दंडात्मक कानूनों का उदार और कठोर अर्थान्व्यन

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यह लेख सत्यबामा इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के छात्र Michael Shriney द्वारा लिखा गया है। यह लेख महत्वपूर्ण निर्णयों के साथ दंडात्मक कानूनों के उदार (लिबरल) और कठोर  (स्ट्रिक्ट) अर्थान्व्यन (कंस्ट्रक्शन), कानूनों के कठोर और उदार अर्थान्व्यन के बीच भेद पर चर्चा करता है, और इस बारे में भी बताता है की दंड कानूनों की कठोर और उदार व्याख्याओं का अर्थ कैसे लगाया जाता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

क़ानून की व्याख्या करने का कार्य, कानून की अदालतों तक ही सीमित है। न्यायालयों के द्वारा कानूनों को समझने या उनकी व्याख्या करने में, व्यक्तियों का मार्गदर्शन करने के लिए, नियमों का एक बड़ा और जटिल (कॉम्प्लेक्स) सेट विकसित किया गया है। व्याख्या करने वाले ज्यादातर कानून, क़ानूनों की व्याख्या की किताबों में पाए जाते हैं, और अधिनियम का मसौदा (ड्राफ्ट) तैयार करने के दौरान इन व्याख्यात्मक कानूनों को ध्यान में रखने से, अधिनियम बनाने वाले लोगों को मदद मिलती है। उदाहरण के लिए, कनाडा के कानूनों की व्याख्या करते समय, क़ानून की व्याख्या को हर उस कनाडाई अधिनियम का कठोरता से पालन करना चाहिए, जो कि इसके अधिनियम के लिए उपचारात्मक (रेमेडियल) है, साथ ही अधिनियम के उद्देश्य की उपलब्धि सुनिश्चित करने के लिए उचित, व्यापक और उदार अर्थान्व्यन प्राप्त करना चाहिए, जो अधिनियम के मूल उद्देश्य, अर्थ और चरित्र को परिभाषित करता है। किसी अधिनियम का वास्तविक अर्थ प्राप्त करने के लिए उसे प्रभावी बनाना न्यायालय का उत्तरदायित्व है, जबकि नियमों या सिद्धांतों की प्रक्रिया व्याख्या करने के लिए बनाई गई है, जो न्यायालयों तक ही सीमित है।

व्याख्या किसी भी कानून का कानूनी अर्थ खोजने की प्रक्रिया है जिसका अर्थ अर्थान्व्यन से अधिक है। संसदीय अधिनियम के प्रावधान के अर्थ की खोज को व्याख्या कहा जाता है। अर्थान्व्यन का एक प्रमुख कार्य व्याकरणिक अर्थ को निकालना है।

“कठोर अर्थान्व्यन” उस व्याख्या को संदर्भित करता है जिसे कठोरता से किया जाता है, जो आश्वासन देता है कि कानून में प्रत्येक शब्द की व्याख्या हर एक अक्षर के अनुसार की जानी चाहिए और व्याख्या कभी भी क़ानून के अर्थ से  बढ़कर नहीं होनी चाहिए। व्याख्या का ध्यानपूर्वक या संकीर्ण (नैरो) पठन एक कठोर अर्थान्व्यन के रूप में जाना जाता है। इस दृष्टिकोण में, अदालतों को शाब्दिक नियम का पालन करना चाहिए। शब्द “उदार अर्थान्व्यन” उस व्याख्या से संबंधित है जिसे उद्देश्य को सुनिश्चित करने या कानून के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लक्ष्य के साथ स्वतंत्र रूप से लागू किया जाता है। इस अर्थान्व्यन में, अदालतें स्वर्णिम नियम (गोल्डन रूल) और रिष्टि के नियम (मिसचीफ रूल) के बीच चयन करती है।

कानून का उदार अर्थान्व्यन क्या है?

