सी.आर.पी.सी. की धारा 190

0
165
Criminal Procedure Code

यह लेख यूनाइटेडवर्ल्ड स्कूल ऑफ लॉ, कर्णावती विश्वविद्यालय, गांधीनगर, स्नातक, की छात्रा Kishita Gupta के द्वारा लिखा गया है। इस लेख में आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 190 पर चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

क्या आपने कभी सोचा है कि अगर कानून की किताबों में गिरफ्तारी की प्रक्रिया को ठीक से परिभाषित नहीं किया गया होता तो क्या होता? खैर, मेरा मानना ​​है कि यह केवल आपराधिक न्याय प्रणाली में अराजकता (क्योस) की ओर ले जाएगा। इस प्रकार, भारत में, आपराधिक प्रक्रिया संहिता, आपराधिक न्याय के मामलों में पालन की जाने वाली सभी प्रक्रियाओं को परिभाषित करती है। इनमें से एक प्रक्रिया में मजिस्ट्रेट को आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 190 के तहत आपराधिक मामलों का संज्ञान (कॉग्निजेंस) लेने का अधिकार शामिल है। इस लेख में, लेखक सी.आर.पी.सी. की धारा 190 पर चर्चा करेंगे।

संज्ञान लेने से क्या तात्पर्य है

सी.आर.पी.सी. और अन्य अधिनियम यह परिभाषित या स्पष्ट नहीं करते हैं कि जब एक सक्षम मजिस्ट्रेट किसी अपराध का “संज्ञान” लेता है तो उसका क्या मतलब होता है। हालाँकि, अच्छी तरह से स्थापित कानूनी घोषणाओं के माध्यम से, वाक्यांश का स्पष्ट अर्थ सामने आ गया है।

अदालत या न्यायाधीश का जिक्र करते समय, “संज्ञान लेना” वाक्यांश का वास्तव में अर्थ है “जागरूक होना”, लेकिन इसका अर्थ “न्यायिक रूप से नोटिस लेना” भी है। आपराधिक कानून में वाक्यांश का कोई गूढ़ (एसोटेरिक) अर्थ नहीं है। वास्तव में, “संज्ञान लेने” का अर्थ आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 190 के तहत कानूनी कार्रवाई शुरू करने के लिए किसी अपराध के बारे में सूचित किया जाना है।

शब्द “संज्ञान” उस क्षण को संदर्भित करता है जब अदालत न केवल पुलिस रिपोर्ट या शिकायत में दी गई जानकारी पर विचार करके बल्कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता के अध्याय XIV में वर्णित अनुसार आगे बढ़ते हुए किसी अपराध का न्यायिक नोटिस लेती है। संज्ञान लेना, यह निर्धारित करने के लिए कार्रवाई करना है कि कानूनी प्रक्रिया शुरू करने का पर्याप्त कारण है या मजिस्ट्रेट को अपराधी के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू करना है।

संज्ञान लेना तब कहा जाता है जब एक मजिस्ट्रेट सी.आर.पी.सी. की धारा 200, 202, या 204 के तहत एक जांच और मुकदमे की दिशा में आगे की कार्रवाई करने के लिए आलोचनात्मक (क्रिटिकल) नजर से अपराध की कथित रूप से जांच करता है। हालांकि, किसी अन्य कार्रवाई के लिए मजिस्ट्रेट के निर्णय का उपयोग, जैसे कि पुलिस जांच का आदेश देना या तलाशी वारंट जारी करना, अपराध का संज्ञान लेने के रूप में नहीं समझा जा सकता है। सी.आर.पी.सी. की धारा 190 और धारा 204 की योजनाओं के माध्यम से जाने पर, यह पाता चलता है कि धारा 190 अपराध के संज्ञान की बात करता है और धारा 204 तब सामने आता है अगर मजिस्ट्रेट अपराध का संज्ञान लेने के बाद यह पाता है प्रक्रियाओं को जारी करके आगे बढ़ने के लिए मामले में पर्याप्त आधार मौजूद है।

सीधे शब्दों में कहें तो किसी जांच या मुकदमे के लिए अपराध की न्यायिक सूचना लेना “संज्ञान” के रूप में जाना जाता है। संज्ञान लेने में कोई औपचारिक (फॉर्मल) गतिविधि शामिल नहीं है।

