कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 179

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Companies Act 2013

यह लेख स्कूल ऑफ लॉ, क्राइस्ट (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी), बैंगलोर से बी.ए एल.एल.बी. (ऑनर्स) कर रही छात्रा Subhadeepa Sen के द्वारा लिखा गया है। इस लेख का उद्देश्य कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 179 के तहत प्रदान की गई निदेशक मंडल (बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स) की शक्तियों की विस्तृत समझ प्रदान करना है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 179 कंपनी के निदेशक मंडल की शक्तियों का वर्णन करती है। निदेशक मंडल, या मंडल (बी.ओ.डी.), जैसा कि उन्हें आमतौर पर संदर्भित किया जाता है, कंपनी की सबसे महत्वपूर्ण इकाइयों में से एक है। वे कंपनी के समग्र प्रबंधन और शासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 149(1) एक कंपनी को न्यूनतम तीन निदेशकों और अधिकतम पंद्रह निदेशकों के लिए बाध्य करती है। बी.ओ.डी. की प्राथमिक जिम्मेदारी रणनीतिक दिशा और मार्गदर्शन प्रदान करना है और यह सुनिश्चित करना है कि संगठन का प्रबंधन, हितधारकों के सर्वोत्तम हितों को ध्यान में रखते हुए किया जाए। मंडल कंपनी के प्रदर्शन की निगरानी भी करता है और साथ साथ यह भी सुनिश्चित करता है कि कंपनी सभी प्रासंगिक वैधानिक आवश्यकताओं के अनुपालन (कंप्लायंस) में काम कर रही है। प्रमुख निर्णय जैसे विलय (मर्जर), अधिग्रहण (एक्विजिशन), निवेश, पूंजी की संरचना (कैपिटल स्ट्रक्चर) में परिवर्तन आदि जैसे कार्य निदेशक मंडल के हाथों में ही होते हैं। 

यह लेख एक कंपनी के निदेशकों को प्रदान की गई विभिन्न शक्तियों के बारे में विस्तार से चर्चा करता है। इस लेख के द्वारा पाठकों को मंडल की संरचना, कंपनी के कामकाज में उनकी भूमिका और कंपनी (मंडल की बैठक और इसकी शक्तियां) नियम, 2014 का नियम 8 और धारा 179 के तहत उन्हें दी गई शक्तियों की समझ मिलती है।

कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत एक कंपनी में निदेशक मंडल 

निदेशक मंडल शब्द को धारा 2(10) के तहत कंपनी के निदेशकों के सामूहिक निकाय के रूप में परिभाषित किया गया है। सामान्य शब्दों में, इसे कंपनी के शेयरधारकों द्वारा कंपनी के प्रबंधन और कामकाज की देखरेख के लिए चुने गए व्यक्तियों के समूह के रूप में समझा जा सकता है। कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 149 में कहा गया है कि बी.ओ.डी. में केवल व्यक्ति शामिल हो सकते हैं, यानी की कोई कृत्रिम (आर्टिफिशियल) व्यक्ति मंडल का सदस्य नहीं बन सकता है। निदेशक मंडल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हितधारकों के हितों का ध्यान, सर्वोत्तम संभव तरीके से रखा जाए और यह की कंपनी को कुशल तरीके से चलाया जा रहा है। 

निदेशक मंडल में आमतौर पर कार्यकारी (एक्जीक्यूटिव) के साथ-साथ गैर-कार्यकारी सदस्य भी शामिल होते हैं। कार्यकारी सदस्यों में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सी.ई.ओ.), मुख्य वित्तीय अधिकारी (सी.एफ.ओ.) आदि जैसे व्यक्ति शामिल हो सकते हैं। स्वतंत्र सदस्य, संगठन के कर्मचारी नहीं होते हैं; वे बाहरी व्यक्ति होते हैं जिन्हें उनकी विशेषज्ञता, कौशल और अनुभव के आधार पर नियुक्त किया जाता है।

धारा 149 निर्धारित करती है कि एक निजी कंपनी के लिए निदेशकों की न्यूनतम संख्या 2 होगी; एक सार्वजनिक कंपनी के लिए, न्यूनतम आवश्यकता 3 निदेशकों की होती है, जबकि एक व्यक्ति कंपनी (ओ.पी.सी.) के लिए 1 निदेशक होना आवश्यक है।

निदेशकों की संख्या आम तौर पर 5 से 15 सदस्यों के बीच होती है। निर्वाचित निदेशक (इलेक्टेड डायरेक्टर) आम तौर पर एक से तीन साल के बीच की अवधि के लिए काम करते हैं और यदि वे मंडल की आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं तो फिर से उनके चुनाव का प्रावधान भी दिया गया है।

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 165 यह भी निर्धारित करती है कि एक व्यक्ति एक समय में 20 कंपनियों का निदेशक हो सकता है। हर कंपनी में कम से कम एक महिला निदेशक का होना भी जरूरी है। इसके अतिरिक्त, मंडल के एक-तिहाई हिस्से में स्वतंत्र निदेशक होने चाहिए।

