भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत ऑडी अल्टरम पार्टम का नियम

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Indian Constitution
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यह लेख के.आई.आई.टी. स्कूल ऑफ लॉ, भुवनेश्वर की छात्रा Raslin Saluja द्वारा लिखा गया है। यह लेख संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत सिविल सेवकों के खिलाफ अनुशासनात्मक (डिसिप्लिनरी) कार्यवाही के संदर्भ में ऑडी अल्टरम पार्टम के नियम का विश्लेषण करता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

नैसर्गिक (नेचुरल) न्याय के नियम निष्पक्षता (फेयरनेस), तर्कशीलता (रीजनेबलनेस), न्याय संगतता (इक्विटी) और समानता को दर्शाते हैं। ये समय के साथ विकसित हुए हैं और समुदाय में चल रही सभ्यता के स्तर का एक उचित उपाय हैं। ये सामान्य कानून के उच्च प्रक्रियात्मक (प्रोसीजरल) सिद्धांतों का एक हिस्सा हैं जो की न्यायिक निर्णय के माध्यम से विकसित हुए हैं, जो एक निजी व्यक्ति के अधिकारों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने वाले किसी भी निर्णय को लेने के दौरान प्रशासनिक एजेंसी का मार्गदर्शन करते हैं। इन सिद्धांतों को भारतीय संविधान में कानून के दुरुपयोग के खिलाफ प्रशासनिक अधिकारियों और सिविल सेवकों की सुरक्षा के लिए कानूनी प्रतिरक्षा (इम्यूनिटी) और सुरक्षा प्रदान करने के लिए शामिल किया गया है।

ऑडी अल्टरम पार्टेम – निष्पक्ष सुनवाई का नियम        

सरल शब्दों में, ऑडी अल्टरम पार्टेम के सिद्धांत का अर्थ है, दूसरे पक्ष को सुनना। यह नैसर्गिक न्याय का दूसरा मौलिक सिद्धांत है जिसमें कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को बिना उसकी सुनवाई करे सजा नहीं दी जानी चाहिए, किसी भी आदेश को पारित करने से पहले दोनों पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाना चाहिए। यह सभ्य न्यायशास्त्र (ज्यूरिस्प्रूडेंस) का पहला सिद्धांत है और इंसानों और ईश्वर के कानूनों द्वारा स्वीकार किया जाता है और प्रत्येक सभ्य समाज के लिए अनिवार्य है। प्रशासनिक कार्रवाई के क्षेत्र में निष्पक्ष सुनवाई और न्याय सुनिश्चित करने के लिए इस सिद्धांत का उपयोग किया जाता है। इसका अनुप्रयोग प्रशासनिक दक्षता (एफिशिएंसी), समीचीनता (एक्सपीडिएंसी) में सुधार और न्याय को पूरा करने के लिए तथ्यात्मक मैट्रिक्स पर निर्भर करता है। निष्पक्ष सुनवाई का नियम प्रक्रिया का एक कोड है, और इसलिए ऐसे प्रत्येक चरण को शामिल करता है जिसके माध्यम से एक प्रशासनिक निर्णय लिया जाता है, इसलिए नोटिस से लेकर अंतिम निर्धारण तक का चरण इसमें शामिल हैं।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 311

भारत के संविधान का अनुच्छेद 311 इस प्रकार राष्ट्रपति/ राज्यपाल (गवर्नर) या उनकी ओर से अधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा अनुच्छेद 310 के तहत प्रयोग किए गए संतुष्टि के सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ़ प्लेजर) को प्रभावित या संशोधित नहीं करता है, लेकिन केवल दो शर्तों के अधीन उन्हें इस पर सीमाएं प्रदान करता है। यह सिविल सेवकों को मनमाने ढंग से गिरफ्तारी से बचाने और उनकी रक्षा करके, सिविल पदों पर रहने की रक्षा करता है। यहां सिविल पद का अर्थ अनिवार्य रूप से प्रशासन के सिविल पक्ष से एक पद में नियुक्ति है। उत्तर प्रदेश राज्य बनाम ए.एन. सिंह (1965) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने एक नियोक्ता और कर्मचारी के संबंध को निर्धारित करने के लिए कुछ बिंदु निर्धारित किए थे जैसे की सेवा, नियंत्रण और प्रबंधन (मैनेजमेंट), भुगतान करने का कर्तव्य, काम करने का तरीका और उनके रोजगार को समाप्त करने की शक्ति। 

