कोई प्रतिफल नहीं, कोई अनुबंध नहीं

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Indian Contract Act

यह लेख Anvita Bhardwaj द्वारा लिखा गया है, जो सिम्बायोसिस लॉ स्कूल, नोएडा से बी.ए. एलएलबी कर रही है। इस लेख में, लेखक ने एक वैध अनुबंध के एक अनिवार्य तत्व के रूप में प्रतिफल (कंसीडरेशन), उसके प्रकार और प्रकृति, और ऐतिहासिक कानूनी मामलों पर चर्चा की है। बिना किसी प्रतिफल के कोई अनुबंध नहीं, के नियम की इसके सभी अपवादों के साथ चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Shreya Prakash के द्वारा किया गया है।

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परिचय

क्या आपको एक वैध अनुबंध की अनिवार्यता याद है? आइए एक पुनश्चर्या (रिफ्रेशर) लें। एक वैध अनुबंध के निम्नलिखित आवश्यक तत्व हैं:

  • प्रस्ताव और स्वीकृति: एक अनुबंध तब बनता है जब एक पक्ष प्रस्ताव करता है और दूसरा पक्ष इसे स्वीकार करता है। प्रस्ताव स्पष्ट और विशिष्ट होना चाहिए, और स्वीकृति बिना शर्त होनी चाहिए और प्रस्तावकर्ता को सूचित किया जाना चाहिए।
  • अनुबंध करने की क्षमता: अनुबंध के दोनों पक्षों के पास समझौते में प्रवेश करने की कानूनी क्षमता होनी चाहिए। अवयस्क (माइनर), अस्वस्थ मस्तिष्क वाले व्यक्ति और अयोग्य व्यक्तियों को अनुबंध में प्रवेश करने में सक्षम नहीं माना जाता है।
  • मुक्त सहमति: अनुबंध के दोनों पक्षों को बिना किसी दबाव, अनुचित प्रभाव या धोखाधड़ी के स्वतंत्र रूप से अपनी सहमति देनी चाहिए।
  • कानूनी उद्देश्य: अनुबंध का उद्देश्य वैध होना चाहिए न कि सार्वजनिक नीति के विरुद्ध।
  • लेखन और पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन): कुछ प्रकार के अनुबंध, जैसे अचल संपत्ति के हस्तांतरण (ट्रांसफर) के अनुबंध, लिखित रूप में होने चाहिए और उचित अधिकारियों के साथ पंजीकृत होने चाहिए।
  • शून्य घोषित नहीं किया गया हो: अनुबंध अधिनियम के अनुसार यह शून्य घोषित किए गए अनुबंधों में से एक नहीं होना चाहिए।
  • प्रतिफल: अनुबंध कुछ मूल्य का होना चाहिए जो एक पक्ष द्वारा किसी और के बदले में दिया या वादा किया गया हो।

क्या आपने कभी सोचा है कि अनुबंध में प्रतिफल क्यों आवश्यक है? यह एक रुपये हो सक्ता है या हजार रुपये, प्रतिफल अधिकांश अनुबंधों का एक हिस्सा होता है, और यह हमेशा मौद्रिक नहीं होता है।

मान लीजिए कि आप अपनी कार किसी दोस्त को 8 लाख रुपये में बेचना चाहते हैं। आपका मित्र मूल्य से सहमत है और आपको राशि के लिए एक चेक लिखता है। बदले में आप कार की चाबी सौंप देते हैं। कार के लिए धन का यह आदान-प्रदान अनुबंध में प्रतिफल है, जो दर्शाता है कि दोनों पक्ष शर्तों से सहमत हैं और बदले में कुछ मूल्य प्राप्त कर रहे हैं। इस प्रतिफल के बिना, अनुबंध लागू करने योग्य नहीं होगा, और कोई भी पक्ष बिना किसी परिणाम के समझौते से बाहर हो सकता है।

हालाँकि, ऐसी कुछ स्थितियाँ हैं जहाँ प्रतिफल अनुबंध का अनिवार्य रूप से हिस्सा नहीं है, और यह अभी भी वैध और लागू करने योग्य है! आइए उन अपवादों को नियम “कोई प्रतिफल नहीं? कोई अनुबंध नहीं!”, के आलोक में देखें।

प्रतिफल क्या है

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 2(d) “प्रतिफल” को निम्नानुसार परिभाषित करती है:

