कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 188

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Companies Act 2013

यह लेख जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज की छात्रा Upasana Sarkar ने लिखा है। यह लेख कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 188 का व्यापक विश्लेषण प्रदान करता है। यह लेख संबंधित पक्षों के बीच होने वाले संबंधित पक्ष लेनदेन के बारे में बताता है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash के द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

एक कंपनी, अपना व्यवसाय करते समय, व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए अपने दैनिक जीवन में कई लेन-देन करती है। ये लेन-देन अज्ञात या संबंधित पक्षों के बीच हो सकते हैं। दोनों ही मामलों में, जब किसी व्यावसायिक कारण से लेन-देन होता है, तो कुछ कानूनी बाधाएं लागू हो जाती हैं। कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 188 संबंधित पक्षों के बीच होने वाले लेन-देन से संबंधित है। लेनदेन के लिए पक्षों के बीच पारदर्शिता (ट्रांसपेरेंसी) और जवाबदेही बनाने के लिए इसे पेश किया गया था। यह सार्वजनिक और निजी लिमिटेड दोनों कंपनियों पर लागू होता है। किसी पक्ष द्वारा संबंधित पक्ष लेनदेन में प्रवेश करने का निर्णय लेने से पहले सभी पहलुओं पर विचार करना आवश्यक है।

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 188 को पेश करने के कारण

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 188 को कंपनी की सटीक वित्तीय स्थिति का पता लगाने और लेन-देन होने पर पारदर्शिता के स्तर को बढ़ाने के लिए पेश किया गया था। यह निदेशक मंडल (बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स) को लेन-देन से संबंधित पक्षों की समीक्षा (रिव्यू), अनुमोदन (अप्रूव), व्याख्या और सिफारिश करने के साथ-साथ शेयरधारकों को उनकी स्वीकृति लेने के लिए बड़ी जिम्मेदारी देता है। यह प्रकटीकरण (डिस्क्लोजर), उत्तरदायित्व (अकाउंटेबिलिटी), संचार (कम्युनिकेशन) और उचित निगरानी को भी प्रोत्साहित करता है जब संबंधित पक्षों के बीच कोई लेनदेन होता है। यह बिना किसी निशान के कंपनी के लिए किसी भी प्रकार के अतिरिक्त लाभ के लिए संबंधित पक्ष लेनदेन के नाम पर होने वाले फंड डायवर्जन को भी हतोत्साहित (डिस्करेज) करता है।

‘संबंधित पक्ष’ शब्द का क्या अर्थ है

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सूचीकरण दायित्व और प्रकटीकरण आवश्यकता) विनियम, (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (लिस्टिंग ऑब्लिगेशंस एंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स) रेगुलेशंस, 2015 की धारा 2(1)(zb), ‘संबंधित पक्ष’ से संबंधित है, जिसका अर्थ है वे संबंध जिन्हे कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2 की उप-धारा (76) के तहत परिभाषित किया गया हैं।

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(76) के अनुसार, ‘संबंधित पक्ष’ शब्द का अर्थ है-

  • एक व्यक्ति जो निदेशक या उसका रिश्तेदार है;
  • एक व्यक्ति जो प्रमुख प्रबंधकीय कर्मी (की मैनेजेरियल पर्सनल) या उसका रिश्तेदार है;
  • एक फर्म जहां एक निदेशक, प्रबंधक (मैनेजर), या उसके रिश्तेदार भागीदारों के रूप में एक दूसरे से संबंधित हैं;
  • एक निजी कंपनी जहां एक निदेशक, प्रबंधक, या उसके रिश्तेदार सदस्य या निदेशक माने जाते हैं;
  • एक सार्वजनिक कंपनी जहां एक निदेशक या प्रबंधक को एक निदेशक माना जाता है और वह अपने रिश्तेदारों के साथ दो प्रतिशत से अधिक की चुकता शेयर पूंजी (पेड अप शेयर कैपिटल) रखता है;
  • एक निगमित निकाय जिसके निदेशक मंडल, प्रबंध निदेशक, या प्रबंधक किसी निदेशक या प्रबंधक की सलाह, निर्देश या निर्देशों के अनुपालन में कार्य करने के अभ्यस्त (हैबिचुअल) हैं;
  • कोई भी व्यक्ति जिसकी सलाह, निर्देश, या निर्देशों का पालन, किसी निदेशक या प्रबंधक द्वारा कोई कार्य करते समय आदतन रूप से किया जाता है;
  • एक कंपनी या एक निकाय कॉर्पोरेट-
    • जिसे उस कंपनी की होल्डिंग, सहायक कंपनी या सहयोगी कहा जाता है, या
    • जिसे एक होल्डिंग कंपनी की सहायक कंपनी माना जाता है, जिसकी वह सहायक कंपनी भी है, या
    • जिसे एक निवेश कंपनी या कंपनी के उद्यमी (वेंचर) के रूप में जाना जाता है;
  • एक व्यक्ति जो कंपनी का निदेशक है, होल्डिंग कंपनी के स्वतंत्र निदेशक या प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों या कंपनी के संबंध में उसके रिश्तेदारों को छोड़कर;
  • ऐसे अन्य व्यक्ति जो निर्धारित किए जा सकते हैं।

