इमरजेंसी इन इंडिया: एक्सप्लेनेशन ऑफ आर्टिकल 352-360 अंडर द कंस्टीट्यूशन (भारत में आपातकाल: संविधान के तहत अनुच्छेद 352-360 की व्याख्या)

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Emergency in India
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यह लेख गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, दिल्ली से संबद्ध विवेकानंद इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज की Kavita Chandra ने लिखा है। उन्होंने राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा से संबंधित प्रावधानों पर चर्चा की है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय (इंट्रोडक्शन)

ब्लैक लॉ की डिक्शनरी ने आपातकाल (इमरजेंसी) को “सामाजिक व्यवस्था (सोशल सिस्टम) जो जीवन की उचित परिस्थितियों को प्रदान करता है” की विफलता (फेलियर) के रूप में परिभाषित किया है। एक आपात स्थिति को “अचानक उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो सार्वजनिक अधिकारियों (पब्लिक अथॉरिटी) को दी गई शक्तियों के तहत तत्काल कार्रवाई की मांग करती है।”

भारत में, आपातकालीन प्रावधान ऐसे हैं कि संविधान संघीय सरकार (फेडरल गवर्नमेंट) को स्थिति की मांग होने पर एकात्मक सरकार (यूनिटरी गवर्नमेंट) की ताकत हासिल करने में सक्षम (इनेबल्स) बनाता है। ऐसी स्थिति के दौरान सभी प्रशांत विधियों (पेसिफिक मेथड) को समाप्त कर दिया जाना चाहिए और आपातकाल का उपयोग ही अंतिम हथियार होना चाहिए क्योंकि यह भारत की सरकार की संघीय विशेषता (फेडरल फीचर) को प्रभावित करता है।

भारतीय संविधान के तहत तीन प्रकार की आपात स्थितियाँ हैं अर्थात्:

  • राष्ट्रीय आपातकाल (नेशनल इमरजेंसी)
  • राज्य आपातकाल (स्टेट इमरजेंसी)
  • वित्तीय आपातकाल (फाइनेंशियल इमरजेंसी)

राष्ट्रीय आपातकाल (नेशनल इमरजेंसी)

संविधान का अनुच्छेद 352 राष्ट्रीय आपातकाल के प्रावधान से संबंधित है जिसे देश की सुरक्षा, शांति, स्थिरता (स्टेबिलिटी) और शासन (गवर्नेंस) के लिए खतरा पैदा करने वाली कोई असाधारण स्थिति (एक्स्ट्राआर्डिनरी सिचुएशन) उत्पन्न होने पर लागू किया जाता है।

जब भी निम्नलिखित में से कोई भी आधार होता है, तो आपातकाल लगाया जा सकता है:

  1. युद्ध,
  2. बाहरी आक्रामकता;  या
  3. आंतरिक विद्रोह

अनुच्छेद 352 में यह प्रावधान है कि यदि राष्ट्रपति इस आधार पर ‘संतुष्ट’ है कि बाहरी आक्रमण (आउटसाइड एग्रेशन) या सशस्त्र विद्रोह (आर्म रिबेलियन) के कारण भारत की सुरक्षा को खतरा है, तो वह पूरे भारत या उसके एक हिस्से में इस आशय (इशू) की घोषणा जारी कर सकता है।

हालांकि, उप-खंड (3) में कहा गया है कि जब केंद्रीय मंत्रिमंडल (यूनियन कैबिनेट) द्वारा लिखित सलाह दी जाती है तो केवल राष्ट्रपति ही ऐसी घोषणा कर सकता है। ऐसी उद्घोषणा (प्रोक्लेमेशन) को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाना चाहिए और उद्घोषणा की घोषणा के एक महीने के भीतर अनुमोदित (अप्रूव्ड) किया जाना चाहिए अन्यथा यह समाप्त हो जाएगा।