“जब वचनकर्ता (प्रॉमिसर) की इच्छा पर, वचनग्रहीता (प्रोमिसी) या किसी अन्य व्यक्ति ने कुछ किया है या करने से विरत (एब्सटेन) रहा है, या करता है या करने से विरत रहता है, या कुछ करने या uttaविरत का वादा करता है, तो ऐसा कार्य या विरत वचन के लिए प्रतिफल कहलाता है। 

इसके अलावा, पोलक ने प्रतिफल को “वह कीमत जिसके लिए दूसरे का वादा खरीदा गया है, और इस प्रकार मूल्य के लिए दिया गया वादा लागू करने योग्य है” के रूप में परिभाषित किया है।

सरल शब्दों में, “प्रतिफल” का अर्थ किसी ऐसे मूल्य से है जो किसी वादे के बदले में दिया या वादा किया जाता है। यह मुआवज़ा या अनुबंध में शामिल पक्षों के बीच कुछ मूल्य का आदान-प्रदान है। एक अनुबंध को वैध माने जाने के लिए, इसमें प्रतिफल होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, कुछ ऐसा होना चाहिए जो पक्षों को किसी और चीज के बदले में दिया जा रहा हो या वादा किया जा रहा हो।

उदाहरण के लिए, यदि A एक निश्चित कीमत पर B को कार बेचने का वादा करता है, तो B द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत A के कार बेचने के वादे के लिए प्रतिफल है।

यह ध्यान देने योग्य है कि प्रतिफल या तो वचनकर्ता को लाभ या वचनग्रहीता को हानि हो सकता है। यह मौद्रिक या मूर्त (टैंजीबल) नहीं होना चाहिए; यह एक वादा, एक गतिविधि या कुछ करने से विरत भी हो सकता है।

प्रतिफल के प्रकार

कई प्रकार के प्रतिफल हैं जिनका उपयोग अनुबंधों में किया जा सकता है। ये निम्नलिखित हैं:

निष्पादित (एग्जिक्यूटेड) प्रतिफल

इस प्रकार का प्रतिफल किसी ऐसी चीज को संदर्भित करता है जो पहले से ही एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष के वादे के बदले में किया या दिया जा चुका है। उदाहरण के लिए, यदि A, B को एक पुस्तक के लिए 100 रु. देता है, तो वह A को पुस्तक देने के B के वादे के प्रतिफल के रूप में 100 रुपये निष्पादित किए जाते हैं।

निष्पादन संबंधी (एग्जिक्यूटरी) प्रतिफल

इस प्रकार का प्रतिफल किसी ऐसी चीज को संदर्भित करता है जिसे करने का वादा किया जाता है या एक पक्ष द्वारा दूसरी पक्ष के वादे के बदले में दिया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि A, B को अगले महीने एक किताब के लिए 100 रुपये देने का वादा करता है, तो वह 100 रुपये का भुगतान करने का वादा A को किताब देने के B के वादे के लिए निष्पादन संबंधी प्रतिफल है।

विगत (पास्ट) प्रतिफल

इस प्रकार का प्रतिफल किसी ऐसी चीज़ को संदर्भित करता है जो अनुबंध किए जाने से पहले किया गया था या दिया गया था, और इसे वैध प्रतिफल के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि A ने पिछले सप्ताह B को चलने में मदद की और B ने इसके लिए A को $100 देने का वादा किया, तो A द्वारा पिछले सप्ताह प्रदान की गई सहायता विगत प्रतिफल है और इसे वैध प्रतिफल के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है।

अवैध प्रतिफल

इस प्रकार का प्रतिफल कुछ ऐसा करने के वादे को संदर्भित करता है जो कानून द्वारा वर्जित/ दंडनीय है। उदाहरण के लिए, यदि A, B से वादा करता है कि वह $ 100 के बदले C को उसके घर में जिंदा जलाकर मार देगा, तो ऐसा करने का वादा अवैध प्रतिफल है।

भ्रमपूर्ण (इल्लूसरी) प्रतिफल

इस प्रकार का प्रतिफल एक ऐसे वादे को संदर्भित करता है जो कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि A, B से वादा करता है कि वह तब तक कुछ करेगा जब तक वह चाहता है, तो वादा एक भ्रमपूर्ण प्रतिफल है।

