आईपीसी की धारा 325: अर्थ, सजा और अपवाद

0
16917
Indian Penal Code
Image Source- https://rb.gy/xmqdpk

यह लेख जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल, ओपी जिंदल विश्वविद्यालय के कानून की छात्रा Vihanka Narasimhan द्वारा लिखा गया है। यह लेख आईपीसी की धारा 325 की व्याख्या करने का प्रयास करता है जो ‘स्वेच्छया से घोर उपहति (ग्रिवियस हर्ट) पहुंचाने के लिए सजा’ की अवधारणा से संबंधित है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

घोर उपहति का गंभीर अपराध भारतीय दंड संहिता, 1860 के तहत ‘मानव शरीर को प्रभावित करने वाले अपराध’ शीर्षक वाले अध्याय 16 में पाया जा सकता है। धारा 320 में 8 प्रकार की उपहति की गणना की गई है जो प्रकृति में ‘घोर’ हैं, जिसमें पुंसत्वहरण (इमेस्कुलेशन), चोट के परिणामस्वरूप दृष्टि और/या सुनने की हानि, किसी व्यक्ति के अंग या जोड़ की हानि, चेहरे और सिर की विकृति, खतरनाक चोट यानी 20 दिनों की अवधि के लिए गंभीर शारीरिक दर्द और हड्डी या दांत का टूटना या विस्थापन (डिस्लोकेशन) होना, शामिल है। संहिता की धारा 325 के तहत स्वेच्छया से ‘घोर उपहति’ पहुंचाने की सजा का प्रावधान किया गया है। इस धारा के तहत दोषी ठहराए जाने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि घोर उपहति एक प्रकार की विशिष्ट उपहति है जो किसी व्यक्ति को स्वेच्छया से दी गई है और धारा 320 के दायरे में आती है।

उपहति का अर्थ

उपहति शब्द को भारतीय दंड संहिता की धारा 319 के तहत परिभाषित किया गया है, जो कोई भी किसी भी व्यक्ति को शारीरिक दर्द, बीमारी या दुर्बलता (डिफाॅर्मिटी) का कारण बनता है, वह उपहति करता है। आम आदमी के शब्दों में, किसी अपराध को उपहति के रूप में माना जाने के लिए, निम्नलिखित तत्वों को संतुष्ट करने की आवश्यकता है: –

शारीरिक दर्द

किसी अपराध को उपहति के रूप में वर्गीकृत करने के लिए आवश्यक है कि इसमें ‘शारीरिक पीड़ा’ का एक तत्व हो। इसे किसी कार्य के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में समझा जा सकता है, जो इस्तेमाल की जाने वाली विधियों के बावजूद शारीरिक दर्द का कारण बनता है। यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इस तत्व को शारीरिक संपर्क के बिना संतुष्ट किया जा सकता है; हालांकि, भावनात्मक या मानसिक पीड़ा की अवधारणा इस धारा के अंतर्गत नहीं आती है। इसके अलावा, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि किसी भी प्रकार की हानि जो जीवन के जोखिम का कारण बनती है जिसके परिणामस्वरूप शरीर में गंभीर दर्द होता है, जिससे वह अस्थायी रूप से अपनी सामान्य गतिविधियों का पालन करने में असमर्थ हो जाता है, उसे घोर उपहति नहीं माना जा सकता है लेकिन वह उपहति के दायरे में आता है।

बीमारी

किसी अपराध को उपहति के रूप में वर्गीकृत करने के लिए, यह आवश्यक है कि एक ‘बीमारी’ का प्रसार (स्प्रेड) हो। संक्षेप में, इसका तात्पर्य यह है कि यदि किसी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति से कोई बीमारी हो जाती है, तो वह इस धारा के दायरे में आएगा। राका बनाम एंपरर के मामले में, एक वेश्या के साथ जिसे उपदंश (सिफिलिस) था और उसके पेशे की प्रकृति के परिणामस्वरूप यह बीमारी उसके ग्राहकों को हस्तांतरित (ट्रांसफर) हो गई। इस मामले में, अदालत ने यह कहते हुए उसके खिलाफ फैसला सुनाया कि वेश्या भारतीय दंड संहिता की धारा 269 के तहत उत्तरदायी थी, जो उसकी ओर से एक लापरवाहीपूर्ण कार्य था जिसके कारण यह बीमारी फैल गई जो संभावित रूप से अन्य व्यक्ति के जीवन के लिए खतरनाक हो सकती है।  

