इंडियन पीनल कोड,1860 के तहत इलेक्शन से संबंधित अपराध (धारा 171A-171I) 

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Indian Penal Code 1860
Image Source- https://rb.gy/eq6uoa

यह लेख Mehak Jain द्वारा लिखा गया है, जो वर्तमान में हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में कानून की पढ़ाई कर रही हैं। यह एक विस्तृत लेख है जो आई.पी.सी. में इलेक्शन से संबंधित अपराधों और सुझाए गए सुधारों की पुष्टि करता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja  द्वारा किया गया है।

  1. परिचय (इंट्रोडक्शन)

  2. इंडियन पीनल कोड, 1860 के अध्याय (चैप्टर) IX A, की धारा 171A में,  इलेक्शन से संबंधित अपराधों का उल्लेख है। भारत में इलेक्शन किसी त्यौहार से कम नहीं हैं और लोगों को बेहद चिंतित करते हैं। यह अध्याय इंडियन इलेक्शन ऑफेंसेस एंड  इंक्वायरी एक्ट, 1920, की धारा 2 द्वारा पेश किया गया था। यह ब्राइबरी, परसोनेशन, अनड्यू इनफ्लुएंस, चुनाव के दौरान किसी की प्रतिष्ठा (रेपुटेशन) को खराब करने के लिए फॉल्स स्टेटमेंट देना आदि जैसे अपराधों के लिए दंड को निर्धारित (प्रिसक्राइब) करता है। इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य स्वतंत्र और निष्पक्ष (फेयर) इलेक्शन सुनिश्चित (एन्शुर) करना है और लोगों को अपने वोटिंग अधिकारों का स्वतंत्र रूप से अभ्यास करने की अनुमति देना है।

उद्देश्य (ऑब्जेक्टिव)

राजनीतिक मामलों के संदर्भ में, स्वतंत्र और निष्पक्ष इलेक्शन की अवधारणा (कॉन्सेप्ट) को सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्रता और समानता मूल तत्व (फैक्टर) हैं। स्वतंत्र और निष्पक्ष इलेक्शन का अर्थ है कि, कोई भी अपने कानूनी अधिकार का प्रयोग करते समय प्रभावित नहीं होता; वे स्वयं निर्णय ले सकते है, और अपनी व्यक्तिगत पसंद, किसी दूसरे के बंधन (बाँडेज) से मुक्त होकर दे सकते हैं, बिना किसी मैलिस या दूसरे के अनड्यू इनफ्लुएंस के। राज्य के सुचारू (स्मूथ) संचालन को सुनिश्चित करने के लिए इलेक्शन महत्वपूर्ण (क्रूशियल) हैं और यह निष्पक्ष तरीके से किया जाना चाहिए। जब कोई व्यक्ति अपना मतदान देता है, तो वह किसी पार्टी के द्वारा अनुशासन, धर्म, लिंग, भाषा, जाति, मजहब (क्रीड) आदि के किसी भी प्रभाव या नियंत्रण में नहीं होता है। रिश्वतखोरी या घटिया रणनीति (चीप टैक्टिक्स) अपनाना किसी के चुनाव प्रचार को धूमिल (स्मिर) करने के लिए, जैसे भ्रष्ट कार्यों के लिए बाध्य नहीं है। इस प्रकार, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव एक डेमोक्रेटिक राष्ट्र के प्रतीक हैं।