प्रतिफल व्यक्त या निहित किया जा सकता है। यह तब व्यक्त किया जाता है जब पक्ष प्रतिफल पर स्पष्ट रूप से सहमत होते हैं, और यह अनुबंध की परिस्थितियों से अनुमानित (इंफर) होने पर निहित होता है।

प्रतिफल की प्रकृति

प्रतिफल की प्रकृति उन विशेषताओं या गुणों को संदर्भित करती है जो इसे एक अनुबंध में वैध और लागू करने योग्य बनाती हैं। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872, प्रतिफल को “बदले में कुछ” के रूप में परिभाषित करता है, जिसका अर्थ है कि अनुबंध के वैध होने के लिए, पक्षों के बीच कुछ मूल्य का आदान-प्रदान होना चाहिए।

प्रतिफल की प्रकृति को निम्नानुसार वर्णित किया जा सकता है:

प्रतिफल वास्तविक होना चाहिए

इसका मतलब यह है कि प्रतिफल कुछ मूल्य का होना चाहिए जो एक वादे के बदले में दिया या वादा किया गया हो। यह भ्रमपूर्ण, अस्पष्ट या अनिश्चित नहीं हो सकता।

चिदंबरा अय्यर बनाम पी.एस. रेंगा अय्यर (1966) के मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अनुबंध कानून में प्रतिफल के मुद्दे से निपटा। इस मामले में चिदंबरम अय्यर और पी.एस. रेंगा अय्यर ने कुछ संपत्ति की बिक्री के लिए एक समझौता किया था। हालांकि, बिक्री नहीं हुई और चिदंबरा अय्यर ने अनुबंध के उल्लंघन के लिए रेंगा अय्यर पर मुकदमा दायर किया।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कानून की नजर में प्रतिफल का कुछ मूल्य होना चाहिए, लेकिन जरूरी नहीं कि यह व्यावसायिक मूल्य का हो। न्यायालय ने पाया कि रेंगा अय्यर (संपत्ति को हस्तांतरित करने का वादा) द्वारा दिया गया प्रतिफल पर्याप्त था और चिदंबरा अय्यर संपत्ति के लिए भुगतान की गई राशि को वसूलने के हकदार थे।

इस मामले को भारतीय अनुबंध कानून में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जाता है और इस सिद्धांत को स्पष्ट करता है कि प्रतिफल जरूरी नहीं कि व्यावसायिक मूल्य का हो, लेकिन कानून की नजर में कुछ मूल्य होना चाहिए। यह दोहराने के लिए भी इस्तेमाल किया गया है कि बिना प्रतिफल के किया गया वादा लागू करने योग्य नहीं है।

प्रतिफल कानूनी होना चाहिए

इसका मतलब यह है कि प्रतिफल कुछ ऐसा होना चाहिए जो अवैध या सार्वजनिक नीति के विरुद्ध न हो।

प्रतिफल पर्याप्त होना चाहिए

इसका मतलब यह है कि प्रतिफल एक निश्चित मूल्य या उपयोगिता का होना चाहिए। इसे बराबर होने की जरूरत नहीं है। हालांकि, यह उचित और पर्याप्त होना चाहिए।

वचनकर्ता के अनुरोध पर प्रतिफल दिया जाना चाहिए

इसका मतलब यह है कि प्रतिफल कुछ ऐसा होना चाहिए जो वचनकर्ता के अनुरोध पर दिया या वादा किया गया हो।

दुर्गा प्रसाद बनाम बलदेव (1879) का मामला एक अनुबंध में प्रतिफल के मुद्दे से संबंधित था। इस मामले में, दुर्गा प्रसाद और बलदेव ने एक समझौता किया जहां बलदेव कुछ संपत्ति के हस्तांतरण के बदले में दुर्गा प्रसाद के पैसे देने पर सहमत हुए। हालांकि, बलदेव सहमत राशि का भुगतान करने में विफल रहे, और दुर्गा प्रसाद ने उन पर मुकदमा दायर किया।

न्यायालय ने कहा कि प्रतिफल का कानून की दृष्टि में कुछ मूल्य होना चाहिए और कुछ ऐसा होना चाहिए जो वचनकर्ता (बलदेव) ने अपने वादे के बदले में प्राप्त किया हो। इस मामले में, अदालत ने पाया कि बलदेव द्वारा दिया गया प्रतिफल (पैसा चुकाने का वादा) पर्याप्त था, और वह अनुबंध से बंधे हुए थे। यह मामला इस सिद्धांत को स्थापित करता है कि प्रतिफल का कुछ मौद्रिक मूल्य होना चाहिए और वचनकर्ता को अपने वादे के बदले में कुछ प्राप्त होना चाहिए।

