भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत गवाहों का परीक्षण और जिरह

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Indian Evidence Act

यह लेख नोएडा के सिम्बायोसिस लॉ स्कूल के छात्र Sushant Biswakarma द्वारा लिखा गया है। यह लेख एक आपराधिक मुकदमे में गवाहों के परीक्षण (एग्जामिनेशन) और जिरह (क्रॉस एग्जामिनेशन) पर चर्चा करता है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash के द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

गवाहों का परीक्षण, एक आपराधिक मुकदमे का एक सबसे जरूरी अंग है। एक गवाह द्वारा दी गई गवाही सबसे विश्वसनीय सबूतों में से एक होती है क्योंकि बयान देने वाले व्यक्ति ने व्यक्तिगत रूप से घटना को देखा होता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम (इंडियन एविडेंस एक्ट), 1872 की धारा 135धारा 165 गवाहों के परीक्षण और जिरह से संबंधित है। यह लेख महत्त्वपूर्ण मामलों के साथ-साथ प्रत्येक धारा को एक-एक करके शामिल करेगा।

साक्ष्य की स्वीकार्यता (एडमिसिबिलिटी)

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 5 के तहत साक्ष्य तभी स्वीकार्य होता है, जब वह किसी प्रासंगिक (रिलेवेंट) तथ्य का समर्थन करता है। आगे धारा 136 में यह प्रावधान किया गया है कि न्यायाधीश पक्षों से पूछ सकते है कि उन्होंने जो साक्ष्य प्रस्तुत किया है, वह प्रासंगिक तथ्य से संबंधित है या नहीं।

न्यायालय में साक्ष्य के स्वीकार्य होने के लिए, न्यायाधीश को आश्वस्त होना चाहिए कि यह साक्ष्य प्रासंगिक है और साथ ही प्रासंगिक तथ्य को स्थापित करने में मदद भी करता है।

परीक्षण का आदेश

गवाहों को उनके सामने प्रस्तुत किए गए प्रासंगिक प्रश्नों का उत्तर देना आवश्यक होता है। एक गवाह से पूछा गया प्रश्न किसी मुद्दे के तथ्य के लिए प्रासंगिक होना चाहिए, और ऐसे मुद्दे को स्थापित करने में मदद करना चाहिए। उनके उत्तर जब दर्ज किए जाते हैं तो उन्हें गवाहों की गवाही (टेस्टिमोनिज ऑफ विटनेस) कहा जाता है। गवाह से यह पूछताछ करना और उनके उत्तरों को दर्ज करना ही एक गवाह का परीक्षण कहलाता है।

गवाह का परीक्षण

एक गवाह का परीक्षण, गवाह से मामले में प्रासंगिक तथ्यों के बारे में सवाल पूछ कर किया जाता है और गवाहों के बयानों को साक्ष्य के रूप में दर्ज भी किया जाता है। गवाह के परीक्षण के तीन भाग होते हैं और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 138 में कहा गया है कि एक गवाह का परीक्षण निम्नलिखित क्रम में किया जाना चाहिए:

  • सबसे पहले, गवाह को बुलाने वाला पक्ष उसका परीक्षण करता है, इस प्रक्रिया को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 137 के तहत उल्लिखित मुख्य परीक्षा कहा जाता है।
  • मुख्य परीक्षा के पूरा होने के बाद, यदि विरोधी पक्ष चाहे तो वे गवाह को अपने कब्जे में ले सकते हैं और उससे उसके पिछले उत्तरों के बारे में फिर से सवाल कर सकते हैं। विरोधी पक्ष उससे सभी प्रासंगिक तथ्यों के बारे में कोई भी प्रश्न पूछ सकता है, न कि केवल मुख्य परीक्षा के दौरान चर्चा किए गए तथ्यों के बारे में। इस प्रक्रिया को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 137 में जिरह के रूप में वर्णित किया गया है।
  • यदि गवाह को बुलाने वाला पक्ष जिरह के बाद फिर से गवाह की जांच करने की आवश्यकता देखता है, तो वे एक बार और गवाह का परीक्षण कर सकते हैं। इसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 137 में पुन: परीक्षण (री एग्जामिनेशन) के रूप में निर्धारित किया गया है।

धारा 138 में कहा गया है कि जिरह में संदर्भित मामलों को समझाने के लिए पुन: परीक्षण को न्यायालय द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए। इस धारा में आगे कहा गया है कि यदि पुन: परीक्षण के दौरान कोई नया तथ्य या मुद्दा सामने आता है, तो विरोधी पक्ष उस तथ्य या मुद्दे पर गवाह से आगे जिरह कर सकता है।

गुलाम रसूल खान बनाम वली खान के मामले में, जम्मू और कश्मीर के उच्च न्यायालय द्वारा यह माना गया था कि- यदि गवाह की गवाही प्रथम दृष्टया (प्राइमा फेसी) अस्वीकार्य हो जाती है, तो जिरह की आवश्यकता नहीं भी हो सकती है।

