पलविंदर कौर बनाम पंजाब राज्य (1952)

0
100

यह लेख Tisha Agrarwal द्वारा लिखा गया है। यह लेख पलविंदर कौर बनाम पंजाब राज्य के मामले से संबंधित तथ्यों, उठाए गए मुद्दों, दिए गए तर्कों और निर्णय के साथ-साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872, आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 और भारतीय दंड संहिता, 1860 के संबंधित कानूनी प्रावधानों के संदर्भ में है। इस लेख का अनुवाद Himanshi Deswal द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

किसी आपराधिक कार्यवाही में, ‘स्वीकारोक्ति’ (कन्फेशन) का साक्ष्य बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। पलविंदर कौर बनाम पंजाब राज्य (1952) का ऐतिहासिक निर्णय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 24 के तहत साक्ष्य के रूप में स्वीकारोक्ति की स्वीकार्यता को समझने में सहायता करता है। यह भारतीय दंड संहिता, 1860 (इसके बाद आईपीसी के रूप में संदर्भित) की धारा 302 और 201 और आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (इसके बाद सीआरपीसी के रूप में संदर्भित) की धारा 164 पर भी केंद्रित है।

यह मामला सत्र न्यायाधीश और पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा आईपीसी की धारा 201 के तहत पलविंदर कौर को दोषी ठहराए जाने के इर्द-गिर्द घूमता है। पलविंदर कौर पर उनके पति जसपाल सिंह की हत्या के सिलसिले में मुकदमा चलाया गया था। उन पर अपने पति को पोटेशियम साइनाइड देने का आरोप था। दोषसिद्धि के बाद, उन्होंने विशेष अनुमति के माध्यम से माननीय सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। इस मामले में देखा गया कि जसपाल सिंह की रहस्यमय तरीके से मौत हो गई और उनकी मौत का कारण जानने के लिए कोई ठोस साक्ष्य नहीं है।

अभियोजन पक्ष का मामला काफी हद तक पलविंदर कौर के बयान पर निर्भर था, जिसे न्यायालय ने स्वीकारोक्ति के रूप में माना था। हालाँकि, वर्तमान याचिका में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इससे इनकार किया और बयान और स्वीकारोक्ति के संबंध में भ्रम को स्पष्ट किया।

इसके अलावा, शीर्ष अदालत ने अपने निर्णय को केवल संदेह के आधार पर रखने के लिए उच्च न्यायालय की आलोचना की, जबकि अपराध का कोई निश्चित साक्ष्य नहीं था। आख़िरकार, न्यायालय ने पलविंदर कौर को आरोपों से बरी कर दिया और कहा कि ठोस साक्ष्यों की कमी के कारण जसपाल सिंह की मौत हमेशा रहस्य के घेरे में रहेगी।

पलविंदर कौर बनाम पंजाब राज्य (1952) का विवरण

  • मामले का नाम: पलविंदर कौर बनाम पंजाब राज्य
  • समतुल्य उद्धरण: 1952 एआईआर 354
  • शामिल अधिनियम: भारतीय साक्ष्य अधिनियम, सीआरपीसी, आईपीसी
  • महत्वपूर्ण प्रावधान: आईईए की धारा 24, आईपीसी की धारा 201 और 302, और सीआरपीसी की धारा 164।
  • न्यायपीठ: मेहर चंद महाजन, एन. चन्द्रशेखर अय्यर, नटवरलाल एच. भगवती, जे.
  • याचिकाकर्ता/अपीलकर्ता: पलविंदर कौर
  • प्रतिवादी: पंजाब राज्य
  • निर्णय की तारीख: 22 अक्टूबर, 1952

पलविंदर कौर बनाम पंजाब राज्य (1952) के तथ्य

इस मामले की अभियुक्त पलविंदर कौर की शादी कुछ साल पहले जसपाल सिंह (मृतक) से हुई थी। जसपाल सिंह पंजाब के भरेली के मुखिया के पुत्र थे। जसपाल और पलविंदर अपने दो बच्चों के साथ अंबाला के भरेली भवन में रहते थे। जसपाल के अपने पिता और दादा के साथ संबंध मधुर नहीं थे। वह अपने पिता से मिलने वाले भत्ते पर जीवन यापन करते थे और अपनी आय की पूर्ति के लिए दूध और अंडे भी बेचते थे। दूसरा अभियुक्त, जिसका कहीं पता नहीं चल रहा है, वह मोहिंदरपाल सिंह था। वह पलविंदर कौर का रिश्तेदार था और कभी-कभार भरेली भवन में रहता था। इस मामले में आरोप लगाया गया था कि पलविंदर कौर और उनके बीच प्रेम प्रसंग (अफेयर) था।