शब्द “उदार अर्थान्व्यन” किसी शब्द या दस्तावेज़ के अर्थ को निर्धारित करते समय उससे संबंधित विभिन्न कारकों की व्याख्या करने के लिए बेंच की क्षमता को संदर्भित करता है। इस व्याख्या के अनुसार, सबसे अधिक संभावना है कि लेखक का मतलब वही था जो पाठक मानता है। व्याख्या, राज्य के उद्देश्य को बढ़ावा देने के लक्ष्य के साथ उदारतापूर्वक की जानी चाहिए। उदार अर्थान्व्यन का उपयोग कल्याणकारी कानूनों, अस्पष्ट शब्दों या अस्पष्ट भाषा, और बाधा डालने वाले कानूनों की स्थिति में किया जाता है।

उदार अर्थान्व्यन, लाभकारी या परोपकारी (बेनेवोलेंट) कानून का भी उल्लेख कर सकता है, जैसे कि नियोक्ता का राज्य बीमा अधिनियम, 1948 और अनुबंध श्रम अधिनियम, 1970 है। यह अर्थान्व्यन स्वर्णिम नियम और रिष्टि के नियम द्वारा शासित होता है, जिसे न्यायाधीशों द्वारा संदर्भित किया जाता है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986, कानून का एक मूल्यवान तरीका है जो उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करता है। इसकी उदारतापूर्वक व्याख्या की जानी चाहिए। किसी भी कानून में कोई भी प्रावधान जो विकास और उन्नति को बढ़ावा देता है, उसे उदारतापूर्वक पढ़ा जाना चाहिए ताकि इस तरह के प्रोत्साहन का वास्तविक उद्देश्य बाधित न हो।

रिष्टि का नियम तब लागू होता है जब कोई क़ानून अस्पष्ट होता है लेकिन काल्पनिक अस्पष्टताओं का आविष्कार नहीं करता है। जब कानून स्पष्ट और सरल हो, तो यह मानदंड (क्राइटेरिया) लागू नहीं होता है। रिष्टि के नियम ने कानूनों की व्याख्या के लिए एक पूरी तरह से अलग दृष्टिकोण स्थापित किया है। इसे व्याख्या के कार्यात्मक (फंक्शनल), उद्देश्यपूर्ण, तार्किक (लॉजिकल) और सामाजिक इंजीनियरिंग मानदंड के रूप में भी जाना जाता है। यह कानूनों की विधायी व्याख्या के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है, लेकिन कानून का इरादा या लक्ष्य हमेशा स्पष्ट या पारदर्शी नहीं होता है, या यह विभिन्न पर्यवेक्षकों (ऑब्जर्वर) के लिए अलग लगता है। इसका संपूर्ण प्रभाव निर्विवाद (अनडिनायबल) रूप से कानूनों की सबसे लचीली व्याख्याओं में से एक है।

विस्काउंट साइमन एल.सी. के अनुसार “स्वर्णिम नियम यह है कि किसी क़ानून में शब्दों को प्रथम दृष्टया (प्राइमा फेसी) उनका सामान्य अर्थ दिया जाना चाहिए।” यह तर्क दिया जाता है कि “जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि जिस कानूनी संदर्भ में शब्दों को नियोजित किया गया है, उसे एक अलग व्याख्या की आवश्यकता है, तब तक शब्दों को उनके प्राकृतिक और सामान्य अर्थ से विचलित (डेविएट) नहीं किया जाना चाहिए”। एक छूट खंड (एक्सेंपशन क्लॉज) के साथ व्याख्या करते समय, शब्दों को एक उदार व्याख्या दी जानी चाहिए, जिसमें भाषा का कोई दुरुपयोग न हो। हालांकि, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि बिना तर्क की व्याख्या के परिणामों से बचा जाना चाहिए। इस प्रकार, जब उदारतापूर्वक व्याख्या की जाती है, तो न्यायाधीश स्वर्णिम नियम और रिष्टि के नियम का उल्लेख करते हैं।

उदार अर्थान्व्यन या लाभकारी नियम की अनुपयुक्तता (इनएप्लीकेबिलिटी)

  1. जब न्यायालय यह निर्धारित करता है कि उदार व्याख्या के नियम को लागू करने के परिणामस्वरूप क़ानून में शब्दों को प्रतिस्थापित करने, जोड़ने या बदलने के द्वारा क़ानून के प्रावधान को फिर से लागू किया जाएगा। तब यह अर्थान्व्यन लागू नहीं होता है।
  2. जब कानून में एक शब्द का केवल एक ही अर्थ हो सकता है, तो इसको लागू करना संभव नहीं है। हालांकि, यदि किसी शब्द के एक से अधिक अर्थ हो सकते हैं, तो उदार अर्थान्व्यन लागू करना संभव है।
  3. यदि क़ानून का प्रावधान स्पष्ट, सरल और संदेह के बिना है, तो उदार अर्थान्व्यन को लागू करना संभव नहीं है।श्याम सुंदर बनाम राम कुमार, (2001), यूनियन ऑफ इंडिया बनाम टाटा केमिकल्स, (2014) में अनुमोदन (अप्रूवल) के साथ संदर्भित।
  4. लाभकारी कानून की उदारतापूर्वक व्याख्या की जा सकती है, लेकिन जब कोई क़ानून एक से अधिक व्याख्या की अनुमति नहीं देता है, तो एक शाब्दिक व्याख्या का उपयोग किया जाना चाहिए- केंद्रीय उत्पाद शुल्क (एक्साइज) के कलेक्टर बनाम सौराष्ट्र केमिकल्स, (2007)
  5. लाभकारी कानून की उदार व्याख्या की धारणा तभी लागू होती है जब दो दृष्टिकोण उपलब्ध हों – मणिपाल उच्च शिक्षा अकादमी बनाम प्रोविजन फंड कमिश्नर 2008