किसी मुकदमे के वैध होने के लिए, संज्ञान लेना एक पूर्व आवश्यकता या शर्त होती है। यहां, अपराध को संज्ञान में लिया जाता है, अपराधी को नहीं। इसलिए, आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 190 के अनुसार, मजिस्ट्रेट के द्वारा “संज्ञान लेना” माना जाता है जब भी वह उसमें प्रस्तुत आरोपों के बारे में पूरी तरह से सूचित हो जाता है और अपराध की जांच या परीक्षण के साथ आगे बढ़ने का फैसला करता है।

सी.आर.पी.सी. की धारा 190 क्या है

धारा 190 मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधों के संज्ञान पर चर्चा करती है।

  1. इस अध्याय के प्रावधानों के अधीन, प्रथम श्रेणी का कोई भी मजिस्ट्रेट और उप-धारा (2) के तहत इस संबंध में विशेष रूप से सशक्त (एंपावर्ड) द्वितीय श्रेणी का कोई भी मजिस्ट्रेट किसी भी अपराध का संज्ञान ले सकता है-
  • उन तथ्यों की शिकायत प्राप्त होने पर जो इस तरह के अपराध का गठन करते हैं 
  • ऐसे तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट के सामने आने पर;
  • एक पुलिस अधिकारी के अलावा किसी अन्य व्यक्ति से प्राप्त जानकारी पर, या अपने स्वयं के ज्ञान पर, कि ऐसा अपराध किया गया है।

2. मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय श्रेणी के किसी भी मजिस्ट्रेट को उप-धारा (1) के तहत ऐसे अपराधों का संज्ञान लेने के लिए सशक्त कर सकता है जो उसकी जांच या विचारण करने की क्षमता के भीतर हैं।

गिरफ्तारी का फैसला कौन लेता है

आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 के अनुसार, दो अलग-अलग प्रकार की गिरफ्तारियां होती हैं: वारंट के साथ की गई गिरफ्तारी और बिना वारंट के की गई गिरफ्तारी। गिरफ्तारी का वारंट एक लिखित दस्तावेज होता है जिसे एक मजिस्ट्रेट जारी करता है और हस्ताक्षर करता है। यह एक पुलिस अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति को विशेष रूप से पहचानता है और उसे उसमें वर्णित व्यक्ति की गिरफ्तारी करने का निर्देश देता है, जिस पर अपराध का आरोप लगाया गया होता है।

इस प्रकार, यह स्पष्ट हो जाता है कि संहिता के प्रस्तावित गिरफ्तारी का निर्णय या तो अदालत के अधिकारियों द्वारा या अन्य लोगों द्वारा किए जाते हैं। वेन आर. लाफवे के द्वारा कहा गया था कि:

एक आपराधिक न्याय प्रणाली में, आमतौर पर यह सोचा जाता है कि निर्णय लेने में न्यायिक भागीदारी, समाज और व्यक्ति के हितों के बीच उचित संतुलन सुनिश्चित करने के लिए वांछनीय (डिजायरेबल) है। यह माना जाता है कि एक “तटस्थ (न्यूट्रल) और अलग” न्यायिक कार्यालय द्वारा किया गया एक “निःस्वार्थ दृढ़ संकल्प” हितों के इस संतुलन को सर्वोत्तम रूप से पूरा करेगा।

गिरफ्तारी के समय, यह अक्सर माना जाता है कि पुलिस को मजिस्ट्रेट को साक्ष्य प्रदान करना चाहिए, जो अपराधियों का पता लगाने और उनकी गिरफ्तारी का आदेश देने की प्रतिस्पर्धी (कंपेटिटिव) प्रक्रिया में शामिल नहीं है, अगर कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता नहीं है।

आज जो कानून है, वह न्यायिक मजिस्ट्रेट को उन स्थितियों में गिरफ्तारी का वारंट जारी करने की अनुमति नहीं देता है, जहां तत्काल गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है और गिरफ्तारी के वारंट के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट से संपर्क करने के लिए पुलिस के पास पर्याप्त समय है, भले ही वह कितना भी उचित क्यों न हो। और यह वांछनीय हो सकता है कि न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा गिरफ्तारी का निर्णय लिया जाए। किसी अपराध का संज्ञान लेने के बाद ही मजिस्ट्रेट समन या गिरफ्तारी वारंट जैसी प्रक्रिया जारी कर सकता है।

