स्विस रिबन प्राइवेट लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया

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Insolvency and Bankruptcy Code
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यह लेख चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, पटना के छात्र Ram Kumar ने लिखा है। इस लेख में स्विस रिबन प्राईवेट लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले का विश्लेषण (एनालिसिस) किया गया है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय (इंट्रोडक्शन)

स्विस रिबन प्राइवेट लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, इंसोलवेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आई.बी.सी.), 2016 में मौजूद विभिन्न प्रोविजंस की कांस्टीट्यूशनल वैलिडिटी से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार 25 जनवरी 2019, को इस मामले का फैसला दिया। आई.बी.सी. कोड के लागू होने के बाद से, यह लगातार बदल रहा है, और रेजोल्यूशन प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए महत्वपूर्ण बदलावों को जोड़ने के लिए कई बार अमेंडमेंट किए गए है। नवीनतम (लेटेस्ट) अमेंडमेंट 2020 में किया गया है। यह इंसोलवेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 में किया जाने वाला चौथा अमेंडमेंट है। इस मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने आई.बी.सी. कोड को कांस्टीट्यूशनल रूप से पूरी तरह से मान्य माना है। वर्तमान मामले में इसकी वैलिडिटी निर्धारित (डिटरमाइन) करने के लिए कोर्ट देश के विभिन्न आर्थिक कारकों को ध्यान में रखता है। वर्तमान मामले में कलकत्ता और गुजरात जैसे विभिन्न हाई कोर्ट्स से स्थानांतरित (ट्रांसफर्ड) कई मामले शामिल हैं।

कोर्ट ने बैंकरप्सी लॉ रिफॉर्म्स कमिटी (2016), जॉइंट पार्लियामेंट्री कमिटी (2016), इंसोलवेंसी लॉ कमिटी (2018) की रिपोर्ट और वर्तमान मामले को तय करने के लिए कई मौकों पर उद्देश्यों और कारणों के बयान पर भरोसा किया। कोर्ट ने इस मामले में अंतिम जजमेंट देने से पहले, आई.बी.सी. (अमेंडमेंट) ऑर्डिनेंस, 2017 को आगे बढ़ाते हुए फाइनेंस मिनिस्टर के परिचयात्मक (इंट्रोडक्टरी) भाषण और क्रेडिट सूचना कंपनियों पर सिद्दीकी वर्किंग ग्रुप, 1999 की सिफारिशों और आई.बी.सी. कोड की प्रभावशीलता (इफेक्टिवनेस) के आंकड़ों (स्टेटिस्टिक्स) पर भी भरोसा किया।

मामले का आकलन (एसेसमेंट ऑफ केस)

संपूर्ण जजमेंट मामले के तथ्यों से संबंधित नहीं है बल्कि आई.बी.सी. कोड के विभिन्न प्रोविजंस की कांस्टीट्यूशनल वैलिडिटी से संबंधित है। मामले में अपीलकर्ताओं (अपेलेंट) ने आई.बी.सी. कोड के विभिन्न प्रोविजंस की वैलिडिटी के लिए तर्क दिया है। अपीलकर्ता द्वारा दिया गया पहला तर्क यह है कि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एन.सी.एल.टी.) और नेशनल कंपनी अपीलेट लॉ ट्रिब्यूनल (एन.सी.एल.ए.टी.) में नियुक्त (अप्वाइंटेड) सदस्य कांस्टीट्यूशन के प्रोविजंस के अनुरूप (कंसोनेंस) नहीं थे। इसमें दो ज्यूडिशियल सदस्य और तीन ब्यूरोक्रेट्स थे। इसके अलावा, सभी एडमिनिस्ट्रेटिव सहायता मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स (एमसीए) द्वारा दी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने कंपनीज़ (अमेंडमेंट) एक्ट, 2017 पर भरोसा किया और कहा कि अमेंडमेंट एक्ट के अनुसार दो एग्जिक्यूटिव सदस्यों के साथ दो ज्यूडिशियल सदस्यों को एन.सी.एल.टी. और एन.सी.एल.ए.टी. में नियुक्त किया जाना चाहिए और यह वैध (वैलिड) है। इस मुद्दे के संबंध में कि एन.सी.एल.टी. और एन.सी.एल.ए.टी. को मिनिस्ट्री ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स से समर्थन मिलता है, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह कांस्टीट्यूशन के अनुरूप है।

