यम से।

यद्यपि ये तंत्र लंबे समय तक भारत में पंचायतों के रूप में प्रचलित रहे, फिर भी उन्हें कानूनी अधिकार अंग्रेजों के आने के बाद ही मिला है।

1889 का मध्यस्थता अधिनियम पहला अधिनियम था जो भारत में वैकल्पिक विवाद तंत्र की अवधारणा से संबंधित था। मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996, एक ऐसा अधिनियम है जो आज लागू है, और इसे तीन बार अर्थात् 2015, 2019 और 2021 में संशोधित किया गया है।

वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र प्रणाली मुख्य रूप से अदालत के बाहर निपटान को बढ़ावा देने के लिए अस्तित्व में आई थी, लेकिन कुछ और उद्देश्य हैं जिन्हें यह हासिल करने की कोशिश करता है:

  • कम प्रक्रिया के साथ वहनीय (अफोर्डेबल) और त्वरित परीक्षण।
  • समझौता, बातचीत, या उचित प्रस्तावों के माध्यम से विवादों का निपटारा।
  • पक्षों को एक-दूसरे के विचारों को बेहतर ढंग से समझने में सक्षम बनाता है, ताकि वे सौहार्दपूर्ण (एमीकेबल) समाधान के लिए जा सकें।
  • कूटनीति (डिप्लोमेसी) के सिद्धांत दोनों पक्षों के लिए बराबर की जीत की स्थिति पर काम करता है।
  • भविष्य के मुद्दों को रोकने और एक व्यवस्थित ढांचा देने के लिए पूर्व-विवाद दिशानिर्देश बनाता है।

मध्यस्थता 

“मैं किसी ऐसे समाज की कल्पना नहीं कर सकता जो मध्यस्थता के किसी तरीके को शामिल नहीं करता है।” 

-हर्बर्ट रीड 

ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी के अनुसार, “मध्यस्थता” का अर्थ है किसी प्रश्न का समाधान, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाना जिस पर पक्ष एक न्यायसंगत निर्णय प्राप्त करने के लिए अपने दावों को संदर्भित करने के लिए सहमत हों।

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996, भारत में मध्यस्थता को, घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनो तरह से, सरल बनाने के लिए अस्तित्व में आया। यह अधिनियम अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक (कमर्शियल) मध्यस्थता पर यूनिसिट्रल मॉडल कानून, 1985 पर आधारित है। मध्यस्थता को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  1. घरेलू मध्यस्थता और
  2. अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता

अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता को मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 2(1)(f) में परिभाषित किया गया है।

यूनिसिट्रल मॉडल कानून अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के लिए विकसित किया गया है। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के विषय पर रेडफेरन और हंटर की प्रमुख टिप्पणी ने मध्यस्थता के संदर्भ में “अंतर्राष्ट्रीय” शब्द से निपटने के लिए तीन दृष्टिकोण प्रदान किए हैं। विवाद की प्रकृति, पक्षों की राष्ट्रीयता और मध्यस्थता के लिए चुने गए स्थान के अलावा पहले दो का मिश्रण तीन दृष्टिकोण हैं। भारतीय कानून ने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को परिभाषित करने के लिए विषय वस्तु के रूप में राष्ट्रीयता को अपनाया है।

इस अधिनियम में “घरेलू” शब्द का उल्लेख नहीं है, लेकिन इसका अर्थ है कि दोनों पक्ष भारत से हैं।

मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2021

इस अधिनियम में अंतिम बार वर्ष 2021 में संशोधन किया गया था। संशोधन में निम्नलिखित परिवर्तनों का प्रावधान किया गया है:

  • जब तक अवॉर्ड के लिए चुनौती निर्धारित नहीं होती है, तब तक भारत मध्यस्थता अवॉर्ड के निर्णय के प्रवर्तन (इंफोर्समेंट) पर बिना शर्त रोक लगा सकता है।
  • मध्यस्थता अधिनियम, 1996 की आठवीं अनुसूची में प्रदान की गई मध्यस्थों की मान्यता के लिए योग्यता और नियमों को हटाना।

धोखाधड़ी या भ्रष्टाचार से प्रेरित मध्यस्थता में एक अवॉर्ड के प्रवर्तन को पूर्वव्यापी (रेट्रोस्पेक्टिव) प्रयोग दिया गया है।

मध्यस्थता कैसे होती है

मध्यस्थता के लिए जाने वाले प्रत्येक मामले में अद्वितीय परिस्थितियाँ होती हैं, लेकिन उनमें से सभी दी गई मध्यस्थता प्रक्रिया का पालन करते हैं।

