सीआरपीसी के तहत पुलिस द्वारा गवाहों का परीक्षण

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Criminal Procedure Code

यह लेख Rohit Raj द्वारा लिखा गया है, जो वर्तमान में लॉयड लॉ कॉलेज से बी.ए. एलएलबी (ऑनर्स) कर रहा है। यह एक विस्तृत लेख है जो गवाहों की अवधारणा से संबंधित है और यह बताती है कि गवाह का परीक्षण कैसे आयोजित किया जाता है और गवाह के परीक्षण की प्रक्रिया क्या है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash के द्वारा किया गया है। 

परिचय

“गवाहों की जांच करने में, मैंने सामान्य प्रश्न पूछना सीखा ताकि शक्तिशाली संवेदी संबंधों (सेंसरी एसोसिएशंस) के साथ विवरण प्राप्त किया जा सके: रंग, ध्वनियां, गंध जो दिमाग में एक छवि बनाते हैं और श्रोता (लिसनर) को विचार में डालते हैं।”                                                                                                                                                                                                                                              -सोनिया सोतोमयोर

आपराधिक प्रक्रिया संहिता के प्रावधान के माध्यम से पुलिस द्वारा गवाहों का परीक्षण एक मामले का फैसला करने और वास्तविक अपराधी को दंडित करने में एक आवश्यक चरण के रूप में सिद्ध होता है। गवाहों के परीक्षण में, पुलिस संबंधित मामले में एक और कदम उठाने के लिए व्यक्ति का बयान लेती है। पुलिस सीआरपीसी के प्रावधान के तहत व्यक्तियों के बयान लेती है लेकिन आपराधिक प्रक्रिया संहिता में बयान’ शब्द का कहीं भी उल्लेख नहीं किया गया है।

यदि हम शब्दकोष के अनुसार किसी बयान का अर्थ देखें तो इसका अर्थ है बोलने या लिखने में किसी बात की घोषणा या स्पष्ट अभिव्यक्ति। सीआरपीसी की धारा 161 और सीआरपीसी की धारा 162 पुलिस द्वारा गवाहों के परीक्षण से संबंधित है और यह धारा पुलिस को जब भी जरूरत हो गवाहों की जांच करने और उनकी सुविधा के अनुसार उनके बयान दर्ज करने की पूरी शक्ति देती है।

गवाह

एक गवाह वह व्यक्ति होता है जिसे या तो वादी या प्रतिवादी द्वारा बुलाया जाता है जो मुकदमे में शपथ के तहत गवाही देता है। ‘गवाह’ शब्द अपने आप में स्पष्ट रूप से अर्थ की व्याख्या करता है अर्थात कोई भी व्यक्ति जिसने अपराध को देखा है और जो मामले के लिए प्रासंगिक है, या उसके बारे में प्रत्यक्ष या मूल ज्ञान रखता है। गवाह को उस व्यक्ति के रूप में भी संदर्भित किया जा सकता है जो किसी दस्तावेज पर गवाह के रूप में हस्ताक्षर करता है जो बाद में विवाद में आता है तो इस मामले में गवाह की जांच की जाती है या कोई भी व्यक्ति जिसके सामने किसी कानूनी दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए गए थे, इस मामले में भी वह व्यक्ति गवाह माना जाएगा।

गवाहों को एक आपराधिक मामले में किसी भी घटना का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है और यह ज्ञान वकील को सबूतों की गवाही देने और अदालतों को अपने फैसले को अंतिम रूप देने में मदद करता है। कई बार आपराधिक मामलों की सुनवाई के दौरान गवाह को अदालत के सामने बुलाने और बयान देने के लिए समन जारी किया जाता है।

गवाह भी विभिन्न प्रकार के होते हैं और उन सभी को एक आपराधिक मामले में हुई घटना के बारे में ज्ञान प्रदान करने में उनकी भूमिका के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। इस प्रकार कानून के प्रावधानों के अनुसार, कुल तीन प्रकार के गवाह होते हैं।