किसी अपराध का गठन करने वाले तथ्यों की शिकायत प्राप्त होने के बाद ही, उन तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट प्राप्त करना, किसी पुलिस अधिकारी के अलावा किसी अन्य स्रोत से सूचना प्राप्त करना, और स्वयं अपराध का ज्ञान होना, अपराध का संज्ञान लेने के लिए इनमें से कोई भी आधार पूरे किए जा सकते हैं।

इसलिए, यह स्पष्ट है कि एक न्यायाधीश को जांच करते समय या अपराध होने की घोषणा करने से पहले गिरफ्तारी वारंट जारी करने की अनुमति नहीं होती है।

इस संबंध में दी गई अपनी 37वीं रिपोर्ट में भारत के विधि आयोग की राय काफी प्रासंगिक (रिलेवेंट) है। आयोग ने नोट किया कि, वारंट जारी करने से पहले, एक अपराध को संज्ञान में लिया जाना चाहिए। विपरीत प्रावधान, जो आमतौर पर विशेष विधियों में पाए जाते हैं, भी मौजूद हो सकते हैं। हालांकि, इस तरह के अनोखे प्रावधानों की अनुपस्थिति में, मजिस्ट्रेट द्वारा वारंट जारी करने से पहले एक कदम के रूप में, संहिता की संरचना संज्ञान की कल्पना करती है।

एक मामले में, न्यायालय ने पाया कि उसे खेद है कि, अत्यंत सम्मान के साथ, वह इस स्थिति से सहमत नहीं था कि एक मजिस्ट्रेट संज्ञान लिए बिना एक वारंट जारी कर सकता है [उस व्यक्ति की गिरफ्तारी के लिए जिसे धारा 41 के तहत वारंट के बिना हिरासत में लिया जा सकता है।] वह जानता है कि इसके विपरीत एक आदेश है [राम नारायण सिंह बनाम ए. सेन (1958) ]। 

इसके अलावा, हालांकि धारा 41 की भाषा की, “कोई भी पुलिस अधिकारी, मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना और बिना वारंट के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है,” ऐसा सुझाव देती है कि धारा 41 द्वारा शामिल किए गए मामलों में गिरफ्तारी करने का निर्णय लेने में एक पुलिस अधिकारी के पास कुछ विवेक है, लेकिन जब कोई 1861 के पुलिस अधिनियम की धारा 23 और 29 पर विचार करता है तो यह विवेक भ्रम की तरह सामने आता है।

इन परिस्थितियों में धारा 41 में सूचीबद्ध किसी भी अपराध के लिए गिरफ्तारी करने से पहले गिरफ्तारी वारंट हासिल करने के लिए एक पुलिस अधिकारी से किसी मंत्री से संपर्क करने की उम्मीद करना अनुचित होगा। इसलिए, यह सुझाव दिया जाता है कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता में एक स्पष्ट प्रावधान शामिल करने के लिए संशोधन किया जाना चाहिए, जिसमें न्यायिक मजिस्ट्रेटों को एक अपराध का संज्ञान लेने से पहले और धारा 41 द्वारा शामिल की गई परिस्थितियों में, गिरफ्तारी वारंट जारी करने की अनुमति दी जाए। इस खंड के हिस्से के रूप में, पुलिस अधिकारियों को वारंट के बिना गिरफ्तारी नहीं करने का निर्देश दिया जाना चाहिए, जब तक कि परिस्थितियों के कारण ऐसा करना बिल्कुल आवश्यक न हो जाए।

सी.आर.पी.सी. की धारा 190 के तहत मजिस्ट्रेट की शक्ति का विश्लेषण

संज्ञान लेने के तरीके सी.आर.पी.सी. की धारा 190(1) A, B और C में उल्लिखित हैं।

मजिस्ट्रेट ने सी.आर.पी.सी. की धारा 190(1)(a) के तहत एक शिकायत प्राप्त होने पर अपराध का संज्ञान लिया माना जाता है, जब वह सी.आर.पी.सी. की धारा 200 और बाद की धाराओं के तहत कार्यवाही के उद्देश्यों के लिए अपना दिमाग लगाता है।

