भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत लास्ट सीन सिद्धांत

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Indian Evidence Act

यह लेख यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज, पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ की छात्रा Pranjali Aggarwal ने लिखा है। यह लेख परिस्थितिजन्य साक्ष्य (सर्कमस्टेंशियल एविडेंस), भारतीय कानून के तहत लास्ट सीन सिद्धांत, इससे संबंधित महत्वपूर्ण मामले और अन्य देशों में जहां इस सिद्धांत का उपयोग किया जाता है, की व्याख्या करता है। इस लेख का अनुवाद Sameer Choudhary द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

जैसा कि रामानंद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (1981) के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उद्धृत (कोट) किया गया है कि ‘इस अपूर्ण दुनिया में शायद ही कभी सही प्रमाण हो और पूर्ण निश्चितता एक मिथक है’। परिस्थितिजन्य साक्ष्य की अवधारणा इसलिए उत्पन्न होती है क्योंकि प्रत्येक मामले में प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं मिल पाते है इसलिए न्यायालय को मामले पर निर्णय लेने के लिए परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर निर्भर रहना पड़ता है। लास्ट सीन सिद्धांत भी इसी पर आधारित है जैसे कुछ आपराधिक मामलों में जहां कोई प्रत्यक्ष या ठोस सबूत नहीं होता है कि अपराध कैसे किया गया है या किसने अपराध किया है तो मामले का फैसला करने का अंतिम उपाय मामले की परिस्थितियों पर आधारित यह सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति मृतक के साथ उसकी मृत्यु से ठीक पहले या उसकी मृत्यु की उचित अवधि के भीतर इस प्रकार से अंतिम बार देखा जाता है कि उनके बीच कोई अन्य व्यक्ति हस्तक्षेप नहीं कर सकता है, तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह (वह व्यक्ति जिसे अंतिम बार देखा गया था) अपराध का रचयिता है। और इस प्रकार इस तथ्य को नकारने के लिए सबूत का भार उस पर आ जाता है और यदि वह अपनी बेगुनाही के बारे में स्पष्ट और पर्याप्त स्पष्टीकरण देने में सक्षम नहीं है तो अनुमान और भी मजबूत हो जाता है।

भारतीय कानून के तहत परिस्थितिजन्य साक्ष्य

परिस्थितिजन्य साक्ष्य शब्द को पीटर मर्फी ने “ऐसे साक्ष्य के रूप में परिभाषित किया है जिससे वांछित (डिजायर्ड) निष्कर्ष निकाला जा सकता है, लेकिन इसके लिए न केवल प्रस्तुत साक्ष्य को स्वीकार करने के लिए तथ्य के न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) की आवश्यकता होती है, बल्कि इससे एक प्रभाव भी आकर्षित होता है”। परिस्थितिजन्य साक्ष्य के कई उदाहरण हो सकते हैं जैसे – मृतक को A द्वारा मौत की धमकी, अपराध करने से पहले A को अजीब व्यवहार करते देखा गया था। भारत में परिस्थितिजन्य साक्ष्य शब्द का प्रयोग पहली बार सर जेम्स स्टीफन ने किया था यह कहते हुए कि ये तथ्य अन्य तथ्यों पर निर्भर करते हैं और ये मौजूद होते हैं यदि यह साबित हो जाता है कि अन्य तथ्य मौजूद थे। इसका मतलब यह है कि पहले से मौजूद तथ्य के आधार पर उचित विवेकपूर्ण व्यक्ति के अनुसार अनुमान लगाया जाता है जो पहले ही साबित हो चुका है। निकाला गया निष्कर्ष सही या गलत हो सकता है। 