प्रतिफल को वचनग्रहीता से आना चाहिए

इसका मतलब यह है कि प्रतिफल कुछ ऐसा होना चाहिए जो वचनकर्ता के अनुरोध पर वचनग्रहीता द्वारा या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दिया या वादा किया गया हो।

कोई प्रतिफल नहीं, कोई अनुबंध नहीं का सिद्धांत

सिद्धांत “कोई प्रतिफल नहीं, कोई अनुबंध नहीं” का अर्थ है कि एक अनुबंध को वैध और लागू करने योग्य होने के लिए, इसमें शामिल पक्षों के बीच कुछ मूल्य का आदान-प्रदान होना चाहिए। इस आदान-प्रदान को “प्रतिफल” के रूप में जाना जाता है।

प्रतिफल एक अनुबंध का एक अनिवार्य तत्व है, और यह कई रूप ले सकता है। यह पैसा, सामान, सेवाएं या कुछ करने या न करने का वादा हो सकता है। अनिवार्य रूप से, प्रतिफल एक ऐसी चीज है जो एक पक्ष दूसरे पक्ष को किसी और चीज के बदले देता है या देने का वादा करता है। प्रतिफल के बिना, कोई अनुबंध नहीं होता है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति बदले में कुछ भी प्राप्त किए बिना एक घर को मुफ्त में पेंट करने का वादा करता है, तो कोई अनुबंध नहीं होता है क्योंकि कोई प्रतिफल नहीं है। हालांकि, अगर वही व्यक्ति भुगतान के बदले में घर को पेंट करने के लिए सहमत होता है, तो एक अनुबंध बनता है क्योंकि पक्षों के बीच एक प्रतिफल (भुगतान) का आदान-प्रदान होता है।

यह ध्यान देने योग्य है कि पक्षों के बीच प्रतिफल समान मूल्य का होना जरूरी नहीं है, लेकिन यह कुछ मूल्य का होना चाहिए। साथ ही, भारतीय अनुबंध कानून में विगत प्रतिफल या नैतिक प्रतिफल मान्य नहीं हैं।

संक्षेप में, प्रतिफल एक अनुबंध का एक महत्वपूर्ण तत्व है और वह है जो अनुबंध को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाता है। प्रतिफल के बिना, कोई अनुबंध नहीं होता है, और पक्षों द्वारा किए गए किसी भी वादे को अदालत में लागू नहीं किया जा सकता है।

कोई प्रतिफल नहीं, कोई अनुबंध नहीं के सिद्धांत के अपवाद

सिद्धांत “कोई प्रतिफल नहीं, कोई अनुबंध नहीं” अनुबंध कानून का एक मौलिक सिद्धांत है, जो बताता है कि एक अनुबंध को वैध और लागू करने योग्य होने के लिए, इसमें शामिल पक्षों के बीच कुछ मूल्य का आदान-प्रदान होना चाहिए। हालाँकि, इस सिद्धांत के कुछ अपवाद हैं। इन पर नीचे चर्चा की गई है।

धारा 25

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 25, इस नियम के लिए प्रदान करती है कि “प्रतिफल के बिना समझौता शून्य है सिवाय जबकि वह लिखित तथा पंजीकृत हो, या की गई किसी बात के लिए प्रतिकार देने का वचन हो, या सीमा कानून द्वारा वर्जित किसी ऋण के भुगतान करने का वादा हो।”

यह धारा बताती है कि बिना प्रतिफल के कोई समझौता तब तक शून्य है जब तक कि वह कुछ शर्तों को पूरा नहीं करता। उदाहरण के लिए, अतीत में किए गए किसी काम की भरपाई के लिए एक समझौता या एक ऋण का भुगतान करने का समझौता जो कि सीमा अधिनियम द्वारा वर्जित है, बिना किसी प्रतिफल, कोई अनुबंध नहीं होने के नियम के अपवाद हैं।

यहां कुछ उदाहरण दिए गए हैं कि धारा 25 कैसे लागू हो सकती है:

  • A, B को वह धनराशि देने का वचन देता है जो B ने 10 वर्ष पहले A को उधार दी थी। भले ही ऋण 10 साल पहले दिया गया था और सीमा अधिनियम द्वारा वर्जित है, भुगतान करने का A का वादा धारा 25 के तहत अभी भी लागू हो सकता है।
  • C, एक दुकानदार, D, एक ग्राहक को उस माल के लिए भुगतान करने का वादा करता है, जो D ने C की दुकान से एक महीने पहले खरीदा था। भले ही माल एक महीने पहले खरीदा गया था और D ने कोई कार्य नहीं किया है या बदले में कोई सेवा प्रदान नहीं की है, C का वादा अभी भी धारा 25 के तहत लागू हो सकता है।

यह ध्यान देने योग्य है कि धारा 25 के तहत बिना प्रतिफल के एक समझौते को लागू करने के लिए, यह लिखित और पंजीकृत होना चाहिए। इस आवश्यकता का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समझौते का एक लिखित रिकॉर्ड है, जिसे विवाद के मामले में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

संक्षेप में, भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 25 में कहा गया है कि बिना प्रतिफल के एक समझौता तब तक शून्य है जब तक कि यह कुछ शर्तों को पूरा नहीं करता है, जैसे कि लिखित और पंजीकृत होना, जो कुछ किए गए क्षतिपूर्ति (इंडेम्निटी) का वादा है, या सीमा कानून द्वारा वर्जित ऋण भुगतान करने का वादा है।

स्वाभाविक प्रेम और स्नेह

सिद्धांत “कोई प्रतिफल नहीं, कोई अनुबंध नहीं” कहता है कि एक अनुबंध को वैध और लागू करने योग्य होने के लिए, इसमें शामिल पक्षों के बीच कुछ मूल्य का आदान-प्रदान होना चाहिए। हालाँकि, इस सिद्धांत के कुछ अपवाद हैं, उनमें से एक “स्वाभाविक प्रेम और स्नेह” है, जो बिना किसी प्रतिफल, कोई अनुबंध नहीं होने के नियम का अपवाद है।

स्वाभाविक प्रेम और स्नेह परिवार के सदस्यों, जैसे माता-पिता और बच्चों, भाई-बहनों और पति-पत्नी के बीच भावनात्मक बंधन को दर्शाता है। जब कोई अनुबंध स्वाभाविक प्रेम और स्नेह के आधार पर किया जाता है, तो प्रतिफल न होने पर भी इसे बाध्यकारी माना जाता है।

उदाहरण के लिए, यदि A स्वाभाविक प्रेम और स्नेह के आधार पर उपहार के रूप में B, A के बच्चे को भूमि का एक टुकड़ा हस्तांतरित करने का वादा करता है, तो इसमें कोई प्रतिफल नहीं है, लेकिन यह अभी भी एक वैध अनुबंध है।

यह ध्यान देने योग्य है कि प्राकृतिक प्रेम और स्नेह पर आधारित समझौते को लागू करने के लिए, यह लिखित और पंजीकृत होना चाहिए। इस आवश्यकता का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समझौते का एक लिखित रिकॉर्ड है, जिसे विवाद के मामले में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872, जो भारत में अनुबंध कानून को नियंत्रित करता है, विशेष रूप से प्राकृतिक प्रेम और स्नेह का उल्लेख नहीं करता है, जो कि बिना किसी अनुबंध के नियम के अपवाद के रूप में है। हालाँकि, अदालतों ने कुछ मामलों में इस अपवाद को मान्यता दी है।

अंत में, प्यार और स्नेह इस नियम के अपवाद हैं कि यदि कोई प्रतिफल नहीं है, तो कोई अनुबंध नहीं है। इसका मतलब यह है कि परिवार के सदस्यों के बीच समझौते बाध्यकारी हो सकते हैं भले ही इसमें कोई प्रतिफल न हो। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि समझौता लिखित रूप में होना चाहिए और लागू करने के लिए पंजीकृत होना चाहिए।

वचन विबंधन (प्रोमिसरी एस्टॉपल)

