ज्यूडिशियल एक्टिविज्म वर्सेज ज्यूडिशियल रिस्ट्रेंट:  द इंडियन डिसेरे (न्यायिक सक्रियता की तुलना में न्यायिक संयम: एक भारतीय अव्यवस्था)

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Judicial Activism Versus Judicial Restraint
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यह लेख सिम्बायोसिस लॉ स्कूल, हैदराबाद की छात्रा Shruti Kulshreshtha द्वारा लिखा गया एक विस्तृत लेख है जिसमें वह भारतीय परिदृश्य में न्यायिक सक्रियता (ज्यूडिशियल एक्टिविज्म) और न्यायिक संयम (ज्यूडिशियल रिस्ट्रेंट) के बीच अंतर  बताती है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja द्वारा किया गया है।  

परिचय (इंट्रोडक्शन)

भारत में, न्यायपालिका (ज्यूडिशियरी) एक सर्वोत्कृष्ट (क्विंटेसेंशियल)  स्थिति पर है क्योंकि उसे विधान (लेजिस्लेचर) की कानूनी वैधता (वैलिडिटी), कार्यान्वयन (इंप्लीमेंटेशन) और व्याख्या (इंटरप्रिटेशन) की जांच करने का अधिकार दिया गया है। न्यायिक प्रणाली (सिस्टम) से इस तरह से कार्य करने की अपेक्षा की जाती है ताकि उनके द्वारा निष्पक्ष (फेयर) और समान (इक्विटेबल) न्याय की सेवा के साथ-साथ, सभी नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा भी की जा सके। तेजी से बदलते भारतीय सामाजिक-आर्थिक -राजनीतिक परिदृश्य (सिनेरियो) में, नागरिकों को न्यायपालिका द्वारा प्रदर्शन और कर्तव्यों में बदलाव की उम्मीद है, जो बदलते दृष्टिकोण (पर्सपेक्टिव) के अनुसार न्याय सुनिश्चित करने में उनके लिए एक चुनौती सिद्ध होती है। यहां, न्यायिक सक्रियता ( ज्यूडिशल एक्टिविज्म) और न्यायिक संयम (रिस्ट्रेंट) की अवधारणाएं (कांसेप्ट) सामने आती हैं। इन अवधारणाओं का उपयोग न्यायिक निर्णय को बनाए रखने के लिए न्यायाधीशों द्वारा इस्तेमाल किए गए दर्शन शास्त्र (फिलोसोफी) को परिभाषित करने के लिए किया जाता है, जो एक दूसरे के बिल्कुल ही विपरीत होते हैं। मूल रूप से, वे वर्णन करते हैं कि न्यायाधीश कैसे न्याय करते हैं। जबकि, पहली एक गतिशील (डायनामिक) अवधारणा है जो समाज के बदलते दृष्टिकोण पर विचार करती है,  और बाद  वाली अवधारणा कानूनों की सख्त व्याख्या पर निर्भर करती है। ये दोनों अवधारणाएं विभिन्न अन्य सिद्धांतों (डॉक्ट्रींस) और विचारधाराओं (आईडियोलॉजी) पर निर्भर करती हैं जिन पर चर्चा की जाएगी।

न्यायिक संयम ( ज्यूडिशियल रिस्ट्रेंट)