इसके अलावा, यह आवश्यक नहीं है कि राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के लिए, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह वास्तव में होना चाहिए। ऐसी स्थिति उत्पन्न होने की संभावना होने पर भी राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की जा सकती है।

मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ में, यह माना गया है कि अनुच्छेद 352(1) के तहत राष्ट्रपति द्वारा जारी आपातकाल की उद्घोषणा की वैधता (वैलिडिटी) निर्धारित (डिटरमाईन) करने की न्यायिक समीक्षा (ज्यूडिशियल रीव्यू) पर कोई रोक नहीं हो सकती है। न्यायालय की शक्तियां केवल यह जांचने तक सीमित हैं कि संविधान द्वारा प्रदत्त (कन्फऱड) सीमाओं का पालन किया गया है या नहीं। यह जांच कर सकता है कि राष्ट्रपति की संतुष्टि वैध आधार पर है या नहीं। यदि राष्ट्रपति संतुष्ट हैं कि राष्ट्रीय आपातकाल के लिए आधार मौजूद हैं, लेकिन वह बेतुके (एब्सर्ड), दुर्भावनापूर्ण (मालाफाईड) या अप्रासंगिक (इररिलेवेंट) आधार पर आधारित हैं, तो यह नहीं माना जाएगा कि राष्ट्रपति ‘संतुष्ट’ हैं।

आपातकाल रद्द करने की प्रक्रिया (प्रोसीजर फॉर रिवॉकिंग इमरजेंसी)

यदि स्थिति में सुधार होता है तो राष्ट्रपति एक अन्य उद्घोषणा के माध्यम से आपातकाल को रद्द कर सकते हैं। संविधान के 44वें संशोधन (अमेंडमेंट) में यह प्रावधान है कि बैठक के लिए मांग लोकसभा के दस प्रतिशत या उससे अधिक सदस्यों द्वारा और उस बैठक में की जा सकती है; यह साधारण बहुमत से आपातकाल को अस्वीकृत या निरस्त कर सकता है। ऐसे मामले में आपातकाल तुरंत निष्क्रिय (इन ऑपरेटिव) हो जाएगा।

उद्घोषणा का प्रादेशिक विस्तार (टेरिटोरियल एक्सटेंट ऑफ प्रोक्लेमेशन)

राष्ट्रपति आवश्यकतानुसार पूरे भारत या भारत के किसी भी हिस्से के संबंध में आपातकाल की घोषणा कर सकता हैं।

आपातकाल की अवधि (ड्यूरेशन ऑफ इमरजेंसी)

यदि संसद (पार्लियामेंट) के दोनों सदनों (बोथ हाउसेस) द्वारा अनुमोदित किया जाता है तो राष्ट्रीय आपातकाल 6 महीने तक जारी रह सकता है और इसे हर 6 महीने के बाद संसद की मंजूरी से नवीनीकृत (रिन्यूड) किया जा सकता है।

लेकिन अगर उस 6 महीने में लोकसभा का विघटन (डिजोल्यूशन) होता है और राष्ट्रीय आपातकाल के नवीनीकरण का प्रस्ताव विचाराधीन (अंडर कंसीडरेशन) है, तो नवनिर्वाचित (न्यूली इलेक्टेड) लोकसभा की पहली बैठक से 30 दिनों तक आपातकाल मौजूद रहता है, बशर्ते कि इसे राज्यसभा द्वारा अनुमोदित किया गया हो।

44वें संशोधन 1978 तक, यदि संसद राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा को मंजूरी देती है तो यह कैबिनेट या कार्यपालिका (एक्जीक्यूटिव) की इच्छा पर चालू रहती है।

राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा या नवीनीकरण से संबंधित उपरोक्त में से कोई भी प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत (अर्थात उस सदन की कुल सदस्यता का बहुमत या उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम 2/3) द्वारा पारित (पास) किया जाना चाहिए। यह प्रावधान 44वें संशोधन 1978 द्वारा जोड़ा गया है और इससे पहले इस तरह के प्रस्ताव को साधारण बहुमत से पारित किया जा सकता है यानी उपस्थित और मतदान करने वाले कुल सदस्यों से अधिक।