यह सिद्धांत मानता है कि एक वादा, हालांकि प्रतिफल द्वारा समर्थित नहीं है, को लागू किया जा सकता है यदि वचनकर्ता को यथोचित रूप से वादे पर भरोसा करने की अपेक्षा करनी चाहिए और यदि वचनकर्ता वास्तव में अपने नुकसान के वादे पर भरोसा करता है। उदाहरण के लिए, यदि A, B से वादा करता है कि वह B को भूमि का एक टुकड़ा हस्तांतरित करेगा और B, उस वादे के भरोसे पर भूमि को बेहतर बनाने के लिए खर्च करता है, तो A को वादे के लिए प्रतिफल के अस्तित्व को नकारने से रोका जा सकता है।

मुहरबंद (सील के तहत) अनुबंध

मुहरबंद अनुबंध, जिसे औपचारिक (फॉर्मल) अनुबंध या विशेष अनुबंध के रूप में भी जाना जाता है, ऐसे अनुबंध होते हैं जिन्हें मुहर के तहत निष्पादित किया जाता है और बिना किसी प्रतिफल के बाध्यकारी माना जाता है। उदाहरण के लिए, A और B के बीच मुहर के तहत निष्पादित अनुबंध को बाध्यकारी माना जाएगा, भले ही इसमें कोई प्रतिफल न हो।

विगत स्वैच्छिक सेवाएं

विगत की स्वैच्छिक सेवाएं उन सेवाओं को संदर्भित करती हैं जो विगत में स्वेच्छा से और मुफ्त में की गई थीं और जिसके लिए बाद में मुआवजे का वादा किया गया था। जब कोई अनुबंध विगत स्वैच्छिक सेवाओं के आधार पर दर्ज किया जाता है, तो इसे बाध्यकारी माना जाता है, भले ही सेवाओं के प्रदान किए जाने के समय कोई प्रतिफल न हो।

उदाहरण के लिए, यदि A स्वेच्छा से B के बुजुर्ग माता-पिता की एक वर्ष तक देखभाल करता है और B बाद में मुआवजे के रूप में A को एक राशि का भुगतान करने का वादा करता है, तो सेवाओं के प्रदान किए जाने पर कोई प्रतिफल नहीं किया गया था, लेकिन अनुबंध अभी भी वैध है क्योंकि अब भुगतान किया जा रहा है।

यह ध्यान देने योग्य है कि पिछली स्वैच्छिक सेवाओं पर आधारित समझौते को लागू करने योग्य बनाने के लिए, यह लिखित और पंजीकृत होना चाहिए। इस आवश्यकता का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समझौते का एक लिखित रिकॉर्ड है, जिसे विवाद के मामले में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872, जो भारत में अनुबंध कानून को नियंत्रित करता है, विशेष रूप से अतीत की स्वैच्छिक सेवाओं का उल्लेख नहीं करता है, जो बिना किसी अनुबंध के नियम के अपवाद के रूप में है। हालाँकि, अदालतों ने कुछ मामलों में इस अपवाद को मान्यता दी है।

सेंट्रल इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम ब्रोजो नाथ गांगुली (1986) के मामले में पिछली स्वैच्छिक सेवाओं के मुद्दे और वचन विबंधन के सिद्धांत के साथ निपटा। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि पिछली स्वैच्छिक सेवाएं एक अनुबंध के लिए एक वैध प्रतिफल हो सकती हैं और वचन विबंधन के सिद्धांत को अनुबंध की शर्तों के लिए वचनकर्ता को पकड़ने के लिए लागू किया जा सकता है।

बिना किसी प्रतिफल, कोई अनुबंध नहीं के सिद्धांत के अपवाद के रूप में समय-बाधित ऋण का भुगतान करने का वादा

एक समय बाधित ऋण एक ऐसे ऋण को संदर्भित करता है जो सीमा अधिनियम, 1963 द्वारा निर्धारित सीमाओं के क़ानून से परे है, और इस प्रकार कानूनी कार्रवाई के माध्यम से लागू नहीं किया जा सकता है। हालांकि, अगर देनदार स्वेच्छा से इस तरह के कर्ज का भुगतान करने का वादा करता है, तो यह लागू हो सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि A ने 10 साल पहले B से पैसा उधार लिया था और ऋण की सीमाओं का क़ानून समाप्त हो गया है, तो B कानूनी रूप से ऋण को लागू नहीं कर सकता है। लेकिन अगर A स्वेच्छा से ऋण का भुगतान करने का वादा करता है, तो कोई प्रतिफल न होते हुए भी एक अनुबंध बनता है।

