कंपनी अधिनियम के तहत कॉर्पोरेट वेल उठाना

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9901
Companies Act 2013

यह लेख Abhijith S Kumar द्वारा लिखा गया है। इस लेख में एक कंपनी के कॉर्पोरेट वेल को उठाने के बारे में चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash के द्वारा किया गया है।

परिचय

कानूनी कल्पनाओं (लीगल फिक्शन) या फिक्शो ज्यूरिस एक ऐसा उपकरण है जिसके द्वारा कानून जानबूझकर चीजों की सच्चाई से दूर हो जाता है, चाहे इसके लिए कोई पर्याप्त कारण हो या नहीं। अर्थात्, कभी-कभी कानून को कुछ तथ्यों की पहचान कुछ ऐसी चीज़ों के रूप में करनी पड़ सकती है जो वास्तविक अभिव्यक्ति (मैनिफेस्टेशन) के विरुद्ध हो सकती हैं। ऐसी स्थितियों में, कानून फिक्शो ज्यूरिस या कानूनी कल्पनाओं पर टिका रहता है, जिससे वह सच्चाई से हट जाता है और कुछ तथ्य को सच मानता है। कॉर्पोरेट व्यक्तित्व (पर्सनेलिटी) एक ऐसी पहचान की गई कानूनी कल्पना है जिसके द्वारा एक कंपनी को उसके व्यक्तिगत सदस्यों के अलावा एक अलग पहचान दी जाती है। कंपनी, जैसा कि स्टेनली के मामले में वर्णित है, किसी सामान्य उद्देश्य या उद्देश्यों के लिए व्यक्तियों का एक संघ है। इस प्रकार यह वास्तव में पुरुष हैं जो गतिविधियों को अंजाम देने वाले संघ का निर्माण करते हैं। लेकिन कानून मुख्य रूप से कंपनी के सदस्यों की देयता (लायबिलिटी) को सीमित करने के लिए अपने सदस्यों से स्वतंत्र संघ के लिए उनके व्यक्तिगत व्यक्तित्व के साथ-साथ एक अलग व्यक्तित्व की पहचान करता है। इस प्रकार निगम एक कृत्रिम प्राणी (आर्टिफिशियल बीइंग) है, जो केवल कानून के चिंतन (कंटेंप्लेशन) में रहता है।

सॉलोमन बनाम सॉलोमन एंड कंपनी लिमिटेड के मामले में कंपनी की अलग कानूनी इकाई के इस विचार की पहचान की गई और इसे अच्छी तरह से स्थापित किया गया। अपने सदस्यों से स्वतंत्र, एक अलग इकाई को जोड़ने के अलावा कॉर्पोरेट व्यक्तित्व का सिद्धांत, अपने सदस्यों की देयता को भी सीमित करता है, सतत उत्तराधिकार (परपेचुअल सक्सेशन) प्रदान करता है, शेयरों की हस्तांतरणीयता (ट्रांसफरेबिलिटी) की अनुमति देता है, एक आम मुहर रखने में सक्षम बनाता है, कंपनी को लेनदेन में प्रवेश करने का अधिकार देता है और इसके नाम पर संपत्ति की खरीद, पकड़, और विनिवेश और कंपनी के नाम पर मुकदमा दायर करने और कंपनी के खिलाफ मुकदमा होने के लिए भी सक्षम बनाता है।

लेकिन निगमन (इनकॉरपोरेशन) के अपने नुकसान भी हैं, जिनमें से प्रमुख कॉर्पोरेट वेल उठाने का उदाहरण है। सॉलोमन द्वारा प्रदत्त विशेषाधिकार (प्रिविलेज) वह है जो कंपनी को सीमित देयता का आनंद लेने में सक्षम बनाता है जबकि स्पेक्ट्रम के दूसरे छोर पर, कानून सीमित देयता सिद्धांत से निपट सकता है और कंपनी के दायित्व के लिए कंपनी चलाने वाले लोगों को कुछ मामलों में कंपनी के दायित्व के लिए उत्तरदायी बना सकता है। कॉर्पोरेट वेल उठाने के सिद्धांत की स्वीकृति के माध्यम से, इसकी एक व्यापक समझ प्राप्त की जा सकती है।

