मुख्तारनामा और विशिष्ट राहत अधिनियम 1963

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Power of attorney and the Specific Relief Act 1963

यह लेख सिम्बायोसिस लॉ स्कूल, नोएडा की Rangita Chowdhury द्वारा लिखा गया है। यह मुख्तारनामा (पॉवर ऑफ अटॉर्नी) और विशिष्ट राहत अधिनियम के विभिन्न कानूनी पहलुओं के बारे में विस्तार से बात करता है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta के द्वारा किया गया है।

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परिचय

दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ होती हैं, दुर्घटनाएँ होती हैं, बीमारियाँ होती हैं और मनुष्य के रूप में हमारा उन पर कोई भी नियंत्रण नहीं होता है, भले ही हमारे पास सही संसाधन हों। यही कारण है कि मुख्तारनामा होना महत्वपूर्ण और सहायक है। किसी को शांति हो सकती है यदि वे जानते हैं कि उनके पास कोई है जो उनके कानूनी और वित्तीय मामलों की देखभाल करेगा जब वे अब सक्षम नहीं होंगे। मुख्तारनामा हमारी और हमारे प्रियजनों की सुरक्षा में मदद करता है।

विशिष्ट राहत अधिनियम भी इसी तरह बहुत मददगार होता है जब अनुबंध का उल्लंघन होता है और केवल मौद्रिक मुआवजा देना पर्याप्त नहीं होता है। विशिष्ट राहत पक्ष को उस विशिष्ट कर्तव्य के रूप में हर्जाना प्राप्त करने में मदद करती है जिसे उल्लंघन करने वाले पक्ष को देना पड़ता है।

विशिष्ट राहत अधिनियम 1963 का उद्देश्य

भारत सरकार द्वारा अधिनियमित विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 (इसके बाद ‘अधिनियम’ के रूप में संदर्भित) 1 मार्च 1964 को लागू हुआ था। इसने अपनी नौवीं रिपोर्ट में विधि आयोग की सिफारिश पर इसके पुराने संस्करण, विशिष्ट राहत अधिनियम, 1887 को निरस्त कर दिया। अधिनियम को हाल ही में 2018 में संशोधित भी किया गया था। अधिनियम पक्षों के बीच अनुबंध का उल्लंघन होने पर सिविल और संविदात्मक उपाय से संबंधित है। यह विशिष्ट उपायों से संबंधित है। विशिष्ट राहत का अर्थ है ‘विशिष्ट प्रकार की राहत’ जिसका अर्थ है ‘वास्तविक निर्दिष्ट रूप में’। तो, अधिनियम मूल रूप से सटीक विशेष दायित्व या उस विशिष्ट प्रदर्शन को पूरा करने के बारे में है जो उल्लंघन करने वाले पक्ष को करना चाहिए था। अधिनियम किसी व्यक्ति के लिए अनुबंध का उल्लंघन होने पर उपलब्ध उपायों के प्रकार निर्धारित करता है।

अधिनियम उन स्थितियों का ध्यान रखने के लिए बनाया गया था जहां हर्जाना या मुआवजा निर्धारित नहीं किया जा सकता है या पर्याप्त नहीं है और केवल कार्य के विशिष्ट प्रदर्शन को ही पर्याप्त माना जा सकता है। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 केवल मुआवजे या हर्जाने के रूप में उल्लंघन के लिए उपाय प्रदान करता है। विशिष्ट राहत अधिनियम कुछ हद तक इसका विस्तार है।

अधिनियम के तहत उपाय के प्रकार निम्नलिखित है-

  • संपत्ति पर कब्ज़ा पुनः प्राप्त करना,
  • अनुबंधों का विशिष्ट प्रदर्शन,
  • लिखतों (इंस्ट्रूमेंट) का सुधार,
  • अनुबंधों को रद्द करना,
  • लिखतों को रद्द करना,
  • घोषणात्मक (डिक्लेरेटरी) डिक्री,
  • निषेधाज्ञा (इंजंक्शन)।

