भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 63 के तहत त्याग का सिद्धांत 

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1912
Indian Contract Act
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यह लेख Najeeb Din द्वारा लिखा गया है, जो लॉसिखो से एडवांस्ड कॉन्ट्रैक्ट ड्राफ्टिंग, नेगोशिएशन एंड डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन में डिप्लोमा कर रहे हैं। इस लेख मे लेखक, भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के तहत त्याग का सिद्धांत  (वेवर) जो की धारा 63 के तहत दिया गया है, पर चर्चा करते हैं। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है। 

परिचय

एक संविदा में प्रवेश करके, दोनों पक्ष अपने प्रतिफल (कंसीडरेशन) के संबंध में कुछ दायित्वों का पालन करते हैं। जिसके नतीजतन, संविदा के सफलतापूर्वक काम करने के लिए दोनों पक्षों को प्रतिफल के अपने हिस्से का प्रदर्शन करना होता है। यदि संविदा के तहत कोई भी पक्ष प्रतिफल के अपने हिस्से का प्रदर्शन नहीं करता है, तो यह संविदा का उल्लंघन होता है। हालांकि, ऐसे कुछ उदाहरण हैं जहां एक पक्ष द्वारा संविदा पर कार्य न करना संविदा का उल्लंघन नहीं होगा। भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के तहत, ऐसे मामले जहां संविदा को निष्पादित करने की आवश्यकता नहीं है, धारा 62-67 में दिए गए हैं। इस लेख में, हम धारा 63 पर ध्यान केंद्रित करेंगे जो संविदा की त्याग (वेवर) के बारे में बात करती है।

त्याग का सिद्धांत क्या होता है?

त्याग एक ऐसा कार्य है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति जानबूझकर अपने उस अधिकार या दावे को त्याग देता है जिसका वह हकदार है। संविदा कानून के तहत, त्याग एक ऐसा तरीका है जिसके द्वारा वादाकर्ता (प्रॉमिसी) (जिस व्यक्ति से वादा किया गया था) अपनी स्वतंत्र सहमति से, उन दायित्वों को समाप्त कर देता है जो वादा करने वाले व्यक्ति (प्रॉमिसर) के द्वारा किए जाने वाले दायित्वों को समाप्त कर देते हैं। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 63 में कहा गया है की:

धारा 63: वादाकर्ता वादे के पालन से अभिमुक्ति (डिस्पेंस) या उसका परिहार (रेमिट) कर सकता है- हर वादाकर्ता, उसको दिए गए किसी भी वादे के पालन से अभिमुक्ति या उसका परिहार पूर्ण या आंशिक (पार्ट) रूप से दे सकता है या कर सकता है, या ऐसे पालन के लिए समय बढ़ा सकता है, या उसके स्थान पर किसी तृष्टि (सेटिस्फेक्शन) को, जिसे वह ठीक समझे, स्वीकार कर सकता है। 

उदाहरण:

  • A, B के लिए एक चित्र बनाने का वादा करता है। B बाद में उसे ऐसा करने से मना करता है। A अब वादा निभाने के लिए बाध्य नहीं है।
  • A पर B के 5,000 रुपये बकाया है। A B को भुगतान करता है, और B पूरे कर्ज की संतुष्टि में, उस समय और स्थान पर 2,000 रुपये का भुगतान स्वीकार करता है, जिस पर 5,000 रुपये देय थे। सारा कर्ज उतर जाता है।
  • A पर B के 5,000 रुपये बकाया है। C ने B को 1,000 रुपये का भुगतान किया, और B ने A पर अपने दावे की संतुष्टि में उसे स्वीकार कर लिया। यह भुगतान पूरे दावे का निर्वहन (डिस्चार्ज) है।
  • एक संविदा के तहत, A पर B का कुछ धन बकाया है, जिसकी राशि का पता नहीं लगाया गया है। A, राशि का पता लगाए बिना, B को पैसे देता है, और B, इसकी संतुष्टि में, 2,000 रुपये की राशि स्वीकार करता है। यह पूरे कर्ज का निर्वहन है, चाहे इसकी राशि कुछ भी हो।
  • A पर B के 2,000 रुपये बकाया है और वह अन्य लेनदारों का भी ऋणी है। A अपने लेनदारों के साथ, B सहित, उन्हें उनकी संबंधित मांगों पर रुपये में आठ आने का भुगतान करने की व्यवस्था करता है। B को 1,000 रुपये का भुगतान, B की मांग का निर्वहन है।