अभियोजन पक्ष का मामला है कि जसपाल सिंह को 6-2-1950 को उनकी पत्नी पलविंदर कौर और मोहिंदरपाल सिंह ने पोटेशियम साइनाइड दिया था। जसपाल सिंह का शव अम्बाला शहर के एक कमरे में एक बड़े संदूक में रखा गया था। दस दिन बाद 16-2-1950 को मोहिंदरपाल ने दो परिचितों अमरीक सिंह और करतार सिंह की मदद से संदूक को घर से बाहर निकाला। संदूक को वे बलदेवनगर शिविर में ले गए और एक गोदाम में रख दिया। तीन दिन बाद मोहिंदरपाल नौकर की मदद से संदूक को राजपुरा ले गया और छत गांव के पास कुएं के पास जीप ले जाकर संदूक को उसमें फेंक दिया। फिर जीप को एक गुरुद्वारे में ले जाया गया और धोया गया।

पीड़िता के लापता होने के बाद उसके पिता ने मोहिंदरपाल से कुछ पूछताछ की, जिस पर उसने कई गलत टिप्पणियाँ कीं। तभी डेली मिलाप में जसपाल सिंह के लापता होने के संबंध में एक विज्ञापन प्रकाशित हुआ। कथित हत्या के एक महीने और दस दिन बाद, जिस कुएं में संदूक फेंका गया था, उसमें से एक अप्रिय गंध आने लगी। इसकी सूचना दी गई और इसे बाहर निकाला गया। अगले ही दिन शव का शवपरीक्षा (पोस्टमार्टम) किया गया। हालांकि, पुलिस ने बिना फोटो खींचे शव का अंतिम संस्कार करने की इजाजत दे दी।

ढाई महीने से अधिक समय के बाद, अपीलकर्ता और मोहिंदरपाल के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। मोहिंदरपाल भूमिगत हो गया और उसका पता नहीं चल सका। इसलिए, अकेले अपीलकर्ता के खिलाफ कार्यवाही शुरू की गई।

उठाये गये मुद्दे 

  • क्या पलविंदर कौर का बयान भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 24 के तहत स्वीकारोक्ति के रूप में स्वीकार्य होगा?
  • क्या उच्च न्यायालय ने प्लाविंदर कौर को उसके पति की हत्या के मामले में आईपीसी की धारा 201 के तहत सही दोषी ठहराया है?

अपीलकर्ता के तर्क

अपीलकर्ता द्वारा यह तर्क दिया गया था कि उच्च न्यायालय ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों का उल्लंघन किया था और दारा सिंह बनाम राज्य (1951) का निर्णय कानून के संदर्भ में गलत था। अपीलकर्ता द्वारा की गई कथित स्वीकारोक्ति एक दोषमुक्ति बयान थी, और वह साक्ष्य में अस्वीकार्य थी और उसे उसके खिलाफ साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था। स्वयं अभियोजन पक्ष द्वारा भी अधिकांश विवरणों में इसका खंडन किया गया था, और इसलिए, किसी भी मामले में, अपीलकर्ता को दोषी ठहराते समय उच्च न्यायालय द्वारा इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता था।

अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 302 के तहत अपराध के लिए सत्र न्यायाधीश द्वारा दोषी ठहराया गया था। जबकि उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता को आरोप से बरी कर दिया और आईपीसी की धारा 201 के तहत दोषी ठहराया। अपीलकर्ता द्वारा यह तर्क दिया गया कि आईपीसी की धारा 302, 34 और 201 के तहत अपराध अलग-अलग अपराध हैं और अलग-अलग समय पर किए गए थे। ये अपराध अलग-अलग लेन-देन का हिस्सा थे, और इस प्रकार, इन आरोपों के लिए अपीलकर्ता को दोषी ठहराया जाना अनुचित है।

यह भी तर्क दिया गया कि विभिन्न गवाहों को दिए गए मोहिंदर पाल के बयान और उसका आचरण अपीलकर्ता प्लाविंदर कौर के खिलाफ प्रासंगिक नहीं थे। उच्च न्यायालय ने बिना किसी पुष्टि के करमचंद और सुश्री लछमी, जो सहयोगी थे, की गवाही पर भरोसा करके भी गलती की। उच्च न्यायालय ने कई अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर भी भरोसा किया जो अपीलकर्ता के खिलाफ साबित हुए और कई अन्य निर्दोष स्पष्टीकरणों पर ध्यान नहीं दिया जो अन्यथा साबित होते।

जांच में अत्यधिक देरी हुई और मामले में कई नई सामग्री गलत तरीके से पेश की गईं। कहानी विभिन्न चरणों में विकसित की जा रही थी। इसलिए, न्यायालय को अपीलकर्ता की बेगुनाही की संभावना को छोड़े बिना उन पर भरोसा नहीं करना चाहिए था।

अभियोजन पक्ष का तर्क

अभियोजन पक्ष ने मामले के तथ्यों पर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि जसपाल सिंह को 6 फरवरी, 1950 की दोपहर को अपीलकर्ता और मोहिंदरपाल द्वारा पोटेशियम साइनाइड जहर दिया गया था। इसके बाद शव को एक बड़े बक्से में डालकर अंबाला शहर स्थित घर के एक कमरे में रख दिया गया। लगभग दस दिन बाद, वे बक्से को जीप में घर से बलदेव नगर शिविर ले गए। तीन दिन के बाद वे बक्से को एक कुएं के पास ले गए और बक्से को उसमें फेंक दिया। इसके बाद जीप को गुरुद्वारे में ले जाकर धोया गया।

