कैविएट एम्प्टर का सिद्धांत

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Sales of Goods Act

यह लेख गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, दिल्ली से संबद्ध विवेकानंद इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज की छात्रा Kavita Chandra ने लिखा है। उन्होंने कैविएट एम्प्टर के सिद्धांत पर चर्चा की है। वह कैविएट एम्प्टर के नियम का विश्लेषण करना चाहती है जो धीरे-धीरे खत्म हो रही है और यह कैविएट वेंडिटर (विक्रेता (सेलर) सावधान) के नियम के साथ बदल चुका है। इस लेख का अनुवाद Namra Nishtha Upadhyay द्वारा किया गया है।

परिचय

कैविएट एम्प्टर का नियम जिसका अर्थ है “खरीदार को सावधान रहने दें” को कैविएट वेंडिटर के नियम से निरस्त (ओवरराइड) कर दिया गया है। आधुनिक व्यापार और वाणिज्य (कॉमर्स) की बदलती परिस्थितियों के कारण इस तरह के बदलाव की आवश्यकता थी। कैविएट एम्प्टर वाक्यांश का प्रयोग आजकल न्यायाधीशों द्वारा बहुत बार नहीं किया जाता है। यह सिद्धांत इस नियम पर आधारित है कि जब कोई खरीदार उत्पाद (प्रोडक्ट) की उपयुक्तता (सूटेबिलिटी) से संतुष्ट होता है, तो उसके पास ऐसे उत्पाद को अस्वीकार करने का कोई अधिकार नहीं रहता है। कैविएट एम्प्टर नियम की उत्पत्ति कई साल पहले सामान्य कानून में हुई थी और समय के साथ इसमें बड़े बदलाव हुए हैं। समय के साथ इस सिद्धांत के अपवाद बढ़ने लगे क्योंकि इसे नए आकार दिए जा रहे है।

कैविएट एम्प्टर का बयान

माल-विक्रय अधिनियम 1930 (सेल्स ऑफ गुड्स एक्ट) की धारा 16 में कैविएट एम्प्टर के सिद्धांत को समझाया गया है, जिसमें कहा गया है कि आपूर्ति (सप्लाई) किए गए सामान के किसी विशेष उद्देश्य के लिए गुणवत्ता या फिटनेस के लिए कोई निहित शर्त या वारंटी नहीं है।

कैविएट एम्प्टर का इतिहास

19वीं शताब्दी में, खरीदार के प्रति सामान्य कानून के रवैये को कहावत कैविएट एम्प्टर द्वारा समझा जा सकता है जिसका अर्थ है कि खरीदार को सावधान रहने दें। यह कहावत बताती है कि एक खरीदार को सावधानीपूर्वक जांच करनी चाहिए और निर्णय लेना चाहिए कि उसके लिए सबसे अच्छा क्या है। खरीदार को उस वस्तु की स्थिति और गुणवत्ता का जोखिम नहीं उठाना चाहिए जिसे उसे खरीदने की आवश्यकता है, उसे वारंटी द्वारा अपनी रक्षा करनी चाहिए। कैविएट एम्प्टर के नियम के पीछे मूल रूप से दर्शनशास्र (फिलोस्फी) यह था कि खरीदार खरीदने से पहले अपने कौशल (स्किल) और निर्णय को लागू करेगा। यह मौलिक सिद्धांत पर आधारित है कि जब कोई खरीदार अपने उपयोग के लिए उत्पाद की उपयुक्तता से संतुष्ट होता है, तो उसे अस्वीकार करने के लिए कोई अधिकार नहीं छोड़ा जाएगा। जब कैविएट एम्प्टर के नियम की उत्पत्ति हुई, तब यह काफी कठिन था और नियम में बाद में किसी भी बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं थी। अंग्रेजी माल-विक्रय अधिनियम, 1893 में, यह अत्यधिक ध्यान देने योग्य और स्पष्ट है कि जब उत्पाद बेचा जाता है तो प्रकटीकरण (डिस्क्लोजर) की आवश्यकताओं के रूप में विक्रेता के कर्तव्य न्यूनतम थे। जानकारी प्रदान करने के लिए विक्रेता पर कोई कर्तव्य नहीं था और खरीदार द्वारा माल की उचित जांच को किसी अन्य दवित्व से ऊपर माना जाता था। जिन अवधारणाओं का इस्तेमाल विक्रेता पर गुणवत्ता और फिटनेस के बोझ को स्थानांतरित (शिफ्ट) करने के लिए किया जा सकता है, जैसे कि ‘माल की फिटनेस’ और ‘मर्चेंटेबिलिटी’ को प्रोत्साहित नहीं किया गया। एक और बड़ा बयान जो अधिनियम की धारा 11(1)(c) में मौजूद था, जिसमें कहा गया था कि खरीदार किसी भी आधार पर उस मामले में सामान को अस्वीकार नहीं कर सकता जहां ‘विशिष्ट’ (स्पेसिफिक) माल की बिक्री हुई हो। इस प्रकार, यह अत्यधिक ध्यान देने योग्य है कि कानून विक्रेता की ओर झुका हुआ था और उस समय, कोई भी ऐसा नियम नहीं खोज सकता था जो विक्रेता पर बोझ डाले।

