कंपनी अधिनियम के तहत एक निदेशक के कर्तव्य

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Companies Act 2013
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यह लेख Shreesh Chadha द्वारा लिखा गया है। इस लेख में कंपनियों के निदेशकों (डायरेक्टर्स) के कर्तव्यों पर चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash द्वारा किया गया है।

एक निदेशक कौन होता है?

कंपनी अधिनियम 2013 एक “निदेशक” को परिभाषित नहीं करता है, लेकिन इसमें निम्नलिखित दिया गया- “एक व्यक्ति जो एक निदेशक के पद पर है” और यह एक निदेशक की जिम्मेदारियों की बहुत कम व्याख्या करता है। इस उद्देश्य के लिए और इसे सही से समझने के लिए एक बेहतर परिभाषा कुछ ऐसी हो सकती है-

“निदेशकों को कभी-कभी ट्रस्टी, या वाणिज्यिक (कमर्शियल) ट्रस्टी कहा जाता है, और कभी-कभी उन्हें प्रबंध भागीदार (मैनेजिंग पार्टनर्स) कहा जाता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप उन्हें क्या कहते हैं, जब तक आप समझते हैं कि उनकी वास्तविक स्थिति क्या है, जो यह है कि वे वास्तव में एक प्रबंधन करने वाले व्यावसायिक व्यक्ति हैं और अपने और अन्य सभी शेयरधारकों के लाभ के लिए व्यापारिक सरोकार (ट्रेडिंग कंसर्न) रखते है।”

एक एजेंट के रूप में

इसके द्वारा यह भी स्थापित किया जाता है कि एक निदेशक की भूमिका और जिम्मेदारियां कानून की नजर में एक एजेंट के समान होती हैं।

“कंपनी में कोई व्यक्ति नहीं होता है: यह केवल निदेशकों के माध्यम से कार्य कर सकती है और उन निदेशकों के संबंध में देखा जाए तो यह केवल एक प्रिंसिपल और एजेंट के समान मामला होता है।”

इसलिए, एजेंट के जैसे, निदेशक भी किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होते हैं, क्योंकि वे कंपनी के लेनदेन में प्रतिनिधित्व करते हैं, और ऐसा मामले में, कंपनी खुद ही उत्तरदायी होती है।

एक ट्रस्टी के रूप में

हालाँकि, कई कारणों से, एक निदेशक कंपनी का ट्रस्टी भी होता है। यह स्थापित है कि-

“एक कंपनी के निदेशक कंपनी के लिए ट्रस्टी होते हैं, और कंपनी के फंड को लागू करने की उनकी शक्ति के संदर्भ में और शक्ति के दुरुपयोग के लिए उन्हें ट्रस्टी के रूप में उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, और उनकी मृत्यु पर, उनके कानूनी प्रतिनिधि करने का भी अधिकार दिया जा सकता है।”

हालांकि, ट्रस्टी के रूप में उनकी देनदारियों के संबंध में, यह सिद्धांत निर्धारित किया गया था कि निदेशक केवल एक कंपनी के ट्रस्टी हैं, व्यक्तिगत (इंडिविजुअल) शेयरधारकों के नहीं हैं।

इसलिए, उपरोक्त ने कंपनियों के समामेलन (अमैलगमेशन) जैसी गतिविधियों से व्यक्तिगत लाभ के प्रकटीकरण की आवश्यकता के रूप में एक कमी छोड़ दी, जहां उनके शेयर शामिल थे। बाद में इसे ठीक कर दिया गया क्योंकि यह स्थापित हो गया था कि निदेशक शेयरधारकों के लाभ के लिए किसी भी लाभ के ट्रस्टी हो सकते हैं। इसे कंपनी अधिनियम, 2013 में समामेलन और अन्य ऐसे मुनाफे से किसी भी लाभ का खुलासा करने के रूप में स्थापित किया गया है, जो पहले के कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत भी कवर किया जा सकता था। इसलिए, शेयरधारकों को शामिल करने वाले अपने कार्यों में, निदेशक भी एक ट्रस्टी के रूप में उत्तरदायी होते हैं।

