सीआरपीसी की धारा 446 

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Criminal Procedure Code

यह लेख Mahesh P Sudhakaran द्वारा लिखा गया है, जो वर्तमान में केएलई सोसाइटी के लॉ कॉलेज, बैंगलोर में पढ़ रहे हैं और इस लेख में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 446 के सभी पहलुओं को शामिल किया गया है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

परिचय

जमानत से संबंधित कानून प्रक्रियात्मक कानून का एक महत्वपूर्ण घटक है। दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का अध्याय XXXIII जमानत से संबंधित प्रावधानों से के बारे में बताता है। जैसा कि कई ऐतिहासिक फैसलों में कहा गया है, जमानत एक नियम है और जेल अपवाद है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार, कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी भी व्यक्ति को उनके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है और यह भी स्थापित अभ्यास के मामले में लगातार दोहराया जाता है कि किसी व्यक्ति को दोषी साबित होने तक निर्दोष माना जाता है। इन कारकों को ध्यान में रखते हुए जमानत अनुच्छेद 21 के सार की रक्षा के लिए एक अनिवार्य तत्व बन जाती है और जमानत से संबंधित नियम संविधान की भावना को बरकरार रखते हुए न्याय प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

ज़मानत को संहिता में परिभाषित नहीं किया गया है, हालाँकि, आम बोलचाल में, जमानत को विचारण (ट्रायल) के लिए अदालत में अभियुक्त, जिस पर कुछ अपराधों का आरोप लगाया गया है, की भविष्य की उपस्थिति सुनिश्चित करके और ऐसे व्यक्ति को अदालत के अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) में रहने के लिए मजबूर करके उसकी रिहाई प्राप्त करने की प्रक्रिया के रूप में समझा जाता है। जमानत के महत्वपूर्ण तत्वों में से एक जमानत बॉन्ड की अवधारणा और इसे नियंत्रित करने वाले प्रावधान हैं। एक जमानत बॉन्ड एक गिरफ्तार संदिग्ध द्वारा विचारण के लिए उपस्थिति या सुरक्षा या उपस्थिति की गारंटी के रूप में एक निश्चित राशि के भुगतान का आश्वासन देकर की गई व्यवस्था है। जिस राशि के लिए जमानत निर्धारित की जाती है, वह अदालत द्वारा तय की जाती है, जो कथित अपराध की गंभीरता और संहिता के प्रावधानों के अनुसार आनुपातिक (प्रोपोर्शनेट) होती है। इसलिए अभियुक्त को अनिवार्य रूप से जमानत बॉन्ड का पालन करना होता है और अदालत में पेश होना होता है।

जब आपराधिक कार्यवाही की बात आती है तो जमानत बॉन्ड का निष्पादन (एग्जिक्यूशन), उसी की जब्ती और उसके परिणाम आम हैं। जमानत और बॉन्ड शब्द अक्सर पर्यायवाची के रूप में उपयोग किए जाते हैं। ये शब्द परस्पर संबंधित हैं लेकिन समान नहीं हैं। बॉन्ड निश्चित रूप से बॉन्डमैन की जमानत की शर्तों के संबंध में प्रतिज्ञा है, अगर अभियुक्त अदालत में पेश होने में विफल रहता है, जबकि जमानत का तात्पर्य अभियुक्त की अस्थायी रिहाई से है, जो विचारण की प्रतीक्षा कर रहा है, अदालत में उस व्यक्ति की भविष्य की उपस्थिति एक निश्चित राशि जमा करके सुनिश्चित की जाती है। यहां सवाल यह है कि अगर अभियुक्त जमानत बॉन्ड का पालन करने में विफल रहता है तो क्या होगा? इसे बॉन्ड की जब्ती कहा जाता है और यह संहिता की धारा 446 द्वारा शासित होता है। यह लेख उस प्रक्रिया से संबंधित सभी पहलुओं को शामिल करता है जब बॉन्ड को जब्त कर लिया जाता है।