कंपनी अधिनियम के तहत ‘रिश्तेदारों’ की परिभाषा

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(77) शब्द ‘रिश्तेदार’ को ऐसे किसी भी व्यक्ति के रूप में परिभाषित करती है जो किसी अन्य से संबंधित है, यदि वे हिंदू अविभाजित परिवार (एचयूएफ) के सदस्य हैं, या यदि वे पति और पत्नी हैं, या यदि कोई व्यक्ति कंपनी (परिभाषा बायोरों के विनिर्देश) नियम, 2014 के नियम 4 में निर्धारित तरीके से एक दूसरे से संबंधित है। एक व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति का रिश्तेदार माना जाता है, यदि वह अन्य व्यक्ति निम्नलिखित तरीकों से संबंधित है या नहीं, अर्थात्-

  • पिता या सौतेले पिता।
  • माँ या सौतेली माँ।
  • बेटा या सौतेला बेटा।
  • बेटे की पत्नी।
  • बेटी।
  • बेटी का पति।
  • भाई या सौतेला भाई।
  • बहन या सौतेली बहन।

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 188(1) के तहत संबंधित पक्ष के साथ ‘लेनदेन’ शब्द का अर्थ

एक ‘लेन-देन’ जो कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 188 (1) द्वारा शामिल किया गया है, कंपनी (बोर्ड की बैठकें और इसकी शक्तियाँ) नियम, 2014 के नियम 15 के साथ पढ़ा जाता है, जिसका अर्थ है कि वे लेनदेन जो निम्नलिखित से जुड़े हैं-

  • किसी विशेष सामान या सामग्री की खरीद, बिक्री या आपूर्ति- जहां लेनदेन का मूल्य वार्षिक कारोबार के 10% या 100 करोड़ रुपये से अधिक है, सीमा वह राशि होगी, जो भी कम हो।
  • किसी भी प्रकार की संपत्ति खरीदना या बेचना या उसका निपटान करना- जहां लेनदेन का मूल्य निवल मूल्य (नेट वर्थ) के 10% या 100 करोड़ रुपये से अधिक है, सीमा वह राशि होगी, जो भी कम हो।
  • किसी भी प्रकार की संपत्ति जो पट्टे पर दी जा सकती है- जहां लेन-देन का मूल्य निवल मूल्य के 10% से अधिक है, या वार्षिक कारोबार का 10% या 100 करोड़ रुपये है, सीमा वह राशि होगी, जो भी कम हो।
  • किसी भी प्रकार की सेवा प्राप्त करना या प्रदान करना- जहां लेन-देन का मूल्य वार्षिक कारोबार के 10% या 50 करोड़ रुपये से अधिक है, सीमा वह राशि होगी, जो भी कम हो।
  • एजेंट के माध्यम से किसी भी सामान, सामग्री, संपत्ति या सेवाओं की खरीद या बिक्री।
  • किसी कंपनी, उसके सहयोगी या सहायक कंपनी में किसी भी पंजीकृत कार्यालय या लाभ के स्थान पर संबंधित पक्ष की नियुक्ति- इस धारा के तहत पारिश्रमिक दो लाख पचास हजार रुपये से अधिक होगा।
  • किसी फर्म या कंपनी के किसी भी प्रकार की प्रतिभूतियों (सिक्योरिटीज) या डेरिवेटिव की सदस्यता की हामीदारी (अंडरराइटिंग)- लेनदेन मूल्य कंपनी के निवल मूल्य के 1% से अधिक है।

सेबी (सूचीकरण दायित्व और प्रकटीकरण आवश्यकता) विनियम, 2015 के तहत ‘संबंधित पक्ष लेनदेन’

