आईपीसी की धारा 409 पर महत्वपूर्ण निर्णय

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यह लेख आईसीएफएआई विश्वविद्यालय, देहरादून के कानून के छात्र Vishwendra Prashant द्वारा लिखा गया है। यह लेख आईपीसी की धारा 409 से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णयों पर चर्चा करता है। हालाँकि, इनमें से अधिकांश मामले हाल के हैं। इस लेख का अनुवाद Shubham Choube द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 409 लोक सेवकों, बैंकरों, व्यापारियों, अभिकर्ता, दलालों, वकीलों या एजेंटों द्वारा विश्वास के आपराधिक उल्लंघन से संबंधित है। हालाँकि, ऐसे व्यक्तियों के कर्तव्य अत्यधिक गोपनीय होते हैं, जिनमें उन्हें सौंपी गई संपत्तियों पर नियंत्रण की महान शक्तियाँ शामिल होती हैं। इसलिए, ऐसे व्यक्तियों द्वारा विश्वासघात इस धारा के तहत दंडनीय है।

अब आईपीसी की धारा 409 के तहत अपराध के लिए सजा की बात आती है, तो अपराधियों को आजीवन कारावास या जुर्माने के साथ 10 साल तक की कैद की सजा हो सकती है।

सरदार सिंह बनाम हरियाणा राज्य (1976)

तथ्य

  • इस मामले में, अपीलकर्ता राजस्व (रिवेन्यू) मंडल रायसीना, गुड़गांव में एक पटवारी था।
  • जब उन्होंने पद का कार्यभार संभाला, तो कार्यभार ग्रहण करते समय उन्हें जो विभिन्न पुस्तकें और दस्तावेज प्राप्त हुए थे, उन्हें व्यवस्थित करके एक ज्ञापन तैयार किया गया था।
  • विभागीय जांच के आधार पर उन्हें निलंबित (सस्पेन्ड) कर दिया गया।
  • उन्हें अपने पद का प्रभार सौंपने का निर्देश दिया गया था, लेकिन वह ऐसा करने में विफल रहे।
  • राजस्व सहायक, गुड़गांव को उनके कमरे का ताला तोड़ने का आदेश दिया गया।
  • उनके उत्तराधिकारी ने पद का कार्यभार संभाला, और उन पुस्तकों और दस्तावेजों जो कमरे में पाए गए थे को निर्धारित करके एक सूची तैयार की गई और जिन पर उत्तराधिकारी ने कब्जा कर लिया था।
  • कमरे से गायब किताबों और दस्तावेजों को दिखाने के लिए एक और सूची तैयार की गई थी।
  • सूची के अनुसार, कमरे से तीन दस्तावेज, रोजनामचा वाकियाती (दैनिक लेनदेन की एक डायरी जो पटवारी द्वारा रखी जाती है),  शुल्क रजिस्टर की प्रति और रसीद बुक गायब थे।
  • अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) पक्ष का मामला यह था कि अपीलकर्ता ने तीन दस्तावेजों और 26.50 रुपये की राशि जो उन्हें पटवारी के रूप में प्रमाणित प्रतियां जारी करने के लिए प्राप्त हुई थी के संबंध में आपराधिक विश्वासघात किया था।
  • न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने अपीलकर्ता को बरी कर दिया और माना कि अपीलकर्ता को उक्त राशि सौंपने का कोई सबूत नहीं था, और उस पर रोज़नामचा वक़लाती और शुल्क रजिस्टर की प्रति के संबंध में कोई आरोप नहीं था। रसीद बुक के संबंध में मजिस्ट्रेट ने पाया कि अपीलकर्ता को पटवारी के रूप में इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई थी, और यह उसके कमरे में नहीं पाया गया था।
  • मजिस्ट्रेट ने अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 409 के तहत दोषी ठहराया और 100 रुपये के जुर्माने के साथ अदालत की अगली सुनवाई तक कारावास की सजा सुनाई।
  • अपीलकर्ता ने सत्र (सेशन) न्यायाधीश के समक्ष अपील दायर की। सत्र न्यायाधीश ने न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के आदेश पर विचार किया और अपील खारिज कर दी।
  • अपीलकर्ता ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष एक पुनरीक्षण (रीविजन) याचिका दायर की। इस न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी।
  • उच्च न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण याचिका खारिज होने से व्यथित होकर, अपीलकर्ता ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील दायर की।

मुद्दा

क्या अपीलकर्ता धारा 409 के तहत रसीद बुक के संबंध में आपराधिक विश्वासघात के लिए उत्तरदायी है?

