न्यायशास्त्र का समाजशास्त्रीय स्कूल

0
5778
Jurisprudence

यह लेख राजीव गांधी, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, पटियाला में द्वितीय वर्ष के छात्र Anirudh Vats और Sourav Bhola के द्वारा लिखा गया है। यह लेख सबसे पहले, स्कूल के अर्थ और प्रकृति पर चर्चा करेगा और उसके पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड) के बारे मे बताएगा जिसके कारण कानून के समाजशास्त्रीय (सोशियोलॉजिकल) स्कूल का उदय हुआ था। इसके बाद यह इस स्कूल के मूल सिद्धांतों पर चर्चा करेगा, प्रभावशाली विचारकों के विचारों को प्रस्तुत करेगा और फिर कानून के समाजशास्त्रीय स्कूल की आलोचना (क्रिटिसिज्म) प्रदान करेगा। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

“सभी सामूहिक मानव जीवन प्रत्यक्ष (डायरेक्ट) या अप्रत्यक्ष (इनडायरेक्ट) रूप से कानून द्वारा आकार में लाए गए है। कानून ज्ञान की तरह है, जो की सामाजिक स्थिति का एक अनिवार्य और व्यापक तथ्य है।”     — निकलास लुहमान

Table of Contents

परिचय

प्रारंभिक समय में, नियम और कानून समाज को नियंत्रित करने के एकमात्र रिवाज से उत्पन्न हुए थे, जिस पर केवल सामाज द्वारा दंड दिया जाता था। फिर, राजा और पुजारी का वर्चस्व (सुप्रीमेसी) आया। फिर, क्रांति और परिवर्तनों के बाद, व्यक्तिगत हित और समाज के कल्याण के बीच संतुलन का एहसास हुआ। 

समाजशास्त्र का मुख्य विषय समाज है। समाजशास्त्र समाज, मानव व्यवहार और सामाजिक परिवर्तनों का अध्ययन है, और न्यायशास्त्र (ज्यूरिस्प्रूडेंस) चीजों के कानूनी पहलू का अध्ययन करता है। न्यायशास्त्र का समाजशास्त्रीय स्कूल इस बात की वकालत करता है कि कानून और समाज एक दूसरे से संबंधित हैं। इस स्कूल का तर्क यह है कि कानून एक सामाजिक घटना है क्योंकि इसका समाज पर बड़ा प्रभाव पड़ता है।

ऑगस्ट कॉम्टे (1798-1857) एक फ्रांसीसी दार्शनिक (फिलॉसोफर) थे। “समाजशास्त्र” शब्द का प्रयोग सबसे पहले कॉम्टे ने किया था और उन्होंने समाजशास्त्र को सामाजिक तथ्यों का एक सकारात्मक विज्ञान बताया था। उन्होंने कहा कि समाज एक जीव की तरह है और यह वैज्ञानिक सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होने पर प्रगति कर सकता है। इस प्रकार, वह कानून को एक उपकरण के रूप में उपयोग करने के लिए बहुत प्रयास करता है, जिसके द्वारा मानव समाज खुद को बनाए रखता है और आगे बढ़ता है। 

कॉम्टे के बाद, कई लेखकों और न्यायविदों (ज्यूरिस्ट) ने समाज और कानून को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया था, और कानून और समाजशास्त्र के बीच एक संबंध खोजने की कोशिश की थी। 

अर्थ और प्रकृति

कानून का समाजशास्त्रीय स्कूल, कानून को एक अमूर्त (ऐब्स्ट्रेक्ट), आदर्शवादी (आइडियलिस्टिक) अवधारणा के रूप में खारिज करता है और इसे एक विकसित सामाजिक संस्था के रूप में देखता है, जो सामाजिक परिस्थितियों में परिवर्तन के लिए प्रतिक्रिया (रिएक्ट) करता है और उसमे अपने आप को समायोजित (एडजस्ट) करता है। इस स्कूल ने समाज में होने वाली हर समस्या और हर बदलाव के कानूनी दृष्टिकोण पर अधिक जोर दिया है। कानून एक सामाजिक घटना है और कानून का समाज से कुछ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध है। यह स्कूल कानून और समाज के बीच संबंधों से संबंधित है, और साथ ही निम्नलिखित प्रश्नों से भी संबंधित है:

  • समाज में कानून कैसे कार्य करता है?
  • सामाजिक परिवर्तन से कानून कैसे प्रभावित होता है?
  • कानून सामाजिक परिवर्तन को कैसे चलाता है?
  • एक कानून के सामाजिक निहितार्थ (इंप्लीकेशंस) क्या हैं?
  • कानून किन सामाजिक समूहों का पक्ष लेता है या उन्हें वंचित करता है?
  • क्या कानून को सामाजिक प्रगति के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है?
  • कानून समाज में हितों के संतुलन का प्रबंधन (मैनेजमेंट) कैसे करता है?
  • सामाजिक नियंत्रण का प्रयोग करने के लिए कानून का उपयोग कैसे किया जाता है?
  • कानून शक्ति का साधन कैसे बन जाता है?

