डाउरी डेथ (धारा 304B)

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Indian Penal Code
Image Source- https://rb.gy/egawkm

यह लेख (बी.बी.ए.एलएलबी) रमैया इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज, बैंगलोर के तीसरे वर्ष के छात्र Kashish Kundlani द्वारा लिखा गया है। इस लेख में, हम डाउरी डेथ से संबंधित अपराधों और डाउरी डेथ के रूप में अनुमानों पर चर्चा करेंगे। इस लेख का अनुवाद Sonia Balhara द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय (इंट्रोडक्शन)

बहुत पुराने समय से हमने महिलाओं के खिलाफ बहुत सारे अपराध देखे हैं, जहां उन्हें प्रताड़ित (टार्चर) किया जाता है और ऐसा ही एक अपराध है डाउरी डेथ। दहेज की मांग को लेकर महिला की मौत से जुड़े कई मामले हम सभी ने सुने होंगे। यह एक ऐसे समाज के लिए बहुत ही शर्मनाक है जहां दहेज न दे पाने के कारण एक महिला की मौत हो जाती है और यह भी बहुत शर्मनाक है कि यहां अभी भी दहेज प्रथा चल रही है।

इंडियन पीनल कोड, 1860 की धारा 304B में डाउरी डेथ को परिभाषित किया गया है। साथ ही इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 113B में डाउरी डेथ के बारे में अनुमान लगाया गया है।

डाउरी डेथ 

इंडियन पीनल कोड की धारा 304B में कहा गया है कि अगर किसी महिला की शादी के सात साल के भीतर जलने या किसी भी तरह की शारीरिक चोट से मृत्यु हो जाती है या यह पता चलता है कि शादी से पहले उसके पति या पति के किसी अन्य रिश्तेदार द्वारा क्रूरता (क्रुएल्टी) या उत्पीड़न (हरासमेंट) का सामना किया गया था दहेज की मांग के संबंध में तो, महिला की मौत को डाउरी डेथ माना जाएगा।

डाउरी डेथ की सजा कम से कम सात साल की कैद या ज्यादा से ज्यादा उम्र कैद की सजा हो सकती है।

आवश्यक सामग्री (एसेंशियल इनग्रेडिएंट्स)

  • मृत्यु, जलने या शारीरिक चोट या किसी अन्य परिस्थिति से होनी चाहिए।
  • मृत्यु विवाह के सात वर्षों के भीतर होनी चाहिए।
  • यह अवश्य ही प्रकट किया जाना चाहिए कि विवाह के कुछ समय बाद ही उसके पति या किसी अन्य रिश्तेदार द्वारा उसके साथ क्रूरता या उत्पीड़न किया गया था।
  • उसके साथ हुई क्रूरता या उत्पीड़न दहेज की मांग को लेकर होनी चाहिए।

दहेज की मांग (डिमांड फॉर डाउरी)

डाउरी प्रोहिबिशन एक्ट, 1961 की धारा 2 के अनुसार, कहा जाता है कि दहेज ऐसी संपत्ति या मूल्यवान (वैल्यूएबल) सुरक्षा है, जो प्रत्यक्ष (डायरेक्टली) या अप्रत्यक्ष (इनडायरेक्टली) रूप से देने के लिए सहमत है-

  • विवाह के एक पक्ष द्वारा विवाह के दूसरे पक्ष को; या
  • विवाह के किसी भी पक्ष के माता-पिता द्वारा या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा, विवाह के किसी भी पक्ष को या किसी अन्य व्यक्ति को, उक्त पक्षों के विवाह के संबंध में विवाह के पहले या बाद में किसी भी समय।

दहेज की मांग के विभिन्न कारण (वेरियस कॉसेस टू डिमांड डाउरी)

दहेज की मांग तो हम सदियों से देखते आ रहे हैं लेकिन दहेज मांग को रोकने के लिए समाज को इसे ठीक से समझना चाहिए ताकि इसकी प्रथा को रोका जा सके।