  • प्रत्यक्षदर्शी (आईविटनेस) एक गवाह है जिसने कथित अपराध को देखा जिसे कभी-कभी परिस्थितिजन्य (सर्कमस्टेंशियल) साक्ष्य की तुलना में अविश्वसनीय माना जाता है जो अधिक प्रामाणिक और विश्वसनीय होता है। लेकिन, अगर कई लोगों ने अपराध को अपनी आंखों से देखा है तो उस मामले में वकीलों को अलग-अलग गवाहों द्वारा एक ही घटना की पुनरावृत्ति (रिपीटिशन) दिखाई देती है।
  • एक विशेषज्ञ गवाह वह व्यक्ति होता है जिसके पास अधिक ज्ञान होता है और वह किसी विशेष क्षेत्र में कुशल होता है जो एकत्र किए गए साक्ष्य को प्रमाणित करने में मदद करता है और इन व्यक्तियों को सामान्य गवाहों से बेहतर माना जाता है क्योंकि वे किसी विशेष क्षेत्र में विशिष्ट होते हैं। ये व्यक्ति फोरेंसिक विशेषज्ञ, बैलिस्टिक विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक (साइकोलॉजिस्ट) और कई अन्य हैं।
  • एक चरित्र गवाह एक गवाह होता है जो शपथ के तहत समाज में उस व्यक्ति के अच्छे चरित्र या प्रतिष्ठा की पुष्टि करता है जहां वह रहता है और इस प्रकार के गवाह मुख्य रूप से अदालत के सामने उस व्यक्ति के अच्छे गुणों, नैतिकता को याद करने और जोर देने के लिए होते हैं। इन गवाहों को केवल तभी बुलाया और इनका बयान दर्ज किया जाता है जब प्रतिवादी की प्रतिष्ठा और गुणों पर सवाल उठाया जाता है।

लेकिन इसमें एक चीज की कमी है यानी सभी तरह के गवाहों में विश्वसनीयता और आपराधिक मामलों में गवाहों की विश्वसनीयता पर बहुत बहस होती है। कई बार गवाह झूठा बयान देते हैं जिसके कारण गलत फैसले सुनाए जाते हैं। यह न केवल भारत में बल्कि कई अलग-अलग देशों में एक गंभीर समस्या है।

वर्जीनिया विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, यह पाया गया है कि गवाह के बयानों की सटीकता किसी व्यक्ति की उम्र में वृद्धि के साथ कम हो जाती है और वर्जीनिया विश्वविद्यालय द्वारा किया गया यह अध्ययन गवाहों की गवाही की विश्वसनीयता पर अधिक सवाल उठाता है।

गवाह का परीक्षण

एक गवाह के परीक्षण का मतलब उस गवाह की जांच करना है जिसने अपराध देखा है और आपराधिक मामले की घटना के बारे में पहले से जानकारी रखता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अध्याय X में गवाहों के परीक्षण के बारे में उल्लेख किया गया है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 135 के अनुसार, गवाहों को पेश किया जाता है और उनकी जांच की जाती है जो कानून के प्रावधानों द्वारा नियंत्रित होती है और गवाहों को पेश करने और उनकी जांच करने की यह प्रक्रिया कानून के अभाव में अदालत के विवेक पर की जा सकती है।

गवाह द्वारा दिए गए बयान की गवाही देने के लिए गवाह का कई बार परीक्षण होता हैं और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 138 के अनुसार, गवाहों का पहले मुख्य रूप से परीक्षण किया जाएगा, फिर जिरह (क्रॉस एग्जामिन्ड) की जाएगी और फिर तथ्यों की प्रामाणिकता की जांच करने के लिए फिर से जांच की जाएगी।

कई बार जब एक गवाह की जिरह की जाती है, तो उसे संदर्भित प्रश्नों के अलावा, कोई भी प्रश्न पूछा जा सकता है जो उसकी सत्यता की जाँच करता है, जो प्रतिवादी के जीवन में उसकी जगह और भूमिका का पता लगाने के लिए होता है और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के धारा 146 के अनुसार अन्य प्रश्न भी किए जाते है।

गवाहों के परीक्षण के दौरान, एक गवाह अपनी याददाश्त को ताज़ा कर सकता है। प्रासंगिक धारा यानी भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 159 बताते हुए इसका अर्थ स्पष्ट हो जाएगा, और इस धारा के अनुसार, एक गवाह परीक्षण के दौरान लेन-देन के समय अपने द्वारा किए गए किसी भी लेख का हवाला देकर अपनी याददाश्त को ताज़ा कर सकता है, जिस पर सवाल उठाया गया हो।

यदि हम सिविल प्रक्रिया संहिता के संदर्भ में देखें तो, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश XXVI में गवाहों की जांच के लिए आयोग की बात की गई है। एक न्यायिक आयोग उस गवाह को हटाने का निर्देश देता है जो अदालत के अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिसडिक्शन) से बाहर है। आयोग खुद उस व्यक्ति की पहचान करता है जिसे अपदस्थ (डिपोज) किया जाना है और यह तय करता है कि उन्हें कब और कहाँ अपदस्थ किया जाएगा।