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सूचीकरण दायित्व और प्रकटीकरण आवश्यकता) विनियम, 2015 के विनियम 2(1)(zc) के अनुसार, ‘संबंधित पक्ष लेन-देन’ का अर्थ किसी भी प्रकार के संसाधनों, सेवाओं या दायित्वों का हस्तांतरण (ट्रांसफर) है जो किसी संस्थाएं जो सूचीबद्ध हैं और एक संबंधित पक्ष के बीच होता है, भले ही कीमत वसूल की गई हो या संबंधित पक्ष के साथ लेनदेन किया गया हो। इसमें एक एकल लेनदेन या लेनदेन का एक समूह शामिल माना जाएगा जिसके लिए एक अनुबंध किया गया है। यह माना जा सकता है कि यह धारा लागू नहीं होगी जहां यह एक यूनिट म्यूचुअल फंड द्वारा जारी किए जाते हैं जो एक स्वीकृत स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हैं।

संबंधित पक्ष लेनदेन के लिए अनुमोदन

संबंधित पक्षों के बीच लेन-देन के लिए कुछ स्वीकृतियों की आवश्यकता होती है। धारा 188 के तहत किसी भी तरह का लेन-देन कंपनी के सदस्यों, यानी निदेशकों, शेयरधारकों और लेखा परीक्षा (ऑडिट) समिति द्वारा पूर्व अनुसमर्थन (रेटिफिकेशन) के बिना नहीं किया जा सकता है, जो कंपनी (बोर्ड की बैठक और इसकी शक्तियां) नियम, 2014 के नियम 15 में प्रदान किए गए प्रस्ताव को पारित करके किया जाता है। 

निदेशक मंडल की स्वीकृति

  • यदि कोई कंपनी संबंधित पक्ष लेनदेन में प्रवेश करने का निर्णय लेती है, तो निदेशक मंडल के पूर्व अनुमोदन की आवश्यकता होती है।
  • हालांकि निदेशक मंडल के पूर्व अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है जब कोई कंपनी व्यापार के सामान्य क्रम में आर्म्स लेंथ पर लेनदेन करती है।

शेयरधारकों की स्वीकृति

  • संबंधित पक्ष लेन-देन के मामले में शेयरधारक की मंजूरी आवश्यक है जो व्यवसाय के सामान्य क्रम में नहीं होती है या आर्म्स लेंथ शुल्क पर नहीं होती है और लेनदेन की राशि भौतिकता (फिजिकेलिटी) सीमा से अधिक होती है। प्रस्ताव पारित करने के बाद ही स्वीकृति दी जाती है।
  • सूचीबद्ध कंपनियों के मामले में भी शेयरधारकों के अनुमोदन की आवश्यकता होती है यदि संबंधित पक्ष लेनदेन सूचीकरण नियमों के तहत भौतिकता सीमा से अधिक हो।

लेखापरीक्षा समिति की स्वीकृति

  • भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सूचीकरण दायित्व और प्रकटीकरण आवश्यकता) विनियम, 2015 के विनियम 18 के अनुसार, सूचीबुद्ध सभी कंपनियों को एक लेखापरीक्षा समिति बनानी होगी, जिसमें निदेशक के रूप में कम से कम तीन सदस्य होंगे।
  • लेखापरीक्षा समिति में कम से कम दो-तिहाई स्वतंत्र सदस्य होंगे।
  • लेखा परीक्षा समिति के सदस्य वित्तीय रूप से साक्षर होंगे, जिसका अर्थ है कि वह बुनियादी वित्तीय विवरणों को पढ़ने और समझने में सक्षम होना चाहिए, यानी बैलेंस शीट, लाभ और हानि खाता और आदि और उनमें से कम से कम एक को संबंधित वित्तीय प्रबंधन या खातों के क्षेत्र का ज्ञान या विशेषज्ञता होनी चाहिए। 
  • निम्नलिखित मामलों में सूचीबद्ध कंपनियों के लिए लेखापरीक्षा समिति की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है-
    • जहां लेन-देन से संबंधित पक्ष एक सूचीबद्ध कंपनी की सहायक कंपनी है, लेकिन सूचीबद्ध कंपनी स्वयं इस तरह के लेन-देन की पक्ष नहीं है, और अंतिम लेखापरीक्षित वित्तीय विवरण के अनुसार, लेन-देन का मूल्य वार्षिक समेकित कारोबार के दस प्रतिशत से अधिक है।
    • जहां लेन-देन से संबंधित पक्ष एक सूचीबद्ध कंपनी की सहायक कंपनी है, लेकिन स्वयं सूचीबद्ध कंपनी नहीं है और इस तरह के लेनदेन का मूल्य, चाहे व्यक्तिगत रूप से दर्ज किया गया हो या एक वित्तीय वर्ष के दौरान एक साथ लिया गया हो, वार्षिक एकल (स्टैंडअलोन) वार्षिक कारोबार के दस प्रतिशत से अधिक हो, 1 अप्रैल, 2013 से लागू होगा।