निदेशक मंडल का नेतृत्व कंपनी के अध्यक्ष द्वारा किया जाता है, जिसे बी.ओ.डी. द्वारा चुना जाता है। कार्यकारी निदेशक, प्रशासन, बिक्री, वित्त और अन्य व्यावसायिक प्रक्रियाओं के लिए जिम्मेदार होता हैं। इसके विपरीत, गैर-कार्यकारी निदेशक कंपनी को महत्वपूर्ण राय और सलाह प्रदान करते हैं। वे कंपनी के कर्मचारी नहीं हैं लेकिन बी.ओ.डी. का हिस्सा हैं। दूसरी ओर, प्रबंध निदेशक वे होते हैं जो कार्यकारी निदेशकों द्वारा मार्गदर्शन प्रदान करने और व्यवसाय के कामकाज की देखरेख के उद्देश्य से चुने जाते हैं।

सूचीबद्ध कंपनियों के लिए, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय (सूचीकरण दायित्व और प्रकटीकरण आवश्यकता)  (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज ऑफ इंडिया (लिस्टिंग ऑब्लिगेशन एंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट)) 2015, का विनियम 17 निदेशक मंडल की संरचना प्रदान करता है।

इसमें कहा गया है कि मंडल में कार्यकारी के साथ-साथ गैर-कार्यकारी निदेशक भी शामिल होने चाहिए, जो कुल संख्या के 50% से कम नहीं होंगे। कंपनी के लिए न्यूनतम एक महिला निदेशक होना आवश्यक है। इसके अलावा, यदि अध्यक्ष एक गैर-कार्यकारी निदेशक है तो निदेशक मंडल का एक तिहाई स्वतंत्र निदेशकों का गठन करेगा। जबकि, यदि अध्यक्ष एक कार्यकारी निदेशक है, तो कम से कम आधे मंडल में स्वतंत्र निदेशक शामिल होने चाहिए। 

एक कंपनी में निदेशक मंडल की भूमिका

यह अधिनियम, कंपनी के निदेशक मंडल की जिम्मेदारियों और शक्तियों पर स्पष्टता प्रदान करता है। इसमें कहा गया है कि निदेशक को सद्भावना में कार्य करने और कंपनी के सर्वोत्तम हित में स्वतंत्र निर्णय लेने की आवश्यकता है। हितों के टकराव को प्रकट करना एक निदेशक का एक अनिवार्य कर्तव्य है, जिसके लिए उन्हें ऐसे मामलों से संबंधित चर्चाओं में भाग लेने से बचना आवश्यक है। यह सुनिश्चित करना बी.ओ.डी. का कर्तव्य है कि कंपनी के पास जोखिमों को प्रबंधित करने और उत्तरदायित्व और पारदर्शिता (ट्रांसपेरेंसी) के उचित स्तर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त प्रणाली और प्रक्रियाएं हैं। कंपनी अधिनियम, 2013 का उद्देश्य निदेशकों को आंतरिक नियंत्रण, वित्तीय रिपोर्टिंग प्रणाली और कंपनी के सदस्यों के लिए एक आचार संहिता स्थापित करने में सक्षम बनाना है।

क़ानून में मंडल की समितियों की नियुक्ति के प्रावधान हैं, जैसे लेखा परीक्षा समिति (ऑडिट कमिटी), नामांकन और पारिश्रमिक समिति (नॉमिनेशन एंड रिम्यूनरेशन कमिटी), और हितधारकों के संबंध के लिए समिति। ये समितियाँ यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं कि कंपनी का प्रबंधन और शासन प्रणाली मजबूत और प्रभावी है।

मंडल, संगठन की रणनीतिक दिशा निर्धारित करने, कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन की देखरेख करने और महत्वपूर्ण कॉर्पोरेट नीतियों पर निर्णय लेने के लिए जिम्मेदार है। यह जांचना भी इनकी ही जिम्मेदारी है कि क्या कंपनी सभी लागू कानूनों और विनियमों के अनुपालन में काम कर रही है और हर समय शेयरधारकों के सर्वोत्तम हित में कार्य करती है या नहीं।

इसके अलावा, निदेशकों द्वारा कंपनी के वरिष्ठ (सीनियर) कार्यकारी अधिकारियों के प्रदर्शन की भी निगरानी की जाती है। वे विलय-अधिग्रहण आदि जैसे कार्यों के लिए निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संक्षेप में कहें तो, किसी भी कंपनी की सफलता के लिए एक निदेशक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

निदेशक मंडल की शक्तियाँ

भारत में कंपनी अधिनियम 2013 के तहत, निदेशक मंडल के पास विभिन्न शक्तियां होती हैं जो कानून द्वारा निर्दिष्ट की गई हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं –

  1. निर्णय लेने की शक्ति – निदेशक मंडल में कंपनी की ओर से निर्णय लेने की शक्ति निहित होती है। कंपनी को रणनीतिक मार्गदर्शन प्रदान करना उनकी जिम्मेदारी है, और इसलिए उनके पास महत्वपूर्ण निर्णय लेने और संगठन को सही दिशा में चलाने की शक्ति है। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि कंपनी ऐसे तरीके से चलती है जो हितधारकों के सर्वोत्तम हित में है और साथ ही, लागू कानूनों और विनियमों के अनुपालन में है। इसलिए निदेशकों को प्रमुख व्यावसायिक लेनदेन को स्वीकार या अस्वीकार करने की शक्ति दी गई है, जैसे कि विलय/अधिग्रहण का निर्णय या कंपनी की वित्तीय योजनाओं को स्वीकृत या अस्वीकृत करना। 
  2. निदेशकों को नियुक्त करने और हटाने की शक्ति- निदेशक मंडल के पास कंपनी के अन्य निदेशकों को नियुक्त करने और हटाने की शक्ति होती है। यह कंपनी के एसोसिएशन ऑफ आर्टिकल और कंपनी अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार किया जाना चाहिए। अधिनियम की धारा 152 के तहत, निदेशक मतदान के माध्यम से इस शक्ति का प्रयोग करते हैं। कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 169 के तहत नियुक्ति की शक्ति के अलावा, हटाने की शक्ति भी निदेशकों के पास निहित है।
  3. कंपनी के एजेंट के रूप में कार्य करने की शक्ति- निदेशक मंडल का कंपनी के साथ एक प्रत्ययी (फिडुशियरी) संबंध है। कहने का तात्पर्य यह है कि उनके बीच भरोसे का रिश्ता होता है और कंपनी की ओर से कार्य करने की शक्ति होती है। निदेशक कंपनी के लाभ के लिए एजेंट के रूप में कार्य करते है। जिससे उनके पास कंपनी की ओर से अनुबंध और कानूनी समझौते करने की शक्ति होती है। ऐसी शक्ति के प्रयोग के लिए प्राधिकरण (अथॉराइजेशन) कंपनी के आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन या निदेशक मंडल द्वारा पारित प्रस्तावों से आता है। 
  4. प्रत्यायोजित (डेलीगेट) करने की शक्ति – कंपनी के भीतर अन्य व्यक्तियों को कुछ कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को प्रत्यायोजित करने (डेलीगेट) की शक्ति निदेशक मंडल द्वारा प्राप्त की जाती है। कुछ व्यावसायिक लेन-देन या विशिष्ट विभागों के प्रबंधन से संबंधित उत्तरदायित्व कुछ ऐसे कार्य हैं जिन्हें एक निदेशक द्वारा प्रत्यायोजित किया जा सकता है। इन प्रत्यायोजनों को आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन और कंपनी अधिनियम, 2013 के अनुसार बनाया जाना चाहिए।
  5. लाभांश (डिविडेंड) स्वीकृत करने की शक्ति – शेयरधारकों को भुगतान किए जाने वाले लाभांश के अनुमोदन (अप्रूवल) के संबंध में निर्णय निदेशकों द्वारा लिया जाता है। लाभांश का भुगतान करने का निर्णय कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन और लाभांश का भुगतान करने की कंपनी की क्षमता पर आधारित होना चाहिए। लाभांश का भुगतान केवल कंपनी के मुनाफे से किया जा सकता है और इसे निदेशक मंडल के एक संकल्प द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए।
  6. वित्तीय स्टेटमेंट को अनुमोदित करने की शक्ति – कंपनी के वित्तीय स्टेटमेंट को अनुमोदित करने की शक्ति निदेशकों के पास निहित है। बैलेंस शीट, आय स्टेटमेंट और कैश फ्लो स्टेटमेंट जैसे स्टेटमेंट इस श्रेणी में आते हैं। इस तरह के स्टेटमेंट को लेखा मानकों के अनुसार तैयार किया जाना चाहिए और कंपनी की वित्तीय स्थिति का सही और उचित प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
  7. कंपनी का प्रबंधन करने की शक्तियाँ- कंपनी के निदेशक मंडल के पास संगठन का प्रबंधन करने की शक्ति होती है। प्रबंधन शक्ति में व्यावसायिक निर्णय लेने, रणनीतिक निर्णय प्रदान करने और कंपनी को कुशल तरीके से चलाने की शक्ति शामिल है। निदेशकों द्वारा इस शक्ति का प्रयोग इस तरीके से किया जाना चाहिए जो उनके प्रत्ययी कर्तव्यों के अनुरूप हो, जिसमें सद्भावना और कंपनी के सर्वोत्तम हित में कार्य करने का उनका कर्तव्य शामिल है।

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 179 का विश्लेषण

धारा 179(1)

यह प्रावधान, निदेशकों को एजेंसी के सिद्धांत को निर्धारित करने के साथ शुरू होता है। यह प्रदान करता है कि निदेशक को ऐसी शक्तियों का प्रयोग करने और ऐसे कार्य करने का अधिकार होता है, जो कंपनी करने के लिए अधिकृत (ऑथराइज) है। यह प्रावधान निर्देशकों की एजेंसी और प्रत्ययी भूमिकाओं को सामने लाता है। ये कंपनी की ओर से कार्य करते हैं।

