भारतीय संविधान के तहत न्यायिक समीक्षा

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Constitution of India

यह लेख डिप्लोमा इन एडवांस्ड कॉन्ट्रैक्ट ड्राफ्टिंग नेगोशिएशन एंड डिस्प्यूट रेजोल्यूशन कर रहे Devansh Singh द्वारा लिखा गया है और इसे Oishika Banerji (टीम लॉसीखो) द्वारा संपादित किया गया है। यह लेख भारतीय संविधान के तहत न्यायिक समीक्षा के बारे में बात करता है। इस लेख का अनुवाद Revati Magaonkar द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय 

न्यायिक समीक्षा (ज्यूडिशियल रिव्यू) संसद द्वारा पारित किसी भी कानून की संवैधानिकता की जांच करने की प्रक्रिया है। यदि पारित कानून भारतीय संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो या तो उच्च न्यायालय या भारत का सर्वोच्च न्यायालय उन्हें शून्य घोषित कर सकता है, जिससे उन्हें लागू करने की अनुमति नहीं मिलती है। अमेरिकी राजनेता और वकील जॉन मार्शल ने न्यायिक समीक्षा की अवधारणा का निर्माण किया था। भारत में, कानून के शासन के सिद्धांत का पालन किया जाता है और भारतीय संविधान को भूमि का सर्वोच्च कानून माना जाता है। बनाए गए कानून संविधान की मूल संरचना के अनुरूप होने चाहिए न कि इसके रुकावट (एबेयंस) के रूप में, क्योंकि बाद वाला स्वत: ही (इप्सो फैक्टो) निरस्त (नलीफाइड) हो जाता है। हालांकि भारतीय संविधान में ‘न्यायिक समीक्षा’ शब्द का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिल सकता है, संविधान के कई प्रावधान हैं जो इस अवधारणा पर एक संदर्भ या संकेत देते हैं। जब भी हम न्यायिक समीक्षा की बात करते हैं, तो जिन दो महत्वपूर्ण कार्यों पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है, वे हैं: 

  1. सरकारी कार्यों का वैधीकरण (लेजीटीमेशन)।
  2. सरकार द्वारा संविधान पर अतिक्रमण होने से बचाना।

यह दो महत्वपूर्ण कार्य हैं।

यह लेख भारतीय संविधान के संबंध में न्यायिक समीक्षा की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करता है। 

न्यायिक समीक्षा का महत्व

न्यायिक समीक्षा आवश्यक है क्योंकि यह भारतीय संविधान के भाग III के तहत निर्धारित नागरिकों और निवासियों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है जिससे संविधान की सर्वोच्चता बनी रहती है और विधायिका और कार्यपालिका (लेजिस्लेचर एंड एक्जीक्यूटिव) को अपनी निहित शक्तियों का दुरुपयोग करने से रोकता है। कार्यकारी कार्यों और विधायी अधिनियमों की जांच करने की न्यायपालिका की शक्ति न्यायिक समीक्षा में शामिल है। न्यायिक समीक्षा के महत्व को निम्नलिखित तरीकों से समझा जा सकता है:

  1. न्यायिक समीक्षा का अभ्यास संघ और राज्यों के बीच शक्तियों के वितरण में मदद करता है। 
  2. यह सुनिश्चित करता है कि न्यायपालिका स्वतंत्र है क्योंकि यह स्वतंत्र रूप से काम करती है जिससे सरकार के प्रत्येक अंग के कार्यों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाता है।
  3. यह भारतीय संविधान द्वारा आश्वस्त (गारंटीड) नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है।

न्यायिक समीक्षा के तत्व 

सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों दोनों के पास क्रमशः अनुच्छेद 32 और 226 के तहत इस न्यायिक समीक्षा का प्रयोग करने की शक्ति है। जबकि अनुच्छेद 32 यह प्रदान करता है कि कोई व्यक्ति अपने मौलिक अधिकारों के किसी भी प्रकार के उल्लंघन के लिए सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है, अनुच्छेद 226 स्पष्ट रूप से बताता है कि एक व्यक्ति समान आधार पर उच्च न्यायालयों का दरवाजा खटखटा सकता है। न्यायिक समीक्षा राज्य और केंद्र दोनों द्वारा बनाए गए कानूनों पर की जा सकती है। 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 32 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 32 व्यक्तियों को संवैधानिक उपाय के अधिकार का आश्वासन देता है, जिसके माध्यम से वे भारत के सर्वोच्च न्यायालय से न्याय प्राप्त करने के लिए संपर्क कर सकते हैं, उन मामलों में जहां उन्हें उनके आश्वासित मौलिक अधिकारों से वंचित किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय को निर्देश देने की शक्ति निहित है जो वंचित अधिकारों को लागू करने में सहायता करती है और साथ ही उन्हें अधिकार बहाल भी करती है। इसलिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 को मौलिक अधिकारों के रक्षक और जिम्मेदारी लेनेवाले (गारंटर) के रूप में भी माना जाता है।