शेयरधारकों के प्रति निदेशकों के कर्तव्य की इस अवधारणा जब उनकी रुचि शामिल होती है, ने रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज लिमिटेड बनाम रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के मामले के माध्यम से अपनी उपस्थिति को मजबूत किया है। इस मामले में, हमारे उद्देश्य के लिए प्रासंगिक तथ्य यह है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (इसके बाद आरआईएल) के बीच एक समझौता ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) के माध्यम से तय किया गया था, जिसे आरआईएल की कंपनी योजना में शामिल किया जाना था। केजी बेसिन क्रूड ऑयल रिजर्व के संभावित हितैषी (टू– बी बेनिफैक्टर) श्री अनिल अंबानी चाहते थे कि यह कदम शेयरधारकों की सहमति के बिना ही उठाया जाए। आरआईएल के निदेशक मंडल (बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स) ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि समझौता ज्ञापन बाध्यकारी नहीं हो सकता, क्योंकि इस विषय पर शेयरधारकों की सहमति नहीं दी गई थी। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने समझौता ज्ञापन को बाध्यकारी नहीं माना, क्योंकि इस तरह के आयोजन में सबसे अधिक रुचि रखने वाला पक्ष शेयरधारक ही होगा। उन्होंने कंपनी के मालिकों और शेयरधारकों की सहमति नहीं होने की निदेशक मंडल की आशंका को बरकरार रखा था।

“पहचान के सिद्धांत (डॉक्ट्राइन ऑफ आइडेंटिफिकेशन)” पर आधारित अपीलकर्ता द्वारा दिया गया एक तर्क था, जिसका अनिवार्य रूप से मतलब था कि एक या दो व्यक्तियों के कार्यों को कंपनी के बाकी कार्यों के रूप में जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, इस मामले में मुकेश अंबानी की सहमति को तथा शेयरधारकों सहित पूरे आरआईएल को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। हालांकि, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने आरआईएल जैसी कंपनियों के मामले में इसे खारिज कर दिया, जिनके पास 2 मिलियन से अधिक शेयरधारक हैं और इस तरह के सिद्धांत को केवल शेयरधारकों के समूह (अंबानी परिवार) के शेयरों और वरीयताओं (प्रिफरेंस) को रखने के रूप में माना जाता है, और बाकी पर, जो अनुमेय (पर्मिसिबल) नहीं है, जैसा कि निदेशक मंडल द्वारा सही आपत्ति की गई थी, जिससे कंपनी के संचालन में निदेशकों के कार्यों में शेयरधारकों की श्रेष्ठता को स्वीकार किया जाता है।

कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत प्रावधान

निदेशकों पर लगाए गए कर्तव्यों में भी कई बार बदलाव किए गए है। कंपनी अधिनियम, 1956 में, निदेशक के कर्तव्यों को निर्धारित करने के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं थे, और उनके दायरे को केवल निदेशक मंडल की सामान्य शक्ति के संबंध में देखा जा सकता था।