इस धारा में दो प्रावधान दिए गए हैं।

  • पहला प्रावधान, वह सीमा प्रदान करता है जिसके भीतर मंडल को अपनी शक्ति का उपयोग करने की आवश्यकता होती है। इसमें कहा गया है कि निदेशक मंडल कंपनी अधिनियम, 2013, मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन, आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन और सामान्य बैठकों में बनाए गए नियमों के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करेगा।
  • इस धारा का दूसरा प्रावधान प्रदान करता है कि मंडल को किसी भी ऐसे कार्य या चीज को करने से बचना चाहिए जो कंपनी द्वारा सामान्य बैठक में किया जाना है या कंपनी अधिनियम, मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन और आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन के तहत निर्देशित या आवश्यक है।

धारा 179(2)

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 179(2) आगे कहती है कि निदेशक मंडल द्वारा किया गया कार्य कंपनी द्वारा सामान्य बैठक में पारित किसी भी विनियमन द्वारा अमान्य नहीं होगा, जो अन्यथा वैध होता यदि विनियमन पारित नहीं किया गया होता।

यह प्रावधान शेयरधारकों और निदेशकों के बीच शक्ति संतुलन का प्रतिबिंब (रिफ्लेक्शन) है। किसी कंपनी के निदेशकों और शेयरधारकों के बीच सत्ता के लिए विवाद लंबे समय से चला आ रहा है। हालांकि, शेयरधारकों को निदेशकों की शक्ति को कम करने का अधिकार नहीं है, जैसा कि लोक अभियोजक (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) बनाम टी.पी. खेतान (1956) के मामले में आयोजित किया गया था।

धारा 179(3)

धारा 179(3) प्रदान करती है कि निदेशक मंडल, मंडल की बैठकों में प्रस्ताव पारित करके कंपनी की ओर से किन शक्तियों का प्रयोग कर सकता है।

  1. शेयरधारकों को उनके शेयरों पर अदत्त (अनपेड) धन के संबंध में उन्हे बुलाने की शक्ति – कंपनी अधिनियम, 2013 निदेशकों को शेयरों पर अदत्त धन के संबंध में बुलाने की शक्ति प्रदान करता है और यह कॉर्पोरेट प्रशासन का एक प्रमुख पहलू है। यह निदेशक को शेयरधारकों को उनके शेयरों पर बकाया राशि का भुगतान करने की आवश्यकता के लिए सक्षम बनाता है। कंपनी आमतौर पर शेयरधारकों से कॉल के रूप में रकम लेती है। शेयर राशि के लिए पहली किस्त का भुगतान, उसे जारी करने के समय किया जाता है और शेष किश्तों को कॉल के रूप में जाना जाता है। यह एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में कार्य करता है और यह सुनिश्चित करता है कि शेयरधारक कंपनी के प्रति अपने दायित्वों को पूरा करने में विफल नहीं होते हैं और उनके शेयरों पर बकाया राशि का पूरा भुगतान किया जाता है। 

कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन निदेशकों को यह अधिकार प्रदान करते हैं। निदेशकों को प्रत्येक शेयरधारक को देय राशि बताते हुए नोटिस भेजना आवश्यक है और किस तिथि तक इसे भुगतान किया जाना चाहिए। ऐसी स्थितियों में जहां देय तिथि तक राशि का भुगतान करने में विफलता होती है, निदेशकों को ऋण की वसूली के लिए प्रवर्तन (एंफोर्समेंट) कार्रवाई करने का अधिकार है, जिसमें कानूनी दावा दायर करना या ऋण वसूली एजेंसी नियुक्त करना शामिल है। यदि शेयरधारक समय पर देय राशि का भुगतान करने में विफल रहता है तो निदेशकों के पास शेयरों को जब्त करने की शक्ति भी होती है। ऐसी कार्रवाइयों की वजह से शेयरधारकों के लिए गंभीर परिणाम होते हैं; उदाहरण के लिए, कंपनी में उनकी इक्विटी की हानि और संगठन के प्रबंधन में भाग लेने के उनके अधिकार का परिणाम। हालाँकि, यह शक्ति प्रकृति में अप्रभावित नहीं है। कंपनी अधिनियम, 2013 प्रावधान करता है कि इस तरह की शक्ति का मनमाने तरीके से प्रयोग नहीं किया जा सकता है। निदेशकों को अपने प्रत्ययी कर्तव्यों और कंपनी के सर्वोत्तम हितों को ध्यान में रखते हुए सद्भाव से कार्य करना चाहिए। निदेशकों को राशि का भुगतान करने का उचित अवसर दिया जाना चाहिए, और प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए।