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 25, इस अपवाद के लिए प्रदान करती है और कहती है कि एक समय-बाधित ऋण का भुगतान करने के लिए प्रतिफल के बिना एक समझौता शून्य नहीं है, लेकिन लागू करने योग्य है।

एजेंसी का निर्माण

एक एजेंसी दो पक्षों के बीच एक संबंध है जिसमें एक पक्ष (प्रिंसिपल) दूसरे पक्ष (एजेंट) को अपनी ओर से कार्य करने के लिए अधिकृत (ऑथराइज) करता है। एक एजेंसी समझौते में, एजेंट को प्रिंसिपल की ओर से कुछ कार्यों को करने के लिए नियुक्त किया जाता है, और एजेंट के कार्यों से प्रिंसिपल बाध्य होता है।

उदाहरण के लिए, A, प्रिंसिपल, B, एजेंट को A की संपत्ति बेचने के लिए नियुक्त करता है। भले ही जब एजेंसी समझौता किया जाता है तो कोई प्रतिफल नहीं होता है, अनुबंध अभी भी बाध्यकारी है क्योंकि एजेंट प्रिंसिपल की ओर से कार्य करने के लिए अधिकृत है, और प्रिंसिपल एजेंट के कार्यों से बाध्य है।

यह ध्यान देने योग्य है कि एक एजेंसी समझौते को लागू करने योग्य होने के लिए, यह लिखित और पंजीकृत होना चाहिए। इस आवश्यकता का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समझौते का एक लिखित रिकॉर्ड है, जिसे विवाद के मामले में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

उपहार

एक उपहार एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को बिना किसी प्रतिफल के संपत्ति का स्वैच्छिक हस्तांतरण है। दूसरे शब्दों में, जब कोई व्यक्ति उपहार देता है, तो बदले में कुछ भी प्राप्त किए बिना, वे ऐसा स्वतंत्र रूप से करते हैं। भले ही कोई प्रतिफल न हो, फिर भी एक उपहार को एक वैध अनुबंध माना जाता है।

उदाहरण के लिए, यदि A, B को उपहार के रूप में एक कार देता है, तो यहां कोई प्रतिफल नहीं है, लेकिन यह अभी भी एक वैध अनुबंध है।

यह ध्यान देने योग्य है कि एक उपहार को लागू करने योग्य होने के लिए, इसे स्वेच्छा से और बिना किसी दबाव या अनुचित प्रभाव के बनाया जाना चाहिए। साथ ही, उपहार देने का इरादा होना चाहिए, और उपहार प्राप्त करने वाले द्वारा इसे स्वीकार किया जाना चाहिए।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 के तहत उपहारों को अनुबंध नहीं माना जाता है। हालाँकि, उपहारों को संपत्ति का हस्तांतरण माना जाता है और यह भारतीय संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 द्वारा शासित होते हैं।

नोट: उपहार संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 122 द्वारा शासित होते हैं। यह धारा संपत्ति के वैध उपहार के लिए आवश्यकताओं और औपचारिकताओं को निर्धारित करती है। इस धारा के लिए आवश्यक है कि एक उपहार स्वेच्छा से और बिना प्रतिफल के दिया जाए और इसे प्राप्त करने वाले द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए। उपहार लिखित रूप में होना चाहिए, उपहार देने वाले के द्वारा या उसकी ओर से हस्ताक्षरित होना चाहिए, और कम से कम दो गवाहों द्वारा प्रमाणित होना चाहिए। धारा यह भी प्रदान करती है कि उपहार देने वाले के द्वारा संपत्ति का कब्जा उपहार लेने वाले को देने से पहले किसी भी समय रद्द किया जा सकता है।

उपनिधान (बेलमेंट)

उपनिधान एक कानूनी संबंध है जब एक पक्ष (उपनिहीति) (बेली) को किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए किसी अन्य पक्ष (उपनिधता) (बेलर) के स्वामित्व वाली संपत्ति का कब्जा और नियंत्रण सौंपा जाता है। उपनिधान में, प्रतिफल का कोई आदान-प्रदान नहीं होता है, लेकिन फिर भी इसे एक वैध अनुबंध माना जाता है।