निर्णय

इलाहाबाद बैंक बनाम अखिल भारतीय इलाहाबाद बैंक सेवानिवृत्त कर्मचारी संघ, (2010)

इस मामले में, अपीलकर्ता पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि उपचारात्मक क़ानून, कल्याणकारी, लाभकारी, या सामाजिक न्याय केंद्रित कानून जैसे दांडिक (प्यूनिटिव) क़ानूनों के विपरीत, दंडात्मक क़ानूनों के लिए बेहतर हैं। ऐसी कल्याणकारी कानूनों को उदारतापूर्वक समझा जाना चाहिए। कानून द्वारा अपेक्षित उपायों को प्राप्त करने के लिए उनकी व्याख्या की जानी चाहिए। यह अच्छी तरह से स्थापित है, और दुहराव (रिपीटिशन) की कोई आवश्यकता नहीं है, कि श्रम और कल्याण कानूनों की व्यापक रूप से और उदारतापूर्वक राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के लिए उपयुक्त विचार के साथ व्याख्या की जानी चाहिए। कल्याणकारी, लाभकारी, या सामाजिक न्याय-उन्मुख (ओरिएंटेड) कानूनों को हमेशा उदारतापूर्वक समझा जाना चाहिए। इस मामले में यह निर्णय लिया गया था।

ओम प्रकाश बनाम रिलायंस जनरल इंश्योरेंस, (2017)

इस मामले में, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 एक लाभकारी कानून है जिसे उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए उदारतापूर्वक लागू करने की आवश्यकता है। इस मामले में यह फैसला किया गया था।

सचिव बनाम सुरेश, (1999)

इस मामले में, ठेका श्रम विनियमन अधिनियम, 1970, कानून का एक लाभकारी हिस्सा है जिसे इस्तेमाल किए गए शब्दों के संदर्भ में व्यापक संभव अर्थ दिया जाना चाहिए। न्यायालय समाज के लाभ के लिए बनाए गए हैं, और उदार अर्थान्व्यन के साथ लाभकारी कानून की व्याख्या करने के मामले में प्रस्तुत एक प्रश्न उचित नहीं होगा, और न ही एक संकीर्ण पांडित्यपूर्ण (पेडेंटिक) दृष्टिकोण के साथ इसकी व्याख्या करने के मामले में एक प्रश्न उठाया जाएगा।

मदन सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, (1999)

इस मामले में, न्यायालय का दायित्व एक प्रावधान की उदारतापूर्वक व्याख्या करना है, विशेष रूप से जो मददगार है, ताकि प्रावधान के सीमित पठन, जो कानून के व्यावहारिक रूप से हर लक्ष्य का खंडन करेगा, के बजाय उसको व्यापक अर्थ प्रदान किया जा सके।

राध्याश्याम बनाम मेवालाल, (1929)

इस मामले में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि आबकारी अधिनियम (एक्साइज एक्ट) की व्याख्या कठोरता से की जानी चाहिए और जनहित में उदारतापूर्वक अर्थान्व्यन किया जाना चाहिए।

दंडात्मक कानूनों का कठोर अर्थान्व्यन क्या है?