पलविंदर कौर बनाम पंजाब राज्य (1952) में चर्चा किए गए कानून और प्रावधान

पलविंदर कौर बनाम पंजाब राज्य का मामला नीचे उल्लिखित प्रावधानों की प्रयोज्यता (एप्लिकेबिलटी) और साक्ष्य के रूप में स्वीकारोक्ति की स्वीकार्यता को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

आईपीसी की धारा 302 

इस प्रावधान में कहा गया है कि जो कोई भी हत्या करेगा उसे मौत या आजीवन कारावास की सजा दी जाएगी और जुर्माना भी देना होगा। हत्या एक बुरा कार्य है, और किसी को भी दूसरे व्यक्ति की जान लेने का अधिकार नहीं है। यह प्रावधान हत्या करने के दोषी अपराधी को सजा देने की बात करता है।

हत्या के आवश्यक तत्व:

  • मृत्यु कारित करने का इरादा।
  • कार्य इस ज्ञान के साथ किया जाना चाहिए कि कार्य से किसी की मृत्यु हो सकती है या किसी अन्य की मृत्यु होने की संभावना है।
  • इरादा ऐसी गंभीर शारीरिक चोट पहुंचाने का होना चाहिए जिससे ऐसे व्यक्ति की मृत्यु हो जाए।

धारा 302 के तहत अपराध गैर-जमानती, संज्ञेय (कॉग्निजेबल) और सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है।

आईपीसी की धारा 201 

इस प्रावधान में कहा गया है कि जो कोई भी गलत जानकारी देगा या किसी अपराध के साक्ष्य मिटाने में मदद करेगा, उसे इस प्रावधान के अनुसार दंडित किया जाएगा।

साक्ष्य एक ऐसी चीज़ है जिसका उपयोग दावा किए गए तथ्य के अस्तित्व या गैर-अस्तित्व को स्थापित करने या अस्वीकार करने के लिए किया जाता है। साक्ष्य या तो मौखिक हो सकता है, जो गवाह की गवाही को संदर्भित करता है, या लिखित, जो न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक डा lटा को संदर्भित करता है। जब ऐसा साक्ष्य जाली या मनगढ़ंत होता है, तो इसे झूठा साक्ष्य कहा जाता है।

धारा 201 दो भागों से संबंधित है। पहला साक्ष्य गायब करना और दूसरा अपराध के बारे में गलत जानकारी देना। किसी अभियुक्त को धारा 201 के तहत उत्तरदायी बनाने के लिए, दो मानदंडों को पूरा करना आवश्यक है:

  • अभियुक्त के पास यह विश्वास करने का उचित ज्ञान या कारण होना चाहिए कि अपराध किया गया है।
  • तब अभियुक्त को उस अपराध के साक्ष्यों को गायब करना चाहिए था या गलत जानकारी देनी चाहिए थी।

आईपीसी की धारा 201 के तहत आरोप स्थापित करने के लिए, यह स्थापित करना महत्वपूर्ण है कि अपराध किया गया है। केवल यह संदेह कि यह अपराध किया गया है, पर्याप्त नहीं है। केवल तभी जब अभियुक्त को पता था या उसके पास विश्वास करने का कारण था कि ऐसा अपराध किया गया था। अपेक्षित ज्ञान के साथ-साथ ऐसे अपराध के संबंध में साक्ष्य गायब करने या गलत जानकारी देकर अपराधी को कानूनी सजा से बचाने का इरादा भी।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 24

स्वीकारोक्ति शब्द का अर्थ है दोष स्वीकार करना। एक स्वीकारोक्ति संदिग्ध का अपराध स्वीकार करना है। एक स्वीकारोक्ति किसी भी धमकी, उत्तेजना, भय या अनुचित प्रभाव से मुक्त होगी।

इस प्रावधान में कहा गया है कि किसी अभियुक्त व्यक्ति द्वारा किया गया स्वीकारोक्ति न्यायालय में अस्वीकार्य है

यदि ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसी स्वीकारोक्ति धमकी, उकसावे, प्रलोभन या अभियुक्त के आरोप के संदर्भ में वादे के तहत की गई है, जिससे कथित तौर पर उसे लाभ मिलेगा या उसके खिलाफ कार्यवाही में अस्थायी प्रकृति की किसी भी बुराई से बचा जा सकेगा।

पकाला नारायण स्वामी बनाम एंपरर (1939) के मामले में, यह माना गया कि अपराध के संबंध में या अपराध का गठन करने वाले सभी तथ्यों के संबंध में स्वीकारोक्ति को किसी भी बिंदु पर प्रासंगिक माना जाना चाहिए।

पलविंदर कौर के मामले में, यह माना गया कि एक स्वीकारोक्ति को या तो पूरी तरह से स्वीकार किया जाएगा या पूरी तरह से खारिज कर दिया जाएगा। न्यायालय केवल दोषसिद्धि वाले भाग को स्वीकार करने में सक्षम नहीं है जबकि दोषमुक्ति वाले भाग को स्वाभाविक रूप से अविश्वसनीय मानकर खारिज कर सकता है।

