अंतरिम जमानत

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Criminal Procedure Code
Interim Bail

यह लेख Sujitha‌ ‌S‌ द्वारा लिखा गया है जो स्कूल ऑफ एक्सीलेंस, चेन्नई से लॉ कर रहीं हैं। यह लेख अंतरिम जमानत (इंटरिम बेल) की अवधारणा, एक अल्पकालिक (शॉर्ट टर्म) जमानत, इसकी शर्तों और आधारों के साथ-साथ प्रासंगिक निर्णयों और व्यावहारिक बारीकियों पर विस्तार से बताने की कोशिश करता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय 

“जमानत का मुद्दा स्वतंत्रता, न्याय, सार्वजनिक सुरक्षा और सार्वजनिक कोष (ट्रेजरी) का बोझ है, जो सभी इस बात पर जोर देते हैं कि जमानत का विकसित न्यायशास्त्र (ज्यूरिस्प्रूडेंस), सामाजिक रूप से संवेदनशील न्यायिक प्रक्रिया का अभिन्न अंग है।” —न्यायमूर्ति वी.आर कृष्णा अय्यर

एक मजबूत इतिहास और अंग्रेजी और अमेरिकी दोनों कानूनों में इसकी जड़ों के साथ, जमानत का कानून प्रक्रियात्मक (प्रोसीजरल) कानून का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। अब जमानत क्या है? ‘जमानत’ शब्द को आपराधिक प्रक्रिया संहिता (1973) में परिभाषित नहीं किया गया है, लेकिन फिर भी इसका उपयोग इसमे किया गया है। कुल मिलाकर, आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 में कई बार ‘जमानत’, ‘जमानती’ और ‘गैर-जमानती’ शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इस प्रकार, जमानत एक ऐसे व्यक्ति की रिहाई है जिसे गिरफ्तार किया गया था, और यह रिहाई उसके जमानतदारों (श्योरिटी) द्वारा उनकी गारंटी के बदले में करवाई जाती है की वह अदालत के सामने आएगा और निर्दिष्ट स्थान और समय पर अदालत के फैसले के लिए खुद को प्रस्तुत करेगा। जमानत का सीधा सा मतलब है कि एक कैदी रिहा होने से पहले अदालत में पेश होगा। 

आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 436 से 450 में जमानत और बॉन्ड से संबंधित प्रावधान शामिल हैं। इसके अलावा, अपराध की गंभीरता के आधार पर जमानत को तीन श्रेणियों में बांटा गया है: सामान्य, अग्रिम (एंटीसिपेटरी) और अंतरिम जमानत। आइए अधिक जानने के लिए इस लेख को विस्तार से पढ़ें।

जमानत: एक अवलोकन (ओवरव्यू)

जमानत जिसे अंग्रेजी में बेल कहते हैं, वह पुराने फ्रांसीसी शब्द ‘बैलियर’ से आया है, जिसका अर्थ है देना या वितरित करना। जमानत की अवधारणा आपराधिक न्याय प्रणाली के पीछे मूल विचारों में से एक है, जो संविधान के भाग III और IV में बनाए गए मौलिक मूल्यों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय संधियों (ट्रीटी) और अनुबंधों (कॉन्ट्रेक्ट) में उल्लिखित मानवाधिकारों के संरक्षण के अनुरूप है। आगे की समझ के लिए, इन बिंदुओं पर विचार करें:

  • व्हार्टन के लेक्सिकॉन और स्ट्राउड्स ज्यूडिशियल डिक्शनरी के अनुसार, जमानत को प्रतिवादी (डिफेंडेंट) को कानून की हिरासत से मुक्त करने के बाद उसके जमानतदारों की हिरासत में सौंपने के रूप में वर्णित किया गया है, जो उसे एक निश्चित दिन और समय पर उसके मुकदमे के लिए अदालत के सामने पेश करने के लिए बाध्य करता हैं।
  • कमलापति त्रिवेदी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1979) में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आरोपी को अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक हित का आनंद लेने का अधिकार दो मौलिक मानवीय मूल्य हैं जिन्हें संतुलित किया जाना चाहिए। आरोपी की रिहाई मुकदमे का सामना करने के लिए अदालत में आरोपी की पेशी पर निर्भर है।

जमानत का वर्गीकरण (क्लासिफिकेशन)