न्यायिक संयम न्यायपालिका के लिए व्याख्या का एक सिद्धांत है। यह एक धारणा है जो दर्शाती है कि न्यायाधीशों को अपनी शक्तियों का  सीमित रूप से इस्तेमाल करना चाहिए और निर्णय या कार्यवाही को अपनी प्राथमिकताओं (प्रेफरेंस) और दृष्टिकोणों से प्रभावित नहीं करना चाहिए बल्कि उन्हें संवैधानिक (कंस्टीट्यूशनल) और वैधानिक (स्टेट्यूटरी) जनादेशों (मैंडेट) को ध्यान में रखकर अपना निर्णय लेना चाहिए। यह अवधारणा, यह प्रतिपादित (प्रोपाउंड) करती है कि जब तक कोई कानून असंवैधानिक (अनकंस्टीट्यूशनल) न हों, तब तक न्यायाधीशों को उन कानूनों को रद्द करने में संकोच करना चाहिए। न्यायिक संयम का समर्थन करने वाले न्यायविदों (ज़्यूरिस्ट) का यह तर्क है कि, न्यायाधीशों के पास कोई नीति-निर्माण (पॉलिसी मेकिंग) शक्ति नहीं है और इसलिए, उन्हें विधायी मंशा (इंटेंट), निर्णीतानुसरण (डॉक्ट्रिन ऑफ़ स्टेयर डिसाइसिस) पर ज्यादा से ज्यादा निर्भर रहना चाहिए और न्यायिक व्याख्या का सख्त प्रयोग करना चाहिए।

न्यायिक संयम की एक प्रसिद्ध परिभाषा, ईस्टर्न मिशिगन यूनिवर्सिटी द्वारा दी गई है जो कि फंडामेंटल्स ऑफ ज्यूडिशियल फिलोसोफी द्वारा प्रकाशित (पब्लिश) की गई है, “एक न्यायविद (न्यायाधीश या न्याय) जो संयम की अवधारणा का पालन करता है, उसे ऐसे व्यक्ति के रूप में वर्णित (कैरक्टराइज्ड) किया जा सकता है जो मानता है कि लोकतंत्र (डेमोक्रेसी) में आंतरिक मूल्य (इंट्रिंसिक वैल्यू) है, ना कि बस साधन मूल्य (इंस्ट्रूमेंटल वैल्यू) है, और यह भी है कि न्यायपालिका सरकार की तीन शाखाओं में सबसे कम शक्तिशाली शाखा है; और कानून बनाने में स्थिरता (स्टेबिलिटी) और पूर्वानुमेयता (प्रेडिक्टबिलिटी) के मूल्यों का सम्मान करती है।”

इस प्रक्रियात्मक (प्रोसीजरल) सिद्धांत के अनुसार, न्यायाधीशों को संवैधानिक मुद्दों से निपटने वाले मामलों में पर्याप्त अनुरोध (डिफेरेंस) देने और संवैधानिक सिद्धांतों का सुसंगत उल्लंघन (कोहेरेंट वायलेशन) होने पर ही अपने कार्यों को रद्द करने की आवश्यकता होती है। न्यायिक समीक्षा (रिव्यू) की धारणा को न्यायालयों द्वारा सीमित किया जाना चाहिए ताकि नीतियों में नए विचारों को बढ़ावा दिया जा सके। इसलिए, न्यायपालिका को निम्नलिखित पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए:

  1. संविधान निर्माताओं की मंशा
  2. पूर्व निर्णय (प्रेसिडेंट)
  3. नीति-निर्माण में लिप्त (इन्डल्ज) न हों

राजस्थान राज्य बनाम भारत संघ (1977) का मामला एक ऐतिहासिक निर्णय है जहां न्यायालय ने इस मामले में शामिल नहीं होने का फैसला किया क्योंकि इसमें राजनीतिक जांच (पॉलिटिकल इंक्वायरी) शामिल थी, इस प्रकार से इस मामले में न्यायिक संयम के सिद्धांत का पालन किया गया था। साथ ही, एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि मामला राजनीतिक जांच से संबंधित है और इसलिए, न्यायालयों को हस्तक्षेप (इंटरफेयर) नहीं करना चाहिए। न्यायाधीश अहमदी ने कहा कि राजनीतिक विकल्पों की जांच के लिए न्यायिक रूप से समझदार मानकों (सेंसिबल स्टैंडर्ड) को आगे बढ़ाना कठिन था और अगर न्यायालय ऐसा करते हैं तो यह राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करेंगे और राजनीतिक विकल्पों की जांच करेंगे, जिससे अदालत को बचना चाहिए। एक अन्य मामले में, अलमित्रा एच.पटेल बनाम भारत संघ, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह अदालत का कर्तव्य नहीं था कि वह नगर पालिका को निर्देश दे कि उनके कार्यों को कैसे किया जाना है, जब तक कि कोई स्पष्ट उल्लंघन न हो। न्यायालय को सिर्फ अधिकार है कि वह केवल अधिकारियों को कानून द्वारा निर्धारित गतिविधियों के संचालन (कंडक्ट) के लिए निर्देश दे।