शब्द “कठोर अर्थान्व्यन” एक ऐसे क़ानून को संदर्भित करता है जिसे कानून में कठोरता से समझा जाता है। प्रत्येक शब्द की व्याख्या अक्षरों द्वारा की जानी चाहिए, और व्याख्या कानून के दायरे से बढ़कर नहीं होनी चाहिए। यह एक कानूनी सिद्धांत है जिसे वैध कानूनों की व्याख्या पर, संकीर्ण तरीके से और कठोर तरीके से लागू किया जा सकता है, जैसे एक संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान। एक कानूनी दस्तावेज के भीतर प्रदान किए गए लिखित रूप में एक पाठ को पढ़ने की बेंच की क्षमता का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। संविधान को उसके मूल अर्थ में कठोरता से समझा जाना चाहिए। 

अर्थान्व्यन के इस रूप का उपयोग कराधान (टैक्सेशन) और आपराधिक कानून में किया जाता है। कठोर अर्थान्व्यन व्याख्या में, अदालतें शाब्दिक नियम का उल्लेख करती हैं। शाब्दिक नियम, जिसे सरल नियम के रूप में भी जाना जाता है, अंग्रेजी अदालतों द्वारा उपयोग किया जाने वाला एक पारंपरिक नियम है। यह कानून की व्याख्या का एक दिशानिर्देश है कि पहली बार में, शब्दों की व्याकरणिक व्याख्या का पालन किया जाना चाहिए। कठोर अर्थान्व्यन का जिक्र करते समय सबसे पहला यह अर्थान्व्यन नियम है जिसका उल्लेख न्यायाधीश करते हैं। आज भी न्यायाधीश इसका उपयोग करते हैं क्योंकि उनके पास कानून बनाने का अधिकार नहीं है। व्याख्या की प्रत्येक प्रणाली में, यह कानूनों की प्राथमिक और पहली व्याख्या है। दूसरे शब्दों में, यह वही है जो कानून कहता है, बजाय इसके कि कानून क्या व्यक्त करना चाहते है। 

शब्द “कठोर अर्थान्व्यन” का अर्थ “एक कानून या लिखित दस्तावेज की एक ध्यानपूर्वक या संकीर्ण रूप से पढ़ना और व्याख्या करना है।” कानूनी अर्थ के शब्दों पर विवाद से जुड़े मामलों में, कभी-कभी एक अस्पष्ट या भ्रमित वाक्यांश के अर्थान्व्यन या व्याख्या को निर्धारित करने के लिए बेंच को बुलाया जाता है। सामान्य कानून परंपरा ने कई कहावतें और दिशानिर्देश बनाए हैं जो अदालतों को कानून या समझौतों जैसे अनुबंधों की व्याख्या करने में मदद करते हैं। कठोर अर्थान्व्यन तब होता है जब अस्पष्ट कानूनी भाषा को एक सटीक और विधिपूर्वक व्याख्या के रूप में माना जाता है और आगे कोई उचित मूल्यांकन या उचित परिणाम पर विचार नहीं किया जाता है। किसी विषय की स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले कानून की व्याख्या करते समय, कठोर अर्थान्व्यन का सुझाव दिया जाता है, लेकिन यह सत्यापित (वेरिफाई) करने के बाद ही, कि विषय की स्वतंत्रता पर रोक लगाने से पहले सभी शर्तों को पूरा किया गया है।

दंडात्मक कानून के संदर्भ में, कठोर अर्थान्व्यन का उपयोग किया जाना चाहिए, जिसका अर्थ है कि दंडात्मक कानूनों को नियोजित भाषा या व्याख्या जो इसके प्रावधानों द्वारा उचित है, के उचित अर्थ से परे, किसी भी अन्य धारणा या उद्देश्य के अनुसार विस्तृत नहीं किया जा सकता है। इन क़ानूनों का अर्थ, अपराध या उन लोगों के अलावा अन्य लोगों, जिन्हें स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है और प्रावधान के शब्दों में प्रदान किया गया है, को शामिल करने के लिए नहीं लगाया जाएगा। उदारवादी नियम को दंड कानूनों के तहत कठोर अर्थान्व्यन के नियम द्वारा सहायता प्रदान की जाती है, जिसमें कहा गया है कि दंडात्मक क़ानून में किसी भी जटिलता को प्रतिवादी के पक्ष में तय किया जाना चाहिए। मैक्सवेल के कठोर अर्थान्व्यन मानदंडों के अनुसार, आपराधिक कानून की गंभीरता को निर्धारित किया जाना चाहिए। दंडात्मक कानून को कठोरता से समझा जाना चाहिए, जैसा कि स्मिथ बनाम वुड (1889) और कमल प्रसाद बनाम किंग-एंपरर (1947) में कहा गया है।

निर्णय 

झारखंड राज्य बनाम अंबे सीमेंट्स, (2005) 

इस मामले में, निर्णय, सर्वोच्च न्यायालय के तीन-न्यायाधीशों के पैनल द्वारा तय किया गया था, और यह निर्धारित किया गया था कि: 

