दमनकारी अभियोजन और उसकी अवैधता

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Criminal Law

यह लेख Gautam Badlani द्वारा लिखा गया है, जो चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, पटना के छात्र हैं। यह दमनकारी अभियोजन (स्टिफलिंग प्रॉसिक्यूशन) की प्रकृति की व्याख्या करता है और इसकी वैधता का व्यापक विश्लेषण प्रदान करता है। इस लेख में अभियोजन को बंद करने से संबंधित प्रासंगिक प्रावधानों और निर्णयों पर चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय 

आपराधिक मामलों में अक्सर ऐसा होता है कि अभियुक्त पीड़ित को आरोप वापस लेने और शिकायत वापस लेने के लिए मनाने की कोशिश करता है। कई मामलों में, पीड़ित को शिकायत वापस लेने के लिए आर्थिक और अन्य प्रोत्साहन भी दिए जाते हैं। इस प्रथा को दमनकारी अभियोजन के रूप में जाना जाता है। 

दमनकारी अभियोजन को न्याय वितरण प्रणाली के लिए हानिकारक माना जाता है क्योंकि यह घोर अपराधों के व्यापार को सुविधाजनक बनाता है। पीड़ित पर दबाव डालकर या उसे उकसाकर किसी व्यक्ति को न्याय प्रणाली से बच निकलने देना सामाजिक कल्याण के विरुद्ध है। 

दमनकारी अभियोजन के तरीके

दमनकारी अभियोजन का अर्थ है पीड़ित को अभियुक्त के खिलाफ मुकदमा न चलाने या मौजूदा अभियोजन जारी न रखने के लिए राजी करना। अभियोजन को दो प्राथमिक तरीकों से दमन किया जा सकता है: समझौते और धमकियाँ।

दमनकारी अभियोजन के लिए समझौते 

ऐसे समझौते जहां एक पक्ष दूसरे पक्ष के खिलाफ आपराधिक आरोपों को छोड़ने का वादा करने के बदले में दूसरे पक्ष को कुछ प्रतिफल (कंसीडरेशन) देने के लिए सहमत होता है, उसे दमनकारी अभियोजन के लिए समझौते के रूप में जाना जाता है। दमनकारी अभियोजन के लिए समझौते न्याय की सामान्य प्रक्रिया को नष्ट कर देते हैं। वे अभियोजन का अनुचित अंत करते हैं और इस प्रकार न्याय प्रशासन को पराजित करते हैं।  

उदाहरण के लिए, यदि A, B के साथ एक समझौता करता है जिसमें कहा गया है कि यदि B, A के खिलाफ आपराधिक आरोप नहीं लगाता है तो A अपना घर B को बेच देगा, तो ऐसा समझौता दमनकारी अभियोजन के समान होगा। 

धमकी

पीड़ितों और गवाहों को आपराधिक मुकदमा न चलाने की धमकी देना दमनकारी अभियोजन का एक और तरीका है। वरयाम सिंह बनाम साधु राम (1972) में, पुलिस अधिकारियों ने दमनकारी अभियोजन के उद्देश्य से गवाहों को धमकी दी। इसके बाद, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने पुलिस अधिकारियों को अदालत की अवमानना अधिनियम, 1952 के तहत दोषी पाया। पुलिस अधिकारियों ने दलील दी थी कि उनका मानना है कि गवाह झूठे थे। हालाँकि, अदालत ने बताया कि भले ही यह ऐसा मामला था जहाँ पुलिस अधिकारी गवाहों को झूठा मानते थे, उन्हें गवाहों को धमकाने का कोई काम नहीं था, और गवाहों की गवाही की सत्यता निर्धारित करना अदालत का काम था। इसके बाद, उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ एक अपील को सर्वोच्च न्यायालय ने भी खारिज कर दिया। 