विभिन्न कारण हैं जैसे की –

परंपरा के नाम पर

हमने देखा होगा कि लोग इसे एक परंपरा या एक रिवाज कहते हैं, जिसका पालन शादियों में किया जाता है। परंपरा के नाम पर दुल्हन के परिवार वाले, दूल्हे के परिवार को कीमती सामान देते हैं

दूल्हे के परिवार के परिवार द्वारा दहेज की मांग

दूल्हे के परिवार वाले स्वेच्छा (वॉलंटरी) कारण बताकर दहेज मांगते हैं कि उनके बेटे की अच्छी नौकरी है और उनकी बहुत प्रतिष्ठा (रेप्युटेशन) है, आदि।

यह सोचकर कि इससे समाज में प्रतिष्ठा बनेगी

पहले लोगों की यह धारणा थी कि दहेज देने से समाज में अच्छी प्रतिष्ठा बनेगी। समय के साथ यह समाज में दिखावे की अवधारणा (कॉन्सेप्ट) बन गई और लोग इसकी तुलना दूसरों से करने लगे है।

निरक्षरता (इल्लिट्रेसी)

अविकसित (अंडरडेवलप्ड) क्षेत्रों में, साक्षरता (लिटरेसी) दर बहुत कम है और लोग दहेज से संबंधित कानूनों से अनजान हैं, जिसके कारण दूसरों द्वारा दहेज की मांग में वृद्धि (इनक्रीज़) हुई है।

हालांकि एक अविकसित क्षेत्र में साक्षरों द्वारा दहेज का भी अभ्यास किया जाता है, लेकिन उन्हें कानूनों को समझाना थोड़ा अधिक कठिन हो जाता है।

क्या डाउरी डेथ एक बेलेबल और कॉग्निज़िबल अपराध है? 

बेलेबल अपराध- ऐसे अपराध जिनमें गिरफ्तार व्यक्ति को रिहा करने के लिए अदालत से अनुमति की आवश्यकता नहीं होती है। गिरफ्तार व्यक्ति को आवश्यक जरूरतों को पूरा करके रिहा किया जा सकता है और पुलिस व्यक्ति को मना नहीं कर सकती है।

कॉग्निज़िबल अपराध- ऐसा अपराध जिसमें, पुलिस को किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार करने का अधिकार होता है और साथ ही मजिस्ट्रेट की अनुमति से या बिना एफ.आई.आर दर्ज कर जांच शुरू करने का भी अधिकार होता है।

डाउरी डेथ एक नॉन-बेलेबल और कॉग्निज़िबल अपराध है।

कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर, 1973 की धारा 41 के अनुसार पुलिस अधिकारी बिना वारंट के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय उस व्यक्ति के विरुद्ध दर्ज शिकायत से संतुष्ट होकर सी.आर.पी.सी की धारा 41 के सभी प्रावधानों (प्रोविजन) को पूरा करता है।

निर्णय विधि (केस लॉ)

स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश बनाम निक्कू राम और अन्य, 30 अगस्त 1995

इस मामले में दंपति (कपल) की शादी हो चुकी थी और शादी के 5-6 महीने बाद ही पति, भाभी और सास ने कम दहेज लाने पर दुल्हन को ताने मारना शुरू कर दिया। वे उससे कई चीजें मांगने लगे जो उसने पूरी नहीं की। अभियोजक (प्रोसिक्यूटर) ने मृतक (डिसीस्ड) को प्रताड़ित करने का मामला दर्ज किया और उसे अधिक दहेज लाने के लिए क्रूरता के अधीन किया।

धीरे-धीरे उस पर प्रताड़ना इस कदर बढ़ गई कि सास-ससुर ने उसके माथे पर धारदार ब्लेड से वार कर दिया जिससे वहां पर गहरा घाव हो गया।

वह अपने पति और ससुराल वालों द्वारा, उस पर हो रहे दुर्व्यवहार को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी, जिसके परिणामस्वरूप, उसने नेफ़थलीन बॉल का सेवन करके आत्महत्या कर ली और उसकी मृत्यु हो गई।

