भारतीय संविधान के तहत न्यायपालिका

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Indian constitution
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यह लेख  इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ, निरमा विश्वविद्यालय के तीसरे वर्ष के छात्र Yash Jain द्वारा लिखा गया है। लेख भारतीय संविधान में न्यायपालिका (ज्यूडिशियरी) की भूमिका पर चर्चा करता है। इसके अलावा, ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से यह स्पष्ट करता है कि क्या राज्य में न्यायपालिका शामिल है। इसका अनुवाद Sakshi kumari ने किया हैं जो फायरफील्ड इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी से बी ए एलएलबी की रही हैं।

Table of Contents

परिचय (इंट्रोडक्शन)

भारतीय राजनीति को 3 भागों में विभाजित (डिवाइड) किया गया है, अर्थात् विधायिका (लेजिस्लेचर), कार्यपालिका (एक्सक्यूटिव) और न्यायपालिका। विधायिका और कार्यपालिका साथ-साथ चलती है लेकिन न्यायपालिका अपने आप में स्वतंत्र है। भारतीय न्यायिक प्रणाली (ज्यूडिशियल सिस्टम) दुनिया की सबसे पुरानी न्यायिक व्यवस्थाओं में से एक है। भारतीय न्यायपालिका लोगों के हितों (इंटरेस्ट्स) की रक्षा करने और उन्हें त्वरित न्याय (स्पीडी जस्टिस) के लिए एक मंच प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत में न्यायिक प्रणाली का सबसे सर्वोच्च न्यायालय (हाईएस्ट कोर्ट) सुप्रीम कोर्ट हैं। यह भारत का सर्वोच्च न्यायालय है और संविधान का संरक्षक (कस्टोडियन) है। न्याय लोगों तक आसानी से पहुंचना चाहिए।

न्यायपालिका की विशेषताएं

1. दुनिया की सबसे पुरानी न्यायिक प्रणालियों में से एक हैं

भारत की न्यायिक प्रणाली दुनिया की सबसे प्रमुख न्यायिक प्रणालियों में से एक है। देश की न्यायिक संरचना (स्ट्रक्चर) का उपयोग देश के कानूनों की व्याख्या (इंटरप्रेट) और लागू करने के लिए किया जाता है। न्यायपालिका पक्षों के बीच विवादों को सौहार्दपूर्ण (एमिकेबली) ढंग से निपटाने में मदद करती है। डॉक्ट्रिन ऑफ ज्यूडिशियल सेप्रेशन न्यायपालिका को उनके अनुसार कानूनों की व्याख्या करने की स्वतंत्रता देता है। न्यायपालिका देश के लिए वैधानिक कानून (स्टेच्यूटरी लॉ) नहीं बनाती बल्कि देश में कानूनों की व्याख्या और लागू करती है।

2. एकल और एकीकृत न्यायिक प्रणाली (सिंगल एंड इंटीग्रेटेड ज्यूडिशियल सिस्टम)

भारत में, एक एकीकृत (इंटीग्रेटेड) और अद्वितीय (यूनिक) न्यायिक प्रणाली है जो संविधान में प्रचलित (प्रिवेल्स) है। सुप्रीम कोर्ट एकीकृत पदानुक्रम (हायरार्ची) के शीर्ष पर है। सुप्रीम कोर्ट के बाद, राज्य स्तर पर हाई कोर्ट हैं। हाई कोर्ट के तहत, डिस्ट्रिक्ट कोर्ट लोअर कोर्ट से मिलकर एक सुव्यवस्थित पदानुक्रम (वेल ऑर्गेनाइज्ड हायरार्ची)  है। भारत में, एक सेटअप है जो केंद्र और राज्य दोनों कानूनों को लागू करता है। भारत ने न्यायपालिका को एकीकृत किया है क्योंकि भारत में एक मजबूत केंद्र के साथ एक संघ (यूनियन) है जहां केंद्र के पास राज्य की तुलना में अधिक शक्ति है।

एकीकृत न्यायपालिका की विशेषताएं हैं, एक व्यक्ति को हाई कोर्ट में अपील करने का अधिकार है जब वह लोअर कोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं है। यह तथ्य कि हाई कोर्ट के न्यायाधीशों (जज) की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, एकीकृत न्यायपालिका की एक विशेषता है। हाई कोर्ट के न्यायाधीशों का वेतन (सैलरी) भी संसद द्वारा तय किया जाता है, यह भी एकीकृत न्यायपालिका की एक विशेषता है।