ये केवल कुछ केंद्रीय प्रश्न हैं जो समाज और कानून के बीच की सीमा की व्याख्या करते हैं, लेकिन यह सूची किसी भी तरह से संपूर्ण नहीं है।

कानून के इस स्कूल का दृष्टिकोण प्रकृति में अंतःविषय (इंटरडिसिप्लिनरी) है। यह आर्थिक (इकोनॉमिक) न्यायशास्त्र, सामाजिक एंथ्रोपोलॉजी, अपराध विज्ञान और मनोविज्ञान से बाहर निकलने का प्रयास करता है।

समाजशास्त्रीय न्यायविद सामाजिक विज्ञानों की एकता और उनके एक दूसरे पर निर्भर रहने की क्षमता पर जोर देते हैं, और कानून के अभ्यास में अंतर्निहित सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करके कानून के अधिक सक्रिय (एक्टिव), शामिल अध्ययन पर जोर देते हैं।

एर्लिच के शब्दों में, “वर्तमान में और साथ ही किसी भी समय, कानूनी विकास की गंभीरता का केंद्र कानून में नहीं है, न ही कानूनी निर्णय में है, बल्कि यह समाज में ही है।”

न्यायशास्त्र का समाजशास्त्रीय स्कूल, कानून और समाजशास्त्र के बीच संबंधों का अध्ययन करता है। हर समस्या या अवधारणा के दो अलग-अलग पहलू होते हैं। एक समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण है और दूसरा कानूनी पहलू है। उदाहरण के लिए सती।

सती का कानूनी और उसका सामाजिक पहलू

सती, विधवा को उसके पति की चिता पर जलाने की प्राचीन भारतीय प्रथा थी। 

कानूनी पहलू:

सती प्रथा को पहली बार 1798 में कलकत्ता में समाप्त कर दिया गया था। एक क्षेत्र जो ब्रिटिश अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिसडिक्शन) में आता था। भारत में ब्रिटिश क्षेत्रों में 1829 में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। आज के समय में सती प्रथा निवारण अधिनियम (1987), जो किसी को भी सती करने के लिए मजबूर करना या प्रोत्साहित करना अवैध बनाता है, के तहत सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। 

सामाजिक पहलू

आज के बढ़ते नारीवाद (फेमिनिज्म) और समानता और मानवाधिकारों पर ध्यान केंद्रित करने के युग में, सती की क्रूर हिंदू प्रथा को चलने देना गलत है। यह प्रथा आज के भारत में गैरकानूनी और अवैध है।

समाजशास्त्रीय स्कूल की पृष्ठभूमि

कानून के समाजशास्त्रीय स्कूल का जन्म कानून के विश्लेषणात्मक (एनालिटिकल) और ऐतिहासिक स्कूल के खिलाफ प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था। 

न्यायशास्त्र के समाजशास्त्रीय स्कूल के अस्तित्व में आने का कारण

लाईसेज़-फेयर क्या है?

ब्रिटानिया डिक्शनरी के अनुसार, “लाईसेज़-फेयर” व्यक्तियों और समाज के आर्थिक मामलों में न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप की नीति है।” 

लाईसेज़-फेयर सरकार द्वारा लोगों को दी जाने वाली अप्रतिबंधित स्वतंत्रता है। यह एक सरकारी नीति है जिसमें सरकार और कानून लोगों के आर्थिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करते हैं। लाईसेज़-फेयर अर्थव्यवस्था में, सरकार और कानून की एकमात्र भूमिका, चोरी, धोखाधड़ी आदि जैसे अपराधों के लिए आरोपित व्यक्तियों के खिलाफ किसी भी विवाद और जबरदस्ती को रोकना है।

लाईसेज-फेयर के कारण, सभी लोग व्यक्तिगत हित को अधिक महत्व दे रहे हैं और सामान्य हित या राज्य के हित और राज्य के कल्याण की अनदेखी कर रहे हैं। समाजशास्त्रीय स्कूल लाईसेज़-फेयर के खिलाफ प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया क्योंकि समाजशास्त्रीय स्कूल राज्य के कल्याण और व्यक्तिगत हित के बीच संतुलन की वकालत करता है।

कानून के विश्लेषणात्मक स्कूल का विरोध

कानून के विश्लेषणात्मक स्कूल के संस्थापक (फाउंडर) जॉन ऑस्टिन थे। उन्होंने कानून को संप्रभु (सॉवरेन) की आज्ञा के रूप में माना। इस स्कूल के अनुसार, कानून का जन्म संप्रभु शासक की इच्छा से हुआ था, और इसमें कोई नैतिक (एथिकल) या सामाजिक संबंध नहीं था।

यह कानून को एक आत्मनिर्भर क्षेत्र मानता था और इसे न्याय, स्वतंत्रता और स्वाधीनता जैसे नैतिक मूल्यों से अलग मानता था।

