सत्यम इन्फोवे लिमिटेड बनाम सिफीनेट सॉल्यूशंस (प्राइवेट) लिमिटेड, (2004) मामले का विश्लेषण

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यह लेख Ashutosh Singh ने लिखा है। यह लेख सत्यम इन्फोवे लिमिटेड बनाम सिफीनेट सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के मामले का विश्लेषण करता है जिसमे अपीलार्थी ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष डोमेन नाम के उल्लंघन के संबंध में कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय को पलटने की मांग करने के लिए अपील की थी। इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla द्वारा किया गया है।

परिचय

इस युग में जहां ज्यादातर सभी व्यवसाय इंटरनेट के माध्यम से चलते हैं, डोमेन नाम इंटरनेट संसाधनों की एक साधारण पहचान से कहीं अधिक हो गए हैं। सभी बड़ी कंपनियों और उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं को उनकी वेबसाइटों पर जाकर आसानी से जाना जा सकता है। जिस देश में ट्रेडमार्क पंजीकृत है, वह उस देश के कानूनों द्वारा संरक्षित है और इसलिए एक ट्रेडमार्क का दुनिया भर में एक से अधिक देशों में कई पंजीकरण हो सकते हैं। इंटरनेट बिना किसी भौगोलिक (ज्योग्राफिकल) सीमा के पहुंच की अनुमति देता है और इसलिए उपभोक्ताओं की भौगोलिक स्थिति के बावजूद एक डोमेन नाम सुलभ है।

भौतिक दुनिया के समानांतर तकनीकी प्रगति के साथ एक साइबर दुनिया बनाई गई है और इस साइबर दुनिया में केंद्र इंटरनेट है। इंटरनेट ने हमारे जीवन के हर पहलू को छुआ है या प्रभावित किया है। ऐसी स्थिति में जब आप सटीक वेबसाइट नहीं जानते हैं, तो आप बस पता पट्टी (बार) में निर्माता/व्यवसाय/व्यापारी का नाम लिख सकते हैं और यह उम्मीद करते हुए खोज कर सकते हैं कि यह आपको निर्माता/व्यवसाय/व्यापारी की आधिकारिक वेबसाइट पर ले जाएगा।

वर्तमान मामला एक ‘डोमेन’ नाम विवाद और पासिंग ऑफ के बारे में है। इस मामले का फैसला 6 मई 2004 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया गया था। अपीलार्थी सत्यम इन्फोवे लिमिटेड है और प्रत्यर्थी सिफीनेट  सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड है। इस मामले में 2 न्यायाधीशों की पीठ में न्यायामूर्ति रूमा पाल और न्यायामूर्ति वेंकटरामा रेड्डी हैं।

मामले के तथ्य

  • इस मामले में, अपीलार्थी, सत्यम इन्फोवे लिमिटेड ने आरोप लगाया कि प्रत्यर्थी, सिफीनेट  सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड ने जानबूझकर पंजीकृत किया और एक डोमेन नाम चलाया जो भ्रमित करने वाला था और उनके स्वामित्व वाले डोमेन के समान था। 
  • अपीलार्थी ने 1995 में विभिन्न डोमेन नाम पंजीकृत किए थे जैसे किः 
  • www.sifynet, 
  • www.sifymall.com,
  • www.sifyrealestate.com
  • 1999 में, उन्होंने इंटरनेट कॉर्पोरेशन फॉर असाइन्ड नेम्स एंड नंबर्स (आईसीएएनएन) और विश्व बौद्धिक (इंटेलेक्चुअल) संपदा संगठन (डब्लूआईपीओ)  के साथ डोमेन नामों को पंजीकृत किया।
  • इसने प्रस्तुत किया कि ‘सिफी’ शब्द का कॉर्पोरेट नाम इसके कॉर्पोरेट नाम ‘सत्यम इन्फोवे’ के तत्वों का उपयोग करके गढ़ा गया था और इसने बाजार में काफी लोकप्रियता हासिल की थी।
  • प्रत्यार्थी ने 2001 में डोमेन नामों के तहत इंटरनेट मार्केटिंग का अपना व्यवसाय शुरू कियाः
  • www.siffynet.net
  • www.siffynet.com
  • प्रत्यार्थी ने siffynet.com और siffynet.net जैसे अपने डोमेन नामों के हिस्से के रूप में ‘सिफी’ शब्द का उपयोग करके इंटरनेट मार्केटिंग किया, और कहा कि ये 2001 में आई.सी.ए.एन.एन के साथ पंजीकृत थे।
  • सिफिनेट सॉल्यूशंस पर भी सत्यम इन्फोवे द्वारा अपने डोमेन नाम के हिस्से के रूप में भ्रामक रूप से समान शब्द का उपयोग करके सत्यम इन्फोवे से संबंधित सेवाओं को बंद करने के कथित प्रयास का आरोप लगाया गया है।
  • सत्यम इन्फोवे ने दावा किया कि इसी तरह का डोमेन नाम उपभोक्ताओं के मन में भ्रम पैदा करेगा, जो गलती करेंगे कि सिफीनेट  सॉल्यूशंस की सेवाएं सत्यम इन्फोवे की हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