दुर्बलता

किसी अपराध को उपहति के रूप में वर्गीकृत करने के लिए, यह आवश्यक है कि ‘दुर्बलता’ का एक तत्व उसमे शामिल हो। इस शब्द को किसी अंग की, अस्थायी या स्थायी रूप से अपना सामान्य कार्य करने में असमर्थता के रूप में समझा जा सकता है। इसे एक ऐसे कार्य के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में माना जा सकता है जो अस्थायी मानसिक दुर्बलता, उन्माद (हिस्टीरिया) या आतंक की स्थिति की ओर ले जाता है।

घोर उपहति का अर्थ

भारतीय दंड संहिता की धारा 320 के तहत घोर उपहति शब्द को निम्नलिखित तरीके से परिभाषित किया गया है: –

“निम्न प्रकार की उपहति को केवल” घोर “के रूप में नामित किया गया है: –

  • प्रथम – पुंसत्वहरण
  • दूसरा – किसी भी आंख की दृष्टि का स्थायी अभाव।
  • तीसरा – किसी भी कान की सुनने की क्षमता का स्थायी अभाव।
  • चौथा – किसी भी अंग या जोड़ का विच्छेद (प्राइवेशन)।
  • पांचवां – किसी भी अंग या जोड़ की शक्तियों का विनाश या स्थायी हानि।
  • छठा  -सिर या चेहरे की स्थायी विकृति ।
  • सातवां – हड्डी या दांत का टूटना या विस्थापन।
  • आठवां -कोई भी उपहति जो जीवन को खतरे में डालती है या जिसके कारण पीड़ित को 20 दिनों की अवधि के दौरान गंभीर शारीरिक दर्द होता है, या अपने सामान्य कार्यों का पालन करने में असमर्थ होता है।

आम आदमी की भाषा में, किसी अपराध को घोर उपहति के रूप में मानने के लिए, निम्नलिखित तत्वों को संतुष्ट करने की आवश्यकता है: –

पुंसत्वहरण

किसी अपराध को घोर उपहति के रूप में वर्गीकृत करने के लिए, यह आवश्यक है कि इसमें पुंसत्वहरण हो।  मरियम वेबस्टर के अनुसार, पुंसत्वहरण शब्द को “ताकत, शक्ति या आत्मा से वंचित करने” के रूप में परिभाषित किया गया है। इस प्रकार की घोर उपहति केवल पुरुषों के लिए ही सीमित है और आमतौर पर इसका उपयोग तब किया जाता है जब किसी व्यक्ति के अंडकोश को नुकसान होता है जिसके परिणामस्वरूप वह नपुंसक हो जाता है। इसे एक प्रकार की घोर उपहति के रूप में माना जाएगा, भले ही यह प्रकृति में स्थायी या अस्थायी हो।

आंखों की रोशनी को हानि

किसी अपराध को घोर उपहति के रूप में वर्गीकृत करने के लिए, यह आवश्यक है कि किसी व्यक्ति की ‘आंखों को हानि’ हो। इस प्रकार की हानि में किसी एक या दोनों आंखों में स्थायी या आंशिक दृष्टि की हानि के माध्यम से शरीर की विकृति शामिल है।

कानों की सुनने की क्षमता को हानि

किसी अपराध को घोर उपहति के रूप में वर्गीकृत करने के लिए, यह आवश्यक है कि किसी हानि के कारण किसी व्यक्ति की सुनने की क्षमता को हानि हुई हो। इस प्रकार की हानि में कान को इस तरह से क्षति पहुँचाने के माध्यम से शरीर की विकृति शामिल है कि यह स्थायी बहरापन का कारण बनता है। यह तब हो सकता है जब किसी व्यक्ति की खोपड़ी, मस्तिष्क या कान को हानि हो जाए। इस हानि को केवल स्थायी सुनवाई हानि के मामले में कर्षण (ट्रेक्शन) दिया जाता है और इसे दृष्टि की हानि से कम गंभीर माना जाता है।