इस लेख का उद्देश्य कानून की इस अवधारणा का विश्लेषण करना है। यह लेख आम कानून के तहत विकास और सॉलोमन के नियम के साथ संघर्ष और उसके बाद के निर्णयों का पता लगाकर,  अवधारणा और इसके विकास पर चर्चा करता है। भारतीय न्यायशास्त्र (ज्यूरिस्प्रूडेंस) के तहत विभिन्न आधारों की स्वीकृति पर विशेष जोर देने के साथ क़ानून और न्यायिक व्याख्याओं के तहत पहचाने गए वेल उठाने के उदाहरणों को भी इस लेख मे देखा गया है।

कॉर्पोरेट वेल उठाना– अवधारणा

कॉर्पोरेट वेल उस काल्पनिक बाधा को दिया गया शब्द है जो कंपनी को उन लोगों से अलग करता है जो इसे निर्देशित करते हैं और जो इसके मालिक हैं। निगमन का मुख्य लाभ, निश्चित रूप से, कंपनी की अलग कानूनी इकाई और सीमित देयता है। लेकिन वास्तव में, यह वह व्यक्ति है जो संघ का गठन करता है, जो निगमित निगम की ओर से व्यवसाय करता है। अर्थात्, हालांकि कानून की कल्पना में एक निगम एक अलग इकाई है, लेकिन वास्तव में, यह व्यक्तियों का एक संघ है जो वास्तव में कॉर्पोरेट व्यक्तित्व के लाभार्थी हैं। इस प्रकार निगमन पर कानूनी व्यक्तित्व का श्रेय कंपनियों को दिया गया विशेषाधिकार है।

लेकिन ऐसे उदाहरण सामने आ सकते हैं, जहां इसकी छाया में धोखाधड़ी या अवैध कार्य किए जाते हैं। चूंकि कृत्रिम व्यक्ति कुछ भी अवैध या कपटपूर्ण करने में असमर्थ हैं, इसलिए वास्तव में दोषी व्यक्तियों की पहचान करने के लिए कॉर्पोरेट व्यक्तित्व के मुखौटे को हटाना होता है। यह सिद्धांत जो सॉलोमन के सामान्य नियम के विपरीत जाता है, ‘कॉरपोरेट वेल उठाने’ के रूप में जाना जाता है। इस प्रकार कॉर्पोरेट वेल के पीछे की वास्तविकताओं को जानने के लिए कॉर्पोरेट वेल उठाने का सहारा लिया जाता है। हालांकि यह सॉलोमन में दिए गए नियम के विपरीत है, यह इसे अमान्य के रूप में प्रस्तुत नहीं करता है। सिद्धांत कॉर्पोरेट पहचान के अस्तित्व को मानता है, जिसे सामान्य रूप से सदस्यों के हितों के लिए या सार्वजनिक हित में उन लोगों की पहचान करने और उन पर दायित्व लागू करने के लिए उठाया जा सकता है जो उन्हें दिए गए विशेषाधिकार का दुरुपयोग करते हैं। जहां न्यायपालिका या विधायिका ने तय किया है कि कंपनी और सदस्यों के व्यक्तित्व का अलगाव (आइसोलेशन) बनाए रखा जाना है, इस प्रकार निगमन का वेल हटा दिया जाता है।

इस प्रकार कॉर्पोरेट वेल का भेदन (या उठाना) कंपनी के ढांचे से परे देखने की संभावना को संदर्भित करता है ताकि सदस्यों को उत्तरदायी बनाया जा सके, जी की सामान्य नियम का अपवाद  है कि सदस्यों को आम तौर पर कॉर्पोरेट कानून द्वारा संरक्षित किया जाता हैं।

अवधारणा का विकास

सॉलोमन के फैसले के बाद से, अदालतों ने कई स्थितियों का सामना किया है, जिसमें उन्हें अलग कानूनी व्यक्ति के सिद्धांत को लागू करने के लिए बुलाया गया था, जिसे अलग-अलग स्थितियों में देखा जा सकता है। हालांकि एक सामान्य नियम के रूप में नहीं, लेकिन अदालतें सॉलोमन में जो कुछ भी निर्धारित किया गया था, विभिन्न आधारों पर उसके विपरीत का सहारा ले रही थीं, जब भी उन्हें ऐसा करना उचित लगता था या जब भी विशेष परिस्थितियां इसकी मांग करती थी। इस प्रकार यह ‘कॉर्पोरेट वेल उठाने’ की अवधारणा की पहचान और स्वीकृति के तथ्य के संबंध में संदेह के लिए कोई जगह नहीं छोड़ता है, हालांकि एक अवधारणा को मान्यता देना, जो किसी कानून के खिलाफ जाती है या जो कानून के लिए विरोधी है जैसा कि हाउस ऑफ लॉर्ड्स द्वारा प्रतिपादित (एक्सपाउंडेड) किया गया है, इसने कानूनी व्यवस्था और न्यायशास्त्र में कई अन्य विरोधाभासों और धुंध के लिए जगह बनाई है।

