समझौते के अनुबंध होने की शर्तें

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यह लेख Abhay Kumar Pandey ने लिखा है जो कि के.एस साकेत पी जी कॉलेज, अयोध्या का एक छात्र है। इस लेख का अनुवाद Gitika द्वारा किया गया है।

परिचय

“सभी अनुबंध समझौते हैं, लेकिन सभी समझौते अनुबंध नहीं हैं”

पहली चीज़ जिसके बारे में हमें पता होना जरूरी है वह है कि कॉन्ट्रैक्ट यानी अनुबंध क्या होते हैं।

अनुबंध की परिभाषा भारतीय संविदा अधिनियम 1872 धारा 2(h) मैं कुछ इस प्रकार दी गई है:

“कानून द्वारा लागू एक समझौता ही एक अनुबंध है।”

इसी तरह सर फ्रेडरिक पॉलॉक ने अनुबंध(कॉन्ट्रैक्ट) को परिभाषित किया है:

“हर समझौता और वादा जो कि कानून द्वारा लागू किया जा सके एक अनुबंध है।”

अंसन ने भी अनुबंध(कॉन्ट्रैक्ट) का अर्थ कुछ इस प्रकार दिया है:

“अनुबंध कार्रवाई के वादे या वादे को मिलाकर बनता है। हर उस वादे में 2 लोग होते हैं एक जो वादा करता है और दूसरा जिससे वादा किया जाता है। उन दो लोगों के बीच जो वादा होता है वह एक ही इरादे को ध्यान में रखकर कर सकता है। होता है और जितने भी कार्य किए जाते हैं वह उस वादे को मद्देनज़र रखते हुए किए जाते हैं। “

सालमंद के मुताबिक “दो लोगों के बीच समझौते और कर्म से होता है।”

जैसे कि गीता ने सीता को ₹ 6,000 में फोन बेचने का वादा किया और सीता ने गीता से उसी कीमत में फोन खरीदने का वादा किया। “

ऊपर दिए गए अनुबंध के अर्थ से हम यह अंदाजा लगा सकते हैं कि अनुबंध के दो आवश्यक तत्व होते हैं।

  • एक समझौता
  • उसी समझौते की प्रवर्तनीयता (प्रवर्तनीयता)

समझौता (समझौता)

भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 2(e) के अनुसार: –

“हर वादे या वादों का हर सेट, जो कि एक दूसरे के लिए प्रतिफल का आधार है वह एक समझौता है। समझौते की परिभाषा को देखने के बाद यह स्पष्ट है कि एक वादा एक प्रतिबद्धता है।” 

वादा

भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 की धारा 2(b) वचन शब्द की परिभाषा इंगित करती है। इसकी गणना से जब एक व्यक्ति जिसे प्रस्ताव दिया जाता है वह उसकी सहमति का संकेत देता है तो प्रस्ताव को स्वीकार किया जाता है। एक प्रस्ताव जब स्वीकार किया जाता है तो वह एक वादा बन जाता है।

इस प्रकार, एक ‘समझौता’ दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच एक द्विपक्षीय लेनदेन है जिसमें एक प्रस्ताव या प्रस्ताव और एक दूसरे द्वारा इस तरह के प्रस्ताव को स्वीकार करना शामिल है। दूसरे शब्दों में, यह ‘व्यक्तियों की बहुलता’ की आवश्यकता होती है क्योंकि एक व्यक्ति स्वयं के साथ समझौता नहीं कर सकता है।

जैसा कि ऊपर कहा गया है, एक अनुबंध बनने के लिए एक अनुबंध को एक कानूनी दायित्व को जन्म देना चाहिए। यदि कोई कानून द्वारा लागू करने योग्य नहीं है। यह एक अनुबंध नहीं है।

समझौते की प्रवर्तनीयता

अधिनियम की धारा 10 एक समझौते की प्रवर्तनीयता(enforceability) की शर्तों से संबंधित है।

यह प्रदान करता है: “सब करार संविदाएँ हैं, यदि वे संविदा करने के लिए सक्षम पक्षकारों की स्वतन्त्र सम्मति से किसी विधिपूर्ण प्रतिफल के लिए और किसी विधिपूर्ण उद्देश्य से किए गए हैं और एतद्द्वारा अभिव्यक्तत: शून्य घोषित नहीं किए गए हैं।”

धारा 10 के दूसरे अनुच्छेद में यह कहा गया है कि:-

“इसमें अन्तर्विष्ट कोई भी बात भारत में प्रवृत्त और एतद्द्वारा अभिव्यक्तत: निरसित न की गई किसी ऐसी विधि पर, जिसके द्वारा किसी संविदा का लिखित रूप में या साक्षियों की उपस्थिति में किया जाना अपेक्षित हो, या किसी ऐसी विधि पर जो दस्तावेजों के रजिस्ट्रीकरण से सम्बन्धित हो, प्रभाव न डालेगी।”

ऊपर लिखी परिभाषा से हम यह बोल सकते हैं की धारा 10 के अनुसार नीचे दी गई शर्तों का पूरा होना जरूरी हैं:-

सक्षम पक्ष(competent parties)

अधिनियम की धारा 11 और 12 के अनुसार निम्नलिखित व्यक्ति अनुबंध के लिए सक्षम नहीं है:-

