हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7

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1844
Hindu Marriage Act
Section 7 Hindu Marriage Act 1955 - Ceremonies for a Hindu marriage

यह लेख चंदेर प्रभु जैन कॉलेज ऑफ हायर स्टडीज और स्कूल ऑफ लॉ, जीजीएसआईपीयू के कानून के छात्र Gautam Chadhary द्वारा लिखा गया है। यह लेख हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 द्वारा प्रदान किए गए विवाह के आवश्यक समारोहों से संबंधित कानून के बारे में बात करता है। इस लेख का अनुवाद Nisha द्वारा किया गया है।

परिचय 

विवाह को दो वयस्कों का मिलन कहा जाता है जो अपने परिवारों के साथ मिलकर एक मिलन बनाते हैं और परिणामस्वरूप, विवाह की स्थापना करते हैं। भारतीय समाज में, इस मिलन को ‘पवित्र मिलन’ कहा जाता है क्योंकि लोगों का मानना ​​है कि यह विशेष मिलन देवताओं की उपस्थिति में संपन्न होता है, जिन्हें ‘मंत्रों’ के पाठ के माध्यम से विवाह के लिए बुलाया जाता है । आगमन पर, वे विवाह को स्वस्थ और अनंत काल तक चलने का आशीर्वाद देते हैं। हालाँकि, ऐसे मिलन तब पूर्ण माने जाते हैं जब उन्हें कुछ पारंपरिक या प्रथागत समारोहों के माध्यम से संपन्न किया जाता है।

ये समारोह हिंदू धर्म के सबसे पुराने आध्यात्मिक ग्रंथों, यानी वेदों से अपने अस्तित्व के लिए शक्ति प्राप्त करते हैं। वे सबसे पुराने आध्यात्मिक ग्रंथ हैं जो हिंदू धर्म में विवाह के बारे में नियम बताते हैं, जो समकालीन (कन्टेम्पररी) हिंदू विवाह कानूनों के लिए प्रत्यक्ष स्रोत के रूप में भी कार्य करते हैं, जिसमें वे प्रदान करते हैं कि हिंदू कानून के तहत विवाह का अपना प्राथमिक आधार है। इन्हें वैध और पूर्ण हिंदू विवाह के लिए आवश्यक समारोह और अनुष्ठान (रिचुअल) के रूप में जाना जाता है। ये समारोह हिंदू धर्म के तहत भगवान की नजर में किए गए विवाह को संपन्न कराने के लिए आवश्यक और सर्वोपरि महत्व के थे। हिंदू कानून के तहत समारोह हिंदू विवाह के वैध अनुष्ठापन (सोलेमनाइज़ेशन) के लिए उपकरण के रूप में कार्य करते हैं, और उनकी उपस्थिति के बिना, विवाह का पवित्र अनुष्ठापन वैध नहीं माना जाता है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 हिंदू विवाह के समारोहों के बारे में बात करती है। वर्तमान लेख एचएमए के तहत दिए गए प्रावधानों और संशोधनों को स्पष्ट करता है। 

