भारतीय कानूनों में कहावतों का समावेश एवं उनका महत्व

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यह लेख न्यू लॉ कॉलेज, भारती विद्यापीठ विश्वविद्यालय, पुणे की Shushmita choudhary द्वारा लिखा गया है। यह एक विस्तृत लेख है जो कानूनी क्षेत्र में कहावतों के अर्थ, उत्पत्ति, महत्व, कमियों और उपयोग के बारे में बात करता है। इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

कानूनी कहावत एक सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) रूप से स्वीकृत सिद्धांत या कानून का प्रस्ताव या कानूनी नीति है जिसे आम तौर पर लैटिन भाषा में कहा जाता है। लैटिन कहावतें ज्यादातर मध्यकालीन युग से यूरोपीय राज्यों में आईं, जो लैटिन को अपनी कानूनी भाषा मानते थे। एक कानूनी कहावत किसी मौलिक नियम के शब्द की तरह प्रतीत होने वाली संक्षिप्त-अभिव्यक्ति है। यह अक्सर शिक्षाप्रद (इंस्ट्रक्टिव) होता है और कुछ विशिष्ट कार्यों से संबंधित होता है। ये सिद्धांत अदालतों को मुद्दों पर निष्पक्ष निर्णय लेने में मौजूदा कानूनों को लागू करके अधिक प्राचीन तरीके से न्याय देने में सक्षम बनाते हैं। कहावतों के पास कानून का अधिकार नहीं है, लेकिन जब वह मुद्दों पर निर्णय लेते समय या कानून बनाते समय शामिल किया जाता है, तो वे कानून में ढल जाते हैं और निर्णय का एक ठोस आधार बनाते हैं।

अर्थ

कहावत को अंग्रेज़ी में मैक्सिम कहते हैं, मैक्सिम  शब्द ‘एक्सिओमा’ का लैटिन व्युत्पन्न (डेरिवेशन) है जिसका अर्थ है पहला सिद्धांत, उदाहरण के लिए, ज्यामिति (ज्योमेट्री)। स्वयंसिद्ध (एक्सियोम) प्रथम सिद्धांत प्रकृति में स्वतः स्पष्ट हैं। सभी सहायक पूर्वसर्ग (प्रीपोजिशन) उनसे निकाले जा सकते थे लेकिन वे खुद अविकसित थे। उनका अपना अधिकार था। इसलिए, एक कानूनी कहावत बिना किसी विरोधाभास (कंट्राडिक्शन) के स्वयं-स्पष्ट पहला सिद्धांत होगा।

हंगेरियन-ब्रिटिश बहुश्रुत माइकल पोलानी, जिन्होंने विज्ञान और सामाजिक विज्ञान के दर्शन (फिलॉसफी) में गहरा योगदान दिया, उन्होंने कहा, “कहावत एक नियम हैं, जिनका सही अनुप्रयोग उस कला का हिस्सा है जिसे वे नियंत्रित करते हैं”।

सर जेम्स फिट्जजेम्स स्टीफन, जो एक अंग्रेजी वकील, न्यायाधीश और लेखक है, उन्होंने कहा, “मुझे ऐसा लगता है कि कानूनी कहावतें, सामान्य तौर पर, अध्यायों के उचित शीर्षकों से कुछ अधिक हैं। वे अधिकतम की अपेक्षा न्यूनतम हैं, क्योंकि वे विशेष रूप से महान नहीं बल्कि विशेष रूप से कम मात्रा में जानकारी देते हैं। जैसा कि अक्सर नहीं होता, उनके लिए अपवाद और अयोग्यताएं तथाकथित नियमों से अधिक महत्वपूर्ण हैं।”

सर जेम्स मैकिंटोश, एक स्कॉटिश न्यायविद (ज्यूरिस्ट), व्हिग राजनेता और साथ ही इतिहासकार ने कहावतों पर अपना बयान इस प्रकार दिया, “कहावते राष्ट्रों की संक्षिप्त अच्छी भावना हैं”।

