क्या भारत में वेश्यावृत्ति कानूनी है

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यह लेख लॉसिखो से एडवांस्ड कॉन्ट्रैक्ट ड्राफ्टिंग, नेगोशिएशन एंड डिस्प्यूट रेजोल्यूशन कोर्स में डिप्लोमा कर रही T. Vani द्वारा लिखा गया है और Shashwat Kaushik द्वारा संपादित किया गया है। इस लेख में भारत में वेश्यावृत्ति (प्रॉस्टिट्यूशन) की स्थिति पर चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash के द्वारा किया गया है।

परिचय

पेशे का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (g) के तहत प्रदत्त भारत के प्रत्येक नागरिक के मौलिक अधिकारों में से एक है, जो कहता है कि प्रत्येक भारतीय को किसी भी प्रकार का काम, व्यापार या चयन करने का अधिकार है। भारत में कहीं भी व्यापार करें, लेकिन यह बड़े पैमाने पर जनता के खिलाफ या भारत के कानूनों के खिलाफ नहीं होना चाहिए। हमारी संसद ने अनुच्छेद 19(6) के तहत कार्य, व्यापार या व्यवसाय करते समय आम जनता के हित में उचित प्रतिबंध लगाए हैं।

अब यहां सवाल यह उठता है कि क्या वेश्यावृत्ति भी इस अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत एक पेशा या व्यवसाय है, या यह एक अपराध है क्योंकि वेश्यालय घरों में बड़ी संख्या में महिलाएं अपनी इच्छा के साथ या उसके बिना उनकी प्रथागत प्रक्रियाओं के कारण, जिनका उन्हें अपनी इच्छा के बावजूद पालन करना पड़ता है, इस पेशे में प्रवृत्त होती हैं।

वेश्यावृत्ति का कानूनी दृष्टिकोण

भारतीय दंड संहिता के तहत वेश्यावृत्ति कोई अपराध नहीं है, लेकिन यौन शोषण, किसी को बहकाना, वेश्यालय चलाना, दलाली करना, याचना करना आदि अनैतिक तस्करी रोकथाम अधिनियम, 1956 की धारा 2 (f) के तहत दंडित किए जाते हैं। और वेश्यावृत्ति के ये कार्य के लिए भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 366A, 366B और 370A के तहत सजा दी जाएगी।

असल में वेश्यावृत्ति एक ऐसा काम है जिसे हर कोई नहीं कर सकता। केवल कुछ पंथ और समुदाय ही इसे आज भी अपना पेशा मानते हैं और इसी से अपना जीवन निर्वाह कर रहे हैं। वे इसका पालन इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन संप्रदायों से जुड़े लोग व्यवस्थाओं के विकास के अनुसार खुद को बदलना नहीं चाहते हैं। वे इस प्रकार के विचारों का अंधानुकरण कर रहे हैं और अपनी अगली पीढ़ियों को भी इसे अपने रीति-रिवाजों/ परंपराओं का हिस्सा मानने के लिए मजबूर कर रहे हैं क्योंकि यह लंबे समय से अस्तित्व में है और वे इसका पालन कर रहे हैं और उनके पास इन चीजों को नहीं कहने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। 

वेश्यावृत्ति को तब भी व्यवसाय माना जा सकता है जब यह वेश्यालय में लोगों द्वारा किया जाता है। जब इसे एक पेशा या व्यवसाय माना जाता है, तो इससे दूसरा सवाल यह उठता है कि यह वैध है या अवैध, क्या यह केवल हमारे देश तक ही सीमित है या दुनिया के अन्य देशों में भी है?

इसका उत्तर यह है कि कुछ देशों में वेश्यावृत्ति अवैध नहीं है। यह निम्नलिखित देशों में कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त पेशा है:

  1. फिनलैंड
  2. कोस्टा रिका (मध्य अमेरिका)
  3. न्यूज़ीलैंड
  4. बांग्लादेश
  5. जर्मनी

भारत में परिदृश्य अलग है। वेश्यावृत्ति न तो पूरी तरह से अवैध है और न ही कानूनी। कुछ परिस्थितियों में, यह कानूनी है; अन्य में, यह अवैध है। यदि कोई व्यक्ति रीति-रिवाजों के कारण या जीवन जीने का कोई अन्य वैकल्पिक तरीका नहीं होने के कारण स्वेच्छा से किसी पेशे के रूप में शामिल होता है, तो इसे कानूनी माना जा सकता है। लेकिन वेश्यालय का स्वामित्व और प्रबंधन अवैध है। जो व्यक्ति इसमें शामिल हैं और गरीब एवं दुखी महिलाओं को इस पेशे में लाते हैं, वे कानून के प्रावधानों के तहत दंड के भागी होंगे।