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण का उद्देश्य कानून की आत्मनिर्भरता के विचार का खंडन (रिफ्यूट) करना है। इसके अनुसार, कानून समाज का एक जीवित, सांस लेने वाला अंग है। सामाजिक सहयोग की आवश्यकता से कानून का जन्म हुआ, जिसने व्यवहार के नियमन (रेगुलेशन) और कुछ स्वतंत्रताएं प्रदान करने का आह्वान किया है।

इसलिए, किसी भी अन्य सामाजिक संस्था की तरह, कानून भी इसके आसपास की सामाजिक घटनाओं के अधीन है। यह समाज को प्रभावित करता है और बदले में समाज से प्रभावित होता है। इसे समाज के नैतिक सरोकारों से अलग देखना, समाजशास्त्रीय न्यायविदों द्वारा गलत माना गया था।

कानून, संप्रभु व्यक्तियों से उत्पन्न नहीं होता है। यह सामाजिक प्रक्रियाओं से पैदा हुआ है और समाज में इसका एक विशिष्ट कार्य है। कानून की वैधता संप्रभु से नहीं, बल्कि उस कार्य से आती है जो वह समाज में करता है।

कानून के ऐतिहासिक स्कूल का विरोध

कानून के ऐतिहासिक स्कूल ने माना कि कानून लोगों के एक निश्चित समूह की धीमी विकसित होने वाली सांस्कृतिक प्रक्रियाओं का परिणाम है। यह कानून को कुछ ऐसा मानता है जो न्यायविदों द्वारा “पाया” जाता है न कि “बनाया” जाता है। कानून किसी व्यक्ति विशेष की विशेष व्याख्या नहीं हो सकता, इसे सांस्कृतिक रूप से अलग समूह और उनकी आवश्यकताओं से उत्पन्न होना चाहिए।

समाजशास्त्रियों द्वारा ऐतिहासिक स्कूल का मुख्य विरोध यह था कि कानून के प्रति उनका दृष्टिकोण बहुत निष्क्रिय (पैसिव) था। वे कानून को एक क्रमिक (ग्रेजुअल) आवश्यकता के रूप में देखते थे जो लोगों के बीच विकसित होती है और फिर औपचारिक (फॉर्मल) हो जाती है, और कानून के माध्यम से समाज को बदलने के लिए सक्रिय रणनीति नहीं अपनाती है।

ऐतिहासिक स्कूल के अनुसार, कानून प्रचलित सांस्कृतिक प्रथाओं का परिणाम है, न कि ऐसा कुछ जिसे सामाजिक परिवर्तन या प्रगति करने के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस विरोध के अलावा, 20वीं शताब्दी की शुरुआत में बढ़ते युद्ध, विवाद और असंतोष के कारण, प्राकृतिक कानून सिद्धांतों को चुनौती दी जा रही थी, और कानून को और अधिक प्रासंगिक (रिलेवेंट) और समकालीन (कंटेंपरेरी) बनाने की सख्त आवश्यकता थी, और इससे कानून के समाजशास्त्रीय स्कूल की प्रमुखता हुई।

न्यायशास्त्र के समाजशास्त्रीय स्कूल के न्यायविद

मोंटेस्क्यू (1689-1755)

मोंटेस्क्यू, फ्रांसीसी दार्शनिक थे और उन्होंने न्यायशास्त्र के समाजशास्त्रीय स्कूल का मार्ग प्रशस्त किया। उनका विचार था कि कानूनी प्रक्रिया किसी न किसी तरह समाज की सामाजिक स्थिति से प्रभावित होती है। उन्होंने इतिहास के महत्व को, समाज की संरचना (स्ट्रक्चर) को समझने के साधन के रूप में भी पहचाना, और उस समाज के लिए कानून बनाने से पहले समाज के इतिहास का अध्ययन करने के महत्व को समझाया।

उन्होंने, अपनी पुस्तक ‘द स्पिरिट ऑफ लॉज‘ में लिखा है कि, “कानून को एक राष्ट्र की विशेषताओं से निर्धारित किया जाना चाहिए ताकि वे प्रत्येक देश की जलवायु, प्रत्येक आत्मा की गुणवत्ता, उसकी स्थिति और सीमा, मूल निवासियों के प्रमुख व्यवसायो, चाहे वे किसान हों, शिकार करने वाले हों या चरवाहे हो, के संबंध में हों, उनका संबंध स्वतंत्रता की मात्रा निवासियों के धर्म, उनके झुकाव, धन, संख्या, वाणिज्य (कॉमर्स), शिष्टाचार (मैनर्स) और प्रथाओं के साथ होना चाहिए, जिसे संविधान द्वारा संभाला जाएगा।”

यूजिन एर्लिच (1862-1922)

यूजिन एर्लिच को कानून के समाजशास्त्र का संस्थापक माना जाता है। कानून का समाजशास्त्र, समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से कानून का अध्ययन है। एर्लिच ने समाज को कानून का मुख्य स्रोत माना है, और समाज से उसका अर्थ है “पुरुषों का संघ”।