न्यायिक सक्रियता (ज्यूडिशियल एक्टिविज्म)

न्यायिक सक्रियता, न्यायिक संयम के विपरीत एक सिद्धांत है, जिसके द्वारा न्यायविदों का मानना ​​है कि,  न्यायाधीशों को बदलते समाज के अनुसार न्यायिक दृष्टिकोण को समझना चाहिए। ब्लैक लॉ डिक्शनरी के अनुसार, न्यायिक सक्रियता न्यायिक दर्शन शास्त्र है जो न्यायाधीशों को पारंपरिक (ट्रेडिशनल) पूर्व निर्णय से हटने के लिए प्रेरित करता है और प्रगतिशील (प्रोग्रेसिव) व नई सामाजिक नीतियों के पक्ष में प्रेरित करता है। जब कार्यपालिका (एग्जीक्यूटिव) जनता के पक्ष में निर्णय नहीं लेती है, तो न्यायपालिका, संविधान द्वारा निहित शक्तियों के साथ, ऐसी सार्वजनिक शिकायतों को हल करने के लिए नियम बनाती है। इन सब के द्वारा न्यायिक सक्रियता की अवधारणा का विकास हुआ है क्योंकि इस अवधारणा ने सामाजिक कल्याण को महत्व दिया है। कभी-कभी, न्यायाधीश कानून की व्याख्या इस तरह से करने का निर्णय लेते हैं जो संविधान के प्रारूपण (ड्राफ्टिंग) के दौरान तैयार की गई विचारधाराओं के विपरीत मौजूदा विचारधाराओं के अनुरूप (कंसोनेंस) हो। न्यायिक कार्यकर्ता (एक्टिविस्ट) मामलों में अपनी मर्जी से निर्णय लेते हैं और वर्तमान समय की सामाजिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कानूनी मुद्दों पर प्रतिक्रिया देते हैं।

इस सिद्धांत के समर्थकों का मानना यह ​​है कि कानून की व्याख्या, आज के समाज में चल रहे मूल्यों और शर्तों के अनुसार की जानी चाहिए क्योंकि वे बदलते समाज के साथ बदलते रहते हैं। इसलिए, न्यायिक निर्णयों को इन परिवर्तनों को भी प्रतिबिंबित (रिफ्लेक्ट) करना चाहिए। जब सरकार की अन्य शाखाएं अपेक्षित तरीके से कार्य नहीं करती तो अदालतों को अन्याय को सुधारने के लिए अपनी शक्तियों का उपयोग करना चाहिए। 

हालाँकि, आज-कल के समय में, न्यायिक सक्रियता की अवधारणा की कानूनी बंधुत्व (लीगल फ्रेटरनिटी) के द्वारा बहुत आलोचना की गई है, क्योंकि यह सरकार के अन्य अंगों के क्षेत्रों में हस्तक्षेप करके, शक्तियों के पृथक्करण (सेपरेशन ऑफ पावर) के सिद्धांत के खिलाफ होता है। यह न्यायाधीशों को भारतीय संविधान की सख्त व्याख्या ना करने के लिए भी प्रोत्साहित करता है, जिससे की राष्ट्र की मूल तत्व (ग्रंड नॉर्म) की पवित्रता कम हो जाती है और संविधान निर्माताओं की मंशा का विरोध होता है। एक प्रमुख निर्णय, मेनका गांधी बनाम भारत संघ, न्यायिक सक्रियता का उत्कृष्ट (एक्सीलेंट) उदाहरण है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 में ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया (प्रोसीजर इस्टैब्लिश्ट बाय लॉ)’ का वर्णन किया, जिसे ‘कानून की उचित प्रक्रिया (ड्यू प्रोसेस ऑफ़ लॉ)’ या न्याय, समानता और अच्छा विवेक सुनिश्चित (इंश्योर) करने वाली प्रक्रिया के रूप में पुन: स्थापित किया गया। एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड बनाम भारत संघ  जो  की सेकंड जजेस केस के नाम से भी प्रख्यात है,  इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत ‘सहमति (कन्करन्स)’ और ‘परामर्श (कंसल्टेशन)’ की शर्तों को व्याख्या दी गई, और यह न्यायालय द्वारा न्यायिक सक्रियता के उपयोग का एक और उदाहरण है।