इसलिए, यदि गवाह द्वारा किसी प्रासंगिक तथ्य का उत्तर नहीं दिया जाता है या उसके बयानों की कोई विश्वसनीयता नहीं पाई जाती है, तो उसकी गवाही को खारिज किया जा सकता है और उस मामले में जिरह की कोई आवश्यकता नहीं होती है।

एक गवाह का परीक्षण विशेष रूप से धारा 138 के तहत उल्लिखित अनुक्रम (सीक्वेंस) में की जानी चाहिए। शारदम्मा बनाम रेंचम्मा के मामले में, यह माना गया था कि जिरह से पहले मुख्य परीक्षा किया जाना चाहिए। इसके विपरीत किया गया कोई और तरीका, न तो संभव है और न ही अनुमेय (परमिसिबल) है।

गैर-गवाह की परीक्षण 

धारा 139

इस धारा के तहत गवाहों की गवाही के अलावा, अदालत में स्वीकार्य साक्ष्य के कई अन्य रूप भी होते हैं।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 3(2)(e) में वर्णित दस्तावेजी साक्ष्य उनमें से एक है। किसी व्यक्ति को केवल दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए भी बुलाया जा सकता है। अधिनियम की धारा 139 में कहा गया है कि- ऐसा व्यक्ति, जिसे केवल दस्तावेज पेश करने के लिए बुलाया जाता है, वह गवाह नहीं बनता है।

दस्तावेज़ की विश्वसनीयता स्थापित करने के लिए उसकी जांच की जा सकती है। लेकिन, जब तक उसे गवाह के रूप में नहीं बुलाया जाता है, तब तक उससे जिरह नहीं किया जा सकता है।

धारा 140

धारा 140 एक पक्ष के चरित्र के बारे में बात करती है। किसी का “चरित्र” उनकी गुणवत्ता या विशेषताओं को संदर्भित करता है जो उन्हें दूसरों से अलग करती है। यह विशेष रूप से मानसिक और नैतिक विशेषताएं की बात करती है। इसमें समाज में एक व्यक्ति की प्रतिष्ठा भी शामिल होती है।

इस धारा में कहा गया है यदि मुख्य परीक्षण पहले ही पूरा हो चुका हो तो कि किसी पक्ष के चरित्र के गवाह की जिरह की जा सकती है।

गवाहों द्वारा दिए गए बयानों के मूल्य का निर्धारण करने में न्यायालय की सहायता के लिए चरित्र का साक्ष्य सहायक होता है।

प्रमुख सवाल

किसी गवाह का परीक्षण, जिरह या पुन: परीक्षण करते समय, पक्षों को प्रमुख प्रश्न पूछने से बचना चाहिए। अधिनियम की धारा 141 में प्रमुख प्रश्नों का वर्णन इस प्रकार किया गया है- कोई भी प्रश्न जो उस उत्तर का सुझाव देता है, जो प्रश्नकर्ता व्यक्ति प्राप्त करने की अपेक्षा करता है।

यदि दूसरा पक्ष गवाह से प्रमुख प्रश्न पूछता है तो पहले पक्ष को आपत्ति करनी चाहिए।

एक प्रमुख प्रश्न, गवाह को उत्तर सुझाता है, उदाहरण के लिए:

  • “आपने हैरी को काला वस्त्र पहने देखा था, है ना?”

यह प्रश्न अपने आप में बताता है कि हैरी ने एक काला वस्त्र पहना हुआ था, यह प्रश्न साक्ष्य देने वाले व्यक्ति को उत्तर देने के लिए प्रेरित कर रहा है, वो भी उस जवाब के लिए जो प्रश्नकर्ता साबित करना चाहता है।

  • “हैरी ने क्या पहना था?”

इस प्रश्न का उत्तर पिछले वाले जैसा ही हो सकता है, हालाँकि, प्रश्न में उसके उत्तर का कोई सुझाव नहीं है। यह एक सरल प्रश्न है और किसी भी तरह से अग्रणी (लीडिंग) नहीं है। इस प्रकार के प्रश्न करने की अनुमति दी जाती है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि गवाह को हर सवाल का जवाब खुद ही देना होगा क्योंकि वह वही है जिसने इस तथ्य को असल में होते हुए देखा है। यदि प्रश्न में उसके उत्तर का कोई सुझाव है, तो इसे प्रश्नकर्ता गवाह को प्रतिक्रियाएँ बताता हुआ पाया जाएगा।

क्या किसी गवाह से प्रमुख प्रश्न पूछे जा सकते हैं?