मुख्तारनामा और स्थायी (ड्यूरेबल) मुख्तारनामा के बीच अंतर

मुख्तारनामा एक लिखित अधिकृत (ऑथराइज्ड) दस्तावेज है जो किसी को अपनी ओर से अपने निजी, व्यावसायिक या कानूनी मामलों में प्रतिनिधित्व करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त करने का अधिकार देता है। जिस व्यक्ति को नियुक्त किया जाता है उसे ‘एजेंट’ के रूप में जाना जाता है और उसे नियुक्त करने वाले व्यक्ति को मुख्य रूप से ‘प्रिंसिपल’ के रूप में जाना जाता है, लेकिन उसे ‘अनुदाता (ग्रांटर) या दाता (डॉनर)’ के रूप में भी जाना जा सकता है। नियुक्त व्यक्ति को कुछ अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) में ‘वास्तव में वकील’ के रूप में भी जाना जाता है। एजेंट एक नियमित आम आदमी हो सकता है, कानूनी पृष्ठभूमि या ज्ञान वाला कोई व्यक्ति नहीं।

मुख्तारनामा दो प्रकार के होते हैं-

  • सामान्य वकालतनामा
  • सीमित वकालतनामा

एक सामान्य मुख्तारनामा में बहुत व्यापक कानूनी अधिकार होता है और यह लेनदेन की एक विस्तृत श्रृंखला को शामिल करता है। यह तब समाप्त हो जाता है जब प्रिंसिपल की मृत्यु हो जाती है, वह मानसिक रूप से अयोग्य हो जाता है, या लिखित रूप में मुख्तारनामा को रद्द कर दिया जाता है।

उदाहरण: A, B को अपने बैंक खाते संचालित करने और उसकी ओर से कोई भी लेनदेन करने के लिए मुख्तारनामा देता है। B के पास अब A के बैंक खाते से धन हस्तांतरित (ट्रांसफर) करने या निकालने की शक्ति है। जल्द ही, A मानसिक रूप से अयोग्य हो जाता है और अब मुख्तारनामा को रद्द कर दिया जाता हैं। 

उपरोक्त उदाहरण में, मैंने केवल दो प्रकार के अधिकृण का उल्लेख किया है, लेकिन सामान्य मुख्तारनामा या केवल मुख्तारनामा में, एजेंट किसी भी कानूनी या व्यक्तिगत लेनदेन को करने का हकदार है जब तक कि उपर्युक्त कारणों में से किसी के लिए शक्ति रद्द नहीं की जाती है।

सीमित मुख्तारनामा में, एजेंट केवल कुछ विशिष्ट मामलों में प्रिंसिपल की ओर से कार्य कर सकता है, जैसा कि दस्तावेज़ में प्रिंसिपल द्वारा निर्दिष्ट किया गया है। इसे एक खास समय तक सीमित भी किया जा सकता है।

उदाहरण: Z, X को नए कर्मचारियों की नियुक्ति के संबंध में अपनी कंपनी के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर करने का अधिकार देता है। इसलिए, X के पास केवल Z की ओर से रोजगार अनुबंध पर हस्ताक्षर करने का सीमित अधिकार है और कुछ नहीं।

कभी-कभी जब पक्ष ऐसी स्थिति से बचना चाहते हैं जहां प्रिंसिपल की मानसिक स्थिति बाद में खराब हो सकती है, और यह जोखिम हो सकता है कि प्रिंसिपल की मानसिक स्थिति के कारण मुख्तारनामा का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, तो वे एक स्थायी मुख्तारनामा पर हस्ताक्षर कर सकते है।

एक स्थायी मुख्तारनामा में, एजेंट का अधिकार उल्लिखित सभी प्रकार के मामलों में जारी रहता है, भले ही प्रिंसिपल अक्षम हो जाए। दस्तावेज़ में इसका स्पष्ट उल्लेख होता हैं वे प्रिंसिपल के स्वास्थ्य के संबंध में निर्णय नहीं ले सकते, इस संबंध में वे अधिकतम इतना कर सकते हैं कि उनके चिकित्सा बिलों का भुगतान करें। वे अपने प्राधिकरण को तब तक जारी रख सकते हैं जब तक कि प्रिंसिपल की मृत्यु न हो जाए या लिखित रूप में मुख्तारनामा रद्द नहीं कर दिया जाए।