2. प्रतिभूतियों (सिक्योरिटीज) की क्रय द्वारा वापसी (बाय बैक) को अधिकृत करने की शक्ति – कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 68 एक कंपनी को अपने निदेशक मंडल और शेयरधारकों के अनुमोदन के अधीन अपनी स्वयं की प्रतिभूतियों को क्रय द्वारा वापसी की अनुमति देती है। यह शक्ति मंडलों के पास निहित है और संगठन के लिए इसकी पूंजी संरचना का प्रबंधन करने के लिए एक आवश्यक उपकरण है। यह कंपनी को अपने शेयरधारकों को अधिशेष (सरप्लस) निधि वापस करने में सहायता करता है और इस प्रकार शेयरधारक मूल्य में वृद्धि करता है। शेयरों की क्रय द्वारा वापसी, कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 62 के तहत निर्धारित शर्तों के अधीन है। इसे मौजूदा शेयरधारकों, खुले बाजार की खरीद, या निविदा (टेंडर) प्रस्ताव के माध्यम से किया जा सकता है। क्रय द्वारा वापसी के लिए उपयोग की जा सकने वाली अधिकतम राशि इसकी कुल चुकता पूंजी और खुली आरक्षित (फ्री रिजर्व) का 25% है। ऐसे क्रय द्वारा वापसी के प्राधिकरण के परिणामस्वरूप बकाया शेयरों में कमी आती है, प्रति शेयर आय में वृद्धि होती है और शेयरधारक मूल्य में वृद्धि होती है। इसके अलावा, चूंकि अधिग्रहण के लिए उपलब्ध शेयरों की संख्या में कमी आई है, शत्रुतापूर्ण अधिग्रहण को भी रोका जा सकता है। निदेशकों की इस शक्ति पर कुछ प्रतिबंध हैं, उदाहरण के लिए- शेयरधारकों द्वारा पारित किए जाने वाले एक विशेष प्रस्ताव की आवश्यकता और जमा या ब्याज का वापसी भुगतान में चूक के मामले में क्रय द्वारा वापसी पर रोक।

3. भारत में या भारत के बाहर डिबेंचर सहित प्रतिभूतियों को जारी करने की शक्ति- अधिनियम के तहत, डिबेंचर सहित प्रतिभूतियों को जारी करने की शक्ति निदेशक मंडल के पास निहित है। बी.ओ.डी. को कंपनी के व्यवसाय संचालन, विस्तार या निवेश के लिए पूंजी जुटाने के उद्देश्य से प्रतिभूतियां जारी करने का अधिकार है। यह भारत के भीतर और बाहर भी किया जा सकता है। निदेशक मंडल को प्रतिभूतियों के प्रकार, जारी की जाने वाली प्रतिभूतियों की संख्या, प्रतिभूतियों का अंकित मूल्य और मूल्य जिस पर प्रतिभूतियां जारी की जानी हैं, निर्दिष्ट करते हुए एक संकल्प पारित करना आवश्यक है। पूरी प्रक्रिया प्रचलित कानूनों के अनुपालन में की जानी चाहिए और कंपनी के आर्टिकल्स के तहत अधिकृत होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, निदेशकों को उचित ध्यान रखना चाहिए कि नियामक (रेगुलेटरी) प्राधिकरणों से आवश्यक अनुमोदन प्राप्त किए गए हैं। इसके अलावा, सभी प्रकटीकरण सेबी की आवश्यकता के अनुसार किए जाने चाहिए, और ऐसा न करने से कानूनी परिणामों का सामना करना पड़ सकता है।

4. धन उधार लेने की शक्ति– इस प्रावधान के तहत निदेशक मंडल को कंपनी की ओर से धन उधार लेने का अधिकार है। इस शक्ति का प्रयोग करने के लिए, एक मंडल के प्रस्ताव को पारित करने की आवश्यकता होती है, जो उधार लेने के उद्देश्य, उधार ली जाने वाली राशि, उधार लेने के नियमों और शर्तों, और लेनदारों को किसी भी प्रतिभूति को प्रदान करने के लिए आवश्यक हो सकती है। कंपनी के वित्तीय सलाहकार इस तरह के प्रस्ताव को मंजूरी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन और कंपनी की उधार नीतियां उन सीमाओं को निर्धारित करती हैं जिनके भीतर ऐसी शक्ति का प्रयोग किया जाना है। इस शक्ति का उपयोग निदेशकों द्वारा विवेकपूर्ण तरीके से और केवल उन उद्देश्यों के लिए किया जाना आवश्यक है जो कंपनी के हित को लाभान्वित करेंगे जैसे कि व्यवसाय संचालन को वित्तपोषित (फाइनेंस) करना, नई परियोजनाओं को वित्तपोषित करना, पूंजीगत संपत्ति में निवेश करना या मौजूदा ऋण चुकाना।