यह धारा वादा करने वाले को त्याग का अधिकार प्रदान करती है। इस धारा के तहत, वादाकर्ता, वादा करने वाले की ओर से प्रदर्शन न होने के कारण संविदा के उल्लंघन से पहले या उसके बाद भी अपने प्रदर्शन से वादा करने वाले को रिहा कर सकता है।

पूर्ण या आंशिक रूप से अभिमुक्ति या उसका परिहार 

वादाकर्ता:

  1. संविदा  के प्रदर्शन को पूरी तरह से छोड़ सकता है। वादा करने वाले के पास अब वादाकर्ता से किए गए वादे के संबंध में कोई दायित्व नहीं है। वादा पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है।
  2. वादे के केवल एक हिस्से या विशिष्ट भागों को छोड़ सकता है। वादा करने वाले को अब वादे के केवल उन भागों का पालन करना होगा जिन्हें वादाकर्ता द्वारा माफ नहीं किया गया है और उसे उन भागों को पूरा न करने का त्याग दिया जाता है जिन्हें वादाकर्ता द्वारा माफ कर दिया गया है।

समय बढ़ाना

वादाकर्ता, वादा पूरा करने के लिए समय बढ़ा सकता है। जिस समय में वादाकर्ता को वादा पूरा करना था, वह अब शून्य हो गया है और विस्तारित समय सीमा अब वादे की अवधि का गठन करती है। वादे की समय अवधि बढ़ाने के लिए किसी समझौते की आवश्यकता नहीं है। नतीजतन, वादाकर्ता द्वारा बढ़ाई जाने वाली समय अवधि के लिए प्रतिफल की कोई आवश्यकता नहीं है। हालांकि, यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि दोनों पक्षों की सहमति होनी चाहिए, इसलिए यदि वादाकर्ता को लगता है कि विस्तारित समय सीमा उसके वादे के प्रदर्शन में बाधा उत्पन्न कर सकती है, तो वह विस्तारित समय को स्वीकार नहीं करने का विकल्प चुन सकता है। इस सिद्धांत को केशवलाल लालूभाई पटेल बनाम लालभाई त्रिकुमलाल मिल्स लिमिटेड में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समझाया गया है, जहां यह माना गया था कि भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 63 के तहत संविदा के प्रदर्शन के लिए समय का विस्तार पक्षों के बीच एक समझौते पर आधारित होना चाहिए और यह उसके अपने स्वयं के लाभ के लिए, समझौते के प्रदर्शन के लिए समय बढ़ाने के लिए अपने एकतरफा कार्य के द्वारा वादा करने वाले के लिए खुला नहीं होगा। इस तरह के समझौते को अनिवार्य रूप से लिखित रूप में करने की आवश्यकता नहीं है और मौखिक साक्ष्य या आचरण के साक्ष्य द्वारा साबित किया जा सकता है।

