न्यायशास्त्र के तहत अधिकारों और कर्तव्यों की अवधारणा

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Jurisprudence
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यह लेख बनस्थली विद्यापीठ की Richa Goel ने लिखा है। इस लेख में, उन्होंने कानूनी अधिकारों और कर्तव्यों की अवधारणा पर चर्चा की है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

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परिचय

कानून प्रत्येक नागरिक के कानूनी अधिकार की रक्षा करता है। देश के नागरिक होने से लोगों को कानूनी अधिकार दिए जाते है। प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।

अर्थ

सामान्य शब्दों में, इसका अर्थ यह है कि कानून द्वारा अनुमति दिए हुए कार्य को कानूनी अधिकार कहा जाता है या राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त या संरक्षित कार्य को कानूनी अधिकार कहा जाता है। परिभाषा हॉलैंड, ऑस्टिन, पोलक जैसे न्यायविदों (ज्यूरिस्ट) के द्वारा दी गई है।

सालमंड के अनुसार:

एक कानूनी अधिकार एक “हित है जो कानून के शासन द्वारा संरक्षित और मान्यता प्राप्त है। यह एक ऐसा हित है जिसका अपना कर्तव्य है और जिसकी अवहेलना करना गलत है।”

ग्रे के अनुसार:

एक कानूनी अधिकार “वह शक्ति है जो मनुष्य के पास है, जिससे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को निश्चित कार्य करने के लिए या न करने के लिए कहा जाता है, और जहां से ​​​​समाज के व्यक्ति या व्यक्तियों पर कानूनी कर्तव्य लागू करने की शक्ति उत्पन्न होती है। उनका कहना है कि “अधिकार स्वयं हित नहीं है, यह सुरक्षित हित का आनंद लेने का साधन है”।

राजस्थान राज्य बनाम भारत संघ के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि “कानूनी अधिकार कानूनी कर्तव्यों के सहसंबद्ध (कोरिलेटिव्स) हैं और कानूनी अधिकारों को उन हितों के रूप में परिभाषित किया जाता है जिनकी रक्षा कानून अन्य व्यक्तियों पर कर्तव्यों को लागू करके करता है। लेकिन सख्त अर्थ में कानूनी अधिकार का अर्थ दूसरे की कानूनी शक्ति से उन्मुक्ति (इम्यूनिटी) है।

कानूनी अधिकार की आवश्यक शर्तें

सालमंड के अनुसार, पाँच आवश्यक शर्तें हैं जिन्हें पूरा करने की आवश्यकता है:

  • पर्सन ऑफ इन्हेरिटेंस/अधिकार का विषय

वह व्यक्ति होगा जो अधिकार का मालिक है। वह कानूनी अधिकार का विषय है। ऐसे व्यक्ति को पर्सन ऑफ इन्हेरिटेंस कहा जाता है। उदाहरण:-Y 20,000 रुपये में एक वैन खरीदता है। यहाँ Y अधिकार का विषय है।

उस स्थिति में भी जब संपत्ति अजन्मे बच्चे की वसीयत होती है, अजन्मा बच्चा संपत्ति का मालिक होता है, भले ही वह अनिश्चित हो।

  • पर्सन ऑफ इंसीडेंस/कर्तव्य का विषय

किसी अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों का यह कर्तव्य है कि वे हर व्यक्ति के अधिकार का सम्मान करें और उसे मान्यता दे। ऐसा व्यक्ति जिसका कानूनी कर्तव्य है, वह पर्सन ऑफ इंसीडेंस कहलाता है। उदाहरण- यदि A का B के विरुद्ध कानूनी अधिकार है, तो A के अधिकार का सम्मान करना B का कर्तव्य है।