सर्वग्राही (ओमनिबस) अनुमोदन

दोहराए गए लेन-देन के मामले में लेखा परीक्षा समिति एक समेकित (कंसोलिडेटेड) या स्थायी अनुमोदन देती है जिसे सर्वग्राही अनुमोदन कहा जाता है।

  1. बोर्ड की स्वीकृति के साथ, लेखापरीक्षा समिति सर्वग्राही अनुमोदन के लिए मानदंड तैयार करती है जिसमें निम्नलिखित शामिल होगा-
  • एक वर्ष में अधिकतम सकल (ग्रॉस) लेनदेन मूल्य।
  • लेनदेन के लिए अधिकतम मूल्य।
  • लेन-देन का तरीका और लेन-देन के लिए किए जाने वाले प्रकटीकरण की सीमा।
  • लेन-देन की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए।
  • लेन-देन जो सर्वग्राही अनुमोदन के अंतर्गत नहीं आता है।

2. मानदंड शुरू करते समय, निम्नलिखित का उल्लेख किया जाना चाहिए-

  • लेन-देन की पुनरावृत्ति (रिक्योरेंस) जो अतीत में की गई है या भविष्य में की जाएगी।
  • सर्वग्राही अनुमोदन की आवश्यकता के कारणों पर विचार किया जाना चाहिए।

3. सर्वग्राही अनुमोदन केवल एक वित्तीय वर्ष के लिए मान्य हैं।

4. उपक्रमों को बेचने या निपटाने के लिए सर्वग्राही अनुमोदन नहीं दिया जा सकता है।

स्वीकृति से छूट

  • संबंधित पक्ष के लेन-देन के लिए निदेशक मंडल के अनुमोदन और शेयरधारकों के पूर्व अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है यदि लेन-देन व्यवसाय के सामान्य क्रम में किया जाता है।
  • संबंधित पक्ष लेनदेन को निदेशक मंडल के अनुमोदन या शेयरधारकों के पूर्व अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है यदि वे आर्म्स लेंथ के आधार पर किए जाते हैं।
  • संबंधित पक्ष लेनदेन को शेयरधारकों और लेखा परीक्षा समिति के पूर्व अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है यदि लेनदेन सूचीबद्ध कंपनियों द्वारा किया जाता है या किसी भी प्रकार का लेनदेन इसकी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी के बीच होता है, जिनके खातों को समेकित और बनाए रखा जाता है ताकि उन्हें आम बैठक में अनुमोदित किया जा सके। 
  • संबंधित पक्ष के लेन-देन निजी कंपनियों या आईएफएससी पंजीकृत (रजिस्टर्ड) सार्वजनिक कंपनियों पर लागू नहीं होते हैं।
  • यदि नब्बे प्रतिशत से अधिक सदस्य संबंधित पक्षों या प्रमोटरों के रिश्तेदार हैं तो संबंधित पक्ष लेनदेन नहीं किए जाते हैं।
  • उन मामलों में अनुवाद की अनुमति नहीं है जहां संबंधित पक्ष सरकारी कंपनियां हैं या प्रभारी मंत्रालय ने सरकारी कंपनियों को अपनी स्वीकृति दी है।

‘व्यवसाय का सामान्य क्रम’ अभिव्यक्ति का अर्थ 

कंपनी अधिनियम, 2013, या किसी भी नियम के तहत अभिव्यक्ति ‘व्यापार का सामान्य क्रम’ सटीक रूप से परिभाषित नहीं है। यह आम तौर पर उन व्यावसायिक प्रथाओं, रीति-रिवाजों और लेन-देन को परिभाषित करता है जो बिना किसी छिपे पहलुओं के दैनिक आधार पर होते हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आईसीएआई) ने कुछ ऐसे लेन-देन को बाहर कर दिया है जो “व्यापार के सामान्य क्रम” की अभिव्यक्ति के अंतर्गत नहीं आएंगे। वे इस प्रकार हैं-