नियमित (रेगुलर) जमानत 

नियमित जमानत उन स्थितियों में दी जाती है जहां किसी व्यक्ति को पहले ही हिरासत में या गिरफ्तार किया जा चुका हो। सीआरपीसी की धारा 437 और 439 के तहत नियमित जमानत का आवेदन दाखिल किया जा सकता है। धारा 437 के अनुसार, अदालत या पुलिस अधिकारी के पास गैर-जमानती मामले, जिसमें मौत या आजीवन कारावास जैसी सजा की कोई संभावना नहीं होती है, में आरोपी व्यक्ति को जमानत पर रिहा करने का विकल्प होता है। हालांकि, 16 साल से कम उम्र के व्यक्ति, एक महिला, या बीमार या कमजोर व्यक्ति को जमानत पर रिहा किया जा सकता है, भले ही जिस अपराध के लिए वे आरोपी हैं, उसमें मौत या उम्रकैद की सजा हो।

धारा 439 के अनुसार, उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय के पास जमानत देने या जमानत को संशोधित करने का विशेष अधिकार है। उपरोक्त अदालतों को किसी ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी और हिरासत का आदेश देने का अधिकार है, जिस पर अपराध करने का आरोप है और उसे हिरासत में रखा जा रहा है। वे जमानत पर आरोपी की रिहाई पर शर्तें भी लगा सकते हैं और मजिस्ट्रेट द्वारा जमानत पर आरोपी की रिहाई पर रखी गई किसी भी शर्त को अलग या संशोधित कर सकते हैं। मनोज कुमार बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2019) के मामले में, हिमाचल प्रदेश के उच्च न्यायालय ने निर्धारित किया कि एक आरोपी व्यक्ति को जमानत देने से मुकदमे में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित होती है।

अग्रिम जमानत 

एक व्यक्ति, एक अग्रिम जमानत का आवेदन प्रस्तुत कर सकता है यदि उसे लगता है कि उसे पुलिस द्वारा ऐसे अपराध के लिए हिरासत में लिया जाएगा, जिसके लिए बॉन्ड की कोई संभावना नहीं है। संहिता की धारा 438 में अग्रिम जमानत से संबंधित प्रावधान हैं। रहना जलाल बनाम केरल राज्य (2020) में, प्रतिवादी मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के अनुसार दोषी था। सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम महिला सुरक्षा से जुड़े एक मामले में अग्रिम जमानत देने पर चर्चा की। यह माना गया कि अग्रिम जमानत केवल तभी दी जा सकती है जब अदालत ने जमानत देने वाले शिकायतकर्ता को खुद सुना हो।

अंतरिम जमानत

नियमित या अग्रिम जमानत देने के लिए सुनवाई से पहले आरोपी को अल्पकालिक जमानत दी जाती है। ऐसी अल्पकालिक जमानत को ‘अंतरिम जमानत’ कहा जाता है। प्रह्लाद सिंह भाटी बनाम एनसीटी, दिल्ली (2001) में, मृतक जो आरोपी की पत्नी थी, उसके साथ दहेज की मांग के परिणामस्वरूप दुर्व्यवहार किया गया था। 18.3.1999 को, आरोपी मृतक को उसके माता-पिता के घर ले गया, जहां उसने उसके माता-पिता के सामने उस पर मिट्टी का तेल डाला और उसे आग लगा दी। सीआरपीसी की धारा 438 के अनुसार आरोपी ने अग्रिम जमानत का आवेदन दिया था। जांच एजेंसी ने जमानत के आवेदन का विरोध करने के लिए कोई वास्तविक प्रयास नहीं किया, इस प्रकार सत्र न्यायाधीश ने अंतरिम जमानत दे दी। हालांकि, सत्र न्यायाधीश ने कहा कि राज्य आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए स्वतंत्र होगा यदि भारतीय दंड संहिता (1860) की धारा 302 के तहत, अग्रिम जमानत को रद्द करने के प्रस्ताव को खारिज करते हुए, मामला तथ्यों पर बनाया जाता है।