  • कानूनी अधिकार की अन्तर्वस्तु (कंटेंट) या विषय वस्तु

कानूनी अधिकार की विषय वस्तु एक अनिवार्य तत्व है। यह कानूनी अधिकार के विषय से संबंधित है। यह कुछ करने या कुछ कार्यों को न करने से संबंधित है। यह एक व्यक्ति को, कानूनी अधिकार रखने वाले व्यक्ति के पक्ष में कुछ सहन (फॉरबीयर) करने या कार्य करने के लिए बाध्य करता है। उदाहरण-Y 20,000 रुपये में एक वैन खरीदता है। यहाँ Y अधिकार का विषय है। विषय वस्तु (Y) का कानूनी अधिकार है और वह दूसरों को बाहर कर सकता है।

  • कानूनी अधिकार का उद्देश्य

कानूनी अधिकारों का उद्देश्य एक वस्तु है जिस पर कानूनी अधिकार का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण- A कार को 1,00,000 रुपये में खरीदता है। यहाँ कार वस्तु है।

  • कानूनी अधिकार का शीर्षक

शीर्षक वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति को अधिकार निहित या प्रदान किया जाता है। यह कुछ निश्चित घटनाएँ हैं जिनके द्वारा अपने पिछले मालिक से अधिकार प्राप्त कर लिया जाता है। उदाहरण- खरीद या उपहार या वसीयत आदि द्वारा।

कानूनी अधिकार से संबंधित सिद्धांत

1. हित का सिद्धांत

रुडोल्फ वॉन जेरिंग द्वारा विकसित

रूडोल्फ वॉन जेरिंग ने कहा कि कानूनी अधिकार कानूनी रूप से संरक्षित हित है। उन्होंने लोगों की इच्छा के बजाय लोगों के हित को महत्व दिया था। मुख्य उद्देश्य, लोगों के हितों की रक्षा करना और व्यक्तिगत हितों के बीच संघर्ष से बचना है।

लोगों का हित समुदाय के जीवन में ही मौजूद है। ये किसी कानून द्वारा नहीं बनाए गए हैं।

सालमंड का सकारात्मक दृष्टिकोण

उन्होंने इस सिद्धांत का समर्थन किया लेकिन उन्होंने कहा कि इसकी प्रवर्तनीयता (एंफोर्सेबिलिटी) एक आवश्यक शर्त है।

सालमंड की आलोचना

उन्होंने हित के सिद्धांत की इस आधार पर आलोचना की कि हित राज्य द्वारा संरक्षित नहीं है। कानूनी अधिकार प्रदान करने के लिए, यह आवश्यक है कि राज्य द्वारा हितों की रक्षा और मान्यता प्राप्त की जानी चाहिए।

ग्रे का दृष्टिकोण

उन्होंने कहा कि यह सिद्धांत आंशिक रूप से सही है क्योंकि कानूनी अधिकार अपने आप में कोई हित नहीं है बल्कि यह केवल एक व्यक्ति के हितों की रक्षा के लिए है। उन्होंने यह भी कहा कि कानूनी अधिकार व्यक्ति को एक निश्चित कार्य करने / कानून की एजेंसी “राज्य” के माध्यम से उन पर कानूनी कर्तव्य लगाकर मना करने का अधिकार प्रदान करते हैं।

डॉ एलन का दृष्टिकोण

यह कहा जा सकता है कि दोनों सिद्धांत एक दूसरे के विरोधाभासी नहीं हैं बल्कि यह दोनों सिद्धांतों का संयोजन (कॉम्बिनेशन) है। उन्होंने इन दो सिद्धांतों को यह इंगित करके संयोजित करने का प्रयास किया कि कानूनी अधिकार का सार कानूनी रूप से गारंटीकृत शक्ति नहीं है और न ही कानूनी रूप से स्वयं द्वारा संरक्षित है, बल्कि कानूनी रूप से गारंटीकृत शक्ति है जो हित के लिए है। यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि दोनों सिद्धांत कानूनी अधिकार के आवश्यक तत्व हैं।

2. इच्छा का सिद्धांत (विल थ्योरी)