इंडियन पीनल कोड में इलेक्शन से संबंधित अपराध 

ब्राइबरी

  1. धारा 171 B के अनुसार, एक व्यक्ति द्वारा किया गया रिश्वतखोरी का अपराध तब माना जाता है, जब वह किसी व्यक्ति को इस उद्देश्य से ग्रेटिफिकेशन करता है, ताकि वह उस व्यक्ति को अपने चुनावी अधिकार का प्रयोग करने के लिए प्रेरित कर सके या किसी व्यक्ति को इसलिए इनाम दे क्योंकि उसने अपने चुनावी अधिकार का प्रयोग, उससे प्रेरित होकर किया। जो व्यक्ति, इस तरह से प्रेरित हो कर अपने चुनावी अधिकार का प्रयोग, भिन्न प्रकार से करता है और रिश्वत लेता है, तो उसे भी रिश्वत के अपराध के लिए दोषी माना जाता है।
  2. इस धारा के लिए, जो व्यक्ति ग्रेटिफिकेशन देने की ऑफर करता है या देने के लिए सहमत होता है या ऑफर करने की प्रस्थापना या प्रयत्न करता है, तो यह माना जाता है कि वह ग्रेटिफिकेशन दे रहा है। जो व्यक्ति अपने पूर्व-निर्धारित विकल्प को बदलने के लिए ग्रेटिफिकेशन को स्वीकार करता है या प्राप्त करने का  प्रयत्न करता है और इस तरह के ग्रेटिफिकेशन देने वाले व्यक्ति की इच्छा के अनुसार कार्य करता है, तो यह माना जाता है कि उस व्यक्ति ने ग्रेटिफिकेशन, को स्वीकार किया है। 
  3. रिश्वतखोरी का अपराध करने वाले व्यक्ति को धारा 171 E के प्रोविजन के तहत कारावास (इंप्रिजनमेंट), जिसकी अवधि एक वर्ष तक हो सकती है, या जुर्माना, या दोनों से दंडित किया जा सकता है। परंतु सत्कार (ट्रीट) के रूप में रिश्वत केवल जुर्माने से ही दंडित की जाएगी। “सत्कार” का अर्थ है भोजन, पेय, मनोरंजन या प्रावधान को ग्रेटिफिकेशन के रूप में प्रदान करना या स्वीकार करना।

इलेक्शन में अनड्यू इनफ्लुएंस डालना 

किसी उम्मीदवार (कैंडिडेट) या मतदाता या किसी ऐसे व्यक्ति को धमकाना (किसी भी प्रकार के अत्याचार के साथ) जिसमें कोई उम्मीदवार/मतदाता रुचि रखता हो , या;

  1. किसी उम्मीदवार/मतदाता को यह विश्वास करने के लिए गुमराह (मिस्लीड) करना या प्रेरित करने का प्रयास करना कि वे, या कोई भी व्यक्ति, जिसमें वे रुचि रखते हैं, ईश्वरीय (डिवाइन) नाराजगी (डिस्प्लेजर) या धार्मिक दोष (स्पिरिचुअल सेन्शर) के अधीन होंगे।
  2. अपने कानूनी अधिकार का प्रयोग करना, किसी व्यक्ति के इलेक्शन अधिकार में दुर्भावपूर्ण (मालाफाइड) इरादे से हस्तक्षेप करे बिना, सार्वजनिक पॉलिसी की घोषणा करना या  किसी सार्वजनिक कार्य को करने का वादा इस धारा के अर्थ के अनुसार हस्तक्षेप के रूप में नहीं गिना जाता।
  3. धारा 171 F के अनुसार, इलेक्शन में  असम्यक का असर डालना एक साल तक की कैद, या जुर्माना, या दोनों के साथ दंडनीय है।

इलेक्शन में परसोनेशन 

 धारा 171 D के अनुसार, दो बार मतदान देने या अनुचित तरीके से मतदान देने का प्रयास करने वाले व्यक्ति परसोनेशन के अपराध का दोषी है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अपना मतदान डालना चाहिए। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति, वोटिंग पेपर का प्रयोग किसी और के नाम से कर रहा हो, चाहे वह जीवित हो या मृत, या किसी काल्पनिक नाम  से, या इस चुनाव में मतदान दे दिया हो पर फिर से  मतदान देना चाहता हूं, तो वह व्यक्ति,  परसोनेशन का दोषी कहलायेगा। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को अपने प्रयोग के लिए वोटिंग पेपर प्राप्त करने के प्रयास से उकसता है, तो वह भी परसोनेशन के अपराध का दोषी होगा।

यहां पर यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि, उस समय लागू किसी भी कानून के तहत, यदि कोई व्यक्ति ऑथराइज है किसी और व्यक्ति के लिए मतदान में प्रोक्सी देने के लिए, तो वह इस अपराध का दोषी नहीं होगा।

धारा 171 F के अनुसार, चुनाव में परसोनेशन का अपराध करने के लिए व्यक्ति को कारावास से दंडित किया जा सकता है, जिसकी अवधि 1 वर्ष तक हो सकती है, या जुर्माना, या दोनों।