डिफ़ॉल्ट जमानत

इसे आमतौर पर डिफ़ॉल्ट जमानत, बाध्यकारी जमानत या वैधानिक जमानत के रूप में जाना जाता है। जमानत का यह अधिकार तब दिया जाता है जब पुलिस या जांच एजेंसी एक निर्दिष्ट अवधि के भीतर पूर्ण चार्जशीट, चालान या पुलिस रिपोर्ट जमा करने में विफल रहती है। जमानत का यह अधिकार मामले के गुण-दोष की परवाह किए बिना दिया जाता है क्योंकि यह जांच एजेंसी द्वारा निर्दिष्ट अवधि के भीतर जांच पूरी करने में विफलता के परिणामस्वरूप होता है। एम. रवींद्रन बनाम खुफिया अधिकारी, राजस्व खुफिया निदेशालय (डायरेक्टरेट) (2020) में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यदि आरोपी आवेदन जमा करने में विफल रहता है और पुलिस इस बीच आरोप पत्र दायर करती है तो आवेदक डिफ़ॉल्ट जमानत के लिए पात्र नहीं होगा। 

अंतरिम जमानत का विस्तृत अवलोकन 

जमानत याचिका पर सुनवाई करने से पहले, अदालत किसी आरोपी व्यक्ति के लिए अंतरिम जमानत निर्धारित कर सकती है, जिसकी वह बाद में पुष्टि कर सकती है या रद्द भी कर सकती है। उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय की अग्रिम जमानत देने की क्षमता सीआरपीसी की धारा 438 के तहत आती है। जब आवेदन लंबित होता है तब अदालत अग्रिम जमानत का अंतरिम आदेश दे सकती है जैसा कि धारा 438 में वर्णित है। लोक अभियोजक (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) और पुलिस अधीक्षक (सुपरिंटेंडेंट) से अधिसूचना (नोटिफिकेशन) और सुनवाई पर अंतिम निर्णय लिया जाना चाहिए। यदि आरोपी की अग्रिम जमानत या अंतरिम जमानत का अनुरोध अदालत द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है, तो पुलिस उसे बिना वारंट के हिरासत में ले सकती है। 

धारा 438(1) के अनुसार, जिस किसी के पास यह संदेह करने का कारण है कि उसे किसी अपराध के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है, वह उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है। नतीजतन, पूरी तरह से समीक्षा (रिव्यू) के बाद अदालत द्वारा आवेदन को खारिज या अनुमोदित (अप्रूव) किया जा सकता है। यदि आवेदन स्वीकार कर लिया जाता है, तो व्यक्ति गिरफ्तार होने के बाद जमानत पर मुक्त हो जाएगा। यह आवश्यकता कि अपराध को ऐसा माना जाए जिसे जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता है, इस प्रावधान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह खंड यह स्पष्ट करता है कि अग्रिम जमानत जारी करना है या नहीं, यह केवल अदालत का विवेकाधिकार नियंत्रित करता है; यह एक अधिकार का गठन नहीं करता है। दूसरी ओर, धारा 438(2) विशिष्ट आवश्यकताओं की रूपरेखा (आउटलाइन) तैयार करती है जिसे आवेदक को उस स्थिति में पूरा करना चाहिए जब उच्च न्यायालय धारा 438(a) के तहत एक निर्देश जारी करता है। वे हैं: 

  • पूछताछ के लिए जब भी आवश्यक हो, व्यक्ति को तब प्रस्तुत होने के लिए सुलभ होना चाहिए।
  • व्यक्ति को, प्रासंगिक परिस्थितियों से अवगत किसी भी व्यक्ति को पुलिस अधिकारी को किसी भी जानकारी को प्रकट करने या उजागर करने का वादा करने, धमकी देने, जबरदस्ती करने से बचना चाहिए।
  • अदालत की मंजूरी के बिना, व्यक्ति भारत नहीं छोड़ सकता है।
  • यह ऐसा होगा जैसे कि जमानत धारा 437(b) के अनुसार दी गई थी और व्यक्ति वैसे ही वहां सूचीबद्ध प्रतिबंधों के अधीन होगा।

अंतिम में, धारा 438(3) यह स्पष्ट करती है कि यदि आवेदन स्वीकृत हो जाता है, तो बिना वारंट के गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को तुरंत जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा। इसके अलावा, यदि मजिस्ट्रेट संज्ञान (कॉग्निजेंस) लेता है तो उसके बाद जारी कोई भी वारंट भी जमानती होना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में बताए गए जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के विचार का अनुपालन करता है। जब अदालत निश्चित हो कि प्रतिवादी के खिलाफ आरोप उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने और उसे नीचा दिखाने का इरादा रखते है, तो अंतरिम जमानत दी जा सकती है। यह पुलिस को अपनी गिरफ्तार करने की शक्ति का बेईमानी से उपयोग करने के लिए एक मजबूत निवारक (डिटरेंट) के रूप में कार्य करता है।