उदाहरण: D, C को स्थायी मुख्तारनामा देता है। D को मनोभ्रंश (डिमेंशिया) हो जाता है और उसी बारे में पता चलता है। सामान्य मुख्तारनामा के विपरीत C के पास अभी भी D की ओर से कार्य करने की शक्ति है।

मुख्तारनामा का कानूनी पहलू

“जैसे-जैसे मनुष्य व्यस्त होता जाता है, उसके लिए अपने काम पूरा करने के लिए दूसरों पर निर्भर रहना अधिक आवश्यक हो जाता है। इस कारण से मुख्तारनामा अब महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

हम जानते हैं कि मुख्तारनामा एक दस्तावेज है जहां एक व्यक्ति (प्रिंसिपल) अपनी ओर से कुछ कार्य करने के लिए दूसरे व्यक्ति (एजेंट) को नियुक्त करता है।

  1. ब्लैक्स डिक्शनरी इसे एक ऐसे लिखत के रूप में परिभाषित करती है जो किसी अधिकृत व्यक्ति को एजेंट के रूप में कार्य करने में मदद करता है।
  2. स्ट्राउड के न्यायिक डिक्शनरी में “मुख्तारनामा को व्यापक रूप से एक प्राधिकार जिसके तहत किसी को उसके स्थान पर कार्य करने के लिए नियुक्त किया जाता है, के रूप में परिभाषित किया गया है”।

मुख्तारनामा अधिनियम, 1882 मुख्तारनामा को एक ऐसे लिखत के रूप में परिभाषित करता है जो किसी निर्दिष्ट व्यक्ति को इसे निष्पादित (एग्जिक्यूट) करने वाले व्यक्ति के नाम पर कार्य करने के लिए सशक्त बनाता है।

शायद मुख्तारनामा का सबसे सटीक अर्थ भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 में पाया जाता है। एजेंसी का कानून मुख्तारनामा के सिद्धांतों को नियंत्रित करता है। धारा 182 एजेंट और प्रिंसिपल की परिभाषा के बारे में विस्तार से बताती है।

  1. इस अधिनियम के तहत एक एजेंट वह व्यक्ति होता है जिसे किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उसकी ओर से कार्य करने या किसी तीसरे पक्ष के साथ किसी भी सौदे में उसका प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया जाता है।
  2. इस प्रकार नियुक्त करने वाले व्यक्ति को ‘प्रिंसिपल’ कहा जाता है और नियुक्त व्यक्ति को ‘एजेंट’ के रूप में जाना जाता है।
  3. हालाँकि, कानून द्वारा अधिकृत व्यक्ति किसी व्यक्ति एजेंट को भी नियुक्त कर सकता है, वह ‘प्रिंसिपल’ हो भी सकता है और नहीं भी, इस प्रकार कानून एजेंटों के विभिन्न वर्गों के बीच कोई अंतर नहीं करता है।
  4. एजेंट या तो सामान्य या विशेष हो सकते हैं। दलाल, प्रतिनिधि, भागीदार, और आम तौर पर मान्यता प्राप्त चरित्र की स्थिति पर कब्जा करने वाले व्यवसाय में कार्यरत सभी व्यक्ति सामान्य एजेंट होते हैं। दूसरी ओर, विशेष एजेंटों को किसी विशिष्ट अवसर या उद्देश्य के लिए नियुक्त किया जाता है। यहां एजेंट का कार्य उसकी नियुक्ति तक ही सीमित होता है।

यह अधिनियम विभिन्न प्रकार के प्राधिकारों सहित एक एजेंट के कर्तव्यों और अधिकारों और उसके प्राधिकारी को परिभाषित और व्याख्या करता है।

भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1889 मुख्तारनामा को परिभाषित करता है कि ” यह कोई भी लिखत है जो किसी निर्दिष्ट व्यक्ति को इसे निष्पादित करने वाले व्यक्ति के लिए और उसके नाम पर कार्य करने का अधिकार देता है।”