  • जटिल इकाई लेनदेन, जिसमें कॉर्पोरेट पुनर्गठन (रिस्ट्रक्चरिंग) या अधिग्रहण (एक्विजिशन) शामिल हैं।
  • विदेशी कंपनियों के बीच होने वाले लेन-देन जहां कॉर्पोरेट कानून पिछड़ रहे हैं।
  • प्रतिफल के अभाव में, व्यावसायिक परिसर को पट्टे (लीज) पर देना या किसी कंपनी द्वारा दूसरी कंपनी को सेवा की सुविधा देना।
  • बहुत भारी छूट या वापसी पर बिक्री लेनदेन।
  • लेन-देन जिसमें एक परिपत्र (सर्कुलर) या पुनर्खरीद की व्यवस्था है।
  • अनुबंध लेनदेन की शर्तें जो समाप्ति से पहले बदली जा सकती हैं।

‘आर्म्स लेंथ लेनदेन’ अभिव्यक्ति का अर्थ

अभिव्यक्ति ‘आर्म्स लेंथ लेन-देन’ का अर्थ किसी भी लेन-देन से है जहां दो या दो से अधिक असंबद्ध पक्ष व्यापार करने और स्वतंत्र रूप से और अपने स्वयं के हित में कार्य करने के लिए सहमत होते हैं ताकि हितों का कोई टकराव न हो। उदाहरण के लिए, यदि कोई खरीदार किसी अजनबी से घर खरीदता है, तो प्रत्येक व्यक्ति वह पेशकश करता है जो वह चाहता है। लेकिन वे किसी बंधन से बंधे नहीं हैं, और वे एक दूसरे से संबंधित नहीं हैं। वे एक ऐसा सौदा कर सकते हैं जो एक-दूसरे से संबंधित हुए बिना समान रूप से उनकी सेवा करता हो।

धारा 188 को लागू नहीं किया जा सकता है यदि लेन-देन व्यापार के सामान्य क्रम में किया जाता है और आर्म्स लेंथ पर होता है। यदि लेन-देन आर्म्स लेंथ पर होता है, तो किसी संकल्प की आवश्यकता नहीं होती है। लेन-देन आर्म्स लेंथ पर है या नहीं, यह स्थापित करने का बोझ कंपनी पर है। कीमत और आपूर्ति की शर्तों के संबंध में उचित और उपयुक्त जानकारी और दस्तावेज़ीकरण को ठीक से स्थापित करना और बनाए रखना कंपनी की ज़िम्मेदारी है।

प्रकटीकरण जो संबंधित पक्ष के लेन-देन के लिए आवश्यक हैं

प्रस्ताव पारित करके बोर्ड के अनुमोदन से पक्षों के बीच किए जाने वाले प्रस्तावित लेनदेन निम्नानुसार होंगे:

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 188(2) के तहत संबंधित पक्ष लेनदेन के लिए बोर्ड की रिपोर्ट में प्रकटीकरण

  • किसी कंपनी द्वारा संबंधित पक्ष लेनदेन के लिए किए गए अनुबंधों का उल्लेख शेयरधारकों को बोर्ड की रिपोर्ट में किया जाएगा, साथ ही ऐसे समझौतों या अनुबंधों में प्रवेश करने का कारण भी बताया जाएगा।
  • वे संबंधित पक्ष लेन-देन जो कीमत पर आर्म्स लेंथ पर नहीं हैं और सामग्री संबंधित पक्ष लेनदेन जो आर्म्स लेंथ पर हैं, उनके विवरणों की सूचना दी जानी चाहिए। इसकी सूचना एओसी-2 में दी जाएगी।

संबंधित पक्ष लेनदेन के लिए अनुबंध या व्यवस्था के रजिस्टर में प्रकटीकरण किया जाना चाहिए

  • संबंधित पक्षों के बीच होने वाले लेन-देन का विवरण दर्ज करना सभी कंपनियों की जिम्मेदारी है।
  • इसे फॉर्म एमबीपी-4 पर पंजीकृत होना चाहिए।

संबंधित पक्ष के लेन-देन के लिए सूचीबद्ध कंपनियों के लिए स्टॉक एक्सचेंज में प्रकटीकरण

  • एक सूचीबद्ध कंपनी के लिए स्टॉक एक्सचेंजों और कंपनी की वेबसाइट पर निर्धारित प्रारूप में समेकित आधार पर संबंधित पक्ष लेनदेन की जानकारी का खुलासा करना आवश्यक है।
  • पहले, यह तीस दिनों के भीतर और 1 अप्रैल, 2022 से, पंद्रह दिनों के भीतर और 1 अप्रैल, 2013 से, एक साथ छह महीने के लिए एकल और समेकित वित्तीय विवरणों के प्रकाशन की तारीख से वित्तीय विवरण जारी करने की आवश्यकता थी।

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 188(3) के तहत सूचीबद्ध कंपनियों के लिए वार्षिक बैठक में वार्षिक रिपोर्ट में किए जाने वाले प्रकटीकरण

