भारतीय संविधान के तहत धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार

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Constitution of India
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इस लेख में, Raja Ravipalli जो की एनयूजेएस, कोलकाता से बिजनेस लॉ में एम.ए कर रहे हैं, भारतीय संविधान के तहत धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार पर चर्चा करते हैं। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

परिचय

भारत एक बहु-धार्मिक (मल्टी रिलीजियस) समाज है और ऐसे में आम जनता के अस्तित्व की कल्पना की जा सकती है, सभी धर्मों के साथ बिना किसी समर्थन या विभाजन (सेपरेशन) के, समान व्यवहार किया जाता है। राष्ट्र का विभाजन स्पष्ट रूप से धर्म के प्रकाश में था और यह संविधान के निर्माताओं के लिए एक मार्गदर्शक था, जब वे हमारे राष्ट्र के संविधान को एक ठोस आकार देने के काम में व्यस्त थे। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने स्पष्ट रूप से भारत की एक धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) राज्य होने की अवधारणा (कांसेप्ट) को नहीं चुना था। जब यह अस्तित्व में आया तो हमारे संविधान में धर्मनिरपेक्षता नहीं थी। यह 1976 के 42वें संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान की प्रस्तावना में शामिल हो गया था। वर्णनात्मक (डिस्क्रिप्टिव) शब्द “धर्मनिरपेक्ष” का औपचारिक (फॉर्मल) विचार, अधिकांश भाग के लिए, प्रमुख परिस्थितियों की आवश्यकताओं को पूरा करने का परिणाम है, और विधायी (लेजिस्लेटिव) मुद्दों को इकट्ठा करने की आवश्यकता है। कुछ हद तक, यह विचारकों की उपेक्षा को भी दर्शाता है, कि उन्होंने इसे केवल परिचय में जोड़ा, और संविधान में उचित परिवर्तन प्राप्त करने के लिए नहीं। इस बात पर ध्यान दिया जा सकता है कि “समाजवादी (सोशियलिस्ट)” के बाद उपयोग किए जाने वाले शब्द का उपयोग कम्युनिस्ट वोट आधारित राज्य के रूप में बार-बार किया जाता है, जो मूल रूप से सामान्य है। संविधान के कुछ हद तक दर्शाने वाले विभिन्न आर्टिकल्स के परिप्रेक्ष्य (पर्सपेक्टिव) में, कोई कह सकता है कि भारत उस समय एक धर्मनिरपेक्ष राज्य था और इस तरह के विस्तार की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसने एक गलत धारणा दी कि पहले भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य नहीं था।

भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और समानता का अधिकार

भारतीय संविधान द्वारा सुनिश्चित किए गए अधिकारों में से एक, धर्म की स्वतंत्रता का विशेषाधिकार (प्रिविलेज) है। एक धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में, भारत के प्रत्येक नागरिक को धर्म के अवसर का विशेषाधिकार है, अर्थात किसी भी धर्म को अपनाने का अधिकार है। भारत में ऐसे कई धर्मों का पालन किया जा सकता है, संविधान प्रत्येक राष्ट्र को अपना पसंदीदा धर्म लेने की स्वतंत्रता का आश्वासन देता है। इस आवश्यक अधिकार के अनुसार, प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्वक अपने धर्म का पालन करने और उसका प्रसार (स्प्रेड) करने का अवसर प्राप्त है। इसके अलावा, यदि भारत में धार्मिक संकीर्णता (नैरो) की कोई घटना होती है, तो यह भारत सरकार का दायित्व है कि वह इन आवृत्तियों (फ्रीक्वेंसीज) की जांच करे और इसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करे। धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार भारतीय संविधान के आर्टिकल 25, 26, 27 और 28 में दर्शाया गया है।

भारतीय संविधान कुछ मौलिक अधिकारों (फंडामेंटल राइट्स) की गारंटी देता है, जिनका वर्णन आर्टिकल 12 से 35 में किया गया था, जो संविधान के भाग III को आकार देते हैं। इन आर्टिकल्स में आर्टिकल 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने वाले दो प्रमुख आर्टिकल हैं।