सिटी सिविल न्यायालय, बैंगलोर

  • सिटी सिविल न्यायालय, बैंगलोर में, सत्यम इन्फोवे ने एक मुकदमा दायर किया था और सिफीनेट  सॉल्यूशंस के खिलाफ एक अस्थायी निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) के लिए आवेदन किया था।
  • न्यायालय द्वारा सत्यम इन्फोवे के पक्ष में अस्थायी निषेधाज्ञा का निर्णय लिया गया था।
  • न्यायालय ने कहा कि सत्यम इन्फोवे ‘सिफी’ शब्द का पूर्व उपयोगकर्ता था, और उसी के तहत बेची जाने वाली इंटरनेट और कंप्यूटर सेवाओं की बिक्री के संबंध में अपार प्रतिष्ठा अर्जित की थी।
  • न्यायालय के आगे के निष्कर्षों से पता चला कि सिफीनेट  सॉल्यूशंस का डोमेन नाम भ्रमित रूप से सत्यम इन्फोवे के समान था, और इसलिए उनकी सेवाओं के स्रोत के संबंध में जनता के मन में भ्रम पैदा किया।

कर्नाटक उच्च न्यायालय 

  • कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सिफिनेट सॉल्यूशंस द्वारा की गई अपील पर सुनवाई की।
  • उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय का समर्थन करने के लिए सुविधा के संतुलन पर भरोसा किया।
  • कर्नाटक उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि सिफीनेट  सॉल्यूशंस ने पहले से ही अपने व्यवसाय के लिए लगभग 50,000 सदस्यों के विशाल ग्राहक आधार को प्राप्त करने में काफी निवेश किया है, जिसे यदि न्यायालय सत्यम इन्फोवे के पक्ष में पाता है तो प्रत्यर्थी को भारी कठिनाई और अपरिवर्तनीय क्षति होगी।
  • न्यायालय ने कहा कि व्यवसाय में शामिल दो पक्ष अलग-अलग थे, इसलिए ग्राहकों को समान डोमेन नामों से गुमराह करना संभव नहीं है।
  • इसके अलावा, चूंकि सत्यम इन्फोवे के पास व्यापार में उपयोग करने के लिए वह नाम था, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सोचा कि इससे उन्हें अस्थायी निषेधाज्ञा को अस्वीकार करने में महत्वपूर्ण कठिनाई नहीं हो सकती है।

मुद्दे 

  • क्या एक डोमेन नाम एक ऐसा शब्द हो सकता है जो इंटरनेट के उपयोगकर्ताओं को उपलब्ध कराए गए व्यापार/सेवा को अलग करने और पहचानने के लिए योग्य हो?
  • क्या वही कानूनी नियम इंटरनेट डोमेन नामों पर लागू होते हैं जैसे कि ट्रेडमार्क जैसी बौद्धिक संपदा पर लागू होने वाले कानूनी मानदंड या कानून हैं?
  • क्या ट्रेडमार्क कानून के तहत पासिंग ऑफ करने का सिद्धांत डोमेन नामों पर लागू होता है?
  • क्या सुविधा का संतुलन अपीलार्थी के पास है जैसा कि इस मामले में लागू किया गया है?