उदाहरण के लिए – यदि हम किसी व्यक्ति को खून से सने कपड़ों सहित उस कमरे से भागते हुए देखते हैं जहाँ एक मृत शरीर पड़ा है, तो कोई यह अनुमान लगा सकता है कि उसने हत्या की या अन्य अनुमान लगाया जा सकता है कि उसने उस व्यक्ति की मदद करने की कोशिश की। इस प्रकार, परिस्थितिजन्य साक्ष्य तब तक पूर्ण अपराध स्थापित नहीं करते जब तक कि प्रत्येक साक्ष्य किसी आरोपी की बेगुनाही को नकार न दे। मामले के तथ्यों और परिस्थितियों की पूरी श्रृंखला इतनी पूर्ण होनी चाहिए जिससे मुख्य तथ्य के कानूनी अस्तित्व अनुमानित किये जा सकें या उनका अनुमान लगाया जा सके और आरोपी के अपराध के बारे में अदालत के दिमाग में कोई संदेह, अनुमान नहीं होना चाहिए तो व्यक्ति ठीक वैसे ही दोषी ठहराया जा सकता है जैसे हरियाणा राज्य बनाम जगबीर सिंह (2003)  के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उल्लिखित परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोषी ठहराया गया है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के तहत परिस्थितिजन्य साक्ष्य शब्द का प्रयोग सीधे तौर पर नहीं बल्कि धारा 3 में किया गया है। ‘सिद्ध’ शब्द की परिभाषा में उल्लेख है कि यदि किसी तथ्य का अस्तित्व इतना संभावित है कि विवेकपूर्ण व्यक्ति इसे अस्तित्व में मानता है तो उस तथ्य को सिद्ध माना जाता है। इसका तात्पर्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य की स्वीकार्यता से है जो भारतीय कानून में तार्किक (लॉजिकल) अनुमानों पर आधारित है। प्रत्यक्ष साक्ष्य और परिस्थितिजन्य साक्ष्य समान हैं यदि घटनाओं की पूरी श्रृंखला सामूहिक रूप से आरोपी के अपराध की ओर इशारा करती है। यदि कोई संदेह है कि आरोपी निर्दोष है या घटनाओं की श्रृंखला पूरी नहीं है तो संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाएगा क्योंकि कानून में एक अनुमान है कि दोषी साबित होने तक प्रत्येक व्यक्ति निर्दोष है। 

परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर निर्णय कब दिया जा सकता है?

जैसा कि सुदामा पांडे बनाम बिहार राज्य (2001) के मामले में निर्णय लिया गया था, परिस्थितिजन्य साक्ष्य की सहायता से मामले को साबित करने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए:

  • जिन परिस्थितियों से निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं, उन्हें पूरी तरह से साबित किया जाना चाहिए कि वे मौजूद थी।
  • सभी तथ्य जो सिद्ध किए जा रहे हैं, आरोपी के दोष की परिकल्पना का समर्थन करते हैं।
  • परिस्थितियों की श्रृंखला अच्छी तरह से जुड़ी और पूर्ण होनी चाहिए ताकि यह निर्णायक हो। 
  • परिस्थितियों को आरोपी के निर्दोष होने की हर संभावना को खत्म कर देना चाहिए।

लास्ट सीन सिद्धांत

इस सिद्धांत की नींव संभाव्यता (फिसिबिलिटी), कारण और संबंध के सिद्धांत पर है क्योंकि कोई भी तथ्य अलगाव में नहीं होता है। मूल रूप से, इसका अर्थ है कि यदि कोई घटना होती है तो अन्य घटनाएं भी होती हैं जो किसी बड़ी घटना के संभावित परिणाम होते हैं या इससे पूर्वव्यापी (रेट्रोस्पेक्टिव) या संभावित रूप से संबंधित होती हैं। इन अनुमानों को तार्किक रूप से इस आधार पर तैयार किया जाता है कि कैसे एक उचित विवेकपूर्ण व्यक्ति विशेष परिदृश्य में बिंदुओं को जोड़ता है।

यह सिद्धांत भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 7 से अपनी प्रासंगिकता प्राप्त करता है जिसे “आगमनात्मक (इंडक्टिव) तर्क का सिद्धांत” कहा जाता है जिसमें यह कहा गया है कि यदि अवसर, कारण या प्रभाव से संबंधित कोई तथ्य उस परिस्थिति की ओर ले जाता है जिसमें वह बात हुई थी या यह उस चीज़ के घटित होने का अवसर प्रदान करता है तो वे तथ्य प्रासंगिक होंते है। और लास्ट सीन सिद्धांत में भी वह व्यक्ति जो पीड़ित के साथ आखिरी बार उपस्थित था, उसे अपराध करने का उचित अवसर मिला है।