भारत के संविधान के आर्टिकल 14, 15 और 16 समानता के अधिकार से संबंधित हैं। आर्टिकल 17 एक अनूठी व्यवस्था है जो “अस्पृश्यता (अनटचैबिलिट)” को समाप्त करती है और किसी भी फ्रेम में इसके प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) को रोकती है। धर्म, जाति, लिंग और जन्म स्थान की परवाह किए बिना सभी निवासियों को कानून के तहत समानता का अधिकार और कानून के समकक्ष (इक्विवेलेंट) आश्वासन एक धर्मनिरपेक्ष लोकप्रियता आधारित राज्य के मौलिक अनुमानों में से एक है। संविधान का आर्टिकल 14 भारत के क्षेत्र के अंदर रहने वाले और बाहरी लोगों सहित, सभी लोगों को एकरूपता (यूनिफोर्मिटी) के दो हिस्से देता है।

इस बीच संविधान की कुछ व्यवस्थाएँ हैं जो विभिन्न समझदार आधारों पर समानता के सामान्य नियम को छूट देती हैं। ये आर्टिकल 15 के क्लॉज (3) और (4) और आर्टिकल 16 के क्लॉज (4) और (5) में दिए गए हैं। आर्टिकल 15 के क्लॉज (4) के तहत सामान्य सरकार को विषेश मामले में एकरूपता की अनुमति है और आर्टिकल 16 के क्लॉज (4) हमारे विचार के लिए उत्साह का होगा।

संविधान का आर्टिकल 15, आर्टिकल 14 में निहित संतुलन के सामान्य मानक (स्टैंडर्ड) के विशिष्ट उपयोग को समायोजित (अकॉमोडेट) करता है। आर्टिकल 15 का क्लॉज (1) राज्य को किसी भी निवासी को धर्म, जाति, स्थायी लिंग या जन्म स्थान या उनमें से कोई भी, के आधार पर उत्पीड़ित (ऑपरेस) नहीं करने का निर्देश देता है। इस प्रावधान में निहित निषेध (फोरबिडेंस), नागरिकों के प्रबंधन में राज्य पर लागू होता है। आर्टिकल 15 का क्लॉज (2) निजी व्यक्ति और इसके अलावा राज्य को किसी भी अलगाव या बाधा के कारण दुकानों, आवासों, और खुले उत्साह के स्थानों और रिसॉर्ट के सभी स्थानों पर प्रवेश के लिए मना करता है। इस प्रावधान का सामाजिक और धार्मिक प्रभाव कथित ‘अछूत व्यक्तियों’ के घृणित इतिहास के संबंध में पाया जाता है, जो काफी लंबे समय से देश के कई हिस्सों में सामाजिक अलगाव और शर्मिंदगी के लिए उत्तरदायी थे। इसी तरह, आर्टिकल 16 के प्रावधान (1) और (2), राज्य के तहत व्यवस्था और कार्य के संदर्भ में आर्टिकल 14 में निर्धारित निष्पक्षता (फेयरनेस) के नियम को दर्शाते हैं।

अब हमें एकरूपता के सामान्य नियम के लिए विशेष मामले की स्थितियों की जांच करने और देखने का मौका दें, जिसे “सुरक्षात्मक (प्रोटेक्टिव) भेदभाव” या “प्रतिपूरक (कंपेंसेटरी) भेदभाव” की व्यवस्था के रूप में जाना जाता है। आर्टिकल 15 का क्लॉज (3) महिलाओं और युवाओं के लिए प्रतिरक्षा (इम्यूनिटी) प्रदान करता है, आर्टिकल 15 का क्लॉज (4) भारतीय नागरिकों के कुछ पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों (ट्राइब्स) के लिए शिक्षा के क्षेत्र में उनकी प्रगति के लिए प्रतिरक्षा देता है। अनिवार्य रूप से, आर्टिकल 16 का क्लॉज (4) राज्य के तहत नौकरियों की नियुक्ति के क्षेत्र में नागरिकों के किसी भी पिछड़े वर्ग के लिए छूट देता है, अगर इस तरह के प्रशासन में उनसे संतोषजनक ढंग से बात नहीं की जाती है।