3. न्यायपालिका की स्वतंत्रता

यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित (इंश्योर) करने के लिए डॉक्ट्रिन ऑफ ज्यूडिशियल सेप्रेशन की प्रणाली को अपनाया है। लेकिन संसदीय संप्रभुता (पार्लियामेंट्री सोवरेनिटी) की अवधारणा (कॉन्सेप्ट) पर आधारित संवैधानिक व्यवस्थाओं  में डॉक्ट्रिन ऑफ ज्यूडिशियल सेप्रेशन को अपनाने से इंकार किया जाता है। इंग्लैंड में यह मामला है। यह आंशिक (पार्टली) रूप से भारत में भी है, क्योंकि भारत में संसदीय और संवैधानिक संप्रभुता के सिद्धांत एक साथ मिला कर बनाया गया हैं। न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ न्यायाधीशों द्वारा निष्पक्ष तरीके से यानी किसी बाहरी ताकत से मुक्त होकर कार्यों के अभ्यास करने की स्वतंत्रता है।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता की आवश्यकता

  • अंगों (ओर्गंस) के कामकाज की जांच करने के लिए।
  • संविधान के प्रावधानों (प्रोविजंस) की व्याख्या करना।
  • फेयर और निष्पक्ष (अनबायस्ड) तरीके से कार्य करना।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का महत्व

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ इसके अस्तित्व (एक्सिस्टेंस) के वर्षों के बाद भी स्पष्ट नहीं है। प्रावधानों के रूप में हमारा संविधान केवल न्यायपालिका की स्वतंत्रता की बात करता है लेकिन यह परिभाषित नहीं है कि वास्तव में न्यायपालिका की स्वतंत्रता क्या है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्राथमिक वार्ता शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर आधारित है जो कार्यपालिका और विधायिका से एक संस्था के रूप में न्यायपालिका की स्वतंत्रता की बात करती है।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता के सिद्धांत को विभिन्न मानवाधिकार (ह्यूमन राइट्स) उपकरणों (इंस्ट्रूमेंट्स) में निर्धारित किया गया है, जिसमें यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स और इंटरनेशनल कॉवेनेंट ऑन सिविल एंड पॉलिटिकल राइट्स (आर्टिकल 14) शामिल हैं। कई यूनाइटेड नेशन स्टैंडर्ड और यूरोपीय फ्रेमवर्क भी हैं।

4. ज्यूडिशियल एक्टिविज्म

ज्यूडिशियल एक्टिविज्म शब्द की उत्पत्ति यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका में हुई थी। 20वीं सदी के मध्य में ज्यूडिशियल एक्टिविज्म के सकारात्मक प्रभाव थे क्योंकि कोर्ट्स को लोगों के लोकतांत्रिक (डेमोक्रेटिक) अधिकारों को कायम रखने के रूप में देखा जाता था। ज्यूडिशियल एक्टिविज्म की अवधारणा वर्षों में तेजी से बढ़ी और सरकार के विधायी और कार्यकारी अंगों के अनर्गल (अनरेस्ट्रेंड) व्यवहार के संदर्भ में भारतीय लोगों के बीच एक बड़ी वैधता प्राप्त की हैं।

कई विद्वानों (स्कॉलर्स) ने नागरिक अधिकारों के संरक्षण में न्यायाधीशों के प्रयासों की प्रशंसा की। न्यायिक कार्यकर्ता (एक्टिविस्ट) प्रतिष्ठित नागरिक अधिकार कार्यकर्ता थे। हाल ही में, कुछ लोगों ने ज्यूडिशियल एक्टिविज्म को अपने अधिकार का दुरुपयोग करने वाले न्यायाधीश के रूप में वर्णित किया है क्योंकि लोकतंत्र न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच शक्तियों के समान सेपरेशन पर पनपता (थ्राइव) है। न्यायपालिका की ओर से अत्यधिक एक्टिविज्म को कभी-कभी सरकार के अन्य अंगों के अधिकारों की ओर बढ़ने के रूप में देखा जाता है।