इलेक्शन के सिलसिले में फॉल्स स्टेटमेंट

धारा 171G में यह कहा गया है कि, जो कोई भी व्यक्ति किसी उम्मीदवार के चरित्र या आचरण को खराब करने के प्रयास में, सार्वजनिक रूप से एक कथन बनाता/पब्लिश करता है, यह जानते हुए भी कि वह फॉल्स स्टेटमेंट है, और उसे सच्चे तथ्यों के रूप में प्रच्छन्न (डिस्गाइज़) करता है, तो ऐसे अपराध जो, इलेक्शन के परिणाम को बाधित (डिस्रप्ट) करने के लिए किए जाते हैं, वह जुर्माने के साथ दंडनीय होंगे।

इलेक्शन के सिलसिले में इलीगल पेमेंट

धारा 171 H के अनुसार, जो कोई भी व्यक्ति, उम्मीदवार के द्वारा लिखित में दिए गए किसी सामान्य या विशेष अधिकार के बिना, इलेक्शन कैंपेन, जिसमें सार्वजनिक सभा करने, प्रेस कॉन्फ्रेंस, विज्ञापन, सर्कुलर या पब्लिकेशन शामिल हो सकते हैं,  को बढ़ावा देने के लिए व्यय (एक्सपेंसेस) करने के लिए जिम्मेदार होता है, तो उस व्यक्ति को जुर्माने से दंडित किया जाएगा, जो 500 रुपये तक बढ़ाया जा सकता है। 

हालांकि, यदि कोई व्यक्ति, जिसने प्राधिकार के बिना कोई ऐसे व्यय किए हो, जिसका मूल्य कुल मिलाकर 10 रुपए से अधिक ना हो, और वह उस तारीख (जिस तारीख को ऐसे व्यय किए गए हो) के भीतर उस उम्मीदवार का लिखित में आज्ञा प्राप्त कर लेता है, तो यह समझा जाएगा कि उसने उम्मीदवार के आज्ञा से ऐसे व्यय किए हैं। 

इलेक्शन-अकाउंट रखने में असफलता 

संहिता की धारा 171I के अनुसार, कोई व्यक्ति, जो इलेक्शन के सिलसिले में होने वाले खर्च का लेखा-जोखा रखने के लिए जिम्मेदार है, उस समय लागू कानून के अनुसार या विधि का बल रखने वाले किसी नियम द्वारा, ऐसा करने में असफल होने पर, जुर्माने से दंडनीय होगा जो 500 रुपये तक बढ़ाया जा सकता है।

सुझाए गए सुधार (सजेस्टेड रिफॉर्म)

पांचवें लॉ कमीशन ने सुधारों से संबंधित, आई.पी.सी. के वर्तमान अध्याय IX-A, में बदलाव का प्रस्ताव रखा  था। हालांकि, इनमें से किसी भी प्रावधान को आज तक लागू और संकलित (कंपाइल) नहीं किया गया। सुधारों में शामिल हैं-

  • ‘इलेक्शन अधिकारों’ की परिभाषा में संशोधन (अमेंडमेंट) करना – वर्तमान परिभाषा में, इलेक्शन में किसी उम्मीदवार से उसकी उम्मीदवारी (कैंडिडेचर) वापस (विथड्रॉ) लेने के अधिकार शामिल नहीं है। उसकी उम्मीदवारी को “वापस लेने या वापस ना लेने के लिए” वाक्यांश को शामिल करने के लिए, परिभाषा को संशोधित किया जाना चाहिए।
  • बेहतर समझ के लिए, रिश्वतखोरी से संबंधित उपखंड (सब क्लोज) और इसकी निर्धारित सजा, यानी धारा 171 B और 171 E को एक धारा के रूप में संयुक्त (कंबाइन) किया जाना चाहिए।
  • रिश्वतखोरी के अपराध को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और इसके लिए पूर्णतया (रिलेटिवली) कठोर सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए क्योंकि यह निश्चित रूप से काफी हद तक एक सुचारू और निष्पक्ष इलेक्शन प्रक्रिया में हस्तक्षेप करता है।
  • अनड्यू इनफ्लुएंस की परिभाषा को सीमित (नेरो) किया जाना चाहिए और कानूनी अधिकारों के स्वतंत्र प्रयोग में हस्तक्षेप करने के (वायलेंट साधनों को शामिल करना चाहिए।
  • रिश्वतखोरी में दिए गए सुझावों के समान, परसोनेशन से संबंधित दोनों उपखंडों यानी आई.पी.सी. की धारा 171 D और 171 F को बेहतर ढंग से समझने के लिए, संयुक्त किया जाना चाहिए।
  • फॉल्स स्टेटमेंट देने की सजा को और सख्त किया जाना चाहिए क्योंकि इससे लोगों के दिमाग और  उम्मीदवारों की प्रतिष्ठा पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए,केवल जुर्माने के साथ बर्खास्त करने के बजाय, 2 साल तक की अवधि के कारावास का सुझाव दिया जाता है।
  • आयोग ने धारा 171F और 171I को भी हटा दिया है क्योंकि वे अनावश्यक और अप्रचलित (ओब्सोलेट) हो गए हैं।

