हिंदू कानून के तहत एक कर्ता की शक्ति और स्थिति

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Hindu Law
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यह लेख ओडिशा के केआईआईटी स्कूल ऑफ लॉ के Arijit Mishra ने लिखा है। यह लेख हिंदू कानून के तहत एक कर्ता की शक्ति और स्थिति के बारे में बात करता है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

संयुक्त हिंदू परिवार एक पितृसत्तात्मक निकाय (पेट्रियार्कल बॉडी) है, जहा परिवार के मुखिया को कर्ता कहा जाता है। कर्ता परिवार का सबसे वरिष्ठ पुरुष सदस्य है जो परिवार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है और परिवार की ओर से कार्य करता है। कर्ता और परिवार के अन्य सदस्यों के बीच एक भरोसेमंद संबंध है क्योंकि प्रत्येक परिवार को एक मुखिया सदस्य की आवश्यकता होती है जो संयुक्त हिंदू परिवार में नाबालिग सदस्यों और महिलाओं के कल्याण की देखभाल कर सके। संयुक्त हिंदू परिवार में कर्ता का स्थान अद्वितीय है। कर्ता पूरे परिवार और उसकी संपत्ति का ख्याल रखता है और कर्ता द्वारा दिए गए निर्णय का हिंदू संयुक्त परिवार के सदस्यों द्वारा पालन किया जाना अनिवार्य है। हिंदू संयुक्त परिवार में कोई भी कर्ता के बराबर नहीं है। एक कर्ता की शक्तियाँ और स्थिति हिंदू संयुक्त परिवार के किसी भी सदस्य की तुलना में व्यापक है। संयुक्त परिवार के अन्य सदस्यों में किसी की तुलना कर्ता से नहीं की जा सकती।

कर्ता कौन हो सकता है?

सबसे वरिष्ठ पुरुष सदस्य

सबसे वरिष्ठ पुरुष सदस्य कर्ता बनने का हकदार है और यह उसका अधिकार है। कर्ता हमेशा परिवार के सदस्यों से होता है; कोई बाहरी या अजनबी कर्ता नहीं बन सकता। यदि परिवार का सबसे वरिष्ठ पुरुष सदस्य जीवित है तो वह कर्ता होगा, यदि उसकी मृत्यु हो जाती है तो परिवार का दूसरा सबसे वरिष्ठ सदस्य कर्ता का कार्यभार संभालता है। कर्ता सभी सहदायिकों (कोपार्सनर) की सहमति से अपना पद ग्रहण करता है।

कनिष्ठ (जूनियर) पुरुष सदस्य

यदि सहदायिक सहमत हैं, तो एक कनिष्ठ भी परिवार का कर्ता बन सकता है। सहदायिकों के साथ समझौता करके, एक कनिष्ठ पुरुष सदस्य परिवार का कर्ता हो सकता है।

कर्ता के रूप में महिला सदस्य

धर्मशास्त्र के अनुसार यदि किसी परिवार में पुरुष सदस्य की अनुपस्थिति है तो उस स्थिति में महिला कर्ता के रूप में कार्य कर सकती है। यदि पुरुष सदस्य मौजूद हैं लेकिन वे नाबालिग हैं, तो उस समय भी महिलाएं कर्ता के रूप में कार्य कर सकती हैं।

कर्ता की विशेषताएं

एक कर्ता की विशेषताएं हैं:

  • कर्ता की स्थिति अद्वितीय है (सुई जेनेरिस)।  उनकी स्थिति स्वतंत्र है और परिवार के किसी भी सदस्यों की उनके साथ तुलना नहीं की जा सकती है।
  • उसके पास असीमित शक्ति है अगर वह अन्य सदस्यों की ओर से कार्य करता है, तो भी उसे भागीदार या एजेंट के रूप में नहीं माना जा सकता है।
  • वह परिवार के सभी मामलों को नियंत्रित करता है और उसके पास व्यापक शक्तियाँ होती हैं।
  • वह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं है। इस नियम का एकमात्र अपवाद (एक्सेप्शन) है, धोखाधड़ी, हेराफेरी या रूपांतरण (कन्वर्जन) के मामले में, उसे जिम्मेदार ठहराया जाता है।
  • वह निवेश, बचत या किफायत करने के लिए बाध्य नहीं है। उसके पास अपनी इच्छानुसार संसाधनों का उपयोग करने की शक्ति है, जब तक कि वह ऊपर बताए हुए आरोपों के लिए जिम्मेदार न हो।
  • वह संयुक्त संपत्ति से उत्पन्न आय को परिवार के सदस्यों के बीच समान रूप से विभाजित करने के लिए बाध्य नहीं है। वह एक दूसरे के साथ भेदभाव कर सकता है और निष्पक्ष होने के लिए बाध्य नहीं है। केवल एक चीज यह है कि उसे सभी को भुगतान करना चाहिए ताकि वे कुछ बुनियादी आवश्यकताओं जैसे भोजन, वस्त्र, शिक्षा, आश्रय आदि का लाभ उठा सकें।