ज्यूडिशियल एक्टिविज्म को न्यायिक समीक्षा (ज्यूडिशियल रिव्यू) के अभ्यास या किसी विशेष न्यायिक निर्णय के रूप में परिभाषित किया गया है जिसमें न्यायाधीश संवैधानिक मामलों पर निर्णय लेने और विधायी या कार्यकारी कार्रवाई को अमान्य करने के लिए तैयार है। न्यायाधीशों को सरकारी कार्रवाई की अनुमति देने या इसे मना करने दोनों के लिए कार्यकर्ता  कहा जा सकता है।

लोकतांत्रिक आदर्शों के फ्रेमवर्क के भीतर, सुशासन (गुड गवर्नेंस) की खोज में सरकारी नीतियों (पॉलिसी) और कार्यक्रमों को प्रभावित करने के लिए लोगों की भागीदारी की मूलभूत (परसूट) आवश्यकता है। भारतीय न्यायपालिका ने ज्यूडिशियल एक्टिविज्म का नेतृत्व (पायनियर) करते हुए सीमांत वर्गों (मार्जिनल सेक्शन) के हितों को बढ़ावा देने के लिए एक कार्यकर्ता की भूमिका निभाई है।

5. न्यायिक समीक्षा (ज्यूडिशियल रिव्यू)

न्यायिक समीक्षा की अवधारणा यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका में 1803 के मारबरी बनाम मैडिसन मामले में प्रतिपादित (प्रोपाउंड) की गई थी जिसका निर्णय अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस जॉन मार्शल ने दिया था। हालाँकि, जब हम भारत में इसके बारे में बात करते हैं, तो संवैधानिक समीक्षा की शक्ति संविधान के माध्यम से ही सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के भीतर रही है। साथ ही, भारत के हाई कोर्ट ने न्यायिक समीक्षा शक्ति को संविधान की एक बुनियादी (बेसिक) संरचना के रूप में घोषित किया है जिसे संवैधानिक अमेंडमेंट के माध्यम से भी नहीं हटाया जा सकता है। यदि न्यायिक समीक्षा के दौरान, राज्य सरकार या केंद्र सरकार के किसी भी विधायी इनैक्टमेंट या कार्यकारी आदेश को संविधान के उल्लंघन में पाया जाता है, तो इसे अमान्य घोषित कर दिया  जाता हैं।

भारत में न्यायिक समीक्षा के प्रकार

  • संवैधानिक संशोधनों की न्यायिक समीक्षा।
  • संसद और राज्य विधानसभाओं और अधीनस्थ विधान (सबॉर्डिनेट लेजिस्लेशन) के विधान की न्यायिक समीक्षा।
  • संघ और  राज्य के अधीन अधिकारियों की प्रशासनिक कार्रवाई (एडमिनिट्रेटिव एक्शन) की न्यायिक समीक्षा।

भारत में न्यायिक समीक्षा का महत्व

  • न्यायिक समीक्षा संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखने में मदद करती है।
  • संघीय संतुलन (फेडरल इक्विलिब्रियम) यानी केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति का वितरण (डिस्ट्रीब्यूशन) बनाए रखा जाता है।
  • नागरिकों के मौलिक अधिकारों (फंडामेंटल राइट्स) की रक्षा की जाती है।

न्यायिक समीक्षा के सार (एसेंस) को प्रतिपादित (प्रोपाउंड) करने वाले विभिन्न मामलों में निर्णय:

  • ए.के. गोपालन बनाम स्टेट ऑफ मद्रास

इस मामले में यह कहा गया था की “भारत में, यह संविधान है जो सर्वोच्च है और वैध होने के लिए एक वैधानिक कानून (स्टेट्यूट लॉ) संवैधानिक आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए और यह न्यायपालिका को तय करना है कि कोई एक्ट  संवैधानिक है या नहीं।”

  • स्टेट ऑफ मद्रास बनाम वी.जी.रो

इस मामले में यह कहा गया था की “हमारे संविधान में संविधान के अनुरूप कानून की न्यायिक समीक्षा के लिए स्पष्ट प्रावधान हैं। यह मौलिक अधिकारों के संबंध में विशेष रूप से सच है, जिसके लिए कोर्ट को क्वी वाइव पर प्रहरी (स्टिनेल) की भूमिका सौंपी गई है। ”

  • केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल

इस मामले में यह कहा गया था की “जब तक कुछ मौलिक अधिकार मौजूद हैं और संविधान का हिस्सा हैं, न्यायिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग यह देखने के लिए भी किया जाना चाहिए कि इन अधिकारों द्वारा प्रदान की गई गारंटी का उल्लंघन नहीं किया गया है।”