मुख्तारनामा के अन्य कानूनी पहलू

  1. मुख्तारनामा से अनुबंधों और समझौतों में प्रवेश कर सकते है या हस्ताक्षर कर सकते है, निष्पादित कर सकते है, वितरित कर सकते है और स्वीकार कर सकते है।
  2. उसे रियल एस्टेट क्षेत्र में बैंक खातों, जमा प्रमाणपत्रों और मुद्रा बाजार खातों से संबंधित सौंपे गए कर्तव्यों को पूरा करने का अधिकार है।
  3. वह टैक्स रिटर्न, बीमा फॉर्म और संबंधित दस्तावेज दाखिल कर सकता है।
  4. उसके पास स्टॉक, बॉन्ड और प्रतिभूतियों (सिक्योरिटीज) से संबंधित समान शक्तियां होती हैं।

मुख्तारनामा के बुनियादी सिद्धांत

  1. शक्ति का कड़ाई से अर्थ लगाया जाना चाहिए।
  2. एजेंट को जिस अधिकार के लिए अधिकार दिया गया है, उसके अतिरिक्त वह कोई भी कार्य निष्पादित नहीं कर सकता है।
  3. एजेंट द्वारा की गई किसी भी धोखाधड़ी के लिए प्रिंसिपल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।
  4. दी गई शक्ति से अधिक किया गया कोई भी कार्य प्रिंसिपल को बाध्य नहीं करेगा (उदाहरण के लिए संपत्ति के निपटान की शक्ति संपत्ति के बंधक (मॉर्गेज) की अनुमति नहीं देती है)।
  5. अचल संपत्ति के प्रबंधन की शक्ति आभूषण आदि जैसी अचल संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार प्रदान नहीं करती है।

मुख्तारनामा को नियंत्रित करने वाले कुछ नियम

  1. विलेख (डीड) का संचालित भाग दाखिलों (रेसिटल्स) द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
  2. किसी विशेष कार्य के लिए अधिकृत के बाद आने वाले सामान्य शब्द उस उद्देश्य तक सीमित होंगे जिसके लिए अधिकृण दिया गया है और कार्य का अर्थ इस प्रकार होना चाहिए कि उसमें निष्पादन के लिए आवश्यक सभी शक्तियां हों।
  3. जहां किसी विशेष कार्य को करने का अधिकार दिया जाता है, उसके बाद सामान्य शब्द दिए जाते हैं, सामान्य शब्दों को वह करने के लिए प्रतिबंधित किया जाता है जो विशेष कार्य के उचित प्रदर्शन के लिए आवश्यक है।

मुख्तारनामा का पंजीकरण

  1. यह वैकल्पिक है, अनिवार्य नहीं, हालांकि, भारत में, पंजीकरण अधिनियम, 1908 के तहत मुख्तारनामा को उप रजिस्ट्रार द्वारा प्रमाणित किया जाना चाहिए।
  2. अन्य क्षेत्रों में, सत्यापन (एटेस्टेशन) नोटरी या राजनयिक एजेंटों द्वारा होना चाहिए।
  3. वैध मुख्तारनामा के तहत एक वकील को दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने का अधिकार है।
  4. विदेशी मुख्तारनामा को भारत में इसकी प्राप्ति के बाद 3 महीने के भीतर कलेक्टर द्वारा सत्यापन की आवश्यकता होती है।
  5. मुख्तारनामा का पंजीकरण मुख्तारनामा के विलेख को प्रमाणित करता है।
  6. मुख्तारनामा को दो या दो से अधिक वयस्क स्वतंत्र गवाहों जो अस्वस्थ न हों द्वारा सत्यापित किया जाना चाहिए। 
  7. यदि अचल संपत्ति का मूल्य 100 रुपये से अधिक है तो उसे पंजीकृत किया जाना चाहिए।

निम्नलिखित मामलों में मुख्तारनामा रद्द किया जा सकता है

  1. प्रिंसिपल द्वारा रद्द करना। 
  2. प्रिंसिपल की मृत्यु, पागलपन या दिवालियापन (इंसोल्वेंट) होना। 
  3. जिस व्यवसाय के लिए एजेंट नियुक्त किया गया था वह व्यवसाय समाप्त हो गया है।
  4. दोनों के बीच आपसी सहमति से।
  5. यदि एजेंट अपना अधिकार त्याग देता है।