भ्रम और परिवर्तन की आवश्यकता

इसकी उत्पत्ति के समय कैविएट एम्प्टर का नियम अपने पूर्ण रूप में प्रचलित था लेकिन बाद में इसे वाणिज्य और व्यापार के विकास के लिए हानिकारक के रूप में वर्गीकृत (कैटेगरीज) किया गया था। उचित जांच की अनुपस्थिति के कारण कैविएट एम्प्टर का नियम अपने पूर्ण रूप में खरीदार के लिए अत्यधिक हानिकारक था। इसलिए एक खरीदार के पास उस विक्रेता के खिलाफ कोई सहारा नहीं होगा जो अव्यक् (लेटेंट) कमी से अवगत है, लेकिन खरीदार इसके बारे में नहीं जानता था और खरीदार उस कमी का पता नहीं लगा सकता था (क्योंकि यह उचित परीक्षा द्वारा पता नहीं लगाया जा सकता है)।

कैविएट एम्प्टर के नियम की भ्रम का एक और मजबूत कारण, खरीदार को सुरक्षा प्रदान करने की आवश्यकता है जो सही इरादे से सामान खरीदता है, यानी जहां खरीदार अपने कौशल और निर्णय पर भरोसा करके विक्रेता से सामान खरीदता है। इस प्रकार यह नियम कमजोर बन गया ताकि विक्रेता और खरीदार के बीच संबंधों को उचित मान्यता दी जा सके और एक ऐसे परिदृश्य को जन्म दिया जा सके जिसमें वाणिज्यिक लेनदेन को प्रोत्साहित किया जा सके।

यह कैविएट वेंडीटर में कैसे बदल गया?

ऊपर दिए हुए कारणों से, कैविएट एम्प्टर के नियम को पहली बार प्रीस्ट बनाम लास्ट के मामले में प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा, जिसमें विक्रेता के कौशल और निर्णय पर खरीदार पर निर्भरता रखी गई थी और खरीदार को पहली बार माल को अस्वीकार करने की अनुमति दी गई थी। इस मामले में खरीदार ने विक्रेता के कौशल और निर्णय के आधार पर एक गर्म पानी की बोतल खरीदी। यह देखा गया कि यदि कोई खरीदार विक्रेता के कौशल और निर्णय के आधार पर कोई वस्तु खरीदता है तो खरीदार को किसी भी कमी के होने पर उसे अस्वीकार करने की अनुमति दी जाएगी। सामान्य कानून में यह पहला निर्णय था जिसमें विक्रेता के निर्णय और कौशल पर खरीदार की निर्भरता को महत्व दिया गया था।