हिंदू विवाह की प्राचीन अवधारणा

प्राचीन भारत में पुराने हिंदू विवाह ऋषियों द्वारा लिखी गई पुरानी पांडुलिपि, यानी मनुस्मृति द्वारा निर्देशित थे। मनुस्मृति ने समाज में निभाई जाने वाली अनिवार्य प्रक्रियाओं, समारोहों और विवाह के रूपों को प्रदान किया। लोग इन पांडुलिपियों के तहत ही विवाह संपन्न करते थे। आध्यात्मिक पहलू के अलावा, प्राचीन काल के विवाह पूरी तरह से पितृसत्तात्मक थे क्योंकि उस समय केवल एक पुरुष को अपनी पसंद के अनुसार दुल्हन चुनने का अधिकार था, जबकि लड़की को केवल एक संपत्ति माना जाता था, जिस पर कोई भी पुरुष अपना अधिकार दावा कर सकता था, जिसके लिए विभिन्न खेल प्रतियोगिता  होते थे, जहां जो मैच जीतता था, उस पर विचार किया जाता था और महिला के लिए उपयुक्त पति चुना जाता था। प्राचीन समय में, महिलाओं को अपने विवाह में कोई अधिकार नहीं था। प्राचीन भारत में, विवाह भी सगोत्र (इंडोगेमस) विवाह था, अर्थात, केवल जाति या सामाजिक समूह के भीतर ही विवाह करना। जो उनकी परंपराओं को आगे बढ़ाने और समूह की स्थिति को बनाए रखने के लिए मनाया गया था। विवाह की इस विशेषता को व्यवस्थित विवाहों के साथ भी जोड़ा गया था, जिसमें विवाह के पक्षों के परिवार को दूसरों के लिए उपयुक्त दुल्हन या दूल्हे की व्यवस्था करने का अधिकार था। इस प्रथा को हिंदू धर्म में पालन करने के लिए सबसे बड़ा ‘संस्कार’ माना जाता था। 

प्राचीन भारत में विवाह के स्वरूप

प्राचीन भारत में विवाह के कई रूप थे, जो हिंदू धर्म के अनुसार मान्य माने जाते थे। वह थे:

ब्रह्मा विवाह

विवाह के इस रूप को दिव्य प्रकृति से ऊपर माना जाता था क्योंकि इसमें उच्चतम स्तर पर पवित्रता प्रदर्शित होती थी जहाँ सभी धार्मिक गतिविधियाँ होती थीं। विवाह के इस रूप में, दुल्हन का पिता अपनी बेटी को आभूषणों से सुसज्जित करके, अच्छे चरित्र वाले व्यक्ति को देता था जो वेदों को जानता था और अच्छी पारिवारिक पृष्ठभूमि वाला था।

दैव विवाह

विवाह के इस रूप में दुल्हन को विवाह के समय केवल एक पुजारी को ‘दक्षिणा’ के रूप में पेश किया जाता था। इस प्रकार के विवाह के लिए अच्छे चरित्र और वेदों के ज्ञान जैसी किसी विशिष्ट योग्यता की आवश्यकता नहीं थी।

अर्षा विवाह 

विवाह का यह रूप तब पूरा होता था जब दुल्हन का पिता अपनी बेटी देता था और बदले में दूल्हे से मवेशी या गाय प्राप्त करता था। यह प्रथा उस समय विवाह के पवित्र नियम को निभाने और पूरा करने के लिए प्रचलित थी। 

प्रजापत्य विवाह

प्रजापत्य विवाह का स्वरूप उपर्युक्त विवाहों से भिन्न था क्योंकि इस प्रकार के विवाह में कन्या का पिता दूल्हे की पूजा करता था और अपनी कन्या यह कहकर देता था कि “तुम दोनों मिलकर कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को पूरा करो”। यह एकमात्र विवाह समारोह था जिसे वैध प्रभाव के लिए विवाह के समय किया जाना था।  