  1. छूट खंड का अर्थ कठोरता से लगाया जाना चाहिए, और छूट अधिसूचना (नोटिफिकेशन) में निर्दिष्ट शर्तों को न्यायालय द्वारा अनदेखा नही किया जा सकता है।
  2. एक अनिवार्य नियम का सावधानीपूर्वक पालन किया जाना चाहिए, लेकिन एक निर्देशिका नियम (डायरेक्टरी रूल) का पर्याप्त पालन किया जा सकता है।
  3. जब कानून एक निश्चित अधिनियम को एक विशिष्ट तरीके से निष्पादित (परफॉर्मड) करने के लिए निर्धारित करता है और कहता है कि उक्त आवश्यकता का पालन करने में विफलता के गंभीर परिणाम होते हैं, तो ऐसी आवश्यकता अनिवार्य है।
  4. यह व्याख्या का मूल सिद्धांत है कि यदि कोई क़ानून निर्देश देता है कि कुछ किया जाना चाहिए, तो उसे निर्दिष्ट तरीके से किया जाना चाहिए न कि किसी अन्य तरीके से। 
  5. जहां कानून आपराधिक प्रकृति का हो, वहां इसे कठोरता से समझा जाना चाहिए और इसका पालन किया जाना चाहिए।

पंजाब राज्य बनाम राम सिंह, (1922)

इस मामले के तथ्य से प्रतीत होता है कि एक आरक्षक (कांस्टेबल) को ड्यूटी के दौरान नशे में धुत होकर सार्वजनिक स्थान पर बंदूक लेकर घूमते पकड़ा गया था। मेडिकल चेकअप के दौरान उसने डॉक्टर से गाली-गलौज की। यह निर्धारित किया गया था कि पुलिसकर्मी अपने शराब पीने के परिणामस्वरूप अपराध करने में सक्षम था। सर्वोच्च न्यायालय ने मैक्सवेल के मानकों के अनुसार कठोर अर्थान्व्यन की व्याख्या की, जो दंडात्मक कानूनों की गंभीरता पर आधारित था, और उसे उसके दुर्व्यवहार के लिए दंडित करना उचित पाया गया था।

बख्तावत सिंह बनाम बलवंत सिंह, (1927)

इस मामले में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना कि यदि किसी कानून की आवश्यकताओं का पालन ना करने के लिए सजा दी गई है, तो इसे कठोरता से माना जाना चाहिए।

दंडात्मक कानूनों के कठोर और उदार अर्थान्व्यन के बीच अंतर

दंडात्मक कानूनों का कठोर अर्थान्व्यन दंडात्मक कानूनों का उदार अर्थान्व्यन
कठोर अर्थान्व्यन कहता है कि कानून में प्रत्येक शब्द की व्याख्या, प्रत्येक अक्षर के अनुसार की जानी चाहिए, और व्याख्या को क़ानून के दायरे से बाहर नहीं जाना चाहिए। उदार अर्थान्व्यन बताता है कि कानून को आगे बढ़ाने या कानून के उद्देश्य को पूरा करने के लिए व्याख्या उदार होनी चाहिए।
2. अदालतें इस अर्थान्व्यन के तहत शाब्दिक नियम का पक्ष लेती हैं। अदालतें इस अर्थान्व्यन के तहत स्वर्णनिम नियम या रिष्टि के नियम का पक्ष लेती हैं।
3. कर और आपराधिक कानूनों का कठोरता से अर्थ लगाया जाता है। नियोक्ता राज्य बीमा अधिनियम और अनुबंध श्रम अधिनियम दोनों को उदारतापूर्वक समझा जाता है।
4. कठोर अर्थान्व्यन कानून का दायरा बढ़ाने, दंडात्मक अधिनियमों को लागू करने के खिलाफ सभी उचित विवादों को हल करने और कानूनों को अक्षम करने से इनकार करता है। उदार अर्थान्व्यन कल्याणकारी कानूनों, अस्पष्ट शब्दों या वाक्यों को लागू करने के खिलाफ किसी भी उचित अनिश्चितता को हल करके और कानूनों को अक्षम करके कानून को विस्तृत करता है।
5. यह उस प्रक्रिया को संदर्भित करता है जिसके माध्यम से विधायी उद्देश्य को व्यक्त करने के लिए कानून को विस्तृत किया जाता है। यह उस प्रक्रिया को संदर्भित करता है जिसके माध्यम से विधायी उद्देश्य को व्यक्त करने के लिए कानून विवश है।
6. इस अर्थान्व्यन का तात्पर्य है कि बेंच का मानना ​​​​है कि प्रावधान के मूल पाठ में किसी भी वर्तमान या भविष्य की कठिनाइयों के सभी उत्तर हैं। यदि कानून अस्पष्ट प्रकृति का है, तो इस व्याख्या का विस्तार किया जा सकता है ताकि दृष्टिकोण और चीजें बदल सकें।
7. केवल एक व्याख्या की आवश्यकता होने पर ही इस कठोर अर्थान्व्यन का उपयोग किया जा सकता है। यह क़ानूनी अर्थान्व्यन तब किया जाता है जब कोई क़ानून दो या अधिक व्याख्याओं की अनुमति नहीं देता है।
8. बिक्री कर के लिए एक कठोर व्याख्या आवश्यक है। पशु क्रूरता की रोकथाम के लिए एक उदार व्याख्या आवश्यक है।
9. कठोर अर्थान्व्यन की व्याख्या, अदालतों द्वारा कठोरता से की जाती है। वे कानून की व्याख्या में गलती नहीं करते हैं, और निर्णय पूरी तरह से प्रवधानों के मूल पाठ पर आधारित है। उदारवादी अर्थान्व्यन की अदालतों द्वारा स्वतंत्र रूप से व्याख्या की जाती है। वे कानून की सटीक व्याख्या से बंधे नहीं हैं और उदार अर्थान्व्यन का उपयोग करके विभिन्न तरीकों से इसकी व्याख्या कर सकते हैं।