धीरे-धीरे इस नियम ने प्रमुखता प्राप्त की और विक्रेता के दायित्वों को विभिन्न मामलो और विधियों (स्टेट्यूट्स) के साथ उचित आकार दिया गया है जो कैविएट एम्प्टर के नियम को ‘उचित परीक्षा’ तक सीमित करता है। दूध में टाइफाइड के कीटाणु, दूषित बीयर जैसे मामलों में, न्यायालयों ने यह स्थापित करने के लिए पर्याप्त उदार किया है कि जहां सामान्य परिस्थितियों में उचित जांच से कमी का पता नहीं लगाया जा सकता है, उस परिस्थिति में खरीदार को दवित्व से छूट दी जाएगी।

इसके अलावा, हार्लिंगडन एंड लेइनस्टर एंटरप्राइजेज लिमिटेड बनाम क्रिस्टोफर हल फाइन आर्ट लिमिटेड में खरीदार ने दावा किया कि उसे पेंटिंग को अस्वीकार करने का अधिकार था क्योंकि यह मूल चित्रकार की नहीं था। इसलिए, यह देखा गया कि जहां खरीदार के पास किसी दिए गए क्षेत्र में अधिक विशेषज्ञता है और विक्रेता की तुलना में अधिक उचित है, तो यह सुझाव देना पूरी तरह से गलत होगा कि खरीदार को खरीदी गई वस्तु को अस्वीकार करने का अधिकार होगा। इसलिए विक्रेता का कर्तव्य है कि वह खरीदार को माल के सभी कमियों और माल के उपयोग से संबंधित जानकारी से अवगत कराए। विक्रेता का यह दायित्व उसके अपने निर्णय और कौशल पर ध्यान दिए बिना है क्योंकि जो मायने रखता है वह यह है कि जो उसके पास होने की उम्मीद है और न कि उसके पास क्या है।

न्यायिक प्रवृत्ति (ट्रेंड)

वार्ड बनाम हॉब्स (1878) 4 एसी 13, में हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने कहा कि यदि कोई विक्रेता बेचे जाने वाले उत्पाद में कमी को छिपाने के लिए कृत्रिमता (आर्टिफाइस) या भेस (डिसगाइज) का उपयोग करता है, तो यह खरीदार के साथ धोखाधड़ी होगी; अभी भी उत्पाद में कमी का खुलासा करने का कोई कर्तव्य विक्रेता पर कैविएट एम्प्टर के सिद्धांत द्वारा नहीं लगाया गया है। सामान खरीदते समय देखभाल और कौशल का उपयोग करने का दायित्व खरीदार पर कैविएट एम्प्टर के सिद्धांत द्वारा लगाया जाता है।

अपील की अदालत ने वालिस बनाम रसेल (1902) 2 आईआर 585, में कैविएट एम्प्टर के दायरे की व्याख्या की और निर्धारित किया कि कैविएट एम्प्टर के नियम का अर्थ है कि “खरीदार को ध्यान रखना चाहिए”। यह उन चीजों की खरीद पर लागू होता है जिन पर खरीदार अपने कौशल और निर्णय का प्रयोग कर सकता है, उदाहरण एक तस्वीर, किताब, आदि (जिसे विशिष्ट सामान भी कहा जाता है); यह उन मामलों में भी लागू होता है जहां उपयोग या अनुबंध की अवधि से यह निहित होता है कि खरीदार विक्रेता के कौशल और निर्णय पर भरोसा नहीं करेगा।

कैविएट एम्प्टर के नियम के अपवाद (माल की बिक्री अधिनियम, 1930 की धारा 16)

खरीदारों के उद्देश्य के लिए फिटनेस [धारा 16(1)]