  • मिनर्वा मिल्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया

इस मामले में यह कहा गया था की “यह कानूनों की वैधता पर निर्णय करना न्यायाधीशों का कार्य है। यदि कोर्ट्स उस शक्ति से पूरी तरह वंचित हो जाते हैं, तो लोगों को दिए जाने वाले मौलिक अधिकार केवल अलंकरण (एडोरेमेंट) बन जाएंगे, क्योंकि बिना उपचार के अधिकार पानी में डुबाने (रिट इन वाटर) जैसा होगा हैं। एक नियंत्रित (कंट्रोल्ड) संविधान तब अनियंत्रित हो जाएगा।”

  • एल. चंद्र कुमार बनाम यूनियन ऑफ इंडिया

इस मामले में यह कहा गया था की “सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को संविधान को बनाए रखने का काम सौंपा गया है और इस उद्देश्य से इसकी व्याख्या करने की शक्ति प्रदान की गई है। उन्हें ही यह सुनिश्चित करना होता है कि संविधान द्वारा परिकल्पित (एविसेज्ड) शक्ति संतुलन (बैलेंस) बनाए रखा जाए और विधायिका और कार्यपालिका अपने कार्यों के निर्वहन (डिस्चार्ज) में संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन न करें।

  • एसएस बोला बनाम बी.डी. सरदाना

इस मामले में यह कहा गया था की “संस्थापक (फाउंडिंग) पिताओं ने बहुत बुद्धिमानी से, इसलिए, संविधान में न्यायिक समीक्षा के प्रावधानों को शामिल किया ताकि संघवाद (फेडरलिज्म)  का संतुलन बनाए रखा जा सके, मौलिक अधिकारों और नागरिकों को दी गई मौलिक स्वतंत्रता की रक्षा की जा सके और उपलब्धता (अवैबिलिटी) और आनंद के लिए एक उपयोगी हथियार वहन (अफोर्ड) किया जा सके। समानता, स्वतंत्रता और मौलिक स्वतंत्रता और एक स्वस्थ राष्ट्रवाद बनाने में मदद करने के लिए। न्यायिक समीक्षा का कार्य संवैधानिक व्याख्या का ही एक हिस्सा है। यह समय की नई परिस्थितियों और जरूरतों को पूरा करने के लिए संविधान को समायोजित (एडजस्ट) करता है।”

6. संविधान का दुभाषिया (इंटरप्रेटर ऑफ द कांस्टीट्यूशन)

भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। सुप्रीम कोर्ट भारत के संविधान के दुभाषिया (इंटरप्रेटर) के रूप में कार्य करता है। यह संविधान की व्याख्या करने का सर्वोच्च अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला सभी लोअर  कोर्ट पर बाध्यकारी होगा। संविधान निर्माताओं (मेकर्स) ने केवल संविधान बनाया लेकिन उसकी व्याख्या नहीं की। संविधान की व्याख्या का काम न्यायपालिका पर छोड़ दिया गया था। संविधान जो भारत का एक पवित्र (सैक्रेड) दस्तावेज (डॉक्यूमेंट) है, उसकी व्याख्या का कार्य न्यायपालिका पर है। न्यायपालिका वैधानिक कानूनों और प्रावधानों (प्रोविजंस) का विश्लेषण करके संविधान की व्याख्या करती है। संविधान की व्याख्या, जो अपने आप में एक कठिन कार्य है, न्यायपालिका ने बार-बार संविधान की व्याख्या के लिए मिसाल (प्रेसिडेंट) कायम की है।

7. मौलिक अधिकारों के संरक्षक (गार्जियन ऑफ फंडामेंटल राइट्स)

मौलिक अधिकार वे मूल (बेसिक) अधिकार हैं जो देश में प्रत्येक व्यक्ति जन्म से प्राप्त करता है। भारतीय संविधान के भाग III में मौलिक अधिकारों की गारंटी दी गई है। भारत के संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त 6 मौलिक अधिकार हैं। वे हैं समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण (एक्सप्लॉयटेशन) के विरुद्ध अधिकार, धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार, सांस्कृतिक (कल्चरल) और शैक्षिक अधिकार और संवैधानिक उपचार का अधिकार। भारतीय न्यायपालिका लोगों के अधिकारों और स्वतंत्रता के संरक्षक के रूप में कार्य करती है। यदि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है तो वह सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। संवैधानिक उपचार का अधिकार व्यक्तियों को कोर्ट्स से सुरक्षा की मांग करके अपने अधिकारों की रक्षा करने में मदद करता है। सुप्रीम कोर्ट संविधान के आर्टिकल 32 के तहत रिट जारी कर सकता है जबकि हाई कोर्ट भारतीय संविधान के आर्टिकल 226 के तहत रिट जारी कर सकता है।