कांट, हिगल, ह्यूम द्वारा समर्थित

उनके सिद्धांत के अनुसार “अधिकार मानव इच्छा का एक अंतर्निहित गुण है”। कानून का उद्देश्य स्वतंत्र इच्छा की अभिव्यक्ति की अनुमति देना है। विषय वस्तु मानव इच्छा से ली गई है।

अधिकारों को ऑस्टिन, पोलक और हॉलैंड द्वारा इच्छा के शब्दों में परिभाषित किया गया है। जॉन लॉक के अनुसार, “अधिकार का आधार व्यक्ति की इच्छा है”। पुचता के अनुसार कानूनी अधिकार व्यक्ति को उस वस्तु पर अधिकार देता है जो अधिकार के माध्यम से उस व्यक्ति की इच्छा के अधीन हो सकती है, जो अधिकार का आनंद ले रहा है।

डुगट के द्वारा आलोचना की गई

उनके अनुसार कानून का आधार व्यक्तिपरक इच्छा नहीं है बल्कि यह एक उद्देश्यपूर्ण इच्छा है। कानून का उद्देश्य केवल उन कार्यों की रक्षा करना है जो आगे सामाजिक एकजुटता का समर्थन करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि व्यक्तिपरक अधिकार का सिद्धांत एक आध्यात्मिक अमूर्तता (मेटाफिजिकल एब्स्ट्रैक्शन) है।

कानूनी अधिकार का वर्गीकरण

  • सर्वबंधी अधिकार (राईट इन रेम) और व्यक्तिबंधी अधिकार (राईट इन पर्सोना)

सर्वबंधी अधिकार बड़े पैमाने पर समाज के खिलाफ उपलब्ध अधिकार है। उदाहरण के लिए:- आईपीसी के तहत किया गया अपराध, क्योंकि यह राज्य के खिलाफ किया गया अपराध है।

व्यक्तिबंधी अधिकार का अर्थ है वह अधिकार जो किसी व्यक्ति के विरुद्ध उपलब्ध हो। उदाहरण अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) का उल्लंघन। जब अनुबंध का उल्लंघन होता है, तो जिस पक्ष ने कार्य का प्रदर्शन किया है, वह उल्लंघन करने वाले पक्ष के खिलाफ मुकदमा दायर करता है। व्यक्तिबंधी अधिकार प्रकृति में अस्थायी है, जिसे सर्वबंधी अधिकार में परिवर्तित किया जा सकता है। सर्वबंधी अधिकार प्रकृति में स्थायी है।

  • सकारात्मक अधिकार और नकारात्मक अधिकार

एक सकारात्मक अधिकार वह अधिकार है जिसमे किसी व्यक्ति को कुछ कार्य करने की आवश्यकता होती है जिसके पास संबंधित कर्तव्य है। जिस व्यक्ति पर कर्तव्य निहित है, उसे कुछ सकारात्मक कार्य करने चाहिए।

नकारात्मक अधिकार वे अधिकार हैं जो व्यक्ति को कुछ कार्य करने से रोकते हैं। नकारात्मक अधिकार, नकारात्मक कर्तव्य के अनुरूप हैं। जिस व्यक्ति पर ऐसा कर्तव्य लगाया जाता है, उसे कुछ कार्य करने से रोका जाता है।

  • व्यक्तिगत और साम्पत्तिक (प्रोपराइट्री) अधिकार

व्यक्तिगत अधिकार, अधिकार के मालिक का सम्मान करने का अधिकार है। व्यक्तिगत अधिकार का कोई आर्थिक मूल्य नहीं है और यह अधिकार व्यक्तिगत स्थिति या भलाई से संबंधित है। उदाहरण गरिमा (डिग्निटी) के साथ जीने का अधिकार, वाक् और अभिव्यक्ति (स्पीच एंड एक्सप्रेशन) की स्वतंत्रता का अधिकार।

साम्पत्तिक अधिकार संपत्ति के मालिक के संबंध में दिया जाता है। ये अधिकार ऐसे अधिकार हैं जिनका कुछ मौद्रिक मूल्य या आर्थिक मूल्य है और व्यक्ति की संपत्ति का गठन करते हैं। उदाहरण-पेटेंट अधिकार, भूमि का अधिकार, ऋण आदि।