जांच के दौरान तेज धार वाला ब्लेड बरामद किया गया और जांच पूरी होने के बाद पति, भाभी और सास पर इंडियन पीनल कोड की धारा 304B, 306 और 498A के तहत आरोप लगाए गए और उनके खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया।

अदालत ने सभी सबूतों की जांच करने के बाद यह माना कि जिन लोगों पर धारा 304B, 306 और 498A के तहत आरोप लगाए गए हैं, वे इन आपराधिक आरोपों से मुक्त होंगे क्योंकि अभियोजन उनके और केवल सास-ससुर के खिलाफ सबूत पेश करने में विफल रहा। कानून को इंडियन पीनल कोड की धारा 324 के तहत अपनी बहू को स्वेच्छा से चोट पहुंचाने का दोषी माना जाएगा और 3,000 रुपये का जुर्माना लगाया। जुर्माने का भुगतान न करने पर 1 महीने के लिए साधारण कारावास का सामना करना पड़ेगा।

पवन कुमार और अन्य बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा, 9 फरवरी 1998 

तथ्यों (फैक्ट्स)

इस मामले में अपीलकर्ता (अप्पीलेंट) नंबर 1, पति और उसकी मृत पत्नी उर्मिल है। कुछ समय बाद वे सोनीपत (हरियाणा) चले गए।

उर्मिल अपनी शादी के कुछ दिनों के भीतर अपने माता-पिता के घर वापस लौट आई और उसने रेफ्रिजरेटर, स्कूटर आदि के लिए दहेज की मांग के बारे में शिकायत की। उसने मांगों को पूरा नहीं किया और अपीलकर्ताओं द्वारा यातना और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा जैसे कि उस पर टिप्पणी करना कि वह बदसूरत आदि दिखती है। अपीलकर्ताओं द्वारा इस तरह की टिप्पणियों और ताने के परिणामस्वरूप, उसने आत्महत्या कर ली और जलने के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

आरोपी के पति, और सास-ससुर के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया था। अदालत में, अपीलकर्ता के विद्वान वकील द्वारा यह तर्क दिया गया था कि यहां कोई अपराध नहीं किया गया है क्योंकि यह इंडियन पीनल कोड की धारा 304B के आवश्यक सामग्री को पूरा नहीं करता है और कोई सबूत भी नहीं मिला है कि उसकी मृत्यु से पहले, मृतक से दहेज की मांग के संबंध में किसी भी तरह की क्रूरता या उत्पीड़न की गयी थी।

मुद्दा (इश्यू)

  • क्या उसकी मृत्यु से ठीक पहले उसके साथ कोई क्रूरता या उत्पीड़न कि गयी थी और क्या वह क्रूरता दहेज की मांग के संबंध में थी
  • क्या रेफ्रिजरेटर, स्कूटर आदि की मांग, अधिग्रहण (एक्वायर) की इच्छा थी या दहेज की मांग थी

निर्णय (जजमेंट) 

अपीलकर्ता के विद्वान वकील ने तर्क दिया कि केवल एक रेफ्रिजरेटर, स्कूटर आदि प्राप्त करने की इच्छा दहेज मांगने के दायरे में नहीं आना चाहिए और इसे अपराध नहीं माना जा सकता क्योंकि इंडियन पीनल कोड की धारा 304B और धारा 498A के साथ डाउरी प्रोहिबिशन एक्ट, 1961 की धारा 2 के तहत दहेज की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आता है।

कोर्ट ने कहा था कि दहेज की मांग खुद धारा 304B के तहत एक अपराध है और इसके तहत अपराध होने के लिए यह जरूरी नहीं है कि इसके लिए एक समझौता होना जरूरी है।

अदालत ने उसे धारा 498A के तहत भी दोषी ठहराया और उसके रूप पर टिप्पणी करके उसे क्रूरता या उत्पीड़न के अधीन किया और उसे और अधिक दहेज लाने के लिए ताना मारा।