Lawshikho

अपीलार्थी की दलीलें

  • सत्यम इन्फोवे के तर्कों ने प्रस्तुत किया कि ‘सिफी’ शब्द इसके कॉर्पोरेट नाम ‘सत्यम इन्फोवे’ के घटकों का एक समामेलन (अमलगमेशन) था और इसे बाजार में व्यापक लोकप्रियता मिली थी।
  • सत्यम इन्फोवे ने दावा किया कि सिफीनेट  सॉल्यूशंस अपने डोमेन नाम के हिस्से के रूप में एक भ्रामक रूप से समान शब्द का संचालन करके सत्यम इन्फोवे से संबंधित अपनी सेवाओं को बंद करने की कोशिश कर रहा था। इसने यह भी दावा किया कि इससे उसके उपभोक्ताओं के मन में भ्रम पैदा होगा, जो प्रत्यर्थी, सिफिनेट सॉल्यूशंस की सेवाओं को सत्यम इन्फोवे से संबंधित समझते हैं, जिससे इसकी प्रतिष्ठा और इसके व्यवसाय को भी बहुत नुकसान होता है।
  • अपीलार्थी ने दावा किया कि यह देश के सबसे बड़े इंटरनेट सेवा प्रदाताओं में से एक होने के अलावा एक प्रमुख सूचना प्रौद्योगिकी सेवा कंपनी थी।
  • अपीलार्थी ने यह भी दावा किया कि उसके 5 लाख से अधिक ग्राहक, लगभग 480 साइबर कैफे और उनकी उपस्थिति के 54 स्थान अकेले भारत में फैले हुए हैं। 
  • इसने यह भी कहा कि उनकी कंपनी पहली भारतीय इंटरनेट कंपनी थी जिसे 1999 में नैस्डैक (एनएएसडीएक्यू) के साथ सूचीबद्ध किया गया था, जहां यह व्यापार नाम ‘सिफी’ के तहत कारोबार करती थी। इस तथ्य को देश के प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्रों में व्यापक व्याप्ति (कवरेज) दिया गया था। 
  • अपीलार्थी ने उन कठोर शर्तों को दर्ज किया जिनसे उसे गुजरना पड़ा और उसने नैस्डैक अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एक व्यापार नाम शामिल करने के लिए एक बड़ा शुल्क जमा किया और यह भी प्रस्तुत किया कि 1999 से इसके शेयरों का सक्रिय रूप से दैनिक आधार पर नैस्डैक पर कारोबार किया जाता है। 
  • अपीलार्थी द्वारा यह भी दावा किया जाता है कि उसने अपने सॉफ्टवेयर व्यवसाय और सेवाओं के लिए एक व्यापारिक नाम/डोमेन नाम के रूप में ‘सिफी’ शब्द का व्यापक रूप से उपयोग किया है और उसने इंटरनेट पर ‘सिफी’ नाम के तहत ब्रोशर और विज्ञापन विपणन (मार्केटिंग) और सेवाओं की पेशकश की है। 
  • अपने दावों को प्रमाणित करने के लिए अपीलार्थी ने ट्रेडमार्क ‘सिफी’ के तहत अपने व्यवसाय के बाजार संवर्धन (प्रमोशन) के लिए विज्ञापन पर अपनी बिक्री और व्यय का आंकड़ा प्रस्तुत किया है। 
  • यह भी दावा किया जाता है कि उसने ट्रेड और एंड मर्चेंडाइज मार्क्स अधिनियम 1958 (जिसे ट्रेड मार्क्स अधिनियम, 1999 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है) के तहत ‘सिफी’ उपसर्ग के साथ 40 से अधिक ट्रेडमार्क के पंजीकरण के लिए आवेदन किया है। 
  • अपीलार्थी ने यह दिखाने के लिए दस्तावेज प्रस्तुत किए कि उसने व्यापार नाम ‘सिफी’ के तहत अपनी उपलब्धियों की मान्यता में कई पुरस्कार और इनाम जीते हैं।