आपातकाल की घोषणा के प्रभाव (इफेक्ट ऑफ प्रोक्लेमेशन ऑफ इमरजेंसी)

आपातकाल की उद्घोषणा के निम्नलिखित प्रभाव हैं:

केंद्र की कार्यकारी शक्तियों का विस्तार (एक्सटेंशन ऑफ एक्जीक्यूटिव पॉवर ऑफ द सेंटर)

  • अनुच्छेद 353 के अनुसार, संघ (यूनियन) अपनी कार्यकारी शक्ति का उपयोग राज्य को निर्देश देने की सीमा तक कर सकता है जिस तरह से राज्य द्वारा कार्यकारी शक्तियों का प्रयोग किया जाएगा।
  • अनुच्छेद 353 (बी) के अनुसार, केंद्रीय संसद राज्य सूची के मामलों से संबंधित कानून बना सकती है।
  • अनुच्छेद 354 के अनुसार, केंद्र और राज्य के बीच राजस्व (रेवेन्यू) का वितरण (डिस्ट्रीब्यूशन) केंद्र द्वारा बदला जा सकता है।
  • अनुच्छेद 83(2) के अनुसार, लोक सभा के सामान्य जीवन को राष्ट्रपति द्वारा हर बार एक वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है, जो कि उद्घोषणा के समाप्त होने के बाद 6 महीने से अधिक नहीं हो सकता है।
  • अनुच्छेद 358 के अनुसार, राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान, अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकारों (फंडामेंटल राइट्स) को निलंबित (सस्पेंड) कर दिया जाएगा। हालांकि, किसी भी मामले में, अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।

आपातकाल की घोषणा के प्रभाव (इफेक्ट ऑफ प्रोक्लेमेशन ऑफ इमरजेंसी)

एक बार आपातकाल की घोषणा हो जाने के बाद इसके गंभीर परिणाम होते हैं। इसका परिणाम लोगों के मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन पर प्रतिकूल प्रभाव (एडवर्स इफेक्ट) पड़ता है। आपातकाल की उद्घोषणा के परिणामों की व्याख्या नीचे की गई है:

 1) कार्यकारी (एक्जीक्यूटिव)

जब आपातकाल की उद्घोषणा चल रही है, संघ अपनी कार्यकारी शक्ति (एक्जीक्यूटिव पॉवर) का उपयोग राज्य को निर्देश देने की सीमा तक कर सकता है, जिस तरह से राज्य द्वारा कार्यकारी शक्तियों का प्रयोग किया जाएगा। संविधान (42वां संशोधन) अधिनियम 1976 ने अनुच्छेद 353 में एक परिणामी (कंसीक्वेंशियल) परिवर्तन किया गया है।

इसमें कहा गया है कि निर्देश देने और कानून बनाने की संघ की कार्यकारी शक्ति उस राज्य के अलावा अन्य राज्यों तक भी विस्तारित (एक्सटेंड) होगी जहां आपातकाल की घोषणा की गई है और यह लागू है। उपर्युक्त शक्ति का प्रयोग तभी किया जाएगा जब भारत या उसके क्षेत्र के किसी भी हिस्से की सुरक्षा को गतिविधियों (एक्टिविटीज) से खतरा हो जिसमें आपातकाल की घोषणा की गई है और संचालन (ऑपरेशन) में है।

सामान्य समय में, कार्यपालिका की शक्ति कुछ अपवादों के अधीन ऐसे निर्देश देने तक विस्तारित नहीं होती है।

 2) विधायी (लेजिस्लेटिव)

जब आपातकाल की घोषणा की गई हो, तो संसद को राज्य सूची (स्टेट लिस्ट) (सूची II) के संबंध में भी कानून बनाने की शक्ति होगी। आपातकाल संघ और राज्य के बीच विधायी शक्तियों के वितरण को निलंबित करता है न कि राज्य विधायिका (स्टेट लेजिस्लेचर) को।