5. कंपनी की निधियों को निवेश करने की शक्ति- कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत कंपनी के निधि को निवेश करने की शक्ति निदेशक मंडल के पास निहित है। यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक निश्चित मात्रा में जोखिम शामिल है और बी.ओ.डी. से इसे विवेकपूर्ण तरीके से प्रयोग करने की अपेक्षा की जाती है। निवेश की प्रकृति, इसमें शामिल जोखिम और निवेश किए जाने से पहले संभावित रिटर्न के संबंध में गहन मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है। इन सब को ध्यान में रखते हुए, संकल्प जो कंपनी के धन के निवेश के निर्णय को मंजूरी देता है, विस्तार से, निवेश के उद्देश्य, निवेश की जाने वाली राशि, अपेक्षित रिटर्न और शामिल जोखिमों को रेखांकित करता है। संगठन की वित्तीय स्थिति और कंपनी के संचालन में निवेश के संभावित प्रभाव कुछ अन्य कारक हैं जिनका ध्यान रखा जाना चाहिए। निवेश किए जाने के बाद, यह निदेशकों की जिम्मेदारी है कि वे नियमित रूप से निवेश की समीक्षा (रिव्यू) करें और सुनिश्चित करें कि वे कंपनी के वित्तीय उद्देश्यों और निवेश नीतियों के अनुरूप हैं ताकि कंपनी और उसके हितधारकों के हितों की रक्षा की जा सके।

6. ऋण देने या ऋण के संबंध में प्रतिभूति देने की शक्ति – बी.ओ.डी. को ऋण देने, गारंटी देने या ऋण के संबंध में प्रतिभूति प्रदान करने का अधिकार है। हालाँकि, निदेशक इस शक्ति का प्रयोग अनियंत्रित तरीके से नहीं कर सकते हैं। कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 185 के तहत एक कंपनी अपने निदेशकों या किसी ऐसे व्यक्ति को ऋण, गारंटी या प्रतिभूति प्रदान नहीं कर सकती है, जिसमें निदेशक रुचि रखते हैं। अधिनियम ने इसके कुछ अपवादों को निर्धारित किया है जैसे व्यापार के सामान्य क्रम में प्रदान किए गए ऋण और कर्मचारियों को उनके रोजगार की शर्तों के हिस्से के रूप में दिए गए ऋण। निदेशकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऋण या प्रतिभूतियाँ एक संकल्प के माध्यम से मंडल से अनुमोदन के बाद ही दी जा रही हैं और कंपनी के आर्टिकल्स और नीतियों में निर्धारित सीमाओं के भीतर हैं।

7. कंपनी के वित्तीय स्टेटमेंट और मंडल की रिपोर्ट को अनुमोदित करने की शक्ति- एक कंपनी के वित्तीय स्टेटमेंट में एक बैलेंस शीट, लाभ और हानि खाता, और कैश फ्लो स्टेटमेंट के साथ-साथ अन्य संबंधित दस्तावेज़ जैसे खातों पर नोट्स और लेखा परीक्षक (ऑडिटर) की रिपोर्ट शामिल होती है। कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 134 में प्रावधान है कि मंडल की रिपोर्ट में स्टेटमेंट होना चाहिए, जैसे कि कंपनी के मामलों की स्थिति, वित्तीय परिणाम और मंडल की बैठकों का स्टेटमेंट। इसके अतिरिक्त, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व नीतियों (ये उन नीतियों को संदर्भित करती हैं जिनके माध्यम से एक कंपनी अपने संचालन में पर्यावरण और सामाजिक चिंताओं को एकीकृत करती है) को मंडल की रिपोर्ट पर भी प्रतिबिंबित किया जाना चाहिए। यह आवश्यक है कि वित्तीय स्टेटमेंट लागू लेखांकन मानकों के अनुपालन में तैयार किए जाएं और कंपनी की वित्तीय स्थिति के बारे में सही और निष्पक्ष दृष्टिकोण प्रस्तुत करें। यह अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया के साथ-साथ 2014 के कंपनी (लेखा) नियम जैसे प्रासंगिक नियमों के अनुपालन में किया जाना चाहिए। वित्तीय स्टेटमेंट और रिपोर्टों का अनुमोदन मंडल की बैठक में किया जाना चाहिए और निदेशकों को उपर्युक्त दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने की आवश्यकता होगी, जिसमें कहा गया हो कि उन्होंने इसकी समीक्षा की है और इसे अनुमोदित किया है।

8. कंपनी के व्यवसाय में विविधता (डायवर्सिटी) लाने की शक्ति – यह शक्ति निदेशक मंडल के पास निहित है। कंपनी के निदेशकों को व्यवसाय के एक नए क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए कंपनी को आरंभ करने का अधिकार है। एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करना आवश्यक है, जिसमें व्यवसाय में विविधता लाने का औचित्य (जस्टिफिकेशन), विविधीकरण से जुड़े संभावित लाभ और जोखिम और कंपनी की वित्तीय स्थिति पर विविधीकरण का प्रभाव शामिल है।