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7

एचएमए अधिनियम, 1955 की धारा 7 कहती है कि विवाह के समय कुछ आध्यात्मिक समारोहों का प्रदर्शन अवश्य होना चाहिए। यह धारा कानून की नजर में विवाह के पक्षों को पति और पत्नी का दर्जा देने के लिए ऐसे प्रदर्शन को अनिवार्य बनाती है। धारा 7 की उप-धारा 1 में कहा गया है कि विवाह समारोह के समय, किसी एक पक्ष के कुछ पारंपरिक संस्कार और समारोहों का प्रदर्शन हो सकता है। उक्त धारा को पढ़ने पर, यह समझा जा सकता है कि विवाह के समय, पति या पत्नी औपचारिक (फॉर्मल) विवाह को वैध बनाने के लिए कुछ पारंपरिक संस्कार या समारोह कर सकते हैं। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि वर्तमान उपधारा उन समारोहों के प्रकार प्रदान नहीं करती है जो भारतीय समाज की विविध विविधतापूर्ण प्रकृति के कारण विवाह के समय किए जाने चाहिए। इसलिए, कानून ने विवाह के पक्षों के लिए उपधारा के पाठों को विवेकाधीन प्रकृति का बना दिया, “दोनों पक्षों में से कोई एक” शब्द का उपयोग यह स्पष्ट करता है कि विवाह के समय, जहां वे अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार कोई भी समारोह कर सकते हैं।वर्तमान धारा की उपधारा 2 की ओर बढ़ते हुए, उपधारा 2 मुख्य रूप से यह प्रक्रिया बताती है कि ‘सप्तपदी’ कैसे पूरी की जाती है। यह विवाह के पवित्र समारोहों में से एक है। उक्त उपधारा में कहा गया है कि जहां अनुष्ठान करने में सप्तपदी शामिल है, जिसका अर्थ है पवित्र अग्नि, यानी ‘अग्नि’ के सामने मंडप में  सात फेरे लेना ,सातवां फेरा पूरा होने पर विवाह संपन्न माना जाता है, जो बाध्यकारी प्रकृति का होता है और वैध विवाह कहा जाता है। वर्तमान उपधारा में उल्लिखित ‘बाध्यकारी’ शब्द का अर्थ है कि पत्नी और पति एक-दूसरे से बंधे हुए हैं और, कानूनन, वे अब एक-दूसरे के हैं, जहां कोई भी पक्ष भविष्य में यह आरोप नहीं लगा सकता है कि दूसरा पक्ष उसकी पत्नी या पति नहीं है और कोई भी पक्ष अपने विवेक और इच्छा के अनुसार इस वैध बंधन से बाहर नहीं जा सकता है। इस बंधन से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता तलाक होगा। 

राज्य ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 में संशोधन किया

वर्तमान धारा को मद्रास संशोधन अधिनियम, 1967 द्वारा संशोधित किया गया था, जो राज्य में आधी सदी से अधिक समय से मौजूद ‘सुयमरियाथाई’ और ‘सीरथिरुत्था’ विवाहों के संबंध में प्रावधान प्रदान करता है। इसके लिए धारा 7-A  जोड़ी गई, जो विवाह के समय किए जाने वाले अतिरिक्त समारोहों का प्रावधान करती है, जो इस प्रकार हैं:

  1. प्रत्येक पक्ष दूसरे के साथ उस भाषा में संवाद कर सकते है जिसे दूसरा पक्ष समझता है और यह बताता है कि पक्ष विपरीत पक्ष को अपना पति या पत्नी मानता है। 
  2. प्रत्येक पक्ष दूसरे पक्ष की उंगली में अंगूठी डाल सकता है या दूल्हा  या दुल्हन के गले में  माला या वरमाला डाल सकते है।
  3. विवाह को थाली, यानी, शादी के बाद विवाहित पत्नी द्वारा पहना जाने वाला सोने का एक पवित्र धागा बांधकर संपन्न किया जा सकता है।

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 में उपर्युक्त मद्रास राज्य संशोधन केवल दो विवाहों के लिए प्रावधान प्रदान करता है, अर्थात्, सुयमरियाथाई और सेरथिरुत्था। इसमें प्रावधान है कि पुजारी की अनुपस्थिति में भी विवाह संपन्न कराया जा सकता है। यदि पुजारी मौजूद नहीं है, तो विवाह दोस्तों, रिश्तेदारों, परिवार और अन्य लोगों के सामने वैध रूप से संपन्न किया जा सकता है, लेकिन उक्त स्थिति में, विवाह के पक्षों को एक-दूसरे के साथ संवाद करना होगा, उसे पति/पत्नी के रूप में स्वीकार करना होगा, दूसरे पक्ष की उंगली में अंगूठी पहनानी होगी, और थाली बांधनी होगी, यानी, सोने का पवित्र धागा, जिसे विवाहित पत्नी शादी के बाद पहनती है।