  • पूर्ण और अपूर्ण अधिकार

पूर्ण अधिकार कानून द्वारा संरक्षित और मान्यता प्राप्त हैं और इसके उल्लंघन के लिए गलत करने वाले के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर किया जा सकता है। उदाहरण: A ने B से ऋण लिया है। B के पास ऋण का भुगतान करने का कर्तव्य है और A को ऋण राशि का दावा करने का पूर्ण अधिकार है। यदि B भुगतान करने में विफल रहता है तो A को अदालत में मुकदमा दायर करने का अधिकार है।

अपूर्ण अधिकार वे अधिकार हैं जिन्हें न तो मान्यता प्राप्त है और न ही कानून द्वारा संरक्षित है। उदाहरण: यदि ऋण समय-बाधित (टाइम बार्ड) हो जाता है, तो वह अपने धन का दावा कर सकता है लेकिन इसे कानून द्वारा लागू नहीं किया जा सकता है।

  • मूल और सहायक (प्रिंसिपल एंड एसेसरी) अधिकार

मूल अधिकार सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है। ये बुनियादी अधिकार हैं जो एक व्यक्ति पर निहित हैं।

सहायक अधिकार परिणामी या आकस्मिक (इंसीडेंटल) अधिकार है। ये महत्वपूर्ण नहीं हैं लेकिन ये बुनियादी अधिकार के प्रति प्रत्यक्ष (ओस्टेंसिबल) हैं।

  • परवस्तु (रे-एलिना) में अधिकार और स्ववस्तु (रे-प्रोप्रिया) में अधिकार

परवस्तु में अधिकार किसी अन्य व्यक्ति की संपत्ति के खिलाफ उपलब्ध अधिकार है। उदाहरण- सुखभोग (ईजमेंट) का अधिकार। यह प्रमुख विरासत और सहायक विरासत की न्यायशास्त्र (ज्यूरिस्प्रूडेंस) अवधारणा का परिणाम है।

स्ववस्तु में अधिकार अपनी संपत्ति के संबंध में उपलब्ध अधिकार है। इसका परिणाम पूर्ण स्वामित्व में होता है। यह स्वामित्व की न्यायशास्त्र की अवधारणा का परिणाम है।

  • साकार  और निराकार (कॉरपोरल एंड इंकॉरपोरल) अधिकार

दोनों अधिकार कानून द्वारा संरक्षित हैं। साकार अधिकार मूर्त (टैंजिबल) वस्तुओं या भौतिक (मैटेरियल) वस्तुओं पर अधिकार है। साकार अधिकार उन वस्तुओं पर अधिकार हैं जिन्हें देखा, स्पर्श या अनुभव किया जा सकता है। उदाहरण: मैं घड़ी खरीदता हूँ। घड़ी का भौतिक अस्तित्व है इसलिए उस पर मेरा एक साकार अधिकार है।

निराकार अधिकार उस वस्तु पर अधिकार है जिसे देखा या छुआ नहीं जा सकता है। उदाहरण प्रतिष्ठा का अधिकार।

  • कानूनी और न्यायसंगत अधिकार

कानूनी अधिकार सामान्य कानून यानी इंग्लैंड के न्यायालय द्वारा संरक्षित हैं। सामान्य कानून उपयोग और प्रथा पर निर्भर करता है।

न्यायसंगत अधिकार न्यायसंगत अदालत या चांसलर की अदालत द्वारा संरक्षित हैं। मूल सिद्धांत प्राकृतिक न्याय, समानता, न्याय और अच्छा विवेक है।

