एक सह-अपराधी को क्षमादान देना

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Indian Evidence Act

यह लेख बनस्थली विद्यापीठ की Richa Goel ने लिखा है। इस लेख में, वह सह-अपराधी का अर्थ, प्रासंगिक मामलो के साथ साथ सह-अपराधी से संबंधित प्रावधानों पर, सीआरपीसी की धारा 307 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के विशेष संदर्भ में चर्चा करती है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja द्वारा किया गया है।

परिचय 

सह-अपराधी अपराध का गवाह है, जो किसी गैरकानूनी कार्य या चूक से अपराध से जुड़ा है, किसी न किसी तरह से अपराध में उसकी सक्रिय (एक्टिव) या निष्क्रिय (इनैक्टिव) भागीदारी है और वह अपराध में अपनी सक्रिय भागीदारी को स्वीकार करता/करती है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 133 सह-अपराधी गवाह के बारे में बात करती है। इसके अनुसार, सह-अपराधी अभियुक्त व्यक्ति के खिलाफ सक्षम गवाह होता है। आमतौर पर, अपराध आश्रय या निजी स्थानों पर किए जाते हैं। ऐसे मामलों में, पुलिस उन संदिग्धों में से एक को उठाती है, जिन्हें गिरफ्तार किया गया है और जो कम से कम दोषी हैं और उन्हें अपराध के बारे में सारी जानकारी देने के लिए कहती है कि यह कैसे किया गया था और उसे अपराध के लिए क्षमा करने की प्रतिभू (श्योरिटी) प्रदान करती है यदि वह सच्ची जानकारी देता है।

आर.के डालमिया बनाम दिल्ली प्रशासन के मामले में यह कहा गया था कि सह-अपराधी वह व्यक्ति होता है जो अभियुक्त के खिलाफ लगाए गए वास्तविक अपराध में शामिल होता है।”

एक सह-अपराधी की श्रेणियाँ

1. मुख्य अपराधी

मुख्य अपराधी वह व्यक्ति होता है जो वास्तव में अपराध करता है या अपराध को बढ़ावा देता है।

2. तथ्य से पहले 

वे लोग, जो किसी अपराध को करने के लिए उकसाते हैं, भड़काते हैं या खरीदते हैं और अपराध में भाग नहीं लेते हैं।

3. तथ्य के बाद

वे लोग जो अपराध करने वाले व्यक्तियों की रक्षा करते हैं या उन्हें स्थान से भागने में मदद करते हैं। उन्हें अपराध का भागीदार भी माना जाता है।

आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 306 और धारा 307 के अनुसार, एक सह-अपराधी अपराध का एक सक्षम गवाह है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 20(3) के अनुसार अभियुक्त को गवाह के रूप में कार्य करने के लिए बाध्य किया जाएगा।

 

क्षमा प्रदान करने के लिए पालन किए जाने वाले सिद्धांत इस प्रकार हैं-

  • विचारण (ट्रायल) शुरू किया जाना चाहिए।
  • दोष साबित नहीं हुआ होना चाहिए।
  • एक सह-अपराधी स्वीकृत होने के लिए सहमत होगा, एक अनुमोदक (अप्रूवर) होने के लिए एक समझौता होना चाहिए।
  • यदि अदालत द्वारा क्षमा प्रदान की जाती है तो अनुमोदक गवाह बन जाता है।
  • यदि वह इन शर्तों का उल्लंघन करता है, तो कोई क्षमा नहीं दी जाएगी।
  • उसे निर्णय या आदेश से पहले रिहा नहीं किया जाएगा।

सीआरपीसी, 1973 के तहत क्षमा प्रदान करना

धारा 306 : सह-अपराधी को क्षमादान

उद्देश्य

उस व्यक्ति का साक्ष्य प्राप्त करना जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपराध से संबंधित हो सकता है।

क्षमता

इस धारा के तहत निम्नलिखित अधिकारियों को क्षमादान देने का अधिकार है:

  • एक मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट।
  • प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट ।

प्रयोज्यता (एप्लीकेबिलिटी)

  • कोई भी अपराध जो आपराधिक संशोधन अधिनियम, 1952 के तहत विशेष न्यायाधीश के न्यायालय द्वारा या सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है।
  • एक अपराध जो 7 साल तक के कारावास या अधिक गंभीर सजा के साथ दंडनीय है।