  • संबंधित पक्ष, निदेशक, या अन्य प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों का नाम जो संबंधित पक्ष लेनदेन में शामिल हैं।
  • संबंध का प्रकार और प्रकृति, भौतिक शर्तें, लेन-देन का मूल्य, और व्यवस्था या अनुबंध के विवरण।
  • कोई विवरण या प्रासंगिक जानकारी जो सदस्यों के लिए बैठक में एक संकल्प पारित करके निर्णय लेने के लिए महत्वपूर्ण हो।
  • वार्षिक रिपोर्ट के कॉरपोरेट गवर्नेंस खंड में इसका खुलासा करना आवश्यक है।

बोर्ड की बैठक में किए जाने वाले प्रकटीकरण

कंपनी (बोर्ड की बैठक और उसकी शक्तियां) नियम, 2014 के नियम 15 के अनुसार, बोर्ड की बैठक में एजेंडे के लिए पारित किए जाने वाले प्रस्ताव में निम्नलिखित विवरण शामिल होंगे:

  • संबंधित पक्ष का नाम और एक दूसरे के साथ उनके संबंध की प्रकृति।
  • प्रकृति, विवरण, साथ ही अनुबंध की अवधि।
  • व्यवस्था या अनुबंध की भौतिक शर्तें इसके मूल्य के साथ।
  • क्या व्यवस्था या अनुबंध के लिए कोई अग्रिम भुगतान किया गया है या प्राप्त किया गया है।
  • मूल्य निर्धारण और अन्य वाणिज्यिक शर्तों का निर्धारण करने का तरीका।
  • कोई विवरण या प्रासंगिक जानकारी जो सदस्यों के लिए बैठक में एक संकल्प पारित करके निर्णय लेने के लिए महत्वपूर्ण हो।

प्रकटीकरण लेखापरीक्षा समिति को किया जाना आवश्यक है

  • संबंधित पक्ष के लेन-देन के लिए किसी प्रकार का प्रकटीकरण करना आवश्यक नहीं है।
  • लेकिन कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 177(6) में कहा गया है कि लेखापरीक्षा समिति के पास कंपनी के रिकॉर्ड में मौजूद सभी विवरणों तक पूरी पहुंच होगी। उचित और निष्पक्ष निर्णय लेने को सुनिश्चित करने के लिए वे बाहरी स्रोतों से पेशेवर सलाह भी प्राप्त कर सकते हैं।

प्रकटीकरण को इच्छुक निदेशकों द्वारा किए जाने की आवश्यकता है

कोई भी निदेशक, जो संबंधित पक्ष के लेन-देन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रुचि रखता है, उस अनुबंध में जो पहले से ही दर्ज किया गया है या किया जाएगा, बोर्ड की बैठक में सौदे की प्रकृति का खुलासा करना चाहिए जहां इस तरह की व्यवस्था या अनुबंध पर चर्चा की जाती है।

बिंदु जो संबंधित पक्ष के लेन-देन के लिए वार्षिक कार्रवाइयों से संबंधित हैं

  • निदेशकों या प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों द्वारा उनकी नियुक्ति पर बोर्ड की बैठक में किए गए किसी भी परिवर्तन के संबंध में रुचि का प्रकटीकरण प्राप्त करने के लिए।
  • सूचीबद्ध कंपनियों की सहायक कंपनियों से संबंधित पक्षों की सूची प्राप्त करना।
  • संबंधित पक्ष के लेन-देन पर एक नीति तैयार करना सूचीबद्ध कंपनियों की जिम्मेदारी है जिसमें संबंधित पक्ष के लेन-देन की पहचान, समीक्षा और अनुमोदन की प्रक्रिया शामिल होगी।
  • संबंधित पक्ष के लेन-देन पर नीति की निगरानी की जानी चाहिए और इसे नियमित रूप से अद्यतन (अपडेट) किया जाना चाहिए।
  • संबंधित पक्ष के लेन-देन पर नीति, कंपनी की वेबसाइट पर प्रकट की जानी चाहिए।