सीआरपीसी की धारा 164 

यह प्रावधान एक विस्तृत प्रक्रिया प्रदान करता है जिसका पालन न्यायिक मजिस्ट्रेट को किसी आपराधिक कार्यवाही में किसी व्यक्ति द्वारा दी गई स्वीकारोक्ति या बयान को रिकॉर्ड करने के लिए करना होता है। इसका उल्लेख सीआरपीसी के अध्याय XII के तहत किया गया है। ऐसी प्रक्रिया प्रदान करने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जो व्यक्ति स्वीकारोक्ति कर रहा है या बयान दे रहा है वह स्वतंत्र रूप से और स्वेच्छा से ऐसा कर रहा है। स्वीकारोक्ति को जबरदस्ती या अनुचित प्रभाव से प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।

दिल्ली राज्य राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र बनाम नवजोत संधू (2005) मामले में, शीर्ष अदालत ने कहा कि स्वीकारोक्तिों को अत्यधिक विश्वसनीय माना जाता है क्योंकि कोई भी तर्कसंगत व्यक्ति अपने स्वयं के अपराध को स्वीकार नहीं करेगा और तब तक खुद पर महाभियोग (इम्पीच) नहीं लगाएगा जब तक कि उसकी अंतरात्मा उसे प्रेरित न करे।

निम्नलिखित कारणों से धारा 164 के तहत बयान दर्ज करने की आवश्यकता है:

  • गवाहों को बाद में अपना बयान बदलने से रोकना।
  • संहिता की धारा 162 के तहत गवाह द्वारा दी गई जानकारी के संबंध में अभियोजन पक्ष से छूट प्राप्त करना।
  • बयान, जो घटना के तुरंत बाद दर्ज किया जाता है, बाद के बयानों की तुलना में अधिक साक्ष्य मूल्य रखता है।

परिस्थितिजन्य साक्ष्य

परिस्थितिजन्य साक्ष्य का उपयोग आपराधिक कार्यवाही में मामले के भाग्य का फैसला करने के लिए किया जाता है। ऐसा तब किया जाता है जब मामले में कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं होता है और तर्क और पुष्टि तथ्यों के माध्यम से अपराध या निर्दोषता स्थापित करने की आवश्यकता होती है। यह बस एक असंबद्ध तथ्य है, लेकिन जब इसे एक साथ रखा जाता है, तो यह कुछ न कुछ निष्कर्ष निकालता है। रेक्स बनाम हॉज (1838) में यह कहा गया था कि आपराधिक मुकदमों के दौरान, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का विश्लेषण करते समय, यह महत्वपूर्ण है कि न्यायालय पक्षपातपूर्ण निर्णय या संदेह के आधार पर निर्णय लेने से खुद को बचाएं। इसलिए, यह आपराधिक कार्यवाही का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू बन जाता है।

वर्तमान मामले में, परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर चर्चा करते हुए, न्यायालय ने कहा कि यह स्थापित करने के लिए कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है कि अपीलकर्ता या मोहिंदरपाल ने मृतक को पोटेशियम साइनाइड दिया था, और साक्ष्य पूरी तरह से परिस्थितिजन्य है। विद्वान सत्र न्यायाधीश ने फैसला सुनाते हुए कहा कि मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्य अभियुक्त की बेगुनाही के साथ असंगत थे और यह माना गया कि मामला अभियुक्त के खिलाफ उचित संदेह से परे साबित हुआ है। इस टिप्पणी को सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया और यह स्पष्ट किया कि जिन दोषमुक्ति बयानों में अभियुक्त अपराध से इनकार करता है, उन्हें स्वीकारोक्ति नहीं कहा जा सकता है, लेकिन न्यायालय द्वारा अक्सर उन्हें झूठा और मनगढ़ंत दिखाकर दोषी चेतना के परिस्थितिजन्य साक्ष्य के रूप में उपयोग किया जाता है। जसपाल की मौत से जुड़े सवालों का जवाब अस्पष्ट परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की मदद से नहीं दिया जा सकता।

परिस्थितिजन्य साक्ष्य की अवधारणा को दोहराते हुए, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने लक्ष्मण प्रसाद @लक्ष्मण बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2023) के मामले में कहा कि श्रृंखला को सभी प्रकार से पूर्ण होना चाहिए ताकि अभियुक्त के अपराध को इंगित किया जा सके और अपराध के किसी अन्य सिद्धांत को भी बाहर रखा जा सके। यदि कोई ऐसा लिंक है जो गायब पाया जाता है और स्थापित कानून के मद्देनजर साबित नहीं होता है, तो अभियुक्त को ऐसे अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।