अपीलकर्ता द्वारा उठाया गया एक अन्य मुद्दा यह है, कि एन.सी.एल.टी./एन.सी.एल.ए.टी. की स्थापना से पहले, अपीलकर्ता के पास अपने संबंधित राज्यों में हाई कोर्ट के समक्ष मामला पेश करने का मौका था, लेकिन अब यह संभव नहीं हो सकता क्योंकि अब एन.सी.एल.ए.टी. की सीट केवल नई दिल्ली में है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया, कि अगर हर हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिसडिक्शन) में स्थायी (परमानेंट) बेंच स्थापित करना संभव नहीं है तो सर्किट बेंच स्थापित करें। यहां यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि, फोरम्स और ट्रिब्यूनल्स की बहुलता (मल्टीप्लिसिटी) के कारण उत्पन्न होने वाली कठिनाई पर विराम लगाने के लिए 2016 में इंसोलवेंसी एंड बैंकरप्सी कोड लागू किया गया था।

यह कोड एन.सी.एल.टी/एन.सी.एल.ए.टी. और सुप्रीम कोर्ट को अपीलीय अथॉरिटी के रूप में नामित (डिजिग्नेट) करता है और हाई कोर्ट्स का उल्लेख नहीं करता है और तब से कांस्टीट्यूशन के आर्टिकल 226 के तहत हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र और एन.सी.एल.टी./एन.सी.एल.ए.टी. के बीच संघर्ष चल रहा है। विवाद एंथनी राफेल मामले से शुरू होता है, जिसमें बॉम्बे हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि आईबीसी कोड के प्रोविजंस के बावजूद, जो एन.सी.एल.टी./एन.सी.एल.ए.टी. को एडज्यूडिकेटिंग अथॉरिटी के रूप में स्थापित करता है, हाई कोर्ट कांस्टीट्यूशन के आर्टिकल 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का भी प्रयोग कर सकता है और अपील पर एन.सी.एल.टी./एन.सी.एल.ए.टी. के मामलों में हस्तक्षेप (इंटरवेन) कर सकता है। बॉम्बे हाई कोर्ट में इस मामले की हाइएर बेंच को अपील करने पर, कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट के पास हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है क्योंकि प्रोविजन अर्थात धारा 60 और 61 एन.सी.एल.टी./एन.सी.एल.ए.टी. के समक्ष अपील करने के लिए उचित आधार प्रदान करते हैं।

आई.बी.सी. मामलों को तय करने के लिए हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का मुद्दा तब एम्बेसी प्रोपर्टी डेवलपमेंट मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिया गया था, और माना गया था कि हाई कोर्ट, आई.बी.सी. मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है क्योंकि ज्यूडिशियल शक्ति कांस्टीट्यूशन से आती है और एन.सी.एल.टी./एन.सी.एल.ए.टी. केवल एक क्वासी ज्यूडिशियल बॉडी है। अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में स्विस रिबन मामले में कहा कि यदि हाई कोर्ट को आई.बी.सी. मामलों में हस्तक्षेप करने की अनुमति दी गई, तो यह बहुतायत (फ्लड) का द्वार खोल देगा और आई.बी.सी. कोड के तहत समयबद्ध (टाइम बाउन्ड) इंसोलवेंसी) प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करेगा। इसलिए, हाई कोर्ट अपीलकर्ता के तर्क पर विराम लगाता है और मानता है, कि एन.सी.एल.टी./एन.सी.एल.ए.टी. एडज्यूडिकेटिंग अथॉरिटी हैं और अपील केवल सुप्रीम कोर्ट में ही की जा सकती है।

तीसरा, सबसे महत्वपूर्ण तर्क दिया जाता है कि फाइनेंशियल क्रेडिटर और ऑपरेशनल क्रेडिटर के बीच का अंतर भारत के कांस्टीट्यूशन के आर्टिकल 14 का उल्लंघन है। इसके अलावा, कोड की धारा 12A के लिए क्रेडिटर और कॉर्पोरेट डेब्टर (डेब्टर) के बीच निपटान (सेटलमेंट) प्रक्रिया शुरू करने से पहले कमिटी ऑफ क्रेडीटर (सीओसी) के कुल वोटिंग शेयर की कम से कम 90% की मंजूरी की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, सीओसी को असीमित शक्ति दी जाती है जो उन्हें इसका दुरुपयोग करने की अनुमति दे सकती है। आई.बी.सी. कोड की संवैधानिक वैधता निर्धारित करने के लिए सुप्रीम कोड ने सूक्ष्म विश्लेषण किया। कॉरपोरेट इंसोलवेंसी रेजोल्यूशन प्रॉसेस (सी.आई.आर.पी.) के तहत आई.बी.सी. कोड के तहत ऑपरेशनल क्रेडिटर के साथ किए गए व्यवहार, जहां उन्हें कहने का कोई अधिकार नहीं है और वह कमिटी ऑफ क्रेडीटर (सीओसी) की दया पर आधारित है, को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि, यह आर्टिकल 14 का उल्लंघन है।