बॉन्ड क्या है

जमानत बॉन्ड अभियुक्त या उसके दोस्तों या परिवार (जिसे जमानतदार (श्योरिटी) के रूप में जाना जाता है) द्वारा हस्ताक्षरित एक लिखित दस्तावेज है जो यह सुनिश्चित करता है कि अभियुक्त अदालत द्वारा निर्धारित समय और तारीख पर अदालत के समक्ष उपस्थित होगा। जमानत राशि अदालत द्वारा निर्धारित की जाती है, जो अपराध की गंभीरता पर आधारित होती है, और यदि अभियुक्त निर्धारित विचारण तिथि पर अदालत के समक्ष पेश नहीं होता है, तो राशि जब्त कर ली जाती है। ज़मानतदार वह व्यक्ति होता है जो अदालत द्वारा निर्दिष्ट तिथि पर अदालत में अभियुक्त या अपराधी की उपस्थिति की क्षतिपूर्ति (इंडेमनीफाइ) करता है या सुनिश्चित करता है। ज़मानत बॉन्ड के उद्देश्य के लिए ज़मानतदार अपराधी की ओर से भुगतान करता है जब अपराधी को अपने व्यक्तिगत बॉन्ड को प्रस्तुत करने में असमर्थ माना जाता है। संहिता की धारा 440 के अनुसार, न्यायालय द्वारा निर्धारित बॉन्ड की राशि अपराध के अनुपात में होनी चाहिए और अत्यधिक नहीं होनी चाहिए। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यह धारा सत्र न्यायालयों और उच्च न्यायालयों को मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी को ज़मानत बॉन्ड की राशि को कम करने का निर्देश देने का अधिकार देती है, यदि उसे अत्यधिक समझा जाता है। धारा 442 के अनुसार बॉन्ड का निष्पादन पूर्ण होते ही अभियुक्त व्यक्ति को तत्काल रिहा कर दिया जायेगा और यदि वह जेल में है तो न्यायालय, जेल के प्रभारी अधिकारी को रिहाई का आदेश जारी करेगा।

बॉन्ड की आवश्यकता कब होती है

जमानत की प्रक्रिया को पूरा करने के उद्देश्य से जमानत बॉन्ड की आवश्यकता होती है। ऐसी स्थिति में जहां अदालत जमानत की राशि का निर्धारण करती है और अभियुक्त को उतनी राशि का भुगतान करने में असमर्थ माना जाता है, तो ऐसी स्थिति में अभियुक्त जमानत बॉन्ड एजेंट या बॉन्डमैन की मदद ले सकता है। यहां अगला चरण निर्धारित तिथि पर अदालत के समक्ष अभियुक्त की उपस्थिति या गैर-उपस्थिति पर आधारित है। यहां दो संभावित परिणाम हो सकते हैं:

प्रतिवादी की उपस्थिति

अदालती मामले के निष्कर्ष या परिणाम के अनुसार, जमानत बॉन्ड का विघटन (डिजोल्यूशन) किया जाता है, और संपार्श्विक (कोलेटरल) को प्रतिवादी या उस व्यक्ति को वापस कर दिया जाता है जिसने इसे पोस्ट किया था।

अनुपस्थिति

ऐसे परिदृश्य में जहां अभियुक्त अदालत द्वारा निर्धारित तिथि पर अदालत में पेश होने में विफल रहता है, तो जमानत बॉन्ड को जब्त कर लिया जाता है और अदालत बॉन्ड राशि के भुगतान की मांग करती है। उपस्थित न होने पर अभियुक्त को कारण बताओ की अनुमति दी जाती है। यदि पर्याप्त कारण नहीं दिखाया गया है और जुर्माने का भुगतान नहीं किया गया है, तो अदालत उसे वसूलने के लिए आगे बढ़ती है जैसे कि इस तरह का जुर्माना उसके द्वारा संहिता के तहत लगाया गया जुर्माना था।