हम सी. चेंगा रेड्डी और अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1996) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय का भी उल्लेख कर सकते हैं, जिसमें यह माना गया था कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामले में, स्थापित कानून यह है कि जिन परिस्थितियों से अपराध का निष्कर्ष निकाला जाता है, उन्हें पूरी तरह से साबित किया जाना चाहिए, और ऐसी परिस्थितियाँ निर्णायक प्रकृति की होनी चाहिए। इसके अलावा, ऐसी सभी परिस्थितियाँ पूर्ण होंगी, और साक्ष्य की श्रृंखला में कोई अंतराल नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इसके अलावा, सिद्ध परिस्थितियाँ केवल अभियुक्त के अपराध की परिकल्पना के अनुरूप होनी चाहिए और उसकी बेगुनाही के साथ पूरी तरह से असंगत होनी चाहिए।

स्वीकारोक्ति की स्वीकार्यता

स्वीकारोक्ति एक बयान है जिसमें या तो अपराध को स्वीकार करना चाहिए या, किसी भी दर पर, अपराध का गठन करने वाले सभी तथ्यों को प्रमाणित करना चाहिए। यह एक गंभीर रूप से आपत्तिजनक तथ्य की स्वीकारोक्ति है। यहाँ तक कि निर्णायक रूप से दोषारोपण करने वाला तथ्य भी अपने आप में एक स्वीकारोक्ति नहीं है। एक स्वीकारोक्ति दो प्रकार की हो सकती है, अर्थात्, दोषारोपणात्मक और दोषमुक्ति।

वह स्वीकारोक्ति जिसमें अभियुक्त स्पष्ट रूप से अपराध करने के अपने अपराध को स्वीकार करता है, उसे दोषारोपणात्मक स्वीकारोक्ति कहा जाता है। न्यायालय के समक्ष स्वीकार्य होने के लिए इन बयानों को भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के तहत दिए गए सख्त दिशानिर्देशों का पालन करना होगा। अपराध स्वीकार करते समय, व्यक्ति को इस तरह के कार्य के परिणामों की स्पष्ट समझ होनी चाहिए।

जबकि, जब स्वीकारोक्ति अभियुक्त को दायित्व से मुक्त कर देती है, तो इसे दोषमुक्ति स्वीकारोक्ति कहा जाता है। एक दोषमुक्ति स्वीकारोक्ति को न्यायालय के समक्ष स्वीकार्य होने के लिए पुष्टिकारक साक्ष्य की आवश्यकता होती है। इन्हें भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के तहत एक प्रकार का बयान माना जाता है और ये स्वीकार्यता के सिद्धांतों के अधीन हैं। ऐसे बयानों का उपयोग यह साबित करने के लिए किया जाता है कि अभियुक्त अपराध स्थल पर मौजूद नहीं था या उसे अपराध को अंजाम देने का मौका नहीं दिया गया था।

पलविंदर कौर बनाम पंजाब राज्य में निर्णय (1952)

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि पलविंदर कौर का बयान भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 24 के तहत स्वीकारोक्ति के रूप में स्वीकार्य नहीं था। उच्च न्यायालय ने बयान के आधार पर अपीलकर्ता को दोषी ठहराने में गलती की।

उच्च न्यायालय ने इस मामले में अपीलकर्ता को दोषी ठहराते हुए 15-04-1950 को उसके द्वारा दिए गए स्वीकारोक्ति पर भरोसा किया। अपने स्वीकारोक्ति में उसने कहा कि उसके पति जसपाल सिंह ने फोटो धोने के लिए रखी दवा गलती से खा ली और अचानक गिर पड़े और उसकी मौत हो गई।

बाद में, डर के मारे वह मोहिंदर पाल के पास गई और शव को ठिकाने लगाने में मदद मांगी। उन्होंने शव को एक बक्से में रख दिया और बक्सा 4-5 दिन तक कोठी में ही पड़ा रहा। इसके बाद पलविंदर और मोहिंदरपाल ने नौकरों की मदद से बक्सा उतारकर उसकी जीप में रख दिया। वे बक्सा बलदेव नगर कैंप में ले गए और 8-10 दिन तक वहीं रहे। इसके बाद एक दिन उन्होंने बक्सा ले जाकर कुएं में फेंक दिया।

समग्र रूप से पढ़ने पर यह बयान दोषमुक्त करने वाला है। यह भारतीय दंड संहिता के तहत किसी भी अपराध के घटित होने को साबित या सुझाव नहीं देता है। बल्कि, उसने खुद को किसी भी अपराध से बरी कर लिया। यह उसके साथ-साथ मोहिंदरपाल को भी बरी कर देता है। न्यायालय ने माना कि यह बयान स्वीकारोक्ति के बराबर नहीं है और इस प्रकार इसे न्यायालय में साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

पीठ ने पकाला नारायण स्वामी बनाम किंग एंपरर (1939) में प्रिवी काउंसिल के निर्णय का हवाला दिया, जिसमें साक्ष्य अधिनियम के तहत इस्तेमाल किए गए स्वीकारोक्ति शब्द को विस्तृत किया गया था। यह कहा गया था कि जब एक स्वीकारोक्ति से यह निष्कर्ष निकलता है कि अभियुक्त ने अपराध किया है, तो ऐसे स्वीकारोक्ति को महज एक बयान नहीं माना जा सकता है।