यौनकर्मियों की सुरक्षा के लिए कानूनी प्रावधान

यौनकर्मियों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून के प्रावधान इस प्रकार हैं:,

  • अनैतिक व्यापार रोकथाम अधिनियम 1956 के तहत, “वेश्यावृत्ति कानूनी तौर पर की जा सकती है, लेकिन लोगों को लुभाना और उन्हें यौन गतिविधियों में शामिल करना गैरकानूनी है, और कानून द्वारा निषिद्ध है। अगर कोई भी व्यक्ति इस तरह के काम में शामिल है तो उसे दंडित किया जाएगा।”
  • कानून वेश्यावृत्ति को “स्वयं अवैध” नहीं बनाता है, लेकिन साथ ही, वेश्यालयों का उपयोग, वेश्यावृत्ति की कमाई पर गुजारा करना, दलाली करना, प्रलोभन देना, दूसरों को जेल या अन्य जगहों पर वेश्यावृत्ति के लिए फुसलाना और सार्वजनिक स्थानों पर वेश्यावृत्ति करना आदि को अवैध बनाता है।
  • उपरोक्त से, हम यह मान सकते हैं कि वेश्यावृत्ति कोई अपराध नहीं है यदि इसे एक पेशे के रूप में स्वेच्छा से किया जाता है या अभ्यास किया जाता है क्योंकि इसमें शामिल व्यक्ति का मानना ​​​​है कि उनकी आजीविका के लिए जीवन यापन का कोई अन्य साधन नहीं है, और ऐसे मामलों में भी जहां यह वेश्यावृत्ति उनकी परंपरा या रिवाज है।

काजल मुकेश सिंह एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य (2020)

यह आईटीपीए, मुंबई के विशेष न्यायालय, विद्वान मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के आदेशों के खिलाफ दायर एक आपराधिक याचिका थी, जिसकी पुष्टि माननीय सत्र न्यायाधीश डिंडोश ने की थी। इसमें, माननीय न्यायालय ने माननीय सत्र न्यायाधीश डिंडोश के आदेशों को रद्द कर दिया और आईटीपीए, मुंबई के लिए विशेष न्यायालय के विद्वान मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के फैसले में भी खामियाँ पाईं गई।

मामले के तथ्य

यह तीन प्रमुख महिलाओं का मामला था, जिनकी उम्र 23-25 ​​वर्ष के बीच है, जिन्हें पुलिस ने वेश्यावृत्ति के काम के लिए महिलाओं की आपूर्ति करने वाले व्यक्तियों को पकड़ने के लिए किए गए एक स्टिंग ऑपरेशन के दौरान पकड़ा था।

उक्त गेस्ट हाउस पर छापे के समय, पुलिस ने केवल इन तीन महिलाओं को गिरफ्तार किया था और वह मुख्य आरोपी श्री निज़ामुद्दीन को पकड़ने में विफल रहे, जो इस गतिविधि के पीछे है और जिसके लिए स्टिंग ऑपरेशन किया जा रहा था और एक दिन बाद इन महिलाओं को माननीय न्यायाधीश के समक्ष पेश किया गया था।

पुलिस उस ऑपरेशन में शामिल अधिकारियों और पंचों के विवरण के रिकॉर्ड पेश करने में विफल रही, साथ ही वेश्यालय घर के मालिक श्री निज़ामुद्दीन, मुख्य आरोपी, जो गेस्ट हाउस में वेश्यावृत्ति के लिए महिलाओं की आपूर्ति कर रहा था, के विवरण का रिकॉर्ड पेश करने में विफल रही। जब मामला मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, 54वीं अदालत, मझफॉन, मुंबई के समक्ष प्रस्तुत किया गया, तो माननीय न्यायाधीश ने इस बात की विस्तृत जानकारी नहीं दी कि पीड़ित लड़कियों को 28 सितंबर, 2023 और 30 सितंबर, 2019 के बीच कहां रखा गया था। पीड़ित लड़कियों को नवजीवन महिला वसतिगृह में कब तक रखा जाए इसका जिक्र नहीं किया और पीड़ित महिलाओं को कोई मौका दिए बिना अपना फैसला सुना दिया।