शक्तियों का पृथक्करण और न्यायिक संयम (सेपरेशन ऑफ पावर एंड ज्यूडिशियल रिस्ट्रेंट)

मोंटेस्क्यू के अनुसार, यदि न्यायिक शक्तियों और विधायी (लेजिसलेटिव) शक्तियों का विलय (मर्ज्ड) कर दिया जाता है, तो नागरिकों का जीवन और स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी, और तब न्यायाधीश, एक विधायक के रूप में कार्य करेगा। यहां तक कि अगर, न्यायिक और कार्यकारी शक्तियों का विलय हो जाए,  तो न्यायाधीश एक अत्याचारी (अप्रेसर) के रूप में कार्य करेगा, जिसके परिणामस्वरूप कार्रवाई में मनमानी (आर्बिट्रेरी) हो सकती है। इसलिए, उनका तर्क है कि शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत लोकतांत्रिक शासन की आधुनिक प्रणाली के लिए सार्वकालिक (इटर्नल) है। प्रो. डी.डी. बसु ने शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को स्पष्ट रूप से समझाया है जिसमें यह निम्नलिखित दो प्रमुख सिद्धांत शामिल है:

  1. विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका कोई भी ऐसा कार्य नहीं कर सकती जो अन्य दो अंगों में से किसी एक से संबंधित हो।
  2. विधानमंडल अपनी शक्तियों और कर्तव्यों का कार्यभार किसी और पर नहीं सौंप सकते (नो डेलिगेशन)।

हालांकि, यह प्रणाली भारतीय संविधान में कहीं भी नहीं लिखी हुई है, लेकिन शासन के उद्देश्यों के लिए इसका पालन किया जाता है। संविधान में कुछ अनुच्छेद हैं जो इस सिद्धांत का सुझाव देते हैं, लेकिन फिर भी, यह स्पष्ट रूप से कहीं नहीं कहा गया है। वास्तव में, बिहार राज्य बनाम बाल मुकुंद शाह के मामले में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को संविधान की मूल विशेषताओं (बेसिक स्ट्रक्चर) में से एक घोषित किया गया था।

यह सिद्धांत भारत में सख्त अर्थों में लागू नहीं होता। संविधान ने प्रत्येक अंग को एक विशिष्ट (स्पेसिफिक) अर्थ में सौंपकर इसका पालन करने का प्रयास किया है। उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 121 के तहत सांसद, सर्वोच्च न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय के किसी भी न्यायाधीश के आचरण पर चर्चा करने के लिए प्रतिबद्ध (रिस्ट्रिक्टेड) है। इसी तरह, न्यायालयों को अनुच्छेद 212 के तहत विधायी कार्यवाही की जांच करने के लिए प्रतिबंधित किया गया है। इसलिए, यह स्पष्ट है कि संविधान न्यायपालिका को विधायिका या कार्यपालिका के प्रतिनिधी (सब्सिट्यूट) के रूप में किसी भी मायने में उनकी विफलता पर नहीं देखता। न्यायपालिका को अपनी सीमा खुद तय करनी होती है। यहाँ न्यायिक संयम की भूमिका आती है।