कॉरपोरेट वेल उठाने के सिद्धांत को अपनाने का सहारा लेते हुए अदालतों द्वारा दिए गए स्पष्टीकरणों ने अक्सर कई मुद्दों को जन्म दिया है। उन उदाहरणों, जिनके तहत अदालतें अलग कॉर्पोरेट इकाई की अवहेलना करते हुए कॉर्पोरेट वेल उठा सकती हैं, के लिए स्पष्टीकरण प्रदान करने में कई प्रयास किए गए है। लेकिन इनमें से कोई भी वास्तव में संतोषजनक नहीं था। विभिन्न उदाहरणों को श्रेणियों के तहत वर्गीकृत करने का प्रयास किया गया है जैसे कि जहां धोखाधड़ी है, जहां रोजगार के मुद्दे मौजूद हैं, जहां अनुचित मुद्दे मौजूद हैं, जब कंपनी केवल एक दिखावा या बहाना है, या जहां कंपनियों का एक समूह एकल आर्थिक इकाई के रूप में कार्य करता है और इन उदाहरणों के तहत, अदालतें यह देखने के लिए वेल उठा सकती हैं कि वास्तविकताएं क्या हैं।

1990 में, ओटोलेघी ने ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की प्रवृत्ति का विश्लेषण करने के दृष्टिकोण के आधार पर विभिन्न उदाहरणों को श्रेणियों में वर्गीकृत करने का सहारा लिया था। जहां सदस्य की जानकारी प्राप्त करने के लिए निगमन का वेल उठा दिया जाता है, वही ‘झांकना’ शीर्ष के अंतर्गत आता है। कुछ समय पर, कंपनी के सदस्यों पर दायित्व तय करने के लिए सीमित देयता की अवधारणा की अवहेलना करने के लिए वेल को ‘घुसना (पेनेट्रेटेड)’ पड़ता है। ‘विस्तार (एक्सटेंडिंग)’ का सहारा लिया जाता है जहां कंपनियों के एक समूह को एक कानूनी इकाई के रूप में माना जाता है और ‘अज्ञानता’ को कंपनी की गैर-मान्यता के लिए संदर्भित किया जाता है।

‘कॉर्पोरेट वेल उठाने’ की अवधारणा और उदाहरणों के विकास को, एलन और जॉन द्वारा तीन चरणों के माध्यम से खोजा गया है। ‘शास्त्रीय (क्लासिकल) वेल उठाने’ (1897-1966) ने अदालतों को सॉलोमन अनुपात पर भारी पड़ते देखा है। इस अवधि में सॉलोमन में हाउस ऑफ लॉर्ड्स का निर्णय हावी रहा, जिससे वेल उठाने पर प्रतिबंध लगा था। लेकिन धीरे-धीरे, अदालतों ने निगमन का वेल उठाना शुरू कर दिया ताकि कुछ निश्चित असाधारण परिस्थितियों से निपटा जा सके। इस संबंध में पहले के फैसलों में से एक डेमलर कंपनी लिमिटेड बनाम कॉन्टिनेंटल टायर एंड रबर कंपनी (ग्रेट ब्रिटेन) लिमिटेड था, जिसमें अदालत ने यह तय करने के लिए वेल हटा दिया कि विचाराधीन कंपनी ‘दुश्मन’ है या नहीं। गिलफोर्ड मोटर कंपनी लिमिटेड बनाम हॉर्न, रे बगले प्रेस और जॉन बनाम लिपमैन में निर्णयों का पालन किया गया था, जो कॉर्पोरेट वेल उठाने के आधार के रूप में अग्रभाग (फैसेड) और दिखावे की पहचान करते थे। यह ध्यान देने योग्य है कि जब अदालतों ने उदाहरणों पर वेल उठाया, तब भी इसका आमतौर पर सहारा नहीं लिया गया था और केवल असाधारण मामलों में ही ऐसा किया गया था। अदालतें सॉलोमन के फैसले पर बहुत भरोसा कर रही थीं और सीमित देयता सिद्धांत को तब तक नहीं छोड़ना चाहती थीं, जब तक कि उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर न किया जाए।