त्याग के सिद्धांत के लिए किसी प्रतिफल की आवश्यकता नहीं है

प्रदर्शन को परिहार करने के लिए कोई प्रतिफल आवश्यक नहीं है। वादा करने वाले को उसके प्रदर्शन से मुक्त करने के लिए त्याग किसी भी प्रतिफल या पारस्परिक (रेसिप्रोकल) प्रतिफल पर निर्भर नहीं करती है। सर्वोच्च न्यायालय ने वामन श्रीनिवास किनी बनाम रतिलाल भगवानदास एंड कंपनी में कहा था कि त्याग एक अधिकार का परित्याग है जिसे आम तौर पर हर कोई माफ करने के लिए स्वतंत्र है। हालांकि, प्रतिफल  की अनुपस्थिति का मतलब इरादे की अनुपस्थिति नहीं है। वादा करने वाले को उस दावे के अपने अधिकार को त्यागने का पूरा ज्ञान और इरादा होना चाहिए। यह सिर्फ इतना है कि अपना दावे को छोड़ते समय वादा करने वाले के पास त्याग का अधिकार मौजूद होना चाहिए।

भारत में त्याग के संबंध में कानून, इंग्लैंड के कानून से बहुत अलग है। इंग्लैंड में, त्याग संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्चुअल) है और एक समझौता होना चाहिए  जिसे या तो प्रतिफल के समर्थन से छोड़ा जा सकता है या यह मुहर के तहत बनाए संविदा द्वारा छोड़ा जा सकता है।

एक त्याग व्यक्त या निहित हो सकता है

वादा करने वाले के प्रदर्शन के निर्वहन के लिए, किसी नए लिखित समझौते में आने की जरूरत नहीं होती है। प्रदर्शन की त्याग को या तो मौखिक रूप से या एक निहित तरीके से वादाकर्ता के आचरण से बताया जा सकता है। एक निहित तरीके से त्याग इस तरह के आचरण या अपने दायित्वों से वादा करने वाले को माफ करने की दिशा में किए गए सकारात्मक कार्य से होनी चाहिए। आम तौर पर, केवल चुप रहने को संविदा की त्याग नहीं माना जाता है।

कम राशि या कम प्रदर्शन की स्वीकृति

जैसा कि ऊपर उदाहरण (B) में देखा गया है, जब राशि के कम भुगतान पर पूरे ऋण का भुगतान किया जाता है, तो यह ऋण की एक वैध संतुष्टि है और ऋण का निर्वहन किया जाता है। हरि चंद मदन गोपाल और अन्य बनाम पंजाब राज्य में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि सरकार ने केवल 40% की वसूली करने का फैसला किया था और उससे अधिक नहीं। सरकार का निर्णय अपीलकर्ताओं द्वारा देय ऋण के एक हिस्से को चुकाने के बराबर होगा। इसलिए, सरकार 40% से अधिक की वसूली के लिए नहीं कह सकती है।

यहां तक ​​​​कि अगर ऋण वापस चुकाने के अलावा कोई प्रदर्शन होता है, तो वादाकर्ता वास्तविक प्रदर्शन को छोड़ कर वादे के कम प्रदर्शन को स्वीकार कर सकता है, जिसे वादाकर्ता द्वारा किया जाना आवश्यक है।

तीसरे पक्ष द्वारा कम भुगतान

जैसा कि ऊपर दिए गए उदाहरण (C) में देखा गया है, जब कोई तीसरा पक्ष वादा करने वाले की ओर से भुगतान करता है या वादे का पालन करता है, तो वादाकर्ता वादा करने वाले के प्रदर्शन को परिहार कर सकता है। भुगतान या प्रदर्शन या तो पूरी वादा की गई राशि का किया जा सकता है या फिर जैसा भी वादाकर्ता को ठीक लगे, तो वह कम राशि या प्रदर्शन ऋण को संतुष्ट कर सकता है। कपूर चंद गोधा बनाम मीर नवाब हिमायत अली खान आज़मजाह में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वादाकर्ता ने अपने दावे की पूर्ण संतुष्टि में भुगतान स्वीकार कर लिया था, वह मुकदमा करने का हकदार नहीं था।

यह नोट करना महत्वपूर्ण है कि यदि वादाकर्ता द्वारा प्रदर्शन की कम राशि के संबंध में विरोध के तहत स्वीकृति दी जाती है, तो वादाकर्ता वादे का भुगतान/निष्पादन करने के लिए उत्तरदायी होता है और राशि/निष्पादन को छोड़ा नहीं जाता है।