इसी प्रकार, यह मानना ​​​​स्वीकार्य है कि मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लिया है, जब शिकायत प्राप्त करने के बाद शिकायतकर्ता की जांच की जाती है कि क्या शिकायत में उल्लिखित दावे सही हैं या पर्याप्त हैं, या ऐसे मामले में आगे की कार्रवाई की जानी है या नहीं।

हालांकि, सी.आर.पी.सी. की धारा 202 के तहत अनुमत पूछताछ या जांच का उद्देश्य पूरी तरह से मजिस्ट्रेट को यह पता लगाने की अनुमति देना है कि शिकायत में निहित दावा सही है या गलत है, ताकि यह तय किया जा सके कि प्रक्रिया जारी की जानी चाहिए या नहीं। यह जांच या परीक्षण संज्ञान के चरण के बाद किया जाता है। 

मजिस्ट्रेट के द्वारा तुरंत प्रक्रिया जारी की जा सकती है, अगर शिकायत को पढ़ने के बाद, उसके द्वारा यह निर्धारित किया जाता है कि व्यक्ति पर लगाए गए आरोप एक संज्ञेय अपराध को दिखाते हैं। अगर वह तुरंत अपराध का संज्ञान नहीं लेता है तो वह सी.आर.पी.सी. की धारा 156(3) के तहत जांच का आदेश दे सकता है। ऐसा कदम उठाकर मजिस्ट्रेट अपना कीमती समय किसी विषय को देखने में खर्च करने से बच जाता है। एक मजिस्ट्रेट इसलिए अपराध का संज्ञान लेने के विकल्प के रूप में पुलिस जांच का आदेश दे सकता है।

यदि एक मजिस्ट्रेट पुलिस जांच का अनुरोध करता है, तो उसके लिए शिकायतकर्ता को शपथ दिलाना आवश्यक नहीं है। यह इस तथ्य के कारण है कि वह भीतर के अपराध को पहचान नहीं पाएगा। पुलिस रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद, जिसमें आगे के महत्वपूर्ण मामले के विवरण शामिल होता हैं, एक मजिस्ट्रेट बहुत अच्छी तरह से संज्ञान लेने का निर्णय ले सकता है।

अगर वह सी.आर.पी.सी. की धारा 156(3) के तहत पुलिस जांच का निर्देश दे रहा है तो उसे अपराध का संज्ञान लेने वाला नहीं माना जा सकता है। ऐसे में मजिस्ट्रेट पुलिस रिपोर्ट की समीक्षा के बाद ही संज्ञान लेंगे। जांच के निष्कर्ष के बाद पुलिस रिपोर्ट प्राप्त होने पर, मजिस्ट्रेट तत्काल इसे जारी करने की प्रक्रिया का उपयोग कर सकते हैं और धारा 190 (1)(b) के तहत अपराध का संज्ञान ले सकते हैं। धारा 190 (1)(b) के अनुसार, एक मजिस्ट्रेट के द्वारा समन जारी किया जा सकता है भले ही पुलिस रिपोर्ट केवल संदर्भ के लिए ही एक रिपोर्ट हो, जो यह दर्शाता है कि रिपोर्ट में मामले का समर्थन करने वाला कोई सबूत नहीं है। इस स्थिति में, उसे धारा 200 और धारा 202 में उल्लिखित प्रक्रिया का पालन करने की आवश्यकता नहीं होती है।

धारा 190 (1)(c) के अनुसार, मजिस्ट्रेट पुलिस अधिकारी के अलावा किसी अन्य स्रोत (सोर्स) से (भले ही वह स्रोत अपराध से व्यक्तिगत रूप से प्रभावित न हो) या अपने स्वयं के ज्ञान से, किसी भी अपराध के घटित होने की घोषणा कर सकता है। यह खंड एक मजिस्ट्रेट को किसी अपराध के खिलाफ मुकदमा चलाने का अधिकार देता है, अगर वह इसके बारे में जानता है, भले ही उसके सामने कोई शिकायत या पुलिस रिपोर्ट न हो।