एक स्वीकारोक्ति में या तो अपराध के संदर्भ में या, किसी भी दर पर, अपराध का गठन करने वाले सभी तथ्यों को स्वीकार किया जाना चाहिए। गंभीर रूप से दोषारोपण करने वाले तथ्यों को स्वीकार करना, यहां तक कि निर्णायक रूप से दोषारोपण करने वाले तथ्य को स्वीकार करना, अपने आप में एक स्वीकारोक्ति नहीं है।

एक बयान जिसमें स्व-दोषमुक्ति मामला शामिल है, उसे स्वीकारोक्ति नहीं माना जा सकता है यदि दोषमुक्ति बयान तथ्यात्मक है, जो यदि सत्य है, तो कबूल किए जाने वाले कथित अपराध को नकार दिया जाएगा।

पीठ ने एंपरर बनाम बालमकुंड (1930) मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय का भी हवाला दिया। इस मामले में स्वीकारोक्ति में दो तत्व शामिल थे। पहला इस बात का विवरण है कि अभियुक्त ने महिलाओं की हत्या कैसे की, और दूसरा उसके ऐसा करने के कारणों का विवरण है। पहला तत्व दोषारोपणात्मक था, और दूसरा दोषमुक्ति था।

माननीय न्यायालय द्वारा यह कहा गया था कि जब यह दिखाने के लिए कोई साक्ष्य नहीं है कि दोषमुक्ति भाग में कोई भी बयान गलत है, तो न्यायालय को संपूर्ण रूप से स्वीकारोक्ति को खारिज कर देना चाहिए। पलविंदर का कथित स्वीकारोक्ति पूरी तरह से दोषमुक्ति प्रकृति का है और किसी अपराध के घटित होने की बात स्वीकार नहीं करता है।

अत: ऊपर बताए गए कारणों और कानून के स्थापित सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, इस मामले में माननीय उच्च न्यायालय ने बयान को स्वीकारोक्ति और पलविंदर कौर के अपराध को साबित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य मानने में गलती की है।

इस तरह का दोषमुक्ति बयान, जिसमें अभियुक्त अपने अपराध से इनकार करता है, को स्वीकारोक्ति के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। हालाँकि, ऐसे बयानों को झूठा और मनगढ़ंत दिखाकर दोषी चेतना के परिस्थितिजन्य साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

अभियोजन पक्ष बयान का अर्थ और इस्तेमाल किए गए शब्दों को समझाने में भी विफल रहा। इसलिए, बयान, एक स्वीकारोक्ति नहीं होने और एक दोषमुक्ति प्रकृति का होने के कारण जिसमें कैदी द्वारा अपराध से इनकार किया गया था, अपीलकर्ता के अपराध को साबित करने के लिए मामले में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

उच्च न्यायालय ने भी बयान के एक हिस्से को स्वीकार करने और बाकी को झूठा ठहराने में गलती की है। यदि मृतक ने गलती से जहर खा लिया होता तो दोनों पक्षों का व्यवहार बिल्कुल अलग होता।

इसलिए इस बात को खारिज किया जाएगा कि उसने गलती से जहर खा लिया। इसके अलावा, पत्नी उसकी तरफ दौड़ती और शोर मचाती और तुरंत चिकित्सा सहायता के लिए बुलाती।

इसलिए, उच्च न्यायालय ने बयान के केवल दोषसिद्धि वाले हिस्से को स्वीकार किया और दोषमुक्ति वाले हिस्से को खारिज कर दिया, जो गलत था। यह एक सर्वमान्य नियम है कि स्वीकारोक्ति को या तो समग्र रूप से स्वीकार किया जाएगा या समग्र रूप से अस्वीकार कर दिया जाएगा, और इस स्थिति से कोई विचलन नहीं हो सकता है।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के विचार में, यह साबित करने के लिए कोई साक्ष्य नहीं था कि जसपाल सिंह की मृत्यु उनकी पत्नी पलविंदर कौर द्वारा उन्हें दिए गए पोटेशियम साइनाइड के कारण हुई थी। अगर ऐसा है तो आईपीसी की धारा 201 के तहत आरोप तय होना चाहिए।

इस निष्कर्ष पर पहुंचते समय, उच्च न्यायालय ने संदेह, अनुमान और सबसे महत्वपूर्ण, अस्वीकार्य साक्ष्य पर कार्रवाई की है। साक्ष्यों के अभाव में जसपाल सिंह की मौत रहस्य में घिरी रहेगी। रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्रियों की मदद से न्यायालय के लिए रहस्य को उजागर करना संभव नहीं है।

यह साबित करने के लिए कोई साक्ष्य नहीं है कि जसपाल सिंह की मृत्यु पोटेशियम साइनाइड के कारण हुई। शवपरीक्षा के कोई सकारात्मक संकेत नहीं थे, जिससे जहर देने का संकेत मिलता। पोटैशियम साइनाइड होठों और मुंह को खराब कर देता है, लेकिन मृतक के शरीर पर ऐसे कोई निशान नहीं थे। यह आरोप साबित करने के बजाय वास्तव में तथ्यों के विपरीत जाता है।