8. जनहित याचिका प्रणाली (पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन सिस्टम)

जनहित याचिका की अवधारणा भारत में 1860 में पी.एन. भगवती और कृष्णा अय्यर द्वारा पेश की गई थी। जनहित याचिका पेश की गई थी क्योंकि भारत में आम सार्वजनिक कानून और महंगी कानूनी फीस की उपलब्धता (अवैबिलिटी) की कमी थी। न्यायपालिका में जनहित याचिका की एक अंतर्निहित (इन्हेरेट) विशेषता है। जनहित याचिका एक अतिरिक्त न्यायिक उपाय है जो लोगों को उनके अधिकारों को लागू करने में मदद करता है। जनहित याचिका न्यायिक सक्रियता का एक हिस्सा है जो न्यायिक प्रक्रिया को और अधिक लोकतांत्रिक बनाती है।

जनहित याचिका की विशेषताएं

  • जनहित याचिका बहुत सस्ती है क्योंकि इसे लगभग किसी भी कीमत पर दायर किया जा सकता है, इसलिए गरीब लोगों को भी न्याय मिल सकता है।
  • मानव अधिकारों या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर जनहित याचिका दायर की जा सकती है।
  • इसे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका के रूप में पंजीकृत (रजिस्ट्रेड) किया जा सकता है।
  • कोई भी व्यक्ति लोगों के समूह के हित के लिए जनहित याचिका दायर कर सकता है।

जनहित याचिका दायर करने की शर्तें

  • जनहित याचिका को राजनीति से प्रेरित नहीं होना चाहिए।
  • इसमें कोई छिपा हुआ एजेंडा नहीं होना चाहिए।
  • ऐसे विषय का मामला किसी अन्य कोर्ट में लंबित (पेंडिंग) नहीं होना चाहिए।

जनहित याचिका दायर करने का उद्देश्य

  • यह सभी के लिए सामाजिक न्याय प्राप्त करने में मदद करता है।
  • यह कानूनी कार्यवाही के माध्यम से एक बड़े मुद्दे को वैध तरीके से हल करने में मदद करता है।
  • यह सरकार या निजी पक्षों के खिलाफ अधिकारों का दावा करने में फायदेमंद है।
  • जनहित याचिका का उपयोग बड़ी जनता के कल्याण के लिए किया जाता है, इसलिए यह प्रकृति में बहुत लोकतांत्रिक है।

जनहित याचिका के गुण (मेरिट्स ऑफ पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन)

  • जनहित याचिका सबसे सस्ता उपाय है, इस प्रकार यह आम जनता के लिए बहुत सस्ती है।
  • जनहित याचिका दायर करने की प्रक्रिया बहुत आसान है।
  • यह पर्यावरण कानून, स्वास्थ्य के मुद्दों और मानवाधिकारों से संबंधित है।

 जनहित याचिका के दोष (डिमेरिट्स ऑफ पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन)

  • जनहित याचिका इतनी लोकप्रिय हो गई है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ज्यादातर अन्य मामलों के बजाय जनहित याचिका से निपटते हैं, इस प्रकार लंबित मामलों को छोड़ देते हैं जो तेजी से बढ़ रहे हैं।
  • राजनीतिक दल और जन दबाव समूह अपने दुर्भावनापूर्ण (मलाफाइड) इरादे के लिए जनहित याचिका दायर कर रहे हैं।

9. संघ और राज्यों के बीच विवादों में मध्यस्थ (आर्बिट्रेटर इन डिस्प्यूट्स बिटवीन यूनियन एंड स्टेट)

संविधान विवादों के सभी मामलों में सुप्रीम कोर्ट को अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिकन) देता है:

  • भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच।
  • भारत सरकार और एक तरफ किसी राज्य या राज्यों के बीच और दूसरी तरफ एक या अधिक राज्यों के बीच और
  • दो या दो से अधिक राज्यों के बीच।

भारतीय संविधान के आर्टिकल 12 के तहत राज्य

संविधान के आर्टिकल 12 में कहा गया है कि:

“इस भाग में, जब तक कि संदर्भ (कॉन्टेक्स्ट) से अन्यथा अपेक्षित (रिक्वायर) न हो, “राज्य” के अंतर्गत भारत की सरकार और संसद तथा राज्यों में से प्रत्येक राज्य की सरकार और विधान- मंडल तथा भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन सभी स्थानीय और अन्य प्राधिकारी हैं

आर्टिकल 12 का दायरा

आर्टिकल 12 के तहत राज्य की परिभाषा केवल भारतीय संविधान के भाग III पर लागू होती है। भाग III में वे मौलिक अधिकार शामिल हैं जो देश में प्रत्येक व्यक्ति के पास हैं। हालांकि व्यक्तियों का एक निकाय (बॉडी) एक ‘राज्य’ का गठन (कांस्टीट्यूट) नहीं कर सकता है, लेकिन गैर-संवैधानिक आधार पर या केवल संविधान के भाग III के बाहर कुछ प्रावधान के उल्लंघन में आर्टिकल 226 के तहत एक रिट याचिका दायर करके उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है।

भाग III में राज्य

जब तक अन्यथा न हो, संविधान के भाग III के प्रयोजन (पर्पस) के लिए, राज्य में शामिल हैं:

  1. भारत की सरकार और संसद यानी संघ की कार्यपालिका और विधायिका।
  2. प्रत्येक राज्य की सरकार और विधानमंडल (लेजिस्लेचर) यानी भारत के विभिन्न राज्यों की कार्यपालिका और विधानमंडल।
  3. भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण।
  4. सभी स्थानीय और अन्य प्राधिकरण जो भारत सरकार के नियंत्रण में हैं।

राज्य की परिभाषा प्रकृति में बहुत व्यापक (वाइड) है। शब्द ‘शामिल’ संपूर्ण नहीं है, लेकिन प्रकृति में समावेशी (इनक्लूसिव) है। विभिन्न व्याख्याओं और न्यायिक घोषणाओं  (प्रोनाउंसमेंटस) के माध्यम से राज्य शब्द ने अपना दायरा बढ़ाया है। आज, राज्य शब्द का दायरा संविधान निर्माताओं के दिमाग में संविधान बनाने के दौरान जितना व्यापक था, उससे कहीं अधिक व्यापक है।

क्या “राज्य” में न्यायपालिका शामिल है?

यह सवाल कि क्या राज्य में न्यायपालिका शामिल है, हर समय के उबलते (बायलिंग) सवालों में से एक है। कोर्ट ने समय-समय पर विभिन्न व्याख्याएं प्रदान की हैं कि क्या न्यायपालिका को राज्य के दायरे में आना चाहिए या नहीं। कुछ मामलों में, न्यायपालिका को एक राज्य के रूप में माना गया है, कुछ मामलों में, इसे एक राज्य के रूप में नहीं माना गया है। न्यायपालिका राज्य का हिस्सा है या नहीं, यह तस्वीर भ्रामक (डेल्यूड) है। ऐसे कई कानूनी मामले हैं जहां कोर्ट द्वारा न्यायपालिका के मुद्दे को उठाया गया था। कुछ ऐतिहासिक (लैंडमार्क) निर्णय नीचे दिए गए हैं:

  • रतिलाल बनाम स्टेट ऑफ बॉम्बे में, कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 12 के तहत राज्य की परिभाषा में ‘न्यायपालिका’ शब्द का विशेष रूप से उल्लेख नहीं किया गया है। तो न्यायपालिका एक राज्य नहीं है। इसलिए, मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए कोर्ट के फैसले को चुनौती नहीं दी जा सकती है।
  • उज्जम बाई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि उत्प्रेषण (सर्सियोररी) का रिट उन निकायों के लिए भी झूठ हो सकता है जो न्यायिक या अर्ध-न्यायिक (क्वासी ज्यूडिशियल) रूप से कार्य करने के लिए बाध्य हैं। चूंकि ऐसी रिट झूठ है, इसलिए यह इस प्रकार है कि कुछ मौलिक अधिकार हैं जिनका उल्लंघन किसी कोर्ट में न्यायिक रूप से कार्य करने वाले न्यायाधीश द्वारा किया जा सकता है। चूंकि सुप्रीम कोर्ट के किसी भी निर्णय की बाध्यकारी शक्ति इस तथ्य पर आधारित है कि यह राज्य द्वारा समर्थित (रिलेटेड) है जिसके पास लागू करने की शक्ति और आवश्यक संसाधन (रिसोर्स) हैं, यह केवल तर्कसंगत (लॉजिकल) होगा कि न्यायपालिका को ही राज्य का हिस्सा माना जाए।