जबकि, 1960 के दशक तक, अदालतें तेजी से खुद को पुरानी मिसाल से मुक्त करने की प्रवृत्ति का प्रदर्शन कर रही थीं, जिसे उन्होंने तेजी से अन्यायपूर्ण देखा। ‘इंटरवेंशनिस्ट इयर्स’ (1966-1989) के रूप में पहचाने जाने वाले इस चरण में संभवत: अदालतों द्वारा कंपनियों के अलग व्यक्तित्व को एक प्रारंभिक बातचीत की स्थिति के रूप में मानने के लिए अदालतों द्वारा किए गए हस्तक्षेप की उच्चतम दर देखी गई, जिसे न्याय के हित में पलटा जा सकता है। लिटलवुड्स मेल ऑर्डर स्टोर्स बनाम आईआरसी के फैसले पर भरोसा करते हुए यह कहा गया कि अदालतें न्याय सुनिश्चित करने के लिए सॉलोमन नियम से दूर हो सकती हैं और इस कारण से, अदालतें वेल से परे भी देख सकती हैं, क्योंकि अदालतें अक्सर कॉर्पोरेट वेल को उठाने का सहारा लेती हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि इससे कॉर्पोरेट व्यक्तित्व से संबंधित कानून के बारे में अनिश्चितता पैदा हुई है।

अपील की अदालत के एडम्स बनाम केप इंडस्ट्रीज पीएलसी के 1990 के फैसले ने आखिरकार अनिश्चितता को शांत कर दिया था। इसने शास्त्रीय और हस्तक्षेपवादी (इंटरवेंशनिस्ट) दृष्टिकोण के बीच विवाद पर चर्चा की और शास्त्रीय दृष्टिकोण के पक्ष में निष्कर्ष निकाला। ‘बैक टू बेसिक्स’ (1989-वर्तमान) के रूप में पहचाने जाने वाले इस चरण ने शास्त्रीय दृष्टिकोण से यू-टर्न लिया और कहा कि सॉलोमन नियम की केवल इस आधार पर अवहेलना नहीं की जा सकती है कि न्याय की आवश्यकता है। क़ानून या अनुबंध (कॉन्ट्रेक्ट) के तहत या न्यायिक व्याख्याओं के तहत पहचाने जाने वाले आधारों की पहचान भी की जा सकती है जो वेल उठाने के लिए अच्छी तरह से तय किया गया हैं; लेकिन इसे एक सामान्य नियम के रूप में नहीं देखा जा सकता है। वेल उठाने का नियम सख्ती से ‘जब आप इसे देखते हैं तो आप इसे जानते हैं’ मामलों पर लागू होता है। इसके अलावा, वूल्फसन बनाम स्ट्रैथक्लाइड रीजनल काउंसिल ने अकेले विशेष परिस्थितियों में और जहां मकसद अच्छी तरह से स्थापित है, नियम के आवेदन पर जोर दिया था।

इस प्रकार, जहां अपील की अदालत कॉर्पोरेट संरचना की कानूनी प्रभावकारिता (एफिकेसी) के बावजूद न्याय प्राप्त करने के लिए वेल उठती है, वहीं इसके विपरीत एडम्स ने अदालतों की वेल उठाने की क्षमता को काफी कम कर दिया था।

कॉर्पोरेट वेल उठाने के उदाहरण

जिन परिस्थितियों में अदालतें कॉर्पोरेट वेल उठा सकती हैं, उन्हें आम तौर पर निम्नलिखित शीर्षों के तहत वर्गीकृत किया जा सकता है: (1) वैधानिक प्रावधानों के तहत, (2) न्यायिक व्याख्याओं के तहत।