9. अन्य कंपनियों में हिस्सेदारी हासिल करने की शक्ति, विलय, अधिग्रहण या समामेलन (अमलगमेशन) को मंजूरी- किसी भी अधिग्रहण में, यह आवश्यक है कि निदेशक मंडल को इस तरह के फैसले को मंजूरी देनी चाहिए। निर्देशकों की प्रत्यायी भूमिका यहाँ सामने आती है। निदेशक को कंपनी के औचित्य, ऐसे विलय/अधिग्रहण/समामेलन के पीछे के कारण और सौदे के समय ऐसे लेनदेन से प्राप्त होने वाले लाभों के बारे में हितधारकों को सूचित करना आवश्यक है। सेबी (शेयरों और अधिग्रहणों का पर्याप्त अधिग्रहण) विनियम 2011 बी.ओ.डी. को स्वतंत्र निदेशकों की एक समिति स्थापित करने के लिए बाध्य करता है, जिन्हें लेनदेन पर उचित सिफारिशें प्रदान करने की आवश्यकता होती है। इन सिफारिशों को कंपनी द्वारा प्रकाशित किया जाना आवश्यक है। इन सिफारिशों को कंपनी द्वारा प्रकाशित किया जाना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, निदेशकों को प्रतिस्पर्धा (कंपटीशन) अधिनियम, 2002 के तहत आवश्यकताओं के अनुपालन में विलय या समामेलन के प्रस्ताव के अनुमोदन से 30 दिनों के भीतर भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग को एक नोटिस दाखिल करना आवश्यक है।

धारा 179 आगे बताती है कि मंडल की बैठक में पारित एक प्रस्ताव के माध्यम से, बी.ओ.डी. किसी भी समिति, प्रबंध निदेशक, प्रबंधक या शाखा के प्रधान अधिकारी को धन उधार लेने, धन निवेश करने, ऋण देने या प्रतिभूति देने के लिए अपनी शक्तियाँ सौंप सकता है।

धारा 179(4)

धारा 179(4) निदेशक मंडल द्वारा प्रयोग किए जाने वाले अधिकारों पर प्रतिबंध प्रदान करती है। इसमें कहा गया है कि कंपनी को अपनी आम बैठक में धारा 179 के तहत निर्धारित अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए निदेशक मंडल पर प्रतिबंध और शर्तें लगाने की शक्ति है। इसके अलावा, कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 180 बी.ओ.डी. की निर्धारित शक्तियों पर प्रतिबंध लगाती है और यह सुनिश्चित करती है कि उनका प्रयोग अबाध तरीके से नहीं किया जाता है। 

कंपनी (मंडल की बैठक और उसकी शक्तियां) नियम, 2014 के नियम 8 के तहत मंडल की अतिरिक्त शक्तियां

कंपनी (मंडल की बैठक और उसकी शक्तियाँ) नियम 2014 मंडल की बैठकों के संचालन और कंपनी के निदेशकों द्वारा शक्तियों के प्रयोग के लिए एक रूपरेखा प्रदान करते हैं। धारा 179 के अलावा, 2014 के नियमों के नियम 8 में निदेशक मंडल के साथ निहित कुछ अतिरिक्त शक्तियों की रूपरेखा दी गई है।

ये शक्तियां इस प्रकार हैं-

  1. राजनीतिक योगदान देना: कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 182 राजनीतिक योगदान के लिए सीमाएं प्रदान करती है। इसमें कहा गया है कि सरकारी कंपनियां और एक कंपनी जो तीन साल से कम समय से अस्तित्व में है, किसी भी तरह का राजनीतिक योगदान देने से प्रतिबंधित है। इन दो प्रकारों को छोड़कर, अन्य कंपनियों को ऐसे योगदान करने की अनुमति है। इस तरह का योगदान मंडल के प्रस्ताव को पारित करने और कुल योगदान राशि के लाभ और हानि खाते में पूर्ण प्रकटीकरण के बाद ही किया जा सकता है।
  2. प्रमुख प्रबंधकीय कार्मिक (मैनेजेरियल) (के.एम.पी.) की नियुक्ति या हटाना: नियम प्रदान करता है कि निम्नलिखित कंपनियों को पूर्णकालिक प्रमुख प्रबंधकीय कार्मिक नियुक्त करने की आवश्यकता है –
  • 10 करोड़ रुपये या उससे अधिक की चुकता शेयर पूंजी वाली सार्वजनिक कंपनी;
  • 10 करोड़ रुपये या उससे अधिक की चुकता शेयर पूंजी वाली निजी कंपनी;
  • हर सूचीबद्ध कंपनी।

एक पूर्णकालिक के.एम.पी. कंपनी से पारिश्रमिक प्राप्त करता है और एक सहायक कंपनी के अलावा किसी अन्य कंपनी में एक साथ किसी भी स्थिति को रखने की अनुमति नहीं है। अधिनियम की धारा 2(51) प्रमुख प्रबंधकीय कार्मिक की परिभाषा प्रदान करती है। वे कंपनी के महत्वपूर्ण निर्णय लेने और कर्मचारियों के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार हैं। यह देखना भी उनका कर्तव्य है कि कंपनी द्वारा अधिनियम द्वारा निर्धारित अनिवार्य अनुपालन का पालन किया जा रहा है।

