सीआरपीसी की धारा 457 

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Difference between Arbitration and Mediation

यह लेख Satyaki Deb द्वारा लिखा गया है जो राजीव गांधी स्कूल ऑफ इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी लॉ, आईआईटी खड़गपुर से एलएलएम कर रहे है। यह लेख सीआरपीसी की धारा 457 जो संपत्ति की जब्ती पर पुलिस द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं को निर्धारित करती है, के विभिन्न आयामों (डाइमेंशन) से संबंधित है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय

भारतीय दंड संहिता, 1860, नारकोटिक ड्रग्स और साइकोट्रॉपिक सबस्टेंस अधिनियम, 1985 (एनडीपीएस); खाद्य अपमिश्रण निवारण (प्रिवेंशन ऑफ फूड अल्टरेशन) अधिनियम, 1954, आदि जैसे विभिन्न कानूनों के विभिन्न प्रावधानों के तहत पूरे देश में पुलिस और विभिन्न अन्य जांच अधिकारी नियमित रूप से संपत्तियों को जब्त करते हैं। ये जब्त वस्तुएं जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और ज्यादातर मामलों में साक्ष्य के उद्देश्य से विचारण चरणों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। चूंकि भारत की जांच और विचारण प्रक्रिया आम तौर पर बहुत धीमी गति से चलती है और ऐसे हजारों मामलों के साथ, जब्त की गई संपत्तियां आम तौर पर निपटाने की तुलना में बहुत तेजी से बढ़ती हैं। इसके अलावा, लंबे समय तक धूल जमा होने के कारण, इनमें से अधिकांश जब्त की गई संपत्तियां अपना आर्थिक मूल्य खो देती हैं और अक्सर बेईमान पुलिस अधिकारियों या तीसरे पक्षों द्वारा इनका दुरुपयोग किया जाता है या भागों के लिए बेच दिया जाता है।

आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) का अध्याय XXXIV (धारा 451459) जब्त की गई संपत्ति के निपटान के प्रावधानों से संबंधित है और जब्त संपत्तियों के राष्ट्रीय अपव्यय (वेस्टेज) में सैकड़ों करोड़ रुपये के नुकसान को रोकने के लिए भारतीय कानूनों का सबसे प्रासंगिक हिस्सा हैं। यह लेख सीआरपीसी की  धारा 457 के विभिन्न आयामों से संबंधित है, जो इस अध्याय के तहत एक प्रमुख प्रावधान है। इस संबंध में, इस अध्याय के तहत विभिन्न अन्य संबंधित प्रावधानों को पूर्ववर्ती (प्रीसीडेंट) मामलो के परिप्रेक्ष्य से भी प्रासंगिक माना गया है।

सीआरपीसी की धारा 457 के तहत संपत्ति का अर्थ

सीआरपीसी की धारा 457 संपत्ति की जब्ती पर पुलिस द्वारा पालन की जाने वाली प्रक्रियाओं की परिकल्पना करती है। इसलिए, यह समझना प्रासंगिक हो जाता है कि यहाँ “संपत्ति” शब्द का क्या अर्थ है। यह धारा और इसका मूल अध्याय XXXIV चार प्रकार की संपत्तियों के निपटान से संबंधित है। वे इस प्रकार हैं:

  1. अपराध करने में प्रयोग की गई संपत्ति।
  2. संपत्तियां जिन पर अपराध किया गया है।
  3. संपत्तियां जो न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई हैं।
  4. संपत्ति जो पुलिस या अदालत की हिरासत में है।

उनके स्रोतों (सोर्सेस) के आधार पर, इन संपत्तियों के स्रोत हो सकते हैं जैसे किसी संदिग्ध/अभियुक्त को गिरफ्तार करते समय पाई गई संपत्ति, किसी अपराध के संबंध में संदिग्ध परिस्थितियों में पाई गई संपत्ति या कथित रूप से चोरी या लूटी गई संपत्ति।