प्रत्यर्थी द्वारा तर्क

  • सिफिनेट सॉल्यूशंस ने दावा किया कि उसने अपने डोमेन नाम के हिस्से के रूप में ‘सिफ्फी’ शब्द का उपयोग करना शुरू कर दिया था, जिसके तहत यह इंटरनेट मार्केटिंग के लिए संचालित होता था, अर्थात् Sifynet.com और Sifynet.net ने अदालत से अपील की कि उसने उन्हें 2001 में आईसीएएनएन के साथ पंजीकृत किया था।
  • सिफिनेट सॉल्यूशंस ने चुनौती दी कि एक डोमेन नाम का पंजीकरण कानून के तहत नाम में कोई बौद्धिक संपदा अधिकार प्रदान नहीं करता है। इसमें कहा गया है कि एक डोमेन नाम कंप्यूटर पर सिर्फ एक पता है, जो उपयोगकर्ता को व्यवसाय के मालिक तक पहुंचने की अनुमति देता है, और उसी में किसी भी तुलनीय संपत्ति अधिकार को अधिकृत नहीं करता है।
  • प्रत्यर्थी ने प्रस्तुत किया कि ‘सिफीनेट ‘ शब्द इसके कॉर्पोरेट नाम और इसके डोमेन नामों की विशेषता है।
  • प्रत्यर्थी ने दावा किया कि ‘सिफ्फी’ शब्द इसके संस्थापक निदेशक श्री बावा सलीम के दिमाग की उपज थी। 
  • प्रत्यर्थी ने आगे कहा कि ‘सिफीनेट ‘ को उनके पांच प्रोत्साहक (प्रमोटरों), सलीम, इब्राहिम, फजल, फरीद और यूसुफ के नाम के पहले अक्षर को मिलाकर बनाया गया था। ‘नेट’ शब्द का तात्पर्य प्रत्यर्थी के सॉफ्टवेयर/इंटरनेट आधारित व्यवसाय से है। 
  • प्रत्यर्थी ने अपने बचाव में यह भी कहा कि वह अपीलार्थी के व्यापार नाम और व्यापार शैली ‘सिफी’ से अवगत नहीं था। 

लागू कानून

मामले का फैसला

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 इस मामले में डोमेन नामों पर लागू होगा, जो इस मामले से पहले भारत में न्याय किए गए कई अन्य मामलों पर निर्भर करेगा। इस मुद्दे पर निर्णय सत्यम इन्फोवे के समर्थन में दिया गया था।

बिक्री के साक्ष्य और डोमेन नामों और अन्य कारकों में पूर्व उपयोग और समानता को देखते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि डोमेन नाम में ट्रेडमार्क की समान विशेषताएं हैं और इसलिए ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 में निर्धारित किए गए पासिंग ऑफ के नियम इस मामले में लागू होंगे।

तथ्यों और गुण-दोष के आधार पर, सर्वोच्च न्यायालय ने अंततः अपीलार्थी के पक्ष में फैसला सुनाया। तदनुसार अपील को स्वीकार कर लिया गया और उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए पहले के फैसले को रद्द कर दिया गया। साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय ने सिटी सिविल न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय को स्वीकार किया।