दमनकारी अभियोजन की वैधता

कानूनी तौर पर दमनकारी अभियोजन की अनुमति नहीं है। दमनकारी अभियोजन के लिए समझौते को भारतीय कानून के तहत अवैध माना जाता है। इस तरह का समझौता न्याय प्रशासन को ही नष्ट कर देता है। हालाँकि, शमनीय (कॉग्निजेबल) अपराध के मामले में पक्ष समझौता कर सकते हैं, और इसलिए शमनीय अपराध दमनकारी अभियोजन के सिद्धांत का अपवाद हैं। 

दमनकारी अभियोजन समझौतों को अवैध माना जाता है क्योंकि वे न्याय के प्रशासन को न्यायिक प्रणाली के हाथों से छीन लेते हैं और इसे निजी व्यक्तियों के हाथों में सौंप देते हैं। अपराधों के खिलाफ सुरक्षा के अधिकार को मौद्रिक प्रतिफल के लिए माफ नहीं किया जा सकता है। 

हालाँकि, किसी मौजूदा दावे को पुनर्प्राप्त करने के लिए केवल कड़े शब्दों का उपयोग दमनकारी अभियोजन जैसा नहीं होगा। फ्लावर बनाम सैडलर [(1882) 10 क्यूबीडी 572] के मामले में, प्रतिवादी पर लेनदारों (वादी) का कुछ बकाया ऋण था। लेनदारों ने कड़ी भाषा का इस्तेमाल किया और बकाया भुगतान करने में विफल रहने पर प्रतिवादी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की धमकी दी। क्वीन की पीठ के समक्ष यह मुद्दा उठा कि क्या इस तरह की धमकी दमनकारी अभियोजन के समान है। लेनदार स्पष्ट रूप से पेशकश कर रहे थे कि यदि प्रतिवादी ने बकाया राशि का भुगतान कर दिया तो उस पर मुकदमा नहीं चलाया जाएगा। क्वीन की खंडपीठ ने कहा कि बकाया वसूलने के लिए ऋणदाता कड़ी भाषा का इस्तेमाल कर सकते हैं। भले ही लेनदारों ने बकाया प्राप्त करने के बाद प्रतिवादी पर मुकदमा नहीं चलाने का फैसला किया, यह दमनकारी अभियोजन जैसा नहीं होगा। 

दमनकारी अभियोजन का एक अन्य पहलू यह है कि यदि अभियुक्त और पीड़ित के बीच एक समझौता होता है, जिसके तहत अभियुक्त पीड़ित को कुछ प्रतिफल देने के लिए सहमत होता है, लेकिन पीड़ित अभियोजन वापस लेने का कोई पारस्परिक वादा नहीं करता है, तो दमनकारी अभियोजन के आधार पर ऐसा समझौता अमान्य नहीं होगा। यदि अभियुक्त इस उम्मीद में पीड़ित को कुछ मौद्रिक भुगतान करने के लिए सहमत होता है कि पीड़ित सद्भाव में अभियोजन को रोक सकता है, तो दमनकारी अभियोजन का सिद्धांत ऐसे समझौते पर असर नहीं डालेगा। कानून क्षतिपूर्ति करने वाले पक्ष की आशाओं और अपेक्षाओं को नियंत्रित नहीं करता है। दमनकारी अभियोजन का गठन करने के लिए, अभियोजन को रोकने का स्पष्ट वादा अनिवार्य है। 

वैध प्रतिफल

एक वैध अनुबंध की अनिवार्यताओं में से एक वैध प्रतिफल और उद्देश्य है। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 23 उन परिस्थितियों को परिभाषित करती है जिनके तहत कोई प्रतिफल या उद्देश्य गैरकानूनी माना जाएगा। धारा 23 के अनुसार, यदि न्यायालय अनुबंध के प्रतिफल या उद्देश्य को सार्वजनिक नीति के विरुद्ध मानता है, तो यह गैरकानूनी होगा। इस प्रकार, दमनकारी अभियोजन के लिए समझौते शून्य हैं। 