एर्लिच ने लिखा था कि “सभी कानूनी विकास का केंद्र कानून या न्यायिक निर्णयों में नहीं बल्कि समाज में ही होता है।”

उन्होंने तर्क दिया कि कानून या न्यायिक निर्णय की तुलना में समाज कानून का मुख्य स्रोत और कानून का बेहतर स्रोत है।

रोस्को पाउंड (1870-1964)

पाउंड एक अमेरिकी कानूनी विद्वान था। उनका विचार था कि कानून का अध्ययन उसके वास्तविक कार्यात्मक (वर्किंग) रूप में किया जाना चाहिए न कि उस रूप में जैसा कि यह पुस्तक में है।

सोशल इंजीनियरिंग का सिद्धांत

रोस्को पाउंड, सोशल इंजीनियरिंग का सिद्धांत देते है जिसमें उन्होंने वकीलों की तुलना इंजीनियरों से की है। नए उत्पादों के निर्माण के लिए इंजीनियरों को अपने इंजीनियरिंग के कौशल (स्किल्स) का उपयोग करने की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार, समाज में उस प्रकार की संरचना का निर्माण करने के लिए सामाजिक इंजीनियरों की आवश्यकता होती है जो अधिकतम सुख और न्यूनतम दुख प्रदान करती है।

पाउंड के अनुसार, “कानून सामाजिक इंजीनियरिंग है जिसका अर्थ समाज में प्रतिस्पर्धी (कंपीटिंग) हितों के बीच संतुलन है,” जिसमें व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं को हल करने के लिए व्यावहारिक विज्ञान का उपयोग किया जाता है।

सोशल इंजीनियरिंग कानून की मदद से व्यक्ति और राज्य के परस्पर विरोधी हितों को संतुलित करना है। कानून ज्ञान का एक निकाय है, और कानून की मदद से सोशल इंजीनियरिंग के बड़े हिस्से को आगे बढ़ाया जाता है। कानून का उपयोग समाज में परस्पर विरोधी हितों और समस्याओं को हल करने के लिए किया जाता है।

उन्होंने उल्लेख किया कि हर किसी का अपना व्यक्तिगत हित होता है और इसे अन्य सभी हितों से सर्वोच्च माना जाता है। कानून का उद्देश्य लोगों के हितों के बीच संतुलन बनाना है। उदाहरण के लिए, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 ‘भाषण और अभिव्यक्ति के अधिकार’ प्रदान करता है, लेकिन दूसरी तरफ, राज्य ने इस अधिकार पर कुछ प्रतिबंध लगा दिए हैं। और जब व्यक्तिगत अधिकार और राज्य के प्रतिबंध के बीच विवाद उत्पन्न होता है, तो कानून अपनी भूमिका निभाने के लिए आता है, और हितों के बीच विवाद को हल करता है।

हित का सिद्धांत

रोस्को पाउंड ने अपने हित के सिद्धांत में तीन प्रकार के हितों का उल्लेख किया। हितों के अतिव्यापी (ओवरलैपिंग) होने से बचने के लिए, उन्होंने सीमाएँ लगाईं है और हितों के प्रकारों को विभाजित किया है।

  • व्यक्तिगत हित

ये व्यक्तिगत जीवन के दृष्टिकोण में शामिल दावे या मांगें हैं, जिनमें व्यक्तित्व के हित, घरेलू संबंधों में हित और धन संपत्ति के हित शामिल हैं।

  • सार्वजनिक हित

ये राजनीतिक जीवन के दृष्टिकोण से व्यक्ति द्वारा किए गए दावे या इच्छाएं हैं, जिसका अर्थ है कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति का एक-दूसरे के प्रति और सार्वजनिक उपयोग के लिए खुली चीजों का उपयोग करने का कुछ दायित्व है।

  • सामाजिक हित 

ये दावे सामाजिक जीवन के संदर्भ में हैं, जिसका अर्थ समाज की सभी जरूरतों को पूरा करना और उसके उचित संचालन और रखरखाव के लिए है। यह हित सामान्य शांति, स्वास्थ्य, लेन-देन की सुरक्षा, धर्म, राजनीति, आर्थिक जैसी सामाजिक संस्थाओं के संरक्षण में है।

रोस्को पाउंड द्वारा न्यायिक अभिधारणाएं (पोस्टुलेट्स)

रोस्को पाउंड ने पाँच न्यायिक अभिधारणाओं का उल्लेख किया है, कि इन न्यायिक अभिधारणाओं में उल्लिखित हितों को संरक्षित किया जाना चाहिए।

  • आपराधिक अभिधारणा

यह किसी भी जानबूझकर किए गए आक्रमण से सुरक्षा का हित है। उदाहरण के लिए, हमला, गलत संयम (रॉन्गफुल रिस्ट्रेंट), बैटरी, आदि।