 3) वित्तीय (फाइनेंशियल)

केंद्र और राज्य के बीच राजस्व के वितरण को बदलने का अधिकार केंद्र को है।

जब आपातकाल की उद्घोषणा चल रही हो, राष्ट्रपति आदेश द्वारा राज्य और संघ के बीच वित्तीय व्यवस्था (फाइनेंशियल अरेंजमेंट्स) को परिभाषित कर सकते हैं जैसा कि अनुच्छेद 268 से 279 तक प्रदान किया गया है। ऐसा आदेश संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा और जब आपातकाल की उद्घोषणा समाप्त हो जाएगी संचालित करने के लिए, ऐसा आदेश भी समाप्त हो जाएगा।

 4) लोकसभा का विस्तार जीवन (एक्सटेंशन लाइफ ऑफ लोक सभा)

लोक सभा के सामान्य जीवन को तब तक बढ़ाया जा सकता है जब आपातकाल की उद्घोषणा लागू हो।  इस तरह का विस्तार संसद द्वारा एक समय में एक वर्ष से अधिक की अवधि के लिए नहीं किया जा सकता है और किसी भी मामले में उद्घोषणा के समाप्त होने के बाद छह महीने की अवधि से अधिक नहीं किया जा सकता है।

 5) अनुच्छेद 19 द्वारा आश्वासित मौलिक अधिकारों का निलंबन (सस्पेंशन ऑफ फंडामेंटल राइट्स गारंटीड बाय आर्टिकल 19)

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 358 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा नागरिकों को आश्वासित मौलिक स्वतंत्रता (फंडामेंटल फ्रीडम) के निलंबन का प्रावधान करता है।

यह प्रदान करता है कि जब एक आपात स्थिति की घोषणा की गई है और यह लागू है, तो अनुच्छेद 19 में निहित प्रावधान किसी भी कानून बनाने या किसी भी कार्यकारी कार्रवाई करने से संबंधित राज्य की शक्ति को प्रतिबंधित नहीं करेंगे जो अनुच्छेद 19 द्वारा आश्वासित अधिकारों को कम करता है या छीनता है।

इसका अर्थ है कि आपातकाल की घोषणा के बाद अनुच्छेद 19 द्वारा आश्वासित स्वतंत्रता स्वतः ही निलंबित हो जाती है। एक बार जब आपातकाल की उद्घोषणा समाप्त हो जाती है, तो अनुच्छेद 19 जो आपातकाल के दौरान निलंबित हो गया था, स्वतः ही जीवन में आ जाता है।

मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के अधिकार का निलंबन: अनुच्छेद 359 (सस्पेंशन ऑफ द राइट ऑफ एनफोर्समेंट ऑफ फंडामेंटल राइट्स: आर्टिकल 359)

ए.डी.एम. जबलपुर बनाम एस शुक्ला, एआईआर 1976 एससी 1207

इस मामले को बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) (शरीर को पेश करने के लिए) मामले के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि जब भी किसी को गिरफ्तार किया जाता है, तो गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा यह सुप्रीम कोर्ट में दायर की जाने वाली रिट है। इससे पहले, जब आपातकाल की घोषणा की गई थी, इस रिट को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में नहीं माना गया था और निलंबित कर दिया गया था।

मामले के तथ्य यह थे कि 26 जून 1975 को भारत के राष्ट्रपति द्वारा आंतरिक अशांति (इंटरनल डिस्टर्बेंस) के कारण आपातकाल की घोषणा की गई थी। उक्त उद्घोषणा के बाद 27 जून 1975 को एक और उद्घोषणा की गई जिसमें राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 359(1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों को लागू किया।  इन शक्तियों का प्रयोग करते हुए, संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 के प्रवर्तन (एनफोर्समेंट) के लिए एक विदेशी सहित किसी भी व्यक्ति के न्यायालय में जाने का अधिकार और उपर्युक्त अनुच्छेदों के प्रवर्तन से संबंधित किसी भी न्यायालय में लंबित (पेंडिंग) कार्यवाही का अधिकार हटा दिया जायेगा।