धारा 304B के तहत पवन कुमार (अपीलकर्ता नंबर 1) को 7 साल के कठोर कारावास और 500 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई और जुर्माना न देने पर 6 महीने की सजा उसके कारावास में जोड़ दी गयी।

306 आईपीसी के तहत 4 साल के सश्रम कारावास और 200 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई और भुगतान न करने पर 3 महीने उसके कारावास में जोड़ दिए गए और धारा 498A के तहत उसे दोषी ठहराया गया और उसे 2 साल के कठोर कारावास और 200 रुपये की सजा सुनाई गई। जुर्माने में चूक करने पर 3 महीने और उसकी कैद में जोड़ा जाएगा।

सभी वाक्य एक साथ चलने चाहिए।

यहां की अदालत ने अपीलकर्ता नंबर 2 और अपीलकर्ता नंबर 3 को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

क्रूरता (क्रुएल्टी)

इंडियन पीनल कोड की धारा 498A क्रूरता को परिभाषित करती है।

यदि कोई पति या उसका कोई रिश्तेदार किसी महिला को मानसिक या शारीरिक नुकसान पहुंचाता है तो उन्हें इस धारा के तहत दंडनीय माना जाएगा।

इसके लिए सजा तीन साल की कैद और जुर्माना भी भरना होगा।

अनिवार्य (एसेंशियल)

  • किसी महिला को चोट पहुंचाने या उसे आत्महत्या करने के लिए उकसाने के लिए, जानबूझकर किया गया कोई भी आचरण।
  • किसी महिला या उसके किसी रिश्तेदार को उनकी गैरकानूनी मांगों को पूरा करने के लिए प्रताड़ित करना।

निर्णय विधि (केस लॉ)

स्टेट ऑफ पंजाब बनाम गुरमीत सिंह, 2 जुलाई 2014

इस मामले में, ‘रिश्तेदार’ शब्द का विश्लेषण किया गया था।

प्रतिवादी (रेस्पोंडेंट) गुरमीत सिंह पर आई.पी.सी की धारा 304B के तहत आरोप लगाया गया था कि वह परमजीत सिंह की पत्नी, गुरुजीत कौर की मौत का कारण है। प्रतिवादी ने तर्क दिया कि उस पर धारा 304B के अपराध का आरोप नहीं लगाया जा सकता क्योंकि वह मृतक का रिश्तेदार नहीं है।

प्रतिवादी परमजीत की मौसी का भाई था और यह नहीं कहा जा सकता कि वह मृतक के पति का रिश्तेदार है।

अदालत ने कहा कि उस पर धारा 304B के तहत आरोप नहीं लगाया जा सकता क्योंकि वह खून, गोद लेने या मृतक के पति के विवाह द्वारा रिश्तेदार नहीं है। लेकिन कोर्ट ने कहा कि उस पर अपराध के लिए अन्य धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है।

धारा 498A अपनी परिभाषा में रिश्तेदार के बारे में बात करती है और इस मामले में, उसने ‘रिश्तेदार’ शब्द का विश्लेषण किया और यह अर्थ निकाला कि एक व्यक्ति जो खून, गोद लेने या शादी द्वारा एक रिश्तेदार है, वह रिश्तेदारों की श्रेणी में नहीं आएगा और उसे आयोजित नहीं किया जा सकता है। धारा 304B के तहत दोषी हैं लेकिन अगर उन्होंने कोई अन्य अपराध किया है तो उन्हें अन्य धारा के तहत दोषी ठहराया जा सकता है।

प्रावधान का दुरुपयोग और इसकी संवैधानिकता (मिसयूज ऑफ द प्रोविजन एंड इट्स कंस्टिट्यूशनलिटी)

अपने मकसद के लिए प्रावधान का दुरुपयोग करने या पति के परिवार को प्रताड़ित करने के लिए कई फर्जी मामले दर्ज किए गए हैं। महिलाओं को इस धारा का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए जो उनकी सुरक्षा के लिए बनाई गई है। हालांकि, प्रावधान का दुरुपयोग करने की एक मात्र संभावना से प्रावधान को अमान्य नहीं कर देना चाहिए। इसलिए धारा 498A संवैधानिक (कॉन्स्टिट्यूशनल) है।