  • पेटेंट का कानून

यह अपनी खुद की बनाई हुई संपत्ति को अपने श्रम और कड़ी मेहनत से हासिल करने का हित है। जैसे कृषि भूमि, कोई संगीत या कलात्मक चीजें।

  • अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट)

अनुबंध करने में हित और उसके अधिकार का उल्लंघन होने पर उचित उपाय या मुआवजा प्राप्त करना।

  • टॉर्ट 

किसी अन्य व्यक्ति के लापरवाहीपूर्ण कार्य के कारण हुई मानहानि (डिफेमेशन) और अनुचित चोट से सुरक्षा।

  • सख्त दायित्व (स्ट्रिक्ट लायबिलिटी)

इसी तरह, रायलैंड बनाम फ्लेचर के मामले में, ये कहा गया था की किसी अन्य व्यक्ति की चीजों के कारण चोट लगने पर हमारे हित की सुरक्षा की जानी चाहिए। अन्य लोगों का यह कर्तव्य है कि वे अपनी चीजों को अपनी सीमा के भीतर रखें और अन्य लोगों को चोट से बचाने के लिए उस चीज की देखभाल करें।  

लियोन डुगुइट (1859-1928)

लियोन डुगुइट, एक फ्रांसीसी न्यायविद और द्रोइट पब्लिक (सार्वजनिक कानून) के प्रमुख विद्वान थे। वे अगस्टे कॉम्टे और दुर्खेम से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने सामाजिक एकता का सिद्धांत दिया जो व्यक्तियों के बीच उनकी आवश्यकता और अस्तित्व के लिए सामाजिक सहयोग की व्याख्या करता है।

सामाजिक समन्वय (सोलीडेरिटी)

सामाजिक समन्वय, एकता की भावना है। शब्द ‘सामाजिक समन्वय’ समाज की ताकत, सामंजस्य (कोहेसिवनेस), सामूहिक चेतना और व्यवहार्यता का प्रतिनिधित्व करता है। लियोन डुगुइट का सामाजिक समन्वय अपने अन्य साथी पुरुषों पर पुरुषों की निर्भरता की व्याख्या करता है। अन्य पुरुषों पर निर्भर हुए बिना कोई भी जीवित नहीं रह सकता है। इसलिए मानव अस्तित्व के लिए सामाजिक निर्भरता और सहयोग बहुत महत्वपूर्ण हैं।

कानून का उद्देश्य व्यक्तियों के बीच सामाजिक समन्वय को बढ़ावा देना है। और लियोन डुगिट ने उस कानून को बुरा कानून माना जो सामाजिक समन्वय को बढ़ावा नहीं देता है।

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक समन्वय को बढ़ावा देना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार और कर्तव्य है।

उदाहरण के लिए, भारत में, संहिताबद्ध कानूनों का पालन सभी लोग करते हैं। इसलिए, यह सामाजिक समन्वय को बढ़ावा देता है।   

कानून का समाजशास्त्र

कानून का समाजशास्त्र, कानूनी दृष्टिकोण से समाजशास्त्र का अध्ययन करता है। भारत में, कानून का समाजशास्त्र जांच का एक हालिया क्षेत्र है। समाजशास्त्रीय न्यायशास्त्र के भारतीय अधिवक्ता पी.बी. गजेंद्रगाखर हैं, और उपेंद्र बक्शि है जो समाज को कानूनी दृष्टिकोण से देखते हैं।

कानून का समाजशास्त्र, समाजशास्त्र का अंतःविषय दृष्टिकोण या उप-विषय है। यह समाज को उसकी कानूनी तरह से देखता है। और समाज और कानून की निर्भरता की व्याख्या करता है। पॉडगोरेकी ने कानून के समाजशास्त्र को निम्नलिखित कार्यों को सूचीबद्ध किया है:

  1. कानून के समाजशास्त्र का उद्देश्य कानून को उसके कामकाज में शामिल करना है;
  2. यह सोशल इंजीनियरिंग के लिए विशेषज्ञ सलाह प्रदान करता है;
  3. कानून का समाजशास्त्र अपने अध्ययनों को आकार देने का प्रयास करता है ताकि उन्हें व्यावहारिक अनुप्रयोगों (एप्लीकेशंस) के लिए उपयोगी बनाया जा सके; तथा
  4. कानून का समाजशास्त्र वास्तविकता से विवाद करता है।

इस प्रकार, कानून के समाजशास्त्र का उद्देश्य कानूनी और सामाजिक घटनाओं की समझ है, जबकि न्यायशास्त्र के पारंपरिक दृष्टिकोण की मुख्य चिंता विश्लेषणात्मक-भाषाई अध्ययन करना है।

मूल सिद्धांत 

औपचारिक (फॉर्मल) कानून सिर्फ कानून का एक चित्र है

कानून के प्रति समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण, प्रत्यक्षवादी (पॉजिटिविस्ट) विचार को खारिज करता है कि, औपचारिक कानून वास्तविक कानून है। यह दावा करता है कि वास्तविक कानून समाज द्वारा अनुभव किया गया कानून है, यह वह कानून है, जो लोगों के सामाजिक जीवन में खुद को प्रकट करता है। यह विधियों, निर्णयों, आदि में पाया जाने वाला कानून नहीं है।