अंतरिम जमानत की विशेषताएं

विषय वस्तु विशेषता
समय यह थोड़े समय के लिए दी जाती है।
आवेदन पत्र जब अग्रिम जमानत या नियमित जमानत के लिए अदालत में एक आवेदन दायर होता  है, तो उसे मंजूर कर लिया जाता है।
गिरफ़्तार करना जमानत अवधि समाप्त होने पर आरोपी  को वारंट के बिना हिरासत में ले लिया जाएगा।
रद्द करना अंतरिम जमानत रद्द करने के लिए किसी विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं है।

अंतरिम जमानत देने के लिए आधार 

अंतरिम जमानत देने के सामान्य आधार 

माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने परमिंदर सिंह और अन्य बनाम पंजाब राज्य, (2001), मे कहा कि निम्नलिखित मामलों में अंतरिम जमानत की अनुमति दी जानी चाहिए:

  • जब आरोपी के मुकदमे से बचने की कोई संभावना नहीं है,
  • जब कोई मौका नहीं है कि प्रतिवादी सबूत के साथ छेड़छाड़ कर सकता है,
  • जब सीमित पूछताछ करने का कोई न्यायोचित (जस्टिफिएबल) कारण न हो, और
  • जब अग्रिम जमानत के दावे पर सुनवाई टालनी पड़े।

कोविड-19 के संबंध में विशेष आधार 

व्यापक विचार-विमर्श के बाद, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2020 में एक निर्णय जारी किया, जिसमें कोविड-19 महामारी के दौरान जमानत के लिए दिशानिर्देशों की रूपरेखा तैयार की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) में एक उच्च शक्ति समिति (एचपीसी) बनाने के लिए अनिवार्य किया गया था। सही सामाजिक दूरी बनाए रखने और दोषियों की भीड़भाड़ को रोकने के लिए, गठित समिति एक निश्चित अवधि के लिए अंतरिम जमानत या पैरोल देने से संबंधित सभी चीजों पर चर्चा करेगी और इस पर उनका पूरा अधिकार था। ऐसे कई उदाहरण हैं जब अंतरिम जमानत देने के निर्णय में कोविड-19 महामारी एक कारक थी। 

इन रे: कॉन्टैगियन ऑफ कोवि ​​​​-19 बनाम अज्ञात (2020) के मामले में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने चल रहे कोरोनावायरस के प्रकोप के कारण जेलों में भीड़भाड़ से राहत के लिए लगभग 3,499 विचाराधीन (अंडरट्रायल) कैदियों के लिए अतिरिक्त 45 दिनों के लिए अंतरिम जमानत बढ़ा दी। उच्च न्यायालय का फैसला उच्च शक्ति समिति की सिफारिश पर आधारित था।

नताशा नरवाल बनाम दिल्ली राज्य एनसीटी (2021) में, याचिकाकर्ता जिसे फरवरी 2020 में गैरकानूनी गतिविधियों और (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के अनुसार हिरासत में लिया गया था, को मानवीय आधार पर तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दी गई थी जब उसके पिता का निधन कोविड-19 के परिणामस्वरूप हो गया था।।