हालांकि, कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 166 के आने के साथ निदेशकों के कर्तव्यों को सूचीबद्ध किया गया है। हालांकि सैद्धांतिक (थिऑर्टीकल) रूप से मामले, सद्भावना (गुड फेथ), परिश्रम (डिलिजेंस) आदि के ऐसे प्रावधान अतीत में निदेशकों पर लागू होते थे, धारा 166 अपने साथ निश्चितता और प्रवर्तनीयता (एंफोर्सेबिलिटी) को आया है। पहले की प्रणाली के तहत, एक कंपनी के निदेशक कंपनी और उसके शेयरधारकों के प्रति क्रमशः एजेंट और ट्रस्टी के रूप में उत्तरदायी होते थे। हालाँकि, नया कंपनी अधिनियम, 2013 निदेशकों को भी एक कंपनी के “अधिकारी” के रूप में उत्तरदायी ठहराए जाने के लिए प्रावधान देता है। “डिफॉल्ट में अधिकारी (ऑफिसर इन डिफॉल्ट)” की एक योजना है जो यह सुनिश्चित करने के लिए मौजूद है कि कंपनी अधिनियम, 2013 के उल्लंघन में किसी के साथ कुछ देयता (लायबिलिटी) संलग्न (अटैच) की जा सकती है। ऐसी योजना का दायरा बहुत व्यापक (वाइड) है और इसमें सभी पूर्णकालिक निदेशक (होल टाइम डायरेक्टर), प्रमुख प्रबंधकीय कार्मिक (की मैनेजेरियल पर्सनेल) (इसके बाद केएमपी), निदेशक मंडल या केएमपी की ओर से या सलाह पर कार्य करने वाले व्यक्ति, या कोई निदेशक जो कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के संदर्भ में किसी भी चूक के बारे में जानते हैं, सभी शामिल हैं। हालांकि, कंपनी अधिनियम, 2013 यहां तक ​​कि निदेशकों को कंपनी के अधिकारियों के रूप में मानने के संबंध में भी उन्नत है क्योंकि यह पूर्णकालिक निदेशकों, स्वतंत्र निदेशकों (इंडिपेंडेंट डायरेक्टर) और गैर-कार्यकारी निदेशकों (नॉन एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर) के बीच अंतर करता है। यह स्वतंत्र निदेशकों और गैर-कार्यकारी निदेशकों (केएमपी नहीं) को उत्तरदायी ठहराता है, जब कोई भी अवैध कार्य उनके ज्ञान या उनकी सहमति से हो रहा था।

इसलिए, कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत एक निदेशक के कर्तव्यों के प्रति दृष्टिकोण अधिक गतिशील (डायनेमिक) है। निदेशकों पर लगाए गए इस कर्तव्य में एक और बदलाव देखा जा सकता है जो वास्तव में यूनाइटेड किंगडम के कंपनी अधिनियम, 2006 से लिया गया है। यह एक अधिक सामान्य कर्तव्य है जो गैर शेयरधारकों के प्रति भी मौजूद है।

“यह लंबी अवधि में शेयरधारक मूल्य बढ़ाने का एक साधन है”।

उपर दिया गया वाक्य अनिवार्य रूप से कॉरपोरेट गवर्नेंस और प्रत्ययी (फिडूशियरी) जिम्मेदारियों का तात्पर्य है, जिनका पालन लंबे समय तक शेयरधारकों को समृद्ध करने की सीमा को बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। इसे कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 166 (2),  के माध्यम से लागू किया गया था, जो निदेशकों पर गैर-शेयरधारकों को भी अंत तक साधन के रूप में मानने का कर्तव्य लगाता है। इसमें न केवल कंपनी के सदस्य, बल्कि कर्मचारी और पूरा समुदाय भी शामिल है।

धारा 166 (2) का उद्देश्य सद्भाव सिद्धांत में निहित है, जिसे इस प्रकार परिभाषित किया गया है-

“सद्भावना की आवश्यकता होगी कि निदेशकों के सभी प्रयासों को कंपनी के लाभ के लिए निर्देशित किया जाना चाहिए।” 

कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत दिल्ली के माननीय उच्च न्यायालय द्वारा इसे और अधिक उन्नत स्तर पर व्याख्यायित किया गया है, और यह माना गया है कि भले ही कोई निदेशक कंपनी के उद्देश्यों को बढ़ावा देने के लिए, कंपनी, उसके कर्मचारियों और शेयरधारकों के सर्वोत्तम हित के लिए कुछ कर रहा हो, तो उस कार्य में कोई व्यक्तिगत हित नहीं होना चाहिए, और यदि ऐसा है तो कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 166 (7),  के प्रावधान, जो एक दंडात्मक प्रावधान होगा, उसे आकर्षित करेगा।

निष्कर्ष

अंत में, नए अधिनियम, 2013 के आने के बाद से निदेशकों पर डाला गया कर्तव्य न केवल कंपनी के मामलों के कार्यवाहक (केयर टेकर), या रक्षकों के लिए विकसित हुआ है, बल्कि कंपनी में शामिल सभी प्रतिनिधियों और उन सभी के प्रति जवाबदेह सभी के संबंध में भी है।

संदर्भ

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