एस नागलिंगम बनाम शिवगामी, (2001) में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी माना कि धारा 7A उन विवाहों पर लागू होगी जहां विवाह के पक्ष, यानी दूल्हा और दुल्हन, माता-पिता, परिवार और दोस्तों की उपस्थिति में विवाह संपन्न करते हैं। इस विशेष प्रावधान के तहत वैध विवाह संपन्न कराने के लिए पुजारी की उपस्थिति आवश्यक नहीं है। इसके अलावा, पक्षों  को ऐसे विवाह में प्रवेश करने की भी पूरी स्वतंत्रता है जहां विवाह के समय उनके माता-पिता, परिवार और दोस्त मौजूद हों, लेकिन ऐसे विवाह में, दूल्हा और दुल्हन को एक दूसरे को बताना या घोषित करना चाहिए कि वह दूसरे को अपना वैध पति और पत्नी मानते हैं। इस आवश्यकता को थाली बांधने या दूसरे की किसी उंगली पर अंगूठी पहनाने के साथ भी जोड़ा जाना चाहिए। इन सबके बाद, कानून की नजर में एक वैध विवाह संपन्न होगा। 

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के तहत विभिन्न समारोह स्वीकार किए जाते हैं

प्रारंभ में, श्रीमती  बिब्बे बनाम श्रीमती. राम काली और अन्य (1982), में माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि विवाह के समय किए जाने वाले आवश्यक समारोह विशेष रूप से तय नहीं होते हैं। इसके अलावा, यदि समारोह किसी निश्चित विवाह में किए जाते हैं, तो इसे कानून द्वारा निर्धारित एकमात्र समारोह या समारोहों के समूह के रूप में नहीं लिया जाएगा। वे विवाह के पक्षों के रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं। 

राम चंद्र भगत बनाम झारखंड राज्य (2010) के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह देखा गया था कि अंतरजातीय विवाह या तो लड़के की जाति या लड़की की जाति के रीति-रिवाजों और समारोहों का पालन करते हुए किया जा सकता है। 

उपर्युक्त निर्णयों पर प्रकाश डालने का उद्देश्य यह समझना है कि हिंदू कानून में, विवाह का आयोजन पूरी तरह से विवाह के पक्षों के रीति-रिवाजों और संस्कारों पर निर्भर है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7(1) में यह भी प्रावधान है कि विवाह किसी भी पक्ष के रीति-रिवाजों के अनुसार किया जा सकता है। इस प्रकार, यह माना जा सकता है कि धारा 7 के तहत कौन से समारोह स्वीकार किए जाते हैं, इसके संबंध में कोई सीधा-सीधा  सूत्र (फॉर्मूला) नहीं हो सकता है क्योंकि भारत कई विविधताओं का स्थान है और प्रत्येक समुदाय के पालन करने के लिए अपने स्वयं के रीति-रिवाज और प्रथा हैं। 

हालाँकि एक बुनियादी और स्पष्ट समझ के लिए, निम्नलिखित समारोह हैं जो विवाह के वैध अनुष्ठान के लिए स्वीकार किए जाते हैं:

कन्यादान

वर्तमान शब्द दो अन्य शब्दों अर्थात ‘कन्या’ और ‘दान’ के मेल से बना है। पहले का अर्थ है ‘लड़की’ और दूसरे का अर्थ है दान या देना। विवाह के समय, दुल्हन का पिता अपनी बेटी को दूल्हे को सौंपकर उसकी सुरक्षा, संरक्षण और पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी देकर, निभाता है। वैध विवाह के लिए वर्तमान समारोह आवश्यक या अनिवार्य हो सकता है। 

सागई

हिंदू धर्म के अंतर्गत विवाह के उत्सव की शुरुआत ‘सगाई’ के दिन से होती है। सगाई वह समारोह है जिसमें दूल्हा और दुल्हन एक-दूसरे को अंगूठी पहनाते हैं और ऐसा करके वे अपने पवित्र मिलन की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाते हैं। भारत में दूल्हे, दुल्हन और उनके परिवारों के आनंदमय मिलन के लिए अंगूठी समारोह आयोजित किया जाता है। 