अंतरिम जमानत देने की शर्तें

सामान्य शर्ते

  • आरोपी को दो जमानतदरों के साथ 2 लाख के बॉन्ड पर अंतरिम जमानत दी जाएगी। जब भी आवश्यक हो, तब पूछताछ और अतिरिक्त जांच के लिए आरोपी को सीबीआई के सामने पेश होना पड़ेगा।
  • मोहम्मद जुबैर बनाम दिल्ली के एनसीटी राज्य, (2022) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने देखा कि आरोपी को गवाहों या सबूतों के साथ हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, और उन्हें चल रहे मामले के बारे में मीडिया से बात करने से भी बचना चाहिए।
  • अदालत के पास अस्थायी जमानत देने की क्षमता है, लेकिन उसके फैसले उचित और कानून पर आधारित होने चाहिए। गुडिकंती नरसिम्हुलु बनाम लोक अभियोजक, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय (1977) के मामले में इस पर जोर दिया गया था, जिसमें अदालत ने फैसला सुनाया कि इसे मनमाने या अस्पष्ट होने के बजाय कानून के साथ-साथ अन्य माध्यमों के द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए। इसे सुसंगत होना चाहिए।
  • एक आरोपी को गिरफ्तारी के बाद बार-बार अंतरिम जमानत मिलती है। हालांकि, वह गिरफ्तारी से बच गया, उसने नियमों की अवहेलना की और अदालत में पेश होने में विफल रहा। नतीजतन, कई अदालतों ने फैसला सुनाया है कि कुछ स्थितियों में, किसी भी तरह की रिहाई नहीं दी जानी चाहिए, यहां तक ​​कि अंतरिम जमानत भी नहीं दी जानी चाहिए और मामले को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह कई फैसलों में देखा गया है। प्रमुख मामलों में निरंजन सिंह बनाम प्रभाकर राजाराम खरोटा (1980) और गुरबख्श सिंह सिब्बिया आदि बनाम पंजाब राज्य (1980) शामिल हैं। इन मामलों में माननीय सर्वोच्च न्यायालय का नियम है कि न तो सीआरपीसी की धारा 438 और न ही अंतरिम जमानत का इस्तेमाल जमानत देने के लिए तब तक किया जाना चाहिए जब तक कि प्रतिवादी अदालत में आत्मसमर्पण (सरेंडर) नहीं कर देता। 

विशिष्ट शर्तें

  • इन्हें अपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 438(2) के अनुसार रखा गया है। अदालत के पास प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गवाहों के साथ बातचीत करने के तरीके पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार है। 
  • पुलिस पूछताछ के लिए उस व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से पेश होना होगा।
  • वह किसी भी तरह से तथ्यों से अवगत किसी व्यक्ति को धमकी या प्रलोभन नहीं दे सकता, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष हो।
  • इसके अतिरिक्त, उसे अदालत की सहमति के बिना देश या अदालत के अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिसडिक्शन) को छोड़ने की अनुमति नहीं है।
  • विवाह या अपने प्रियजन के निधन पर विशेष आधार पर जमानत देने के मामले में अन्य विशिष्ट शर्तें रखी जा सकती हैं।

प्रासंगिक निर्णय

लाल कमलेंद्र प्रताप सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2009)

कमलेंद्र प्रताप सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2009), में सर्वोच्च न्यायालय ने फिर से पुष्टि की कि एक नियमित जमानत के आवेदन पर विचार करने वाले न्यायाधीश के पास अंतरिम जमानत देने का अंतर्निहित (इन्हेरेंट) अधिकार है, जबकि जमानत के मामले पर पूरी तरह से फैसला किया जा रहा है। जब कोई नियमित जमानत का अनुरोध करता है, तो अदालत आमतौर पर कुछ दिनों के बाद उस अनुरोध को सूचीबद्ध करती है ताकि वह केस डायरी की समीक्षा कर सके, जिसे पुलिस अधिकारियों से प्राप्त किया जाना चाहिए। इस बीच, आवेदक को हिरासत में रहना चाहिए। भले ही आवेदक को बाद में बॉन्ड पर मुक्त कर दिया गया हो, समाज में उसकी छवि पहले से ही अपरिवर्तनीय रूप से क्षतिग्रस्त (डैमेज) हो सकती है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसकी और उसके अधिकार के पहलुओं में से एक महत्वपूर्ण संपत्ति है। नतीजतन, अदालत ने कहा कि इसमें शामिल अदालत के पास जमानत आवेदन के अंतिम निपटान तक किसी व्यक्ति को अंतरिम जमानत देने का अंतर्निहित अधिकार है।

अतीक अंसारी बनाम राज्य, एनसीटी दिल्ली (2006)