उक्त अधिनियम की धारा 16(1) में प्रावधान है कि ऐसी स्थितियों में जहां विक्रेता या तो स्पष्ट रूप से या उस उद्देश्य के आवश्यक निहितार्थ (इंप्लीकेशन) से अवगत होता है जिसके लिए खरीदार को एक विशिष्ट उत्पाद खरीदने की आवश्यकता होती है, इसके अलावा, माल ऐसे विवरण का है जिसे विक्रेता अपने व्यापार के सामान्य क्रम में आपूर्ति करता है और विक्रेता के निर्णय और कौशल पर भरोसा करके, खरीदार उस उत्पाद को खरीदता है, तो माल उद्देश्य के अनुसार होना चाहिएl दूसरे शब्दों में, यह धारा उन परिस्थितियों की व्याख्या करती है जहां विक्रेता का दायित्व है कि वह खरीदार को उस उद्देश्य के अनुसार सामान की आपूर्ति करे जिसके लिए वह सामान खरीदना चाहता है।

धारा 16(1) की आवश्यकताएं इस प्रकार हैं:-

  • खरीदार को उस विशेष उद्देश्य की व्याख्या करनी चाहिए जिसके लिए वह विक्रेता से खरीदारी कर रहा है।
  • खरीदार को खरीदारी करते समय विक्रेता के कौशल और निर्णय पर भरोसा करना चाहिए।
  • माल एक विवरण का होना चाहिए जो विक्रेता अपने व्यापार की आपूर्ति के सामान्य पाठ्यक्रम में करता है।

शीतल कुमार सैनी बनाम सतवीर सिंह में याचिकाकर्ता द्वारा एक वर्ष की वारंटी के साथ एक कंप्रेसर खरीदा गया था। उत्पाद में कमी तीन महीने के अंदर दिखाई देने लगी। याचिकाकर्ता ने प्रतिस्थापन (रिप्लेसमेंट) की मांग की। विक्रेता ने इसे बदल दिया लेकिन आगे कोई वारंटी नहीं दी। राज्य आयोग (स्टेट कमीशन) ने कहा कि माल-विक्रय अधिनियम, 1930 की धारा 16 के तहत एक निहित वारंटी की गारंटी दी गई थी और इसे अस्वीकार करने की अनुमति दी गई थी।

व्यापार नाम के तहत बिक्री [धारा 16(1) का परंतुक (प्रोविसो)]

कुछ मामलों में, खरीदार विक्रेता के कौशल और निर्णय पर भरोसा करके नहीं बल्कि उत्पाद के व्यापार नाम पर भरोसा करके सामान खरीदता है। ऐसे मामलों में, यह अनुचित होगा कि विक्रेता गुणवत्ता की जिम्मेदारी के बोझ तले दब जाए। धारा 16 का परंतुक ऐसे मामलों से संबंधित है। यह प्रदान करता है कि:

“बशर्ते कि, किसी विशिष्ट उत्पाद की बिक्री के लिए उसके पेटेंट या अन्य व्यापारिक नामों के तहत अनुबंध के मामले में किसी विशेष उद्देश्य के लिए उपयुक्तता के रूप में कोई निहित शर्त नहीं है।

व्यापारिक (मार्केटेबिलिटी) गुणवत्ता [धारा 16(2)]

कैविएट एम्प्टर के नियम का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण अपवाद अधिनियम की धारा 16(2) द्वारा शामिल किया गया है। धारा व्यापारी पर व्यापारिक गुणवत्ता के सामान की डिलीवरी करने का दायित्व लगाती है।

धारा 16 (2) में कहा गया है कि एक निहित शर्त है कि जब सामान विक्रेता से विवरण द्वारा खरीदा जाता है जो उस विवरण के सामान का सौदा करता है, तो माल व्यापारिक गुणवत्ता का होगा।

व्यापारिक गुणवत्ता का अर्थ: इसका तात्पर्य यह है कि जब माल पुनर्विक्रय (रीसेल) के लिए खरीदा जाता है, तो माल बाजार में उस नाम से गुजरने में सक्षम होना चाहिए जिस नाम से उन्हें बेचा जाता है।