न्यायालय की टिप्पणियां

  • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि डोमेन नाम उन्हीं नियमों के अधीन हैं जो ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 के तहत ट्रेडमार्क पर लागू होते हैं, हालांकि भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है जिसमें डोमेन नामों के लिए विशिष्ट प्रावधान हों।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि विभिन्न न्यायालयों ने डोमेन नाम विवादों के लिए ट्रेड मार्क अधिनियम, 1999 के तहत पासिंग ऑफ से संबंधित कानून को नियमित रूप से लागू किया है। इसमें कहा गया है कि विवाद डोमेन नाम मालिकों और ट्रेडमार्क मालिकों के बीच या डोमेन नाम धारकों के बीच हो सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय पर पहुंचने के लिए निम्नलिखित मामलों पर भरोसा कियाः
  • यदि कोई व्यक्ति उसी डोमेन या ध्वन्यात्मक (फोनेटिकली) रूप से समान नाम का उपयोग करता है जिसका उपयोग किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया जाता है, तो यह प्रदान की गई सेवाओं के बारे में उनके मन में भ्रम के कारण उपभोक्ताओं को नुकसान या भटकाने का कारण बन सकता है और उनके द्वारा गलत बहकावे (मिसरिप्रेजेंटेशन) के रूप में समझा जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी एक बहुत ही उपयुक्त अवलोकन किया कि समान डोमेन नामों के उपयोग में सद्भावना की सुरक्षा, बाजार में व्यवसाय की प्रतिष्ठा, और जनता को उनके मन में भ्रम पैदा करके गुमराह नहीं करने और अंत में इससे होने वाले नुकसान जैसे समान आवश्यक तत्व हैं। इस प्रकार, पासिंग ऑफ की प्रयोज्यता (एप्लीकेशन) के मुद्दे पर, सर्वोच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि डोमेन नामों को ट्रेड मार्क अधिनियम, 1999 के तहत वर्णित पासिंग ऑफ के समान कानून के तहत संरक्षित किया जाना है। न्यायालय ने इसके लिए निम्नलिखित निर्णयों पर भरोसा कियाः
  • धारा 2(zb), 2(m) और 2 (z) के विस्तृत विवरण के बाद न्यायालय ने कहा कि एक डोमेन नाम की भूमिका इंटरनेट पर कंप्यूटर को एक पता प्रदान करना था, लेकिन समय के साथ इंटरनेट एक संचार साधन से कई वाणिज्यिक (कमर्शियल) गतिविधियों को करने के लिए विकसित हुआ है। इसके कारण एक डोमेन नाम अब एक व्यवसाय की पहचान बन गया है। इस प्रकार, अब से ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 की धारा 2(z) के तहत एक डोमेन नाम को सेवा के रूप में माना जा सकता है।
  • न्यायालय ने प्रत्यर्थी से उसके डोमेन नाम पर सवाल किया कि अगर कंपनी के संस्थापक पांच लोग सलीम, इब्राहिम, फजल, फरीद और यूसुफ थे, तो प्रत्यर्थी का डोमेन नाम पहले से ही श्री सी.वी . कुमार के नाम पर सिफीनेट’ के रूप में क्यों पंजीकृत था।
  • न्यायालय ने कहा कि मूल लिखित बयान में, प्रत्यर्थी ने प्रस्तुत किया था कि हालांकि इसका डोमेन नाम शुरू में श्री सी.वी. कुमार के नाम पर पंजीकृत था, लेकिन वर्तमान में, उक्त व्यक्ति का प्रत्यर्थी के साथ कोई संबंध नहीं था क्योंकि वह अब एक भागीदार नहीं था।
  • अंतिम मुद्दा सुविधा के संतुलन के बारे में था। न्यायालय ने कहा कि या तो ‘ सिफी’ या ‘सिफ्फी’ को जाना होगा। न्यायालय ने कहा कि अपीलार्थी पूर्व उपयोगकर्ता था और उसने यह दिखाने के लिए पर्याप्त सबूत प्रस्तुत किए थे कि जनता अपीलार्थी के साथ व्यापार नाम ‘सिफ़ी’ को पहचानती है। 
  • न्यायालय ने कहा कि हालांकि, प्रत्यर्थी ने अपने मामले के समर्थन में आरोपों को टालने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं किए थे। यह संदेह से परे साबित हुआ कि अपीलार्थी डोमेन नाम और पूर्व उपयोगकर्ता का पूर्व अपनाने वाला था।  इस प्रकार, सुविधा के संतुलन को मामले में अपीलार्थी, सत्यम इन्फोवे के पक्ष में माना गया। 