  1. आंतरिक (इंटरनल) लेखा परीक्षकों और सचिवीय (सेक्रेटेरियल) लेखा परीक्षकों की नियुक्ति: कंपनी अधिनियम की धारा 138 (1) और कंपनी (लेखा) नियम, 2014 उन कंपनियों की श्रेणी प्रदान करती है जिन्हें आंतरिक लेखा परीक्षक नियुक्त करने की आवश्यकता होती है। नियुक्त किया जाने वाला व्यक्ति या तो संगठन का कर्मचारी या बाहरी सदस्य हो सकता है। प्रस्तावित व्यक्ति से लिखित सहमति प्राप्त करने की आवश्यकता होती है, जिसके बाद उनकी नियुक्ति के लिए और उनके पारिश्रमिक को तय करने के लिए एक मंडल बैठक आयोजित करने की आवश्यकता होती है। कंपनी अधिनियम की धारा 204(1) के अनुसार प्रत्येक सूचीबद्ध कंपनी के लिए लेखा परीक्षक अनिवार्य है। यह अनिवार्य है कि केवल एक प्रमाणित कंपनी सचिव ही सचिवीय लेखा परीक्षक बन सकता है। सचिवीय लेखा परीक्षक को एक मंडल संकल्प पोस्ट के माध्यम से नियुक्त किया जाता है, जिसे आरओसी के साथ संकल्प दायर किया जाना है।

निष्कर्ष 

एक कंपनी के निदेशक मंडल को कंपनी अधिनियम, 2013 और इसके संबद्ध नियमों के आधार पर उन्हें प्रदत्त कई शक्तियाँ प्राप्त हैं। ये शक्तियाँ उनमें निहित हैं ताकि वे कंपनी का कुशलतापूर्वक प्रबंधन और संचालन कर सकें। उन्हें प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए, निदेशक को कंपनी के सर्वोत्तम हित में कार्य करना चाहिए। कंपनी के सर्वोत्तम हित में कार्य करना निदेशकों का प्रत्ययी कर्तव्य है। निदेशकों के व्यक्तिगत हितों को कभी भी कंपनी और उसके हितधारकों के हितों पर हावी नहीं होना चाहिए। निदेशकों को अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए विवेकपूर्ण ढंग से कार्य करना चाहिए और उचित परिश्रम का प्रयोग करना चाहिए। उन्हें जानकारी एकत्र करने, जोखिमों का करने और सूचित निर्णय लेने के लिए सभी उचित कदम उठाने चाहिए। यह आवश्यक है कि मंडल द्वारा लिए गए निर्णय किसी भी व्यक्तिगत या बाहरी दबाव से प्रभावित नहीं होने चाहिए और केवल अपने सर्वोत्तम निर्णय के आधार पर और कंपनी के सर्वोत्तम हित में निर्णय लेने चाहिए। निदेशकों को अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए पारदर्शिता बनाए रखने की आवश्यकता है। कंपनी के अन्य हितधारकों को किसी अज्ञानता के पर्दे के पीछे नहीं रखना चाहिए। निदेशकों को कानूनी और नियामक आवश्यकताओं का अनुपालन भी सुनिश्चित करना चाहिए और नैतिक आचरण को बढ़ावा देना चाहिए। इन सिद्धांतों का पालन करके, निदेशक संगठन की दीर्घकालिक (लॉन्ग टर्म टर्म) सफलता और स्थिरता सुनिश्चित कर सकते हैं। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत कंपनी का निदेशक कौन है?

“निदेशक” शब्द को कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(34) के तहत परिभाषित किया गया है। एक निदेशक को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में समझा जा सकता है जिसे कंपनी के निदेशक की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए नियुक्त किया जाता है।

क्या किसी कंपनी का निदेशक निदेशक मंडल की स्वीकृति के बिना अपने दम पर कार्य कर सकता है?

कंपनी अधिनियम, 2013 में प्रावधान है कि किसी कंपनी के निदेशक मंडल को सामूहिक रूप से कार्य करना चाहिए और मंडल की बैठकों में प्रस्ताव पारित करके निर्णय लेना चाहिए। उन्हें सभी हितधारकों के हितों को ध्यान में रखते हुए कंपनी के सर्वोत्तम हित में कार्य करना चाहिए। मंडल के अनुमोदन के बिना किसी भी निदेशक द्वारा लिया गया निर्णय कंपनी को बाध्य नहीं करेगा, और निदेशक अपनी व्यक्तिगत क्षमता में ऐसे कार्यों के परिणामस्वरूप कंपनी को होने वाले किसी भी नुकसान या क्षति के लिए जिम्मेदार होगा। हालाँकि, कुछ अत्यावश्यक स्थितियों में, एक निदेशक अपने दम पर कार्रवाई कर सकता है, जैसे कि उन स्थितियों में जब जल्द सूचना पर मंडल की बैठक आयोजित करना संभव नहीं है, लेकिन ऐसी कार्रवाइयों को अगले दिन मंडल की बैठक में निदेशक मंडल द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए। 

कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत एक कंपनी के निदेशक की शक्तियों पर क्या प्रतिबंध हैं?

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 180, निदेशक की शक्तियों पर प्रतिबंध प्रदान करती है। यह ऐसी स्थितियाँ प्रदान करती है जिनमें निदेशक केवल विशेष संकल्प के माध्यम से अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं।

संदर्भ 

 

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