सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के आदेश 1 से 21: सिविल प्रक्रिया की मूल बातें 

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Code of Civil Procedure 1908

यह लेख एमिटी लॉ स्कूल, कोलकाता से Oishika Banerji द्वारा लिखा गया है। यह लेख सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 1 से 21 से संबंधित है। इस लेख का अनुवाद Revati Magaonkar द्वारा किया गया है।

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परिचय

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 सिविल न्यायालयों की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है। संहिता जैसे की सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 2 (1) के तहत परिभाषित है, आम भाषा में यह नियमों का एक समूह है जो न्यायालय में किसी मामले की गति को नियंत्रित करता है। सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 स्वभाव से एक प्रक्रियात्मक कानून होने के कारण भारतीय क्षेत्र में सिविल कार्यवाही का संचालन करती है और इसलिए इसे एक संहिता के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह लेख संहिता 158 धाराओं से बनी है जिसमें संहिता का मूल भाग शामिल है, और संहिता के प्रक्रियात्मक पहलू को समझाने वाले 51 आदेश शामिल हैं। हालाँकि संहिता में 51 आदेश हैं, यह लेख विशेष रूप से पहले 21 आदेशों पर ध्यान केंद्रित करेगा जो किसी मामले की सुनवाई में सिविल न्यायालय द्वारा पालन की जाने वाली बुनियादी सिविल प्रक्रिया को निर्धारित करता है।

केवल आदेशों पर आगे बढ़ने से पहले, किसी भी प्रकार के भ्रम को दूर करने के लिए 1908 की संहिता के तहत आदेश, डिक्री और निर्णय के बीच अंतर को समझना आवश्यक है।

  • आदेश: 1908 की संहिता की धारा 2(14) के तहत परिभाषित, आदेश केवल यह बताता है कि एक मामला सिविल न्यायालय में कैसे आगे बढ़ेगा। जैसा कि प्रावधान प्रदान करता है, आदेश सिविल न्यायालय के निर्णय की औपचारिक अभिव्यक्ति को दर्शाता है, लेकिन स्पष्ट रूप से डिक्री को बाहर करता है।
  • डिक्री: सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 2(2) के तहत परिभाषित, डिक्री भी एक न्यायनिर्णय(एडज्यूडिकेशन) की एक औपचारिक अभिव्यक्ति है जो एक सिविल मामले में वादी और प्रतिवादी दोनों पक्षों के अधिकारों को निर्धारित करती है। एक डिक्री में निम्नलिखित आवश्यक होना चाहिए; पक्षों के अधिकार, वाद, न्यायनिर्णय, पक्षों के तय किए गए अधिकारों का निर्णायक (कंक्लूजिव) निर्धारण, और यह लिखित रूप में होना चाहिए।
  • निर्णय: यह 1908 की संहिता की धारा 2(9) के तहत परिभाषित किया गया है, एक निर्णय एक सिविल मामले में न्यायाधीश द्वारा आदेश के आधार पर, या उसके द्वारा पहले से पारित डिक्री में शामिल पक्षों को दिया गया एक बयान है। यदि किसी निर्णय में तथ्यों का विवरण, निर्धारण बिंदु, न्यायालय का निर्णय और न्यायालय के निर्णय के पीछे का कारण शामिल होना चाहिए।

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 1 से 21 तक

चूंकि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 एक बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रासंगिक सिविल प्रक्रियात्मक कानून है, इसलिए इसमें आदेशों के बारे में ज्ञान अपरिहार्य (इनडिस्पेंसेबल) है। इसके साथ ही किसी भी कानूनी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए इस क़ानून की अनदेखी नहीं की जा सकती। आदेशों को याद रखना अक्सर कठिन हो जाता है और इसलिए, कानूनी स्पष्टीकरण के साथ-साथ, यहां एक सरल व्याख्या भी प्रदान की गई है ताकि सिविल प्रक्रिया को कानूनी और गैर-कानूनी दोनों पृष्ठभूमि के व्यक्तियों द्वारा समझना आसान हो सके।