हालाँकि, इनमें से किसी भी सुझाव को विधायिका (लेजिस्लेटर) या 14 विधि आयोग द्वारा ध्यान में नहीं रखा गया था।

ऐतिहासिक निर्णय (लैंडमार्क जजमेंट)

ई अनूप वर्सेज स्टेट ऑफ केरला, 2012 

इस मामले में, पेटीशनर के अनुसार, वह पोलिंग स्टेशन, जो कि, उत्तर प्रदेश के मोकेरी सरकारी विद्यालय में, पेरिंगलम क्षेत्र में है, पर उपस्थित हुए थे। उन्होंने, अपना नाम बदलकर, मतदान केंद्र में खुद को कुट्टीकट्टू पवित्रारण के रूप में प्रस्तुत किया और उन्होंने वोटिंग पेपर प्राप्त करने के लिए ऐसा किया, भले ही वह, वे व्यक्ति नहीं थे जिसका उन्होंने दावा किया था, न ही वह उस इलेक्शन क्षेत्र से संबंधित थे। अदालत ने उन्हें धारा 171D और 171F के तहत परसोनेशन के अपराध का दोषी ठहराया।

इकबाल सिंह वर्सेज गुरदास सिंह, 1975

इस मामले में, रेस्पोंडेंट को पंजाब के एक इलेक्शन क्षेत्र से, कांस्टीट्यूएंसी सदस्य के रूप में चुना गया था। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि कम से कम 15,000 अवैध मत डाले गए थे, जिसके कारण प्रतिवादी को निर्वाचित घोषित किया गया था, और आरोपी ने कथित तौर पर धर्मशालाओं के निर्माण में सहायता करने के बहाने, हरिजनों को भारी मात्रा में धन वितरित (डिस्ट्रीब्यूट) किया था, और ग्रेटिफिकेशन के रूप में कई लोगों को बंदूक के लाइसेंस भी प्रदान किए थे, ताकि मतदाता उनके लिए मत देने के लिए प्रेरित हो।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि, वह परितोषण के रूप में रिश्वतखोरी की भ्रष्ट (करप्ट) प्रथा को प्रदान किए जाने के लिए उत्तरदायी है और मतदाताओं के स्वतंत्र कानूनी अधिकारों को प्रभावित कर रहा है।

आरोपी, 15,000 अवैध मतों को सिद्ध करने में असफल रहा। इलेक्शन रूल्स के नियम 56 के अनुसार मतदान अधिकारी के चिन्ह और हस्ताक्षर दोनों से रहित बैलट पेपर अमान्य होता है, पर इस मामले में ऐसा नहीं था।

“परितोषण”, यदि रिश्वत के तहत शामिल किया जाता है, तो केवल उन मामलों को संदर्भित (रेफर) करने के लिए उपयोग किया जाएगा जहां उपहार देने पर भौतिक (मेटेरियल) लाभ प्रदान किया गया था। इस मामले में दिए गए अनुज्ञा पत्र ने कोई भौतिक लाभ नहीं दिया और इसलिए, इसे रिश्वत के तहत शामिल नहीं कहा जा सकता था। इसके अलावा, रिश्वतखोरी को सिद्ध करने के लिए मतों की सौदेबाजी (बारगेनिंग) के अस्तित्व की आवश्यकता होती है। चूंकि बंदूक के अनुज्ञा पत्र के बदले  मत की सौदेबाजी के संबंध में कोई सबूत नहीं था, इसलिए मुद्दों को सिद्ध नहीं किया जा सका और मामला खारिज कर दिया गया।