अपीलकर्ता द्वारा यह तर्क दिया गया था कि ऑपरेशनल क्रेडिटर के साथ फाइनेंशियल क्रेडिटर के समान व्यवहार किया जाना चाहिए। इसकी वैलिडिटी निर्धारित करने के लिए, कोर्ट आई.बी.सी. कोड के प्रोविजन को इसके अधिनियम (इनैक्टमेंट) के पीछे लेजिसलेटिव इरादे को देखता है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि वर्गीकरण (क्लासिफिकेशन) भारत के कांस्टीट्यूशन के आर्टिकल 14 का उल्लंघन नहीं है। कोर्ट ने पाया कि व्यवसाय की व्यवहार्यता (वायबिलिटी) का आकलन करने के लिए फाइनेंशियल क्रेडिटर, कॉर्पोरेट डेब्टर की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं। फाइनेंशियल क्रेडिटर जैसे बैंक और फाइनेंशियल संस्थान पैसे उधार देने में शामिल होते हैं, जबकि ऑपरेशनल क्रेडिटर जो केवल वस्तुओं और सेवाओं और इसके साथ हुई बकाया राशि से निपटते हैं, वे व्यवसाय का आकलन (एसेस) करने की स्थिति में नहीं हैं।

उठाया गया एक अन्य तर्क यह था कि एडज्यूडिकेटिंग की शक्ति उचित अथॉरिटी के पास होनी चाहिए, न कि रेजोल्यूशन प्रोफेशनल के पास जो गैर-ज्यूडिशियल बॉडी थे और इसलिए यह प्रोविजन आई.बी.सी. कोड का उल्लंघन है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीआईआरपी रेगुलेशन के 10,12,13 और 14 रेगुलेशन, धारा 18 के साथ पढा जायेगा, की सावधानीपूर्वक जांच करने पर, कुछ सुरक्षा उपाय पेश किए गए हैं और रेजोल्यूशन प्रोफेशनल, कमिटी ऑफ क्रेडीटर (सीओसी) की मंजूरी के बिना कई मामलों में मनमाने (आर्बिट्रारिली) ढंग से कार्य नहीं कर सकते हैं और दो-तिहाई बहुमत (मेजोरिटी) वाली सीओसी, रेजोल्यूशन प्रोफेशनल की जगह ले सकती हैं। इस प्रकार, रेजोल्यूशन प्रोफेशनल एक फैसिलिटेटर के रूप में कार्य करता है।

अपीलकर्ता द्वारा तर्कों की एक पंक्ति रखी गई है, अर्थात, कोड की धारा 29A, प्रमोटरों को डेब्ट वसूली प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार देती है, यह मनमाना है, क्योंकि इसका रेट्रोस्पेक्टिव प्रभाव है। यह प्रोविजन कुछ व्यक्तियों जैसे कॉर्पोरेट डेब्टर, उनके रिश्तेदारों, अनडिस्चार्ज्ड इंसोल्वेंट, सेबी एक्ट के तहत निषिद्ध (प्रोहिबिट) व्यक्ति को रेजोल्यूशन एप्लीकेंट के लिए अपात्र (इनेलिजिबल) बनाता है। सुप्रीम कोर्ट ने आर्सेलर मित्तल मामले में दिए गए लेजिसलेटिव प्रोविजन की पर्पोजिव इंटरप्रिटेशन और सॉलोमन मामले की इंटरप्रेटेशन का उपयोग करते हुए कहा कि अलग कॉर्पोरेट इकाई (एंटिटी) के सिद्धांतों को लागू नहीं किया जा सकता है, और वे सभी व्यक्ति जिन्होंने संयुक्त (ज्वाइंटली) रूप से या कंसर्ट में कंपनी को रेजोल्यूशन कि स्टेज तक चलाने के लिए काम किया है, तो वह रेजोल्यूशन एप्लीकेंट होने से अयोग्य घोषित कर दिया जाएगे।