जैसा कि पहले चर्चा की गई थी, राजस्थान राज्य बनाम भारत संघ का मामला न्यायिक संयम को बढ़ावा देने में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के आवेदन का एक आदर्श उदाहरण है, जहां अदालत ने इस मामले में शामिल ना होना उचित समझा क्योंकि यह राजनीतिक मामलों से अत्यधिक संबंधित था। न्यायमूर्ति ए.एस. आनंद, पूर्व सी.जे.आई ने कहा कि न्यायाधीशों को अपने न्यायिक कार्यों का अभ्यास करने में आत्म-अनुशासन (सेल्फ डिसीप्लिन) का पालन करना चाहिए और अगर न्यायिक संयम के सिद्धांत का विकास नहीं होता तो, प्रत्येक न्यायाधीश स्वयं ही नए कानून बनाते रहते, जिसके परिणामस्वरूप भारी अव्यवस्था होती है। इसलिए, न्यायाधीशों को अपनी राय और व्यक्तिगत कल्पनाओं के अनुसार अपनी शक्तियों का प्रयोग सीमित तरह से करने के लिए, न्यायिक संयम महत्वपूर्ण है।

न्यायपालिका द्वारा शक्तियों के दुरुपयोग का एक उदाहरण जेपी उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य है, जहां अदालतें संविधान के अनुच्छेद 21 की व्याख्या करते हुए अनुच्छेद 37 को पढ़ती हैं। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अनुच्छेद 37 राज्य नीति का एक निर्देशक सिद्धांत है (डायरेक्टिव प्रिंसिपल ऑफ स्टेट पॉलिसी), जो सामाजिक-आर्थिक आदर्श है और कानून में लागू नहीं  होते है। दूसरी ओर, अनुच्छेद 21 एक मौलिक अधिकार (फंडामेंटल राइट) है। इसलिए, न्यायिक सक्रियता के सिद्धांत ने अदालत को संविधान निर्माताओं के इरादे की तुलना में एक अलग रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया।

चूंकि शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत पहले ही स्थापित हो चुका था, तो विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनो का पालन करने और उसे लागू करने के लिए न्यायाधीश की सीमित भूमिका होती है। न्यायिक संयम की धारणा के समर्थकों का  यह मानना ​​​​है कि सार्वजनिक नीति के लिए निष्पक्षता की परवाह किए बिना, न्यायाधीश को कानून का प्रशासन करना आवश्यक होता है। हालांकि, कानूनों को सख्त रूप से अमल करने से, किसी भी कानून के शुद्ध उद्देश्य के बावजूद, वह एक विपरीत प्रभाव डाल सकता है। न्यायपालिका की भूमिका के मूल्यांकन से यह पता चला है कि एक न्यायाधीश के कर्तव्यों को एक विधायक के रूप में भी सीमित किया जाता है। किसी भी कानून के प्रालेख के निर्माता कानून के एक ही क्षेत्र में होने वाली घटनाओं की अनंत संभावनाओं को नहीं समझ सकते। किसी कानून के लिए किसी स्थिति की सभी संभावनाओं को शामिल करना और उसके अधिदेश (मैंडेट) या सुधार या उपाय के लिए प्रावधान बनाना आम तौर पर असंभव है।

इसलिए, परिणाम की संभावनाएं बहुत अधिक हैं, जिससे किसी भी अधिनियमन के लिए संभावनाओं के कुछ कोनों को छोड़ देना अनिवार्य हो जाता है। ऐसे तथ्यों का एक समूह हो सकता है जो कानून में पहले से मौजूद व्यापकता (जनरैलिटीज) से अकल्पनीय हैं। ऐसे मामलों में, न्यायाधीश इसकी व्याख्या के उद्देश्य से, कानून के निर्माताओं के दिमाग को पढ़ने और उचित निर्णय देने के लिए बाध्य है। इसलिए, न्यायाधीश, विधायक की तरह सोचता है ताकि मामले पर फैसला किया जा सके। यहां, न्यायिक संयम और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत की सख्त व्याख्या, निर्णय को बेकार या शायद, अलाभकारी (नॉन वायबल) बना देगी।