बॉन्ड की जब्ती और इसके लिए आगे की शर्त

दंड की वसूली के लिए संहिता की धारा 446 के अनुसार कार्रवाई करने से पहले एक विशेष अदालत को बॉन्ड की जब्ती के संबंध में संतुष्ट होना पड़ता है। यह सर्वोपरि है कि अदालत की उचित संतुष्टि में ज़ब्ती “साबित” होनी चाहिए। इसलिए, संहिता की धारा 446 के तहत कार्यवाही शुरू करने के संबंध में बॉन्ड की जब्ती से संबंधित संतोषजनक सबूत आवश्यक है। इस तरह के सबूत को संहिता की धारा 446 के तहत कार्यवाही शुरू करनी चाहिए और इसके बिना, संहिता की धारा 446 के तहत कार्यवाही निर्धारित नहीं की जा सकती है। निम्नलिखित चरणों की पहचान धारा 446 के आह्वान तक की जा सकती है।

  • एक अभियुक्त को संहिता के प्रावधानों के तहत जमानत पर रिहा कर दिया गया।
  • एक निर्दिष्ट तिथि पर अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए अदालत द्वारा अनिवार्य राशि पर जमानत बॉन्ड निर्धारित किया गया था।
  • निर्धारित तिथि पर अभियुक्त न्यायालय में उपस्थित होने में असफल रहता है।
  • यह अदालत की संतुष्टि के लिए साबित हो जाता है कि उपस्थिति या संपत्ति के उत्पादन या किसी अन्य बॉन्ड के लिए बॉन्ड जब्त कर लिया गया है।
  • बॉन्ड की जब्ती पर कार्यवाही शुरू करना है।

बॉन्ड जब्त किए जाने पर कार्यवाही के बारे में संहिता की धारा 446 क्या कहती है

संहिता की धारा 446 के अनुसार, जब यह स्थापित हो जाता है कि बॉन्ड जब्त कर लिया गया है, तो अदालत किसी भी व्यक्ति को जुर्माने का भुगतान करने के लिए बाध्य कर सकती है या यह बोल सकती है कि कारण बताओ की यह भुगतान क्यों नहीं किया जाना चाहिए। यदि ज़ब्ती का पर्याप्त कारण साबित या दिखाया नहीं गया है और उसमें जुर्माना भी नहीं दिया गया है, तो अदालत उसे वैसे ही वसूल कर सकती है जैसे कि वह धारा 421 के अनुसार इस संहिता के तहत अदालत द्वारा लगाया गया जुर्माना था। अदालत के पास यह विवेकाधिकार है कि वह जुर्माने के एक निर्दिष्ट हिस्से को हटा दे। जब बॉन्ड के अनुसार निर्धारित तिथि पर अभियुक्त उपस्थित नहीं होता है, तो अभियुक्त को अपनी अनुपस्थिति को उचित ठहराने के लिए एक अच्छा कारण दिखाना होगा। बॉन्ड की जब्ती के संबंध में अदालत सबूत के आधार भी रिकॉर्ड करेगी। निम्नलिखित पहलुओं को धारा 446 के आधार पर प्राप्त किया जा सकता है:

  1. संहिता की धारा 446 बॉन्ड की जब्ती के संबंध में प्रक्रिया निर्धारित करती है। यह मूल रूप से बॉन्ड के दो वर्गों को संदर्भित करती है:
  • उपस्थिति के लिए या संपत्ति की प्रस्तुति के लिए इस संहिता के अनुसार निष्पादित कोई बॉन्ड; और
  • इस संहिता के दायरे में कोई अन्य बॉन्ड।