संविधान के अनुच्छेद 311 के तहत उल्लिखित सुरक्षा उपायों का दावा अखिल भारतीय सेवा के सदस्य, संघ (यूनियन) और राज्य के सिविल सेवा के सदस्य, संघ या राज्य के तहत एक सिविल पद धारण करने वाला व्यक्ति कर सकता हैं। हालांकि, कुछ व्यक्तियों को अनुच्छेद के लाभ का दावा करने से बाहर रखा गया है। सैन्य सेवाओं, रक्षा क्षेत्र, वैधानिक सार्वजनिक निगम, पी.जी.आई., कंपनी अधिनियम, 1956 या पंजीकृत (रजिस्टर्ड) समिति या विश्वविद्यालय के तहत पंजीकृत सरकारी कंपनियों के कर्मचारी, एक  सिविल पद के धारक नहीं हैं और इस प्रकार यह सिविल सेवकों के अंतर्गत नहीं आते हैं। इसके अलावा, जहां किसी व्यक्ति को भर्ती और प्रक्रिया का पालन किए बिना नियुक्त किया जाता है, उसकी नियुक्ति अवैध होने के कारण सुरक्षा उपायों का पालन किए बिना समाप्त की जा सकती है।

अनुच्छेद 311(2)

यह प्रावधान केवल उस स्थिति पर लागू होता है जब एक सिविल सेवक को उसके कार्यकाल की अवधि की समाप्ति से पहले उसकी इच्छा के विरुद्ध “पद में नीचे”, “बर्खास्त” या “निष्कासन (रिमूव) किया” जाता है। वे खंड 2 के तहत इस सुरक्षा के हकदार तभी होते हैं जब पद में नीचे, बर्खास्तगी या निष्कासन दंड के माध्यम से किया जाता है। यह निर्धारित करने के लिए कि क्या यह दंड या सजा के माध्यम से किया गया था, सर्वोच्च न्यायालय ने पुरुषोत्तम लाल ढींगरा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1958) के मामले में दो परीक्षण निर्धारित किए थे, जो हैं:

  1. क्या संबंधित कर्मचारी को पद धारण करने का अधिकार है?
  2. क्या कर्मचारी को बुरे परिणामों के साथ दंडित किया गया है? (बुरे परिणाम का अर्थ है नागरिक या दंडात्मक परिणाम)

यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम रघुवर पाल सिंह (2018) के मामले में यह आयोजित किया गया था कि रोजगार की समाप्ति पर सरल आदेश, प्रतिवादी के आचरण को प्रतिबिंबित (रिफ्लेक्ट) नहीं करता है, बल्कि यह केवल उसकी नियुक्ति के अवैध होने का एक निहितार्थ (इंप्लीकेशन) है क्योंकि वह सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बिना की गई थी। जहां जांच किए बिना ऐसी समाप्ति की जाती है, तो यह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत और संविधान के अनुच्छेद 311(2) का उल्लंघन होता है। अनुच्छेद 311(2) भी कुछ मामलों को आकर्षित करता है, जैसे पद को नीचे कर देना या संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्चुअल) या स्थायी कर्मचारी की समाप्ति क्योंकि दोनों को पद धारण करने का अधिकार होता है। इसी तरह, केंद्रीय सिविल सेवा (अस्थायी सेवा) नियम, 1965 के नियम 6 के तहत, अनुच्छेद 311(2) आकर्षित होता है क्योंकि इसमें कहा गया है कि “अर्ध-स्थायी (क्वासी पर्मानेंट)” सेवाओं में व्यक्तियों की सेवाओं की समाप्ति को भी दंड के रूप में माना जाएगा। इस प्रकार, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है सिविल पद धारण करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ पद को कम करने, बर्खास्तगी या निष्कासन के रुप में पारित किसी भी आदेश के लिए वैध होने के लिए एक जांच और सुनवाई के उचित अवसर की गारंटी होनी चाहिए, जैसा कि अनुच्छेद 311(2) के तहत गारंटीकृत है।