  1. प्रारंभिक चरण: पक्षों को मध्यस्थता केंद्र द्वारा सूचित किया जाता है कि मामला दर्ज किया गया है। पक्षों को मध्यस्थता प्रक्रिया, जवाब दाखिल करने की नियत तारीख, दस्तावेज जो जमा करने की आवश्यकता होती है और प्रक्रिया शुरू होने से पहले शुल्क (यदि कोई हो) का भुगतान किया जाता है, के बारे में भी सूचित किया जाता है।
  2. आमंत्रण चरण: उन नियमों के आधार पर जो पक्षों की मध्यस्थता को नियंत्रित करते हैं, मध्यस्थता केंद्र के मध्यस्थ, मामले पर कार्य करते हैं। मध्यस्थ दस्तावेजों की समीक्षा (रिव्यू) करता है, विवाद का अध्ययन करता है और किसी भी आवश्यक प्रकटीकरण (डिस्क्लोजर) के साथ हस्ताक्षरित शपथ दस्तावेज़ लौटाता है।
  3. नियुक्ति चरण: पक्षों को मध्यस्थ की नियुक्ति के बारे में सूचित किया जाता है और इसके संबंध में कोई आपत्ति उठाने का अवसर प्रदान किया जाता है। यदि नियत तारीख से पहले कोई आपत्ति उठाई जाती है, तो मध्यस्थता केंद्र तय करता है कि मध्यस्थ को बदलना है या नहीं। यदि मध्यस्थ को हटा दिया जाता है, तो मामला वापस आमंत्रण चरण में चला जाता है और यदि मध्यस्थ को नही हटाया जाता है, तो मामला अगले चरण में चला जाता है।
  4. प्रारंभिक सुनवाई और सूचना का आदान प्रदान चरण: मामले के लिए एक मध्यस्थ की पुष्टि होने के बाद, एक प्रारंभिक बैठक निर्धारित की जाती है और पक्षों और मध्यस्थों के साथ आयोजित किया जाता है। इस बैठक के दौरान, दोनों पक्षों के मुद्दों को संबोधित किया जाता है, पक्षों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जाता है और सुनवाई की तारीख निर्धारित की जाती है।
  5. सुनवाई का चरण: दोनों पक्ष मध्यस्थ के समक्ष अपना मामला प्रस्तुत करते हैं। यह चरण या तो व्यक्तिगत रूप से या पक्षों द्वारा वांछित (डिजायरेबल) माध्यम से हो सकता है। मध्यस्थता समझौता और मामले को नियंत्रित करने वाले नियम कार्यवाही को नियंत्रित करेंगे।
  6. अवॉर्ड चरण: जब मध्यस्थ ने दोनों पक्षों के सभी तर्कों को सुना है और संतुष्ट है कि पक्षों के पास प्रस्तुत करने के लिए कोई नया साक्ष्य नहीं है, तो सुनवाई बंद कर दी जाती है और अवॉर्ड की घोषणा के लिए एक तिथि निर्धारित की जाती है। मध्यस्थ पक्षों को लिखित अवॉर्ड प्रदान करता है जिसके साथ मामला समाप्त हो जाता है और मध्यस्थता केंद्र द्वारा फ़ाइल को बंद कर दिया जाता है।

बीच बचाव 

बीच बचाव एक स्वैच्छिक, बाध्यकारी प्रक्रिया है जिसमें एक निष्पक्ष और तटस्थ (न्यूट्रल) बिचवई (मीडिएटर) विवादित पक्षों को समझौते पर पहुंचने में मदद करता है। एक बिचवई समाधान थोपता नहीं है बल्कि एक अनुकूल वातावरण बनाता है जिसमें विवादित पक्ष अपने सभी विवादों को हल कर सकते हैं।

बीच बचाव पारंपरिक रूप से पति और पत्नी या भाइयों के बीच उत्पन्न होने वाले पारिवारिक विवादों को हल करने के लिए किया जाता था। हाल के वर्षों में, इसका उपयोग व्यावसायिक प्रकृति के विवादों को हल करने के लिए भी किया गया है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019, साथ ही कंपनी बीच बचाव नियम, 2016, और वाणिज्यिक न्यायालयों के तहत पूर्व-संस्था मध्यस्थता नियम, वाणिज्यिक न्यायालयों, वाणिज्यिक प्रभाग (डिविजन) और उच्च न्यायालयों के वाणिज्यिक अपीलीय प्रभाग (संशोधन) अधिनियम, 2018 के तहत विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान के तरीकों में से एक के रूप में बीच बचाव प्रदान किया गया है। एकीकृत (यूनिफाइड) कानून की अनुपस्थिति को देखते हुए बीच बचाव को विवाद समाधान के अन्य तरीकों के रूप में गंभीरता से नहीं लिया जाता है।