मामले की बारीकियों के आधार पर, मजिस्ट्रेट ने अपराध का संज्ञान लिया हो सकता है या नहीं भी लिया हो सकता है। इसमें मामला शुरू करने की विधि और मजिस्ट्रेट द्वारा उठाए गए प्रारंभिक कदमों के प्रकार शामिल होते हैं।

संज्ञान लेना वैकल्पिक है

भले ही शिकायत में बताए गए तथ्य किसी अपराध के किए जाने का खुलासा करते हों, लेकिन शिकायत प्राप्त होने पर एक मजिस्ट्रेट को संज्ञान लेने की आवश्यकता नहीं होती है। वाक्यांश “संज्ञान ले सकता है” से यह चीज स्पष्ट हो जाती है। शब्द “हो सकता है” मजिस्ट्रेट को यह तय करने की अनुमति देता है कि उन्हें कैसे आगे बढ़ना है।

जब मजिस्ट्रेट किसी शिकायत, पुलिस रिपोर्ट, या किसी अपराध की रिपोर्ट करने वाले किसी व्यक्ति से प्राप्त जानकारी के विवरण पर अपने न्यायिक निर्णय को लागू करता है, तो ऐसे में संज्ञान लिया गया कहा जाता है।

न्यायालय के द्वारा कोई भी आवश्यक आदेश जारी करने से पहले उसे प्रस्तुत की गई सामग्रियों का ठीक से विश्लेषण किया जाता है। यह तब होता है जब मजिस्ट्रेट उस अपराधी, जिसके खिलाफ पहली बार में एक मजबूत मामला पेश किया गया है, के खिलाफ आरोप लगाने का फैसला करता है। प्रक्रिया जारी करना केवल अपराध का नोटिस लेने के बाद होता है; किसी अपराध का संज्ञान लेना प्रक्रिया जारी करने के समान नहीं होता है। एक मजिस्ट्रेट को शिकायत में सूचीबद्ध अपराधों का संज्ञान लेने पर विचार करना चाहिए जब वह एक प्रक्रिया जारी करने के लिए अपने विवेक का प्रयोग करता है।

पुलिस को जांच शुरू करने की अनुमति देने के लिए मजिस्ट्रेट पुलिस को कानून के अनुसार प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दे सकता है। यदि शिकायत एक संज्ञेय अपराध का खुलासा करती है, तब भी थाने के प्रभारी अधिकारी को प्राथमिकी दर्ज करनी चाहिए, भले ही मजिस्ट्रेट उन्हें ऐसा करने का निर्देश न दे। पुलिस अधिकारी प्राथमिकी (एफ.आई.आर.) दर्ज करने के बाद संहिता के अध्याय XII में नियोजित अतिरिक्त कार्रवाई कर सकता है।

पुलिस रिपोर्ट प्राप्त करने की शक्ति

शिकायत या पुलिस रिपोर्ट प्राप्त होने पर, मजिस्ट्रेट के पास अधिकार है कि वह:

  1. पुलिस रिपोर्ट को अस्वीकार करें और सी.आर.पी.सी. की धारा 203 के तहत कोई भी कार्रवाई करने से पहले सी.आर.पी.सी. की धारा 202 के तहत जांच का अनुरोध करें ।
  2. अगर वह पुलिस रिपोर्ट से असहमत है तो धारा 190 के तहत तुरंत संज्ञान लें।
  3. उसे सी.आर.पी.सी. की धारा 200 के तहत जांच के लिए भेजें।
  4. सी.आर.पी.सी. की धारा 200 के अनुसार शिकायतकर्ता और उपस्थित गवाहों द्वारा शपथ के तहत दिए गए बयानों को रिकॉर्ड करने के लिए आगे बढ़ना और उसके खिलाफ दायर की गई शिकायत के आधार पर अपराध का संज्ञान लेना।

दूसरे शब्दों में, प्रारंभिक शिकायत के आधार पर ही सी.आर.पी.सी. की धारा 200, 203, और 204 के तहत कार्यवाही करने की मजिस्ट्रेट की क्षमता इस तथ्य से अप्रभावित है कि उन्होंने एक जांच का आदेश दिया है और एक पुलिस रिपोर्ट प्राप्त की है। खराब पुलिस जांच या उसकी रिपोर्ट मजिस्ट्रेट की संज्ञान लेने की क्षमता को बाधित नहीं कर सकती है। यदि कोई मजिस्ट्रेट अपराध के संबंध में उसके सामने पेश किए गए प्रासंगिक साक्ष्य से संतुष्ट है, तो वह ऐसे मामले का संज्ञान ले सकता है।