एक कर्ता की शक्तियां

कर्ता की शक्तियाँ निम्नलिखित हैं:

  • प्रबंधन (मैनेजमेंट) की शक्तियां

कर्ता की प्रबंधन की शक्ति निरपेक्ष (एब्सोल्यूट) है।  कोई भी कर्ता के कर्तव्यों पर सवाल नहीं उठा सकता है, जैसे वह संपत्ति, परिवार, व्यवसाय का प्रबंधन या कुप्रबंधन किसी भी तरह से कर सकता है। कर्ता किसी भी सदस्य को संपत्ति के रखरखाव और कब्जे से इनकार नहीं कर सकता। सकारात्मक विफलताओं के लिए कर्ता जिम्मेदार नहीं है।

  • आय या पारिश्रमिक (रिम्यूनरेशन) और व्यय (एक्सपेंडिचर) के अधिकार

संयुक्त हिंदू परिवार की कुल संपत्ति की आय कर्ता को दी जानी चाहिए। फिर यह कर्ता की जिम्मेदारी है कि वह सदस्यों को उनकी जरूरतों की पूर्ति के लिए धन आवंटित करे। कर्ता धन के व्यय को नियंत्रित करता है। उसकी शक्ति का दायरा केवल परिवार के उद्देश्यों जैसे प्रबंधन, भरण पोषण, विवाह, शिक्षा आदि पर धन को खर्च करना है।

  • संयुक्त परिवार का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार

कर्ता कानूनी, धार्मिक और सामाजिक मामलों में परिवार का प्रतिनिधित्व करता है। कर्ता के कार्य और निर्णय सदस्यों के लिए बाध्यकारी होते हैं। कर्ता परिवार की ओर से कोई भी लेन-देन कर सकता है।

  • समझौता करने का अधिकार

कर्ता के पास प्रबंधन या पारिवारिक संपत्ति से संबंधित विवादों से समझौता करने की शक्ति है। वह पारिवारिक ऋणों, लंबित मुकदमों और अन्य लेन-देन से समझौता कर सकता है। कर्ता द्वारा किए गए समझौतों को केवल दुर्भावना के आधार पर वारिसों द्वारा अदालत में चुनौती दी जा सकती है।

  • विवाद को मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) के लिए संदर्भित करने की शक्ति

कर्ता प्रबंधन, पारिवारिक संपत्ति से संबंधित विवादों को मध्यस्थता के लिए संदर्भित कर सकता है। यदि माध्यस्थता द्वारा दिया गया निर्णय वैध है तो यह संयुक्त परिवार के सदस्यों के लिए बाध्यकारी होगा।

  • ऋण अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) करने की शक्ति

कर्ता ऋणों को अनुबंधित करने और परिवार के श्रेय और संपत्ति को गिरवी रखने के लिए एक निहित अधिकार का प्रयोग करता है। इस तरह के कार्यों का पालन परिवार के सदस्यों द्वारा किया जाना अनिवार्य है। यहां तक ​​कि, कर्ता जब पारिवारिक उद्देश्य के लिए या पारिवारिक व्यवसाय के लिए ऋण लेते हैं तो संयुक्त परिवार इस तरह के ऋण का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होता है।

  • अनुबंधों में प्रवेश करने की शक्ति

कर्ता अनुबंधों में प्रवेश कर सकता है और जहां अनुबंध परिवार के खिलाफ लागू करने योग्य हैं। अनुबंध संयुक्त परिवार के सदस्यों के लिए बाध्यकारी हैं।

  • हस्तांतरण (एलिनेट) करने की शक्ति

परिवार के सदस्यों में से कोई भी संयुक्त परिवार की संपत्ति को अलग नहीं कर सकता है। लेकिन कर्ता के पास तीन परिस्थितियों में संपत्ति को अलग करने की शक्ति है।

1. कानूनी आवश्यकता

इस शब्द को किसी भी निर्णय या किसी कानून में स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। इसमें वे सभी चीजें शामिल हैं जो परिवार के सदस्यों के लिए आवश्यक समझी जाती हैं।