इस मामले में, जब आवेदक से हेरोइन को लिया गया था, तब उसके पास 2.5 किलो  हेरोइन थी, और वह अपनी पत्नी के बीमार होने के आधार पर अंतरिम जमानत की मांग कर रहा था। होरी लाल बनाम राज्य (2009) में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के आधार पर जमानत देने के संबंध में, कि याचिकाकर्ता की पत्नी की आसन्न (इम्पेंडिंग) सर्जरी की पुष्टि की गई थी और यह भी कि याचिकाकर्ता की पत्नी के वृद्ध पिता के अलावा, उसका कोई और नहीं था, इस चीज को ध्यान में रखा गया था। इसलिए, याचिकाकर्ता को 20,000 रुपये के निजी बॉन्ड पर न्यायालय द्वारा दो सप्ताह के लिए अंतरिम जमानत दी गई थी। 

 

पूनम रानी बनाम हरियाणा राज्य (2012)

इस मामले में, मुद्दा नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 (एनडीपीएस) की धारा 21 और 29 के तहत अंतरिम जमानत देने का था। याचिकाकर्ता को उसके स्वास्थ्य के आधार पर दो सप्ताह की अंतरिम जमानत दी गई थी। याचिकाकर्ता की पत्नी की सर्जरी के दौरान उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। अगर अस्थायी जमानत नहीं दी जाती तो उनकी पत्नी इलाज कराने की क्षमता खो देती। इसके अलावा, याचिकाकर्ता का कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं था। इसलिए उसे अस्थाई जमानत दे दी गई थी।

अर्नेश कुमार बनाम बिहार सरकार (2014)

इस मामले मे, 1 जुलाई 2007 को अर्नेश कुमार और श्वेता किरण की शादी हुई थी। शादी के कई साल बाद, श्वेता किरण ने दावा किया कि उसके ससुराल वालों ने आठ लाख रुपये, एक मारुति कार, एक एयर कंडीशनर, एक टेलीविजन सेट आदि की मांग की है। जब उसके पति को स्थिति का सामना करना पड़ा, तो उसने भी अपने परिवार का साथ दिया और एक अलग महिला से शादी करने के लिए उस पर दबाव डाला गया। उसने आगे दावा किया कि दहेज की मांग पूरी नहीं होने के कारण उसे घर से निकाल दिया गया था। आखिरकार अर्नेश कुमार के खिलाफ मुकदमा दायर किया गया।

अर्नेश कुमार ने अग्रिम जमानत का अनुरोध किया और अपनी पत्नी द्वारा उस पर लगाए गए सभी आरोपों से इनकार किया। सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों ने जमानत खारिज कर दी। अदालत के फैसले से असंतुष्ट होने के बाद उसने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक विशेष अनुमति याचिका दायर की। जमानत देने के अलावा, सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A के दुरुपयोग को भी संबोधित किया। भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A के तहत व्यक्तियों को गिरफ्तार करने के लिए आठ निर्देश स्थापित करके, न्यायालय अपने निष्कर्ष पर पहुंचा और अपना फैसला सुनाया। वे हैं:

  • जब भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A के तहत अपराध की सूचना दी जाती है, तो प्रत्येक राज्य सरकार को अपने पुलिस अधिकारियों को उचित रूप से निर्देश देना चाहिए कि वे किसी व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तार न करें। जब मामला अपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 41 के दिशानिर्देशों के अंतर्गत आता है, तो गिरफ्तारी आवश्यक हो जाती है।
  • धारा 41(1)(b) के लिए आवश्यक है कि विशिष्ट खंडों वाली चेकलिस्ट सभी पुलिस कर्मियों को उपलब्ध कराई जाए।
  • प्रतिवादी को अतिरिक्त हिरासत के लिए मजिस्ट्रेट के सामने पेश करते समय, पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी के कारण साथ ही उससे जुड़ी जानकारी को ठीक से भरी हुई चेक लिस्ट में भेजना चाहिए।
  • मजिस्ट्रेट को यह ध्यान रखना चाहिए कि अतिरिक्त हिरासत के आदेश को मंजूरी देते समय, वह पुलिस अधिकारी द्वारा प्रदान की गई रिपोर्ट पर और पुलिस रिपोर्ट पर औचित्य (जस्टिफिकेशन) को ठीक से दस्तावेज करने के बाद ही निर्भर होना चाहिए। मजिस्ट्रेट संतुष्ट होने के बाद नई हिरासत के आदेश को मंजूरी देंगे।
  • आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार न करने का निर्णय मामले के दायर होने की तारीख से दो सप्ताह के भीतर मजिस्ट्रेट को भेजा जाना चाहिए। इस समय सीमा को जिले के पुलिस अधीक्षक (एसपी) द्वारा एक कारण के लिए बढ़ाया जा सकता है जिसे लिखित रूप में प्रलेखित (डॉक्यूमेंटेड) किया जाना चाहिए।
  • मामले के दायरा होने के दो सप्ताह के भीतर, आरोपी को अपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 41-A के अनुसार उपस्थिति की सूचना दी जानी चाहिए। पुलिस अधीक्षक इस समयावधि को बढ़ा सकते हैं यदि ऐसा करने का औचित्य लिखित रूप में दिया गया हो।
  • यदि पुलिस अधिकारी किसी भी तरह से उपरोक्त निर्देशों का उल्लंघन करते है, तो अधिकार क्षेत्र वाले उच्च न्यायालय को अदालत की अवमानना ​​(कंटेंप्ट) के लिए उसे दंडित करने का अधिकार है।
  • यदि कोई न्यायिक मजिस्ट्रेट बिना कारण बताए किसी आरोपी को कारावास का आदेश देता है, तो न्यायिक मजिस्ट्रेट को विभागीय (डिपार्टमेंटल) कार्यवाही के लिए उच्च न्यायालय द्वारा जवाबदेह ठहराया जाएगा।