साथ ही फिल्मिस्तान प्राइवेट लिमिटेड, बॉम्बे बनाम भगवानदास संतप्रकाश और अन्य, 1970 के मामले में, जिन गवाहों से पूछताछ की जानी थी, वे काबुल में रह रहे थे। यह आदेश भारतीय राजदूत को “अनुरोध पत्र जारी करने” का निर्देश देते हुए पारित किया गया था कि वे उन गवाहों की जांच करें जो कमीशन पर वहां रह रहे थे। इसलिए इस आदेश को अदालत के समक्ष चुनौती दी गई और यह कहा गया कि कमीशन पर परीक्षित गवाहों से जिरह नहीं की जा सकती है या यदि वे ऐसा करते हैं तो यह भारी लागत का हकदार होगा।

परीक्षण की प्रक्रिया

भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत गवाहों के परीक्षण की प्रक्रिया निर्धारित की गई है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 166 गवाहों के परीक्षण के लिए प्रक्रिया का वर्णन करती है। और गवाहों के परीक्षण की प्रक्रिया को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की विभिन्न प्रासंगिक धाराओं की मदद से समझाया गया है।

  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 135 में कहा गया है कि “जिस क्रम में गवाहों को पेश किया जाता है और कानून के अनुसार उनकी जांच की जाती है और कानून की अनुपस्थिति में, गवाहों की प्रस्तुति और परीक्षण भी अदालत के विवेक पर किया जाता है।”
  • धारा 136 कहती है कि “जब कोई भी पक्ष किसी तथ्य का सबूत देने का प्रस्ताव करता है, तो न्यायाधीश सबूत देने का प्रस्ताव करने वाले पक्ष से कह सकते है कि कथित तथ्य, अगर साबित हो जाए, तो प्रासंगिक कैसे होगा; और न्यायाधीश साक्ष्य को स्वीकार करेंगे यदि वह सोचते है कि तथ्य साबित होने पर प्रासंगिक होंगे, अन्यथा नहीं।
  • धारा 137 में 3 चीजों के बारे में बात की गई है यानी मुख्य परीक्षण, जिरह और गवाहों का फिर से परीक्षण।
  • धारा 138 गवाह के परीक्षण के आदेश की बात करती है। इस धारा में कहा गया है कि गवाह पहले मुख्य परीक्षण, जिरह और फिर दोबारा परीक्षण से गुजरेगा।
  • धारा 139 कहती है कि कोई भी व्यक्ति जिसके खिलाफ मामले से संबंधित कोई दस्तावेज पेश करने के लिए समन जारी किया जाता है, उसे गवाह नहीं माना जा सकता है और जब तक उस व्यक्ति को गवाह नहीं माना जाता तब तक उसकी जांच नहीं की जा सकती है।
  • धारा 140 कहती है कि “चरित्र की गवाही” की जिरह और फिर से परीक्षण किया जा सकता है लेकिन यह अनिवार्य नहीं है कि यह किया जाना चाहिए।

और 141 से 166 तक कई अन्य धाराएं भी है जो गवाहों के परीक्षण से संबंधित बिंदुओं का आंशिक रूप से वर्णन या उल्लेख करती हैं लेकिन उपर्युक्त धाराएं सबसे अधिक प्रासंगिक हैं जो गवाहों के परीक्षण के दौरान पहले पूरे किए जाते हैं।

पुलिस द्वारा उत्प्रेरण (इंड्यूसमेंट) 

पुलिस द्वारा उत्प्रेरण का अर्थ है लोगों को उनकी इच्छा के बिना गवाह के रूप में स्वैच्छिक बनाने के लिए उनकी शक्ति का नकारात्मक तरीके से उपयोग करना। एक प्रमुख कारण जो गवाह के रूप में इच्छुक गवाही या स्वयंसेवा के प्रवाह को बर्बाद कर देता है। पुलिस अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए मामले में गवाह बनने के लिए लोगों को परेशान करती है।

कई मामले हमारे सामने आए है जहां लोगों को पुलिस गवाह बनने के लिए प्रताड़ित कर रही है। यशोदाबाद में एक प्रतिवादी ने अपने जीवन में पहली बार स्वेच्छा से गवाही देने के दु:खद अनुभव के बारे में बताया। इसी तरह की एक और घटना की सूचना बिरजोड़ी में एक महिला ने दी थी जिसे कथित तौर पर पुलिस ने गवाही देने के लिए मजबूर किया था।

पुलिस लोगों को गवाह बनने के लिए अपमानित करके सत्ता का दुरुपयोग करती है जो वास्तव में समाज के साथ-साथ सरकार के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है। साथ ही पुलिस लोगों को गवाही देने या व्यक्ति की इच्छा के बिना मामले में गवाह बनने के लिए मजबूर करते हुए लोगों को अशिष्टता (रूडनेस) और क्रूरता का चेहरा भी दिखाती है।