न्यायालय के आदेश से व्यथित होकर जब पीड़िता ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डिंडोश से गुहार लगाई तो न्यायालय ने भी उसी फैसले की पुष्टि की। दोनों अदालतों के आदेशों से व्यथित होकर, माननीय मुंबई उच्च न्यायालय के समक्ष अपील दायर की गई, जहां माननीय न्यायाधीश पी.के. चव्हाण की माननीय खंडपीठ ने मामले की सुनवाई शुरू की, और उन्होंने याचिका स्वीकार कर ली और आरोपी महिलाओं के पक्ष में आदेश दिया।

न्यायालय का निर्णय

माननीय न्यायालय ने, दोनों वकीलों द्वारा दिए गए सभी तथ्यों और प्रस्तुतियों पर विचार करने और प्रस्तुत रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद, मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश को रद्द कर दिया, जिसकी पुष्टि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, डिंडोशी ने भी की थी। और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को नवजीवन महिला वस्त्रगृह, मुंबई से उनकी स्वतंत्रता का विस्तार किया जाए। वे चाहें तो अपना प्रवास जारी रख सकते हैं। और याचिकाकर्ताओं को यह भी निर्देश दिया कि वे निचली न्यायालय के समक्ष अपने साक्ष्य प्रस्तुत करें और जांच अधिकारी को अपने फोन नंबर के साथ अपना पूरा आवासीय पता प्रदान करें। माननीय न्यायालय ने विशेष मजिस्ट्रेट को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि पीड़ितों पर उनके साक्ष्य की रिकॉर्डिंग के दौरान कोई प्रभाव नहीं डाला जाएगा।

इस कानूनी मामले का महत्व: इस फैसले के बाद, वेश्यावृत्ति को अपराध नहीं माना जा सकता है यदि यह सहमति से और बिना किसी बल के किया जाता है और जब यह महिलाओं की आजीविका और पारंपरिक प्रथा है।

इस फैसले के बाद कानूनी व्यवस्था में जो बदलाव आये

  • सर्वोच्च न्यायालय का आदेश यौनकर्मियों से संबंधित मामलों से निपटने के दौरान पुलिस कार्रवाई पर सीमा निर्धारित करता है और यौनकर्मियों और उनके बच्चों को समाज के बाकी लोगों के बराबर रखता है। उन्हें अपराधी मानकर किसी भी प्रकार की कठोरता नहीं बरती जानी चाहिए।
  • पुलिस विभाग को निर्देश दिया गया है कि जब कोई यौनकर्मी शिकायत लेकर आती है तो उसे किसी अन्य शिकायत की तरह ही माना जाएगा और उसे अपराधी नहीं बल्कि शिकायतकर्ता माना जाएगा।
  • पुलिस और स्वास्थ्य विभाग को यह भी निर्देश दिया गया है कि जो भी यौनकर्मी यौन उत्पीड़न का शिकार है, उसे तत्काल चिकित्सा सहायता सहित यौन उत्पीड़न से बचे व्यक्ति को उपलब्ध सभी सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए। यह सहायता 1973 की आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 357 और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा यौन हिंसा से बचे लोगों और पीड़ितों के लिए जारी दिशानिर्देशों और प्रोटोकॉल के अनुरूप होनी चाहिए।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने वेश्याओं के सामने आने वाली सभी समस्याओं का अवलोकन करने के बाद इस प्रकार कहा: “कहने की जरूरत नहीं है, मानवीय शालीनता और गरिमा की यह बुनियादी सुरक्षा यौनकर्मियों और उनके बच्चों तक फैली हुई है, जो अपने काम के लिए सामाजिक अन्याय और कलंक का खामियाजा भुगत रहे हैं, और उन्हें भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित करके समाज के हाशिये पर धकेल दिया जाता है, इसलिए उन्हें सम्मान के साथ जीने दें ताकि उनके बच्चे समान रूप से समाज में सुरक्षित जीवन जी सकें, वह भी समाज के अन्य नागरिकों के साथ”।
  • सर्वोच्च न्यायालय का आदेश बच्चों को उनकी मां, जो यौनकर्मी हैं, से जबरन अलग करने पर भी रोक लगाता है। आदेश में कहा गया है, “इसके अलावा, अगर कोई नाबालिग वेश्यालय में या यौनकर्मियों के साथ रहता पाया जाता है, तो यह नहीं माना जाना चाहिए कि उसकी तस्करी की गई है। यदि यौनकर्मी दावा करती है कि वह उसका बेटा/ बेटी है, तो यह निर्धारित करने के लिए परीक्षण किया जा सकता है कि दावा सही है या नहीं और यदि हां, तो नाबालिग को जबरन अलग नहीं किया जाना चाहिए।