आदेश 1: उपयुक्त पक्ष

किसी मामले में हमेशा दो पक्ष शामिल होते हैं। एक सिविल मामले के लिए, इन दोनों पक्षों को वादी के रूप में संदर्भित किया जाता है, जो दूसरे पक्ष के खिलाफ वाद शुरू करने के लिए जिम्मेदार है, और प्रतिवादी जो दूसरा पक्ष है और उसे लगाए गए आरोपों के खिलाफ सिविल न्यायालय में उसको अपना बचाव करना होता है। यह एक सिविल मामले की शुरुआत है जैसा कि आदेश 1 के तहत प्रदान किया गया है जो कि संबंधित पक्षों से संबंधित है। मुकदमे के पक्षकारों की पहचान होने के तुरंत बाद आदेश 2 के तहत दिए गए प्रावधान के अनुसार वाद दायर करने की आवश्यकता आती है।

आदेश 2: मुकदमे का ढांचा 

वादी अपने मुकदमे के लिए एक सिविल न्यायालय का दरवाजा खटखटाएगा, जिसे संहिता के आदेश 2 के तहत प्रदान किए गए मुकदमे के ढांचे के रूप में जाना जाता है। मुकदमे का निर्धारण यह दर्शाता है कि एक पक्ष ने दूसरे पक्ष के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की है। जैसा कि आदेश 2 के नियम 2 द्वारा प्रदान किया गया है, वादी को मुकदमे में अपना पूरा दावा शामिल करना होगा, जो प्रतिवादी के खिलाफ वादी द्वारा लाई गई कार्रवाई के कारण के रूप में कार्य करेगा। मुकदमे को सिविल न्यायालय के समक्ष स्थापित करने की आवश्यकता है। लेकिन, यह दाखिल कौन करता है? क्या यह वादी है, या कोई अन्य व्यक्ति? इस प्रश्न का उत्तर संहिता के आदेश 3 द्वारा दिया गया है।

आदेश 3: मान्यता प्राप्त एजेंट और वकील

1908 की संहिता का आदेश 3 मान्यता प्राप्त एजेंटों और वकीलों के बारे में बात करता है। वादी द्वारा सिविल न्यायालय के समक्ष दायर किए गए मुकदमे को दाखिल करने के लिए, वाद दायर करने वाले पक्ष को एक कानूनी पेशेवर या एक वकील की मदद की आवश्यकता होती है जो कानून के क्षेत्र में विशेषज्ञता रखता हो। यहां एक वकील को नियुक्त करने की आवश्यकता आती है जो पीड़ित पक्ष, यानी वादी की ओर से सिविल न्यायालय के समक्ष तय किए गए मुकदमे को पेश करता है। सभी को मान्यता प्राप्त एजेंटों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है, और वकील को क्रमशः आदेश 3 के नियम 2 और नियम 4 के तहत जगह दी गई है। अब यह मान्यता प्राप्त एजेंट या वकील की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह विवादित पक्ष, वादी की ओर से सिविल न्यायालय के समक्ष वाद दायर करे, जो हमें संहिता के आदेश 4 पर लाता है ।

आदेश 4: वाद का संस्थगन (इंस्टीट्यूशन)

वाद स्थापित करने के लिए वादी को न्यायालय के समक्ष एक वाद प्रस्तुत करना होगा। एक वाद का अर्थ सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 7 के तहत समझाया गया है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि मुकदमे की उचित संस्थगन के लिए आदेश 4 के नियम 1 के उप-नियम (1), और (2) का अनुपालन करना अनिवार्य है। जबकि उप-नियम (1) न्यायालय के समक्ष वाद दायर करने के लिए वाद-पत्र (प्लेंट) प्रस्तुत करने का आदेश देता है, उप-नियम (2) यह प्रावधान करता है कि पिछले नियम में प्रदान किया गया कोई भी वाद-पत्र संहिता के आदेश 6, और 7 के तहत प्रदान किए गए नियमों से बच नहीं सकता है। 

आदेश 5: सम्मन जारी करना और तामील करना (सर्विस)