1. वैधानिक (स्टेट्यूट) प्रावधानों के तहत

कॉर्पोरेट वेल को कुछ उदाहरणों के तहत उठाया जा सकता है और इनमें से कुछ को स्पष्ट रूप से वैधानिक प्रावधानों के तहत दिया गया है, जिससे अदालत ऐसा कर सके। कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड बनाम जी.सी. ओडुसुमथ के मामले ने यह नियम निर्धारित किया कि अदालतें कॉर्पोरेट वेल तभी उठा सकती हैं जब उसके लिए प्रावधान क़ानून की किताब में स्पष्ट रूप से प्रदान किए गए हों या केवल तभी जब कोई अनिवार्य कारण हों। वेल उठाने का शास्त्रीय दृष्टिकोण भी इसी दृष्टिकोण के अनुरूप है। इस संदर्भ में ऐसे प्रावधानों की समझ प्रासंगिकता प्राप्त करती है।

कंपनी अधिनियम, 2013 निम्नलिखित प्रावधानों का प्रावधान करता है जो अदालतों को कॉर्पोरेट वेल उठाने में सक्षम बनाते हैं।

अक्सर, अदालतें दायित्व तय करने और कंपनी के सदस्यों या निदेशकों को दंडित करने के लिए कॉर्पोरेट वेल हटाती हैं। अधिनियम की धारा 7(7) ऐसा ही एक प्रावधान प्रदान करती है। जहां किसी कंपनी का निगमन झूठी सूचना प्रस्तुत करके किया जाता है, अदालत वहा देयता तय कर सकती है और इस उद्देश्य के लिए वेल उठाया जा सकता है।

धारा 251(1) भी एक दंडात्मक प्रावधान है। अधिनियम, कंपनियों के रजिस्ट्रार से कंपनी का नाम हटाने के लिए एक आवेदन जमा करने के लिए कहता है। इस प्रकार, कोई भी जो कपटपूर्ण आवेदन करता है, इस धारा के तहत उसकी देयता तय की जाती है।

अधिनियम की धारा 34 और धारा 35 भी अदालतों को देयता तय करने के लिए निगमन का वेल उठाने में सक्षम बनाती है। जब प्रॉस्पेक्टस में गलत बयानी (मिसरिप्रेजेंटेशन) शामिल होती है, तो अदालत गलत तरीके से प्रस्तुत करने वाले पर प्रतिपूरक (कंपनसेटरी) दायित्व लगा सकती है।

कंपनी अधिनियम में प्रावधान है कि जनता को शेयर जारी करने के मामले में, कंपनी को प्रॉस्पेक्टस जारी करने के 30 दिनों में न्यूनतम सदस्यता प्राप्त नहीं होने की स्थिति में, कंपनी आवेदन राशि वापस करने के लिए बाध्य है। धारा 39, 15 दिनों की समयावधि के भीतर ऐसा करने में विफल रहने पर जुर्माना लगाती है।

ऐसे उदाहरण हो सकते हैं जहां जांचकर्ताओं या संबंधित प्राधिकरण या सरकार को किसी कंपनी के मामलों का मूल्यांकन करने के उद्देश्य से देखना पड़ सकता है कि क्या यह एक दिखावा है और इसके कॉर्पोरेट वेल के भीतर क्या वास्तविकताएं हैं। धारा 216 इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए समर्थकारी (इनेबलर) प्रावधान है। इसे प्रकट करने के लिए, अदालतें वेल को हटा सकती हैं और इसकी रक्षा कर सकती है। अधिनियम की धारा 219 भी यही कार्य करती है।

सदस्यों द्वारा कपटपूर्ण आचरण का सहारा लेने की संभावना विशेष रूप से किसी कंपनी के समापन के दौरान अधिक होती है। धारा 339 के तहत इसकी निंदा की जाती है। इसकी संभावनाओं का मूल्यांकन करने के लिए, वेल उठाया जा सकता है।

अधिनियम की धारा 464 कंपनी के सदस्यों और निदेशकों पर तब दंडात्मक दायित्व लागू करती है जब निगमन की आवश्यकताओं का अनुपालन नहीं किया जाता है। निगमन अपने साथ अतिरिक्त विशेषाधिकार लाता है और इसलिए कानून वैधानिक अनुपालन के रूप में अपने आनंद पर पूर्व शर्त लगाता है, जिसका पालन न करने पर देयता आकर्षित हो सकती है। इस प्रकार इसके प्रकट होने के तथ्य की जांच की जा सकती है और इस उद्देश्य के लिए वेल उठाया जा सकता है।