इस मामले में मुख्य मुद्दा यह था कि “क्या हाई कोर्ट किसी व्यक्ति द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट पर विचार कर सकता है, जहां वह अपनी नजरबंदी (डिटेंशन) के लिए आधार को चुनौती देता है, उस मामले में जहां ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति के आदेशों के निष्पादन (एक्जिक्यूशन) में हिरासत में लिया गया है।

इस मामले में चार न्यायधीश- चीफ जस्टिस ए.एन.रे, वाई.वी.चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति एम.एच.बेग और पी.एन.  भगवती इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि, जबकि आपातकाल की उद्घोषणा अनुच्छेद 359 (1) के तहत लागू है, बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट अनुरक्षणीय (मेंटेनेबल) नहीं है।

चार न्यायाधीशों ने देखा कि आंतरिक सुरक्षा अधिनियम की धारा 16ए(9)बी के तहत की गई नजरबंदी को चुनौती देने के लिए अदालतों के पास कोई अधिकार या शक्ति नहीं है (जो यह प्रावधान करता है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ धारा 3 के तहत नजरबंदी आदेश पारित किया गया है, वह  किसी भी ऐसे आधार, सूचना या सामग्री के संचार या प्रकटीकरण के हकदार होंगे जैसा कि खंड (ए) में संदर्भित है या ऐसे आधार, सूचना या सामग्री वाले किसी भी दस्तावेज के उत्पादन के लिए) जैसा कि अधिनियम के तहत स्पष्ट रूप से कहा गया है कि  नजरबंदी के आधारों का खुलासा करने की जरूरत नहीं है।

इसलिए अदालत आदेश को चुनौती नहीं दे सकती है और हिरासत को मान्य करने के लिए राज्य या कार्यकारी निकाय से सवाल नहीं कर सकती है।  इसलिए कोई अधिकार क्षेत्र मौजूद नहीं है, तो पार्टी मौलिक अधिकारों पर मुकदमा बनाए रखने के लिए किसी भी अदालत में नहीं जा सकती है।

न्यायमूर्ति खन्ना ने एक असहमतिपूर्ण राय (डिसेंटिंग ओपिनियन) दी और कहा कि जब आपातकाल की घोषणा लागू होती है, तो व्यक्ति मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए अदालत में नहीं जा सकता है, लेकिन यह उसे क़ानून के माध्यम से अपने कानूनी उपाय का प्रयोग करने से नहीं रोकता है।

न्यायमूर्ति खन्ना ने विशेष रूप से माखन सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले में दिए गए फैसले पर भरोसा किया जिसमें उन्होंने निर्दिष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति अपने निरोध आदेश की वैधता को चुनौती देते हुए, किसी भी अधिकार की वकालत करता है जो आदेश में उल्लिखित अधिकारों के दायरे से बाहर है, किसी भी अदालत में जाने का उसका अधिकार निलंबित नहीं है, क्योंकि यह आदेश में निर्दिष्ट अधिकारों के साथ-साथ राष्ट्रपति के आदेश से भी बाहर है। मान लीजिए कि किसी व्यक्ति ने इस अधिनियम के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन किया है, और इस उल्लंघन के कारण उसे हिरासत में लिया गया है।

इसलिए, बंदी यह तर्क (कंटेंड) दे सकता है कि उसे इस आधार पर अवैध रूप से हिरासत में लिया गया है कि अधिनियम के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन नहीं किया गया है। इस तरह की याचिका अनुच्छेद 359(1) के बाहर है और इस तरह के आधार पर बंदियों को रिहा करने का अधिकार राष्ट्रपति के आदेश से प्रभावित नहीं हो सकता है। अनुच्छेद 21 को कम करने से जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित होना पड़ता है जो कि जन्म से ही भारत के प्रत्येक नागरिक को सुनिश्चित किए गए मौलिक अधिकार के साथ-साथ मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा द्वारा गारंटीकृत अधिकारों के खिलाफ है।