वादी द्वारा वाद दायर करने के बाद, ऐसे मुकदमे के बारे में प्रतिवादी को सूचित करने की आवश्यकता होती है ताकि वह न्यायालय के सामने पेश हो सके, और वादी द्वारा किए गए दावे के खिलाफ अपनी सुरक्षा में कुछ दाखिल कर सके। प्रतिवादी को आवश्यक कदम उठाने में सुविधा प्रदान करने के लिए, न्यायालय सम्मन भेजती है जैसा कि 1908 की संहिता के अनुसार आदेश 5 के तहत विधिवत प्रदान किया गया है। प्रतिवादी को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने और एक लिखित बयान दाखिल करने के लिए 30 दिनों की अवधि प्रदान की जाती है। आदेश 5 के नियम 1 के प्रावधान में यह प्रदान किया गया है कि यदि कोई प्रतिवादी वाद प्रस्तुत करने के समय न्यायालय के समक्ष उपस्थित होता है और न्यायालय में प्रस्तुत वाद पत्र में वादी ने जो भी दावा किया है उसे स्वीकार कर लेता है, तो इस मामले में प्रतिवादी को कोई सम्मन नहीं दिया जाएगा। सीधे शब्दों में कहें तो समन वह माध्यम है जिसके द्वारा न्यायालय प्रतिवादी को वादी द्वारा अपनी याचिका में किए गए दावों के खिलाफ अपना बचाव पेश करने के लिए बुलाती है। आदेश 5 में समन की तामील से जुड़े चरण और उन्हें वितरित करने का तरीका भी शामिल है।

आदेश 6: आम तौर पर दलील/अभिवचन 

आदेश 6 का नियम 1 “अभिवचन/दलील” शब्द का अर्थ प्रदान करता है जिसका अर्थ वाद-पत्र, या लिखित बयान होगा। हालाँकि वाद और लिखित बयान को क्रमशः आदेश 7, और 8 में समझाया जाएगा, वर्तमान आदेश एक दलील की अनिवार्यताओं पर जोर देता है जो हैं;

  1. दलीलों में केवल प्रासंगिक तथ्य बताए जाने चाहिए। दलील में साक्ष्य का कोई महत्व नहीं है (देखें: नियम 2 उप-नियम (1))।
  2. न्यायालय का समय बर्बाद करने से बचने के लिए, दलीलों को छोटे-छोटे अनुच्छेदों (पैराग्राफ) में विभाजित किया जाना चाहिए, और तारीखों, आंकड़ों और संख्याओं को एक दलील में अंकों और शब्दों दोनों में व्यक्त किया जाना चाहिए (संदर्भ: नियम 2 उप-नियम (2), और (3) )।
  3. दलील में सभी आवश्यक विवरण शामिल होने चाहिए, जिन मामलों में उनकी विशेष रूप से आवश्यकता होती है (संदर्भ: नियम 4)।
  4. दलील में किसी भी पिछले आधार से असंगत प्रतीत होने वाले नए आधार को शामिल करने के लिए, संशोधन (अमेंडमेंट) आवश्यक है। (संदर्भ: नियम 7)
  5. दलीलों में ऐसा कोई भी तथ्यात्मक मामला शामिल नहीं होना चाहिए जो पक्षपाती (बायस) प्रकृति का हो, मामले के किसी भी पक्ष के पक्ष में हो (संदर्भ: नियम 13)।
  6. संबंधित पक्षों के लिए अपनी दलीलों में अपने प्रारंभिक अक्षर प्रदान करना अनिवार्य है (संदर्भ: नियम 14)।

आदेश 7: वादपत्र

मुक़दमे के दाखिले पर चर्चा करते समय वादपत्र शब्द पर पहले ही बात की जा चुकी है। आदेश 7 विशेष रूप से इससे संबंधित है। एक वादपत्र में क्या होना चाहिए यह इस आदेश के नियम 1 के तहत निर्धारित किया गया है। यदि अपेक्षित शर्तों का पालन नहीं किया जाता है, तो आदेश का नियम 11 लागू होगा जो किसी वाद को खारिज करने के आधार से संबंधित है। जबकि वादी अपना वाद प्रस्तुत करने जा रहा है, प्रतिवादी को एक लिखित बयान के माध्यम से न्यायालय के समक्ष वादी के दावे का उत्तर देना होगा जो संहिता के आदेश 8 के तहत प्रदान किया गया है।

आदेश 8: लिखित बयान, मुजरा (सेट ऑफ), और प्रतिदावा (काउंटर क्लेम)