शर्तें 

अपराध से संबंधित अपनी जानकारी के भीतर सभी परिस्थितियों का एक वैध और पूर्ण प्रकटीकरण (डॉसक्लोजर) करने के लिए और उस व्यक्ति के बारे में जानकारी देने के लिए जो दुर्ष्प्रेरक (एबेटर) है या अपराध से संबंधित मुख्य व्यक्ति है।

मजिस्ट्रेट के कर्तव्य

निमलिखित को रिकॉर्ड करना प्रत्येक मजिस्ट्रेट का कर्तव्य है:

  • ऐसा करने का कारण।
  • जिस व्यक्ति को टेंडर दिया गया था, उसने इसे स्वीकार किया है या नहीं।
  • अभियुक्तों को रिकॉर्ड की प्रति निःशुल्क उपलब्ध कराना।

टेंडर स्वीकार करने वाले व्यक्ति को गवाह के रूप में अपराध का संज्ञान (कॉग्निजेंस) लेते हुए मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया जाएगा। उसे मुकदमे के निपटारे तक या जब तक वह पहले से ही जमानत पर नहीं है तब तक हिरासत में रखा जाता है।

अंतिम चरण

जब जिस व्यक्ति को टेंडर दिया गया था उसने क्षमा स्वीकार कर ली थी और अदालत द्वारा किसी अपराध का संज्ञान लेते हुए उसका गवाह के रूप में परीक्षण किया गया था, तो मामले में आगे कोई पूछताछ नहीं की जाएगी।

निम्नलिखित परिदृश्यों (सिनेरियो) के अनुसार इसे परीक्षण के लिए भेजें।

  • यदि अपराध सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है या यदि अपराध का संज्ञान लेने वाला मजिस्ट्रेट मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय है।
  • यदि अपराध आपराधिक संशोधन अधिनियम, 1952 के तहत नियुक्त विशेष न्यायाधीश द्वारा विचारणीय है।
  • एक अन्य मामले में मामले को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को सौंपा जा सकता है जो स्वयं मामले की सुनवाई करेंगे।

अपराध

धारा 306 उन अपराधों के बारे में बात करती है जिनके लिए क्षमा प्रदान की जा सकती है। इसमें कहा गया है कि इस धारा के तहत 7 या 7 से अधिक साल तक के कारावास की सजा वाले अपराध शामिल हैं।

चरण

सह-अपराधी को क्षमा निर्णय की घोषणा से पहले किसी भी मोड़ पर दी जा सकती है।

दीपेश चांडाल बनाम भारत संघ के मामले में न्यायालय ने कहा कि अभियुक्त आर्थिक प्रकृति के किसी भी अपराध के लिए अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) पक्ष से छूट का दावा नहीं कर सकता है।

कोनाजेती राजाबाबू बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के मामले में अदालत ने कहा कि प्रभागीय (डिवीजनल) न्यायालय के पास यह निर्धारित करने का अधिकार है कि जिस मजिस्ट्रेट ने क्षमादान दिया है उसने विवेकपूर्ण तरीके से काम किया है या नहीं।

धारा 307 –  टेंडर को क्षमा करने का निर्देश देने की शक्ति

धारा 307 के तहत मामले के शुरू होने के बाद किसी भी समय, लेकिन निर्णय पारित होने से पहले, जिस न्यायालय में मामला शुरू किया गया है, वह किसी भी ऐसे व्यक्ति जो किसी अपराध से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संबंधित हो या किसी अपराध से जुड़ा हो, का साक्ष्य प्राप्त करने की दृष्टि से ऐसे व्यक्ति को उसी शर्त पर क्षमा कर सकता है।

के अनिल अग्रवाल बनाम केरल राज्य के मामले में केरल के उच्च न्यायालय ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज एक बयान क्षमा देने की शर्त नहीं हो सकता है और सत्र न्यायालय धारा 306(1) के तहत क्षमा प्रदान कर सकता है लेकिन उन्हीं शर्तों पर जो धारा 306(1) में निर्दिष्ट हैं।

लेफ्टिनेंट कमांडर पास्कल फर्नाडिस बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आम तौर पर, यह अभियोजन पक्ष है जिसने टेंडर को क्षमा करने के लिए कहा था, लेकिन जब अभियुक्त विशेष न्यायाधीशों के लिए सीधे आवेदन करता है, तो उसे पहले अभियोजन एजेंसी को अनुरोध भेजना चाहिए।