बीच बचाव विधेयक (बिल), 2021

बीच बचाव विधेयक, 2021, भारत में बीच बचाव के लिए एक विशिष्ट क़ानून के निर्माण की दिशा में एक कदम है।

विधेयक की विशेषताएं इस प्रकार हैं:

  • देश में बीच बचाव का विनियमन और संवर्धन (प्रोमोशन)।
  • यह मुकदमेबाजी के लिए जाने से पहले पक्षों को बीच बचाव का विकल्प चुनने के लिए बाध्य करता है।
  • यह उन पक्षों के हितों की रक्षा करता है जो तत्काल राहत के लिए अदालतों से संपर्क करते हैं।
  • यह प्रक्रिया की गोपनीयता प्रदान करता है और कुछ मामलों में प्रकटीकरण को प्रतिबंधित करता है।
  • बीच बचाव का परिणाम जो कि बीच बचाव समझौता (एमएसए) है, कानूनी रूप से लागू करने योग्य होगा और राज्य/जिला/तालुक कानूनी अधिकारियों के साथ 90 दिनों के भीतर समझौते को रिकॉर्ड में लाने के लिए पंजीकृत (रजिस्ट्रेबल) होगा।
  • यह भारत की बीच बचाव परिषद की स्थापना के लिए प्रदान करता है।

इस विधेयक को लेकर कुछ दिक्कतें हैं। वो निम्नलिखित हैं:

  • मुक़दमेबाज़ी के पूर्व बीच बचाव का शासनादेश (मैंडेट) भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
  • अदालतों के आदेश और निर्देश संविधान के वैधानिक प्रावधानों को ओवरराइड नहीं कर सकते हैं। इसलिए, विधेयक का खंड 26 संविधान का उल्लंघन है।
  • विधेयक अंतरराष्ट्रीय समझौता और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों की प्रवर्तनीयता पर स्पष्ट नहीं है।

यह विधेयक सही दिशा में एक सही कदम है, लेकिन यह कुछ चुनौतियों को भी जन्म दे रहा है, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है ताकि देश में इस तंत्र के उपयोग में तेजी लाई जा सके।

बीच बचाव कैसे होता है

विवाद समाधान तंत्र के अन्य तरीकों की तुलना में बीच बचाव एक कम औपचारिक (फॉर्मल) प्रक्रिया प्रतीत होती है, लेकिन यह वास्तविकता नहीं है। बीच बचाव में वांछित समाधान पर पहुंचने के लिए बहु-चरणीय प्रक्रिया शामिल होती है।

बीच बचाव की कार्यवाही निम्नलिखित क्रम में होती है:

  1. बीच बचाव की शुरुआत: बीच बचाव की प्रक्रिया तब शुरू होती है जब कोई एक पक्ष विवाद को बीच बचाव केंद्र को सौंपता है और अनुरोध करता है कि बीच बचाव की कार्यवाही की जाए। प्रस्तुति में विवाद का विवरण और पक्षों के बारे में जानकारी शामिल होती है।
  2. बिचवई की नियुक्ति: अनुरोध प्राप्त होने के बाद बीच बचाव केंद्र विवाद की परिस्थितियों को देखते हुए बिचवई नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू करेगा। बिचवई की नियुक्ति दोनों पक्षों से परामर्श के बाद की जाती है।
  3. बीच बचाव से पूर्व संचार (कम्यूनिकेशन): बिचवई की नियुक्ति के बाद, वह बीच बचाव के कार्यक्रम को अंतिम रूप देने के लिए टेलीफोन या संचार के किसी अन्य माध्यम से पक्षों के साथ संचार करता है। वह पक्षों को पहली बैठक से पहले विवादों से संबंधित दस्तावेज को जमा करने की समय सीमा के बारे में भी सूचित करता है।
  4. पहली बैठक: पहली बैठक में, बिचवई सभी का परिचय देता है और बैठक के उद्देश्य, और पूरी प्रक्रिया के दौरान पालन किए जाने वाले नियमों की व्याख्या करता है और पक्षों को विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटाने के लिए संचार करने के लिए प्रोत्साहित करता है। दोनों पक्षों से विवाद के कारण और उन पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में समझाने के लिए कहा जाता है। बिचवई पक्षों को एक-दूसरे के सवालों का जवाब देने के लिए प्रोत्साहित करता है ताकि उन्हें अपनी बातों को सूचित करने में मदद मिल सके।
  5. निजी बैठकें: निजी बैठक दोनों पक्षों के लिए बिचवई से अलग-अलग मिलने का एक अवसर है। प्रत्येक पक्ष को एक अलग कमरे में रखा जाता है। बिचवई प्रत्येक पक्ष की ताकत और कमजोरियों पर चर्चा करने और प्रस्तावों का आदान-प्रदान करने के लिए दो कमरों के बीच जाता है।
  6. संयुक्त बातचीत: एक निजी बैठक के बाद, बिचवई पक्षों को सीधे बातचीत के लिए लाता है, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है। बिचवई पक्षों को तभी वापस लाता है जब समझौता हो जाता है या बीच बचाव के लिए आवंटित समय समाप्त हो जाता है।
  7. अंतिम निर्णय: जब पक्ष एक सर्वसम्मत (यूनेनिमस) निर्णय पर पहुंचते हैं, तो बिचवई इसे लिखित रूप में रखता है और दोनों पक्षों को समझौते के लिखित दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के लिए कहता है। जब वे अंतिम निर्णय से सहमत नहीं होते हैं, तो बिचवई सुझाव देता है कि पक्ष या तो आगे की चर्चा के लिए एक बार फिर से मिलें या विवाद समाधान के अन्य तरीकों के लिए जाएं।