लिक्विडेशन की प्रक्रिया के दौरान, ऑपरेशनल क्रेडिटर को कुछ भी प्राप्त करने की अनुमति नहीं थी, क्योंकि वे आईबीसी कोड की धारा 53 के अनुसार अन्य क्रेडिटर से नीचे थे और इसे कांस्टीट्यूशनल प्रोविजन का उल्लंघन कहा जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फाइनेंशियल क्रेडिटर को एक उच्च पद पर रखा गया था क्योंकि उनके डेब्ट्स का भुगतान अर्थव्यवस्था में धन वापस करने में मदद करता है, और आगे यह कोड द्वारा मांगी गई वस्तु को पूरा करता है, जबकि ऑपरेशनल क्रेडिटर के डेब्ट सरकार को वापस दिए गए थे। इस तर्क के आधार पर, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आईबीसी कोड की धारा 53 कॉन्स्टीट्यूशन के आर्टिकल 14 का उल्लंघन नहीं है और फाइनेंशियल क्रेडिटर और ऑपरेशनल क्रेडिटर दोनों को अलग करते हुए इंटेलिजिबल डिफरेंसिया लागू किया जाता है।

फाइनेंशियल क्रेडिटर के साथ कांट्रेक्ट में आमतौर पर बड़ी मात्रा में धन शामिल होता है जो विभिन्न संबंधों को जन्म देता है क्योंकि दिया गया डेब्ट व्यवसाय स्थापित करने के साथ-साथ फाइनेंशियल तनाव होने पर डेब्ट प्राप्त करने में मदद करता है। ऑपरेशनल क्रेडिटर के बीच उसी तरह के संबंध स्थापित नहीं होते हैं जिनके डेब्ट दिन-प्रतिदिन के कारोबार को चलाने में मदद करते हैं। हालांकि, इंटेलिजिबल डिफरेंसिया के आधार पर फाइनेंशियल और ऑपरेशनल क्रेडिटर दोनों के बीच अंतर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक प्रयास किया गया है, फिर भी कोड में कई मौजूदा खामियां हैं जो ऑपरेशनल क्रेडिटर के साथ गलत व्यवहार करती हैं।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि आई.बी.सी. कोड की धारा 24 के अनुसार, ऑपरेशनल क्रेडिटर धारा 24 के तहत ‘पार्टिसिपेंट’ की परिभाषा में नहीं थे, यदि कॉर्पोरेट डेब्टर के कारण कुल डेब्ट 10% या उससे अधिक है। यह आगे ‘रेजोल्यूशन प्लान’ की कॉपी प्राप्त करने का अधिकार छीन लेता है क्योंकि वे ‘पार्टिसिपेंट’ के मानदंडों (क्राइटेरिया) को पूरा करने में विफल रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे से निपटने के दौरान रेगुलेशन 38 पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया है कि ऑपरेशनल क्रेडिटर के कारण राशि को फाइनेंशियल क्रेडिटर को प्राथमिकता (प्रायोरिटी) दी जानी चाहिए। स्पष्ट रूप से दिए गए तर्क और अपीलकर्ता द्वारा उठाए गए मुद्दे के बीच कोई संबंध प्रतीत नहीं होता है। सुप्रीम कोर्ट ने बिनानी इंडस्ट्रीज मामले पर और भरोसा किया, जहां यह माना गया था कि अगर ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जहां ऑपरेशनल क्रेडिटर को तुरंत भुगतान करने की आवश्यकता होती है, तो फाइनेंशियल क्रेडिटर अपने मौजूदा प्रोविजंस को बदल सकते हैं और अपने भुगतान में कटौती कर सकते हैं।

अंत में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए तर्क और इस मामले में दिए गए विभिन्न निर्देशों के आधार पर यह माना गया कि आईबीसी कोड कांस्टीट्यूशनली रूप से मान्य है।

सारांश (सम्मरी)