शारजील इमाम बनाम दिल्ली के एनसीटी राज्य (2020)

इस देशद्रोह मामले में, नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 के खिलाफ दिल्ली के जामिया पड़ोस और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दिए गए कथित भड़काऊ बयानों से जुड़े शरजील इमाम द्वारा प्रस्तुत अंतरिम जमानत अनुरोध को दिल्ली उच्च न्यायालय ने नोटिस दिया था। कड़कड़डूमा अदालतों के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत ने शारजील इमाम को जिन्होंने यह भी नोट किया कि इमाम एक नया जमानत आवेदन जमा नहीं कर सकते थे या आवेदन की योग्यता के बारे में नई दलीलें नहीं दे सकते थे क्योंकि अदालत ने पहले ही उन्हें नियमित जमानत से इनकार करने और योग्यता के आधार पर उनके खिलाफ आरोप तय करने और उनको जमानत न देने का आदेश जारी किया था।

प्रिया रंजन बनाम ओडिशा राज्य (2021)

इस मामले में, मुद्दा अंतरिम जमानत के आवेदन का था। यह दावा किया गया था कि याचिकाकर्ता की मां का निधन, एससीबी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल, कटक में हो गया था, और वह इकलौता बेटा था जिसे अपनी मां के अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति थी। इसके अतिरिक्त, यह दावा किया जाता है कि माहंगा पुलिस स्टेशन के प्रभारी (इन चार्ज) निरीक्षक द्वारा आवेदन के दावों की पुष्टि की गई है। मामले के दस्तावेजों और परिस्थितियों की समीक्षा के बाद अदालत ने याचिकाकर्ता को 50,000 रुपये जमानत बॉन्ड  के बदले अंतरिम जमानत दे दी।

तेज़ योजना (फास्टर स्कीम)

कोविड-19 महामारी ने सर्वोच्च न्यायालय को जेल की भीड़ को कम करने के लिए विमर्शी (डेलीबेरेट) कार्रवाई करने के लिए प्रेरित किया है। भीड़भाड़ वाली जेलों में बंद लगभग 4 लाख कैदियों के प्रति अदालत ने मानवीय रुख अपनाया क्योंकि बढ़ती हुई दूसरी लहर के कारण बहुत मौतें हुईं थी। जेलों में भीड़भाड़ से बचने के लिए, मुख्य न्यायाधीश रमना की अध्यक्षता वाली पीठ (बेंच) ने पहले पुलिस को महामारी के दौरान गिरफ्तारी को प्रतिबंधित करने का निर्देश दिया था। पीठ ने यह भी सिफारिश की कि अदालतें उन स्थितियों में स्वत: हिरासत का आदेश देने से बचें जहां सजा सात साल से कम या उसके बराबर है। अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कैदियों की जांच करने और उन्हें अंतरिम जमानत पर रिहा करने के लिए उच्चाधिकार प्राप्त समितियां थीं।