शुन्यकरणीय (वॉयडेबल) अनुबंध

  1. जब कोई निदेशक या कोई अन्य कर्मचारी बोर्ड की मंजूरी के बिना या सामान्य बैठक में एक प्रस्ताव पारित करके एक व्यवस्था या अनुबंध में प्रवेश करता है, और बोर्ड या शेयरधारकों ने भी बैठक की तारीख से तीन महीने के भीतर ऐसी व्यवस्था या अनुबंध की पुष्टि नहीं की है, तो यह बोर्ड या शेयरधारकों के विकल्प पर शून्य हो सकता है जैसा भी मामला हो।
  2. जब व्यवस्था या अनुबंध किसी ऐसे पक्ष के साथ होता है जो किसी निदेशक से संबंधित होता है या किसी अन्य निदेशक द्वारा अधिकृत होता है, तो यह उसकी ज़िम्मेदारी है कि वह कंपनी को होने वाले किसी भी नुकसान की भरपाई करे।
  3. कंपनी के पास एक निदेशक या किसी अन्य कर्मचारी के खिलाफ कार्यवाही करने की विवेकाधीन शक्ति है जिसने इस धारा के प्रावधानों के विपरीत एक व्यवस्था या अनुबंध किया है। अगर किसी व्यवस्था या अनुबंध के कारण कंपनी को कोई नुकसान होता है, तो उस व्यक्ति से इसकी भरपाई की जा सकती है।

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 188(5) के तहत गैर-अनुपालन के लिए दंड

यदि किसी कंपनी का निदेशक या कर्मचारी इस धारा के प्रावधानों के विपरीत या उल्लंघन करने वाला अनुबंध करता है, तो वह निम्नलिखित दंडों का भागी होगा-

  • सूचीबद्ध कंपनी के मामले में, वह पच्चीस लाख रुपये के जुर्माने से दंडनीय होगा; और
  • किसी अन्य कंपनी के मामले में उसे पांच लाख रुपए के जुर्माने से दंडित किया जाएगा।

यह धारा 21 दिसंबर, 2020 को लागू हुआ था।

न्यायिक घोषणाएं

  1. सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड बनाम आर.टी. एग्रो प्राइवेट लिमिटेड (2022) के मामले में, आर.टी. एक्सपोर्ट लिमिटेड ने एक नीलकंठ रियल्टर्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ 40,000 वर्ग फुट आवासीय स्थान खरीदने के लिए एक लेनदेन में प्रवेश करने का सुझाव दिया। इस प्रस्ताव को एक संबंधित पक्ष लेनदेन माना गया था, और इसलिए इसे कंपनी के शेयरधारकों के अनुमोदन की आवश्यकता थी। आर.टी. एक्सपोर्ट लिमिटेड ने एक विशेष प्रस्ताव को मंजूरी दी, लेकिन संबंधित पक्षों ने औपचारिक (फॉर्मल) रूप से धारा 188 के तहत उस विशेष प्रस्ताव पर मतदान करने से मना कर दिया। उसके बाद, प्रस्ताव को निरस्त करने के लिए एक असाधारण आम बैठक हुई जिसमें संबंधित पक्षों ने भी मतदान किया। अपीलकर्ता सेबी ने एक शिकायत दर्ज की और एक नोटिस जारी किया जिसमें तर्क दिया गया कि भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सूचीकरण दायित्व और प्रकटीकरण आवश्यकताएं) विनियम, 2015 के विनियम 23 का उल्लंघन किया गया था। न्यायनिर्णयन (एडज्यूडिकेटिंग) अधिकारी ने विनियम 23 का उल्लंघन करने के लिए प्रतिवादियों को पैंतीस लाख रुपये का जुर्माना लगाया। लेकिन अपीलीय न्यायाधिकरण ने इस आदेश को मंजूरी नहीं दी और प्रतिवादी को उस आदेश के खिलाफ अपील दायर करने की अनुमति दी। यह माना गया कि, इस अधिनियम की धारा 188 के अनुसार, पक्षों ने विशेष प्रस्ताव पर वोट देने से इनकार करके कोई गलती नहीं की है।
  2. लोक अभियोजक (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) बनाम टी. पी. खेतान (1957) के मामले में, धारा 188 के तहत ‘हित’ शब्द के अर्थ की व्याख्या व्यक्तिगत हित के रूप में की गई थी। अर्थ केवल वित्तीय हित तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वे हित भी शामिल हो सकते हैं जो एक प्रत्ययी (फिडुशियरी) या व्यक्तिगत संबंध से उत्पन्न होते हैं। संबंधित पक्ष का हित प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हो सकता है।
  3. नीडल इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम नीडल इंडस्ट्रीज न्यूए (इंडिया) होल्डिंग लिमिटेड (1982) के मामले में, यह सवाल उठाया गया था कि क्या संबंधित पक्षों के साथ सभी लेनदेन की जांच और इस अधिनियम की धारा 188 के अनुपालन की आवश्यकता है। धारा 188 की उप-धारा (1) का तीसरा प्रावधान इस प्रश्न का उत्तर देता है, क्योंकि यह एक छूट खंड है। यह किसी भी लेन-देन से छूट देता है जो इकाई द्वारा व्यापार के सामान्य क्रम में उन लेनदेन के अलावा दर्ज किया जाता है जो आर्म्स लेंथ के आधार पर नहीं होते हैं।
  4. इंडसइंड बैंक बनाम अतिरिक्त आयकर आयुक्त (एडिशनल कमिश्नर) (2012) के मामले में, ‘आर्म्स लेंथ लेन-देन’ का अर्थ उसके रूप में परिभाषित किया गया था, जिसके लिए एक इच्छुक और जानकार खरीदार और एक इच्छुक और जानकार विक्रेता के बीच संपत्ति का आदान-प्रदान किया जा सकता है।