सुप्रीम कोर्ट लोचनर मामले में स्थापित लोचनर सिद्धांत सामाजिक-आर्थिक कानून को अनकांस्टीट्यूशनल घोषित करने पर विचार करता है, यदि वह ज्यूडिशियल जांच (स्क्रूटिनी) पास नहीं करता है। इसके विपरीत, कोर्ट ने आर के गर्ग मामले पर भरोसा किया और कहा कि किसी भी कोड की कांस्टीट्यूशनल वैलिडिटी पर विचार करने में कोर्ट द्वारा ज्यूडिशियल रिस्ट्रेंट का प्रयोग किया जाना चाहिए, क्योंकि आर्थिक समस्याओं को हल करने के लिए कोई सीधा समाधान नहीं है। अब तक यह मानते हुए कि ऑपरेशनल क्रेडिटर को फाइनेंशियल क्रेडिटर के समान माना जाना चाहिए, सुप्रीम कोर्ट बिनानी जजमेंट से दूर जाने की कोशिश करता है, जो यह प्रदान करता है कि फाइनेंशियल और ऑपरेशनल दोनों क्रेडिटर के साथ एक ही तरीके से व्यवहार किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिनानी फैसले की गलत इंटरप्रेटेशन किया गया है। कोर्ट ने रेजोल्यूशन ऑफ द डेबटर को प्राप्त करने और लिक्विडेशन से बचने के लिए इनोवेटिव इंडस्ट्रीज लिमिटेड मामले के निर्णय में इंटरप्रेट की गई कोड के प्रिएंबल के उद्देश्य पर भी भरोसा किया। इस मुद्दे पर कि ज्यूडिशियल अथॉरिटी को मिनिस्ट्री ऑफ लॉ एंड जस्टिस के तहत कार्य करना चाहिए, कोर्ट ने इस विचार को स्वीकार किया कि मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स के तहत एडज्यूडिकेटिंग अथॉरिटी का कामकाज, आर गांधी मामले में निर्धारित ज्यूरिस्प्रूडेंस के विपरीत है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही याचिकाकर्ता के इस तर्क को स्वीकार कर लिया कि दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट के मामले में विभिन्न मिनिस्ट्री के बीच व्यापार के नियमों का एलोकेशन अनिवार्य रूप से तय किया गया है। इस प्रकार, अंत में, कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि एन.सी.एल.टी. और एन.सी.एल.ए.टी. को मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स के तहत कार्य करना जारी रखना चाहिए।

अमेंडमेंट

आई.बी.सी. कोड की धारा 29A को 2017 में गलत प्रमोटरों को एक रेजोल्यूशन स्कीम का प्रस्ताव देने और स्ट्रेस्ड एसेस्ट्स को वापस खरीदने से रोकने के लिए डाला गया था। कंपनीज़ एक्ट, 1956 की धारा 391 आई.बी.सी. कोड की धारा 29A के विपरीत काम करती है। सरकार द्वारा एक अमेंडमेंट किया गया है और कंपनीज़ एक्ट, 1956 की धारा 391 को अब पूरी तरह से कंपनीज़ एक्ट, 2013 की धारा 230 से बदल दिया गया है। धारा 230 में प्रोविजन है, कि इंसोलवेंसी एक्ट के तहत नियुक्त लिक्विडेटर एक रेजोल्यूशन स्कीम का प्रस्ताव करने के लिए योग्य है। सेकरन मामले पर एक नजर डालनी चाहिए जहां यह माना गया था कि ऐसे एरेंट प्रमोटर, रेजोल्यूशन स्कीम में व्यवस्था की एक स्कीम शुरू कर सकते हैं, जो आई.बी.सी. कोड की धारा 29A के तहत अयोग्य हैं।

इसके अलावा, व्यवस्था की स्कीम 90 दिनों के भीतर पूरी की जानी चाहिए। यह एक अच्छी दिशा हो सकती है इसलिए लिक्विडेशन प्रक्रिया में देरी नहीं होनी चाहिए। मेघल मामले में दिए गए एक अन्य जजमेंट में, सुप्रीम कोर्ट ने कंपनीज़ एक्ट, 1956 की धारा 391 और कंपनीज़ एक्ट, 2013 की धारा 230 दोनों को वैध माना। यह जजमेंट कंपनी के लिक्विडेशन की तुलना में रेजोल्यूशन स्कीम पर अधिक जोर देता है, लेकिन फिर भी, यह स्पष्ट नहीं है कि दोनों पप्रोविजन यानी आई.बी.सी. कोड की धारा 29A और कंपनीज़ एक्ट, 2013 की धारा 230 एक साथ कैसे जा सकते हैं। आई.बी.सी. कोड के पीछे पूरा उद्देश्य लिक्विडेशन की तलाश करना नही है, बल्कि कॉर्पोरेट डेब्टर को रिवाइव करना है। हालांकि, भारत में, उन कंपनीज़ के लिए व्यवस्था की ऐसी स्कीम के लिए खरीदार ढूंढना मुश्किल है, जो लिक्विडेशन के कगार पर हैं। इन दोनों प्रोविजंस को सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टता की आवश्यकता है, जिसे स्विस मामले में अछूता छोड़ दिया गया है।