यह ध्यान में रखना जरूरी है कि भारतीय संविधान 5 प्रकार के रिट प्रदान करता है जो अनुच्छेद 32 के तहत दायर एक याचिका के परिणामस्वरूप न्यायालय द्वारा जारी किए जा सकते हैं। ये बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस), परमादेश (मैंडमस), उत्प्रेषण/प्रमाणपत्र की रिट (सर्शीयोररी), अधिकार-पृच्छा (क्यो वारंटो) और निषेध (प्रोहिबिशन) की रिट हैं। संवैधानिक उपचार नागरिकों को उनके उल्लंघन किए गए अधिकार उन्हे वापस बहाल करने के सुसज्जित साधन प्रदान करते हैं। यह ध्यान में रखना जरूरी है कि संविधान द्वारा प्रदान की जाने वाली रिट क्षेत्राधिकार (ज्यूरिस्डिक्शन), विशेषाधिकार शक्तियों के साथ आता है और यद्यपि विवेकाधीन (डिस्क्रेशनरी) है, इसकी सीमाएं असीमित हैं। इसी के आधार पर यह स्पष्ट है कि संवैधानिक व्यवस्था मनमानी शक्तियों की उपस्थिति को स्वीकार नहीं करती है। इसलिए, अनुच्छेद 32 द्वारा याचिका किए जाने पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जो भी निर्णय लिया जाता है, वह ठोस तर्क पर आधारित होना चाहिए। 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 

अनुच्छेद 32 की तुलना में अनुच्छेद 226 की विशेषता यह है कि अनुच्छेद 32 केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित है, और अनुच्छेद 226 मौलिक अधिकारों के साथ-साथ कानून के सवालों से भी निपट सकता है। हालांकि अनुच्छेद 226 के तहत अपनी निहित शक्ति का प्रयोग करना उच्च न्यायालयों के लिए विवेकाधीन है, इस तरह के विवेक के लिए ठोस न्यायिक तर्क की आवश्यकता होती है। यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि जब उच्च न्यायालय चर्चा किए गए प्रावधान के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हैं, तो न्यायालय इस बात पर विचार करने के लिए बाध्य होते है कि जिस याचिकाकर्ता ने उनसे संपर्क किया था, उसके पास अनुच्छेद 226 के तहत प्रदान किए गए उपाय के अलावा कोई वैकल्पिक उपाय (अल्टरनेट रेमेडी) नहीं था।  

राजस्थान उच्च न्यायालय ने उचित रूप से देखा है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा की शक्ति जो उच्च न्यायालयों को निहित की गई है, वह ऐसे संविधान की मूलभूत विशेषताओं में से एक मानी जाती है और इसकी किसी भी कानून के तहत निहित अधिकार क्षेत्र पर अधिभाव (ओवरराइड) से इस तरह के लिए जगह नहीं हो सकती है यह एल एन जे पावर वेंचर्स लिमिटेड बनाम राजस्थान विद्युत नियामक आयोग और अन्य (2022) के मामले का फैसला करते समय उच्च न्यायालय द्वारा बताया गया था।

न्यायिक समीक्षा के कार्य

न्यायिक समीक्षा का मुख्य कार्य विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों की व्याख्या करना है। न्यायिक समीक्षा यह सुनिश्चित करती है कि जो कानून पारित किया गया है वह भारतीय संविधान के प्रावधान का उल्लंघन नहीं कर रहा है। यह सरकार के विधायी और कार्यकारी विभाग द्वारा पारित कानून की समीक्षा करता है। न्यायिक समीक्षा देश के सभी नागरिकों को न्याय भी प्रदान करती है और इसलिए इसे संविधान का संरक्षक कहा जा सकता है।

न्यायिक समीक्षा के लिए आधार

न्यायिक समीक्षा के आधार निम्नलिखित हैं:-

क्षेत्राधिकार त्रुटि (ज्यूरिज्डीक्शनल एरर)