भारतीय संविधान द्वारा आर्टिकल 25 के क्लॉज (1) द्वारा गारंटीकृत भारत के व्यक्तियों की धार्मिक स्वतंत्रता, जिसकी सटीक व्याख्या (इंटरप्रेट प्रिसाइजली) की जा सकती है, संविधान स्पष्ट करता है कि आर्टिकल 25 के क्लॉज (1) में प्रदान किए गए अधिकार “नैतिकता (मोरलिटी)”, “सार्वजनिक व्यवस्था”, और स्वास्थ्य और संविधान के भाग III के आर्टिकल जो मौलिक अधिकारों को निर्धारित करते हैं, के अधीन है। आर्टिकल 25 का क्लॉज (2) देश के लिए एक “बचत क्लॉज” है, और क्लॉज (1) के तहत गारंटीकृत धार्मिक अधिकार किसी भी “मौजूदा कानून” या कानून के अधीन है, जिसे राज्य पास करने के लिए उपयुक्त समझता है:

  1. किसी भी वित्तीय (फाइनेंसियल), आर्थिक, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधि पर नियंत्रण या बाधा डालता है, जो धार्मिक प्रथाओं से जुड़ा हो सकता है, या,
  2. सभी हिंदू वर्गों के लिए सामाजिक कल्याण और सुधार या सार्वजनिक चरित्र के हिंदू धार्मिक संस्थानों को खोलने के लिए प्रस्ताव देता है।

इसके अनुरूप आर्टिकल 26 मौलिक आर्टिकल है, जो धर्म को “कॉर्पोरेट स्वतंत्रता” देता है, जो राज्य के बीच संबंध की देखरेख करता है और अनुरोध, नैतिक गुणवत्ता (एथिकल क्वालिटी) और कल्याण के अधीन प्रत्येक धार्मिक समूह या उसके किसी भी क्षेत्र को विशेषाधिकार होना चाहिए:

  1. धार्मिक और उदार (लिबरल) उद्देश्यों के लिए संगठनों (ऑर्गेनाइजेशन) की स्थापना और रखरखाव;
  2. धर्म के मुद्दों में अपने स्वयं के विशेष उपक्रमों (अंडरटेकिंग) से निपटने के लिए;
  3. पोर्टेबल और उत्साही संपत्ति रखने और प्राप्त करने के लिए;  और 
  4. कानून के अनुसार ऐसी संपत्ति को विनियमित (रेगुलेट) करने के लिए।

आर्टिकल 26 का प्रावधान (b) प्रत्येक धार्मिक श्रेणी या उसके किसी भी वर्ग को धर्म और स्थिति के मुद्दों में अपने स्वयं के मुद्दों से निपटने का विशेषाधिकार देता है, (d) उन्हें राज्य के कानून के अनुसार अपनी संपत्ति (संगठनों) की देखरेख करने का विशेषाधिकार देता है। आर्टिकल 26 की शर्तों (b) और (d) से स्पष्ट है कि, एक वर्ग के अपने धार्मिक उपक्रमों से निपटने के लिए विशेषाधिकार और उसकी संपत्ति से निपटने के लिए उसके अधिकार के बीच एक मौलिक अंतर है।

धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार की न्यायिक धारणा (ज्यूडिशियल परसेप्शन)