आदेश 5 के तहत न्यायालय द्वारा प्रतिवादी को सम्मन दिए जाने के बाद, प्रतिवादी को न्यायालय से सम्मन प्राप्त होने की तारीख से 30 दिनों की निर्दिष्ट अवधि के भीतर न्यायालय के समक्ष अपना लिखित बयान प्रस्तुत करना होगा। ऐसे समय के भीतर लिखित बयान प्रस्तुत करने में विफलता के परिणामस्वरूप न्यायालय को प्रतिवादी को अपना बयान प्रस्तुत करने के लिए कोई अन्य दिन निर्दिष्ट करने की अनुमति मिल जाएगी। लेकिन नई निर्दिष्ट तारीख न्यायालय द्वारा प्रतिवादी को सम्मन जारी करने की तारीख से 90 दिनों से अधिक नहीं होनी चाहिए। प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत लिखित बयान की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें वादी द्वारा लगाए गए आरोपों का विशिष्ट खंडन होना चाहिए, न कि केवल सामान्य खंडन।

आदेश 9: पक्षों की उपस्थिति और गैर-उपस्थिति के परिणाम

दोनों पक्षों की दलीलों के बाद, न्यायालय मामले की सुनवाई को आगे बढ़ाने के लिए पक्षों को पेश होने के लिए कहेगी। संहिता का आदेश 9 भी यही प्रावधान करता है। आदेश का नियम 1 विशेष रूप से इंगित करता है कि एक सिविल मामले में पक्षों को उस तारीख पर सिविल न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना होता है जो न्यायालय द्वारा प्रतिवादी को दिए गए सम्मन में निर्दिष्ट है। इस आदेश का दिलचस्प हिस्सा पक्षों की गैर-उपस्थिति के लिए प्रदान किए गए परिणाम हैं, जिन्हें यहां नीचे सूचीबद्ध किया गया है:

  1. नियम 3 में निर्दिष्ट तिथि पर दोनों पक्षों के उपस्थित न होने की बात कही गई है। इस स्थिति में, न्यायालय वाद खारिज कर देगी।
  2. नियम 6 उस स्थिति के बारे में बात करता है जब केवल वादी ही न्यायालय के सामने पेश होता है। इस नियम के तहत, तीन परिदृश्य प्रदान किए गए हैं जो तदनुसार मुकदमे के भाग्य का फैसला करेंगे।
  3. नियम 8 मुकदमे की सुनवाई के लिए बुलाए जाने की तारीख पर वादी की गैर-उपस्थिति के बारे में बात करता है। ऐसी स्थिति में भी वाद न्यायालय द्वारा खारिज कर दिया जाएगा बशर्ते प्रतिवादी ने वादी द्वारा उसके खिलाफ किए गए दावे को स्वीकार नहीं किया है। यदि अन्यथा हो, तो न्यायालय स्वीकार किए गए दावे के आधार पर प्रतिवादी के खिलाफ डिक्री पारित करेगी, जिससे शेष वाद खारिज हो जाएगा।

आदेश 10: न्यायालय द्वारा पक्षों की जांच

न्यायालय के समक्ष संबंधित पक्षों की उपस्थिति के बाद, न्यायालय 1908 की संहिता के आदेश 10 के तहत प्रदान किए गए अनुसार मामले के पक्षों की जांच करेगी। यहां पक्षों की परीक्षा एक आवश्यकता है;

  1. न्यायालय को यह सुनिश्चित करना है कि क्या वादी द्वारा प्रतिवादी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को प्रतिवादी द्वारा स्वीकार कर लिया गया है या खारिज कर दिया गया है।
  2. न्यायालय पक्षों को वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) का सहारा लेने का निर्देश दे, और न्यायालय की लंबी कार्यवाही से बचने के लिए न्यायालय के बाहर विवाद को निपटाने का प्रयास करें।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि आदेश 11, 12, और 13 इस आदेश के तहत निर्धारित परीक्षा प्रक्रिया के अंतर्गत आते हैं।

आदेश 11: खोज और निरीक्षण (इंस्पेक्शन)

न्यायालय के लिए किसी मामले में केवल पक्षों को सुनना मुद्दे तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसलिए, आदेश 11 जो खोज और निरीक्षण से संबंधित है, न्यायालय को संबंधित मामले में आगे बढ़ने में मदद के रूप में आता है, और इसके बारे में पर्याप्त ज्ञान प्राप्त करने के बाद ही न्यायालय मुद्दों को तैयार करने के लिए आगे बढ़ेगी।