  • प्राथमिक और मंजूरी अधिकार

प्राथमिक अधिकार महत्वपूर्ण है और बुनियादी अधिकार है। ये अधिकार वास्तव में हैं। ये अधिकार प्रकृति में स्वतंत्र हैं। इसमें एक बाध्यकारी बल है। ये सर्वबंधी अधिकार हैं। उदाहरण: प्रतिष्ठा का अधिकार।  यदि ऐसे मामले में इन अधिकारों का उल्लंघन होता है तो कोई व्यक्ति कानून की अदालतों का रुख कर सकता है। इस तरह के अधिकार के खिलाफ मुआवजे या जुर्माना या कारावास के रूप में एक कानूनी उपाय उपलब्ध है।

मंजूरी अधिकार परिणामी अधिकार हैं। ये प्राथमिक अधिकारों के अधिकारों का समर्थन करते हैं। ये व्यक्तिबंधी अधिकार हैं, जो कुछ गलत कामों का परिणाम है। उदाहरण: यह तब उत्पन्न होता है जब प्राथमिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।

  • सार्वजनिक और निजी अधिकार

सार्वजनिक अधिकार वह अधिकार है जिसका प्रयोग राज्य करता है। उदाहरण- मतदान का अधिकार, सड़क का उपयोग करने का अधिकार आदि। निजी अधिकार का प्रयोग व्यक्ति अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए करता है। उदाहरण:- सोने का अधिकार, स्वच्छ जल का अधिकार।

  • निहित और समाश्रित (कंटिंजेंट) अधिकार

एक निहित अधिकार एक ऐसा अधिकार है जो शुरू से ही व्यक्ति पर निहित है। किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रदान करने के लिए किसी आयोजन की आवश्यकता नहीं है। यह वर्तमान स्थिति पर निर्भर करता है।

समाश्रित अधिकार वे अधिकार हैं जो कुछ कार्यों के घटित होने या न होने पर प्रदान किए जाते हैं। यह अधिकार भविष्य के कार्यों पर निर्भर करते है। यदि निर्धारित कार्य होता है तो ही व्यक्ति को अधिकार प्रदान किए जाएंगे।

कानूनी अधिकार कैसे लागू किया जाता है?

यूबी जस ईबी रेमेडियम जिसका मतलब है कि जहां अधिकार है वहां उपाय है। यदि व्यक्ति के अधिकार का उल्लंघन होता है तो वह अदालत में जा सकता है। उन्हें मुआवजे के रूप में राहत मिल सकती है। जब मुआवजा वादी के दावे को संतुष्ट नहीं करता है तो अदालत अनुबंध के विशिष्ट प्रदर्शन (स्पेसिफिक परफॉर्मेंस) के लिए आदेश दे सकती है। यह विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम (स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट) द्वारा शासित है।

कर्तव्य

जब अधिकार व्यक्ति को दिया जाता है तो यह माना जाता है कि उस व्यक्ति पर कुछ कर्तव्य भी थोपे जाते हैं। अधिकार के अपने सहसंबद्ध कर्तव्य हैं। दो प्रकार के कर्तव्य होते हैं:-

  • जब व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने कर्तव्य का पालन करे तो उसके पास कानूनी कर्तव्य होता है, 
  • नैतिक (मोरल) कर्तव्य के मामले में उसका कोई दायित्व नहीं है। यह एक व्यक्ति के विवेक पर है।

कर्तव्यों को, पूर्ण और सापेक्ष (रिलेटिव) कर्तव्य, सकारात्मक और नकारात्मक कर्तव्य और प्राथमिक और माध्यमिक कर्तव्य में वर्गीकृत किया गया है।

निष्कर्ष

हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि अधिकार और कर्तव्य सह-अस्तित्व में हैं। सालमंड के शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि कोई भी अधिकार संबंधित कर्तव्य के बिना मौजूद नहीं है। व्यक्ति का प्रत्येक कर्तव्य किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति कर्तव्य होना चाहिए, जिसमें अधिकार निहित है और इसके विपरीत प्रत्येक अधिकार कुछ व्यक्तियों के विरुद्ध होना चाहिए जिन पर कर्तव्य लगाया गया है।

संदर्भ

  • 1978 एससीआर (1)1

 

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