धारा 23 का चित्रण (h) दमनकारी अभियोजन का एक उदाहरण है। उदाहरण में कहा गया है कि यदि दो पक्ष हैं, A और B, और A, B के खिलाफ डकैती की शिकायत वापस लेने के लिए सहमत है यदि वह चोरी किए गए सामान के मूल्य को बहाल (रिस्टोर) करता है, तो ऐसी व्यवस्था को निर्धारित करने वाला अनुबंध गैरकानूनी होगा। ऐसे अनुबंध का उद्देश्य गैरकानूनी है।   

सार्वजनिक नीति

सार्वजनिक नीति के मामले के रूप में, यह वांछनीय है कि एक अपराधी को उसके द्वारा किए गए अपराधों के लिए दंडित किया जाए। ऐसे समझौतों में प्रवेश करना जो मौद्रिक या अन्य लाभों के बदले में आपराधिक आरोपों को दबाने का प्रावधान करते हैं, कानूनी रूप से निषिद्ध है। ऐसी प्रथा भारत की सार्वजनिक नीति के विरुद्ध है। 

प्रासंगिक मामले

सुरेश गणपति बनाम महाराष्ट्र राज्य (2017)

मामले के तथ्य

इस मामले में, आवेदकों को विद्युत (इलेक्ट्रिसिटी) अधिनियम, 2003 के तहत लगाए गए आरोपों का दोषी पाया गया और तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। इसके बाद आवेदकों ने एक समझौता आवेदन दायर किया और उच्च न्यायालय से मौद्रिक दायित्व के भुगतान के अधीन अपराध के समझौते की अनुमति देने की प्रार्थना की। 

मामले में शामिल मुद्दा

अदालत के समक्ष मुद्दा यह था कि क्या पक्षों द्वारा किए गए समझौते के आधार पर आवेदकों को अपराध से बरी किया जा सकता है। 

न्यायालय का निर्णय 

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने माना कि पक्षों के बीच समझौता केवल शमनीय अपराधों के संबंध में बरी होने का आधार हो सकता है, गैर-शमनीय अपराधों के संबंध में नहीं। यदि पीड़ित किसी गैर-शमनीय अपराध को शमन करने का प्रयास करता है, तो यह दमनकारी अभियोजन के सिद्धांत को आकर्षित करेगा। 

ओसेफ पाउलो बनाम कैथोलिक यूनियन बैंक लिमिटेड (1964)

ओसेफ पाउलो बनाम कैथोलिक यूनियन बैंक लिमिटेड (1964) में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यदि दो पक्षों के बीच एक समझौता किया जाता है जिसमें कहा गया है कि अभियुक्त द्वारा शिकायतकर्ता को इस वादे के बदले में एक निश्चित राशि का भुगतान किया जाएगा कि शिकायतकर्ता अभियुक्त के खिलाफ मुकदमा नहीं चलाएगा या मौजूदा अभियोजन को बंद कर देगा, तो ऐसा समझौता सार्वजनिक नीति के विरुद्ध होगा। 

यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन बनाम भारत संघ (1991)

मामले के तथ्य

सर्वोच्च न्यायालय ने यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन बनाम भारत संघ (1991) के मामले में दमनकारी अभियोजन के सिद्धांत पर विचार किया। यह मामला 1984 में यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन के भंडारण टैंक से घातक गैस के रिसाव के कारण भोपाल में हुई गैस त्रासदी से संबंधित है। त्रासदी के परिणामस्वरूप, निगम के विरुद्ध कई दावे किये गये। दावों को निपटाने के प्रयास में, यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन ने भारत संघ को 470 मिलियन अमेरिकी डॉलर का भुगतान करने की पेशकश की। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि राशि का भुगतान इसलिए किया गया ताकि भारत सरकार मौजूदा अभियोजन वापस ले ले और भविष्य में आपराधिक आरोप शुरू करने से इंकार करे।