सीआरपीसी की धारा 457 

जैसा कि पहले संक्षेप में कहा गया है, सीआरपीसी की धारा 457 संपत्ति की जब्ती पर पुलिस द्वारा पालन की जाने वाली प्रक्रिया से संबंधित है। इस प्रावधान ने 1898 की पुरानी आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 523 को प्रतिस्थापित (रिप्लेस) कर दिया। किसी भी संपत्ति को जब्त करने के बाद पुलिस को सीआरपीसी की धारा 457 के तहत परिकल्पित प्रक्रिया का पालन करने की आवश्यकता है। इस प्रावधान के अनुसार-

  • इस धारा की उप-धारा (1) बताती है कि पुलिस द्वारा सीआरपीसी के तहत किसी भी संपत्ति को जब्त करने के बाद और अगर ऐसी संपत्ति को आपराधिक अदालत में पूछताछ या विचारण चरण में पेश नहीं किया जाता है, तब मजिस्ट्रेट विवेकाधीन शक्तियों के साथ आदेश जारी करने के लिए सशक्त होता है जो ऐसी संपत्ति का निपटान या ऐसी संपत्ति का वितरण (डिलिवरी) उस व्यक्ति को करेगा जो उसके कब्जे का हकदार होगा। यदि जब्त की गई संपत्ति के कब्जे के हकदार व्यक्ति की पहचान पता नहीं है, तो ऐसे मामलों में, मजिस्ट्रेट ऐसी संपत्ति की उचित अभिरक्षा (कस्टडी) और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उचित समझे जाने वाले आदेश पारित कर सकता है।
  • इस धारा की उप-धारा (2) में कहा गया है कि यदि जब्त संपत्ति के कब्जे के हकदार व्यक्ति की पहचान पता है, तो मजिस्ट्रेट अपने विवेक से हकदार व्यक्ति को ऐसी संपत्ति के वितरण के लिए कोई शर्त लगा सकता है। यदि मजिस्ट्रेट उचित समझे तो इस प्रावधान के तहत हकदार व्यक्ति को बिना शर्त वितरण के भी अनुमति दे सकता है। यदि ऐसी जब्त संपत्ति के कब्जे के हकदार व्यक्ति की पहचान पता नहीं है, तो मजिस्ट्रेट जब्त की गई संपत्ति को हिरासत में लेने का आदेश दे सकता है और ऐसी संपत्ति बनाने वाली वस्तुओं को निर्दिष्ट करते हुए एक उद्घोषणा (प्रोक्लेमेशन) जारी कर सकता है। ऐसी जब्त संपत्ति का दावा करने वाला कोई भी व्यक्ति मजिस्ट्रेट के सामने उपस्थित हो सकता है और उद्घोषणा की तारीख से छह महीने की अवधि के भीतर अपना दावा सिद्ध करने के बाद ऐसी जब्त संपत्ति पर दावा कर सकता है।

सीआरपीसी की धारा 457 से संबंधित मामले 

सीआरपीसी की धारा 457 से संबंधित कुछ प्रासंगिक मामले निम्नलिखित हैं:

एम. मुनिस्वामी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1992)

इस मामले में, जब्त की गई संपत्ति के हकदार व्यक्ति को ऐसी संपत्ति के निपटान या वितरण के रूप में आदेश पारित करने की मजिस्ट्रेट की शक्ति का दायरा बताया गया था। इस मामले पर निम्नानुसार विस्तार से चर्चा की गई है:

मामले के संक्षिप्त तथ्य

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत श्री राघवय्या के खिलाफ दो जब्ती सूचियों के तहत कई दस्तावेज, लॉकर की चाबियां और कुछ नकदी जब्त की थी। अभियुक्त चाहते थे कि सीबीआई उनके जब्त दस्तावेज, सामान और लॉकर की चाबी वापस कर दे। हैदराबाद में सीबीआई की विशेष अदालत से शुरू होकर मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।