कंपनी अधिनियम, 2013 के अलावा, आयकर अधिनियम और विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (फॉरेन एक्सचेंज रेगुलेशन एक्ट), 1973 के कुछ प्रावधान भी कॉर्पोरेट वेल उठाने में सक्षम बनाते हैं।

2. न्यायिक व्याख्या के तहत

एक अवधारणा के रूप में, कॉर्पोरेट वेल का सिद्धांत कॉमन लॉ के तहत सॉलोमन के बाद विकसित हुआ था। शास्त्रीय दृष्टिकोण ने उदाहरणों की कुछ श्रेणियों की पहचान की थी, जिसके तहत निगमन का वेल उठाया जा सकता है। इसमें एजेंसी तर्क, एकल आर्थिक इकाई तर्क, बहाना या दिखावा, अनुचितता और दुश्मन का निर्धारण शामिल है। यह उल्लेखनीय है कि भारत में भी इसकी पहचान की गई थी और इसे स्वीकार भी किया गया था।

सामान्य कानून के तहत पहचाने गए उदाहरण और भारतीय कानून के तहत उसी की मान्यता

जोन्स बनाम लिपमैन, एक उत्कृष्ट उदाहरण है जहां धोखाधड़ी या अनुचित आचरण के आधार पर वेल उठाया गया था। इस मामले में, A ने B के साथ एक बिक्री का समझौता किया। लेकिन इसके पूरा होने से पहले, A ने संपत्ति को उसके द्वारा बनाई गई कंपनी को स्थानांतरित कर दिया, जिसमें वह और उसका क्लर्क एकमात्र निदेशक, सह सदस्य थे। इसके कारण एक मुकदमा दर्ज हुआ, जिसमें अदालत को पता चला कि उसकी कार्रवाई में द्वेष जुड़ा हुआ था, जिससे उसने विशिष्ट प्रदर्शन के दावों से बचने की कोशिश की थी।

रे: आर.जी फिल्म्स लिमिटेड, के मामले ने एजेंसी के तर्क की पहचान की थी। इस मामले में, एक अमेरिकी प्रोडक्शन कंपनी ने एक ब्रिटिश कंपनी के बैनर तले भारत में एक फिल्म बनाने का फैसला किया था। जब ब्रिटिश प्रोडक्शन फिल्म के रूप में इसके प्रमाणन के लिए आवेदन किया गया था, तो आवेदन को अस्वीकार कर दिया गया था। इस उदाहरण में अदालत ने मामले की पेचीदगियों को समझने के लिए कॉरपोरेट वेल हटाने के सिद्धांत को लागू किया। अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि ब्रिटिश कंपनी केवल एक एजेंट थी क्योंकि अधिकांश निवेश अमेरिकी कंपनी से आया था और इस प्रकार यह मानते हुए कि प्रमाणन प्राधिकरण द्वारा लिया गया स्टैंड सही था।

कंपनी के एक कृत्रिम व्यक्ति होने के नाते, उसके दुश्मन या दोस्त नहीं हो सकते है। लेकिन युद्ध के मामलों में, यह देखने के लिए वेल उठाना आवश्यक हो सकता है कि कंपनी की कार्रवाई वास्तव में मित्र या दुश्मन की है या नहीं। दुश्मन के निर्धारण का यह सिद्धांत डेमलर कंपनी लिमिटेड बनाम कॉन्टिनेंटल टायर एंड रबर कंपनी में स्थापित हुआ था। कोनोर्स ब्रदर्स बनाम कोनोर्स के मामले में, अदालत ने पाया कि वह निदेशक जिसके पास कंपनी का वास्तविक नियंत्रण था, जर्मनी का निवासी था जो एक विदेशी देश था, और कंपनी की कार्यवाही की अनुमति देना एक तरह से दुश्मन देश को पैसा देना होगा। इस प्रकार कंपनी को दुश्मन माना गया था।

बहाना या दिखावा उस स्थिति को कहते हैं जहां चेहरे पर जो दिखता है वह हकीकत नहीं होता, बल्कि इसके विपरीत होता है। सुभ्रा मुखर्जी बनाम भारत कोकिंग कोल लिमिटेड में एक निजी कोयला कंपनी के संबंध में एक मामला शामिल था। कंपनी के राष्ट्रीयकरण (नेशनलाइजेशन) की सूचना मिलने पर कंपनी ने अपनी की अचल संपत्ति निदेशकों की पत्नियों को हस्तांतरित कर दी थी। निगमन का वेल उठाने पर अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि लेनदेन कंपनी के हित में नहीं, बल्कि निदेशकों के हित में किया गया था और इसलिए यह एक दिखावा है।