मामले में शामिल मुद्दा

अदालत के समक्ष मुद्दा यह था कि क्या समझौता प्रस्ताव दमनकारी अभियोजन के सिद्धांत को आकर्षित करता है। 

न्यायालय का निर्णय 

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि भारत सरकार ने यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन को समझौता करने और पैसे की पेशकश करने के लिए मजबूर नहीं किया था। इस प्रकार, समझौते में दमनकारी अभियोजन का सिद्धांत शामिल नहीं था। 

न्यायालय ने आगे कहा कि यदि एक पक्ष इस बहाने से आपराधिक न्याय प्रणाली को गति देता है कि दूसरे पक्ष द्वारा एक गैर-शमनीय अपराध किया गया है और फिर अभियोजन का उपयोग दूसरे पक्ष को उसके साथ एक समझौते में प्रवेश करने के लिए मजबूर करने के लिए एक जबरदस्त उपाय के रूप में करता है, तो ऐसा प्रयास दमनकारी अभियोजन के सिद्धांत से प्रभावित होगा। ऐसा समझौता सार्वजनिक नीति के विपरीत है और इसलिए भारतीय न्यायशास्त्र (ज्यूरिस्प्रूडेंस) के तहत अमान्य है। 

न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि जहां आपराधिक आरोपों को हटाना मकसद है, लेकिन समझौते पर प्रतिफल नहीं, दमनकारी अभियोजन के सिद्धांत से समझौता अमान्य नहीं होगा। दमनकारी अभियोजन सिद्धांतों को आकर्षित करने के लिए आपराधिक आरोपों को हटाना समझौते पर प्रतिफल होना चाहिए। 

द्विजेंद्र नाथ मलिक बनाम गोपीराम गोविंदराम (1925)

मामले के तथ्य

द्विजेंद्र नाथ मलिक बनाम गोपीराम गोविंदराम (1925) में, प्रतिवादी पर आपराधिक विश्वासघात का आरोप लगाया गया था। प्रतिवादी ने वादी फर्म के लिए एक चेक भुनाया (एंकैश) था और बाद में यह बहाना बनाकर पुलिस स्टेशन पहुंचा था कि उसने भुनाए गए पैसे खो दिए हैं। पुलिस को प्रतिवादी की कहानी पर विश्वास नहीं हुआ और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। वादी फर्म ने प्रतिवादी पर आपराधिक विश्वासघात का आरोप लगाया था। 

इसके बाद, प्रतिवादी ने वादी फर्म को एक निश्चित राशि का भुगतान किया और अभियोजन वापस लेने की उम्मीद में वादी के साथ एक बंधक (मॉर्गेज) में प्रवेश किया। इसके बाद वादी फर्म ने शिकायत वापस लेने के लिए उपायुक्त (डेप्युटी कमिश्नर) के समक्ष याचिका दायर की। बाद में शिकायत वापस ले ली गई। 

हालाँकि, जब वादी फर्म ने प्रतिवादी द्वारा निष्पादित (एग्जिक्यूटेड) बंधक को लागू करने की कोशिश की, तो प्रतिवादी ने दलील दी कि चूंकि बंधक दमनकारी अभियोजन के उद्देश्य से दर्ज किया गया था, इसलिए यह लागू करने योग्य नहीं था। पक्षों के बीच समझौते में कोई वैध प्रतिफल नहीं था। 

मामले में शामिल मुद्दे

उच्च न्यायालय के समक्ष मुद्दा यह था कि क्या पक्षों के बीच समझौता अभियोजन समझौते को दमन करने जैसा है।