क्षमता

प्राधिकरण (अथॉरिटी) जो शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं उनका उल्लेख धारा 307 के तहत किया गया है। निम्नलिखित मजिस्ट्रेट संहिता द्वारा दी गई शक्ति प्रदान कर सकते हैं,

  • मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट।
  • प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट।
  • सत्र न्यायालय
  • विशेष न्यायाधीश

व्यक्ति

इन दोनों धाराओं के तहत अनुमोदक बनने की योग्यता एक समान है और इसके अलावा समान शर्तों के तहत टेंडर की जा सकती है।

केवल वे व्यक्ति जिन्होंने कुछ निर्दिष्ट अपराध किए हैं, केवल अदालत से क्षमा प्राप्त कर सकते हैं और क्षमा प्राप्त करने में सक्षम होने के लिए अनुमोदक द्वारा अपराध की सच्ची और पूर्ण स्वीकारोक्ति होगी। जिस सह-अपराधी पर अपराध के अधिक आरोप हैं या जघन्य (हीनियस) अपराधों के विभिन्न कार्यों के ऐसे पिछले रिकॉर्ड हैं तो उसे अदालत द्वारा क्षमा नहीं किया जा सकता है।

मुख्य दोषियों को दंडित करने के लिए अपराध में कम भागीदारी वाले व्यक्ति को अदालत द्वारा क्षमादान दिया जा सकता है। व्यक्ति न्यायालय द्वारा क्षमादान प्राप्त करने के लिए अपनी जानकारी में अपराध के तथ्यों और परिस्थितियों का पूर्ण और वैध प्रकटीकरण करेगा।

 

धारा 306 और धारा 307 के बीच अंतर

नारायण चेतनराम चौधरी बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 306 मामला शुरू होने के पहले के चरण में लागू होती है जबकि धारा 307 मामला शुरू होने के बाद वाले चरण में लागू होती है। अदालत ने आगे कहा कि धारा 306 के तहत माफ़ी देने के लिए विचारणीय न्यायालय को धारा 306(1) की आवश्यकता का पालन करने की आवश्यकता है, लेकिन धारा 306(4) के साथ नहीं।

धारा 308 – क्षमादान की शर्तों का पालन न करने पर व्यक्ति का विचारण।

परिणाम जब टेंडर स्वीकार करने वाला व्यक्ति क्षमा की आवश्यकता को पूरा करने में विफल रहता है

जब सरकारी वकील का मानना ​​है या उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि जिस व्यक्ति ने टेंडर स्वीकार कर लिया है या जिसे क्षमा प्रदान की गई है वह क्षमा की शर्तों को पूरा नहीं करता है, तो ऐसे व्यक्ति पर उसी अपराध के लिए विचारण किया जा सकता है जिसके लिए उस पर आरोप लगाया गया था या कई अन्य अपराधो के लिए जिसके लिए वह उसी मामले के संबंध में दोषी था।

व्यक्ति पर झूठे साक्ष्य के लिए आरोप भी लगाया जा सकता है। जब तक उच्च न्यायालय की अनुमति नहीं ली जाती, तब तक उस पर झूठे साक्ष्य का आरोप नहीं लगाया जा सकता। इस मामले में धारा 195 और धारा 340 के प्रावधान लागू नहीं होंगे।

कोई भी बयान जो व्यक्ति द्वारा दिया जाता है और धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा या धारा 306(4) के तहत न्यायालय द्वारा दर्ज किया जाता है, इस तरह के विचारण में उसके खिलाफ सबूत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

परीक्षण के दौरान, टेंडर स्वीकार करने वाले व्यक्ति को यह साबित करने की आवश्यकता है कि उसने क्षमा की शर्तों का पालन किया है और यह साबित करने का भार अभियोजन पक्ष पर है कि टेंडर स्वीकार करने वाला व्यक्ति क्षमा प्रदान करने की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता है।

इस तरह के परीक्षण में, अदालत:

  • आरोप को पढ़कर सुनाए जाने और अभियुक्त को समझाए जाने से पहले या यदि यह सत्र न्यायालय है
  • गवाह के साक्ष्य से पहले, अभियोजन किया गया है या यदि यह मजिस्ट्रेट की अदालत है