दोनों ज़ब्ती के संबंध में एक ही आधार पर खड़े होंगे।

  1. उप-धारा (2) का परंतुक (प्रोविजो) कहता है कि जब जुर्माने का भुगतान नहीं किया जाता है और संहिता की धारा 421 में निर्धारित तरीके से वसूल नहीं किया जा सकता है, तो वह व्यक्ति जो ज़मानतदार के रूप में बाध्य है, जुर्माने की वसूली के लिए अदालत के आदेश द्वारा छह महीने तक की अवधि के लिए सिविल जेल में कारावास के लिए उत्तरदायी माना जाएगा। 
  2. उप-धारा (3) के अनुसार, न्यायालय जुर्माने के किसी भी भाग को हटा सकता है और केवल उस विशेष भाग के संबंध में भुगतान लागू कर सकता है।
  3. उप-धारा (4) के अनुसार, यदि बॉन्ड की जब्ती से पहले ज़मानतदार की मृत्यु हो जाती है, यानी बॉन्ड की शर्तों का उस बिंदु तक उल्लंघन नहीं किया गया है, तो उस स्थिति में, ज़मानतदार की संपत्ति बॉन्ड के संबंध में सभी दायित्वों से मुक्त हो सकती है। लेकिन ऐसे परिदृश्य में जहां बॉन्ड की जब्ती के बाद ज़मानतदार की मृत्यु हो जाती है, ज़मानतदार की संपत्ति को जुर्माने के लिए उत्तरदायी माना जा सकता है।
  4. उप-धारा (5) के अनुसार, निर्णय की एक प्रमाणित प्रति, जो यह दर्शाती है कि सुरक्षा प्रदान करने वाले व्यक्ति को दोषी माना गया है और उसके बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन के लिए दोषी ठहराया गया है, तो वह ऐसे व्यक्ति के खिलाफ सबूत के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है। इसलिए, ऐसी स्थिति में जहां किसी व्यक्ति को संहिता की धारा 106, 117, 360 या 448 के दायरे में बॉन्ड के उल्लंघन के लिए दोषी ठहराया जाता है, निर्णय की एक प्रमाणित प्रति ज़मानतदार के खिलाफ कार्यवाही के दौरान सबूत के रूप में इस्तेमाल की जाएगी और इस तरह से कार्य करेगी कि यह ऐसे व्यक्ति की दायित्व का अनुमान लगा ले जब तक कि अन्यथा साबित न हो जाए।

बॉन्ड रद्द करना

धारा 446A बॉन्ड को रद्द करने से संबंधित है। इस धारा के प्रावधान बॉन्ड की जब्ती से संबंधित प्रावधानों को प्रभावित नहीं करते हैं। जॉनी विल्सन बनाम राजस्थान राज्य के मामले में राजस्थान के माननीय उच्च न्यायालय ने कहा कि “यह सच है कि जमानत-बॉन्ड को जब्त करना जमानत रद्द करने के बराबर नहीं है। विधायिका ने “रद्दीकरण” शब्द का प्रयोग नहीं किया है। जब अदालत के समक्ष किसी मामले में किसी व्यक्ति की उपस्थिति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक बॉन्ड को स्पष्ट रूप से निर्धारित शर्त के उल्लंघन के लिए जब्त कर लिया जाता है, तो ऐसे परिदृश्य में, अभियुक्त और ज़मानतदारों द्वारा निष्पादित बॉन्ड रद्द कर दिया जाएगा; और तत्पश्चात् उस मामले में अभियुक्त को उसके निजी बॉन्ड पर रिहा नहीं किया जाता है।

इस धारा के संबंध में परंतुक में कहा गया है कि एक अभियुक्त को एक या एक से अधिक जमानतदारों द्वारा ऐसी धनराशि और बॉन्ड के लिए एक नए व्यक्तिगत बॉन्ड के निष्पादन के बाद रिहा किया जा सकता है, जैसा कि पुलिस अधिकारी या अदालत उचित समझे।

न्यायिक घोषणाएं

ये धारा 446 से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण निर्णय हैं। इनकी चर्चा इस प्रकार है:

मोहम्मद कुंजू बनाम कर्नाटक राज्य,

इस मामले में, अदालत ने धारा 446 के दायरे में ज़मानतदार के दायित्व के संबंध में विभिन्न कारकों पर विचार किया और निम्नलिखित टिप्पणियां कीं:

  • प्रत्येक ज़मानतदार बॉन्ड की जब्ती में जुर्माने के लिए उत्तरदायी है। आधे हिस्से का आवंटन कानूनी नहीं है;
  • एक बॉन्ड की जब्ती प्रत्येक ज़मानतदार के खिलाफ उस राशि के लिए जुर्माना लगाएगी जो उसने अपने द्वारा निष्पादित बॉन्ड में ली है। दोनों ज़मानतदार से राशि को आधे से साझा करने की अपेक्षा नहीं की जाती है, क्योंकि प्रत्येक ज़मानतदार को भुगतान करने के लिए उत्तरदायी बनाया जाता है।

महमूद हसन बनाम राज्य

इस मामले में, यह माना गया था कि प्राकृतिक न्याय के नियम की एक स्पष्ट आवश्यकता यह है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ प्रतिकूल आदेश पारित किया गया है उसे सुनवाई का अवसर दिया जाए। इसलिए, ज़मानत बॉन्ड को ज़ब्त करने से पहले, अदालत को ज़मानतदार को कारण बताने के लिए नोटिस देना चाहिए कि क्यों ज़मानत बॉन्ड को ज़ब्त नहीं किया जाना चाहिए।

दयाल चंद बनाम राजस्थान राज्य

इस मामले में, यह देखा गया कि जब अदालत धारा 446(3) के तहत विवेकाधीन शक्ति का प्रयोग करती है, ऐसे मामलों में, यह विचार करना प्रासंगिक नहीं है कि क्या ज़मानतदार ने गैर-जिम्मेदाराना तरीके से काम किया और क्या ज़मानतदार की ओर से कोई मिलीभगत या लापरवाही नहीं थी।

सी.एम आइसॉ बनाम कर्नाटक राज्य

इस मामले में, यह निर्धारित किया गया था कि एक ज़मानतदार, जिसका बॉन्ड ज़ब्त कर लिया गया है, को कैद करने से पहले, कलेक्टर को धारा 421 के तहत नोटिस दिया जाना चाहिए और यदि कलेक्टर राशि वसूल करने में असमर्थता जताता है, तो उसे जेल भेज दिया जाना चाहिए।

जगतार सिंह बनाम पंजाब राज्य

इस मामले मे पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने इस सवाल का जवाब दिया कि क्या एक ज़मानतदार जिसका बॉन्ड जब्त कर लिया गया है और जो जुर्माने का भुगतान करने में असमर्थ है, उसे नकारात्मक में कारावास की सजा दी जा सकती है।

निष्कर्ष

जमानत विभिन्न संवैधानिक सिद्धांतों को बनाए रखने और किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए दी जाती है। जमानत के संदर्भ में बॉन्ड जमानत का एक महत्वपूर्ण पहलू है क्योंकि यह एक सुरक्षा के रूप में कार्य करता है जो कानून की अदालत के समक्ष अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करता है। धारा 446 इस संबंध में सर्वोपरि है कि बॉन्ड जब्त किए जाने पर कानून क्या करता है। यह अभियुक्त को कारण दिखाने का अवसर प्रदान करता है, क्योंकि बॉन्ड को तब तक जब्त नहीं माना जाता जब तक कि अदालत संतोषजनक तरीके से साबित न हो जाए। इस प्रावधान का यह पहलू अभियुक्त के सुने जाने के अधिकार का सम्मान करता है, यानी ऑडी अल्टेरम पार्टम (दोनों पक्षों की सुनवाई) के सिद्धांत का पालन करता है, और यह सुनिश्चित करता है कि अभियुक्त को पेश करने का अवसर प्रदान किए बिना ज़मानत बॉन्ड को मनमाने ढंग से जब्त नहीं किया जाता है।

संदर्भ

  • R.V. Kelkar’s Criminal Procedure.
  • Ratanlal & Dhirajlal’s The Code of Criminal Procedure

 

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