न्यायालय का निर्णय 

हालाँकि, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने माना कि बंधक भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 23 के तहत नहीं आया था। इस मामले में, प्रतिवादी द्वारा वादी पर ऋण बकाया था, और दमनकारी अभियोजन का सिद्धांत बकाया ऋण के मामलों पर लागू नहीं होता है। आपराधिक मुकदमा पुलिस अधिकारियों द्वारा शुरू किया गया था, न कि वादी द्वारा। इसके अलावा, वादी ने केवल आयुक्त (कमिश्नर) के समक्ष एक आवेदन दायर किया था, और यह आयुक्त ही थे जिन्होंने अभियोजन वापस लेने का फैसला किया था। इस प्रकार, समझौते में दमनकारी अभियोजन की चिंता नहीं थी। 

अपवाद

उन मामलों में दमनकारी अभियोजन की अनुमति है जहां संबंधित अपराध शमनीय प्रकृति का है। शमनीय अपराध वह है जहां पक्ष समझौता करने के लिए स्वतंत्र हैं। शमनीय अपराधों के उदाहरण छल, हमला और गलत कारावास हैं। 

हालाँकि, कुछ ऐसे अपराध हैं जिनके लिए पक्षों को समझौता करने की स्वतंत्रता नहीं है। गैर-शमनीय अपराधों के मामले में, पीड़ित अभियुक्त के साथ समझौता करके आरोप नहीं छोड़ सकता है। गैर-शमनीय  अपराध के उदाहरण हत्या, बलात्कार आदि हैं। 

उन मामलों में दमनकारी अभियोजन निषिद्ध है जहां अपराध एक सार्वजनिक अपराध है। हालाँकि, जहां कोई पक्ष सिविल उपचार के तहत नुकसान का दावा करने का हकदार है, वहां दमनकारी अभियोजन की अनुमति दी जा सकती है। 

सज़ा 

यदि कोई व्यक्ति दमनकारी अभियोजन के लिए कोई समझौता करता है, तो ऐसा समझौता कानून की दृष्टि से अमान्य माना जाता है। ऐसा समझौता लागू करने योग्य नहीं है, और अपराधी ऐसे समझौते पर भरोसा करके अपने दायित्व से बच नहीं पाएगा। ऐसे समझौते सार्वजनिक नीति के विरुद्ध हैं और इसलिए लागू करने योग्य नहीं हैं। 

निष्कर्ष 

दमनकारी अभियोजन एक अनैतिक आचरण है। एक बार जब किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप अदालत में साबित हो जाते हैं, तो ऐसे व्यक्ति को उसके अपराधों के लिए दंडित किया जाना चाहिए। उसे किसी समझौते में प्रवेश करके और पीड़ित को प्रोत्साहित करके आपराधिक दायित्व से बचने में सक्षम नहीं होना चाहिए। किसी अपराध का उपयोग आर्थिक लाभ कमाने के लिए नहीं किया जा सकता है। किसी भी सभ्य समाज में घोर अपराधों से बचने के लिए व्यापार का विषय नहीं हो सकती। 

आपराधिक कानून का उद्देश्य सुधार या केवल बहाली नहीं है। इस प्रकार, यदि अपराधी पीड़ित को कुछ मौद्रिक भुगतान करके आपराधिक दायित्व से बचने की कोशिश करता है, तो यह आपराधिक दायित्व के मूल उद्देश्य को विफल कर देगा। इससे न्याय प्रशासन विफल हो जाएगा क्योंकि आपराधिक दायित्व में निवारण (डिटेरेंस) का तत्व धुंधला हो जाएगा। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

कौन से समझौते सार्वजनिक नीति के विरूद्ध माने जाते हैं?

दमनकारी अभियोजन, एकाधिकार सृजन (मोनोपॉली क्रिएशन) और जयांशभागिता (चैंपर्टी) (जहां एक पक्ष मुकदमेबाजी में दूसरे पक्ष की सहायता करता है और नुकसान के एक हिस्से को प्रतिफल के रूप में दावा करता है) से संबंधित समझौतों को सार्वजनिक नीति के विरूद्ध माना जाता है। 

संदर्भ 

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