बीच बचाव और मध्यस्थता के बीच अंतर

अंतर के बिंदु  बीच बचाव  मध्यस्थता 
लागत  किफायती प्रक्रिया महंगी प्रक्रिया
तटस्थ तृतीय पक्ष बिचवई एक सुविधाप्रदाता के रूप में कार्य करता है। मध्यस्थ एक निर्णायक के रूप में कार्य करता है।
कार्यवाही की प्रकृति कार्यवाही किसी विशिष्ट क़ानून द्वारा शासित नहीं होती है और इसलिए लचीली होती है। कार्यवाही, मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 के प्रावधानों द्वारा शासित होती है और कठोर होती है।
निर्णय की प्रकृति एक समझौता तभी बाध्यकारी होता है जब दोनों पक्ष उस पर पारस्परिक रूप से सहमत हो। मध्यस्थता की कार्यवाही में दिया गया निर्णय पक्षों के लिए बाध्यकारी होता है और इसे केवल कुछ विशिष्ट आधारों पर ही चुनौती दी जा सकती है।
औपचारिकता का स्तर लचीले प्रक्रियात्मक चरणों के साथ एक अनौपचारिक कार्यवाही निजी तौर पर आयोजित की जाती है। एक औपचारिक कार्यवाही गुप्त रूप से आयोजित की जाती है और इसमें सख्त प्रक्रियात्मक चरण होते हैं।
पक्षों के बीच संचार पक्ष एक बिचवई की उपस्थिति में एक दूसरे के साथ संचार करते हैं। पक्ष आपस में संचार नहीं करते हैं।
न्यायालय शुल्क निपटान के मामलों में न्यायालय शुल्क वापस किया जा सकता है जहां अदालत ने बीच बचाव को संलग्न किया है। कोई न्यायालय शुल्क नहीं है।

बीच बचाव और मध्यस्थता के बीच एक बेहतर विकल्प क्या है और क्यों

बीच बचाव दोनों के बीच पसंदीदा विकल्प है क्योंकि यह अधिक लचीली प्रक्रिया है। बीच बचाव की कार्यवाही का लचीलापन उन्हें अधिक अनुकूल बनाने का एकमात्र कारण नहीं है। अन्य कारण प्रक्रिया की गोपनीयता है। उदाहरण के लिए, कई बार विवादों के सार्वजनिक प्रकटीकरण से पक्षों की प्रतिष्ठा को अपरिवर्तनीय नुकसान होता है, जिसे आसानी से टाला जा सकता है जब तक कि बीच बचाव की कार्यवाही दोनों पक्षों और बिचवई के बीच रखी जाती है।

गोपनीयता के अलावा, अनिश्चित समय का सामना कर रही अर्थव्यवस्थाओं के साथ, व्यवसाय के प्रतियोगी किसी अन्य विवाद समाधान तंत्र पर विवादों को हल करने के लिए बीच बचाव का विकल्प चुन रहे हैं, यह पक्षों को उन समाधानों तक पहुंचने में सक्षम बनाता है जो बिचवई  द्वारा उचित संचार के माध्यम से दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद होते हैं।