यह वास्तव में तब होता है जब किसी शिकायत को न्यायालय द्वारा गलत तरीके से संबोधित किया गया हो। जब की न्यायालय को ऐसा करने का अधिकार नहीं है। इस त्रुटि को ” उत्प्रेषण ” की रिट जारी करके संबोधित किया जा सकता है।

तर्कहीनता (इरेशनेलिटी)

इसे “वेडनेसबरी अनरीजनेबलनेस” (मतलब एक ऐसा निर्णय या विचार जो इतना अनुचित्त है कि इसे कोई उचित व्यक्ति अपना कार्य उचित तरिके से करते समय नही करेगा) के नाम से भी जाना जाता है। इसमें कोई भी निर्णय लेनेवाला एक ही निर्णय पर नहीं आता है। वे प्रासंगिक मामलों पर विचार करने में विफल रहते हैं।

प्रक्रियात्मक अनुपयुक्तता (प्रोसीजरल इंप्रोप्राइटी)

यह निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करने में विफलता है। इसमें वास्तव में दो क्षेत्र शामिल हैं, अर्थात् नियमों और न्याय के मौलिक नियम का पालन करने में विफलता।

न्यायिक समीक्षा के प्रकार

न्यायिक समीक्षा तीन प्रकार की होती है, अर्थात्-

विधायी (लेजिस्लेटीव) निर्णय 

विधायी निर्णयों की न्यायिक समीक्षा का अर्थ है कि सरकार के विधायी अंग द्वारा जो भी कानून पारित किया जाता है, उसे संविधान के प्रावधानों का पालन करना चाहिए। इसे संविधान के किसी भी प्रावधान का अनादर या अवज्ञा (डिसओबे) नहीं करनी चाहिए। 

प्रशासनिक (एडमिनीस्ट्रेटीव) निर्णय 

प्रशासनिक निर्णयों की न्यायिक समीक्षा का अर्थ है कि न्यायालय के पास विधायिका और कार्यपालिका की किसी कार्रवाई की समीक्षा करने की शक्ति है। यदि उनके कार्य संविधान के किसी भी अनुच्छेद का उल्लंघन करते हुए पाए जाते हैं, तो उन्हें शून्य घोषित कर दिया जाएगा। इसलिए, उनके कार्यों को संविधान के प्रावधानों का पालन करना चाहिए। 

न्यायिक निर्णय 

न्यायिक निर्णयों की न्यायिक समीक्षा उच्च न्यायालयों को उनकी कार्यक्षमता में हस्तक्षेप किए बिना निचली न्यायालयों द्वारा पारित निर्णय का अवलोकन (ओवेरव्यू) करने का प्रतीक है। भारतीय न्यायपालिका के कुशल कामकाज के लिए भी यही आवश्यक है। 

भारत में न्यायिक समीक्षा की प्रक्रिया

वाक्यांश “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया”, जैसा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदान किया गया है, न्यायिक समीक्षा की अवधारणा के लिए यह शासी (गवर्निंग) सिद्धांत के रूप में कार्य करता है। इस सिद्धांत का वास्तव में यह अर्थ है कि जो कानून विधायिका द्वारा अधिनियमित किया गया है वह वैध है या उसका कानूनी प्रभाव तभी पड़ता है जब सही प्रक्रिया का पालन किया जाता है। संवैधानिकता की एक कसौटी होती है जिसे कानून को पास करना होता है और अगर कानून उस कसौटी पर खरा उतरता है तभी यह एक प्रवर्तनीय (इंफोर्सेबल) कानून हो सकता है।

न्यायिक समीक्षा की सीमाएं

न्यायिक समीक्षा केवल सर्वोच्च न्यायालयों और उच्च न्यायालयों जैसे न्यायालयों तक ही सीमित है, निचली न्यायालयों तक नहीं। न्यायिक समीक्षा न तो किसी राजनीतिक प्रश्न को बाधित कर सकती है और न ही किसी नीतिगत (पॉलिसी) मामले को। न्यायिक समीक्षा केवल उस कानून की समीक्षा करती है जो बनाया गया था। यह कानून नहीं बनाता या लागू नहीं करता क्योंकि यह शक्ति सरकार के अन्य अंगों के पास निहित है। यह सरकार के कामकाज को भी सीमित करता है।

न्यायिक समीक्षा में उपलब्ध कुछ संभावित उपाय क्या हैं?