निर्णय

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कमरे में कोई रसीद बुक नहीं थी, और उन्होंने इसे अपने उत्तराधिकारी को वापस नहीं किया था। हालाँकि, रसीद बुक के दुरुपयोग के संबंध में साक्ष्य के अभाव के कारण वह आपराधिक विश्वासघात के लिए उत्तरदायी नहीं था। इसलिए, उन्हें आईपीसी की धारा 409 के तहत गलत तरीके से दोषी ठहराया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने अपील स्वीकार कर ली और दोषसिद्धि के आदेश को रद्द कर दिया था। इस प्रकार, अपीलकर्ता के खिलाफ दर्ज सजा को रद्द कर दिया गया, और उसे उक्त धारा के तहत अपराध से बरी कर दिया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि केवल संपत्ति लौटाने में विफलता या चूक, धारा 409 के तहत अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

एल. चंद्रैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2003)

तथ्य

  1. इस मामले में, ए1, ए2, ए3, ए4, ए5 और ए6 नाम के छह आरोपी व्यक्ति थे।
  2. ए1 ने अप्रैल 1986 से 8 मई 1987 तक एक उप-डाकघर में उप-डाकपाल के रूप में काम किया। ए2, ए1 का उत्तराधिकारी था और उसने 8 मई 1987 से 16 नवंबर 1987 तक काम किया था। ए3 उसी उप डाकघर में एक डाक सहायक था। ए4 उसी कार्यालय में डाकिया था। डाक विभाग के एक कर्मचारी ए5 ने 1987 में इस्तीफा दे दिया था। ए6 एक छात्र था जो ए3 के साथ किरायेदार के रूप में रहता था।
  3. एक कंपनी के कर्मचारियों ने उस उप-डाकघर में कई आवर्ती (रिकरिंग) जमा खाते खोले।
  4. कंपनी प्रबंधन ने उन खातों में जमा की गई राशि को श्रमिकों के वेतन से काट लिया और सीधे डाकघर में भेज दिया।
  5. प्रबंधन ने कुल राशि के लिए एक ही चेक भेजा, और डाक अधिकारियों ने प्रत्येक खाते में आवश्यक प्रविष्टियाँ (एन्ट्री) कीं।
  6. आवर्ती जमा खाते से राशि निकालने की प्रक्रिया यह थी कि प्रबंधन, निकासी वाउचर पर अपनी मुहर लगाने के बाद, उसे पोस्टमास्टर को भेजता था, और कर्मचारी पोस्टमास्टर की उपस्थिति में निकासी के लिए उक्त वाउचर पर हस्ताक्षर करता था। 
  7. अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि आरोपी व्यक्ति उन खातों से बड़ी संख्या में निकासी करने की साजिश में शामिल थे। उन्होंने जाली हस्ताक्षर वाले फर्जी वाउचर के माध्यम से उन खातों से 91,280 रुपये की राशि निकाल ली थी।
  8. कर्मचारियों ने बताया कि उन्होंने कभी भी अपने खाते से यह रकम नहीं निकाली है।
  9. विचारणीय अदालत ने ए1, ए2 और ए3 को आईपीसी की धारा 409, 467 और 471 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1947 की धारा 5(2) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 5(1)(c) और (d) के तहत दोषी ठहराया। इसके अलावा, न्यायालय ने ए4, ए5 और ए6 को बरी कर दिया।
  10. विचारणीय अदालत ने ए1 को आईपीसी की धारा 409 के तहत एक साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके अलावा, इस अदालत ने ए2 को आईपीसी की धारा 409 के तहत दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
  11. ए1 और ए2 ने सजा को चुनौती देने के लिए हैदराबाद में आंध्र प्रदेश के उच्च न्यायालय के समक्ष अपील दायर की थी। उच्च न्यायालय ने अपीलें खारिज कर दीं और दोषसिद्धि को बरकरार रखा था।
  12. दोनों आरोपियों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की थी।

मुद्दे

  1. क्या अपीलकर्ताओं (ए1 और ए2) की सजा कानून की नजर में सही थी?
  2. क्या अपीलकर्ताओं को पता था कि वाउचर ए3 द्वारा जाली थे?

निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ए1 और ए2 को नहीं पता था कि वाउचर ए3 द्वारा बेईमानी और धोखाधड़ी से बनाए गए थे। यह साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं था कि ए1 और ए2 को धोखाधड़ी के बारे में पता था, इसलिए ए1 और ए2 का कोई आपराधिक इरादा नहीं था। इसलिए, अपीलकर्ताओं की उक्त सजा कायम रखने योग्य नहीं थी। इस न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया। इसके अलावा, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि धारा के तहत अपराध के लिए आपराधिक इरादे या आपराधिक इरादे की आवश्यकता होती है।

एन. भार्गवन पिल्लई बनाम केरल राज्य (2004)

तथ्य

  • इस मामले में आरोपी सहायक तालुक आपूर्ति अधिकारी था।
  • वह कौडियार में केरल राज्य नागरिक आपूर्ति निगम में प्रतिनियुक्ति पर कनिष्ठ (जूनियर) प्रबंधक के रूप में कार्यरत थे।
  • एक निगम के क्षेत्रीय प्रबंधक के आदेश (दिनांक 14 अप्रैल, 1983) के आधार पर, उन्होंने पुनालुर यूनिट में यूनिट मैनेजर के रूप में कार्यभार संभाला। निगम में उनकी प्रतिनियुक्ति का कार्यकाल 5 वर्ष अर्थात 30 जून 1986 तक था।
  • निगम ने नागरिक आपूर्ति विभाग से अवधि एक वर्ष बढ़ाने का अनुरोध किया।
  • बाद में, निगम के प्रबंध निदेशक ने एक अनुरोध पत्र द्वारा कार्यकाल के विस्तार के अनुरोध को 30 नवंबर, 1986 तक सीमित कर दिया। उन्होंने वह पत्र राजस्व मंडल के नागरिक आपूर्ति निदेशक को भेज दिया था।
  • निगम के क्षेत्रीय प्रबंधक ने 29 नवंबर 1986 से आरोपी को कार्यमुक्त करने का आदेश जारी किया।
  • हालाँकि, आरोपी 27 नवंबर 1986 के बाद कार्यालय में उपस्थित नहीं हुआ और 29 नवंबर 1986 को कार्यभार नहीं सौंपा। उसने छुट्टी के लिए आवेदन किया। इसके अलावा, उन्होंने न तो पुनालुर गोदाम की चाबियाँ सौंपी और न ही स्टॉक का सत्यापन (वेरीफाई) किया।
  • वह 13 दिसंबर 1986 को गोदाम में पहुंचे और चाबियां लेकर आए।
  • उन्होंने तत्कालीन सहायक प्रबंधक की मौजूदगी में गोदाम खोला। उन्होंने 13, 15 और 16 दिसंबर 1986 को कार्यभार सौंपने का लिखित वचन भी दिया।
  • उनकी मौजूदगी में गोदाम में मिले सामान का सत्यापन हुआ। मात्र 21.875 क्विंटल एम.पी. उबला चावल और 84 किलो इमली का स्टॉक गोदाम में मिला।
  • स्टॉक में 123.65 क्विंटल उबला चावल होना चाहिए, इसलिए 102 क्विंटल की कमी हो गयी थी। इसके अलावा, स्टॉक सत्यापन रिपोर्ट के अनुसार पामोलीन और निः शुल्क बिक्री के लिए चीनी का कोई स्टॉक नहीं था।
  • कमी का कुल मूल्य निम्नलिखित तालिका में दिखाया गया है:
कमी  मूल्य (रुपये में)
चावल (102 क्विंटल) रु. 33,150
पामोलीन (72 क्विंटल) रु. 1,08,000
निःशुल्क बिक्री चीनी (30 क्विंटल) रु. 22,620

 