अनुपात निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आधुनिक समय में एक डोमेन नाम एक साधारण व्यावसायिक पते से एक व्यावसायिक पहचानकर्ता के रूप में विकसित हुआ है। इसलिए, एक डोमेन नाम केवल इंटरनेट नेविगेशन के लिए एक प्रवेश द्वार नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा उपकरण भी है जो समानांतर रूप से विशिष्ट इंटरनेट स्थान प्रदान करते हुए व्यवसाय की वस्तुओं या सेवाओं को अलग करता है और वर्गीकृत करता है। यह सुविधा उन्हें ट्रेडमार्क के साथ जुड़े रहने और साथ-साथ ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 के दायरे में शामिल होने की अनुमति देती है।

प्रत्यर्थी द्वारा ‘सिफ्फी’ को अपनाने और उस नाम पर पहुंचने के बारे में कोई उचित औचित्य (जस्टिफिकेशन) नहीं दिया गया था, लेकिन दूसरी ओर, अपीलार्थी एक पूर्व अपनाने वाला और पूर्व उपयोगकर्ता था और अच्छी तरह से जाना जाता था और उसकी एक अच्छी प्रतिष्ठा थी जो प्रलेखित प्रमाण द्वारा पर्याप्त रूप से समर्थित थी।

ओबिटर डिक्टा

डोमेन नाम प्रणाली (डी. एन. एस.) में मौजूद कमी के लिए एक अंतरराष्ट्रीय विनियमन की आवश्यकता थी जिसे डब्ल्यूआईपीओ और आई.सी.ए.एन.एन. के माध्यम से लागू किया गया था। भारत दुनिया के उन 171 देशों में से एक है जो डब्ल्यूआईपीओ के सदस्य हैं जो दुनिया भर में बौद्धिक संपदा के संरक्षण, प्रसार और उपयोग को बढ़ावा देने के लिए अस्तित्व में आए थे। 

आईसीएएनएन और डब्ल्यूआईपीओ के बीच सहयोग के परिणामस्वरूप मान्यता प्राप्त रजिस्ट्रारों के साथ डोमेन नामों के लिए पंजीकरण की एक प्रणाली की स्थापना हुई है और इसके परिणामस्वरूप 24 अक्टूबर 1999 को आईसीएएनएन द्वारा समान डोमेन नाम विवाद समाधान नीति (यूडीएनडीआर नीति) का विकास भी हुआ है। यू.डी.एन.डी.आर. नीति में उन प्रकार के अधिकारों के प्रावधान हैं जो एक डोमेन नाम का मालिक आई.सी.ए.एन.एन. मान्यता प्राप्त रजिस्ट्रार के साथ पंजीकरण पर होने की उम्मीद कर सकता है। आईसीएएनएन के नियम 4 के तहत प्रशासन-विवाद-समाधान सेवा प्रदाताओं के समक्ष एक व्यक्ति शिकायत आदि कर सकता है। 

विश्लेषण

पिछले कुछ समय से इंटरनेट मानव जीवन का एक बुनियादी हिस्सा बन गया है और बहुत सारे लेन-देन ऑनलाइन होते हैं जैसे व्यापार और खरीदारी आदि। इन गतिविधियों के कारण, ई-कॉमर्स लोकप्रिय हो गया है और बाजार को विनियमित करने और नियंत्रित करने का एक बहुत मजबूत और प्रमुख साधन है और कभी-कभी यह ऑफ़लाइन बाजार में भी प्रचलित है। 

ई-कॉमर्स गतिविधियों में भारी वृद्धि का मतलब है कि इंटरनेट पर व्यवसाय को संरक्षित करने की आवश्यकता है। ऑफ़लाइन होने वाले व्यवसाय के लिए, ट्रेडमार्क कानून हैं जो उनकी रक्षा करते हैं, लेकिन जब हम इंटरनेट पर व्यवसाय से निपटते हैं तो उनके बीच अंतर करना मुश्किल होता है यदि वे प्रकृति में समान हैं और समान डोमेन नाम हैं।