देव किशन बनाम राम किशन एआईआर 2002

इस मामले में वादी ने प्रतिवादी के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। वादी और प्रतिवादी दोनों संयुक्त हिंदू परिवार के सदस्य थे। प्रतिवादी 2 कर्ता है, जो प्रतिवादी 1 के प्रभाव में है, उसने एक अवैध और अनैतिक उद्देश्य के लिए संपत्ति को बेचा और गिरवी रखा है जो नाबालिग बेटियों विमला और पुष्पा की शादी के लिए है। प्रतिवादी ने तर्क दिया कि उसने कानूनी आवश्यकता के लिए ऋण लिया था।

अदालत ने माना कि ऋण का इस्तेमाल गैरकानूनी उद्देश्य के लिए किया गया था। चूंकि इसने बाल विवाह निरोधक (रिस्ट्रेंट) अधिनियम, 1929 का उल्लंघन किया है, इसलिए इसे अवैध हस्तांतरण कहा जा सकता है।

2. संपत्ति का लाभ

संपत्ति का लाभ का मतलब कुछ भी है जो संयुक्त परिवार की संपत्ति के लाभ के लिए किया जाता है। प्रबंधक के रूप में कर्ता वो सभी कार्य कर सकता है जो परिवार की उन्नति में सहायक हों।

3. अपरिहार्य कर्तव्य (इंडिस्पेंसिबल ड्यूटीज)

ये शब्द उन कार्यों के प्रदर्शन को संदर्भित करते हैं जो धार्मिक, पवित्र या धर्मार्थ (चेरिटेबल) हैं। विवाह, गृहप्रवेश आदि अपरिहार्य कर्तव्यों के उदाहरण हैं। एक कर्ता संपत्ति के हिस्से को धर्मार्थ उद्देश्य के लिए अलग कर सकता है। इस मामले में, कर्ता की शक्ति सीमित है यानी वह परिवार की संपत्ति के केवल एक छोटे से हिस्से को ही अलग कर सकता है, चाहे वह चल या अचल हो।

वचन पत्र (प्रोमिसरी नोट) पर ऋण

जब कर्ता किसी पारिवारिक उद्देश्य के लिए कोई ऋण लेता है या एक वचन पत्र निष्पादित (एग्जिक्यूट) करता है, तो सभी सदस्य जो उस वचन पत्र के पक्ष नहीं हैं, यदि ऋण का भुगतान नहीं किया जाता है तो उन पर मुकदमा चलाया जाएगा। लेकिन, पत्र पर कर्ता व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी है।

एक कर्ता के दायित्व

  • भरण पोषण करने का दायित्व- कर्ता संयुक्त परिवार के सभी सदस्यों का भरण-पोषण करता है। यदि वह किसी सदस्य का भरण-पोषण नहीं करता है तो उस पर भरण-पोषण के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है और मुआवजे के लिए भी कहा जा सकता है।
  • खातों को सौंपने का दायित्व- जहां तक ​​परिवार संयुक्त रहता है, कर्ता को परिवार का खाता नहीं रखना चाहिए, लेकिन जब  विभाजन होता है तो वह उस समय पारिवारिक संपत्ति के लिए जिम्मेदार होता है। यदि वारिस में से कोई भी अपने खातों से संतुष्ट नहीं है, तो वह सच्चाई पता करने के लिए और यह जानने के लिए कि कर्ता द्वारा कोई हेराफेरी की गई है या नहीं के लिए कर्ता के खिलाफ मुकदमा कर सकता है।
  • परिवार के बकाया ऋणों की वसूली का दायित्व- उसके पास परिवार के बकाया ऋणों को चुकाने का दायित्व है।
  • यथोचित (रीजनेबल) खर्च करने का दायित्व- उसके पास केवल पारिवारिक उद्देश्यों के लिए संयुक्त परिवार के फंड को खर्च करने का दायित्व है।
  • सहदायिक संपत्ति को समाप्त न करने का दायित्व- यह कर्ता का दायित्व है कि वह राज्य को किसी कानूनी आवश्यकता या लाभ के बिना सहदायिकी संपत्ति को अलग न करे।
  • नया व्यवसाय शुरू न करने का दायित्व- अन्य सहदायिकों की सहमति के बिना नया व्यवसाय शुरू न करना कर्ता का दायित्व है।

कर्ता की जिम्मेदारियां

एक कर्ता का कर्तव्य संयुक्त परिवार के सदस्यों को वस्त्र, भोजन, आश्रय आदि प्रदान करना है। कर्ता की कई जिम्मेदारियां हैं जिनमें शामिल हैं:

भरण पोषण

कर्ता सहित परिवार के प्रत्येक सदस्य को भरण-पोषण का अधिकार है। कर्ता का दायित्व परिवार के सभी सदस्यों का भरण-पोषण करना होता है। यदि वह किसी सदस्य का ठीक से भरण-पोषण नहीं करता है, तो उस पर भरण-पोषण के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है।

विवाह

कर्ता अविवाहित सदस्यों विशेषकर बेटियों के लिए जिम्मेदार है। विवाह का खर्च संयुक्त परिवार की संपत्ति से लिया जाएगा।

प्रतिनिधित्व

कर्ता परिवार की ओर से एक प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसे परिवार के कारण कुछ जिम्मेदारियों और दायित्वों का पालन करना होता है। उसे सभी बकाया और करों का भुगतान करना होता है। किसी भी समझौते या सौदे के दौरान परिवार की ओर से उस पर मुकदमा चलाया जा सकता है।

विभाजन के समय के खाते

विभाजन के कारण संयुक्त परिवार की स्थिति समाप्त हो जाती है। मिताक्षरा कानून के तहत, इसका अर्थ है:

स्थिति और ब्याज का विभाजन

यह एक व्यक्तिगत निर्णय है, जहां एक सदस्य खुद को संयुक्त परिवार से अलग करना चाहता है और अलग-अलग अपरिभाषित और अनिर्दिष्ट हिस्से का आनंद लेना चाहता है।

संपत्ति का वास्तविक विभाजन

यह अलग होने की इच्छा की घोषणा का परिणाम है।  हालांकि, यह एक द्विपक्षीय (बाईलेटरल) कार्रवाई है।

संपत्ति खोलने का मतलब संयुक्त परिवार की संपत्ति की जांच करना है। इसमें पारिवारिक संपत्ति की सभी चीजे शामिल हैं। मिताक्षरा कानून के तहत कर्ता को खातों का खुलासा तभी करना होता है जब उसके खिलाफ संयुक्त परिवार की धोखाधड़ी, हेराफेरी या संपत्ति के रूपांतरण का कोई आरोप हो। यदि कर्ता के विरुद्ध हेराफेरी, धोखाधड़ी या धर्मांतरण का कोई सबूत नहीं है, तो विभाजन प्रक्रिया का पालन करने वाले सहदायिक संयुक्त परिवार की संपत्ति के साथ कर्ता के पिछले सौदों के प्रकटीकरण (डिसक्लोजर) की मांग नहीं कर सकते।  स्थिति के विभाजन के बाद, कर्ता को व्यय और आय के खातों को उसी तरह से देना होगा जैसे किसी ट्रस्टी या एजेंट को खातों को प्रस्तुत करना होता है। इसका मतलब है कि कर्ता को सभी मुनाफे की रिपोर्ट करनी होगी।

निष्कर्ष

एक संयुक्त हिंदू परिवार में कर्ता अपनी समझ और जटिलता के संदर्भ में एक असाधारण स्थान रखता है। कर्ता की अवधारणा की उत्पत्ति सदियों पहले हुई थी और यह अभी भी कुछ कार्यात्मक (फंक्शनल) तत्वों के कारण काम करती है। प्रत्येक संयुक्त परिवार में एक ऐसा कर्ता होना चाहिए जो ऐसे परिवार के व्यवहार और उद्यमों (वेंचर) के संदर्भ में एकात्मक पहलू को बढ़ावा दे। कर्ता की स्थिति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि उसके पास कम दायित्व और अधिक शक्तियां हैं। जब कर्ता की स्थिति निर्धारित करने की बात आती है, तो वह एक अद्वितीय स्थान रखता है। कर्ता द्वारा दिए गए निर्णय या बयान पक्षों के लिए बाध्यकारी हैं और वे इसे करने के लिए बाध्य हैं। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 6 बेटियों को बेटों के समान अधिकार देती है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 दो परिस्थितियों को छोड़कर महिला को कर्ता के रूप में स्वीकार नहीं करता है- यदि परिवार के पुरुष सदस्य की अनुपस्थिति है या परिवार में कोई पुरुष सदस्य है लेकिन वह नाबालिग है। इन दो परिस्थितियों का उल्लेख प्राचीन हिंदू कानून, धर्मसूत्र में भी किया गया है। सरकार को अन्य व्यक्तिगत कानून में महिलाओं की स्थिति को ऊपर उठाने के लिए कुछ कदम उठाने चाहिए।

संदर्भ

 

 

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