सप्तपदी

सप्तपदी, जिसका सामान्य अर्थ विवाह के समय मंडप के नीचे पवित्र अग्नि के चारों ओर सात कदम उठाना है, विभिन्न हिंदू समुदायों के बीच किया जाने वाला एक मौलिक और सामान्य समारोह है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7(2) सप्तपदी के लिए सामान्य प्रावधान देती है, जिसमें कहा गया है कि जहां संस्कार और समारोहों में एक समारोह के रूप में ‘सप्तपदी’ शामिल है, तो पवित्र अग्नि के चारों ओर सातवां फेरा पूरा होने पर विवाह पूर्ण और वैध माना जाएगा। 

होम

एक हिंदू विवाह में ‘होम’ या आध्यात्मिक शब्द ‘विवाह होम’ का समारोह भी शामिल होता है, जिसमें कन्यादान के बाद, हवन कुंड में एक पवित्र अग्नि जलाई जाती है और पुजारी द्वारा मंत्रों का जाप करके अग्नि के देवता यानी ‘अग्निदेवता’ की पूजा करना शुरू होता है और इसे पवित्र मानने के लिए विवाह में ‘विष्णु’ को आमंत्रित किया जाता है। इस समारोह में, दूल्हा और दुल्हन बच्चों के कल्याण के लिए ‘संतानी’, अच्छी संपत्ति और वित्तीय स्थिति के लिए ‘सम्पत्ति’ और सुखी और स्वस्थ जीवन के लिए ‘दीर्घरोग्य’ मंत्र दोहराते हैं ।

पाणि ग्रहण

पाणि ग्रहण में, दूल्हा दुल्हन का दाहिना हाथ पकड़ता है और उसका मुख पश्चिम की ओर होता है, जबकि दुल्हन का मुख पूर्व दिशा की ओर होता है। ऐसी स्थिति लेने के बाद, दूल्हा पुजारी द्वारा दिए गए मंत्रों का उच्चारण करना शुरू कर देता है। मंत्रों में खुशी के वादे, शादी के पक्षों के बीच लंबे समय तक चलने वाले रिश्ते और घरेलू जिम्मेदारी के वादे शामिल हैं।

   