कॉर्पोरेट कानून के तहत सहायक कंपनी होना वर्जित नहीं है। सहायक कंपनी पर होल्डिंग कंपनी का पूर्ण नियंत्रण हो भी सकता है और नहीं भी। इस तथ्य के बावजूद, कानून होल्डिंग और सहायक कंपनी दोनों के लिए अलग कानूनी पहचान करता है। लेकिन कई बार वेल उठाने पर पता चला कि ऐसे भी उदाहरण हो सकते हैं जहां दोनों कंपनियों को एक ही आर्थिक इकाई के रूप में पहचाना जा सकता है।

मर्चेंडाइज ट्रांसपोर्ट लिमिटेड बनाम ब्रिटिश ट्रांसपोर्ट कम्युनिकेशंस के मामले में, एक ट्रांसपोर्ट कंपनी ने लाइसेंस के लिए आवेदन किया और इसे अस्वीकार करने पर, उन्होंने इसकी सहायक कंपनी के नाम पर आवेदन किया। अदालत ने पाया कि सहायक कंपनी ने कोई व्यवसाय नहीं किया और न ही उसकी कोई आय थी। इसे केवल लाइसेंस प्राप्त करने के लिए बनाया गया था और इसलिए दोनों कंपनियां एक समान उद्देश्य के लिए काम कर रही थीं। इस प्रकार उन्हें एक एकल आर्थिक इकाई के रूप में पहचाना गया। जेबी एक्सपोर्ट्स लिमिटेड बनाम बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड के मामले ने भी इसी सिद्धांत की पहचान की थी।

3. भारतीय न्यायशास्त्र के तहत विकसित अन्य आधार

भारतीय न्यायशास्त्र के तहत विकसित किए गए वे उदाहरण निम्नलिखित हैं जो अदालतों को कॉर्पोरेट वेल उठाने में सक्षम बनाते हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस सिद्धांत को Lifting of Corporate Veil Under the Companies Act बहुत पहले स्वीकार किया था। जबकि एलआईसी बनाम एस्कॉर्ट्स लिमिटेड का मामला शास्त्रीय दृष्टिकोण के अनुरूप था, यूपी बनाम रेणुसागर पावर कंपनी का मामला हस्तक्षेपवादी दृष्टिकोण के पक्ष में गया। लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि हालांकि रेणुसागर में लिए गए निर्णय को खारिज नहीं किया गया है, लेकिन यह पालन करने के लिए नियम नहीं है। शीर्ष अदालत ने समय-समय पर यह दोहराया है कि कॉरपोरेट से वेल केवल असाधारण परिस्थितियों में ही हटाया जा सकता है और इसे सामान्य नियम के रूप में नहीं माना जा सकता है।

इसके बाद उल्लिखित विशेष रूप से पहचाने गए आधार, शास्त्रीय विचार के खिलाफ नहीं जाते हैं। यह कथन कि वही शास्त्रीय विचार के विपरीत जाता है, एक अस्थिर (इंस्टेबल) कथन होगा। वे अलग-अलग परिस्थितियों में विकसित हुए थे, लेकिन अनिवार्य रूप से पहचाने गए शास्त्रीय शीर्षों के अंतर्गत आते थे, जिससे वे उसी के उपसमुच्चय (सबसेट) बनते थे।

दिनशॉ मानेकजी पेटिट के कानूनी मामले में, एक धनी व्यक्ति, जो बड़े लाभांश और आय से ब्याज का आनंद ले रहा था, ने चार कंपनियों का गठन किया और अपने सभी हितों और लाभांश को कंपनियों को हस्तांतरित कर दिया। कंपनियों के पास कोई अन्य व्यवसाय नहीं था और निर्धारिती को किए गए सभी निवेशों को नकली ऋणों के माध्यम से वापस स्थानांतरित कर दिया जाता था। अनिवार्य रूप से बहाना और अनुचितता के तहत आते हुए, अदालत ने वेल उठाने पर माना की, करों से बचने के लिए ऐसा किया गया था।