राज्यों की रक्षा करना संघ का कर्तव्य (ड्यूटी ऑफ द यूनियन टू प्रोटेक्ट द स्टेट्स)

यह सुनिश्चित करना संघ का कर्तव्य है कि राज्य अशांति और बाहरी आक्रमण से सुरक्षित रहे, जबकि आपातकाल की उद्घोषणा चल रही हो। संघ यह सुनिश्चित करेगा कि राज्य सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार काम करे।

राज्य आपातकाल (स्टेट इमरजेंसी)

अनुच्छेद 356 के अनुसार, यदि राष्ट्रपति किसी राज्य के राज्यपाल (गवर्नर) से रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद या अन्यथा संतुष्ट हो जाता है कि ऐसी स्थिति मौजूद है जहां किसी राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चल सकती है, तो वह एक उद्घोषणा जारी कर सकता हैI

समयांतराल (ड्यूरेशन)

जब अनुच्छेद 356 के तहत उद्घोषणा जारी की जाती है, तो इसे पहले संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा। ऐसी उद्घोषणा 2 महीने तक लागू रहेगी जब तक कि उक्त अवधि की समाप्ति से पहले इसे संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुच्छेद 356 (3) के अनुसार अनुमोदित नहीं किया गया हो। मान लीजिए कि ऐसे मामले में जहां आपातकाल की उद्घोषणा जारी करने के दौरान लोकसभा भंग कर दी गई है या इसका विघटन (डिजोल्यूशन) दो महीने की उक्त अवधि के भीतर होता है और राज्य सभा ने उद्घोषणा को मंजूरी दे दी है लेकिन लोकसभा ने इसे मंजूरी नहीं दी है।

ऐसे मामले में, उक्त उद्घोषणा तब तक लागू नहीं होगी जब तक कि 30 दिनों की समाप्ति से पहले इसे लोकसभा द्वारा इसके पुनर्निर्माण (रिकंस्ट्रक्शन) के बाद भी पारित नहीं कर दिया जाता है। यह उद्घोषणा संसद द्वारा अनुमोदित किए जाने के बाद 6 महीने तक लागू रहेगी। आपातकाल की अवधि को एक बार में 6 महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है लेकिन यह 3 साल से अधिक समय तक चालू नहीं रह सकता है।

निरसन (रिवोकेशन)

बाद की उद्घोषणा द्वारा, राज्य आपातकाल की घोषणा को रद्द किया जा सकता है।

प्रभाव (इफेक्ट्स)

राज्य आपातकाल के निम्नलिखित प्रभाव होंगे:

  • राष्ट्रपति के पास वे सभी शक्तियाँ होंगी जो राज्य में राज्यपाल द्वारा प्रयोग की जा सकती हैं।
  • राष्ट्रपति यह घोषणा करेगा कि राज्य अपनी विधायी शक्तियों का प्रयोग संसद के अधिकार के तहत करेगा।
  • यदि राष्ट्रपति उचित समझे तो उद्घोषणा के उद्देश्य की पूर्ति के लिए आवश्यक प्रावधान किए जाये, तो वह ऐसे प्रावधान कर सकता है।

अनुच्छेद 352 और 356 के बीच अंतर (डिफरेंस बिटवीन आर्टिकल 352 एंड 356)

अनुच्छेद 352 के तहत, राज्य विधानमंडल और कार्यपालिका कार्य करना जारी रखती है लेकिन केंद्र को राज्य के मामलों में कानून और प्रशासन की समवर्ती (कंकरंट) शक्तियां प्राप्त होती हैं। अनुच्छेद 356 के तहत, कार्यपालिका के साथ-साथ विधायी शक्ति केंद्र में निहित है और राज्य विधानमंडल भंग (स्टेट लेजिस्लेटिव डिसोल्व्ड)  कर दिया गया है।