निष्कर्ष (कंक्लूज़न)

2019 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्विस मामले का निर्णय भारत के इंसोलवेंसी रिजाइम में ऐतिहासिक विकास है। कोर्ट रेजोल्यूशन के आँकड़ों पर भरोसा करता है और निपटान आई.बी.सी. कोड के बाद होता है। आई.बी.सी. कोड ने नॉन परफॉर्मिंग संकटों से निपटने को सिद्ध किया है और साथ ही कोड में किए गए निरंतर अमेंडमेंट से आसानी से व्यापार करने में मदद मिलती है। कोर्ट ने माना कि यह एक लाभकारी कानून है और इस प्रकार इसे रद्द नहीं किया जा सकता है। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए कोर्ट ने प्री-इंसोलवेंसी कोड को ध्यान में रखा था जो कई पहलुओं में विफल रहता है।

इसके अलावा, बहुत कम समय में सरकार द्वारा बदलते इन्वेस्टमेंट के साथ तालमेल रखने के लिए कई अमेंडमेंट पेश किए गए हैं। इस जजमेंट से पता चलता है, कि सुप्रीम कोर्ट को केवल उन मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए जहां किसी भी लेजिसलेटिव अधिनियम का प्रयोग प्राइमा फेसी मनमाना लगता है। इन इंसोलवेंसी कोड के अधिनियमन के पीछे लेजिसलेटिव की मंशा और प्राइमरी उद्देश्य को ध्यान में रखा जाना चाहिए। कोर्ट आर्थिक कारणों से इसकी कांस्टीट्यूशनल वैलिडिटी को बनाए रखने का प्रयास करता है। कोर्ट इस तथ्य पर निर्भर करता है कि यदि विभिन्न प्रोविजन को अनकांस्टीट्यूशनल माना जाता है तो उनका पूरे कोड पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। यह जजमेंट इंसोलवेंसी प्रक्रिया में शामिल इन्वेस्टर, क्रेडिटर और अन्य स्टेकहोल्डर को बहुत आवश्यक राहत देता है।

इस जजमेंट ने इसे लागू करने के कुछ निर्देशों के साथ इंसोलवेंसी कोड की नींव को और मजबूत किया है। कोर्ट क्रेडिटर की रक्षा करने की कोशिश करती है क्योंकि वे कॉर्पोरेट डेब्टर को रिवाइव करने के लिए फ्रंट लाइन में हैं। किसी को कुछ और वर्षों तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता है, जब तक कि विभिन्न जजमेंट उन दिशाओं का मार्गदर्शन नहीं करते हैं जिनमें इस कोड को काम करना चाहिए। आंकड़े स्पष्ट रूप से बताते हैं कि इंडियन इंसोलवेंस कोड अन्य देशों में इंसोलवेंसी कानूनों की तुलना में बेहतर काम करती है। कई निपटान और रेजोल्यूशन स्वयं स्पष्ट रूप से इंगित (इंडिकेट) करते हैं कि इंसोलवेंसी कोड कितना सफल है।

यह जजमेंट आगे इस कोड के माध्यम से संपत्ति प्राप्त करने में इन्वेस्टर के बीच बढ़ते भय को कम करने में मदद करता है। अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना है और क्रॉस बॉर्डर इंसोलवेंसी, फाइनेंशियल सर्विस प्रोवाइडर के रेजोल्यूशन और स्ट्रेस्ड एसेस्ट्स के रेजोल्यूशन के संबंध में और अमेंडमेंट किए जाने की आवश्यकता है। अंत में, सुप्रीम कोर्ट एरेंट प्रमोटरों के प्रवेश के मुद्दे पर बहुत आवश्यक स्पष्टता लाने में विफल रहता है और आई.बी.सी. कोड की धारा 29A और कंपनीज़ एक्ट, 2013 की धारा 230 के बीच संघर्ष उत्पन्न होता है। जजमेंट पूरी तरह से विफल रहा, उन खामियों को पूरा करने में जो ऑपरेशनल क्रेडिटर के साथ गलत व्यवहार करती हैं। यह अच्छी तरह से ध्यान दिया जाना चाहिए कि चेन्नई में सर्किट बेंच स्थापित करने के लिए सरकार द्वारा हाल ही में किया गया कदम स्विस मामले के प्रभाव को दर्शाता है, लेकिन आई.बी.सी. कोड को अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना है और मौजूदा प्रोविजन में कई और अमेंडमेंट किए जाने की आवश्यकता है।

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