अभिव्यक्ति (एक्सप्रेशन) “धर्म” को संविधान में चित्रित नहीं किया गया है और यह किसी भी अटूट परिभाषा से असहाय नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में इसकी विशेषता बताई है। एक धर्म सकारात्मक (पॉजिटिव) रूप से विश्वास का विषय है और वास्तव में रहस्यमय नहीं है। धर्म का आधार “उन विश्वासों या परंपराओं की व्यवस्था है जिनका सम्मान उन व्यक्तियों द्वारा किया जाता है जो उस धर्म को अपनी गहन समृद्धि (प्रोफाउंड प्रोस्पेरिटी) के लिए सहायक बताते हैं”, हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि धर्म एक शिक्षण या विश्वास के अलावा और कुछ नहीं है। एक धर्म केवल अपने भक्तों को स्वीकार करने के लिए नैतिक सिद्धांतों का एक कोड निर्धारित नहीं करता है, यह उन रीति-रिवाजों और पालन, सेवाओं और प्रेम के तरीकों का समर्थन करता है, जिन्हें धर्म के एक मौलिक टुकड़े के रूप में देखा जाता है, ये संरचनाएं (स्ट्रकचर) और पालन के मुद्दों तक भी हो सकती है। विशिष्ट कारावासों के अधीन, आर्टिकल 25 सभी के लिए एक प्रमुख आदर्श प्रस्तुत करता है, न केवल ऐसे धार्मिक विश्वासों को शामिल करने के लिए जो उनके निर्णय या आत्मा द्वारा पुष्टि की जा सकती हैं, इसके अलावा, ऐसे अचूक कार्यों और प्रथाओं द्वारा अपने विश्वासों और विचारों को प्रदर्शित करते हैं जो धर्म अधिकृत (ऑथराइज) करता हैं। वर्तमान में, आर्टिकल के तहत जो पूर्वाभ्यास (रिहर्सेस) सुरक्षित हैं, वह एक विशिष्ट धर्म के सम्मेलन के संबंध में अदालतों द्वारा चुना जाना है और समूह द्वारा अपने धर्म की विशेषता के रूप में देखी जाने वाली प्रथाओं को शामिल करना है। प्रशिक्षण की स्थिति के प्रश्न का पता लगाने के लिए अदालतें धार्मिक पवित्र ग्रंथों का उपयोग करती हैं। विभिन्न मामलों में, अदालतों ने बिना सूचना, गैर-पृथक्करण (नॉन सेपरेशन) और धार्मिक अवसर पर संविधान की व्यवस्था का अनुवाद करने पर टिप्पणी की है। इन मामलों के बड़े हिस्से में विकल्प दिया गया है कि, विशिष्ट धार्मिक समूहों के विशेषाधिकारों की सेटिंग या कम खर्च के तहत, ऐसे समूहों के साथ, पहचान करने वाले कानून है। वास्तविक विकल्पों के बारे में संक्षिप्त जानकारी बाद में आती है।

भारत में, धर्म को चित्रित करने की आवश्यकता को दिलचस्प रूप से डॉ.बी.आर.अम्बेडकर ने देखा था, जब संविधान सभा में व्यक्तिगत कानून और धर्म से इसके संबंधित मुद्दे पर बातचीत की मांग की गयी थी। उन्होंने ध्यान आकर्षित किया कि: इस राष्ट्र में धार्मिक उत्पत्ति इस हद तक विशाल है कि वे जन्म से लेकर मृत्यु तक, जीवन के प्रत्येक भाग को कवर करते हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है जो धर्म नहीं है और अगर व्यक्तिगत कानून को बख्शा जाना है तो मैं इसके बारे में निश्चित हूं कि सामाजिक मुद्दों पर हम रुक जाएंगे। यह कहने में कोई असामान्य बात नहीं है कि हमें धर्म के अर्थ को इस तरह से, इस हद तक सीमित करने के लिए अभी से प्रयास करना चाहिए कि हम ऐसे विश्वासों और ऐसे समारोहों का विस्तार नहीं कर सकते हैं जो औपचारिक रूप से धार्मिक समारोहों से जुड़े हैं। यह बेमानी है कि जिस तरह के कानून, उदाहरण के लिए, अधिभोग (ऑक्यूपेंसी) के साथ पहचान करने वाले कानून या प्रगति के साथ पहचान करने वाले कानूनों का प्रतिनिधित्व धर्म द्वारा किया जाना चाहिए।

डॉ बी.आर.अम्बेडकर के अनुसार, “धर्म” या ‘धर्म के मामले’ का गठन धार्मिक विश्वासों और समारोहों तक सीमित करके किया जाता है, जिन्हें एक विशिष्ट धर्म में मूल रूप से धार्मिक माना जाता है, जो कानूनी ऑडिट के अधीन है। भारतीय संविधान में “धर्म” या “धर्म के मामले” का कोई स्पष्ट अर्थ नहीं है। संविधान के आर्टिकल 32 के आदेश के तहत, जो संरक्षित उपचार का विशेषाधिकार देता है, इस तरह की शर्तों के कानूनी महत्व पर समझौता करने के लिए यह सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दिया गया है। 1950 के दशक के मध्य में, प्रत्येक मामले में, भारत में कोर्ट्स को आर्टिकल 25 (1) में दिए गए “धर्म” और आर्टिकल 26 (b) में दिए गए ‘धर्म के मामलों’ के रूप में वर्णित करने के मुद्दे का सामना करना पड़ा था। विशेषज्ञ को अब उन कुछ मामलों का विश्लेषण करना चाहिए, जो कानूनी समूहीकरण (ग्रुपिंग) के लिए भारत के सुप्रीम कोर्ट की स्थिर निगाह में थे।