आदेश 12: स्वीकार की गई दलील

खोज के तुरंत बाद, और न्यायालय द्वारा निरीक्षण के बाद संहिता के आदेश 12 में स्वीकृति प्रदान की जाती है। न्यायालय को वादी के आरोपों और प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत बचाव के बारे में पर्याप्त जानकारी होने के बाद, निरीक्षण द्वारा समर्थित, और मामले से जुड़े नए तथ्यों या सबूतों की खोज के बाद, मुकदमे का कोई भी पक्ष मामले को भागों में, या समग्र रूप से दलील के माध्यम से सच्चाई को स्वीकार कर सकता है।

आदेश के नियम 6 के तहत, न्यायालय किसी भी पक्ष द्वारा तथ्यों को स्वीकार करने पर संतुष्टि के आधार पर, दलील के माध्यम से, पक्षों के बीच मौजूद किसी भी अन्य प्रश्न पर विचार किए बिना, जैसा उचित समझे, वैसा मामले के लिए निर्णय पारित कर सकता है। ऐसे फैसले के साथ-साथ एक डिक्री भी प्रदान की जाएगी जिसमें फैसले की घोषणा की तारीख अंकित होगी।

आदेश 13: दस्तावेज प्रस्तुत करना, जब्ती और वापसी

आदेश 13 न्यायालय द्वारा पक्षों की जांच का अंतिम चरण है। दस्तावेज प्रस्तुत करना, जब्ती और वापसी से निपटने के लिए, आदेश 13 में पक्षों को मुद्दों को निपटाने से पहले या उससे पहले अपने संबंधित दलीलों का समर्थन करने वाले दस्तावेजी साक्ष्य की सभी मूल प्रतियां (कॉपीज) प्रदान करने की आवश्यकता होती है। इसलिए यह बिल्कुल स्पष्ट है कि न्यायालय जो अगला कदम उठाती है वह मुद्दों का निपटारा करना है, और कानूनी आधार पर मुकदमे के भविष्य का निर्धारण करना, जो हमें आदेश 14 पर लाता है।

आदेश 14: मुद्दों का निपटारा

पक्षों को विस्तार से सुनने और मामले के बारे में पर्याप्त जानकारी प्राप्त करने के बाद, न्यायालय इस आदेश के नियम 1 के तहत दिए गए मुद्दों को तय करने के लिए आगे बढ़ती है। मामले के तथ्यों के संबंध में कुछ आधारों पर पक्षों के बीच असहमति से एक मुद्दा उत्पन्न होता है। मुद्दों के निर्धारण के संबंध में ध्यान देने योग्य दो महत्वपूर्ण बिंदु हैं;

  1. किसी महत्वपूर्ण मुद्दे को तय न करना हानिकारक हो सकता है, जैसा कि मोनोरंजन पॉल बनाम नरेंद्र कुमार पॉल (1994) के मामले में देखा गया था।
  2. न्यायालय उन दलीलों के अनुसार मुद्दे तय करेगी जिनकी एक पक्ष ने पुष्टि की है जबकि दूसरे ने इनकार किया है, जैसा कि डॉ. ओम प्रकाश रावल बनाम श्री न्यायमूर्ति अमृत लाल बाहरी (1994) के मामले में दी गई राय थी।

आदेश 15: प्रथम सुनवाई में वाद का निस्तारण (डिस्पोजल)

मुद्दों का निर्धारण संहिता के आदेश 14 और 15 दोनों में विस्तारित है। आदेश 15 का सार नियम 1 में ही दिया गया है। नियम में यह प्रावधान है कि यदि मामले के संबंध में तथ्य या कानून के किसी भी प्रश्न पर पक्षकारों के बीच विवाद नहीं है, तो न्यायालय पहली ही सुनवाई में मुकदमे का निपटारा कर देगा और इस तरह फैसला सुना देगा।