आईपीसी की धारा 201 के तहत अपराध को स्थापित करने के लिए, यह साबित करना महत्वपूर्ण है कि अपराध किया गया है। केवल संदेह ही दोषसिद्धि का आधार नहीं हो सकता। बिना किसी उचित संदेह के यह साबित करना होगा कि अभियुक्त जानता था या उसके पास विश्वास करने का कारण था कि ऐसा अपराध किया गया था। अपराधी को सजा से बचाने के लिए अपेक्षित ज्ञान और इरादा होना चाहिए। इस इरादे से, वह सहायता करेगा या साक्ष्यों को गायब करने का कारण बनेगा या गलत जानकारी देगा।

इन परिस्थितियों में, अभियोजन पक्ष के लिए यह स्थापित करना आवश्यक था कि जसपाल की मृत्यु निश्चित रूप से किसी व्यक्ति द्वारा पोटेशियम साइनाइड के सेवन के कारण हुई थी। इसके अलावा, उसके पास यह विश्वास करने का कारण था कि ऐसा हुआ था, और उसने शव को छुपाने और निपटाने में भाग लिया था। इस बात को साबित करने के लिए कोई साक्ष्य नहीं है।

इसलिए, न्यायालय ने उसे आईपीसी की धारा 201 के तहत आरोप में दोषी ठहराते समय केवल कथित स्वीकारोक्ति और अन्य गवाहों की गवाही पर भरोसा किया है, जो स्थापित कानून के खिलाफ है।

निर्णय के पीछे तर्क

मामले में यह साबित करने के लिए कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सामग्री साक्ष्य नहीं था कि जसपाल सिंह की मृत्यु पोटेशियम साइनाइड के कारण हुई थी और पलविंदर कौर ऐसी हत्या में सहयोगी थी। मृतक की मौत के कारणों के संबंध में कोई साक्ष्य नहीं मिला।

इसके अलावा, पलविंदर कौर द्वारा दिए गए कथित स्वीकारोक्ति को साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 24 के अर्थ के तहत स्वीकारोक्ति के रूप में नहीं माना जा सकता है। न्यायालय ने स्वीकारोक्ति के अर्थ और इसे स्वीकारोक्ति के रूप में क्या समझा जाएगा, इस पर विस्तार से चर्चा की। इस मामले में अपीलकर्ता द्वारा दिया गया बयान दोषमुक्त करने वाला था और इसलिए इसे स्वीकारोक्ति नहीं माना जा सकता।

सख्ती से, दोषमुक्ति संबंधी बयान जिसमें एक कैदी अपने अपराध से इनकार करती है, उसे स्वीकारोक्ति नहीं माना जा सकता है, लेकिन इन बयानों को झूठा और मनगढ़ंत दिखाकर दोषी चेतना के परिस्थितिजन्य साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह भी पाया गया कि अपीलकर्ता का मोहिंदरपाल के साथ अवैध संबंध हो सकता है, लेकिन इससे उसके पति को मारने का उसका मकसद साबित नहीं होता है।

आईपीसी की धारा 201 के तहत आरोप को बरकरार रखते हुए, उच्च न्यायालय ने साक्ष्य का सबसे महत्वपूर्ण टुकड़ा स्वीकारोक्ति को माना। इसकी पुष्टि हो गई और आरोप स्थापित हो गया। यह कानून की गलती थी और उच्च न्यायालय ने बयान को स्वीकारोक्ति के रूप में स्वीकार करने में गलती की थी।

आईपीसी की धारा 201 के तहत आरोप स्थापित करते समय यह साबित करना जरूरी है कि अपराध किया गया है। केवल संदेह दोषसिद्धि का आधार नहीं हो सकता। इस मामले में अपीलकर्ता के खिलाफ कोई आरोप साबित करने के लिए कोई साक्ष्य नहीं था।

महज संदेह के आधार पर व्यक्तियों के जीवन और स्वतंत्रता को खतरे में नहीं डाला जा सकता। किसी व्यक्ति को इनसे वंचित करने के लिए पुख्ता साक्ष्य और तर्क की आवश्यकता होती है। यहां अपीलकर्ता को दोषी ठहराना असुरक्षित है।

पलविंदर कौर बनाम पंजाब राज्य (1952) का विश्लेषण

पलविंदर कौर बनाम पंजाब राज्य के मामले में निर्णय भारतीय न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल है, खासकर आपराधिक कानून और साक्ष्य के क्षेत्र में। जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, इस मामले में अपने अवैध प्रेमी के साथ मिलकर अपने पति की हत्या करने के आरोप में पलविंदर कौर को दोषी ठहराया गया था। हालाँकि, न्यायालय ने आरोपों को खारिज कर दिया और उसे बरी कर दिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि पलविंदर कौर का बयान, जिसे पहले उच्च न्यायालय ने एक स्वीकारोक्ति के रूप में लिया था, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 24 के अर्थ में एक बयान नहीं है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि स्वीकारोक्ति में अपराध के घटित होने की बात स्वीकार की जानी चाहिए। किसी दोषमुक्ति बयान को स्वीकारोक्ति नहीं माना जा सकता।

इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर भी ध्यान केंद्रित किया कि कैसे उच्च न्यायालय को सिर्फ संदेह और अनुमान के आधार पर फैसला नहीं लेना चाहिए था। आपराधिक कार्यवाही में उचित संदेह से परे अपराध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, निर्णय इस बात पर प्रकाश डालता है कि स्वीकारोक्ति को या तो अस्वीकार कर दिया जाएगा या समग्र रूप से स्वीकार कर लिया जाएगा।

कुल मिलाकर, निर्णय आपराधिक कानून प्रक्रिया के मूलभूत सिद्धांतों की पुष्टि करता है। अपराध का निर्धारण करने में विश्वसनीय साक्ष्य और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता का पालन करने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

पलविंदर कौर का उपरोक्त चर्चा किया गया मामला एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मामला है, खासकर साक्ष्य कानूनों और आपराधिक प्रक्रियाओं के अनुप्रयोग को समझने में। सर्वोच्च न्यायालय का विश्लेषण प्रक्रियात्मक निष्पक्षता का पालन करने और साक्ष्यों की जांच के महत्व पर प्रकाश डालता है। यह महत्वपूर्ण है कि अपराध स्थापित करने के लिए स्वीकारोक्ति के प्रत्येक पहलू की स्पष्ट रूप से जांच की जाए। दोषसिद्धि और दोषमुक्ति दोनों भागों वाले किसी बयान को भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत किसी न्यायालय के समक्ष स्वीकार्य स्वीकारोक्ति के रूप में नहीं लिया जा सकता है। ऐसे बयान अस्वीकार्य होंगे और न्यायालय अभियुक्त को दोषी ठहराने के लिए उन पर भरोसा नहीं करेगी। एक स्वीकारोक्ति को समग्र रूप से और संपूर्णता में लिया जाना चाहिए। न्यायालय अपने निर्णय को आधार बनाते हुए एक भाग को लेकर दूसरे को नहीं छोड़ सकता।

यह भी साबित किया जाना चाहिए कि आईपीसी की धारा 201 के तहत अभियुक्त व्यक्ति को अपराध के आचरण के बारे में जानकारी थी या उसके पास यह सोचने के लिए पर्याप्त जानकारी थी कि अपराध किया गया था। इसका मतलब यह नहीं है कि अभियुक्त को अपराध की सटीक प्रकृति के बारे में पता होगा; केवल यह ज्ञान कि अपराध किया गया है, पर्याप्त है।

किसी व्यक्ति को दोषी ठहराते समय केवल संदेह पर भरोसा न करने की भी जरूरत है। उचित संदेह से परे अपराध स्थापित करना महत्वपूर्ण है। न्यायालय की एक गलती किसी व्यक्ति का जीवन हमेशा के लिए नष्ट कर सकती है। अंततः, न्याय दिया जाएगा और धार्मिकता की सेवा की जाएगी। इस तरह के आपराधिक मामलों में उपरोक्त निष्कर्ष बहुत महत्वपूर्ण हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

स्वीकारोक्ति से आपका क्या तात्पर्य है?

स्वीकारोक्ति किसी अपराध के अपराध को स्वीकार करने वाला बयान है। आपराधिक न्यायशास्त्र में, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के तहत स्वीकारोक्ति को ठोस साक्ष्य माना जाता है। इस मामले में, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी बयान को समग्र रूप से या तो अस्वीकार किया जा सकता है या स्वीकार किया जा सकता है। न्यायालय ऐसे स्वीकारोक्ति के सिर्फ एक हिस्से को स्वीकार या अस्वीकार नहीं कर सकता हैं।

कानून के न्यायालय में कब स्वीकारोक्ति स्वीकार्य है?

न्यायालय में स्वीकार्य होने के लिए, स्वीकारोक्ति बिना किसी दबाव या प्रलोभन के स्वेच्छा से की जानी चाहिए। इसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा। अभियुक्तों को भ्रष्टाचारियों का निशाना बनने से बचाने के लिए अन्य आवश्यक चीजें भी हैं, जो भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के तहत प्रदान की गई हैं।

दोषारोपणात्मक और दोषमुक्ति बयान क्या है?

दोषारोपणात्मक बयान वे होते हैं जिनमें अभियुक्त स्पष्ट रूप से अपना अपराध स्वीकार करता है। इसके विपरीत, दोषमुक्ति बयान वह होता है जिसमें अभियुक्त को जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया जाता है। एकमात्र प्रकार की स्वीकारोक्ति जो स्वीकार्य है वह दोषारोपणात्मक स्वीकारोक्ति है।

परिस्थितिजन्य साक्ष्य क्या है?

परिस्थितिजन्य साक्ष्य किसी तथ्य का अप्रत्यक्ष प्रमाण है जिसका उपयोग किसी आपराधिक मामले में निष्कर्ष निकालने के लिए किया जा सकता है। जब कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद नहीं होता है, तो न्यायालय परिस्थितियों का उपयोग करती है और निष्कर्ष निकालने के लिए तथ्यों की पुष्टि करती है। यह मूल रूप से मौजूद तथ्यों के आधार पर एक तार्किक निष्कर्ष को जन्म देता है।

संदर्भ

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here