एसोसिएटेड रबर इंडस्ट्रीज लिमिटेड में कार्यरत कर्मचारी, भावनगर बनाम द एसोसिएटेड रबर इंडस्ट्रीज लिमिटेड, भावनगर के मामले में, कंपनी ने एक पूर्ण नियंत्रित सहायक कंपनी बनाई जिसने कोई व्यवसाय नहीं किया, लेकिन प्रमुख कंपनी से लाभांश प्राप्त किया। न्यायालय ने कॉरपोरेट वेल हटाया और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि यह कार्रवाई लाभांश को विभाजित करने के लिए की गई थी ताकि कर्मचारियों को कम बोनस राशि दी जा सके। यह एक कल्याणकारी कानून से बचने के लिए एक कार्य के रूप में पाया गया था और इसे निगमन का वेल उठाने के लिए एक वैध आधार के रूप में पहचाना गया था।

आर्थिक अपराधों के मामलों में, एक अदालत कॉर्पोरेट इकाई से वेल उठाने और कानूनी पहलू के पीछे की आर्थिक वास्तविकताओं के संबंध में भुगतान करने का हकदार है। शांतनु रे बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में, कंपनी पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क और नमक अधिनियम (सेंट्रल एक्साइज एंड साल्ट एक्ट) की धारा 11 के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। अदालत ने कहा कि यह जानने के लिए कॉर्पोरेट वेल हटाया जा सकता है कि कौन सा निदेशक धोखाधड़ी, छुपाने या जानबूझकर गलत बयानी या तथ्यों को छिपाने के कारण उत्पाद शुल्क की चोरी से संबंधित था।

न्यायालय की अवमानना ​​जैसा कि ज्योति लिमिटेड बनाम कंवलजीत कौर भसीन में पहचाना गया, कॉर्पोरेट वेल उठाने के लिए एक और पहचाना गया आधार है। इस मामले में, दो भागीदारों की एक फर्म संपत्ति बेचने के लिए सहमत हुई, जो बाद के चरण में रद्द हो गई। इसके बाद मुकदमेबाजी हुई जिसमें अदालत ने एक निषेधाज्ञा (इनजंक्शन) आदेश दिया जिसमें संपत्ति के संबंध में सभी प्रकार के लेन-देन पर रोक लगाई गई थी। लेकिन कंपनी ने आगे बढ़कर एक निजी कंपनी को संपत्ति बेच दी। यह माना गया कि कॉर्पोरेट वेल उठाने पर, यह समझा जा सकता है कि कंपनी को केवल उत्तरदाताओं द्वारा प्रचारित किया गया था और इसलिए कंपनी के हित केवल दो लोगो के थे। इस प्रकार बिक्री अदालत की अवमानना ​​थी और सदस्यों को उत्तरदायी बनाया गया था।

निष्कर्ष

जब भी किसी कंपनी के सदस्य किसी भी वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं या कंपनी के ऊपर कॉर्पोरेट वेल की आड़ में कोई गैर-वांछनीय (नॉन डिजायरेबल) गतिविधियों को अंजाम देते हैं, जिससे उन्हें दिए गए विशेषाधिकार का दुरुपयोग होता है, तो अदालतें वेल से परे देखने के हकदार हैं, और यह ही कॉर्पोरेट वेल उठाने के रूप में जाना जाता है। लेकिन यह एक सामान्य नियम नहीं है और इसे केवल असाधारण परिस्थितियों में ही लागू किया जाना चाहिए। यह उन उदाहरणों के लिए रास्ता छोड़ देता है जिनके तहत इसे पहचाना जा सकता है। सामान्य कानून के माध्यम से विकसित, पहचाने गए आधार- बहाना या दिखावा, अनुचितता, एकल आर्थिक इकाई तर्क, करों की चोरी, कल्याणकारी कानून से बचाव आदि है। यह ध्यान देने योग्य है कि जो महत्वपूर्ण है वह मामले की प्रकृति है। जैसा कि यह एक असाधारण नियम है, इसके आवेदन से पहले जांच का मानक उच्च है। अंत में, परीक्षण यह है कि क्या उदाहरण विधियों के भीतर स्पष्ट हैं या क्या उन्हें शास्त्रीय दृष्टिकोण के तहत पहचाना जाता है या वे उसी के अंतर्गत आते हैं।

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