तथ्य का यह अनुमान भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के तहत लिया जाता है जिसके तहत अदालत यह मान सकती है कि कुछ तथ्य मौजूद हैं यदि प्राकृतिक घटनाओं, मानव आचरण और सार्वजनिक और निजी व्यवसाय के मामलों में कुछ अन्य तथ्य मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, यदि A अपनी हत्या से ठीक पहले B के साथ देखा गया आखिरी व्यक्ति था तो यह माना जा सकता है कि A ने इस सिद्धांत के तहत B की हत्या कर दी क्योंकि A के पास अपराध करने का पर्याप्त अवसर था। लेकिन इस अनुमान को व्यक्ति के अपराध के लिए निर्णायक सबूत नहीं माना जाता है और इन अनुमानों का आरोपी द्वारा खंडन किया जा सकता है। यह केवल व्यक्ति को यह साबित करने की जिम्मेदारी देता है कि वह निर्दोष है जो आपराधिक कानून में एक अपवाद है क्योंकि वूलमिंगटन बनाम लोक अभियोजन निदेशक (1935) के  मामले में निर्धारित सिद्धांत के अनुसार आरोपी के अपराध को साबित करने का भार अभियोजन पर था। इस मामले में, पीड़ित के साथ आखिरी बार देखे जाने के दौरान हुई घटनाओं को उसके द्वारा विशेष रूप से जाना जाता है क्योंकि यह कानून भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत निर्धारित किया गया है जहां तथ्य को साबित करने का भार उस व्यक्ति पर है जो विशेष रूप से उस विशेष तथ्य या परिस्थिति के बारे में जानता है।

हालांकि लास्ट सीन सिद्धांत अदालत को अपराध साबित करने के बोझ से मुक्त करता है, फिर भी यह कमजोर सबूत है और इसे अन्य कारकों के साथ पुष्टि करने की आवश्यकता है जैसे कि मृतक के साथ आखिरी बार देखे गए व्यक्ति के पास कोई मकसद था या वह उसने इस तरह की चोट पहुंचाई जो मौत का कारण बनी। जसवंत गिर बनाम पंजाब राज्य (2005) के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह माना गया था कि यदि सिद्धांत की पुष्टि के लिए अन्य परस्पर कड़ियां मौजूद नहीं हैं तो केवल इस सिद्धांत के आधार पर दोषी ठहराना सुरक्षित नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि एक बूढ़ी औरत, जो स्वयं ठीक से चलने में सक्षम नहीं है, को अंतिम बार मृतक के साथ देखा गया था और मृतक की मृत्यु चाकू से लगी कई चोटों के कारण हुई थी। तो इस मामले में, कोई भी तर्कसंगत रूप से विश्वास नहीं कर सकता है कि बूढ़ी औरत ने हत्या की थी, हालांकि यह साबित हो जाएगा कि उसे आखिरी बार देखा गया था लेकिन उसे दोषी मानना ​​तर्कसंगत नहीं होगा। तो इस प्रकार अंतिम बार देखे गए तथ्य को अन्य कारकों द्वारा भी समर्थित किया जाना चाहिए ताकि परिस्थितियां प्रकृति में निर्विवाद रूप से निर्धारक (डिटरमाइनर) हों और निर्णायक रूप से व्यक्ति के अपराध को साबित करें। इस प्रकार के मामलों पर निर्णय लेते समय न्यायालय को सतर्क रहने की आवश्यकता है क्योंकि सूक्ष्म विवरण भी मामले के पूरे परिदृश्य को बदल सकता है।

व्यक्ति अपनी बेगुनाही साबित करके कैसे लास्ट सीन सिद्धांत का खंडन कर सकता है?