उदाहरण के लिए, जहां एक न्यायाधीश अछूत (अनटचेबल) को अपने कोर्ट कक्ष में प्रवेश से इनकार करता है, वह आर्टिकल 17 का उल्लंघन करने का दोषी होगा। इसी तरह, यदि कोई न्यायाधीश किसी को आपत्तिजनक (इंक्रिमेटिंग) प्रश्नों का उत्तर देने के लिए मजबूर करता है तो वह आर्टिकल 20 (3) का उल्लंघन करने का दोषी है। उपरोक्त आधारों पर, कोर्ट द्वारा यह माना गया कि न्यायपालिका को राज्य के अधीन आना चाहिए।

  • प्रेम चंद गर्ग बनाम आबकारी आयुक्त (एक्साइज कमिशनर) में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो संभावनाएं हैं, एक जहां न्यायपालिका को राज्य माना जाता है और दूसरा जहां न्यायपालिका को राज्य नहीं माना जाता है। जब न्यायपालिका अपनी ‘न्यायिक क्षमता’ में कार्य करती है, तो इसे ‘अन्य प्राधिकरणों’ के अर्थ में शामिल नहीं किया जाता है और इसे राज्य के रूप में नहीं माना जाता है। जब न्यायपालिका अपनी ‘प्रशासनिक क्षमता’ में कार्य करती है, तो इसे ‘अन्य प्राधिकरणों’ के अर्थ में शामिल किया जाता है और इसे राज्य माना जाता है।
  • परमात्मा शरण बनाम मुख्य न्यायाधीश में, राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा कि कोर्ट के फैसले को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है कि वे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं चाहे कोर्ट के फैसले में कोई दोष हो या नहीं, यह हो सकता है अपील में ही फैसला किया है। हालाँकि, यदि न्यायपालिका प्रशासनिक क्षमता में कार्य करती है या प्रशासनिक कार्य करती है या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले नियम और कानून बनाती है तो इसे कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
  • नरेश श्रीधर बनाम स्टेट ऑफ बॉम्बे, बहुमत ने माना कि कोर्ट द्वारा मौलिक अधिकारों का दमन (सप्रेशन) कार्यवाही की सुनवाई का फैसला करने के लिए कोर्ट की शक्ति से अधिक महत्व नहीं रखता है। कोर्ट के पास सार्वजनिक सुनवाई करने या बंद कमरे में सुनवाई करने का पूर्ण विवेकाधिकार (डिस्क्रिशन) है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आर्टिकल 19(1) के तहत अधिकार भी आर्टिकल 19(2) में दिए गए उचित प्रतिबंधों (रिस्ट्रिक्टेड) द्वारा प्रतिबंधित है। इसके अलावा, कोर्ट ने माना कि न्याय का प्रभावी प्रशासन अधिक महत्वपूर्ण है, भले ही कोर्ट के आदेश से कुछ मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो। यदि कोर्ट निर्णय लेता है कि कोर्ट एक राज्य है, तो उसके आदेशों के विरुद्ध आर्टिकल 32 के तहत रिट जारी नहीं की जा सकती क्योंकि ऐसे आदेशों में नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है। अत: न्यायपालिका राज्य का अंग नहीं है।
  • ए.आर. अंतुले बनाम आर.एस. नायक, सुप्रीम कोर्ट के 7 न्यायाधीशों की एक संवैधानिक बेंच ने कहा कि कोर्ट ऐसे आदेश और निर्देश नहीं दे सकती है जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं अर्थात न्यायालय को भी आर्टिकल 32 के तहत राज्य शब्द में शामिल किया जा सकता है। 
  • रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा में, सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल से निपटा (डील) कि क्या समीक्षा याचिका खारिज होने के बाद एपेक्स कोर्ट के फैसले की वैधता पर सवाल उठाने के लिए आर्टिकल 32 के तहत एक रिट याचिका को बनाए रखा जा सकता है। कोर्ट ने माना कि दुर्लभ से दुर्लभ (रेयरेस्ट ऑफ रेयर) मामले में आर्टिकल 32 के तहत एक याचिका समीक्षा याचिका खारिज होने के बाद भी स्वीकार की जाती है। इसलिए, अन्यथा,सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित एक आदेश आर्टिकल 32 के तहत अधिकार क्षेत्र में आने योग्य नहीं था। इसलिए न्यायपालिका को आर्टिकल 12 के तहत राज्य के रूप में नहीं माना जाता है।