इस फैसले के बाद कई अन्य मामले भी दायर किए गए जिनमें ऐतिहासिक फैसले दिए गए जो यौनकर्मियों के अधिकारों के पक्ष में थे।

अन्य ऐतिहासिक फैसले

गौरव जैन बनाम भारत संघ एवं अन्य (1997)

इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि यौनकर्मियों को स्व-रोज़गार योजनाओं के माध्यम से पुनर्वासित किया जाना चाहिए और राज्यों को यह सुनिश्चित करने के लिए प्रक्रियाओं और सिद्धांतों को विकसित करने के लिए आमंत्रित किया कि यौनकर्मी भी अपने मौलिक और मानवाधिकारों का आनंद लेंगे।

बुद्धदेव कर्मस्कर बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2011)

इस ऐतिहासिक मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि “भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत यौनकर्मियों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है, यौनकर्मियों की कठिनाई यह है कि वे उस क्षेत्र में हैं, इसलिए नहीं कि उन्हें यह पसंद है, लेकिन क्योंकि गरीबी उन्हें इसकी ओर ले जाती है। अपने पेशे को लेकर समाज में होने वाले अपमान के कारण, इससे उन्हें जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।”

सी.पी. राजू बनाम केरल राज्य (2014)

इस मामले में, यह माना गया कि केवल अधिकृत अधिकारियों को ही जांच करने और गिरफ्तारी की अनुमति होगी और यह शक्ति किसी को नहीं सौंपी जा सकती। मजिस्ट्रेट गिरफ्तारी और निष्कासन, बचाए गए व्यक्तियों को सीधे हिरासत में लेने या वेश्यालयों को बंद करने और यौनकर्मियों को बेदखल करने का आदेश दे सकता है। अधिनियम में बचाए गए यौनकर्मियों के लिए संस्थागत पुनर्वास उपलब्ध कराने का भी प्रावधान है।

निष्कर्ष

यौनकर्मी भी वे लोग हैं जिन्हें गरीबी, रीति-रिवाज, परंपरा, बल या किसी अन्य कारण से उनके काम के लिए उनके मौलिक और मानवाधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। हालाँकि, वे अभी भी बाकी सभी लोगों की तरह समान मौलिक मानवाधिकारों के हकदार हैं। इन अधिकारों में जीवन, स्वतंत्रता और व्यक्ति की सुरक्षा का अधिकार; कानून के समक्ष समानता का अधिकार; अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार; संघ की स्वतंत्रता का अधिकार; और काम करने का अधिकार शामिल है।

गरीबी, शिक्षा या नौकरी के अवसरों की कमी, या पारिवारिक या सामाजिक दबाव सहित कई कारणों से यौनकर्मियों को उद्योग में खींचा जा सकता है। वे तस्करी या यौन शोषण के भी शिकार हो सकते हैं। चाहे जिन भी कारणों से वे देह व्यापार में उतरें, यौनकर्मी अन्य सभी की तरह समान मानवाधिकारों के हकदार हैं।

कुछ लोगों का तर्क है कि यौनकर्मियों को अन्य श्रमिकों के समान मानवाधिकारों का हकदार नहीं होना चाहिए क्योंकि वे अवैध या अनैतिक गतिविधियों में संलग्न हैं। हालाँकि, यह तथ्य कि यौन कार्य अवैध है या अनैतिक माना जाता है, इसका मतलब यह नहीं है कि यौनकर्मियों को उनके मानवाधिकारों से वंचित किया जाना चाहिए। सभी लोग, चाहे उनका व्यवसाय कुछ भी हो, समान मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता के हकदार हैं।

इसमें महिलाओं और बच्चों की तस्करी शामिल नहीं होनी चाहिए। जो लोग वेश्यावृत्ति छोड़ना चाहते हैं उन्हें आवश्यक प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) प्रदान करके यौनकर्मियों को वैकल्पिक व्यवसायों के बारे में उचित जागरूकता प्रदान की जानी चाहिए, क्योंकि इस काम से समाज में बुरे व्यवहार, उनके बच्चों के लिए असुरक्षा और काम के कारण होने वाली बीमारियों का खतरा हमेशा बना रहता है। जो यौनकर्मी काम छोड़ना चाहते हैं, उन्हें शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करके उचित मार्गदर्शन और प्रोत्साहन प्रदान किया जाना चाहिए ताकि उनमें आत्मविश्वास पैदा हो, जो उन्हें समाज के अन्य सदस्यों के बराबर सम्मानजनक जीवन जीने में मदद करे।

संदर्भ

 

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