न्यायिक सक्रियता में प्रवृत्ति (ट्रेंड इन ज्यूडिशल एक्टिविज्म)

भारतीय संविधान में कहीं भी न्यायिक सक्रियता शब्द का उल्लेख नहीं है। हालाँकि, यह न्यायिक व्याख्या का एक अभिन्न (इंटीग्रल) अंग बन गया है। न्यायिक सक्रियता की अवधारणा का विस्तार लोकस स्टैंडी, न्यायिक समीक्षा, संशोधन (अमेंडमेंट) और जनहित याचिका (पी.आई.एल) के उदारीकरण (लिबरलाइजेशन) के आगमन के साथ हुआ है, जिसे सोशल एक्शन लिटिगेशन (एस.ए.एल.) के रूप में भी जाना जाता है। जन-उत्साही (पब्लिक-स्पिरिटेड) व्यक्तियों और संगठनों (ऑर्गेनाइजेशन) के उत्थान (इमर्जन्स) के साथ, सार्वजनिक कार्रवाइयों में मनमानी के खिलाफ सामान्य रूप से समाज में सक्रिय भागीदारी बढ़ी, जिससे न्याय तक पहुंचने की भूमिका आगे बढ़ी।

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के ऐतिहासिक फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान की बुनियादी विशेषताएं जैसे लोकतंत्र, कानून का शासन, संघीय (फेड्रल) व्यवस्था, धर्मनिरपेक्षता (सेक्युलर) और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को शामिल करने वाले संशोधनों को असंवैधानिक माना जाएगा। इस मामले ने मूल संरचना के सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ़ बेसिक स्ट्रक्चर) को जन्म दिया। यहां, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि मूल संरचना के सिद्धांत का उल्लेख संविधान के किसी भी पाठ में नहीं है बल्कि  यह न्यायालय द्वारा स्थापित किया गया एक सिद्धांत है। यह भारतीय परिदृश्य में न्यायिक सक्रियता का सबसे अच्छा उदाहरण है क्योंकि न्यायालय ने इस मामले में, सरकार के अंगों द्वारा घोषित नीतियों के दुरुपयोग का मूल्यांकन किया था। न्यायमूर्ति भगवती ने यह भी कहा है कि न्यायिक सक्रियता हर राजनीतिक व्यवस्था की केंद्रीय विशेषता है जो स्वाधीन और स्वतंत्र न्यायपालिका को न्यायिक (एडज्यूडिकेटरी) शक्तियों के साथ सशक्त बनाती है।

वर्तमान परिदृश्य में न्यायिक सक्रियता की आवश्यकता (द नेसेसिटी ऑफ ज्यूडिशल एक्टिविज्म  इन प्रेजेंट सिनेरियो)

न्यायिक सक्रियता की आवश्यकता को समझने के लिए हमें उन कारणों का विश्लेषण करना होगा जिनके कारण न्यायपालिका को सक्रिय भूमिका निभाने के लिए मजबूर होना पड़ा। ऐसा समय था जब यह स्पष्ट हो चुका था कि भ्रष्टाचार, सरकार के अंगों में पैर जमा रहा है, चाहे वह राजनीति में धन बल हो, कार्यपालिका का कठोर ढांचा हो, संसदीय अज्ञानता हो या लोकतंत्र का विध्वंस (डिस्ट्रक्शन) होना हो । ऐसे परिदृश्य में, न्यायपालिका के लिए, एक मात्र दर्शक (स्पेक्टेटर) बनकर, हाथों में अपार शक्तियां लेकर समाज में हो रहे कुछ बुरे कामों को संशोधित करना एक मुश्किल  कार्य था। कानून का शासन, लोकतंत्र को बनाए रखने के संवैधानिक दायित्व को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है और समाज को सही रास्ते पर लाने के लिए न्यायपालिका की भूमिका होती है। न्यायालय ने महसूस किया कि अगर वे अस्पष्ट सीमाओं के कुछ क्षेत्रों में कदम रखने के लिए अनिच्छुक (रिलक्टेंट) रहे, तो लोकतंत्र की बुनियादी संरचना को जोखिम में डालना पड़ेगा।