राज राज देब वर्सेज गंगाधर, 1962

इस मामले में, रेस्पोंडेंट ओडिशा में पुरी के राजा का छोटा भाई था।  पेटीशनर ने आरोप लगाया कि अपीलकर्ता ने सत्यपदी जिले में चुनाव प्रचार के दौरान अपने फायदे के लिए गलत तरीके से इस कथन का इस्तेमाल किया, जहां उन्होंने कहा कि वह “चलंती विष्णु” है, और लोगों को यह कहकर  मतदान देने के लिए प्रेरित किया कि अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो वे स्वयं भगवान जगन्नाथ को नाराज कर देंगे और उन्हें दिया गया हर मत भगवान जगन्नाथ को दिया गया मतदान कहलाया जाएगा। उन्होंने ईश्वरीय नाराजगी और आध्यात्मिक नाराजगी की धमकी भी दी। इसके अलावा, उन पर यह भी आरोप लगाया गया कि, उन्होंने ग्रामीणों से, उनकी जाति, खंडायत के आधार पर मत देने का निवेदन किया था। उन्होंने इलेक्शन प्रचार के लिए नीला घखरा का भी इस्तेमाल किया था, जो भगवान जगन्नाथ का धार्मिक प्रतीक है।

अदालत ने उन्हें आई.पी.सी. की धारा 171F का उल्लंघन करने के लिए करार दिया।

वीरघवन वर्सेज रजनीकांत, 1997

इस मामले में,  रेस्पोंडेंट, श्री रजनीकांत एक स्थापित फिल्म अभिनेता हैं, जिनके पूरे भारतीय और विशेष रूप से तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर प्रशंसक हैं। याचिकाकर्ता, जो कि सुप्रीम कोर्ट में एक वकील है, ने उन पर इलेक्शन की पूर्व संध्या पर, लोगों पर अनुचित प्रभाव डालने का आरोप लगाया, उनके मुताबिक, प्रतिवादी ने एक टेली-प्रचार प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने मतदाताओं को याचिकाकर्ता से 500 या 1000 रुपये स्वीकार करने और फिर भी उन्हें मत ना देने का आग्रह किया।

मुद्दा यह था कि क्या यह मामला, आई.पी.सी. की धारा 171B, जो रिश्वतखोरी से संबंधित है और धारा 171C, जो अनड्यू इनफ्लुएंस से संबंधित है, को आकर्षित करेगा।

भाषण यह कहा गया कि, तमिलनाडु के मतदाता इन युक्तियों से प्रभावित नहीं हो सकते और उन्हें भ्रष्ट नहीं किया जा सकता है; इसलिए, यदि विरोधी ने  मत डालो के सौदे के रूप में पैसे की पेशकश की, तो संकोच न करें और इसे स्वीकार करें, लेकिन फिर भी, अपने कानूनी अधिकारों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग करें क्योंकि तमिलनाडु के लोगों को खरीदा नहीं जा सकता।

न्यायालय ने कहा कि, प्रतिवादी ने भाषण में कभी भी रिश्वत मांगने और प्राप्त करने की सलाह नहीं दी। आपत्तिजनक (ऑफेण्डिंग) भाषण इतना अपमानजनक नहीं था और इसमें मतदाताओं पर अपनी स्वतंत्र इच्छा का प्रयोग ना करने के रिस्ट्रेंट से संबंधित कुछ भी नहीं था। आई.पी.सी. की दर्शाई हुई धाराएं को इस मामले में लागू नहीं किया जा सकता था और इस प्रकार प्रतिवादी किसी भी अपराध का दोषी नहीं था और मामला खारिज कर दिया गया था।

निष्कर्ष (कंक्लूज़न)

यह स्पष्ट है कि, सदियों से चलती आ रही पुरानी सजाएं, ज्यादातर व्यर्थ हो गई है और अपराधों कि रोक-थाम के लिए सख्त नहीं हैं। इलेक्शन में भाग लेने वाला प्रत्येक उम्मीदवार जीतने के इरादे से भाग लेता है और खुद को सबसे सक्षम (विएबल) विकल्प के रूप में देखता है। इस लक्ष्य की दिशा में काम करने के लिए, वे अनुचित तरीके अपना सकता है और इलेक्शन कराने के निष्पक्ष तंत्र (मेकैनिज्म) के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं।  इलेक्शन से संबंधित अपराधों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और निष्पक्ष इलेक्शन प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए, सजा को संशोधित किया जाना चाहिए। पांचवें विधि आयोग के द्वारा प्रस्तुत किए गए सुधारों पर विचार करना और तदनुसार (अकॉर्डिंग्ली) परिवर्तन करना आवश्यक है।

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