भारतीय संविधान के तहत धर्म के अधिकार के मामले में कुछ ऐतिहासिक मामले

  • रतिलाल पानाचंद गांधी बनाम बॉम्बे क्षेत्र (इसके बाद रतिलाल मामला)

रतिलाल के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 25 और 26 के तहत सुनिश्चित किए गए धर्म के अभ्यास के लिए नैतिक रूप से उचित सुझाव के रूप में “धर्म” और ‘धर्म के मामलों’ के कानूनी उपयोग पर समझौता किया था। बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, 1950 से सामने आया यह मामला, बॉम्बे राज्य विधानमंडल के पास गया था। 1951 के मद्रास अधिनियम की तरह, बंबई अधिनियम का प्रश्न, जैसा कि इसकी प्रस्तावना में व्यक्त किया गया था, जो बंबई राज्य में खुले धार्मिक और लाभकारी ट्रस्टों के संगठन के लिए व्यवस्था को नियंत्रित करना और सुधारना था।

बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, 1950 की धारा 18 में कहा गया है कि ट्रस्ट के नामांकन (एनरोलमेंट) के लिए आवेदन करने के लिए प्रत्येक खुले ट्रस्ट के ट्रस्टी पर यह अनिवार्य है कि वह अधिनियम से जुड़ा हो। 1951 के मद्रास अधिनियम की धारा 21 की तरह, बॉम्बे अधिनियम की धारा 37 ने भी चैरिटी कमिश्नर और उनके अधीनस्थ (सबॉर्डिनेट) अधिकारियों को खुले ट्रस्ट के साथ किसी भी संपत्ति में प्रवेश करने और उसकी समीक्षा (रिव्यू) करने की मंजूरी दी है। अधिनियम की धारा 44 में कहा गया है कि, सक्षम क्षेत्राधिकार (ज्यूरिसडिक्शन) वाले कोर्ट द्वारा या ट्रस्ट के निर्माता द्वारा एक खुले ट्रस्ट के एकमात्र ट्रस्टी के रूप में जाने जाने के लिए, चैरिटी कमिश्नर का चयन किया जा सकता है। धारा 74 ने कोर्ट को अन्य ट्रस्टी या ट्रस्टियों का चयन करने की शक्ति दी है और कोर्ट, अनुरोध करने के बाद, चैरिटी कमिश्नर या किसी अन्य व्यक्ति को ट्रस्टी के रूप में नामित कर सकता है।

एक जैन सार्वजनिक मंदिर के प्रबंधक (मैनेजर) और बॉम्बे में पारसी पंचायत फंड और संपत्तियों के ट्रस्टियों ने बॉम्बे हाई कोर्ट के सामने बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट 1950 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। यह इस आधार पर किया गया था कि 1950 के बॉम्बे अधिनियम के प्रावधानों ने धर्म के अवसर का उल्लंघन किया, जैसा कि अनुच्छेद 25 (1) में सुनिश्चित किया गया था और संविधान के अनुच्छेद 26 (b) द्वारा सुरक्षित धर्म के मामलों के लचीलेपन (फ्लेक्सिबिलिटी) का उल्लंघन किया गया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 26 के उप-प्रावधान (c) और (d) के आलोक में अपील को खारिज कर दिया, जो राज्य विशेषज्ञ को बॉम्बे एक्ट में दिए गए अधिनियम को अधिकृत करने देता है। इसलिए बॉम्बे हाई  कोर्ट ने राज्य के लिए उस परिभाषा के आधार पर मामले का निपटारा किया, जो कोर्ट ने महत्वपूर्ण मामले में धर्म के लिए प्रदान की थी। इस परिभाषा ने धर्म को अन्य दुनिया और नैतिक दृष्टिकोणों तक सीमित कर दिया और मुख्यधारा (मैनस्ट्रीम) से संपत्ति के स्वामित्व के समान और धार्मिक प्रथाओं से संबंधित, संविधान में सुनिश्चित आश्वासन के अभ्यासों को मिटा दिया। मुख्य न्यायाधीश श्री एम.सी. छागला, बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले से अवगत कराने वाले ने कहा: “धर्म” अभिव्यक्ति के एक भाग के रूप में उपयोग किया जाता है। आर्टिकल 25 और 26 का अनुवाद इसके सख्त और व्युत्पत्ति (एटीमोलॉजिकल) संबंधी अर्थों में किया जाना चाहिए। धर्म वह है जो एक व्यक्ति को अपने निर्माता के साथ जोड़ता है, हालांकि, श्री सोमाया अपने ग्राहक (पानाचंद) के लाभ के लिए कहते हैं कि जहां तक ​​जेनिज चिंतित हैं, उन्हें एक निर्माता पर भरोसा नहीं है और उस योग्यता का कोई महत्व नहीं होगा जो जैनियों को प्रभावित करती है। जैसा भी हो, आपके पास एक धर्म है जो एक निर्माता पर भरोसा नहीं करता है, प्रत्येक धर्म के लिए दिल में भरोसा होना चाहिए और उसे नैतिकता और अच्छी विधियों में विश्वास होना चाहिए। 