यह न्याय के औपचारिक विचार और “सामाजिक न्याय” के बीच अंतर करता है, जिसे समाजशास्त्रियों द्वारा वास्तविक अर्थों में न्याय माना जाता है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण का कहना है कि समाज में मौजूद असमानताएं भी कानून की चिंता है।

न्याय केवल अदालत तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, न्याय व्यक्ति के दैनिक जीवन में होता हुआ दिखना चाहिए, जिस तरह से वह लोगों के द्वारा काम में लाया जाता है और जिस तरह से वह समाज में कार्य करता है।

मान लीजिए एक दलित को जाति-आधारित घटना में पीटा जाता है। कानूनी न्याय यह होगा कि अपराधी को दंडित किया जाए। लेकिन सामाजिक न्याय इस बात से संबंधित होगा कि समाज में उस दलित की गरिमा (डिग्निटी) को कैसे बनाए रखा जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि उसके साथ भेदभाव न हो, और यह सामाजिक न्याय कानून का केंद्र बिंदु बनना चाहिए।

कानून एक सामाजिक संस्था है

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण, कानून को राज्य, परिवार, धर्म आदि के समान एक अन्य सामाजिक संस्था के रूप में मानता है। इसका मतलब यह है कि किसी भी अन्य संस्था की तरह, कानून एक सतत विकसित पैटर्न है जो समाज में अच्छी तरह से स्थापित है। समाज में कानून के अपने कार्य हैं, और यह अपूर्ण है और स्थायी रूप से परिवर्तन के अधीन है।

इसके अलावा, समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण इस परिवर्तन को चलाने में सक्रिय रूप से शामिल होने की वकालत करता है। कानून का उद्देश्य सामाजिक समस्याओं को हल करना और अधिक न्यायपूर्ण, निष्पक्ष और न्यायसंगत (इक्विटेबल) समाज सुनिश्चित करना है।

यह इस विचार को खारिज करता है कि कानून समाज से अलग है और किसी तरह इससे बाहरी है। समाज कानून में व्याप्त (परमिएट) है और कानून समाज में, और इसलिए सामाजिक और कानूनी परिवर्तन एक दूसरे के पूरक (कंप्लीमेंट्री) हैं।

यह दंड के बजाय सामाजिक उद्देश्य पर ध्यान देता है

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण कानून को एक ऐसी संस्था के रूप में मानता है जिसका कार्य समाज के सामने आने वाली कानूनी और न्यायिक समस्याओं को हल करना है। कानून को उस समाज की स्थिति से अवगत होना चाहिए जिसमें वह काम कर रहा है और सक्रिय रूप से इसकी जरूरतों को पूरा करने का लक्ष्य रखता है।

यह दावा प्रत्यक्षवादी दृष्टिकोण के विपरीत है, जिसका उद्देश्य प्रतिबंधों द्वारा समर्थित नियमों की प्रणाली के रूप में कानून स्थापित करना है। इस दृष्टिकोण के लिए, कानून, उल्लंघन और दंड के साथ शुरू और समाप्त होता है। इसका कोई नैतिक उद्देश्य या नैतिक दिशा नहीं है। इसका उस समय से कोई संबंध नहीं है जिसमें यह काम कर रहा है या जिस स्थान पर यह लागू है, वह उद्देश्यपूर्ण, पूर्ण और निर्विवाद है।

समाजशास्त्रियों के लिए, यह विचार गलत है। कानून, सभी कानूनों की तरह, अपने नैतिक लक्ष्यों से अलग नहीं किया जा सकता है, वास्तव में, कानून के नैतिक सरोकारों को कानून के दंड-आधारित परिप्रेक्ष्य (सिनेरियो) पर प्रेफरेंस दी जानी चाहिए।

कानूनी संस्कृतियों का अध्ययन

यह अपेक्षाकृत (रिलेटिवली) नया शब्द है, लेकिन कानून के समाजशास्त्र की केंद्रीय अवधारणाओं में से एक है। कानूनी संस्कृति, “पुस्तकों में कानून” और “कार्य में कानून” के बीच अंतर करती है, और अध्ययन करती है कि दोनों एक दूसरे से कैसे संबंधित हैं।

यह कानूनी संस्थाओं के प्रति समाज के रवैये और व्यवहार का अध्ययन करता है और व्यक्तियों द्वारा कानूनी व्यवस्था को कैसे माना जाता है इस पर ध्यान देता ही।

कानूनी संस्कृति कानूनी प्रणाली से परे है और इसे अमूर्तता के विभिन्न स्तरों पर समझा जाता है। कानूनी संस्कृति राज्य, देश और समुदाय में मौजूद है।