जांच और उचित अवसर 

एक सिविल सेवक को पद में नीचे करने, बर्खास्त करने या निष्कासित करने के लिए पहले उसे सुनवाई और अपना बचाव करने का उचित अवसर देना होगा। भारतीय संविधान की उद्देशिका (प्रीएंबल) आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय के साथ-साथ विश्वास, विचार और समान अवसर की स्वतंत्रता प्रदान करती है, जो कर्मचारी को नैसर्गिक न्याय के नियमों के आधार पर प्रशासनिक कार्रवाई में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए अपनी रक्षा करने का अवसर प्रदान करती है। ये सिद्धांत अनुच्छेद 14 से जुड़े हैं “जो कानून के समक्ष समानता और कानून की समान सुरक्षा” सुनिश्चित करता है, इस तरह से नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन अनुच्छेद 14 का भी उल्लंघन होता है। इस तरह की प्रशासनिक कार्रवाई को प्रकृति में मनमाना माना जाता है। ऑडी अल्टरम पार्टेम की सभी प्रक्रियाओं को, नोटिस के अधिकार से लेकर किसी कर्मचारी के खिलाफ दायर शिकायत के अंतिम निर्धारण तक हर कर्मचारी पर समान रूप से लागू किया जाना चाहिए अन्यथा, यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा।

सुनवाई का उचित अवसर नैसर्गिक न्याय सिद्धांतों के सभी पहलुओं को शामिल करता है जिन्हें अपने बचाव में पेश करने का एक पूर्ण अवसर प्रदान करने के लिए बिना ध्यान दिए नहीं छोड़ा जाना चाहिए। चूंकि नैसर्गिक न्याय के सभी सिद्धांतों को यह तय करने के लिए निर्धारित नहीं किया जा सकता है कि उचित अवसर दिया गया था या नहीं, इसलिए एक सामान्य कथन जिसे मान्यता दी गई है वह यह है कि निष्पक्ष आचरण में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करने के बाद एक जांच किया गया था। यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम टी.आर. वर्मा (1957), के मामले में, न्यायाधीश वेंकटराम अय्यर ने कहा की, नैसर्गिक न्याय के नियमों को लागू करने के उद्देश्य से, एक पक्ष को सभी प्रासंगिक सबूतों को प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना चाहिए, जिस पर वह निर्भर करता है। उसे गवाहों से जिरह (क्रॉस एग्जामिनेशन) करने की अनुमति दी जानी चाहिए। उसे बचाव करने का अवसर दिए बिना किसी भी सबूत पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए।

यह खेम चंद बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (1958) के मामले में आयोजित किया गया था, कि सुनवाई के अवसर का अर्थ संबंधित कर्मचारी को चार्जशीट के बनने के बाद अपनी बेगुनाही साबित करने की अनुमति देना है, और इससे बचाव के लिए गवाह से जिरह करने की अनुमति मिल जाती है। इसके बाद प्रतिनिधित्व करने का अवसर तभी मिलता है जब सक्षम प्राधिकारी द्वारा बर्खास्तगी, निष्कासन या पद को कम करने जैसे दंड लगाए गए हों।

1976 में 42वें संशोधन से पहले, एक सिविल सेवक के पास दो चरणों में अपना बचाव पेश करने का अवसर था:

  1. जांच के चरण पर जहां जांच अधिकारी को अपना बचाव करने का अवसर दिया जाता है, और
  2. दंडात्मक चरण में जहां संबंधित कर्मचारी को अनुशासनात्मक प्राधिकारी द्वारा प्रस्तावित दंड लगाए जाने के विरुद्ध अपना बचाव देने का अवसर दिया जाता है।

संशोधन के बाद दूसरे चरण को हटा दिया गया था। इसलिए बाद में कीया कर बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2019) के मामले में याचिकाकर्ता को जांच में बचाव पेश करने का अवसर दिया गया था, न कि सजा के आदेश के खिलाफ जाने का। इसलिए, यह माना गया था कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का कोई उल्लंघन नहीं था।

जांच का बहिष्करण (एक्सलुजन ऑफ इंक्वायरी) 

हालांकि संविधान के अनुच्छेद 311(2) में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिया जाएगा, लेकिन, यह पूर्ण नहीं है और इसके कुछ अपवाद हैं जिनमें उक्त अवसर देने की आवश्यकता नहीं है और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं होगा। ये उदाहरण इस प्रकार हैं:

अपवाद 1- आपराधिक आरोप पर दोषसिद्धि [परंतुक 2(a), अनुच्छेद 311(2)]

अनुच्छेद 311 के परंतुक (a) के खंड (2) के अनुसार, अनुच्छेद 311 के खंड 2 के तहत संरक्षण यानी की सुनवाई का अवसर, उन मामलों में कोई भी प्रमुख दंड लगाने से पहले लागू नहीं होगा, जहां कर्मचारी के खिलाफ मुकदमा एक अपराध के लिए चलाया जा रहा है और उसके कारण कर्मचारी के पद को कम किया जाता है, बर्खास्तगी या निष्कासन किया जाता है। इस परंतुक को लागू करने के लिए, सरकार के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह दोषसिद्धि (कनविक्शन) के विरुद्ध प्रस्तुत अपील या पुनरीक्षण (रिवीजन) के निपटारे तक इंतज़ार करे। लेकिन अगर दोषसिद्धि को रद्द कर दिया जाता है, तो बर्खास्तगी का आदेश समाप्त हो जाएगा।

अपवाद 2 – जहां जांच यथोचित (रीजनेबल) रूप से व्यावहारिक नहीं है [परंतुक 2(b), अनुच्छेद 311(2)]

इस खंड के दायरे को यूनियन ऑफ इंडिया बनाम तुलसीराम पटेल (1985) के मामले में समझाया गया था, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था,

  • जांच करना व्यावहारिक है या नहीं, इस पर, इस संदर्भ में निर्णय लिया जाना चाहिए कि अनुशासन समिति की संतुष्टि पर ऐसा करना उचित रूप से व्यवहार्य है या नहीं। यह खंड (b) द्वारा आवश्यक कुल या पूर्ण अव्यवहारिकता नहीं है।
  • जो आवश्यक है वह यह है कि मौजूदा स्थिति के बारे में उचित दृष्टिकोण रखने वाले एक उचित व्यक्ति की राय में, जांच आयोजित करना व्यावहारिक नहीं है।
  • अनुशासनात्मक प्राधिकारी को जांच से दूर रहने के कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना होता है। सरकारी कर्मचारी को कारण बताने की कोई बाध्यता नहीं है।
  • अनुशासनात्मक प्राधिकारी का निर्णय अनुच्छेद 311(3) द्वारा अंतिम होता है। हालाँकि, जहाँ तक न्यायिक समीक्षा (रिव्यू) की अपनी शक्ति का संबंध है, यह अदालतों के लिए बाध्यकारी नहीं है।