भले ही प्रमुख प्रश्न पूछना धारा 141 द्वारा निषिद्ध है क्योंकि यह गवाह को प्रश्न की प्रतिक्रियाओं से भर देता है और ऐसे प्रश्न गवाह से पूछे जाने पर विपरीत पक्ष द्वारा आपत्ति की जानी चाहिए। हालांकि, धारा 142 में कहा गया है कि प्रमुख प्रश्न एक परीक्षण-इन-चीफ में या फिर से परीक्षण में पूछे जा सकते हैं यदि न्यायालय ऐसा करने की अनुमति देता है।

इस धारा में आगे कहा गया है कि ऐसे मामलों में न्यायालय द्वारा प्रमुख प्रश्न करने की अनुमति दी जा सकती है जहां तथ्य परिचयात्मक (इंट्रोडक्टरी) या निर्विवाद (अंडिस्प्यूटेड) हैं या न्यायालय की राय में पहले ही पर्याप्त तरीके से साबित हो चुके हैं।

केरल के उच्च न्यायालय ने वर्की जोसेफ बनाम स्टेट ऑफ केरल के मामले में भी इसका समर्थन किया था।

धारा 142 में जिरह के दौरान प्रमुख प्रश्न पूछने का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। लेकिन, धारा 143 में कहा गया है कि जिरह के दौरान भी प्रमुख प्रश्न पूछे जा सकते हैं।

परीक्षण-इन-चीफ, जिरह या पुन: परीक्षण में केवल अन्य पक्ष द्वारा आपत्ति किए जाने पर प्रमुख प्रश्न नहीं पूछे जा सकते हैं। यदि दूसरे पक्ष को आपत्ति न हो तो ऐसे प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं।

यहां तक ​​​​कि जब एक प्रमुख प्रश्न पर आपत्ति जताई गई है, तो यह न्यायालय के विवेक पर है कि इसे अनुमति दी जाए या नहीं और अत्यधिक मामलों को छोड़कर अपील या पुनरीक्षण (रिवीजन) के न्यायालय द्वारा विवेकाधिकार में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।

लिखित दस्तावेजों के मौखिक साक्ष्य

धारा 144 में कहा गया है कि किसी भी गवाह से किसी दस्तावेज़ या अनुबंध की सामग्री के बारे में सवाल पूछा जा सकता है, जो दस्तावेज़ में मौजूद भी नहीं है। यदि गवाह ऐसे दस्तावेजों के संबंध में बयान देता है, तो उसे न्यायालय के समक्ष पेश किया जाना चाहिए।

विरोधी पक्ष ऐसे साक्ष्य पर तब तक आपत्ति कर सकता है जब तक कि उसे न्यायालय में पेश नहीं किया जाता।

उदाहरण के लिए:

  • हैरी का दावा है कि हर्मोइन ने रॉन को यह कहते हुए सुना कि “टॉम ने एक पत्र लिखा है जिसमें मेरे परिवार को मारने की धमकी दी गई है और इससे पहले कि वह कुछ कर सके, मैं उसे मार डालूंगा”।

हत्या के लिए हर्मोइन के इरादे को दिखाने में यह कथन प्रासंगिक है, और इसके लिए सबूत दिए जा सकते हैं, हालांकि यहां पत्र के बारे में कोई अन्य सबूत नहीं दिया गया है।

यदि कोई गवाह किसी अनुबंध, अनुदान (ग्रांट) या संपत्ति के किसी अन्य निपटान% के संबंध में साक्ष्य दे रहा है तो उससे पूछा जा सकता है कि क्या इसका कोई दस्तावेज मौजूद है या नही। यदि वह हां में उत्तर देता है, तो अधिनियम की धारा 91 लागू हो जाती है और उक्त दस्तावेज की शर्तों के मौखिक साक्ष्य की अनुमति नहीं होगी।

अतुल बोरा बनाम अकान बोरा के मामले में, अदालत ने माना कि धारा 144 की कोई जरूरत नहीं आती है जब चुनाव-याचिकाकर्ता द्वारा गवाह से जिरह की मांग की जाती है, जो किसी भी अनुबंध, अनुदान या संपत्ति के किसी अन्य निपटान पर कोई प्रश्न नहीं पूछाता है।

पिछले बयानों पर जिरह

एक गवाह द्वारा दिए गए हर बयान को लिखित रूप में रक्षित किया जाना चाहिए। जिरह के बाद के चरण में, एक गवाह द्वारा पहले दिए गए बयानों पर उसका खंडन किया जा सकता है।

अधिनियम की धारा 145 में कहा गया है कि इस तरह के विरोधाभास (कांट्रेडिक्शंस), प्रासंगिक प्रश्नों में बिना गवाह को उनके साबित होने से पहले दस्तावेज दिखाए बिना भी किए जा सकते हैं। एक बार जब कथन सत्य सिद्ध हो जाते हैं, तब साक्ष्य देने वाले का खंडन करने की कोई बात ही नहीं आती है।

पुरुषोत्तम जेठानंद बनाम द स्टेट ऑफ कच्छ के मामले में, अदालत ने कहा कि यह धारा आरोपी को जांच के दौरान बयान प्राप्त करने में मदद नहीं करती है, लेकिन यह उसे ऐसे बयानों का उपयोग करने में मदद करता है, जब उसने उन्हें किसी और तरह से प्राप्त किया हो। जिस बयान पर गवाह का खंडन किया जा रहा है, वह मामले के मुद्दे के लिए प्रासंगिक होना चाहिए।