निष्कर्ष

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 188 में ‘संबंधित पक्ष लेनदेन’ की अवधारणा पेश की गई थी, जो हमें व्यापार और वाणिज्यिक लेनदेन के लिए संबंधित पक्ष के संबंध को समझने में मदद करती है। सभी कंपनियों को, अपने दैनिक मामलों में, अपने कारोबार को चलाने के लिए लेन-देन करना पड़ता है। कोई भी लेन-देन जो पक्षों के बीच होता है जो या तो रिश्तेदार या पक्ष हैं जो एक दूसरे के साथ निकटता से जुड़े हुए हैं, उन्हें आम तौर पर “संबंधित पक्ष लेनदेन” कहा जाता है। जब इस तरह के लेन-देन होते हैं, तो वे कभी-कभी विवाद या अन्य अवैध स्थितियां पैदा कर सकते हैं जो इसकी वित्तीय स्थिति पर प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए, हितधारकों के हितों की रक्षा करने और व्यावसायिक मामलों में जवाबदेही और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए, विधायिका ने पुराने कंपनी अधिनियम में संशोधन किया और इस धारा को नए अधिनियम में सम्मिलित किया। यह धारा संबंधित पक्ष लेनदेन का खुलासा करके कंपनी के वित्त पर बेहतर नियंत्रण रखने में मदद करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

संबंधित पक्ष के लेन-देन के प्रकटीकरण की आवश्यकता क्यों है?

संबंधित पक्ष के लेन-देन का प्रकटीकरण निम्नलिखित कारणों से आवश्यक है-

  • ताकि संबंधित पक्ष के संबंध, रिपोर्टिंग कंपनी और संबंधित पक्ष के बीच लेन-देन को प्रभावित न करें।
  • ताकि असंबंधित पक्ष संबंधित पक्ष के लेन-देन से प्रभावित न हो।
  • बेहतर कॉर्पोरेट प्रशासन के लिए।
  • ताकि सही जानकारी होने पर हितधारक उचित निर्णय ले सकें।
  • कंपनी की सही और निष्पक्ष स्थिति और प्रदर्शन का निर्धारण करने के लिए।

एक रजिस्टर को बनाए रखने की आवश्यकता कब नहीं होती है?

एक रजिस्टर को बनाए रखने की आवश्यकता नहीं है, जब-

  • किसी विशेष वर्ष में खरीदे या बेचे गए सामान का मूल्य पांच लाख रुपये से अधिक नहीं है।
  • बैंकिंग कंपनी जो व्यवसाय के सामान्य क्रम में बिल जमा करती है।
  • कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के तहत लेनदेन एक लाख रुपये से अधिक नहीं है।

पिछले अनुबंधों के लिए धारा 188 के तहत नए अनुमोदन की क्या आवश्यकताएं हैं?

कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 297 के अनुसार कंपनियों द्वारा किए गए अनुबंध, जो कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 188 के प्रारंभ होने से पहले ही लागू हो गए हैं, को इस धारा के तहत नए अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होगी जब तक कि अनुबंधों की मूल शर्तें समाप्त हो जाती हैं।

क्या 1 अप्रैल, 2014 से पहले संबंधित पक्ष लेन देन’ के तहत किए गए किसी भी अनुबंध को कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है?

1 अप्रैल, 2014 से पहले संबंधित पक्षों द्वारा ‘संबंधित पक्ष लेनदेन’ के तहत किए गए किसी भी अनुबंध को कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। यह पिछले कंपनी अधिनियम के प्रावधानों द्वारा शासित होगा। 2013 का कंपनी अधिनियम उस तिथि से पहले किए गए किसी भी संबंधित पक्ष लेनदेन पर लागू नहीं होगा।

संदर्भ

 

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