न्यायिक समीक्षा में उपाय विवेकाधीन है। इसलिए, भले ही किसी सार्वजनिक प्राधिकरण ने अवैध तरीके से काम किया हो, अगर ऐसा कार्य जनता के हित में किया गया हो तो न्यायालय किसी उपाय के आदेश को जारी करने से इनकार कर सकती है। न्यायिक समीक्षा कार्यवाही में अन्य बातों के साथ-साथ कुछ संभावित उपचार हैं, अर्थात्-

रद्द करने के आदेश

यह किसी भी निर्णय या आदेश या समीक्षा के अधीन कार्रवाई को उलट देता है, जिससे यह कानूनी रूप से शून्य हो जाता है।

अनिवार्य (मैंडेटरी) आदेश

यह एक सार्वजनिक प्राधिकरण को एक विशेष कार्य करने के लिए मजबूर करता है, उदाहरण के लिए, एक विशिष्ट समय अवधि के भीतर एक निर्णय को पुनर्जीवित करने के लिए।

निषेधात्मक (प्रोहिबिटरी) आदेश

यह किसी सार्वजनिक प्राधिकरण को निर्णय लेने से प्रतिबंधित करता है।

घोषित करना (डिक्लेरेशन)

यह एक घोषणा है कि कानून क्या है, ऐसे मामलों में जहां टकराव होता है।

हर्जाना (डैमेजेस)

ऐसे आदेश वे होते हैं जो किसी लोक प्राधिकरण को हर्जाने के लिए भुगतान करने का आदेश देते हैं। बहरहाल, इस तरह का उपाय तभी काम करता है जब कोई अन्य कानूनी उपाय भी मांगा जाता है।

भारत में न्यायिक समीक्षा का वर्तमान परिदृश्य (सिनेरियो) क्या है

भारतीय न्यायालय के सामने आने वाले मामलों की वर्तमान श्रृंखला, जहां उन्हें न्यायिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग करने के लिए कहा जा रहा है, लेकिन न्यायिक अतिक्रमण से बचने के कारण न्यायालयों में इससे पीछे हटने की यानी की इसका प्रयोग न करने की प्रवृत्ति देखी गई है। संतोष नांता बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य व अन्य (2023), के मामले का फैसला करते हुए हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने बताया कि न्यायिक समीक्षा का उपयोग यदि किसी चयन समिति (सिलेक्शन कमिटी) के विशेषज्ञ डोमेन द्वारा किए जाने वाले तर्कपूर्ण चयन प्रक्रिया के लिए, किए गए किसी भी निर्णय की अनदेखी करने में किया जाता है, तो इसे खुद ही अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारने के बराबर माना जाएगा और इसलिए यहा न्यायिक हस्तक्षेप से बचना चाहिए।

इसके अलावा, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने नल्लाचेरुवु ओबुलेसु बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (2023) के मामले का फैसला करते हुए कहा है कि निविदा (टेंडर) आमंत्रण शर्तों से उत्पन्न विवाद के मामलों में न्यायिक समीक्षा करने की न्यायालय की शक्ति सीमित है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि निविदा के नियम और शर्तें सरकार द्वारा निर्देशित की जाती हैं, जो एक विचारशील प्रकृति और तर्कपूर्ण निर्णय लेने के बाद उसी को निर्धारित करते हैं। निविदा आमंत्रित करने वाले प्राधिकारी (अथॉरिटी) को उसी में उपयुक्त न्यायाधीश माना जाता है, और उसके फैसले पर सवाल उठाना न्यायालय द्वारा उसके कामकाज में स्वत: हस्तक्षेप है। इस प्रकार, निविदा की शर्तें अच्छी हैं या बुरी हैं इसका निष्कर्ष निकालने का कार्य न्यायालय के लिए नहीं है। 

इन निर्णयों से पता चलता है कि न्यायपालिका स्वयं न्यायिक समीक्षा की विवेकाधीन शक्ति का प्रयोग करते हुए पर्याप्त रूप से सचेत (कांशियस) रही है, जिससे न्यायिक अतिरेक (ज्यूडिशियल ओवररीच) से सर्वोत्तम रूप से बचा जा सके। 

निष्कर्ष

न्यायिक समीक्षा भारतीय संविधान द्वारा वरिष्ठ न्यायालयों के हाथों में प्रदान किया गया सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली उपकरण है। यह सरकार के अन्य अंगों पर नियंत्रण रखता है ताकि वे अनावश्यक हस्तक्षेप के बिना ठीक से काम करें। इस प्रकार, न्यायिक समीक्षा अति प्राचीन समय की आवश्यकता के रूप में है और इसे भारतीय संविधान की मूल संरचना भी माना जाता है।  

 

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