वैध प्रश्न

गवाह के बयानों को न्यायालय, साक्ष्य के तौर पर लेगा, लेकिन उससे पहले यह साबित करना होगा कि गवाह वास्तव में सच कह रहा है। धारा 146 में कहा गया है कि एक गवाह के जिरह के दौरान, उससे उपरोक्त प्रश्नों के अतिरिक्त ऐसे प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं जो निम्न करने का प्रयास करते हैं:

  • उसकी सटीकता या सच्चाई का परीक्षण करते हो।
  • गवाह और जीवन में उसकी स्थिति के बारे में अधिक जानने के लिए हो।
  • उनके चरित्र पर सवाल उठाकर उनका क्रेडिट हिलाने लेने के लिए हो।

भले ही इन सवालों के जवाबों में प्रत्यक्ष (डायरेक्टली) या अप्रत्यक्ष (इनडायरेक्टली) रूप से उसे दोषी ठहराने या बेनकाब करने या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उसे दंड करने या जब्ती की ओर ले जाने की क्षमता है, गवाह ऐसे सवालों का जवाब देने के लिए मजबूर होता है।

हालांकि, धारा किसी भी सबूत को जोड़ने या जिरह में कोई प्रश्न पूछने की अनुमति नहीं देता है जिसमें पीड़ित के नैतिक चरित्र या किसी भी व्यक्ति के साथ पिछले यौन अनुभव शामिल हो सकते हैं।

क्या गवाह को जवाब देने के लिए मजबूर किया जाता है?

इस अधिनियम की धारा 147 में कहा गया है कि यदि मामले के प्रासंगिक मुद्दे से संबंधित कोई प्रश्न है, तो धारा 132 लागू होती है।

धारा 132 में कहा गया है कि गवाह को इस आधार पर किसी भी प्रश्न का उत्तर देने से छूट नहीं दी जाएगी कि उत्तर उसे अपराधी बना सकता है या मामले में प्रासंगिक मुद्दे के संबंध में किसी भी प्रश्न पर दंड या जब्ती का कारण बन सकता है।

इस धारा के प्रावधान में कहा गया है कि ऐसा कोई भी जवाब उसे गिरफ्तारी या मुकदमा चलाने के अधीन नहीं करेगा या किसी आपराधिक कार्यवाही में उसके खिलाफ साबित नहीं होगा। लेकिन यह सब, अपने बयानों से झूठे सबूत देने के लिए मुकदमे के अलावा होगा।

अधिनियम की धारा 148 में यह उल्लेख किया गया है कि न्यायालय को यह तय करना होगा कि एक गवाह को जवाब देने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए या नहीं।

यह क़ानून गवाह को आक्रामक (एग्रेसिव) जिरह से सुरक्षा प्रदान करता है। वह उन सवालों के जवाब देने के लिए बाध्य नहीं है जो:

  • उसके चरित्र को हानि पहुँचाता है, या
  • उसकी विश्वसनीयता पर संदेह करता है।

बॉम्बे कॉटन मैन्युफैक्चरिंग कंपनी बनाम आर.बी. मोतीलाल शिवलाल के मामले में, यह बताया गया है कि इस तरह के प्रश्न प्रासंगिक तथ्यों से संबंधित होते हैं और केवल इस मुद्दे के लिए प्रासंगिक होते हैं कि गवाह पर विश्वास किया जाना चाहिए या नहीं।

ऐसे मामलों में जहां निर्णय पूरी तरह से मौखिक साक्ष्य पर निर्भर करता है, ऐसे प्रश्नों का उत्तर देना सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है।

इसलिए, अदालत यह तय कर सकती है कि किसी गवाह को सवालों के जवाब देने के लिए कब मजबूर किया जा सकता है और अगर सवाल उसे किसी भी तरह से अपराधी बनाने की प्रवृत्ति रखते हैं, तो उसके बयानों के आधार पर उस पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। उसे कानून द्वारा ऐसी सुरक्षा प्रदान की गई है।

प्रश्न उचित आधार पर होने चाहिए

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 149 में उल्लिखित उचित आधार के बिना आरोपी से कोई प्रश्न नहीं पूछा जाना चाहिए।

धारा में कहा गया है कि धारा 148 में संदर्भित कोई भी प्रश्न तभी पूछा जाना चाहिए जब ऐसे प्रश्न पूछने के लिए उचित आधार हों जो गवाह के चरित्र को हानि पहुंचा सकते हैं या उसे बेनकाब कर सकते हैं।

प्रावधान को बेहतर ढंग से समझने के लिए, आइए धारा 149 के उदाहरण देखते है:

  • एक वकील द्वारा एक बैरिस्टर को सूचित किया जाता है कि गवाह एक डकैत है। यह एक ऐसा प्रश्न पूछने का उचित आधार है कि गवाह डकैत है या नहीं।
  • जब एक गवाह के बारे में कुछ भी पता नहीं चलता है और उससे बेतरतीब (रैंडम) ढंग से पूछा जाता है कि क्या वह डकैत है। इस प्रश्न के पूछे जाने के लिए कोई उचित आधार नहीं हैं।

दिए गए उदाहरण को पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि यह धारा गवाह को उसके चरित्र को घायल होने से बचाने का भी इरादा रखती है।

इसके अलावा, धारा 150 में उल्लेख किया गया है कि यदि कोई बैरिस्टर, प्लीडर, वकील या अटॉर्नी बिना किसी उचित आधार के ऊपर बताए गए ऐसे प्रश्न पूछता है, तो न्यायालय को मामले की रिपोर्ट उच्च न्यायालय या अन्य प्राधिकारी (अथॉरिटी) को करनी चाहिए, जिसके अधीन ऐसा अधिवक्ता अपना काम करता है।

निषिद्ध (फोरबिडन) प्रश्न

न्यायालय को धारा 151 के तहत ऐसे प्रश्नों को मना करने की शक्ति प्रदान की गई है जो अशोभनीय (इंडिसेंट) या निंदनीय (स्कैंडलस) हैं।

मोहम्मद मियां बनाम एंपरर के मामले में, यह माना गया था कि इन प्रश्नों को पूछने की अनुमति केवल तभी दी जा सकती है जब वे मामले से संबंधित हों और किसी प्रासंगिक तथ्य से संबंधित हों, या यह पता लगाने के लिए आवश्यक हों कि क्या कोई तथ्य मौजूद है या नही।

न्यायालय उन प्रश्नों को भी पूछने से मना कर सकता है जो अधिनियम की धारा 152 में वर्णित अपमान या नाराज़ करने के इरादे से किए जाते हैं। धारा में आगे कहा गया है कि न्यायालय उचित होने पर भी किसी प्रश्न को मना कर सकता है, यदि न्यायालय सोचता है कि यह अनावश्यक रूप से आक्रामक है।

सवाल गवाह के चरित्र पर हमला नहीं करना चाहिए

एक गवाह के परीक्षण के दौरान पूछे गए एक प्रश्न से मामले में एक तथ्य स्थापित होना चाहिए, यह केवल उसके चरित्र को हानि पहुंचाने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए। यह अधिनियम की धारा 153 में कहा गया है।

इसमें कहा गया है कि यदि कोई प्रश्न पूछा गया है और गवाह ने उसका उत्तर दिया है और यह केवल गवाह के चरित्र को हानि पहुँचाता है, तो उसका खंडन करने के लिए कोई भी साक्ष्य नहीं दिया जाएगा। जब तक वह गलत जवाब नहीं देता है, उस स्थिति में उस पर झूठे बयान देने का आरोप लगाया जाएगा।

इस धारा के दो अपवाद हैं, जो इस प्रकार हैं:

  • अगर किसी गवाह से पूछा गया है कि क्या उसे पहले दोषी ठहराया गया था या नहीं। गवाह के इनकार करने पर, उसकी पिछली दोषसिद्धि के सबूत के बारे में साक्ष्य दिए जा सकते हैं।
  • यदि किसी गवाह से यह सवाल पूछा गया है जो महाभियोग (इंपीच्ड) निष्पक्षता है, तो गवाह के इनकार करने पर उसका खंडन किया जा सकता है।

इसका मतलब यह है कि अगर किसी पक्ष के पास यह मानने के लिए पर्याप्त आधार हैं कि गवाह निष्पक्ष नहीं है, तो वे उसका खंडन कर सकते हैं और सबूत देने की कोशिश भी कर सकते हैं।

स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम यारप्पा रेड्डी के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस तरह के विरोधाभासी सबूत जोड़ने के लिए बुनियादी आवश्यकता यह है कि जिस गवाह की निष्पक्षता पर सवाल उठाया गया है, उसे सबूत के साथ पेश किया जाना चाहिए और इसके बारे में पूछा जाना चाहिए और उसे यह इनकार करना चाहिए था। 

इस तरह के प्रारंभिक उपायों को अपनाने के बिना, पहले से ही जांचे गए गवाह के बारे में कुछ नया बोलने के लिए एक नया गवाह लाना अर्थहीन और अनुचित होगा।

इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए, यहाँ एक काल्पनिक स्थिति है:

  • A एक निश्चित तिथि पर B को दिल्ली में देखने का दावा करता है,
  • A से पूछा जाता है कि क्या वह स्वयं उसी दिन कलकत्ता में था या नहीं,
  • A इनकार करता है,
  • A वास्तव में कलकत्ता में था यह दिखाने के लिए साक्ष्य जोड़े जाते हैं।