उत्पत्ति

अधिकांश वकील लैटिन वाक्यांशों का प्रयोग करना पसंद करते हैं। इसका कारण यह है कि प्राचीन रोम की कानूनी प्रणाली का कई पश्चिमी देशों की कानूनी प्रणालियों पर हमेशा गहरा प्रभाव रहा है। इसके पीछे यह तथ्य निहित है कि यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व के अधिकांश हिस्सों पर रोमनों ने कब्ज़ा कर लिया था। रोमन आदर्श वाक्य था “डिवाइड एट इम्पेरा” जिसका अर्थ है फूट डालो और राज करो।

जैसे-जैसे रोमन राष्ट्रों पर विजय प्राप्त करते गए, उन्होंने बर्बर लोगों का लैटिनीकरण करना शुरू कर दिया, जिसका अर्थ था कोई भी जो रोमन नहीं था। जाहिर है, उनका लक्ष्य दूसरों को असली रोमन बनना सिखाना था। जब रोमन साम्राज्य धीरे-धीरे ढह गया और अपना महत्व खो दिया तो इन भूमियों में नई प्रणाली ने अंततः पहले से मौजूद कानूनी प्रणाली को अपनाना शुरू कर दिया था। इंग्लैंड और उसके अधिकांश पूर्व उपनिवेश जिनमें भारत भी शामिल है, पुराने रोमन कानून के एक रूप का उपयोग करते हैं जिसे आम तौर पर ‘सामान्य कानून’ कहा जाता है। यही कारण है कि वकील उन लैटिन वाक्यांशों (फ्रेसेस) का उपयोग करना पसंद करते हैं। अंग्रेजी कानूनी शब्द अनेक लैटिन शब्दों और वाक्यांशों से भरे हुए हैं। 

महत्व

कानूनी कहावतें कानूनी पेशेवरों के दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बन गई हैं। इन कहावतों का प्रभाव न केवल वकीलों और कानून के छात्रों पर बल्कि आम लोगों पर भी पड़ा है। क़ानून से लेकर कानून से संबंधित पुस्तकों या पत्रिकाओं तक हर कानूनी दस्तावेज़ में कानूनी कहावतें बिखरी हुई हैं। कानूनी कहावतों ने भाषा को संशोधित कर दिया है। 

कानूनी कहावतों के कुछ महत्व इस प्रकार हैं:

  1. इसका प्रयोग लंबी परिभाषाओं के प्रयोग से बचने के लिए किया जाता है। हम इसे अनेक शब्दों के लिए एक शब्द रूप में उपयोग करते हैं, उदाहरण के लिए, एक कहावत ‘एब इनिशियो’ लें। इसका अर्थ है ‘आरंभ से’ या ‘किसी चीज़ की शुरुआत से’। इसलिए इसे इतना लंबा लिखने के बजाय, हम एब इनिशियो शब्द का उपयोग करते हैं जो व्यावहारिक स्थिति में काफी सहायक होता है।
  2. कानूनी कहावतें, जब सही संदर्भ में उपयोग की जाती हैं, तो भाषा बहुत स्पष्ट हो जाती है। एक अंग्रेजी दार्शनिक (फिलोसॉफर) थॉमस हॉब्स ने कहा कि कानूनी कहावतें अधिनियमों और क़ानूनों के समान ही मजबूत हैं।”फ्रांसिस बेकन, एक अन्य प्रमुख दार्शनिक, ने अपनी पुस्तक ‘मैक्सिम्स ऑफ द लॉ’ की प्रस्तावना में कहा कि कहावतों का उपयोग “संदेहों का निर्णय करने, और निर्णय की सुदृढ़ता में मदद करने के लिए किया जाएगा, लेकिन, इसके अलावा, तर्क को बढ़ाने में, लाभहीन सूक्ष्मता को ठीक करने में, और इसे कानून की अधिक सुदृढ़ और पर्याप्त समझ में लाना, अश्लील त्रुटियों को पुनः प्राप्त करना, और, आम तौर पर, पूरे कानून की प्रकृति और जटिलता में कुछ हद तक संशोधन करना के लिए किया जाता हैं।
  3. कुछ कहावतों की दोहराव प्रकृति जैसे ‘बोना फाइड’ जिसका अर्थ है ‘अच्छे विश्वास में’, नियमित लोगों का भी उपयोग बन गया है। इनका उपयोग विभिन्न न्यायिक कार्यवाहियों में भी नियमित रूप से किया जाता है। शब्द ‘पर से’ जिसका अर्थ है ‘स्वयं से’ भी लैटिन है जिसका प्रयोग दैनिक जीवन में नियमित रूप से किया जाता है। सैकड़ों कानूनी कहावतें हैं जिनका उपयोग अक्सर कानूनी सिद्धांत, प्रस्ताव या अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए किया जाता है।
  4. कहावतों का सार अत्यंत गहन एवं मानवीय नीति है। ये कहावतें आम तौर पर मानवाधिकारों और पर्यावरण सिद्धांतों के रूप में शामिल की जाती हैं।