अंग या जोड़ का नुकसान

किसी अपराध को घोर उपहति के रूप में वर्गीकृत करने के लिए, यह आवश्यक है कि किसी व्यक्ति को किसी हानि के कारण अंग या जोड़ का नुकसान हुआ हो।  अंग शब्द को किसी व्यक्ति के हाथ या पैर के रूप में परिभाषित किया जा सकता है और एक जोड़ शरीर में दो हड्डियों का जोड़ है। एक अंग या जोड़ का अभाव व्यक्ति को उन कार्यों को करने में असमर्थ बना सकता है जो अंगों या जोड़ों की सहायता से किए जाते हैं;  उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति के पैर काट दिए जाते हैं, तो वह चलने या दौड़ने में सक्षम नहीं होगा।

किसी अंग या जोड़ को हानि

किसी अपराध को घोर उपहति के रूप में वर्गीकृत करने के लिए, यह आवश्यक है कि अंग या जोड़ को हानि हुई हो जो किसी व्यक्ति के कारण हुई हो। इस प्रकार की हानि में शरीर को इस तरह से क्षति पहुंचाना शामिल है कि यह किसी अंग या जोड़ की उपयोगिता को स्थायी रूप से कम कर देती है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति के दिन-प्रतिदिन के कार्यों को करने में बाधा उत्पन्न होती है।

सिर या चेहरे की विकृति

किसी अपराध को घोर उपहति के रूप में वर्गीकृत करने के लिए, यह आवश्यक है कि किसी व्यक्ति को, किसी हानि के कारण सिर या चेहरे की विकृति हुई हो। कैंब्रिज डिक्शनरी द्वारा विकृति शब्द को “किसी चीज या किसी की उपस्थिति को खराब करने के लिए, विशेष रूप से उनके चेहरे को पूरी तरह से खराब करने के लिए” के रूप में परिभाषित किया गया है। इस प्रकार की हानि में शरीर को इस तरह से क्षति पहुंचाना शामिल है कि यह किसी व्यक्ति के रूप या शारीरिक सुंदरता को स्थायी रूप से बर्बाद कर देता है।

हड्डी या दांतों का टूटना या विस्थापन

किसी अपराध को घोर उपहति के रूप में वर्गीकृत करने के लिए, यह आवश्यक है कि किसी व्यक्ति को किसी हानि के कारण हड्डी या दांत का टूटना या विस्थापन हुआ हो। टूटने को आमतौर पर हड्डी के पूर्ण या आंशिक रूप से टूटने के रूप में परिभाषित किया जा सकता है और विस्थापन तब होता है जब एक हड्डी को उसके सामान्य स्थान से अलग कर दिया जाता है।

खतरनाक उपहति

किसी अपराध को खतरनाक उपहति के रूप में वर्गीकृत करने के लिए, यह आवश्यक है कि निम्न में से कोई भी एक व्यक्ति के घायल होने पर घटित हो: –

  1. एक व्यक्ति का कार्य दूसरे व्यक्ति के जीवन को खतरे में डालता है,
  2. एक ऐसा कार्य जिससे गंभीर शारीरिक दर्द होता है जो एक व्यक्ति को 20 दिनों की अवधि के लिए भुगतना पड़ता है,
  3. एक ऐसा कार्य जिससे गंभीर शारीरिक पीड़ा होती है कि एक व्यक्ति 20 दिनों की अवधि के लिए अपने सामान्य कार्य और दैनिक गतिविधियों को करने में असमर्थ होता है

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि, यदि मृत्यु करने या गंभीर शारीरिक उपहति पहुंचाने के इरादे की अनुपस्थिति है, तो आरोपी को केवल उपहति पहुंचाने का दोषी माना जाएगा, न कि घोर उपहति पहुंचाने का।

उपहति और घोर उपहति के बीच अंतर

उपहति और घोर उपहति शब्द प्रकृति में समान लग सकते हैं लेकिन वास्तव में कानून में इनके अलग-अलग प्रावधान हैं। दोनों शब्दों में अंतर इस प्रकार है:-