ऐसा साक्ष्य स्वीकार्य हो जाता है, इस तथ्य पर नही कि A के विरोधाभास (कांट्रेडिक्ट) साक्ष्य से उसको प्रभाव हुआ है बल्कि कथित तथ्य के विपरीत होने की वजह से कि उसने उसी तारीख को दिल्ली में B को देखा था। रेग बनाम सखाराम मुकुंदजी के मामले में भी ऐसा ही हुआ था।

एक पक्ष द्वारा अपने स्वयं के गवाह से प्रश्न

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 154 एक गवाह को बुलाने वाले पक्ष को अपने स्वयं के गवाह से कोई प्रश्न पूछने की अनुमति देती है, जैसे कि वे उससे जिरह कर रहे हैं।

कभी-कभी एक गवाह मुकर सकता है और ऐसी स्थिति होने पर गवाह को बुलाने वाले पक्ष के लिए यह आवश्यक होता है कि वह उससे जिरह करे।

सत पॉल बनाम दिल्ली प्रशासन के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने इस धारा की व्याख्या की है और एक शत्रुतापूर्ण (होस्टाइल) गवाह को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया है जो किसी पक्ष द्वारा उसे बुलाए जाने पर सच बताने के लिए तैयार नहीं होता है।

इस धारा के तहत जिरह के उद्देश्य के लिए, यह दिखाने के लिए पर्याप्त सबूत होना चाहिए कि गवाह सच नहीं कह रहा है और वह दिए गए मामले में मुकर गया है, जैसा की अतुल बोरा बनाम अकान बोरा के मामले में भी हुआ था।

स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम भेरा में, न्यायालय ने कहा कि एक शत्रुतापूर्ण गवाह की पिछली गवाही को सबूत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि वे अभी भी रिकॉर्ड में होते हैं। यदि कोई भी पक्ष गवाह की शत्रुता का विरोध नहीं करता है, तो सच्चाई का पता लगाना न्यायालय पर होता है।

यह धारा खुद ही स्पष्ट रूप से कहती है कि इस तरह की जिरह की अनुमति देना न्यायालय का विवेकाधिकार है या नहीं। मट्टम रवि बनाम मट्टम राजा येलैय्या के मामले में, न्यायालय ने कहा कि:

  • न्यायालयों का कानूनी दायित्व है कि वे अपनी विवेकाधीन शक्तियों का विवेकपूर्ण तरीके और उचित तरीके से प्रयोग करके और उपस्थित परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रयोग करें।
  • धारा 154 के संबंध में जिरह की अनुमति केवल मांगने पर नहीं दी जा सकती और न ही दी जानी चाहिए।

गवाहों पर महाभियोग चलाने का क्रेडिट

यदि गवाह अपनी बात से मुकर जाता है, तो उसके क्रेडिट पर विपरीत पक्ष द्वारा, या उसे बुलाने वाले पक्ष द्वारा (अदालत की अनुमति के अधीन) महाभियोग लगाया जा सकता है। धारा 155 ऐसा करने के तीन तरीके प्रदान करती है:

  1. ऐसे व्यक्ति को बुलाकर जो अपने व्यक्तिगत अनुभव और ज्ञान से गवाह के खिलाफ गवाही दे सकता है और यह स्थापित कर सकता है कि विचाराधीन गवाह क्रेडिट के योग्य नहीं है।
  2. सबूत प्रस्तुत करके कि गवाह ने रिश्वत ली है, या रिश्वत लेना स्वीकार किया है, या पक्ष के तरफ शत्रुतापूर्ण होने के लिए कोई अन्य प्रोत्साहन मौजूद है।
  3. अपने पूर्व बयानों में असंगति दिखाकर और धारा 153 द्वारा अनुमत सीमा तक उसका खंडन करके, जैसा कि जाहिरा हबीबुल्लाह शेख बनाम स्टेट ऑफ गुजरात में आयोजित किया गया था।

साक्ष्य की पुष्टि

कभी-कभी केवल सबसे प्रासंगिक तथ्य पूछना एक गवाह से सभी आवश्यक तथ्यों को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है। कुछ प्रश्न जो प्रासंगिक तथ्य से बहुत अधिक जुड़े हुए नहीं लगते हैं, तो उनसे पूछा जा सकता है कि क्या वे ऐसे तथ्य की पुष्टि करने में मदद कर सकते हैं।

धारा 156 पक्षों को, न्यायालय की अनुमति के साथ कुछ तत्वों को जोड़ने और संबंधित तथ्य को स्थापित करने के इरादे से घुमा फिरा कर प्रश्न करने की अनुमति देती है।

गवाह द्वारा दिए गए पिछले बयानों का इस्तेमाल अधिनियम की धारा 157 के तहत निर्धारित उसी तथ्य के बारे में बाद की गवाही की पुष्टि के लिए भी किया जा सकता है।

पूर्व बयानों को न्यायालय को देने की आवश्यकता नहीं है, यह मामले के तथ्यों के संबंध में कोई बातचीत हो सकती है।