कमियां

कहावतें अक्सर कानूनी क्षेत्र के इतिहासकारों के बीच काफी चर्चा का विषय रही हैं, जो कि समझी गई कहावतों के विभिन्न सिद्धांतों और कहावतों और कानून के बीच मौजूद संबंधों पर विचार करती हैं। हालाँकि, कानूनी सिद्धांत में कहावतों का महत्व कानूनी व्यवहार में नहीं पाया गया हैं। विभिन्न कानून रिपोर्टों से पता चलता है कि उनका सैद्धांतिक महत्व चाहे जो भी हो, वास्तविक जीवन की समस्याओं को हल करने के लिए ये पर्याप्त नहीं थे। कानूनी अभ्यास में कहावतों की गहराई से जांच करने पर कई पद्धतिगत (मेथडोलॉजिकल) समस्याएं सामने आती हैं।

  1. आरंभिक आधुनिक कानून रिपोर्ट आम तौर पर उस वकील द्वारा नहीं लिखी जाती थी जिसके तर्क की रिपोर्ट की गई थी, बल्कि यह किसी और द्वारा लिखी गई थी। रिपोर्टें आम तौर पर कार्यवाही की एक-एक शब्द प्रतिलेख (ट्रांसक्रिप्ट) में लिखने का आशय नहीं रखती थीं। इसलिए, यह नहीं माना जा सकता कि रिपोर्ट में उपयोग की गई भाषा का उपयोग अदालत में भी किया गया था।
  2. कहावतों की व्याख्या से जुड़ी विविधता थी जो कि कुछ शुरुआती लेखकों द्वारा पहले से ही पहचानी गई समस्या थी। उदाहरण के लिए, कुछ लेखकों में कहावतों और नियमों को लेकर मतभेद है। कुछ लोग उन्हें समान मानते हैं तो कुछ उन्हें भिन्न मानते हैं। सबसे बड़े अंतर को आम तौर पर तब दूर किया जा सकता है जब सैद्धांतिक चर्चाओं पर विचार करने पर प्रैक्टिशनरो को अंतर करने की चिंता नहीं होती है; लेखक शब्दावली की एक श्रृंखला को इस तरह से लागू करके अपने पसंदीदा उपयोग को स्पष्ट कर सकते हैं जो इस बारे में कुछ मूल्यांकन व्यक्त करता है कि क्या उपयोग किए गए विभिन्न शब्द केवल पर्यायवाची के रूप में या विभिन्न अवधारणाओं के रूप में कार्य करते हैं।
  3. आधुनिक समय में, धारणा यह है कि कानूनी कहावतें केवल संक्षिप्त लैटिन कथन हैं। यह कुछ इतिहासकारों के लिए महत्वपूर्ण समस्याओं का कारण रहा है, जिन्होंने कानून रिपोर्टों में जहां भी लैटिन दिखाई देता है, वहां कहावतों की व्याख्या की है। कहावतों पर प्रारंभिक-आधुनिक लेखक, साथ ही कानून रिपोर्टों में ‘कहावतों’ के संदर्भ, लैटिन कथनों तक सीमित नहीं हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि आरंभिक-आधुनिक वकीलों ने लैटिन और स्थानीय भाषा दोनों में, कभी-कभी एक ही काम में, स्वतंत्र रूप से कहावतें कही हैं। लैटिन के सभी कथनों को कहावत नहीं माना जाना चाहिए।