 

निर्णय

रावुला सुब्बा राव और अन्य बनाम आयकर आयुक्त, (1956)

इस मामले में, निम्नलिखित प्रश्न के संबंध में कठोर और उदार अर्थान्व्यन के बीच अंतर है: “स्थिति के आधार पर किसी क़ानून को कठोर या उदार व्याख्या क्यों दी जानी चाहिए? एकमात्र संभव सटीक प्रतिक्रिया यह है कि जिस प्रकार के अर्थान्व्यन का उपयोग किया जाता है वह विधायी मंशा को प्रभावित करता है। कभी-कभी, कानून को प्रभावी बनाने के लिए, एक उदार अर्थान्व्यन की आवश्यकता होती है, और कभी-कभी, ऐसा अर्थान्व्यन विधायिका के इरादे को विफल कर देगा। यदि अर्थान्व्यन के नियम का पालन करने की यह सही समझ है, तो एक कठोर या उदार अर्थान्व्यन केवल विधायी अर्थ को व्यक्त करने के लिए किसी क़ानून के दायरे को बढ़ाने या सीमित करने का एक तरीका है। यदि कठोर और उदार अर्थान्व्यन दिए जाने के लिए यह उचित स्थिति है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि विचाराधीन क़ानून दंडात्मक, आपराधिक, उपचारात्मक या सामान्य अधिकार से छूट में था, क्योंकि इस वर्गीकरण के आधार पर भेद अर्थहीन होगा।”

निष्कर्ष

इस प्रकार, विनियमों की, अपने तरीके से व्याख्या करने के लिए दंडात्मक कानूनों की उदार और कठोर व्याख्याएं लागू की जाती हैं। दंडात्मक कानूनों की कठोर व्याख्या का अर्थ उस व्यक्ति के पक्ष में सावधानी से लगाया जाता है जिस पर मुकदमा चलाया जा रहा है। प्रावधान के पाठ में अस्पष्टता की स्थिति में, यह नियम विषय की स्वतंत्रता के लिए एक पूर्वाभास (प्रेडिलेक्शन) का सुझाव देता है। आपराधिक और दंडात्मक कानूनों को कठोरता से समझा जाना चाहिए और इसे इरादे, व्याख्या या निष्पक्ष विचारों से विस्तृत नहीं किया जा सकता है। यदि आपराधिक कानून में एक उदार व्याख्या स्थापित की जाती है, तो यह सार्वजनिक हित के लाभ के लिए होनी चाहिए। दंडात्मक कानूनों का पूर्वव्यापी (रेट्रोस्पेक्टिव) प्रभाव नहीं होना चाहिए क्योंकि यह आरोपी के हितों के लिए हानिकारक है। व्याख्या के शाब्दिक नियम का प्रयोग न्यायालयों द्वारा कठोर व्याख्या में किया जाता है। व्याख्या का स्वर्णिम नियम, या रिष्टि का नियम, अदालतों द्वारा उदार व्याख्या में लागू किया जाता है।

संदर्भ

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