उदाहरण के लिए, यदि A, B को A की कार की मरम्मत के उद्देश्य से उसका कब्जा और नियंत्रण सौंपता है, तो यहां कोई प्रतिफल नहीं है, लेकिन अनुबंध अभी भी वैध है।

यह ध्यान देने योग्य है कि उपनिधान को लागू करने योग्य होने के लिए, इसे स्वेच्छा से और बिना किसी जबरदस्ती या अनुचित प्रभाव के बनाया जाना चाहिए। इसके अलावा, एक उपनिधान बनाने का इरादा होना चाहिए, और पक्ष द्वारा उपनिधान को स्वीकार किया जाना चाहिए।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 के तहत, एक उपनिधान को एक विशेष अनुबंध माना जाता है और धारा 148 – 181 के द्वारा शासित होता है।

दान

दान का तात्पर्य बदले में कुछ भी प्राप्त किए बिना संगठनों या व्यक्तियों को धन, सामान या सेवाएं देने के कार्य से है। दूसरे शब्दों में, जब कोई व्यक्ति धर्मार्थ (चेरिटेबल) दान करता है, तो वे बिना कोई प्रतिफल प्राप्त किए स्वतंत्र रूप से ऐसा करते हैं। हालांकि कोई प्रतिफल नहीं है, फिर भी एक धर्मार्थ दान को एक वैध अनुबंध माना जाता है।

उदाहरण के लिए, यदि A किसी धर्मार्थ संगठन को पैसा देता है, तो कोई प्रतिफल नहीं होता है, लेकिन यह अभी भी एक वैध अनुबंध है।

यह ध्यान देने योग्य है कि किसी दान को लागू करने योग्य होने के लिए, इसे स्वेच्छा से और बिना किसी दबाव या अनुचित प्रभाव के बनाया जाना चाहिए। साथ ही, धर्मार्थ दान करने का इरादा होना चाहिए, और दान प्राप्त करने वाले द्वारा इसे स्वीकार किया जाना चाहिए।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 के तहत धर्मार्थ दान को अनुबंध नहीं माना जाता है। हालांकि, धर्मार्थ दान को उपहार का एक रूप माना जाता है और यह भारतीय संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 द्वारा शासित होता है।

निष्कर्ष

अनुबंधों की अखंडता (इंटीग्रिटी) और संविदात्मक दायित्वों की कानूनी निश्चितता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिफल एक महत्वपूर्ण कारक है। अंत में, “कोई प्रतिफल नहीं, कोई अनुबंध नहीं” का नियम अनुबंध कानून का एक मूलभूत सिद्धांत है, जो मानता है कि कानूनी रूप से लागू होने के लिए एक अनुबंध में प्रतिफल होना चाहिए। प्रतिफल कुछ ऐसे मूल्य को संदर्भित करता है जो पक्षों के बीच एक अनुबंध के लिए आदान-प्रदान किया जाता है। प्रतिफल की आवश्यकता यह सुनिश्चित करती है कि दोनों पक्षों ने अनुबंध के बदले में कुछ मूल्य दिया है और अनुबंध के लिए एक कानूनी आधार प्रदान करता है। प्रतिफल की अनुपस्थिति एक अनुबंध को शून्य और अप्रवर्तनीय बना सकती है। हालाँकि, इस नियम के अपवाद हैं, और उन्हें पहले ही ऊपर विस्तार से बताया जा चुका है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफ.ए.क्यू.)

एक अनुबंध में प्रतिफल क्यों महत्वपूर्ण है?

प्रतिफल एक अनुबंध के लिए कानूनी आधार प्रदान करता है, और इसे बाध्यकारी और लागू करने योग्य बनाता है। एक अनुबंध की वैधता निर्धारित करने में प्रतिफल एक महत्वपूर्ण कारक है। कुछ कानूनी अपवादों को छोड़कर, प्रतिफल के बिना एक अनुबंध को शून्य और अप्रवर्तनीय माना जाता है। यह सुनिश्चित करके अनुचित समझौतों से बचाने में मदद करता है कि दोनों पक्षों को अनुबंध के बदले में कुछ मूल्य दिया गया है। प्रतिफल प्रत्येक पक्ष को अनुबंध के अपने पक्ष को पूरा करने के लिए एक कानूनी दायित्व देता है। प्रतिफल किए बिना, किसी भी पक्ष को अपने दायित्वों को निभाने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं हो सकता है।

संदर्भ

 

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