मामलो में उपयोग

यहां कुछ कहावतें दी गई हैं जिनका उपयोग अक्सर मामलो में निर्णय लेते समय किया जाता है:

एब इनिशियो (कानून/अधिनियम की शुरुआत से)

सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली विकास प्राधिकरण बनाम कोचर कंस्ट्रक्शन वर्क और अन्य मामले में निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए लैटिन शब्द एब इनिशियो का इस्तेमाल किया था। इस मामले में, फैसला किया कि कार्यवाही शुरू से ही दोषपूर्ण थी और इसे शुरू नहीं किया जा सका क्योंकि जिस फर्म के नाम पर कार्यवाही हुई थी वह कार्यवाही शुरू होने की तारीख पर पंजीकृत नहीं थी।

मंजीत सिंह बनाम पारसन कौर में, सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि शून्य विवाह आरंभ से ही शून्य हैं, जिसका अर्थ है कि विवाह कानून की नजर में कभी भी अस्तित्व में नहीं आया।

आर राजशेखर और अन्य बनाम ट्रिनिटी हाउस बिल्डिंग कोऑपरेटिव सोसाइटी और अन्य मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान की गई बिक्री के लेनदेन को कानून की नजर में पूरी तरह से अवैध माना जाता है और इसलिए शुरू से ही शून्य माना जाता है।  

शिव कुमार और अन्य बनाम भारत संघ मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 4 के तहत अधिसूचना प्राप्त होने के बाद खरीदार को भूमि में किसी भी अधिकार की आवश्यकता नहीं है क्योंकि बिक्री को शून्य एब इनीशियो माना जाता है और इसलिए, खरीदार को नीति के तहत भूमि पर दावा करने का कोई अधिकार नहीं है। 

एक्टस देई नेमिनी फैसिट इंजुरियम (कानून ईश्वर के कृत्य के लिए किसी व्यक्ति को जिम्मेदार नहीं मानता)

माली राम महाबीर प्रसाद बनाम शांति देबी और अन्य में, पटना उच्च न्यायालय ने सिविल न्यायालय में अराजपत्रित (नॉन  गैजेटेट) कर्मचारियों की हड़ताल को ईश्वर का कार्य माना और ऐसे में कहावत एक्टस देई नेमिनी फैसिट इंजुरियम की प्रयोज्यता (एप्लीकेबिलिटी) का फैसला किया। अदालत ने आगे कहा कि किसी भी असामान्य स्थिति में जो किसी भी वादी के नियंत्रण से परे है, अदालतों को प्रक्रियात्मक कानून के कठोर पालन की मांग नहीं करनी चाहिए। ऐसी घटनाएँ आमतौर पर ईश्वर के अभिव्यक्ति कृत्य से ढकी रहती हैं। इसलिए, कहावत एक्टस देई नेमिनी फैसिट इंजुरियम  यहां अपनी पूर्ण प्रयोज्यता पाती है।

एक्टियो पर्सनलिस मोरिटुर कम पर्सोना (व्यक्ति के साथ कार्यवाही का व्यक्तिगत अधिकार समाप्त हो जाता है)

गिरजा नंदिनी और अन्य बनाम बिजेंद्र नारायण चौधरी में, सर्वोच्च न्यायालय ने इस कहावत का उल्लेख किया और माना कि इसका सीमित प्रयोज्यता है। यह कार्यवाहीयों की एक सीमित श्रेणी में मान्य है, जैसे कि उन चोटों के लिए क्षतिपूर्ति, जो व्यक्ति की मृत्यु का कारण नहीं बनती, जैसे मानहानि हमला या अन्य कार्यवाहीयां शामिल है। हिसाब-किताब के प्रतिपादन (रेंडरिंग) के लिए कोई कार्रवाई या दावा कोई व्यक्तिगत दावा नहीं है और सूचीबद्ध वर्गों के अंतर्गत नहीं आता है। यदि वह पक्ष जो किसी खाते का दावा करता है या जिस पक्ष को बुलाया जाता है उसकी मृत्यु हो जाती है तो दावा समाप्त नहीं होता है। इसलिए, इस कहावत का यहां कोई महत्व नहीं होगा। 