दक्षिणी रेलवे अधिकारी संघ बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (2010) के मामले में , खंड 2 के आवेदन को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष परीक्षण के लिए रखा गया था। यहां अर्पुथराज नाम के एक व्यक्ति के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई थी, जिसके कारण उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था, जिसे बाद में बहाल (रीइंस्टेट) कर दिया गया था। एक दिन जब अनुशासनात्मक प्राधिकार रेलवे स्टेशन पर कार्यशाला में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए इंतजार कर रहा था, तभी उसे एक नौकर ने गाली दी और जान से मारने की धमकी भी दी। समिति के पास उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर, उसे जांच किए बिना  सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने उचित ठहराया था।

अपवाद 3 – राज्य के हित में जांच करना समीचीन (एक्सपीडिएंट) नहीं है [परंतुक 2(c), अनुच्छेद 311(2)]

यह अपवाद प्रदान करता है कि राष्ट्रपति/ राज्यपाल की संतुष्टि के अधीन किसी सिविल सेवक को राज्य की सुरक्षा के हित में न होने पर अवसर देना समीचीन नहीं है। इस अपवाद का उद्देश्य यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम तुलसीराम पटेल में न्यायालय द्वारा विस्तृत किया गया था, जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रपति/ राज्यपाल की संतुष्टि राज्य की सुरक्षा के हित में जांच करने में समीचीनता के संदर्भ में है। यह संतुष्टि प्रकृति में व्यक्तिपरक है और इसे वस्तुनिष्ठ मानकों द्वारा वर्गीकृत (क्लासिफाई) नहीं किया जा सकता है।

यूनियन ऑफ़ इंडिया और अन्य बनाम एम एम शर्मा (2011) के मामले में, चीन में काम करने वाले एक भारतीय नियोक्ता को चीनी सरकार को कुछ गोपनीय तस्वीरें पेश करने के लिए बरखास्त कर दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि राज्य की सुरक्षा के हितों की रक्षा के लिए यह उचित था।

खंड D – अनुच्छेद 311(3)

यह अंतिम खंड है जो पहले उल्लेखित अनुच्छेद 311(2)(b), परंतुक (ii) के तहत शमिल की गई स्थिति के बारे में चर्चा करता है। इसमें कहा गया है कि यदि कोई प्रश्न उठता है कि क्या ऐसे व्यक्ति के संबंध में खंड 2 में इस तरह की जांच करना उचित रूप से व्यावहारिक है, तो पद से बर्खास्त करने, निष्कासित करने या पद में कम करने का प्राधिकारी का निर्णय अंतिम होगा। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह कहा गया था कि अनुच्छेद 311(3) अनुच्छेद 311, परंतुक (ii) के खंड 2 (b) के तहत की गई कार्रवाई, न्यायिक समीक्षा पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाता है। यह माना गया था कि इसकी अंतिमता का परीक्षण कानून की अदालत में किया जा सकता है जब यह पाया जाता है कि कार्रवाई मनमानी या दुर्भावनापूर्ण है या बाहरी विचार से प्रेरित है या जांच से दूर करने के लिए एक चाल है।

निष्कर्ष

अनुच्छेद 311 का उद्देश्य सरकारी सेवा के तहत सिविल सेवकों के अधिकारों के मनमाने ढंग से पद को कम करने, बर्खास्त करने या निष्कासित करने के खिलाफ सुरक्षित करना है। यह उन्हें आत्मविश्वास और कुशलता से अपने कार्यों का निर्वहन करने में सक्षम बनाता है। इसका मुख्य उद्देश्य उन्हें एक निश्चित मात्रा में सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इस प्रकार, अनुच्छेद 311(2) के आधार पर पद कम करने, निष्कासित करने या बर्खास्त करने के रूप में दंड लगाने के मामले में, उन्हें सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए। देश के सार्वजनिक हित और सुरक्षा पर अधिक जोर दिया जाता है और इसलिए नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों को जनहित की सेवा करने और विकासशील समाज की मांगों के अनुकूल बनाने के लिए तैयार किया गया है। इसलिए, मामले की आवश्यकताओं को समायोजित करने के लिए उनके आवेदन को लचीला होना चाहिए।

संदर्भ

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