सी.आर.पी.सी. की धारा 190 से संबंधित विभिन्न न्यायिक घोषणाएँ

महमूद उल रहमान बनाम ख़ज़िर मोहम्मद टुंडा (2015)

इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 190(1)(b) के तहत मजिस्ट्रेट को पुलिस रिपोर्ट से लाभ होता है, और उसे धारा 190(1)(c) के तहत किए गए अपराध के बारे में जानकारी भी होती है। हालांकि, उनके पास सी.आर.पी.सी. की धारा 190(1)(a) के तहत बस एक शिकायत है। नतीजतन, संहिता में कहा गया है कि मजिस्ट्रेट “परिस्थितियों की शिकायत जो इस तरह के अपराध का गठन करती है” प्राप्त करने के बाद संज्ञान लेने के अपने अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं। इसलिए, मजिस्ट्रेट सी.आर.पी.सी. की धारा 190(1)(a) के तहत संज्ञान नहीं लेगा यदि शिकायत किसी अपराध के होने का संकेत नहीं देती है। ऐसी शिकायत को सीधे खारिज किया जाना चाहिए।

मणिपुर राज्य बनाम कुमारी रंजना मनोहरम (2022)

मणिपुर राज्य बनाम कुमारी रंजना मनोहरम (2022) के मामले में मणिपुर उच्च न्यायालय द्वारा यह देखा गया था कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 190 के अनुसार, एक मजिस्ट्रेट किसी भी अपराध का संज्ञान या तो तथ्यों, जो अपराध का गठन करता है, का वर्णन करने वाली शिकायत प्राप्त करने के बाद ले सकता है, उन तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद, पुलिस अधिकारी के अलावा किसी अन्य स्रोत से सूचना प्राप्त करने के बाद, या केवल यह जानने के बाद कि अपराध किया गया है। इस खंड में उल्लिखित “पुलिस रिपोर्ट” “अंतिम रिपोर्ट” है जिसे पुलिस सी.आर.पी.सी. की धारा 173(2) के अनुसार अपनी जांच के बाद पेश करती है।

नाहर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2022)

सी.आर.पी.सी की धारा 190(1)(b) के संबंध में, नाहर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2022) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह मुद्दा उठाया गया था कि क्या एक मजिस्ट्रेट के पास अपराध के लिए एक पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संज्ञान लेने का अधिकार है और या फिर किसी ऐसे व्यक्ति को बुलाने का अधिकार है जिसका नाम प्राथमिकी या पुलिस रिपोर्ट में आरोपी के रूप में नहीं दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (सी.आर.पी.सी.) की धारा 190 एक मजिस्ट्रेट को उन व्यक्तियों के खिलाफ समन जारी करने का अधिकार देती है, जिन्हें आरोप पत्र (चार्ज शीट) में संदिग्धों के रूप में नामित नहीं किया गया है या जिनपर प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफ.आई.आर.) में आरोप नही लगाया गया है।

यह सिर्फ मजिस्ट्रेट को अपराध का संज्ञान लेने की शक्ति देता है, और फिर यह मजिस्ट्रेट को प्राथमिकी और आरोप पत्र में निर्दिष्ट लोगों की तुलना में किसी भी अन्य आरोपी पक्ष को देखने और समन करने की शक्ति देता है।

न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी अपराध का संज्ञान लेने पर, मजिस्ट्रेट को अपने निपटान में सबूतों की समीक्षा करनी चाहिए ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि पुलिस द्वारा भेजे गए लोगों के अलावा अपराध के किसी और पक्ष को बुलाने की आवश्यकता है या नहीं। यह विवरण प्राथमिकी, आरोप पत्र, या पुलिस रिकॉर्ड तक ही सीमित नहीं होना चाहिए। इसके लिए, संहिता की धारा 164 के अनुसार दिए गए बयान को भी ध्यान में रखा जा सकता है।

वी. लक्ष्मी बनाम तमिलनाडु सरकार (2011)