सहमति और संतुष्टि का सिद्धांत

यदि वादा करने वाला अपने वादे के हिस्से को पूरा करने में सक्षम नहीं है और एक उल्लंघन होता है, तो पक्ष एक समझौते में प्रवेश कर सकते हैं, जिसके तहत वादाकर्ता उसके लिए उपलब्ध कानूनी उपाय के अलावा कुछ प्रतिफल स्वीकार करता है। इस प्रकार, जब वादा करने वाला नए समझौते के संबंध में अपने दायित्वों का पालन करता है, तो वह पिछले संविदा के उल्लंघन से उत्पन्न होने वाली देयता से मुक्त हो जाता है। यह निर्वहन दोनों पक्षों के बीच सहमति और संतुष्टि से किया जाता है। यह सिद्धांत धारा 63 में लागू होता है, क्योंकि सहमति और संतुष्टि से, वादाकर्ता मूल संविदा से उत्पन्न होने वाले अपने दावे को छोड़ देता है।

त्याग के सिद्धांत का निरसन (रिवोकेशन)

अपील की अदालत ने कहा कि जिस पक्ष ने किसी विशेष आवश्यकता के अनुपालन को माफ कर दिया है, वह परिस्थितियों में और उचित नोटिस देकर अपने त्याग का अधिकार वापस ले सकता है। हालांकि, ऐसा नोटिस दिया जाना चाहिए ताकि वादा करने वाले के पास उस आवश्यकता को पूरा करने का एक उचित अवसर हो जिसे वादा करने वाले द्वारा माफ कर दिया गया था। यदि बहुत देर हो चुकी है या अनुचित है, तो त्याग को रद्द नहीं किया जा सकता है और पक्ष त्याग के लिए बाध्य हैं।

एक संविदा में त्याग का खंड

यह सलाह दी जाती है कि संविदा में ही त्याग का खंड होना चाहिए। त्याग खंड में त्याग के संबंध में अतिरिक्त विवरण शामिल हो सकते हैं जैसे, “त्याग का अनुमान केवल प्रदर्शन करने में विफलता से नहीं लगाया जाएगा” या “त्याग एक लिखित तरीके से की जाएगी”। त्याग खंड भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 63 में कानून द्वारा प्रदान की गई बातों के विपरीत कुछ भी नहीं बता सकता है।

निष्कर्ष

त्याग एक अवधारणा है जिसे संविदा को और कुशल बनाने के खंड में कई बार अनदेखा किया जाता है लेकिन यह संविदा पर एक बड़ा प्रभाव डाल सकता है। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 63 को संविदा का त्याग का एक व्यापक अर्थ प्रदान करने के लिए न्यायिक घोषणा के माध्यम से विकसित किया गया है। इसलिए, हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि त्याग वह तरीका है जिसके द्वारा एक वादाकर्ता वादा करने वाले के प्रदर्शन को या तो पूर्ण या आंशिक रूप से परिहार करता है या समय बढ़ाने के लिए प्रदान कर सकता है। यह या तो स्पष्ट रूप से या निहित तरीके से व्यक्त किया जा सकता है। भारतीय कानूनों के तहत, त्याग के लिए किसी समझौते या प्रतिफल की आवश्यकता नहीं है, जैसा कि हम अंग्रेजी कानून में देखते हैं। इस प्रकार, एक समझौते में त्याग के खंड का सावधानीपूर्वक मसौदा (ड्राफ्ट) तैयार करना महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि खंड में कोई खामियां हैं तो इससे बहुत नुकसान हो सकता है।

संदर्भ

  • Contract and Specific Relief- Avatar Singh
  • MULLA- The Indian Contract Act
  • Phoenix Mills Ltd. vs M.H. Dinshaw And Co. (1946) 48 BOMLR 313

 

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