मुख्तारनामा के माध्यम से संपत्ति की बिक्री की वैधता

व्यवहार में होने के बावजूद, वैध बिक्री विलेख संचालित करने के लिए मुख्तारनामा एक वैध लिखत नहीं है।

खरीदार और विक्रेता के बीच निष्पादित बिक्री विलेख में खरीदार द्वारा पंजीकरण शुल्क और स्टांप शुल्क और विक्रेता द्वारा पूंजीगत लाभ कर का भुगतान शामिल होता है। हालाँकि, यदि लेनदेन मुख्तारनामा के माध्यम से किया जाता है, तो इन शुल्कों से बचा जा सकता है क्योंकि लेनदेन कानूनी रूप से पूरा नहीं हुआ है और विक्रेता को अभी भी खरीदार माना जाता है। यही कारण है कि यह प्रथा पूरे भारत में बहुत प्रचलन में है क्योंकि यह खरीदार और विक्रेता दोनों को मौद्रिक लाभ प्रदान करती है। हालाँकि आधिकारिक तौर पर स्वामित्व का कोई हस्तांतरण नहीं है, दोनों पक्ष इस मौद्रिक लाभ के लिए इस तरह की प्रथा पर सहमत हैं।

इस प्रथा पर आपत्ति जताते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सूरज लैंप एंड इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम हरियाणा राज्य और अन्य (2011) में माना गया कि मुख्तारनामा अपने अधिकार, शीर्षक और हित से संबंधित अचल संपत्ति के हस्तांतरण का एक कानूनी लिखत नहीं है क्योंकि मुख्तारनामा के माध्यम से निष्पादित कोई भी बिक्री विलेख एक अधूरा हस्तांतरण है जहां संपत्ति के अधिकार अभी भी मूल मालिक के ही रहेंगे।

सर्वोच्च न्यायालय ने नगर निगम अधिकारियों को ऐसे दस्तावेजों के आधार पर संपत्तियों का पंजीकरण और परिवर्तन न करने का भी आदेश दिया। हालाँकि सामान्य मुख्तारनामा के माध्यम से वास्तविक लेनदेन को फैसले के दायरे से बाहर रखा गया था।

यह कानूनी स्थिति है लेकिन कहने की जरूरत नहीं है कि यह प्रथा अभी भी पूरे देश में बहुत प्रचलन में है।

विशिष्ट राहत अधिनियम कब लागू होता है

अधिनियम एक सामान्य नियम के रूप में हर्जाना देने और अपवाद के रूप में विशिष्ट प्रदर्शन देने के लिए अदालतों को व्यापक विवेकाधीन अधिकार प्रदान करता है। इस प्रकार यह विशिष्ट गैर-निष्पादन के लिए राहत देने के संबंध में एक संहिताकरण (कोडिफिकेशन) है।

इसका मतलब यह है कि अधिनियम के प्रावधान तब लागू होते हैं जब कोई अनुबंध निष्पादित नहीं किया गया हो। इस अधिनियम के तहत पीड़ित पक्ष को अनुबंध के निष्पादन के लिए बाध्य करते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करने की स्वतंत्रता है। इसे विशिष्ट प्रदर्शन के रूप में जाना जाता है। हालाँकि, प्रदर्शन के बदले पक्ष आर्थिक मुआवज़ा भी मांग सकते है।

इस प्रकार, अधिनियम के प्रावधान किसी व्यक्ति को संपत्ति की वसूली, अनुबंध के विशिष्ट प्रदर्शन, लिखत के सुधार, अनुबंधों को रद्द करने और लिखत को रद्द करने का अधिकार देते हैं। जब भी कार्य के निष्पादन में विफलता होती है तो ये सभी मुद्दे अधिनियम के प्रावधानों को आकर्षित करते हैं।

2018 के संशोधन से पहले, विशिष्ट प्रदर्शन का उपाय पीड़ित पक्ष के अधिकार के रूप में उपलब्ध नहीं था। न्यायालय अपने विवेक पर इसका प्रयोग करते थे। अब, अदालतें सीमित अपवादों के साथ, एक नियम के रूप में वादे या अनुबंध में निर्दिष्ट प्रदर्शन को लागू करने के लिए बाध्य हैं।

अधिनियम संपत्ति पर व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा कैसे करता है?