आंतरिक (इंटर्नल) कानूनी संस्कृति औपचारिक कानूनी प्रणाली के भीतर की संस्कृति को संदर्भित करती है, जैसे न्यायपालिका, बार काउंसिल आदि। बाहरी कानूनी संस्कृतियां इसके बाहर के लोगों द्वारा अपनाई गई कानूनी प्रणाली के प्रति दृष्टिकोण को संदर्भित करती हैं।

आलोचना

यह व्यक्तिगत हित को कमजोर करता है

समाज में एक मूलभूत समस्या व्यक्तिगत और सामाजिक हितों के बीच निरंतर विवाद है। समाजशास्त्रीय स्कूल व्यक्तिगत हितों की अवहेलना करता है क्योंकि यह मानता है कि कानून मुख्य रूप से समाज पर लागू होता है न कि व्यक्ति पर।

मान लीजिए कोई न्यायाधीश बलात्कार के एक मामले का फैसला कर रहें है। आरोपी को हर कोई दोषी मानता है और समाज पहले ही उस पर फैसला सुना चुका होता है। इस मामले में, यह न्यायाधीश का कर्तव्य है कि वह तथ्यों और सबूतों को निष्पक्ष रूप से देखे और उसके अनुसार निर्णय करे। न्यायाधीश के लिए सामाजिक हित या राय का कोई महत्व नहीं होना चाहिए, और यदि सबूत की कमी है, तो आरोपी को मुक्त कर दिया जाना चाहिए।

इससे पता चलता है कि व्यक्तिगत पहचान कानून की नज़र में समूह की पहचान में अधिक हित रखती है। लोग अपनी जाति, लिंग, राष्ट्रीयता आदि से उत्पन्न नहीं हुए हैं, बल्कि विशिष्ट, स्वतंत्र प्राणी हैं जिनके साथ समाज द्वारा उनके परस्पर विरोधी हितों के कारण अत्याचार नहीं किया जा सकता है।

समाजशास्त्रीय स्कूल, कानून का ध्यान समाज की ओर स्थानांतरित (शिफ्ट) करने का प्रयास करता है, और बदले में व्यक्ति के हित को कम करता है, जो अक्सर समाज के हित के विपरीत होता है।

सामाजिक न्याय, जबकि एक महान विचार है, कानून का एकमात्र ध्यान नहीं हो सकता, क्योंकि व्यक्तिगत न्याय कानून के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।

सामाजिक आदर्शों की विषयपरकता (सब्जेक्टिविटी)

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के अनुसार, कानून को समाज को एक आदर्श की ओर बढ़ने में मदद करनी चाहिए। इससे दो समस्याएं आती हैं। सबसे पहले यह कौन तय करता है कि समाज किस दिशा में जा सकता है? आखिरकार, समाज परस्पर विरोधी व्यक्तिगत हितों का एक संयोजन (कॉम्बिनेशन) मात्र है। कुछ के लिए, समलैंगिकता (होमोसेक्शुअलिटी) एक वैध यौन अभिविन्यास (ओरिएंटेशन) है, दूसरों के लिए यह पाप है। कौन सा हित प्रबल होना चाहिए और क्या कानून को हर अलग-अलग हित के प्रति सचेत होना चाहिए?

एक सामाजिक आदर्श एक आध्यात्मिक (मेटाफिजिकल) विचार है। यदि कानून सक्रिय रूप से इन अमूर्त आदर्शों की ओर बढ़ना शुरू कर देता है, तो यह मूर्त नियमों और सामाजिक विनियमन (रेगुलेशन) की एक निश्चित प्रणाली के साथ एक निश्चित विज्ञान नहीं रह जाता है।

एक और समस्या यह है कि सामाजिक परिवर्तन के परिणामों को पहले से जानना असंभव है, और यदि कानून इसके लिए एक सक्रिय उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) बन जाता है, तो यह अपनी सीमाओं को पार कर सकता है और दमनकारी (ऑप्रेसिव) बन सकता है।

उदाहरण के लिए, 20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका में शराब और इसकी बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसका मतलब था कि लोगों की उत्पादकता (प्रोडक्टिविटी) बढ़ी, अपराध कम हुए और विवाहित महिलाएं खुश थीं। लेकिन अंततः, एक भूमिगत माफिया विकसित हुआ जिसने शराब का एक बड़ा काला बाजार शुरू किया, इससे पुलिस और अपराधियों के बीच लगातार विवादो के साथ-साथ बहुत अधिक अपराध और मृत्यु हुई। इसके अलावा, कानून ने एक व्यक्ति की अपनी इच्छानुसार उपभोग करने की स्वतंत्र पसंद को समाप्त कर दिया था।

इसलिए, कानून को केवल सामाजिक परिवर्तन को प्रेरित करके प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह एक निश्चित विज्ञान है जो समाज पर अमूर्त नियमों और विनियमों को लागू करना चाहता है।