इसके अलावा, यह विवाद समाधान के अन्य तरीकों की तुलना में अधिक बेहतर विकल्प है क्योंकि इसमें न्यूनतम लागत शामिल है और साक्ष्य की प्रस्तुति के लिए बहुत गुंजाइश है जिस पर अन्यथा विचार नहीं किया जाता।

पक्षों के बीच बचाव में जाने का एक और कारण यह है कि बिचवई  बेहतर समाधान खोजने में पक्षों की मदद करता है, लेकिन उन्हें बीच बचाव में भाग लेने या बिचवई  से सुझाव चुनने के लिए बाध्य नहीं करता है, यदि वे रुचि नहीं रखते हैं। इसके अलावा, समापन समाधान गैर-बाध्यकारी है और अंततः इसे स्वीकार या अस्वीकार करना पक्षों के विवेक पर निर्भर करता है।

मध्यस्थता और बीच बचाव में विकास के लिए तत्पर हैं

बीच बचाव पर एक विशिष्ट कानून अभी भी भारतीय परिदृश्य में नहीं है, लेकिन सिंगापुर कन्वेंशन के प्रभाव में आने और बीच बचाव विधेयक, 2021 को उचित परिश्रम के बाद लागू किए जाने से हम आने वाले वर्षों में भारत में बीच बचाव के लिए बेहतर परिदृश्य की उम्मीद कर सकते हैं।

सिंगापुर कन्वेंशन वैश्विक प्रयासों को एकजुट करने और वाणिज्यिक विवादों में बीच बचाव को अपनाने में तेजी लाने का प्रयास करता है।

भारत न्यूयॉर्क कन्वेंशन के मूल हस्ताक्षरकर्ताओं में से एक है, लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय मानकों (स्टैंडर्ड) को बनाए रखने में विफल रहा है। हालाँकि, पक्ष लगातार अदालतों के समर्थक मध्यस्थता दृष्टिकोण के साथ मध्यस्थता का विकल्प चुनते हैं और मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 में 2015, 2019 और 2021 के संशोधन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति में सुधार कर रहे हैं।

निष्कर्ष

भारत वर्ष 2022 में यूनाइटेड किंगडम की जगह लेते हुए दुनिया में आकार के मामले में पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन गया है। भारत को इस स्थिति को बनाए रखने और आगे बढ़ने के लिए विदेशी निवेश को आकर्षित करने में सक्षम होने के लिए एक मजबूत विवाद समाधान तंत्र की आवश्यकता है। भारत में अदालतों के समक्ष इतने सारे मामले लंबित होने के कारण, भारत के साथ-साथ विदेशों में भी शामिल व्यवसायों की पहली प्राथमिकता मध्यस्थता या बीच बचाव के माध्यम से विवादों को हल करना है।

मध्यस्थता और बीच बचाव की अवधारणा भारत में कई वर्षों से मौजूद है, और इन क्षेत्रों में हाल के घटनाक्रम उनकी वैधता को और मजबूत करने जा रहे हैं।

पिछले पांच वर्षों में, भारत ने मध्यस्थता और बीच बचाव जैसे वैकल्पिक विवाद तंत्रों के प्रति अदालतों और विधायकों के दृष्टिकोण में लगातार सकारात्मक बदलाव देखा है। ये परिवर्तन निश्चित रूप से वैकल्पिक विवाद समाधान के अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ भारत को बराबरी पर लाएंगे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

मध्यस्थता पर बीच बचाव का प्रमुख लाभ क्या है?

बीच बचाव सस्ता है और जब विवाद समाधान की बात आती है तो मध्यस्थता की तुलना में कम औपचारिक प्रक्रियाएं शामिल होती हैं।

मध्यस्थों और बिचवई  की भूमिकाओं में क्या अंतर है?

बिचवई  पक्षों के बीच संचार की सुविधा प्रदान करके विवाद को हल करने में सहायता करते हैं, जबकि मध्यस्थ विवाद की जांच करने के बाद उचित निर्णय देते हैं।

किन स्थितियों में बीच बचाव के स्थान पर मध्यस्थता का उपयोग किया जा सकता है?

मध्यस्थता एक निर्धारित प्रक्रिया के साथ आती है और इसका उपयोग तब किया जा सकता है जब पक्षों में गंभीर असहमति हो और मामले में हल करने के लिए एक गंभीर मुद्दा शामिल हो।

संदर्भ

 

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