न्यायमूर्ति गजेंद्रगडकर ने अपने निर्णयों के माध्यम से श्रम कानून (लेबर लॉ) व्यवस्था में विभिन्न नियमों को प्रस्तावित किया क्योंकि उन्हें अधिनियमों से परे नियमों की आवश्यकता महसूस हुई। ऐसे उदाहरणों में से एक यह भी है कि उन्होंने सत्यनारायण बनाम ईस्टर्न पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी के मामले में  एक कर्मचारी को खुद का बचाव करने का अवसर दिया और  यह भी कहा की उसके बचाव के लिए एक अनिवार्य जांच की जाएगी क्योंकि उसे दुर्व्यवहार (मिसकंडक्ट) के कारण बर्खास्त (डिस्मिस) करने का निर्देश दिया गया था।

विशाखा बनाम राजस्थान राज्य का मामला स्पष्ट रूप से न्यायिक सक्रियता की आवश्यकता पर चर्चा करता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न (सेक्शूअल हैरेसमेंट) के खिलाफ लैंगिक (जेन्डर)  समानता कानूनों को लागू करने के संबंध में अधिनियम की अनुपस्थिति के कारण, अदालत के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि महिलाओं के साथ उचित व्यवहार करने के लिए सभी कार्यस्थलों (वर्कप्लेस) पर दिशानिर्देशों का पालन किया जाना चाहिए। इसके अलावा, अदालत ने निर्देश दिया कि इन दिशानिर्देशों को संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत एक कानून के रूप में माना जाएगा जब तक कि इस उद्देश्य के लिए संसद द्वारा कानून नहीं बनाया जाता। ऐसे मामले भारत में न्यायिक सक्रियता के कार्यान्वयन की आवश्यकता को दर्शाते हैं।

अनुच्छेद 21 और न्यायिक सक्रियता (आर्टिकल 21 एंड ज्यूडिशल एक्टिविज्म)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना जीवन और स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता। ए.के.गोपालन बनाम मद्रास राज्य में, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि न केवल एक व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए कानून द्वारा स्थापित एक प्रक्रिया की आवश्यकता है, बल्कि ऐसी प्रक्रिया के लिए न्यायसंगत (फेयर), निष्पक्ष और उचित होना आवश्यक है। न्यायमूर्ति हरिलाल ने तर्क को खारिज कर दिया और अनुच्छेद 21 के तहत ‘प्रक्रिया’ शब्द की व्याख्या की। हालांकि, न्यायालय ने बहुमत से माना कि वह विधायिका द्वारा दी गई प्रक्रिया की तर्कसंगतता (रीज़नेबलनेस) की जांच नहीं करेगा। यह स्थिति,1950 के दशक में थी।

1960 के दशक में, गोलकनाथ मामले के साथ, देश ने न्यायपालिका के सुरक्षात्मक रवैये को देखा, जब यह फैसला सुनाया गया कि सांसद को स्वयं किसी और कानून के माध्यम से नागरिकों के मौलिक अधिकारों को छीनने का कोई अधिकार नहीं है। उन अधिनियमों के लिए जो पहले ही पारित (पास) और कार्यान्वित हो चुके हैं, संभावित अधिनिर्णय का नियम (प्रोस्पेक्टिव ओवर-रूलिंग) लागू होगा।