रामेश्वर बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान के मामले में एक युवती के साथ बलात्कार हुआ था और उसने अपनी मां को इस बारे में बताया था। बाद में मामले को स्थापित करने के लिए लड़की के अपनी मां को दिए गए बयान की पुष्टि, उसके अन्य बयानों से की गई थी।

अधिनियम की धारा 158 में कहा गया है कि कोई भी बयान जो धारा 32 या धारा 33 के तहत प्रासंगिक है और साबित हो चुका है, उसकी पुष्टि या उसे नकारने के लिए या ऐसा बयान देने वाले व्यक्ति पर महाभियोग लगाने या उसे क्रेडिट देने के लिए सभी मामलों को इस हद तक साबित करना होगा कि मानो उस व्यक्ति को गवाह के रूप में बुलाया गया हो।

रिफ्रेशिंग मेमोरी

हम इंसान, कभी-कभी चीजों को भूल जाते हैं और अगर हमें गवाह के रूप में बुलाया गया है तो तथ्यों की संपूर्णता को याद रखना बेहद जरूरी हो जाता है। किसी की जान खतरे में पड़ सकती है और हमारे बयान न्यायालय को किसी को न्याय दिलाने में मदद कर सकते हैं। एक गवाह बहुत दबाव में हो सकता है और सभी तनावों के कारण उसे अपनी याददाश्त को ताज़ा करने की आवश्यकता हो सकती है।

धारा 159

इसीलिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 159 कहती है कि एक गवाह अपने परीक्षण के दौरान अपनी याददाश्त को ताज़ा कर सकता है।

वह ऐसा उस घटना के समय, जिसके बारे में उससे पूछताछ की गई है, या कुछ समय बाद जब तक अदालत उसे उसकी याददाश्त में ताजा समझती है, अपने द्वारा किए गए किसी भी लेखन का हवाला देकर ऐसा कर सकता है।

गवाह उपरोक्त समय सीमा के भीतर तैयार किए गए किसी और के नोट्स का भी उल्लेख कर सकता है, और यह तय कर सकता है कि यह सही है या नहीं।

धारा आगे कहती है कि गवाह अपनी याददाश्त को ताज़ा करने के लिए अदालत की अनुमति से किसी दस्तावेज़ की कॉपी या फोटोकॉपी का उपयोग भी कर सकता है।

इस धारा के लिए ‘लेखन’ शब्द में मुद्रित (प्रिंटेड) सामग्री शामिल है। एक गवाह जिसने भाषण सुना है, वह अपनी स्मृति को इसके एक समाचार पत्र के उस भाग का हवाला देकर संदर्भित कर सकता है यदि वह इसे जल्द ही पढ़ता है, और यदि, उस समय जब वह इसे पढ़ता है, तो वह जानता था कि यह सही है।

धारा 160

इस धारा में कहा गया है कि एक गवाह को उन तथ्यों की गवाही देनी चाहिए जो धारा 159 में वर्णित किसी भी ऐसे दस्तावेज में वर्णित की गई हैं। यह अप्रासंगिक है कि क्या वह उन सभी तथ्यों को याद रखता है जो हर छोटे विवरण के साथ दर्ज किए गए थे, जब तक कि वह निश्चित है कि तथ्यों को उसके द्वारा सही ढंग से दर्ज किया गया है।

इस धारा को बेहतर ढंग से समझने के लिए, हमें धारा में दिए गए उदाहरण पर गौर करना होगा, जो कहता है:

  • एक बुक-कीपर को अपने व्यवसाय के दौरान नियमित रूप से रखी गई पुस्तकों में दर्ज तथ्यों की गवाही देनी होगी।
  • हो सकता है कि उसे अपनी प्रविष्टि के बारे में हर विवरण याद न हो, लेकिन जब तक वह जानता है कि दर्ज किए गए तथ्य सही थे और पुस्तक को सही ढंग से रखा गया था, तब तक वह सही है।

धारा 159 और धारा 160 के बीच मूलभूत अंतर यह है कि:

  • पूर्व, गवाह की याददाश्त के बारे में बात करता है न कि दस्तावेज़ की।
  • जबकि, बाद की धारा में, दस्तावेज़ ही उसमें उल्लिखित तथ्यों का प्रमाण बन जाता है।

धारा 161

इस धारा में कहा गया है कि उपरोक्त अंतिम दो धाराओं में उल्लिखित किसी भी लेखन या दस्तावेज को प्रस्तुत किया जाना चाहिए और यदि आवश्यक हो तो विरोधी पक्ष को भी प्रदान किया जाना चाहिए।

यदि आवश्यक हो तो विरोधी पक्ष दस्तावेज़ पर गवाह से जिरह भी कर सकता है।

जब कोई दस्तावेज़ धारा 161 के तहत प्रस्तुत किया जाता है, तो यह विपरीत पक्ष द्वारा एक सामान्य निरीक्षण (इंस्पेक्ट) और जिरह के अधीन हो जाता है।