यह आवश्यक नहीं है कि आरोपी व्यक्ति को हमेशा तब दोषी माना जाए जब यह स्थापित हो जाए कि उसे अंतिम बार उस व्यक्ति के साथ देखा गया था। उसे इस धारणा का खंडन करने का एक उचित मौका दिया जाता है क्योंकि यह आवश्यक नहीं है कि वही स्थिति मौजूद हो जिसे न्यायालय ने तर्क के आधार पर अनुमान लगाया था क्योंकि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। सतपाल सिंह बनाम हरियाणा राज्य  (2018) के मामले में ये कुछ बचाव हैं जिन्हें आरोपी द्वारा अनुमान को खारिज करने के लिए लिया जा सकता है क्योंकि लास्ट सीन सिद्धांत सबूत का एक मजबूत टुकड़ा नहीं है: –

  • यदि आरोपी यह साबित कर सकता है कि अपराध किए जाने के समय वह दूसरे व्यक्ति के साथ था, तो उसका अपराध सिद्ध नहीं हो सकता है।
  • यदि यह साबित हो जाता है कि वह पीड़िता के साथ अंतिम व्यक्ति नहीं था क्योंकि एक अन्य व्यक्ति ने उनके और आरोपी के बीच हस्तक्षेप किया और इस प्रकार तीसरे व्यक्ति पर अपना दोष स्थानांतरित (ट्रांसफर) कर सकता है। 
  • यदि आरोपी यह साबित करता है कि उन्हें एक साथ देखने और गलत करने के बीच उचित समय का अंतराल था, तो न्यायालय यह मान सकता है कि किसी अन्य कारक के हस्तक्षेप की संभावना है जिसके कारण यह विशेष अपराध किया गया था।
  • यदि आरोपी द्वारा यह साबित कर दिया जाता है कि जिस व्यक्ति ने उसे पीड़िता के साथ अंतिम बार देखा था, वह किसी भी कारण से विश्वसनीय गवाह नहीं है क्योंकि वह एक बाल गवाह या स्टॉक गवाह हो सकता है, तो न्यायालय उनके बयानों पर भरोसा नहीं कर सकता है।

सिद्धांत से संबंधित महत्वपूर्ण मामले

शैलेंद्र राजदेव पासवान बनाम गुजरात राज्य (2019)

मामले के तथ्य 

  • इस मामले में 5 फरवरी 2001 को परमहंस मंगल यादव ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उनका बेटा अर्जुन 4 फरवरी 2001 से लापता है।
  • शिकायतकर्ता ने आसपास के सभी परिसरों की तलाशी ली और उसके बारे में पूछताछ भी की।
  • शिकायत को पहली बार सामान्य डायरी में ही दर्ज किया गया था और 14 फरवरी 2001 को औपचारिक (फॉर्मल) रूप से शिकायत दर्ज की गई थी।
  • शिकायतकर्ता (परमहंस) ने कहा कि शुरुआत में शैलेंद्र राजदेव पासवान (अपीलकर्ता/आरोपी संख्या 1) उसकी तलाश में मदद कर रहे थे लेकिन बाद में वह गायब हो गया।
  • शैलेंद्र पासवान ने चार दिन बाद शिकायतकर्ता को फोन किया और कहा कि वह वापी में है।
  • शिकायतकर्ता को अपीलकर्ता पर शक हुआ और इसलिए उसने अपने रिश्तेदारों को वापी से उसे वापस लाने के लिए भेजा।
  • जब अपीलकर्ता वापी से लौटा तो आरोप है कि उसने 50 लोगों के सामने अतिरिक्त न्यायिक (एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल) कबूलनामा किया।
  • उसने कबूल किया कि उसने रामकेवल मुत्तूर यादव (आरोपी संख्या 5) के निर्देश पर काम करते हुए अर्जुन का अपहरण किया था, जो शिकायतकर्ता के साथ अच्छे संबंध नहीं रखता है।
  • अपीलकर्ता संख्या 1 ने कहा कि उसने अर्जुन का अपहरण किया और उसे राम आशीष और शिवनाथ (अपीलकर्ता/आरोपी संख्या 2 और 3) को सौंप दिया।
  • अपीलकर्ता संख्या 1 को 14 फरवरी 2021 को गिरफ्तार किया गया था।
  • बाद में अपीलकर्ता संख्या. 2 और 3 को भी गिरफ्तार किया गया है।
  • 13 फरवरी को, नागिनभाई पटेल और संजय पटेल को उनके खेत में एक पैर कटा हुआ एक क्षत-विक्षत शव मिला था। लाश अर्जुन की थी।
  • पुलिस के अनुसार अपीलकर्ता संख्या 2 और 3 ने पुलिस को उस जगह का खुलासा किया जहां अर्जुन की हत्या की गई थी और जहां उसके शरीर को ठिकाने लगाया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय में अपील

उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और आरोपी को दोषी करार दिया। उच्च न्यायालय के इस फैसले को आरोपी ने इस आधार पर चुनौती दी थी कि सबूत विश्वसनीय नहीं थे। यह आरोप लगाया गया था कि अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) पक्ष के दोनों गवाहों की गवाही अलग-अलग है और बहस का विषय है:

  • अभियोजन पक्ष के दोनों गवाहों को इस बात की जानकारी थी कि लापता बच्चे की तलाश की जा रही है, इसके बावजूद  दोनों ने अपीलकर्ता संख्या 1 के आचरण का शुरू में पुलिस या शिकायतकर्ता के सामने खुलासा नहीं किया।
  • काशीबेन द्वारा कहा गया कि उसने शिकायतकर्ता की छत पर अर्जुन को अपनी छत से देखा, यह तर्कसंगत नहीं था क्योंकि दोनों घरों के बीच उचित दूरी है।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का आधार 

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय सुनाने के लिए निम्नलिखित आधारों पर भरोसा किया:

  • सबसे पहले, शरद बर्डीचंद शारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य (1984) के मामले में निर्धारित सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए, जिसके अनुसार परिस्थितिजन्य साक्ष्य पूर्ण और ठोस होना चाहिए। आरोपी का दोष सिद्ध होना चाहिए और आरोपी के दोष को छोड़कर परिस्थितियों से कोई अन्य निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। 
  • इस फैसले में दोहराया गया एक और मामला अंजन कुमार शर्मा बनाम महाराष्ट्र राज्य (2017) का था। इस मामले में निर्धारित सिद्धांत यह है कि यदि लास्ट सीन सिद्धांत स्थापित किया जाना है तो आरोपी और मृतक की अंतिम बार एक साथ देखे जाने की अवधि और शव की बरामदगी न्यूनतम होनी चाहिए। ताकि किसी अन्य व्यक्ति के हस्तक्षेप की संभावना से इंकार किया जा सके और आरोपी के अपराध के रचयिता होने की संभावना को स्थापित किया जा सके। जिन मामलों में लास्ट सीन सिद्धांत की स्थापना के लिए लंबे समय का अंतराल मौजूद है, वहां आरोपी के अपराध का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता क्योंकि यह आरोपी के लिए खतरनाक होगा। 
  • इसके अलावा, अतिरिक्त न्यायिक कबूलनामा साक्ष्य का एक कमजोर टुकड़ा है जैसा कि सहदेवन बनाम तमिलनाडु राज्य (2012) में कहा गया है और इस प्रकार इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता है यदि जगरूप सिंह बनाम पंजाब राज्य (2012) द्वारा निर्धारित सिद्धांत पूरा नहीं किया जाता है।

फैसला

इस मामले में, सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया, जो आरोपी के अपराध को इंगित नहीं करती है क्योंकि गवाहों की गवाही में विसंगतियां थीं। इसके अलावा, आरोपी और मृतक के एक साथ देखे जाने और शव की बरामदगी के बीच काफी समय का अंतर था। दोनों को 4 फरवरी 2001 को एक साथ देखा गया था और 13 फरवरी 2001 को शव बरामद किया गया था। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, मृत्यु का अनुमानित समय पोस्टमार्टम से 2 से 3 दिन पहले था। इस प्रकार, समय अवधि को देखते हुए, आरोपी का दोष कमजोर था। अतिरिक्त न्यायिक कबूलनामा पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि कथित रूप से कबूलनामे में दिए गए बयानों की पुष्टि करने के लिए कोई गवाह नहीं था। 

मामला पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित होने के लिए स्थापित कानून है कि:

  • आरोपी को अपराध की ओर ले जाने वाली परिस्थिति के हर पहलू को अभियोजन पक्ष द्वारा उचित संदेह से परे साबित किया जाना चाहिए।
  • और सभी परिस्थितियों को आरोपी के अपराध को स्पष्ट रूप से चित्रित करना चाहिए।