अनुच्छेद 352 के तहत केंद्र और सभी राज्यों के बीच संबंध (रिलेशन) बदल जाते हैं लेकिन अनुच्छेद 356 के मामले में केंद्र और राज्य के बीच संबंध जिसमें राष्ट्रपति शासन लागू होता है, बदल जाता है।

वित्तीय आपातकाल (फाइनेंशियल इमरजेंसी)

अनुच्छेद 360 के अनुसार, वित्तीय आपातकाल की उद्घोषणा जारी की जा सकती है, यदि राष्ट्रपति की राय है कि ऐसी स्थिति मौजूद है जहां भारत या क्षेत्र के किसी भी हिस्से की वित्तीय स्थिरता (स्टेबिलिटी) को खतरा है।

समयांतराल (ड्यूरेशन)

वित्तीय आपातकाल की उद्घोषणा 2 महीने के बाद काम करना बंद कर देगी जब तक कि इसे संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुमोदित नहीं किया जाता है। ऐसे मामले में जहां उद्घोषणा जारी करने के दौरान लोकसभा को भंग कर दिया गया है या उसका विघटन 2 महीने की उक्त अवधि के भीतर होता है और राज्य सभा ने उद्घोषणा को मंजूरी दे दी है लेकिन लोकसभा ने इसे मंजूरी नहीं दी है। फिर, ऐसी उद्घोषणा तब तक लागू नहीं होगी जब तक कि 30 दिनों की समाप्ति से पहले लोकसभा ने उद्घोषणा को मंजूरी देने वाला प्रस्ताव पारित नहीं कर दिया हो।

निरसन (रिवॉकेशन)

बाद की उद्घोषणा द्वारा, वित्तीय आपातकाल की उद्घोषणा को निरस्त किया जा सकता है।

प्रभाव (इफेक्ट्स)

वित्तीय आपातकाल के निम्नलिखित प्रभाव हैं:

  • संघ के कार्यकारी प्राधिकारी (एक्जीक्यूटिव अथॉरिटी) वित्तीय स्थिरता के रखरखाव (मेंटेनंस) के संबंध में राज्य को निर्देश देंगे।
  • इसमें राज्य में सेवारत (सर्विंग) सभी या किसी भी वर्ग के व्यक्तियों के वेतन और भत्तों (सैलरी एंड एलाउंस) में कमी के प्रावधान शामिल हो सकते हैं। इसमें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश शामिल हैं।
  • धन विधेयकों (मनी बिल) को राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए सुरक्षित रखा जाएगा।

निष्कर्ष (कंक्लूजन)

सभी आपातकालीन प्रावधानों से निपटने के बाद, ऐसे प्रावधानों को लागू करने के पीछे के उद्देश्य को समझना आसान है। लेकिन यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि जब ये प्रावधान राष्ट्र की सुरक्षा और लोगों की सुरक्षा के लिए प्रदान किए जाते हैं, तब भी प्रावधान अपने आप में कार्यपालिका के हाथों में अत्यधिक विवेकाधीन (डिस्क्रेशनरी) शक्तियाँ देते हैं। यह राष्ट्र के संघीय ढांचे को प्रभावित करता है और अनिवार्य रूप से इसे एकात्मक (फेडरल स्ट्रक्चर) में बदल देता है।

इसलिए, अदालतों को केंद्र की शक्तियों का विस्तार करने की शक्ति दी जानी चाहिए, क्योंकि यह जांच करने के लिए एक अंतर्निहित तंत्र (बिल्ट इन मैकेनिज्म) के रूप में कार्य करेगा कि क्या संसद और कार्यपालिका द्वारा विवेकाधीन शक्तियों का मनमाने ढंग से उपयोग किया जा रहा है।

 

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