ऐतिहासिक निर्णय

विभिन्न न्यायालयों द्वारा कई निर्णय दिए गए हैं और कुछ को ऐतिहासिक माना जाता है क्योंकि यह लोगों द्वारा गवाहों के परीक्षण पर आने वाले मामलों के लिए मिसाल कायम करता है। कुछ ऐतिहासिक निर्णयों का उल्लेख नीचे किया गया है।

  • नंदिनी सत्पथी बनाम पीएल दानी, 1978, इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आरोपी व्यक्ति को केवल इसलिए सवालों के जवाब देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है क्योंकि अलगाव में देखे जाने और उस विशेष मामले तक सीमित होने पर उसके उत्तर निहित नहीं हैं। वह अपना मुंह बंद रखने का हकदार है यदि मांगे गए उत्तरों में वास्तविक या आसन्न किसी अन्य आरोप में उसे दोषी ठहराने की उचित संभावना है, भले ही चल रही जांच उसके संदर्भ में न हो।
  • दिल्ली राज्य बनाम रविकांत शर्मा, 2007 इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने एक जांच के दौरान साक्ष्य अधिनियम की धारा 161 के तहत दर्ज गवाहों के बयान के संबंध में विशेषाधिकार की व्याख्या की और कहा कि इस तरह के बयानों के “सार” की आपूर्ति करने के लिए कोई निर्देश टिकने योग्य नहीं था क्योंकि जांच के दौरान रिकॉर्ड किए गए गवाहों के ऐसे बयान में जांच अधिकारी की व्याख्या शामिल नहीं है।
  • नरपाल सिंह बनाम हरियाणा राज्य, 1977, इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पूछताछ रिपोर्ट में दिए गए बयान साक्ष्य अधिनियम की धारा 162 से प्रभावित हैं और साक्ष्य में अस्वीकार्य हैं, क्योंकि गवाहों के रूप में हस्ताक्षरकर्ताओं की जांच नहीं की गई थी।
  • लक्ष्मण कालू बनाम महाराष्ट्र राज्य, 1968 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में कहा था कि जब एक व्यक्ति जिसका बयान सीआरपीसी की धारा 161 के तहत दर्ज किया गया है, की अभियोजन पक्ष के गवाह के रूप में नहीं बल्कि बचाव में गवाह के रूप में जांच की जाती है, सीआरपीसी की धारा 162(1) का प्रावधान बिल्कुल भी लागू नहीं होता है, और अभियोजन पक्ष को धारा 161 के तहत परीक्षा के दौरान दर्ज किए गए अपने पिछले बयान के साथ बचाव पक्ष के गवाह का सामना करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
  • राधिका गुप्ता बनाम दर्शन गुप्ता, 2013 में मानसिक बीमारी के आधार पर पति पत्नी को तलाक देना चाहता था। उच्च न्यायालय ने इस मामले में कहा था कि महिला को पहले परीक्षा देना चाहिए, उसके बाद जिरह करनी चाहिए और उसके बाद उसे मेडिकल जांच की इजाजत दी जा सकती है। लेकिन, इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उसे पहले मेडिकल साक्ष्य देने की अनुमति दी जानी चाहिए और फिर मौखिक साक्ष्य देना चाहिए कि वह कैसे उपयुक्त है।

निष्कर्ष

पुलिस द्वारा गवाहों के परीक्षण को आपराधिक न्याय प्रणाली में एक आवश्यक चरण माना जाता है जिसमें कानून के विभिन्न प्रावधानों के माध्यम से मुकदमे शुरू होने से पहले गवाहों की जांच की जाती है।

पहले यह देखा जाता था कि गवाह स्वेच्छा से गवाही देते थे लेकिन आजकल कोई भी गवाह के रूप में पूछताछ के लिए आगे नहीं आता है और इसका सीधा सा कारण गवाहों के परीक्षण के दौरान पुलिस की बर्बरता और उत्पीड़न है।

यह सिक्के का एक पहलू है क्योंकि सभी पुलिस गवाहों की जांच करते समय एक जैसा काम नहीं करती हैं, उनमें से कई गवाहों से विनम्र तरीके से पूछताछ करते हैं जिसके कारण आजकल कुछ लोग पुलिस को गवाहों की जांच करने में भी मानते हैं।

इस पूरे विषय यानी गवाहों के परीक्षण पर मेरे विश्लेषण के अनुसार, मेरा कहना यह है कि गवाहों के परीक्षण के समय पुलिस की निगरानी करने वाली संस्थाएं और अधिक विनियमन (रेगुलेशन) और निगरानी होनी चाहिए। इससे निश्चित रूप से पुलिस की बिना किसी क्रूरता और अशिष्टता के गवाहों की जांच करने का एक बेहतर तरीका निकलेगा और यह कदम निश्चित रूप से निकट भविष्य में स्वैच्छिक गवाही का मार्ग प्रशस्त करेगा।

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