आदेश 16: गवाहों को बुलाना और उनकी उपस्थिति

न्यायालय द्वारा पक्षों की जांच करने, मामले से संबंधित तथ्यों की खोज करने और पक्षों की दलीलों के आधार पर मुद्दों को तय करने के बाद गवाहों को सुनने की आवश्यकता होती है। यहां संहिता का आदेश 16 आता है जो गवाहों को बुलाने और उनकी उपस्थिति से संबंधित है। उसी प्रक्रिया का पालन करते हुए, जैसा कि न्यायालय ने पहले प्रतिवादी को बुलाते समय किया था, न्यायालय गवाहों को न्यायालय के सामने पेश होने के लिए सम्मन जारी करेगा, और चल रहे मामले में अपना पक्ष प्रस्तुत करने की अनुमति देगा। इसके अलावा, आदेश 16A उन गवाहों की उपस्थिति से संबंधित है जो जेल में बंद या हिरासत में हैं।

आदेश 17: स्थगन (एडजोर्नमेंट)

जैसे ही सुनवाई शुरू होती है, “स्थगन” की अवधारणा सामने आती है। स्थगन मुकदमे की सुनवाई की तारीख को स्थगित करने का प्रतीक है। आदेश 17 के नियम 1 के प्रावधान में कहा गया है कि मुकदमे की सुनवाई के समय किसी पक्ष को लगातार तीन बार से अधिक स्थगन नहीं दिया जाएगा। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि न्यायालय द्वारा स्थगन तभी दिया जाएगा जब सुनवाई की तारीख पर उपस्थित न होने के लिए पर्याप्त कारण दिखाया जाएगा। मुकदमे की सुनवाई संहिता के आदेश 17, 18 और 19 के अंतर्गत आती है।

आदेश 18: मुकदमे की सुनवाई और गवाहों की परीक्षा

स्थगन के बाद, न्यायालय मुकदमे की सुनवाई के लिए एक तारीख तय करती है जो हमें आदेश 18 पर लाती है। एक सिविल मामले की सुनवाई में, वादी को मुकदमे की सुनवाई शुरू करने का अधिकार है। इस आदेश के तहत बुलाए गए गवाहों से पूछताछ के लिए कमरे भी शामिल किए गए हैं।

आदेश 19: शपथ पत्र (एफिडेविट)

प्रत्येक सुनवाई में होने वाले तथ्यों या परीक्षण को साबित करने के लिए मुकदमे के पक्षकार न्यायालय में शपथपत्र दायर कर सकते हैं। यह हमें आदेश 19 पर लाता है जो शपथपत्रों के बारे में बात करता है। इस आदेश का नियम 3 केवल उन मामलों को निर्दिष्ट करता है जिन तक शपथपत्र सीमित होंगे।

आदेश 20: निर्णय और डिक्री

जैसा कि ऊपर बताया गया है, संपूर्ण सुनवाई प्रक्रिया के बाद निर्णय की घोषणा और डिक्री की मांग आती है। जबकि डिक्री पक्षों के अधिकार प्रदान करती है, निर्णय डिक्री के आधार पर न्यायाधीश द्वारा दी गई एक औपचारिक अभिव्यक्ति है। नियम 3 आदेश 20 और आदेश 20A के लागतों से संबंधित है और दिए गए प्रावधान के अनुसार प्रत्येक निर्णय पर हस्ताक्षर किए जाने चाहिए। 

आदेश 21: डिक्री और आदेशों का निष्पादन (एग्जिक्यूशन)

आदेश 21 महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न्यायालय द्वारा पारित आदेशों और डिक्री के निष्पादन से संबंधित है। डिक्री और आदेश दोनों के अर्थ पर इस लेख में पहले चर्चा की जा चुकी है। आदेश 21 को नीचे दिए गए अनुसार 6 भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  1. निष्पादन हेतु आवेदन एवं लागू की जाने वाली प्रक्रिया।
  2. फाँसी पर रोक।
  3. निष्पादन का तरीका।
  4. अचल संपत्ति और चल संपत्ति की बिक्री।
  5. दावों एवं आपत्तियों का निष्पादन।
  6. कब्जे का प्रतिरोध (रेजिस्टेंस) और वितरण

निष्कर्ष

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 का आदेश 1 से 21 अत्यधिक महत्व रखता है क्योंकि यह व्यक्ति को मार्गदर्शन देता है कि एक सिविल मामला कैसे और किस रास्ते से अपने गंतव्य (डेस्टिनेशन) तक पहुंचता है यानी एक मुकदमे में दो पक्षों के बीच विवाद को हल करना है। इस लेख में आदेशों को सरल बनाने का प्रयास किया गया है जिससे की वह त्वरित समझ आए और आसानी से याद रख सके।

 

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