सुशील कुमार शर्मा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य, 19 जुलाई 2005 

इस मामले में, याचिकाकर्ता (पिटीशनर) ने संविधान के आर्टिकल 32 के तहत इंडियन पीनल कोड की धारा 498A की वैधता (वैलिडिटी) को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह अपराध महिलाओं को दहेज से बचाने के लिए किया गया है न कि परिवार के निर्दोष सदस्यों के खिलाफ हथियार के रूप में इसका दुरुपयोग करने के लिए।

इस मामले में मुद्दा यह था कि अगर कोई महिला, इस प्रावधान का दुरुपयोग करती है तो क्या निवारक (प्रिवेंटिव) उपाय किए जाने चाहिए। याचिकाकर्ता का कहना था कि जांच एजेंसियों और अदालतों को मामले का ठीक से विश्लेषण करना चाहिए और इस धारणा से शुरू नहीं करना चाहिए कि आरोपी व्यक्ति ही दोषी हैं। उन्हें दहेज से संबंधित मामले में प्रतिबंधात्मक दृष्टिकोण (रेस्ट्रिक्टिव एप्रोच) का उपयोग नहीं करना चाहिए।

उनका यह भी कहना है कि जांच एजेंसियों और अदालतों को बनाए गए कानूनों की रक्षा करनी चाहिए और किसी के द्वारा लगाए गए निराधार (बेसलेस) और बुरे आरोपों पर एक निर्दोष व्यक्ति को पीड़ित नहीं होने देना चाहिए। अदालत को उसकी अपील में कोई सामग्री नहीं मिली और उसने रिट याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि अगर वह अपनी बेगुनाही साबित करना चाहता है जिसके लिए वह आरोपी है, तो वह एक मुकदमे में ऐसा कर सकता है।

डाउरी डेथ के बारे में अनुमान

इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 113B डाउरी डेथ के बारे में उपधारणा के बारे में बताती है। यदि किसी महिला की दहेज की मांग के संबंध में मृत्यु हो जाती है और यह दिखाया गया था कि उसकी मृत्यु से कुछ समय पहले उसे किसी भी व्यक्ति द्वारा उत्पीड़न या क्रूरता का शिकार किया गया था। तब अदालत ऐसे व्यक्ति को उसकी मौत के लिए जिम्मेदार मानेगी।

निष्कर्ष (कंक्लूज़न)

दहेज जैसी कही गयी परंपरा के नाम पर प्रथा भारत में हर जगह मौजूद है चाहे वह ग्रामीण हो या शहरी। दहेज प्रथा का खतरा समाज में बहुत नीचे तक पहुंच गया है। इतने प्रावधान करने के बाद भी दहेज की मांग की प्रथा अभी भी बंद नहीं हुई है। सरकार चाहे कितने भी कानून बना ले फिर भी उसे समाज से पूरी तरह मिटा नहीं सकती। इसे पूरी तरह खत्म करने के लिए समाज के लोगों को समझना होगा कि यह गलत है।

समाज में सख्त कानून बनाकर इसे नियंत्रित किया जा सकता है लेकिन समाज में कानूनों की अनभिज्ञता (इग्नोरेंस) और परिवारों से कोई समर्थन न होने के कारण इसे समाप्त नहीं किया जा सकता है। यहां तक ​​कि अगर लड़की अपने माता-पिता से पति के परिवार द्वारा झेली जा रही प्रताड़ना के बारे में शिकायत करती है, तो भी लड़की के माता-पिता इसे प्रकाश में लाने के बजाय समझौता करने का विकल्प चुनते हैं। समाज के कानून और समर्थन मिलकर इस मुद्दे को हल कर सकते हैं।

संदर्भ (रेफरेन्सेस)

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