कानून केवल हितों का संतुलन नहीं हो सकता

यदि समाज व्यक्तिगत हितों से बना है, तो असहमति होना तय है। सामाजिक न्यायशास्त्र कहता है कि कानून को इन हितों के बीच मध्यस्थ (मीडिएटर) के रूप में कार्य करना चाहिए, और अधिक से अधिक लोगों की जरूरतों को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। यह बेंथम के विचार के अनुरूप है कि बड़ी संख्या में लोगों के लिए अच्छा होना चाहिए, और यह सिद्धांत एक कानून है जिसका पालन करना चाहिए।

लेकिन यह दावा मानता है कि कानून एक निष्पक्ष पर्यवेक्षक (ओवरसीअर) है, लेकिन हम जानते हैं कि कानून भी राय से मुक्त नहीं है, कानून के न्याय के अपने विचार हैं, और यह स्वतंत्रता और निष्पक्षता का अपने तरीके से व्याख्या करता है।

कानून समाज के सभी हितों को संतुलित नहीं कर सकता। यह मूर्त है और अपने स्वयं के पूर्वाग्रहों (बायस) और निर्णय के मानकों (स्टैंडर्ड) के अनुसार चुनता है कि क्या वैध है और क्या नहीं।

इसलिए, यह विचार कि कानून निष्पक्ष है और कम करने वाला है, यदि सभी हित त्रुटिपूर्ण हो, अपर्याप्त हैं।

समाजशास्त्र के सिद्धांतों से परे जाता है

समाजशास्त्र अनिवार्य रूप से सामाजिक तथ्यों का एक वर्णनात्मक (डिस्क्रिप्टिव) अध्ययन है, लेकिन कानून का समाजशास्त्रीय स्कूल न्यायशास्त्र में तल्लीन (डेल्व) करता है, जो कि कानून का दर्शन है, और यहां समाजशास्त्रीय स्कूल एक आदर्श अध्ययन, निर्देशन और किसी चीज की आकांक्षा रखने और सक्रिय रूप से इसे महसूस करने का प्रयास करने के लिए उसकी ओर जाता है।

इस स्कूल के एक प्रभावशाली विचारक रोस्को पाउंड ने समाजशास्त्रीय स्कूल को न्यायशास्त्र के रूप में माना, और कानून के एक सक्रिय अध्ययन की वकालत की।

इसलिए, यह कानून के समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य का एक मात्र वर्णन नहीं रह जाता है, और सामाजिक परिवर्तन के उत्प्रेरक के रूप में कानून का एक मानक अध्ययन बन जाता है।

निष्कर्ष 

समाजशास्त्रीय न्यायशास्त्र स्कूल, कानून और समाज के बीच संबंधों का अध्ययन करता है। यह कानून और समाज की निर्भरता की व्याख्या करता है। समाज की आवश्यकता और संरचना को देखे और अध्ययन किए बिना कोई बेहतर और प्रभावी कानून नहीं बना सकता। बेहतरीन और सामंजस्यपूर्ण समाज के लिए हमें बेहतर और प्रभावी कानूनों की जरूरत है।

उदाहरण के लिए, 2012 में दिल्ली गैंग रेप हुआ (निर्भया गैंग रेप), और भारत में बलात्कार कानूनों में संशोधन किया गया।

भारत में हर समस्या के दो पहलू होते हैं, एक कानूनी और दूसरा सामाजिक पहलू। जैसे, कन्या भ्रूण हत्या का कानूनी पहलू 1795 में है, जहां बंगाल विनियमन XXI द्वारा शिशुहत्या को हत्या घोषित किया गया था। ब्रिटिश सरकार ने कन्या भ्रूण हत्या और उसी तरह के दुष्प्रचार के खिलाफ कदम उठाए। और इसका समाजशास्त्रीय पहलू यह है कि प्रकृति ने दोनों लिंगों को मानव जाति के अस्तित्व के लिए तैयार किया है। 2001 में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष द्वारा लैंगिक समानता और महिलाओं के सशक्तिकरण (एंपॉवरमेंट) को आठ सहस्राब्दी (मिलेनियम) विकास लक्ष्यों में से एक माना गया था।

न्यायशास्त्र के समाजशास्त्रीय स्कूल के न्यायविद अगस्त कॉम्टे, यूजीन एर्लिच, रोस्को पाउंड और डुगुइट हैं। अगस्त कॉम्टे का विचार था कि समाज एक जीव है और यह वैज्ञानिक सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होने पर प्रगति कर सकता है। जबकि यूजिन एर्लिच ने तर्क दिया कि “समाज कानून का मुख्य स्रोत है” और रोस्को पाउंड ने वकीलों की तुलना इंजीनियर्स से की और तर्क दिया कि कानून का उद्देश्य व्यक्तिगत हित और राज्य हित के बीच संघर्ष को हल करना है। 

संदर्भ

  • V.D.MAHAJAN, JURISPRUDENCE AND LEGAL THEORY,5th ed reprint 2006, Eastern book company, Lucknow, page no. 605, paragraph 1
  • Dr. B N Mani Tripathi, Jurisprudence Legal Theory,16th ed., Allahabad Book Agency, page no.49, paragraph 1

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here