  • नाबालिगों (मोहरी बीबी  बनाम धर्मदास घोष में यह बोला गया था कि एक नाबालिक के साथ एक समझौता आरंभतः शून्य(void ab initio) है)
  • अस्वस्थ मस्तिष्क(unsound mind)  के व्यक्ति
  • किसी भी कानून के अधीन होने से अयोग्य ठहराया गया व्यक्ति।

स्वतंत्र सहमति

जो कुछ इसी अर्थ में सहमत हुए होंगे और पार्टी की सहमति उन्हे प्राप्त नहीं हुई होगी:-

  • जबरदस्ती- धारा (15)– एक कार्य जो भारतीय दंड संहिता द्वारा निषेध है। (चिकाम अमिराजू बनाम चिकाम शेशम्मा मामले में यह कहा किया गया था कि आत्महत्या की धमकी देना, भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 15 के तहत “जबरदस्ती” मानी जाती है।)
  • अवांछित प्रभाव- धारा 16– ऐसे प्रभाव जिसके द्वारा किसी व्यक्ति को अपने मर्जी से या परिणामों पर पर्याप्त ध्यान दिए बिना अन्यथा कार्य करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
  • धोखा (फ्रॉड) –  धारा 17– धोखा भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 की धारा 17 के तहत परिभाषित किया गया है।
  • गलत बयानी( misrepresentation) धारा 18– गलत बयानी एक भ्रामक, लापरवाही, या निर्दोष गलत बयान या अधूरा बयान है भौतिक तथ्य का।
  • गलती- जहां एक समझौते को कर रहे दोनों पक्ष आवश्यक तत्व के मामले में गलती कर रहे होते हैं या अलग अलग संदर्भ में सहमत होते हैं, तो ऐसे समझौते को अवैध माना जाता है।

वैध प्रतिफल(consideration) और वैध विषय (object) धारा 23 

एक अनुबंध के गठन के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि अनुबंध का प्रतिफल और उद्देश्य वैध होना चाहिए। प्रतिफल या वस्तु को गैरकानूनी कहा जाता है यदि:-

  • यह कानून द्वारा निषिद्ध है
  • यह किसी भी कानून के प्रावधान को पराजित करेगा
  • यह कपट पूर्ण है
  • इसमें किसी व्यक्ति या दूसरे की संपत्ति को चोट पहुंचाना या शामिल करना है

या

  • अदालत से अनैतिक यहां सार्वजनिक नीति के खिलाफ मानती है।

समझौता किसी प्रतिफल (consideration) के लिए होना चाहिए (धारा 25)

अधिनियम की धारा 25 में घोषणा की गई है कि बिना प्रतिफल के एक समझौता शून्य है। हालांकि धारा 25 के तहत कुछ निश्चित शर्तें हैं जिनके तहत बिना किसी विचार के एक अनुबंध को वैध माना जाता है।

समझौते को किसी कानून द्वारा स्पष्ट रूप से अवैध घोषित नहीं किया जाना चाहिए 

भारतीय अनुबंध अधिनियम के तहत निम्नलिखित समझौतों को शून्य या अवैध घोषित किया जाता है:-

  • जहां समझौते के लिए दोनों पक्ष आवश्यक तथ्य की गलती के तहत होते हैं। (धारा 20)

या

  • बिना प्रतिफल के समझौता (धारा 25)
  • नाबालिक के अलावा किसी भी व्यक्ति के विवाह के संयम में समझौता (धारा 26)
  • व्यापार के अवरोधक में समझौता (धारा 27)
  • एक समझौता न्यायिक कार्रवाई का एक पूर्ण अवरोधक है (धारा 28)
  • एक समझौता जिसका अर्थ अनिश्चित है और निश्चित होने में असमर्थ है (धारा 29)
  • पंद्यम्(wager) के तौर का समझौता (धारा 30)
  • असंभव घटनाओं पर समझौता (धारा 36)
  • एक ऐसा कार्य करने के लिए समझौता जो अपने आप में असंभव है या जो बाद में किसी पार्टी के दोष के बिना असंभव हो जाता है (धारा 56)

अन्य कानूनी आवश्यकता 

किसी समझौते को किसी विशेष कानून द्वारा आवश्यक या औपचारिकताओं को पूरा करना चाहिए। यदि भारत में किसी कानून की आवश्यकता हो तो लिखित, सत्यापित और पंकज कृत होना चाहिए। कुछ समझौते जैसे:- 

  • एक समय वर्जित ऋण का भुगतान करने के लिए समझौता 

या 

  • अचल संपत्ति के हस्तांतरण(transfer) के लिए समझौता।

या

  • विवाद के मामले में मध्यस्थता के लिए मामले को संदर्भित करने के लिए समझौता

यह ऐसे समझौते हैं जिन्हें लिखना और पंजीकृत होना  चाहिए।

निष्कर्ष

एक अनुबंध कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता है जो दो या दो से अधिक पार्टियों के बीच मौजूद है। एक समझौता एक प्रस्ताव से शुरू होता है और विचार पर समाप्त होता है लेकिन एक अनुबंध को एक और लक्ष्य यानी प्रवर्तनीयता हासिल करनी होती है। अनुबंध के लिए उल्लंघन के कारण दोषी पार्टी के खिलाफ पीड़ित पक्ष को कानूनी उपाय प्रदान करते हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि सभी अनुबंध एक समझौता है लेकिन सभी समझौते एक अनुबंध नहीं।

 

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