नतीजतन, जो कुछ भी एक आदमी को अपने दिल से जोड़ता है और जो भी अच्छे और नैतिक मानक पुरुषों के जीवन का प्रबंधन करते हैं, वह स्वयं ही संविधान द्वारा समझे गए धर्म का गठन कर सकते है। एक धर्म में कई मुख्यधारा के अभ्यास हो सकते हैं, इसमें सामान्य दृष्टिकोण हो सकते हैं, फिर भी ये सामान्य अभ्यास और दृष्टिकोण के साथ भी, संविधान द्वारा समझे गए धर्म का गठन नहीं करते हैं। ऐसे भी धर्म हैं, जो प्रत्येक मानव आंदोलन को अपने कफन में लाते हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है जो एक आदमी नही कर सकता है, चाहे वह कपड़ों या खाने या पीने की विधि हो, जिसे धार्मिक नहीं माना जाता है। किसी भी मामले में, यह अनुशंसा (रिकमेंड) करना हास्यास्पद है कि मुख्यधारा के राज्य के लिए किसी भी समय एक संविधान से यह अपेक्षा की जाती है कि प्रत्येक मानव और अचूक कार्रवाई को धर्म के बहाने सुरक्षित किया जाना चाहिए, और यह इस तरह से धर्म के सख्त अर्थ को समझने में है, जिसे हमें आर्टिकल 25 और 26 में देखना चाहिए।

  • दरगाह समिति, अजमेर बनाम सैयद हुसैन अली (अब से दरगाह समिति मामला)

दरगाह समिति मामले में, “धर्म के मुद्दों” पर समझौता करने के लिए एक अपील की गई थी, जो कि आर्टिकल 26 के क्लॉज (b) के तहत सुनिश्चित है। वर्तमान मामले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (बैकड्रॉप) निम्नलिखित है: 1955 में, संसद ने दरगाह को विनियमित करने और अजमेर में दरगाह ख्वाजा मोइनुद्दीन ईसाई के आशीर्वाद को विनियमित करने के लिए दरगाह ख्वाजा साहब अधिनियम पास किया था। यह दरगाह, जो एक मुस्लिम अग्रणी (पायोनिर) है, ख्वाजा मोइनुद्दीन साहब की कब्र पर काम करती है, जो एक ईसाई पवित्र व्यक्ति थे, और अब मुस्लिम और हिंदू दोनों यात्री वहा जाते हैं।

1955 के दरगाह ख्वाजा साहेब अधिनियम की धारा 4 और 5 में, केंद्र सरकार द्वारा दरगाह बंदोबस्ती (एंडोमेंट) को नियंत्रित करने और उससे निपटने के लिए एक दरगाह समिति की व्यवस्था को समायोजित किया गया। अधिनियम की धारा 4 और 5 की शर्तों के अनुसार, पैनल के व्यक्ति, सरकार द्वारा नामित हनफ़ी मुसलमान होने चाहिए। अधिनियम की धारा 15 ने निर्देश दिया कि समिति को ईसाई पवित्र व्यक्ति की कब्र पर स्थापना अनुष्ठानों (रिचुअल्स) और कार्यों को करने और नेतृत्व करने में ईसाई पवित्र व्यक्ति के मुस्लिम दिशानिर्देशों और नियमों का पालन करना चाहिए।