मुद्दा

माननीय न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या जब्त किए गए दस्तावेज और लॉकर की चाबी वापस की जानी चाहिए या नहीं।

निर्णय 

माननीय न्यायालय ने न केवल धारा 457 बल्कि धारा 451, 452 और 456 की बारीकियों को भी समझाया। यह सभी एक ही अध्याय XXXIV के अंतर्गत आती हैं और इनकी अलग अलग व्याख्या नहीं की जा सकती है। माननीय न्यायालय ने इस मामले में बालाजी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1976) और राज्य बनाम बेल्किस सुल्ताना (1985) को पलट दिया क्योंकि इन मामलों ने गलत तरीके से निम्नलिखित मान लिया था-

  • कि अदालतों को अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिसडिक्शन) तभी मिलता है जब संपत्ति की जब्ती की सूचना पुलिस द्वारा मजिस्ट्रेट को दी जाती है और अन्यथा नहीं।
  • न्यायालय जब्त संपत्ति के संबंध में तभी आदेश पारित कर सकता है जब पुलिस जब्त संपत्ति को जांच या विचारण के दौरान न्यायालय में इसे पेश करे।
  • कि धारा 457 के तहत केवल अदालत जो अपराध की जांच या विचारण कर रही वही आदेश पारित कर सकती है।
  • यह कि धारा 451 और 457 दोनों जांच या विचारण चरण के दौरान/लंबित होने तक जब्त संपत्तियों से निपटने के लिए मजिस्ट्रेट की शक्ति से संबंधित हैं।

माननीय न्यायालय ने न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णय्यर की तर्ज पर राम प्रकाश शर्मा बनाम हरियाणा राज्य (1978) में तर्क दिया और कहा कि:

  • जिन मामलों में जब्त संपत्ति को पुलिस द्वारा अदालत में पेश नहीं किया जाता है, ऐसी संपत्ति के निपटान के लिए धारा 457 लागू होगी।
  • जब जब्त की गई संपत्ति को अन्यथा न्यायालय के समक्ष पेश किया गया है, तो शासी प्रावधान धारा 451 होगा और ऐसी जब्त संपत्ति का निपटान उसके अनुसार किया जाएगा।
  • जांच या विचारण चरण के बाद, यदि जब्त संपत्ति के निपटान का मुद्दा उठता है, तो ऐसी संपत्ति का निपटान करने के लिए शासी धारा 452 होगी।

इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि धारा 457 किसी भी जब्त संपत्ति के निपटान के लिए एक जांच या विचारण (उदाहरण के लिए: जांच चरण) के शुरू होने से पहले या उससे पहले के चरण में लागू होती है, धारा 451 लंबित विचारण में जब्त संपत्ति की हिरासत और निपटान पर लागू होती है, और धारा 452 और 456 विचारण के बाद जब्त संपत्ति के निपटान से संबंधित है। दूसरे शब्दों में, धारा 457 को अध्याय XXXIV के अन्य प्रावधानों के साथ पढ़ने की आवश्यकता है, और धारा 457 में वाक्यांश “ऐसी संपत्ति को एक जांच या विचारण के दौरान एक आपराधिक न्यायालय के समक्ष पेश नहीं किया जाता है” कार्यवाही के किसी भी चरण को इंगित नहीं करता है लेकिन केवल संपत्ति की जब्ती को योग्य बनाता है।