  1. ‘उपहति’ शब्द को धारा 319 के तहत परिभाषित किया गया है जबकि ‘घोर उपहति’ को भारतीय दंड संहिता की धारा 320 के तहत परिभाषित किया गया है।
  2. ‘उपहति’ शब्द में तीन मुख्य घटक शामिल हैं जिनमें शारीरिक दर्द, बीमारी और हानि के कारण होने वाली दुर्बलता शामिल है जबकि ‘घोर उपहति’ में आठ मुख्य घटक शामिल हैं, जिनमे पुंसत्वहरण,  चोट के परिणामस्वरूप दृष्टि और/या सुनने की हानि, किसी व्यक्ति के अंग या जोड़ की हानि, चेहरे और सिर की विकृति, खतरनाक चोट, और दांत या हड्डी का टूटना या विस्थापन शामिल है।
  3. ‘घोर उपहति’ का अपराध ‘उपहति’ के अपराध से कहीं अधिक गंभीर है।
  4. ‘उपहति’ धारा 323 के तहत केवल 1 वर्ष तक कारावास या जुर्माना जो एक हजार रुपये तक हो सकता है, या दोनों के साथ दंडनीय है, जबकि ‘घोर उपहति’ धारा 325 के तहत 7 साल तक की सजा और जुर्माने के साथ दंडनीय है।
  5. यह आवश्यक है कि दंडनीय होने के लिए ‘उपहति’ के अपराध के साथ एक और अपराध किया गया हो; हालांकि, ‘घोर उपहति’ के मामले में, अपराध करने वाले व्यक्ति को उत्तरदायी ठहराना ही पर्याप्त है।
  6. ‘उपहति’ का अपराध एक गैर-संज्ञेय (नॉन कॉग्निजेबल), जमानती और कंपाउंडेबल अपराध है जबकि ‘घोर उपहति’ एक संज्ञेय (कॉग्निजेबल), जमानती और कंपाउंडेबल अपराध है।

सरलता से समझने के लिए, कृपया नीचे दी गई टेबल को देखें: –

आधार उपहति घोर उपहति
घटक इसे धारा 319 के तहत परिभाषित किया गया है और इसमें शारीरिक दर्द, बीमारी और दुर्बलता शामिल है। इसे धारा 320 के तहत परिभाषित किया गया है और इसमें पुंसत्वहरण,  चोट के परिणामस्वरूप दृष्टि और/या सुनने की हानि, किसी व्यक्ति के अंग या जोड़ की हानि, चेहरे और सिर की विकृति, खतरनाक चोट, और दांत या हड्डी का टूटना या विस्थापन शामिल है।
गंभीरता यह प्रकृति में गंभीर नहीं है क्योंकि यह किसी व्यक्ति के जीवन को खतरे में नहीं डालता है। यह प्रकृति में गंभीर है क्योंकि यह किसी व्यक्ति के जीवन को खतरे में डालता है।
सजा यह धारा 323 के तहत दंडनीय है और गैर-संज्ञेय अपराध है। यह धारा 325 के तहत दंडनीय है और संज्ञेय और जमानती है।
आवश्यकताएं दंडनीय समझे जाने के लिए, इसके साथ अन्य अपराध होने चाहिए। यह अपने आप में दंडनीय है।

आईपीसी की धारा 325 के तहत सजा

भारतीय दंड संहिता की धारा 325 में घोर उपहति के लिए सजा का प्रावधान है। यह प्रदान करती है की: –

“जो कोई, धारा 335 द्वारा प्रदान किए गए मामले को छोड़कर, स्वेच्छया से घोर उपहति का कारण बनता है, उसे एक अवधि के लिए कारावास से दंडित किया जाएगा जो सात साल तक का हो सकता है, और वह जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।”

सरल शब्दों में, किसी को घोर उपहति पहुंचाना भारत में कुछ हद तक गंभीर अपराध माना जाता है और यह प्रकृति में संज्ञेय है। संज्ञेय अपराधों को एक विशेषाधिकार (प्रिविलेज) के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो कानून के तहत केवल एक पुलिस अधिकारी को प्रदान किया गया है जो उसे अदालत से वारंट के बिना गिरफ्तारी करने की अनुमति देता है। हालांकि, यह अदालत के विवेक पर जमानती और कंपाउंडेबल है। यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि यदि किसी व्यक्ति को इस अपराध के लिए दोषी ठहराया जाता है, तो उसे एक अवधि के लिए कारावास की सजा दी जाएगी, जो सात साल तक की हो सकती है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