खादिमों (मकबरे की पारंपरिक देखभाल करने वाले) ने अधिनियम की वैधता का परीक्षण इस आधार पर किया कि, इसने आर्टिकल 26 (b), (c) और (d) में सुनिश्चित अधिकारों का उल्लंघन किया है। उनका परीक्षण राजस्थान के हाई कोर्ट में प्रचलित था। निर्णय देते समय, राजस्थान हाई कोर्ट ने देखा कि समिति के व्यक्तियों की व्यवस्था इस हद तक अधिकारहीन थी, कि समिति के व्यक्तियों की व्यवस्था ईसाई व्यक्तियों की व्यवस्था से दूर रखी गई, जिन्हें धार्मिक प्रथाओं में विश्वास है और ईसाई पवित्र व्यक्ति अल्तार से संबंधित रीति-रिवाज है। पूजा स्थल के अधिकारियों के लाभों और दायित्वों को प्रभावित करने वाले अधिनियम की विभिन्न व्यवस्थाओं को भी संविधान के आर्टिकल 19 और 25 का उल्लंघन घोषित किया गया था।

अपील पर, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि उक्त अधिनियम के प्रावधान, धार्मिक समूहों को सुनिश्चित करने वाले संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं थे। कोर्ट ने देखा कि अधिनियम केवल धर्म से संबंधित सामान्य प्रथाओं को प्रबंधित करता है, जो कि धर्म का एक मौलिक या महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं थी।

गजेंद्रगडकर, जिन्होंने कोर्ट के सुसंगत (कंसिस्टेंट) निर्णय से अवगत कराया, ने कहा: जब तक हम इस बिंदु को प्रबंधित कर रहे हैं, यह संयोग से एक चेतावनी के नोट पर प्रहार करने और यह देखने के लिए अजीब नहीं हो सकता है कि सभी को एक साथ संदर्भित किया जा रहा है कि प्रथाओं को धर्म के एक टुकड़े के रूप में माना जाना चाहिए, इन्हें उक्त धर्म द्वारा इसके मौलिक और महत्वपूर्ण भाग के रूप में देखा जाना चाहिए; आम तौर पर मुख्यधारा के लोग जो धर्म का एक बुनियादी या आवश्यक हिस्सा नहीं हैं, वे धार्मिक रूप से तैयार होने के लिए उपयुक्त हैं और आर्टिकल 26 के महत्व के भीतर धार्मिक प्रथाओं के रूप में व्यवहार करने के लिए एक मामला बना सकते हैं। इस प्रकार, यहां तक ​​​​कि प्रथाएं भले ही धार्मिक हों और केवल अंधविश्वासों से उत्पन्न हुई हों, इस अर्थ में धर्म के लिए अनावश्यक संचय (एक्युमुलेशन) हो सकता है। जब तक इस तरह की प्रथाएं एक धर्म के मौलिक और बुनियादी हिस्से का गठन करने के लिए नहीं पाई जाती हैं, तब तक आर्टिकल 26 के तहत सुरक्षा के लिए उनके मामले की ठीक से जांच की जा सकती है; जैसे, बीमा ऐसी धार्मिक प्रथाओं के लिए रखा जाना चाहिए, जैसे कि एक बुनियादी और एक आवश्यक टुकड़ा और कोई अन्य नहीं।

मामले के फैसले को व्यक्त करते हुए, श्री पी.बी. गजेंद्रगडकर, जिन्होंने कोर्ट का प्रतिनिधित्व किया, ने इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि आर्टिकल 26 (b) के तहत सुरक्षित ‘धर्म के मामले’, वे प्रदर्शन हैं जिन्हें मौलिक और आवश्यक भाग के रूप में निपटाया जाता है। उन्होंने सलाह दी कि आम तौर पर ऐसी चीजें जो धर्म से संबंधित नहीं हैं, उन्हें इसके दायरे में लाया जा सकता है ताकि धर्म का वास्तविक विश्वासों और प्रथाओं के लिए उपयोग या नियंत्रित किया जा सके, जो मानव समृद्धि को सशक्त (एंपावर) बनाने के विरोध में नुकसान कर सकते हैं। न्यायाधीश का ‘धर्म के मामलों’ को अलग करने के लिए चेतावनी, एक नोट पर प्रहार करने का उद्देश्य है, जिसका बीमा भारत के संविधान द्वारा धार्मिक प्रथाओं से जुड़े सामान्य अभ्यासों से सुनिश्चित किया गया है।

सन्दर्भ

 

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