लेकिन इस मामले में, कई विसंगतियां और संदेह थे और अपराध एक उचित संदेह से परे स्थापित नहीं किया गया था। निर्णय आधी-अधूरी स्थिति पर आधारित नहीं हो सकता है। इस प्रकार माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपी को बरी करने का आदेश दिया था।

सूरजदेव महतो बनाम बिहार राज्य

सूरजदेव महतो बनाम बिहार राज्य (2021) के हाल ही के मामले में, जहां आरोपी द्वारा अपील दायर की गई थी कि दोषसिद्धि केवल लास्ट सीन सिद्धांत के आधार पर नहीं हो सकती है, लेकिन अदालत ने देखा कि अभियोजक ने मामले पर सही भरोसा किया है। राजस्थान राज्य बनाम काशी राम (2006) जहां यह कहा गया था कि यदि निम्नलिखित शर्तें पूरी होती हैं तो व्यक्ति को लास्ट सीन सिद्धांत के आधार पर ही दोषी ठहराया जा सकता है:

  • यदि लास्ट सीन सिद्धांत का तथ्य स्थापित हो जाता है तो आरोपी को यह साबित करने और पर्याप्त स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता है कि उसने किस परिस्थिति में मृतक को छोड़ा था; तथा
  • यदि परिस्थितियों का कोई स्पष्ट विवरण नहीं होता, तो न्यायालय इस परिदृश्य में प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकता है; तथा 
  • अगर हत्या का मकसद साबित हो जाता है तो यह साक्ष्य की श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण कड़ी स्थापित करता है।

फैसला

जैसा कि इस मामले में पहले तो आरोपी मृतक का ठिकाना नहीं बता पाया और हत्या के बाद फरार हो गया। अभियोजन द्वारा साक्ष्य के माध्यम से आरोपी के साथ इरादे का अस्तित्व भी स्थापित किया गया था। इस प्रकार, अपील को अदालत ने खारिज कर दिया और आरोपी को दोषी ठहराया गया।

दिगंबर वैष्णव और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य

दिगंबर वैष्णव और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2019) के मामले में, यह माना गया कि व्यक्ति को देखने और मृतक के साथ अंतिम बार देखे गए व्यक्ति की ओर सुई को इंगित करने के लिए मृत शरीर की बरामदगी के समय के बीच उचित निकटता होनी चाहिए। और इस मामले में, यह सही ठहराया गया कि केवल यह तथ्य कि उन्हें आखिरी बार एक साथ देखा गया था, आरोपी को दोषी ठहराने का एकमात्र मानदंड (क्राइटेरिया) नहीं हो सकता है। लास्ट सीन सिद्धांत और अन्य सभी परिस्थितियां जो आरोपी की बेगुनाही को नकारती हैं, को आरोपी को लास्ट सीन सिद्धांत के आधार पर दोषी ठहराने के लिए स्थापित किया जाना चाहिए।

कुछ मामलों में, हालांकि घटना के घटित होने और उस समय के बीच एक बड़ा समय अंतराल था जब उन्हें आखिरी बार एक साथ देखा गया था और अभियोजन पक्ष इस तथ्य को स्थापित कर सकता है कि कोई अन्य व्यक्ति हस्तक्षेप नहीं कर सकता था क्योंकि उसके पास विशेष अधिकार था। जिस स्थान पर घटना हुई थी, उस स्थान पर आरोपित है, तो इसके आधार पर भी लास्ट सीन सिद्धांत स्थापित किया जा सकता है और बड़े समय अंतराल के बावजूद अनुमान लगाया जा सकता है जैसा सतपाल सिंह बनाम हरियाणा राज्य के मामले में किया गया है।

कृष्णा महादेवन चव्हाण बनाम महाराष्ट्र राज्य

कृष्ण महादेव चव्हाण बनाम महाराष्ट्र राज्य (2011) के मामले में, यह माना गया था कि भले ही लास्ट सीन सिद्धांत स्थापित किया गया था, लेकिन जब संपूर्ण परिस्थितियों पर विचार किया गया, तो वे संदेह को चित्रित करते हैं, तो निर्णय केवल लास्ट सीन सिद्धत के आधार पर नहीं दिया जा सकता है। इस मामले में, चूंकि हत्या का तथ्य अस्पष्ट और अनिश्चित था, इसलिए आरोपी को बरी कर दिया गया क्योंकि अपराध एक उचित संदेह से परे स्थापित नहीं किया गया था।

कौन से अन्य देश समान सिद्धांतों का पालन करते हैं?