तो अभियुक्त से पूछे कि क्या वह यह स्वीकार करता है कि उसने क्षमा की शर्तों का पालन किया है।

जब अभियुक्त स्वीकार करता है कि उसने क्षमा की शर्तों का पालन किया है, तो अदालत इसे स्वीकार करेगी और बयान दर्ज करेगी और मुकदमे को आगे बढ़ाएगी।

और मामले में जब निर्णय पारित नहीं किया जाता है तो यह पता चलता है कि अभियुक्त ने शर्तों को पूरा किया है और यदि यह पाया जाता है कि उसने आवश्यकताओं का अनुपालन किया है, तो दोषमुक्ति का आदेश पारित किया जा सकता है।

राज्य बनाम भूरा व अन्य के मामले में अदालत ने कहा कि यदि एक अभियुक्त क्षमा देने की शर्तों का पालन करने में विफल रहता है, तो उस पर अन्य अभियुक्तों के साथ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है, लेकिन वह अन्य अभियुक्तों के खिलाफ गवाह हो सकता है और वह अपना साक्ष्य वापस ले लेता है तब भी वह अन्य अभियुक्तों के विरुद्ध गवाह नहीं रहता है।

न्यायालय ने  राज्य बनाम हीरालाल गिरधारीलाल कोठारी के मामले में कहा कि यदि अभियुक्त ने शर्तों का उल्लंघन किया है, तो क्षमा का कोई सवाल ही नहीं होगा। अदालत ने करुप्पा सेरवाई बनाम कुंदारू के मामले में कहा कि सार्वजनिक नीति और सार्वजनिक हित के सिद्धांतों के आधार पर अनुमोदक को क्षमा प्रदान की जा सकती है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 और 133 का महत्व

ये दोनों प्रावधान एक ही विषय से संबंधित हैं। साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 कहती है कि सह-अपराधी को अदालत द्वारा श्रेय के अयोग्य माना जाता है जब तक कि भौतिक विवरणों में पुष्टि नहीं की जाती।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 133 कहती है कि सह-अपराधी को अभियुक्त व्यक्ति के खिलाफ सक्षम गवाह माना जाएगा।

जब साक्ष्य अधिनियम की धारा 133 को धारा 114(b) के साथ पढ़ा जाता है, तो हम पाते हैं कि सह-अपराधी साक्ष्य के संबंध में सबसे आवश्यक मुद्दा पुष्टि का है। पुष्टि के संबंध में सामान्य नियम कानून का नियम नहीं है बल्कि यह केवल अभ्यास का नियम है जिसका भारत और इंग्लैंड दोनों में पालन किया जाता है।

सह-अपराधी साक्ष्य की निम्नलिखित कारणों से पुष्टि की जाएगी।

  • इस बात की संभावना है कि सह-अपराधी खुद से अपराध का बोझ को दूर करने के लिए झूठी कसम खा सकता है।
  • एक सह-अपराधी एक अनैतिक व्यक्ति है क्योंकि वह अपराध में शामिल है।
  • सह-अपराधी केवल सजा से क्षमा पाने के लालच और आशा में तथ्य का खुलासा करता है।

क्षमा प्रदान करने की शक्ति बहुत सी शर्तों के अधीन है जो संहिता द्वारा निर्दिष्ट हैं, और कुछ न्यायाधीशों द्वारा निर्धारित की गई हैं।

निष्कर्ष

एक सह-अपराधी को क्षमा वह अवधारणा है जहां गंभीर अपराध के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। यह केवल गंभीर अपराधों के मामलों में प्रस्तुत किया जाता है, और अदालत यह देखने के लिए अपने न्यायिक दिमाग का इस्तेमाल करती है कि अभियुक्त को क्षमा दी जानी चाहिए या नहीं।

संदर्भ

  • 1963 एससीआर (1) 253
  • 17 सितंबर, 2004
  • 2002 सीआरआईएलजे 2990
  • 1996 सीआरआईएलजे 1942
  • 1968 एससीआर (1) 695
  • 5 सितंबर, 2000
  • एआईआर 1961 राज 274
  • एआईआर 1960 एससी 360
  • 1953 सीआरएल.एलजे 45

 

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