फैसले का विश्लेषण करने के बाद, यह कहा जा सकता है कि इस तरह की प्रासंगिक व्याख्या के प्रमुख कारणों में से एक यह था कि पुलिस के पास संपत्ति को जब्त करने और पेश करने या उसके बारे में रिपोर्ट करने का अधिकार नहीं हो सकता था। पुलिस जब्त की गई संपत्ति का किसी भी तरह से निपटान नहीं कर सकती है। माननीय न्यायालय ने ठीक ही कहा है कि कोई भी मजिस्ट्रेट धारा 457 के तहत जब्त की गई संपत्ति का निपटान कर सकता है और यह जरूरी नहीं है कि वह अभियुक्त के बारे में पूछताछ करे या मुकदमा चलाए। यहां किसी मजिस्ट्रेट का मतलब यह नहीं है कि अभियुक्त मजिस्ट्रेट चुन सकता है। केवल वो मजिस्ट्रेट जो अभियुक्त से पूछताछ या मुकदमा चला सकता है या कोई भी मजिस्ट्रेट जिसके अधिकार क्षेत्र में संपत्ति को जब्त किया गया है, को धारा 457 के तहत जब्त संपत्ति का निपटान करने का अधिकार है। ऐसे मजिस्ट्रेट को जब्त संपत्ति की रिपोर्ट को प्रस्तुत करने के लिए पुलिस की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन वह धारा 457 के तहत आदेश पारित कर सकता है, भले ही इच्छुक पक्ष ऐसे मजिस्ट्रेट से संपर्क करें।

इस संबंध में ध्यान देने योग्य एक महत्वपूर्ण बिंदु, जैसा कि इस फैसले में कहा गया है, कि मजिस्ट्रेट को जब्त की गई संपत्ति को इच्छुक पक्षों को वापस देने से पहले सभी प्रासंगिक पहलुओं पर विचार करने के लिए अपने न्यायिक विवेक को लागू करने की आवश्यकता है, जिन्होंने ऐसी जब्त संपत्ति पर अपने दावों को पर्याप्त रूप से साबित कर दिया है। उसे शर्तों को लागू करके या अन्यथा यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि संपत्ति का ऐसा निपटान न्याय के मार्ग में बाधा नहीं होना चाहिए और यदि आवश्यक हो तो विचारण के समय जब्त की गई संपत्ति की वापसी सुनिश्चित की जाती है। इस प्रकार, परिस्थितियों को देखते हुए, याचिकाकर्ताओं को उनके जब्त दस्तावेजों और लॉकर की चाबी की वापसी का अधिकार दिया गया था।

सुंदरभाई अंबालाल देसाई बनाम गुजरात राज्य (2002)

इस मामले में, दो न्यायाधीशों की बेंच ने धारा 451 और 457 की व्याख्या और कार्यान्वयन (इंप्लीमेंटेशन) के तरीके के बारे में सवालों के जवाब दिए। यह एक और महत्वपूर्ण मामला है जो हमें दिखाता है कि कैसे धारा 451 और 457 की बारीकियां आपस में जुड़ी हुई हैं और संबंधित मजिस्ट्रेट को अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग कितनी तेजी से और विवेकपूर्ण तरीके से करने की आवश्यकता है। सीधे शब्दों में, इस मामले में, कुछ पुलिस अधिकारियों पर मुख्य रूप से थाने के “मलखाना” से जब्त वस्तुओं (“मुदम्मल” लेख) की हेराफेरी का आरोप लगाया गया था। जब मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा, तो जब्त संपत्ति से संबंधित निपटान और प्रक्रियाओं के संबंध में निम्नलिखित प्रासंगिक बिंदु रखे गए:

  • जब्त की गई वस्तुओं को जब्ती के एक सप्ताह के भीतर मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत या रिपोर्ट करने की आवश्यकता है।
  • इस तरह के साक्ष्य को खोने, बदलने या नष्ट होने से बचाने के लिए जब्त संपत्ति का निपटान करते समय मजिस्ट्रेट द्वारा देय बॉन्ड, प्रतिभूति (सिक्योरिटी) और गारंटी ली जानी चाहिए।
  • जब्त संपत्ति के निपटान से पहले विस्तृत पंचनामा बनाया जाना चाहिए।
  • जब्त की गई संपत्ति का निपटान करने से पहले, जब्त की गई संपत्ति की तस्वीरें ली जानी चाहिए और ऐसी तस्वीरों को शिकायतकर्ताओं और अभियुक्त व्यक्तियों के साथ-साथ ऐसे जब्त किए गए सामानों की हिरासत प्राप्त करने वाले व्यक्ति द्वारा सत्यापित (वेरिफाई) या प्रतिहस्ताक्षरित (काउंटरसाइनड) किया जाना चाहिए।
  • जब्त वाहनों के संबंध में, चूंकि ऐसे वाहनों को थानों में लंबे समय तक रखने का कोई फायदा नहीं है, मजिस्ट्रेट को आवश्यक बॉन्ड, प्रतिभूति और गारंटी लेकर तुरंत उचित आदेश पारित करना चाहिए जो किसी भी बिंदु पर आवश्यक होने पर जब्त वाहन की वापसी सुनिश्चित करेगा। ऐसे जब्त वाहनों की वापसी के लिए आवेदनों की सुनवाई लंबित रहने तक ऐसा किया जा सकता है।
  • यदि कोई ऐसा मामला है जहां जब्त वाहन का मालिक या अभियुक्त या बीमा कंपनी या किसी अन्य तीसरे व्यक्ति द्वारा दावा नहीं किया जाता है, तो मजिस्ट्रेट ऐसे जब्त वाहन को नीलाम कर सकता है। अदालत में ऐसे जब्त वाहनों के पेश होने की तारीख से छह महीने के भीतर आदेश पारित किया जाना चाहिए।
  • जब्त शराब के संबंध में, यह कहा गया था कि चूंकि पुलिस थानों में बड़ी मात्रा में शराब रखने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है, इसलिए उन्हें थानों में बड़ी अवधि के लिए नहीं रखा किया जाना चाहिए। विश्लेषण के लिए आवश्यक नमूने लिए जायें तथा आवश्यक पंचनामा बनाने के पश्चात ऐसी जब्त शराब का मजिस्ट्रेट के आदेशानुसार शीघ्र निपटान किया जाये।
  • जब्त सामग्री को पुलिस थानों में 15 से 30 दिनों से अधिक नहीं रखा जाना चाहिए और इसे मजिस्ट्रेट की तत्काल कार्रवाई से सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

धारा 451 और 457 के तहत जब्त संपत्ति के ऐसे त्वरित और विवेकपूर्ण निपटान के पीछे तर्क या उद्देश्य निम्नलिखित उद्देश्यों को सुनिश्चित करेगा:

  • ऐसी जब्त की गई वस्तुओं के मालिक को उनके दुरूपयोग या लंबे समय तक अनुपयोग के कारण नुकसान नहीं होगा।
  • सरकारी खजाने का पैसा बचेगा क्योंकि जब्त की गई संपत्ति के त्वरित निपटान के लिए अदालत या पुलिस को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की आवश्यकता नहीं होगी।
  • यदि जब्त की गई वस्तुओं का पंचनामा ठीक से तैयार किया गया है, तो ऐसे पंचनामा को जब्त वस्तुओं के बजाय विचारण के दौरान साक्ष्य में पेश किया जा सकता है।
  • अदालतें सामानों के साथ छेड़छाड़ को रोकने के लिए अपने अधिकार क्षेत्र का तुरंत उपयोग करने और साक्ष्य को तेजी से रिकॉर्ड करने में सक्षम होंगी।

सामान्य बीमा परिषद (जनरल इंश्योरेंस काउंसिल) बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2010)

इस मामले में, प्रक्रियाओं और जब्त संपत्ति के निपटान के संबंध में और निर्देश दिए गए थे। इस लेख के लिए प्रासंगिक बात को इस प्रकार चित्रित किया गया है:

  • सामान्यतया, जब्त वाहनों की रिहाई आवेदन की तारीख से 30 दिनों के भीतर की जानी चाहिए।
  • संबंधित अदालतों से इसकी सूचना मिलने पर बीमाकर्ताओं को बरामद वाहनों की रिहाई के लिए अलग से आवेदन करने की अनुमति दी जा सकती है।
  • यदि मजिस्ट्रेट का मानना है कि बीमाकर्ता जब्त किए गए वाहनों का असली मालिक नहीं है तो बीमाकर्ता जब्त वाहनों की बिक्री या नीलामी से प्राप्त आय को हटाने के लिए एक उपक्रम (अंडरटेकिंग) या गारंटी प्रस्तुत करेगा। बीमाकर्ता की कॉर्पोरेट प्रकृति को देखते हुए बीमाकर्ताओं से व्यक्तिगत बॉन्ड पर जोर नहीं दिया जा सकता है।
  • सभी राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों और पुलिस महानिदेशकों (डायरेक्टर जनरल) को संबंधित वैधानिक प्रावधानों का व्यापक कार्यान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए और जिला स्तर पर संबंधित महानिरीक्षकों (इंस्पेक्टर जनरल), आयुक्तों (कमिश्नर) और पुलिस अधीक्षकों (सुप्रिटेंडेंट) को जब्त किए गए वाहनों का त्वरित निपटान सुनिश्चित करना चाहिए।
  • यदि कोई याचिकाकर्ता या पीड़ित पक्ष गैर-अनुपालन की सूचना देता है, तो ऐसे दोषी अधिकारियों से सख्ती से निपटा जाएगा।

निष्कर्ष

सीआरपीसी की धारा 457 लंबे समय तक बनी रही, जबकि यह कार्यपालिका द्वारा सबसे कम लागू किए गए प्रावधानों में से एक थी और इसने कई पीड़ित पक्षों की शिकायतों को जन्म दिया था। इस तरह के नुकसान का संचयी मूल्य (क्यूमुलेटिव वैल्यू) सैकड़ों करोड़ रुपये में चला गया। मुख्य रूप से इन व्यापक और गहरी चल रही शिकायतों के कारण, माननीय सर्वोच्च न्यायालय, जैसा कि उपरोक्त पूर्ववर्ती मामलो में दर्शाया गया है, ने जब्त की गई संपत्तियों की प्रक्रियाओं और निपटान पर आवश्यक निर्देश दिए। ये निर्देश की परम आवश्यकता थी, लेकिन उनके कार्यान्वयन इन निर्णयों के प्रभावों को कुछ हद तक बेअसर कर देते हैं, और इसे जल्द से जल्द बदलने की जरूरत है।

सीआरपीसी की धारा 457 पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या होता है जब एक व्यक्ति जिसके पास संपत्ति (जब्त) का कब्जा है ऐसी संपत्ति पर अपना कानूनी दावा साबित करने में विफल रहता है?

ऐसे मामले में, मजिस्ट्रेट आदेश दे सकता है कि ऐसी संपत्ति राज्य सरकार के अधिकार में होगी और उसके द्वारा बेची या नीलाम की जाएगी। संबंधित व्यक्ति को ऐसे किसी भी आदेश के खिलाफ अदालत में अपील करने का अधिकार होगा जिसमें आमतौर पर मजिस्ट्रेट द्वारा दोषसिद्धि के खिलाफ अपील की जाती है।

क्या जब्त की गई संपत्ति को पेश करने और जारी करने की कोई समय सीमा है?

जब भी कोई संपत्ति पुलिस या अन्य जांच अधिकारियों द्वारा जब्त की जाती है, तो यह जब्ती अधिकारी या संबंधित एसएचओ का कर्तव्य है कि वह जब्ती के एक सप्ताह के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करे, और अदालत द्वारा संबंधित पक्षों को उचित नोटिस देने के बाद, अदालत में ऐसी जब्त संपत्ति को पेश करने के एक महीने की अवधि के भीतर, आमतौर पर इसके निपटान के लिए एक उचित आदेश पारित करने की आवश्यकता होती है।

संदर्भ

 

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