अधिनियम का अध्याय I संपत्ति पर कब्ज़ा वापस पाने से संबंधित है। अपनी चल या अचल संपत्ति से बेदखल किया गया कोई भी व्यक्ति इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत उस पर कब्ज़ा पाने के लिए राहत मांग सकता है।

अचल संपत्ति

  • अधिनियम की धारा 5, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 में दिए गए तरीके से एक विशिष्ट अचल संपत्ति पर कब्ज़ा करने का अधिकार देती है।
  • अधिनियम की धारा 6 के तहत, अपनी अचल संपत्ति से बेदखल किया गया कोई भी व्यक्ति इसकी वसूली के लिए मुकदमा दायर कर सकता है, बशर्ते कि उसने इस तरह की बेदखली के लिए कोई सहमति नहीं दी हो और यह भी प्रावधान किया हो कि यह कानून के मौजूदा प्रावधान के तहत किया गया था।
  • यह अधिनियम इस अधिनियम के तहत पारित डिक्री के किसी भी आदेश के खिलाफ किसी भी अपील या समीक्षा (रिव्यू) को प्राथमिकता देने पर भी रोक लगाता है।

हालाँकि, 2 सीमाएँ हैं – मुकदमा बेदखली के 6 महीने के भीतर किया जाना चाहिए और सरकार के खिलाफ कोई मुकदमा दायर नहीं किया जा सकता है।

विशिष्ट चल संपत्ति

  • अधिनियम की धारा 7 सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 में दिए गए तरीके से एक विशिष्ट चल संपत्ति पर कब्ज़ा करने का अधिकार देती है। न्यासियों (ट्रस्टी) को कब्जे का दावा करते हुए मुकदमा करने की भी अनुमति है।

किसी व्यक्ति का संपत्ति का मालिक न होने पर दायित्व

  • धारा 8 चल संपत्ति के किसी विशेष सामान के कब्जे या नियंत्रण वाले व्यक्ति को, जो मालिक नहीं है, उसे अपने तत्काल कब्जे के हकदार व्यक्ति को सौंपने के लिए मजबूर करती है, बशर्ते कि प्रतिवादी वादी का एजेंट या ट्रस्टी हो, या जब मौद्रिक मुआवजा पर्याप्त मुआवजा प्रदान नहीं हो या जब वास्तविक हर्जाने का पता लगाना मुश्किल हो और जब वस्तु को वादी से गलत तरीके से स्थानांतरित किया गया हो।

निष्कर्ष

जैसा कि चर्चा की गई है, मुख्तारनामा एक कानूनी लिखत है जो एक व्यक्ति (एजेंट, वकील, या प्राप्तकर्ता) को किसी अन्य व्यक्ति (प्रिंसिपल या दाता) जो लिखत को निष्पादित करता है के नाम पर कार्य करने का अधिकार देता है। यह तंत्र उन लोगों की मदद करता है, जो अपनी शारीरिक अनुपलब्धता के कारण कानूनी कार्यों या कार्यवाही को निष्पादित करने में असमर्थ हैं, ऐसे कार्यों को किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से करवा सकते है। मुख्तारनामा से संबंधित प्रावधानों को मुख्तारनामा अधिनियम, 1882 द्वारा शासित होने की आवश्यकता है।

यदि एजेंट/वकील/प्राप्तकर्ता प्रिंसिपल या दाता द्वारा उसे सौंपे गए कर्तव्यों को पूरा करने में विफल रहता है तो यह कहा जाता है कि उसने मुख्तारनामा के अनुबंध का उल्लंघन किया है। प्रिंसिपल विशिष्ट कर्तव्य के प्रदर्शन के लिए विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 के तहत एजेंट पर मुकदमा कर सकता है, जिसे पूरा करने में दूसरा पक्ष विफल रहा है। इस प्रकार एक उपाय प्रदान करके, विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963, मुख्तारनामा अधिनियम, 1882 का पूरक (कॉम्प्लीमेंट) है, और प्रिंसिपल की सहायता के लिए आता है, जब एजेंट मुख्तारनामा में निर्धारित अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को निष्पादित करने में विफल रहता है।

संदर्भ

 

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