इस मामले में, मद्रास उच्च न्यायालय ने पाया कि जब एक पुलिस जांच से जुड़े मामले में, जांच अधिकारी द्वारा एक योग्य आपराधिक अदालत में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती है, जो एक कानूनी कार्यकारी कर्तव्य है, तो जांच प्रक्रिया पूरी हो जाती है। एक बार जब आपराधिक शिकायत की जांच समाप्त हो जाती है और एक शिकायत, सूचना, या रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के पास दायर की जाती है, तो अदालत, आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 190 के अनुसार, एक प्रारंभिक खोज के आधार पर अपराध का संज्ञान लेती है कि एक अपराध किया गया है। इसके बाद प्रक्रिया शुरू की जाती है, उसके बाद मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रक्रियाओं की शुरुआत, अदालत में आरोपों का निर्धारण, और मुकदमे की शुरुआत होती है, जिसके परिणामस्वरूप अंततः न्यायालय द्वारा एक निर्णय लिया जाता है।

निष्कर्ष

शब्द “संज्ञान लेना” सी.आर.पी.सी. के तहत परिभाषित नहीं किया गया है। वास्तव में, संज्ञान लेने के लिए अदालत या मजिस्ट्रेट की ओर से किसी औपचारिक कार्रवाई की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि जैसे ही एक मजिस्ट्रेट आगे की कार्रवाई करने के उद्देश्य से किसी अपराध के कथित आचरण पर अपने विचार लागू करता है, तो ऐसे में मामले का संज्ञान लिया गया माना जा सकता है। सी.आर.पी.सी. की धारा 195 से धारा 199 के तहत मजिस्ट्रेट का संज्ञान लेने का अधिकार हमेशा से कुछ प्रतिबंधों के अधीन रहा है। उसके पास किए गए अपराध की घोषणा करने का अधिकार है, लेकिन वह इस मामले पर विचारण नहीं कर सकता है। इसलिए, संज्ञान लेने का चरण, कानून के शासन के लिए महत्वपूर्ण है और पुलिस के अधिकार पर एक महत्वपूर्ण ‘न्यायिक जाँच’ के रूप में कार्य करता है।

हमने पहले देखा है कि मजिस्ट्रेट अपने अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिसडिक्शन) का प्रयोग किसी ऐसे व्यक्ति के संबंध में भी समन जारी करने के लिए कर सकता है जिसका नाम पुलिस रिपोर्ट में बिल्कुल भी नहीं है, चाहे आरोपी के रूप में या और कही, यदि मजिस्ट्रेट इस बात संतुष्ट है कि फ़ाइल में ऐसी सामग्री है जो प्रथम दृष्टया अपराध में व्यक्ति के शामिल होने को प्रकट करती है।

किसी भी एजेंसियों से किसी भी बाधा या प्रतिबंध के बिना, मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय एक आरोपी व्यक्ति को संज्ञान लेने के बाद भी बुला सकता है, भले ही उसका नाम प्राथमिकी या पुलिस रिपोर्ट में दर्ज न हो। इसलिए, मजिस्ट्रेट के पास आरोपी को समन जारी करने की शक्ति है, भले ही उसका नाम एफआईआर या चार्जशीट या दोनों में ही न हो।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफ. ए. क्यू.)

सी.आर.पी.सी. की धारा 190 और धारा 200 में क्या अंतर है?

सी.आर.पी.सी. के तहत संज्ञान लेने का अधिकार धारा 190 के तहत आता है। सत्यापन (वेरिफिकेशन) के उद्देश्य से शपथ के तहत शिकायतकर्ता से पूछताछ करने की शक्ति (और, यदि लागू हो, तो अतिरिक्त गवाह पर भी), शिकायत को सी.आर.पी.सी. की धारा 200 में वर्णित किया गया है, इसलिए, ये दोनों भाग एक शिकायत मामले के उद्देश्यों से संबंधित हैं। वे एक शिकायत मामले के लिए विभिन्न चरणों की रूपरेखा (आउटलाइन) तैयार करते हैं। नतीजतन, सी.आर.पी.सी. की धारा 190 और धारा 200 दोनों एक शिकायत मामले के संदर्भ में प्रासंगिक हैं।

 

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here