दुनिया में ऐसे कई क्षेत्राधिकार (ज्यूरिसडिक्शन) हैं जिनमें लास्ट सीन सिद्धांत लागू होता है। आजकल, इसका उपयोग भी लोकप्रिय हो गया है क्योंकि हर बार मामले में प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं होते है। लास्ट सीन सिद्धांत का पालन करने वाले कुछ देश निम्नलिखित हैं: –

नाइजीरिया

नाइजीरियाई कानून स्पष्ट रूप से लास्ट सीन सिद्धांत का उल्लेख नहीं करते है, लेकिन इसमें ऐसे निर्णयों की अधिकता है जिन्होंने सिद्धांत को एक स्थापित कानून बना दिया है। मदु बनाम राज्य (2012) के मामले में, न्यायालय ने कानून के आवेदन की व्याख्या की थी। इस सिद्धांत के अनुसार, यह माना जाता है कि मृतक के साथ अंतिम बार देखे गए व्यक्ति पर मृत्यु की पूर्ण जिम्मेदारी है। और अगर आरोपी को आखिरी बार देखा गया था और उसके खिलाफ परिस्थितिजन्य साक्ष्य भारी हैं और वह उन परिस्थितियों के बारे में उचित स्पष्टीकरण देने में सक्षम नहीं है, जिसके तहत उसने आरोपी को छोड़ दिया, तो अदालत लास्ट सीन सिद्धांत के आधार पर व्यक्ति को दोषी ठहरा सकती है।

बांग्लादेश

शाजनीन हत्याकांड (2018) (ट्रांसकॉम ग्रुप के चेयरमैन लतीफुर रहमान की बेटी) में यह माना गया कि लास्ट सीन सिद्धांत, परिस्थितिजन्य साक्ष्य का एक हिस्सा है, और अगर सभी परिस्थितियां आरोपी की बेगुनाही को नकारती हैं तो इसके आधार पर उसे दोषी ठहराया जा सकता है। 

निष्कर्ष

लास्ट सीन सिद्धांत निस्संदेह भारतीय साक्ष्य में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है जैसे कि एक बार साबित हो जाने पर यह आरोपी पर अपनी बेगुनाही साबित करने का बोझ डाल देता है। हालांकि, यह एक उचित संदेह से परे आरोपी के अपराध को साबित करने के अपने कर्तव्य के अभियोजन पक्ष का पूरी तरह से निर्वहन नहीं करता है। अभियोजन पक्ष को मृतक की हत्या के साथ आरोपी का पूरा संबंध पेश करना होता है यानी उसके पास एक मौका था क्योंकि उन्हें आखिरी बार एक साथ देखा गया था, उसके पास अपराध करने का मकसद था और यहां तक कि उसके व्यवहार, अपराध सिद्ध करने के लिए स्थिति की व्याख्या जैसे अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी नहीं थे। यह इस तथ्य पर आधारित है कि आपराधिक कानून में आरोपी के अपराध को साबित करने का पैमाना एक उचित संदेह से परे है। निर्णय संदेह और अनुमान पर आधारित नहीं होना चाहिए। ऐसे मामलों में जहां एक भी स्थिति में यह संदेह पैदा हो जाता है कि आरोपी निर्दोष है तो उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाएगा क्योंकि हमारा आपराधिक कानून इस सिद्धांत पर आधारित है कि किसी भी निर्दोष को सजा नहीं दी जानी चाहिए। अदालत को परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर मामले का फैसला करते समय अतिरिक्त सतर्क रहना चाहिए ताकि अन्याय न हो लेकिन यदि लास्ट सीन सिद्धांत की पुष्टि अन्य साक्ष्यों से होती है तो परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर ही आरोपी को दोषी ठहराने के लिए इसका पालन किया जा सकता है और यह साबित किया जा सकता है कि यह एक वैध दोषसिद्धि होगी।

संदर्भ

 

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