भारत के मुख्य न्यायाधीश ने तब कैदी की रिहाई में तेजी लाने के लिए तेज़ कार्यक्रम को प्रस्तुत किया। नया कार्यक्रम, जिसे तेज़, या “इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का तेज़ और सुरक्षित ट्रांसमिशन” के रूप में जाना जाता है, जेलों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से आदेश भेजना आसान बना देगा, जिससे कैदियों की रिहाई हो जाएगी। जमानत दिए जाने के बाद दोषियों की रिहाई में देरी से जुड़े एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वत: संज्ञान लेने के बाद तेज़ प्रणाली विकास प्रक्रिया चल रही थी। त्वरित न्याय की गारंटी देने के अलावा, तेज़ प्रणाली विचाराधीन कैदियों के खिलाफ इस अन्याय की भरपाई करेगा। जमानत पर निर्देश और गिरफ्तारी पर रोक सहित सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसलों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से और सुरक्षित रूप से जेल प्रशासन और कानून प्रवर्तन (एनफोर्समेंट) संगठनों को तेज़ प्रणाली का उपयोग करके भेजा जा सकता है।

निष्कर्ष

दोषी साबित होने तक आरोपी के निर्दोष होने की अवधारणा को जमानत के माध्यम से उजागर किया जाता है, जो भारतीय कानूनी प्रणाली में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास सबसे आवश्यक मौलिक अधिकारों में से एक स्वतंत्रता और गरिमा (डिग्निटी) का अधिकार है। ये अधिकार उन लोगों पर भी लागू होते हैं जिन पर आरोप लगाया जाता है। इन अधिकारों से किसी को भी वंचित नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार, जमानत देने से आरोपी के मौलिक अधिकारों की रक्षा होती है। अंतरिम जमानत का विचार महत्वपूर्ण है क्योंकि एक आरोपी व्यक्ति को उसकी जमानत पर सुनवाई के परिणाम से पहले ही हिरासत में लिए जाने का खतरा हो सकता है। इसलिए अंतरिम जमानत तब दी जाती है जब अदालत को यकीन हो कि ऐसा करने से आरोपी को अन्यायपूर्ण तरीके से कैद या हिरासत में लेने से रोका जा सकेगा। सामान्य तौर पर, मजिस्ट्रेट या अदालत को जब भी व्यावहारिक हो अंतरिम जमानत देने की क्षमता का उपयोग करना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

अंतरिम और नियमित जमानत में क्या अंतर है?

एक व्यक्ति गिरफ्तार होने के बाद नियमित जमानत का अनुरोध करता है। उसे जमानत लेनी चाहिए क्योंकि वह पहले ही पुलिस द्वारा हिरासत में लिया जा चुका है और अब भी उनकी हिरासत में है। एक अदालत अंतरिम जमानत तब जारी कर सकती है, जो अस्थायी जमानत के समान है, जब अग्रिम जमानत या नियमित जमानत के लिए आवेदन पर कार्रवाई की जा रही है।

क्या किसी आरोपी को अंतरिम जमानत मिल सकती है?

हालांकि, एक आरोपी व्यक्ति या दोषी व्यक्ति उस समय जेल जाने से बचने के लिए अंतरिम जमानत का अनुरोध कर सकता है जब तक कि उच्च न्यायालय निचली अदालत से आवश्यक कागजी कार्रवाई प्राप्त न कर ले।

अंतरिम जमानत से अग्रिम जमानत में क्या अंतर है?

अंतरिम जमानत, अग्रिम जमानत के समान नहीं है क्योंकि अंतरिम  जमानत तब दी जाती है जब जमानत का आवेदन चल रहा जो। केवल वे जो मानते हैं कि उन्हें अपराध के लिए स्थापित किया जा सकता है जिस पर उन पर आरोप लगाया गया है और वे हिरासत छोड़ने के इच्छुक हैं, वे अंतरिम जमानत से लाभान्वित हो सकते हैं।

क्या अंतरिम जमानत बढ़ाई जा सकती है?

अंतरिम जमानत को बढ़ाया जा सकता है, लेकिन अगर ऐसा नहीं है और आरोपी व्यक्ति अंतरिम जमानत की पुष्टि और/या जारी रखने के लिए अदालत को भुगतान नहीं करता है, तो उसकी स्वतंत्रता जब्त कर ली जाएगी, और उन्हें या तो जेल में ले जाया जाएगा या उनकी गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी किया जाएगा।

संदर्भ 

 

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