ऐतिहासिक मामले 

  1. ए. असुवथमन बनाम भारत संघ (2015) के मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने वर्ष 2015 में एचएमए की धारा 7-A की वैधता को बरकरार रखा। वर्तमान मामले में, याचिकाकर्ता ने राज्य के संशोधन की वैधता को चुनौती देते हुए इसे धारा 7 के दायरे से बाहर और पूरी तरह से हिंदू धर्म के सिद्धांतों के खिलाफ बताया। उन्होंने आगे यह भी कहा कि यह संशोधन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन साबित हुआ है।न्यायालय  ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि संशोधन सिर्फ दो शादियों यानी सुयामरियाथाई और सेरथिरुत्था के संबंध में है।, और इस प्रकार यह प्रकृति में भेदभावपूर्ण नहीं है। न्यायालय ने आगे कहा कि अधिनियम की संवैधानिकता के पक्ष में एक धारणा मौजूद है जब तक कि याचिकाकर्ता कोई ऐसा आधार साबित नहीं करता जो संविधान के किसी भी सिद्धांत के खिलाफ साबित हो।  
  2. भाऊराव शंकर लोखंडे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1965) के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि विवाह तब तक अस्तित्व में नहीं माना जाएगा जब तक कि इसे आवश्यक पारंपरिक समारोहों के साथ नहीं मनाया जाता है। कानून की नजर में एक विवाह तभी संपन्न माना जाएगा जब यह दोनों पक्षों में से किसी एक के समारोहों का पालन करते हुए आयोजित किया गया हो। इसके अलावा, न्यायालय ने यह भी माना कि केवल अपनी इच्छा के अनुसार कुछ समारोहों का पालन करने के बाद, पक्षों को विवाहित नहीं कहा जा सकता क्योंकि ऐसे समारोह को कानून और रीति-रिवाजों द्वारा मान्यता नहीं दी जाएगी। ध्यान देने वाली बात यह है कि व्यवहार में समारोह पक्षों  के रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार आयोजित किए जाने चाहिए। 
  3. सुमित सुभाष अग्रवाल बनाम कमलेश ललिता प्रसाद गुप्ता (2018) के मामले में माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कहा कि अगरबत्तियों के झुंड के चारों ओर फेरे लेना सप्तपदी माना जाता है और इसलिए यह एक वैध विवाह है। 
  4. श्री नितिन पुत्र ओमप्रकाश बनाम श्रीमती. रेखा पत्नी नितिन अग्रवाल (2017), में माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी महिला के माथे पर सिन्दूर लगाने और मंगलसूत्र बांधने के साथ शारीरिक संबंध बनाना वैध विवाह नहीं है।
  5. सुरजीत कौर बनाम गरजा सिंह (1993) के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि बिना किसी पवित्र समारोह के लंबे समय तक एक साथ रहना वैध विवाह नहीं होगा।
  6. एस नागलिंगम बनाम शिवगामी (2001) में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि सप्तपदी का समारोह आवश्यक है जहां पक्ष इसे आवश्यक मानते हैं। और जहां सप्तपदी का प्रदर्शन नहीं किया गया है, लेकिन किसी भी पक्ष के रीति-रिवाज के अनुसार अन्य समारोह किए गए हैं, तो एक वैध विवाह संपन्न हुआ है। 

निष्कर्ष

कानून की नजर में एक वैध विवाह को संपन्न करने के लिए, व्यक्ति को सभी नहीं बल्कि कुछ समारोह अवश्य करने चाहिए। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 किसी भी पक्ष को विवाह को वैध प्रभाव देने के लिए आवश्यक समारोह करने की स्वतंत्रता देता है। इसके अलावा, कानून इस बारे में कोई स्पष्ट सूत्र  नहीं देता है कि ये आवश्यक समारोह क्या हैं, इसका कारण भारतीय समाज की विविध प्रकृति है। आवश्यक यह है कि विवाह को संपन्न करने के लिए समारोह, चाहे दुल्हन पक्ष का हो या दूल्हे का, आवश्यक और अत्यंत महत्वपूर्ण होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय  ने सुरजीत कौर बनाम गरजा सिंह (1993) के मामले में भी यही कहा था और कहा गया था कि बिना किसी पवित्र समारोह के लंबे समय तक एक साथ रहना वैध विवाह नहीं होगा।  

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू) 

क्या समारोहों का गैर-निष्पादन विवाह को अमान्य कर देगा?

आवश्यक समारोहों को न करने पर विवाह पूरी तरह से अमान्य हो जाएगा, क्योंकि हिंदू धर्म के अनुसार, वैध विवाह को संपन्न करने के लिए सप्तपदी जैसे समारोहों का प्रदर्शन आवश्यक है। 

क्या धारा 7 प्रकृति में अनिवार्य है?

एचएमए की धारा 7 वैध विवाह के संदर्भ में अनिवार्य बल रखती है। समारोह करना है या नहीं, इस बारे में विवेक की कोई मौजूदगी नहीं है।

मद्रास सरकार द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 में धारा 7-A क्यों जोड़ी गई?

धारा 7-A राज्य सरकार द्वारा एक संशोधन के माध्यम से विशेष रूप से विवाहों यानी, सुयमरियाथाई और सेरथिरुत्था के लिए प्रावधान प्रदान करने के लिए जोड़ी गई थी। उक्त प्रावधान केवल इन विवाहों को कानूनी ढांचा देने के लिए पेश किए गए थे, जो राज्य में लंबे समय से चलन में थे।

 संदर्भ 

 

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