आपातकाल (इमरजेंसी) के बाद की अवधि में, भारत ने मौलिक अधिकारों की व्याख्या के उदारीकरण को देखा। ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ को दी गई संकीर्ण (नैरो) व्याख्या का निपटारा किया गया और सुप्रीम कोर्ट ने मेनका गांधी बनाम भारत संघ और अन्य के माध्यम से अनुच्छेद 21 को शिष्ट (लिबरल) व्याख्या दी। इस मामले में, ‘जनहित’ के क्षेत्र को विस्तृत (वाइडन) अर्थ दिया गया और अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ की  शिष्ट व्याख्या दी। कुछ साल बाद, न्यायपालिका ने देखा कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से पीड़ित लोग, कई कारणों से निवारण (रिड्रेसल) की मांग नहीं कर पा रहे थे, जिसका मुख्य रूप से न्यायपालिका से संपर्क करने  का यह भी कारण था कि उनके पास वित्त (फाइनेंस) और साक्षरता (लिटरेसी) की कमी थी। इसलिए, न्यायालयों ने समाज के सभी वर्गों के बेहतर प्रतिनिधित्व (रिप्रेजेंटेशन) के उद्देश्य से, जनहित याचिका शुरू करने के लिए लोकस स्टैंडी की अवधारणा का विस्तार किया। जनहित याचिकाएं न्यायपालिका द्वारा न्यायिक सक्रियता का सबसे उपयोगी परिणाम हैं।

न्यायिक सक्रियता की एक और संभावना तब खुल गई जब आर राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य के मामले में अनुच्छेद 21 के तहत ‘निजता का अधिकार (राइट टू प्राइवेसी)’ देखा गया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक नागरिक को अपने स्वयं के व्यक्ति की गोपनीयता (प्राइवेसी) और अपने परिवार, विवाह, प्रजनन (प्रोक्रिएशन) आदि  की गोपनीयता की रक्षा करने का अधिकार है। आजीविका (लाइवलीहुड) के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में शामिल किया गया। कपिला हिंगोरानी बनाम भारत संघ में न्यायालय ने देखा की भोजन का अधिकार भी अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक हिस्सा है और मौलिक अधिकार के रूप में भारत के सभी नागरिकों को आजीविका के साधन उपलब्ध कराना राज्य का कर्तव्य है। न्यायिक सक्रियता के दायरे का विस्तार होता रहा और कई अन्य अधिकार जिनका संविधान के पाठ में मूल रूप से उल्लेख नहीं किया गया, उन्हें न्यायपालिका द्वारा अनुच्छेद 21 क्षेत्र में लाया गया। इसमें निष्पक्ष परीक्षण (फेयर ट्रायल) का अधिकार, पानी का अधिकार, स्वास्थ्य और चिकित्सा देखभाल का अधिकार, त्वरित परीक्षण (स्पीडी ट्रायल) का अधिकार, कानूनी सहायता का अधिकार और कई अन्य शामिल हैं।

इसलिए, हम देख सकते हैं कि अनुच्छेद 21 की व्याख्या में न्यायिक सक्रियता के सिद्धांत का उपयोग बढ़ रहा है। हालांकि, जो लोग इस सिद्धांत के खिलाफ हैं, वे आश्चर्य करते हैं कि अनुच्छेद 21 में अन्य अधिकारों को पढ़ने की एक सीमा होनी चाहिए।

निष्कर्ष (कंक्लूज़न)

यह सच है कि यदि न्यायाधीश कार्यपालिका और विधायिका के कार्यों को अपने हाथों में लेते हैं तो कुछ मुद्दे उठना लाजिमी (बाउंड) है जैसे विशेषज्ञता की कमी और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को विकृत (डिस्टॉर्ट) करना। लेकिन भारतीय परिदृश्य में वर्तमान समय में मामलों की जटिलता ( कंपलेक्सिटी) के कारण व्याख्या करते समय न्यायाधीशों को रचनात्मकता (क्रिएटिव) व्यक्तिगत दिमाग और अनुप्रयोग की भी आवश्यकता होती है।

संदर्भ (रेफरेंसेस)

 

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