लेकिन गवाह द्वारा निर्दिष्ट हिस्से पर जिरह करने से प्रतिपरीक्षक (क्रॉस एग्जामिनर) के खिलाफ दस्तावेज साक्ष्य नहीं बनता है।

प्राण दत्त बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश के मामले में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि जांच अधिकारी द्वारा दिया गया बयान जैसे पुलिस रिपोर्ट, धारा 161 के तहत एक गवाह का खंडन करने के लिए प्रयोग योग्य नहीं होती है।

दस्तावेजों का उत्पादन

धारा 162

यह धारा कहती है कि एक गवाह को जब किसी दस्तावेज को पेश करने के लिए बुलाया जाता है तो अगर उसके पास ऐसा दस्तावेज़ है तो उसे उसे पेश करना चाहिए।

यदि इसके पेश करने या स्वीकार्यता के संबंध में कोई आपत्ति होती है, तो न्यायालय उस पर विचार करेगा। न्यायालय दस्तावेज़ का निरीक्षण भी कर सकता है जब तक कि वह राज्य के मामलों को संदर्भित न करे।

यदि दस्तावेज़ों का अनुवाद करने की आवश्यकता है, तो ऐसा अनुवादक द्वारा किया जा सकता है, जो इसके सामग्री को गोपनीय रख सकता है। यदि अनुवादक उक्त दस्तावेज़ की सामग्री को लीक करता है, तो उस पर कानून की अवज्ञा (डिसोबे) करने के लिए आईपीसी की धारा 166 के तहत आरोप लगाया जा सकता है।

धारा 163

इस धारा में उल्लेख किया गया है कि जब कोई पक्ष किसी अन्य पक्ष से किसी दस्तावेज़ को प्रस्तुत करने के लिए कहता है, और इसे उस पक्ष द्वारा प्रस्तुत और निरीक्षण किया गया है जिसने इसके लिए कहा है, तो उसे इसे सबूत के रूप में देना होगा यदि प्रस्तुत करने वाला पक्ष ऐसा होना ठीक समझे तो।

इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए, आइए हम कहते है कि:

  • हैरी और रॉन एक मामले के पक्ष हैं।
  • हैरी एक दस्तावेज चाहता है जो रॉन के कब्जे में है।
  • दस्तावेज़ प्रस्तुत करने के लिए हैरी को रॉन को नोटिस देना होगा।
  • नोटिस मिलने के बाद रॉन ने दस्तावेज हैरी को दे दिया।
  • हैरी ने रॉन द्वारा दिए गए दस्तावेज़ का निरीक्षण किया है।
  • अब, अगर रॉन ऐसा कहता है, तो हैरी को उस दस्तावेज़ को सबूत के तौर पर अदालत को देना होगा।

धारा 164

यह धारा उन परिणामों के बारे में बात करता है जब कोई पक्ष दस्तावेज़ प्रस्तुत करने का नोटिस प्राप्त होने पर भी ऐसा नहीं करता है।

यदि उपरोक्त स्थिति में:

  • रॉन हैरी को दस्तावेज़ नहीं देता है।
  • अगर कुछ समय बाद, रॉन उस दस्तावेज़ को सबूत के तौर पर इस्तेमाल करना चाहता है, तो वह हैरी की सहमति के बिना ऐसा नहीं कर पाएगा।

न्यायाधीश की शक्ति

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 न्यायाधीश को सवाल उठाने और सबूत पेश करने का आदेश देने की शक्ति के बारे में बात करती है।

प्रासंगिक तथ्यों का प्रमाण प्राप्त करने के लिए, न्यायाधीश कोई भी प्रश्न पूछ सकता है जो उसके लिए उपयुक्त हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके द्वारा उठाया गया प्रश्न प्रासंगिक है या अप्रासंगिक। परीक्षण के दौरान किसी भी समय प्रश्न पूछा जा सकता है, यह किसी भी रूप में हो सकता है और वह किसी से भी कोई भी प्रश्न पूछ सकता है, चाहे वह गवाह हो या पक्ष।

हालाँकि, न्यायाधीश गवाह को उनके द्वारा किए गए सवालों के जवाब देने के लिए मजबूर नहीं कर सकता है और उनके फैसले केवल उनके सवालों पर आधारित नहीं होने चाहिए। निर्णय प्रासंगिक तथ्यों और प्रस्तुत साक्ष्य पर आधारित होने चाहिए।

निष्कर्ष

गवाहों की सुरक्षा के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 बहुत आवश्यक है, और यह उन्हें अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) के डर के बिना स्वतंत्र रूप से बोलने की अनुमति देता है।

न्यायिक व्याख्याओं (ज्यूडिशियल इंटरप्रेटेशंस) के द्वारा समय की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस अधिनियम में महत्वपूर्ण सकारात्मक बदलाव लाए हैं और कुछ प्रावधानों को और अधिक व्यावहारिक (प्रैक्टिकल) भी बना दिया है।

 

 

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