व्यापारिक गुणवत्ता निम्नलिखित दो कारकों पर निर्भर करती है: –

विपणन योग्यता (मार्केटेबिलिटी)-  व्यापारिकता का मतलब यह नहीं है कि माल सिर्फ इसलिए बिक्री योग्य है क्योंकि माल ठीक दिखता है, लेकिन वे अपने पूर्ण मूल्य पर विपणन योग्य होंगे। “व्यापारिकता का मतलब यह नहीं है कि माल बिक्री योग्य है, भले ही उसमें दोष हों जो इसे इसके उचित उपयोग के लिए अनुपयुक्त बनाता है लेकिन सामान्य जांच पर ध्यान देने योग्य नहीं है।

सामान्य उद्देश्यों के लिए उचित उपयुक्तता- “व्यापारिक गुणवत्ता” का अर्थ है, कि यदि माल स्व-उपयोग के लिए खरीदा जाता है, तो उन्हें उस उद्देश्य के लिए उपयुक्त होना चाहिए जिसके लिए उनका आमतौर पर उपयोग किया जाता है। उदाहरण: एक व्यक्ति ने एक गर्म पानी की बोतल खरीदी जिसका उपयोग आमतौर पर गर्मी के अनुप्रयोग के लिए किया जाता है। विक्रेता को उत्तरदायी ठहराया जाएगा।

खरीदार द्वारा जांच [धारा 16(2) का परंतुक]

धारा 16(2) में प्रावधान है कि “यदि खरीदे जाने वाले सामान की जांच करने पर, दोषों का खुलासा किया जाना चाहिए था, तो दोष के संबंध में कोई निहित शर्त मौजूद नहीं होगी।” प्रावधान में प्रदान की गई आवश्यकता को पूरी तरह से संतुष्ट माना जाएगा जब खरीदार को माल की जांच करने का पूरा अवसर दिया गया था और यह तर्क कि खरीदार ने उस अवसर का उपयोग नहीं किया, कोई फर्क नहीं पड़ेगा, ऐसे मामलों में अवसर का अस्तित्व पर्याप्त है।

व्यापार प्रथा द्वारा निहित शर्तें [धारा 16(3)]

धारा 16(3) किसी विशेष व्यापार की प्रथा में निहित शर्तों को वैधानिक बल प्रदान करती है। यह कहती है:

“किसी विशेष उद्देश्य के लिए गुणवत्ता या फिटनेस के रूप में एक निहित शर्त या वारंटी को व्यापार की प्रथा से जोड़ा जा सकता है।”

पीटर डार्लिंगटन पार्टनर्स लिमिटेड बनाम गोशो कंपनी लिमिटेड के मामले में, कैनरी बीजों की बिक्री के लिए एक अनुबंध व्यापार के रिवाज के अधीन था और यह माना जाता था कि यदि बीज में कोई अशुद्धता है तो खरीदार को कीमत पर छूट मिलेगी लेकिन वह माल को अस्वीकार नहीं करेगा। हालांकि, एक रिवाज जो अनुचित है, पक्षों के अनुबंध को प्रभावित नहीं करेगा।

निष्कर्ष

इस प्रकार, उपरोक्त विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कैविएट एम्प्टर के नियम को कैविएट वेंडिटर के नियम द्वारा बदल दिया गया है। अधिक उपभोक्ता-उन्मुख (कंज्यूमर ओरिएंटेड) बाजार बनाने के लिए परिवर्तन हो रहा है जिसमें वाणिज्यिक प्रकृति के लेनदेन को प्रोत्साहित किया जाएगा। इस तरह के बदलाव से अधिक उपभोक्ता-अनुकूल बाजार बनाने में मदद मिलेगी और खरीदार और विक्रेता के अधिकारों और दायित्वों के बीच एक उचित संतुलन बनाए रखा जा सकता है। लेकिन यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यदि इस दृष्टिकोण को बहुत दूर ले जाया जाता है, तो यह अत्यधिक समर्थक खरीदार बन सकता है और फिर कुछ लोग कानून के तहत सुरक्षा का दुरुपयोग कर सकते हैं।

 

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