निष्कर्ष (कंक्लूज़न)

प्रत्येक प्राधिकरण जो भारतीय संविधान के आर्टिकल 12 के अंतर्गत आता है, एक राज्य का गठन करता है। ‘अन्य प्राधिकरण’ शब्द बहुत विशाल है और न्यायिक निर्णयों के साथ बदल गया है। न्यायालयों ने प्राधिकरणों, निगमों (कॉरपोरेशन), संस्थानों की स्थिति की जांच करने के लिए विभिन्न परीक्षण निर्धारित किए हैं कि वे राज्य हैं या नहीं और यदि वे बताते हैं कि कोई व्यक्ति अपने मौलिक अधिकारों का दावा कर सकता है या नहीं। ‘अन्य प्राधिकरण’ शब्द को संविधान में कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है जो कोर्ट्स को अपने तरीके से इस शब्द की व्याख्या करने के लिए पूर्ण विवेक और शक्ति देता है।

आर्टिकल 12 के तहत राज्य शब्द केवल भारतीय संविधान के भाग III और IV पर लागू होता है और भारतीय संविधान के भाग XIV में मौजूद आर्टिकल 309, 310 और 311 पर लागू नहीं होता है। इसलिए, एक कर्मचारी भाग III के तहत सुरक्षा का दावा कर सकता है लेकिन राज्य के सिविल सेवकों के लिए आर्टिकल  311 के तहत अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकता है। सभी वैधानिक निकाय ‘स्टेट’ नहीं हैं।

वैधानिक और गैर-सांविधिक दोनों निकाय राज्य हो सकते हैं बशर्ते वे ‘सांविधिक वित्तपोषित (स्टेच्यूटरी फाइनेंस्ड) हों और सरकार का गहरा और व्यापक (परवेसिव) नियंत्रण’ रखते हों। ओएनजीसी, एलआईसी, आईएफसी, बिजली बोर्ड, दिल्ली परिवहन निगम जैसी इकाइयों (यूनिट्स) को राज्य कहा जाता है। हालाँकि, एनसीआरटी जैसी संस्थाओं को राज्य नहीं माना जाता है क्योंकि उन्हें सरकार द्वारा वित्तपोषित नहीं किया जाता है और नियंत्रण व्यापक नहीं होता है।

चूंकि ‘न्यायपालिका’ शब्द का आर्टिकल  12 में कोई उल्लेख नहीं है, यह भारतीय संविधान के भाग III में सभी विवादों का मूल कारण है।

न्यायपालिका को राज्य की परिभाषा में शामिल किया जाना चाहिए। चूंकि न्यायपालिका की भूमिका नियम बनाना, कोर्ट्स की प्रथाओं और प्रक्रियाओं को विनियमित करना, कर्मचारियों की नियुक्ति करना है, यह राज्य की भूमिका निभाता है। यह एक अच्छी तरह से स्थापित तथ्य है कि न्यायपालिका एक राज्य है जब वह गैर-न्यायिक (नॉन जीडिशियल)  कार्य करती है। चूंकि यह माना गया है कि न्यायिक आदेश मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर सकते हैं, न्यायपालिका भी राज्य की श्रेणी में आती है।

इसलिए, न्यायपालिका को भाग III के दायरे में लाना और राज्य की स्थिति को सर्वोच्च न्याय देने का अधिकार देना वांछनीय (डिजायरेबल) है।

संदर्भ (रेफरेंसेस)

  • AIR 1950 SC 27.
  • AIR 1952 SC 196.
  • AIR 1973 SC 1461.
  • AIR 1980 SC 1789.
  • 1997 (2) SCR 1186.
  • AIR 1997 SC 3127.
  • AIR 1954 SC 388.
  • AIR 1962 SC 1621.
  • AIR 1963 SC 996.
  • AIR 1964 Raj 13.
  • AIR 1967 SC 1.
  • AIR 1984 SC 684.
  • (2002) 4 SCC 388.

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