ऑनलाइन बाजारों और इसके उत्पादों को सम्मिलित करने और उनकी सुरक्षा के लिए कोई ठोस कानून नहीं होने के कारण, इन वस्तुओं और व्यवसायों की सुरक्षा के संबंध में कई मामले सामने आए हैं। वर्तमान मामला और याहू!, इंक. बनाम आकाश अरोड़ा (1999) का मामला इसके अच्छे उदाहरण हैं। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने डोमेन नामों के मामले में कानून में मौजूदा रिक्तियों को स्वीकार किया। कुछ हद तक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए, कानून में एक शून्य को दूर करने के लिए, अदालत ने कहा कि ट्रेडमार्क और डोमेन नाम अलग तरह से काम करते हैं, फिर भी उन्हें सुरक्षा की आवश्यकता होती है क्योंकि इन दिनों ऑनलाइन व्यवसायों की पहचान उनके डोमेन नामों से की जाती है और यह अब केवल एक पता नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय ने सिटी सिविल न्यायालय के फैसले को बरकरार रखने के लिए सही निर्णय लिया और उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द कर दिया। लेकिन हमें नियमों के एक नए सेट की आवश्यकता है जो डोमेन नामों को इसके दायरे में शामिल करता है क्योंकि देश में ट्रेडमार्क कानून डोमेन नाम में उत्पन्न होने वाले असंख्य विवादों से निपटने के लिए सुसज्जित नहीं है। इसके अलावा, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 भी डोमेन नाम विवादों से निपटने से संबंधित ट्रेडमार्क अधिनियम में खामियों को भरने में विफल रहा है।

निष्कर्ष

ट्रेडमार्क की सुरक्षा प्रकृति में क्षेत्रीय है लेकिन डोमेन नाम भौगोलिक सीमाओं को पार करते हैं और डोमेन नामों को दुनिया भर में विशिष्टता की आवश्यकता होती है और डोमेन नामों की सफलतापूर्वक सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय कानून अपर्याप्त हैं। जिस तरह से एक ट्रेडमार्क एक उत्पाद को दूसरे से अलग करता है, उसी तरह एक डोमेन नाम इंटरनेट पर एक व्यवसाय की पहचान करता है। वास्तव में, प्रत्येक इंटरनेट साइट को उसके अद्वितीय डोमेन नाम से नियंत्रित और पता लगाया जा सकता है जो इसे अन्य डोमेन नामों से अलग करता है।

ज्यादातर एक डोमेन नाम पर आयोजित व्यवसाय दूसरे से अलग होता है, लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब दो अलग-अलग व्यक्ति/कंपनियां लगभग समान डोमेन नाम का उपयोग करती हैं और शायद व्यवसाय की एक समान पंक्ति में, जिसके परिणामस्वरूप उस कंपनी को नुकसान होता है जो एक पूर्व उपयोगकर्ता थी और उस डोमेन नाम द्वारा अच्छी तरह से प्रतिष्ठित और पहचानी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय, इस निर्णय में, डब्ल्यू.आई.पी.ओ. जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और आई.सी.ए.एन.एन. जैसे निजी निकायों को संदर्भित करता है। ये निकाय प्रौद्योगिकी कानून तैयार करने में शामिल हैं जो डोमेन नामों को संबोधित करते हैं।

डोमेन नाम विवादों से जुड़े सभी मामलों में, न्यायालय ने कहा कि डोमेन नाम और उस डोमेन नाम धारक के मालिक के व्यवसाय की रक्षा करने की आवश्यकता है। चूंकि डोमेन नाम और ट्रेडमार्क अलग-अलग उद्देश्यों को पूरा करते हैं, इसलिए डोमेन नाम विनियमों और उनके विवादों को शमिल करने वाले कानूनों का एक अलग सेट होना महत्वपूर्ण है।

संदर्भ

 

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