एक्टस क्यूरीए नेमिनेम ग्रेवबिट (अदालत का एक कार्य किसी भी व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा)

जंग सिंह बनाम बृजलाल और अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय की तीन न्यायधीशों की बेंच ने कहा था कि अगर सूचना देने में न्यायालय से कोई गलती होती है तो वादी की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती, बल्कि कम से कम न्यायालय की जिम्मेदारी भी बनती है। यदि वादी उस गलत जानकारी पर विश्वास करके कार्य करता है, तो न्यायालयों के पास उसे जिम्मेदार ठहराने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि यह उसे उस गलती के लिए जिम्मेदार ठहराएगा जो उसने स्वयं की है। इसमें आगे कहा गया, “न्यायालय के मार्गदर्शन के लिए इससे बड़ा कोई सिद्धांत नहीं है कि न्यायालय के किसी भी कार्य से किसी वादी को नुकसान न पहुंचे और यह देखना न्यायालय का परम कर्तव्य है कि यदि गलती से किसी व्यक्ति को नुकसान होता है।” न्यायालय को उसे उस पद पर बहाल (रिस्टोर्ड) किया जाना चाहिए जिस पर वह उस गलती के लिए होता है।

यह कहावत ‘एक्टस क्यूरी नेमिनेम ग्रेवाबिट’  में उपयुक्त रूप से समाहित है। इस प्रकार, जिला न्यायालय की गलती को ध्यान में रखते हुए, जिसे सुधारने की आवश्यकता थी, पक्षों को उस स्थिति में वापस कर दिया गया, जब वह गलती न्यायालय द्वारा की गई थी, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने ठीक कर दिया था। 

एक्टस नॉन-फेसिट रियम निसी मेन्स सिट रीया (कोई भी कार्य तब तक किसी को अपराधी नहीं बना देता जब तक वह आपराधिक आशय से न किया गया हो)

आर बालाकृष्णन पिलाई बनाम केरल राज्य मामले में, यह माना गया था कि जिस व्यक्ति ने आपराधिक कानून का उल्लंघन किया है, उसे अपराध से जोड़ा जाएगा। हालाँकि, यह नियम पूर्ण नहीं है क्योंकि यह लैटिन कहावत एक्टस नॉन-फैसिट रियम निसी मेन्स सिट रीया  में निहित कुछ सीमाओं को पूरा करता है जो इंगित करता है कि दोषी दिमाग की उपस्थिति के बिना कोई अपराध नहीं हो सकता है। किसी व्यक्ति को अपराध के लिए उत्तरदायी बनाने के लिए, यह साबित करना होगा कि उसके द्वारा किया गया दोषी कार्य भी एक दोषी दिमाग द्वारा किया गया था। इस प्रकार, प्रत्येक अपराध के दो घटक होते हैं- एक भौतिक तत्व और एक मानसिक तत्व। 

निष्कर्ष

कानूनी कहावतें मनोरंजक हैं और उनका अभिव्यंजक (एक्सप्रेसिव) ज्ञान आधुनिक कानून के छात्रों और कानूनी पेशेवरों के अनुमोदन (अप्रूवल) से मिलता है। यही कारण है कि बहस के दौरान अक्सर उन्हें ऐसी सूत्र कहावते सामने आना बहुत आम है। कानून पुस्तकालयों में कहावतों पर टिप्पणियाँ ऐतिहासिक जिज्ञासाएँ उत्पन्न करती हैं। वे अभी भी कानूनी साहित्य के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में कार्य करते हैं।

संदर्भ

 

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