आईपीसी की धारा 325 का अपवाद

धारा 325 की भाषा से, यह आसानी से समझा जा सकता है कि धारा 335 एक अपवाद के रूप में कार्य करती है जिसके परिणामस्वरूप घोर उपहति के मामले में किसी व्यक्ति को दंडित नहीं किया जाएगा। धारा 335 में कहा गया है कि आरोपी को गंभीर और अचानक उकसावे पर स्वेच्छया से घोर उपहति पहुंचानी चाहिए और इस तरह की घोर उपहति का इरादा उस उकसावे वाले व्यक्ति के अलावा किसी अन्य को उपहति पहुंचाने का नहीं होना चाहिए। इस धारा के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति उपरोक्त कार्य करते हुए पकड़ा जाता है, तो उसे या तो चार साल की कैद या दो हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

क्या होता है जब किसी व्यक्ति पर आईपीसी की धारा 325 का आरोप लगाया जाता है? 

एक आपराधिक प्रक्रिया शुरू करने के लिए, आम तौर पर पीड़ित की पहली प्रतिक्रिया एक पुलिस स्टेशन में जाकर एफआईआर दर्ज करने की होगी या सरल शब्दों में, पीड़ित शिकायत दर्ज करेगा। इस कदम के बाद पुलिस द्वारा जांच शुरू की जाती है जिसमें साक्ष्य जुटाए जाते हैं। इसे  ‘चार्जशीट’ के रूप में जाना जाता है जिसे पुलिस द्वारा दायर किया जाता है। चार्जशीट मूल रूप से एक रिपोर्ट है जो पुलिस द्वारा मजिस्ट्रेट को जांच सफलतापूर्वक होने के बाद दायर की जाती है जो मुखबिर / शिकायतकर्ता, आरोपी और पीड़ित, किसी भी गवाह, वस्तुओं के नाम, अपराध के घटित होने की तिथि, समय और स्थान, जांच अधिकारी का नाम, मेडिकल रिपोर्ट यदि बनाई गई है, एफआईआर संख्या, केस डायरी के सही निष्कर्ष आदि से संबंधित विवरण दर्ज करती है। फिर आरोपी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष ले जाया जाता है जो मौखिक रूप से आरोपियों को किए गए अपराध (अपराधों) के बारे में बताते हैं और उनसे पूछते हैं कि क्या वे दोषी हैं या नहीं। यदि आरोपी व्यक्ति अपराध स्वीकार करता है, तो मजिस्ट्रेट आरोपी के बयान का रिकॉर्ड बनाता है और फिर दोषसिद्धि के लिए आगे बढ़ता है। हालांकि, अगर वे दोषी नहीं मानते हैं तो एक सुनवाई होती है जिसमें न्यायाधीश आरोपी को बरी करने या दोषी ठहराए जाने का फैसला कर सकते है।

आईपीसी की धारा 325 पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. आईपीसी की धारा 325 के तहत किस अपराध को परिभाषित किया गया है?

यह धारा किसी व्यक्ति को स्वेच्छया से घोर उपहति पहुंचाने के अपराध के लिए सजा को निर्दिष्ट करती है।

2. यदि किसी व्यक्ति को धारा 325 के तहत दोषी ठहराया जाता है, तो सजा क्या है?

इस धारा के तहत किए गए अपराध में 7 साल की जेल और जुर्माना हो सकता है।

3. धारा 325 संज्ञेय अपराध है या गैर संज्ञेय अपराध?

इस धारा के तहत किया गया अपराध संज्ञेय अपराध है।

4. क्या धारा 325 जमानती या गैर जमानती अपराध है?

इस धारा के तहत किया गया अपराध जमानती अपराध है।

5. आईपीसी की धारा 325 पर किस अदालत में मुकदमा चलाया जा सकता है?

इस धारा के तहत किए गए अपराध का विचारण किसी भी मजिस्ट्रेट के न्यायालय में किया जा सकता है।

निष्कर्ष

भारतीय दंड संहिता में, घोर उपहति के संबंध में प्रावधान धारा 320 से निर्धारित किया गया है। पहली नज़र में उपहति शब्द घोर उपहति के समानार्थी लग सकता है, हालांकि, हमारे कानूनी प्रणाली द्वारा उनके लिए विशिष्ट अर्थ और दंड हैं। घोर उपहति एक घोर अपराध है और न्यायपालिका द्वारा इसकी जांच की जाती है और इसे सख्ती से दंडित किया जाता है। दोषी पाए जाने पर सात साल तक की सजा हो सकती है और जुर्माना भी भरना पड़ सकता है।

संदर्भ

 

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here