  • आरोपी ने इन वस्तुओं के लिए लोडिंग और परिवहन शुल्क भी वापस ले लिया था।
  • बाद में, उन्होंने 72 क्विंटल पामोलीन, 102 क्विंटल चावल और 39 क्विंटल चीनी की कमी का मूल्य 1,63,770 रुपये चुकाने का वादा किया था।
  • आंशिक भुगतान के रूप में उन्होंने 50,000 रुपये पुनालुर डिपो में जमा किये।
  • राजस्व मंडल ने उन्हें सेवा से निलंबित कर दिया। वह 28 फरवरी, 1992 को सेवा से सेवानिवृत्त (रिटायर) हुए।
  • उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया था।
  • विचारणीय अदालत ने माना कि वह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 5(2) और आईपीसी की धारा 409 के तहत दोषी था।
  • जहां तक धारा 409 का सवाल है, इस न्यायालय ने उसे इस अपराध के लिए एक वर्ष की सजा के साथ दोषी ठहराया था।
  • आरोपी ने केरल उच्च न्यायालय के समक्ष अपील दायर की। इस न्यायालय ने उनकी दोषसिद्धि की पुष्टि की थी।
  • उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की।
  • बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 और आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (इसके बाद सी.आर.पी.सी. के रूप में संदर्भित) की धारा 197 के संदर्भ में उक्त दोषसिद्धि में कोई मंजूरी मौजूद नहीं थी। उन्होंने यह भी प्रस्तुत किया कि अभियोजन पक्ष ने कथित अपराध के लिए किसी भी तरह की हेराफेरी और/या आपराधिक कारण स्थापित नहीं किया है। इसलिए, सजा कानून के विपरीत थी।
  • अभियोजन पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि अदालतों ने कानून के अनुसार काम किया है। सम्पत्ति का बेईमानी से गबन(मिसअप्प्रोप्रिएशन) किसी कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं है, इसलिए सीआरपीसी की धारा 197 के तहत किसी मंजूरी का सवाल ही नहीं उठता है। भ्रष्टाचार के किसी मामले में, लोगों के लिए रखे गए भारी स्टॉक के दुरुपयोग के दोषी आरोपी पर मुकदमा न चलाना जनहित के विरुद्ध होगा।

मुद्दे

  1. क्या अपीलकर्ता (अभियुक्त) की सजा उचित थी?
  2. क्या उस पर मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी की जरूरत थी?

निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि विचारणीय अदालत और केरल उच्च न्यायालय यह मानने में सही थे कि अभियोजन पक्ष उक्त वस्तुओं को सौंपे जाने को साबित करने में सक्षम था (जैसा कि तालिका में उल्लिखित है)। इस प्रकार, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और आईपीसी की धारा 409 के तहत उक्त सजा उचित थी। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि सीआरपीसी की धारा 197 के तहत मंजूरी आईपीसी की धारा 409 के तहत आरोपी पर मुकदमा चलाने के लिए एक शर्त नहीं है।

इसके अलावा, यह माना गया था कि अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि संबंधित संपत्ति आरोपी को सौंपी गई है। फिर यह आरोपी को दिखाना है कि उसने उस संपत्ति का सौदा कैसे किया था।

सुशील कुमार सिंघल बनाम क्षेत्रीय प्रबंधक, पंजाब नेशनल बैंक (2010)

तथ्य

  • इस मामले में आरोपी एक बैंक में चपरासी था।
  • उन्हें डाकघर में टेलीफोन बिल के बकाया के रूप में जमा करने के लिए 5,000 रुपये की नकदी सौंपी गई थी। उन्होंने इसे जमा नहीं किया और बैंक ने उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 409 के तहत एफ.आई.आर. दर्ज कर दी।
  • विचारणीय अदालत ने उन्हें इस धारा के तहत दोषी ठहराया। इसके अलावा बैंक ने उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया।
  • उन्होंने औद्योगिक (इंडस्ट्रियल) विवाद अधिनियम 1947 के तहत एक औद्योगिक विवाद उठाया और मामला केंद्र सरकार औद्योगिक न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल)-सह-श्रम न्यायालय-द्वितीय (इसके बाद “न्यायाधिकरण” के रूप में संदर्भित) को भेजा गया था।
  • इस बीच, उन्होंने अपीलीय अदालत के समक्ष अपील दायर की। इस न्यायालय ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा लेकिन उसे अपराधियों की परिवीक्षा (प्रोबेशन) अधिनियम 1958 के तहत परिवीक्षा का लाभ दिया। इस न्यायालय ने उसे परिवीक्षा पर रिहा कर दिया था।
  • इसके अलावा, न्यायाधिकरण ने उनके दावे को खारिज करते हुए और सेवा से उनकी बर्खास्तगी को उचित और कानून के अनुसार सही मानते हुए फैसला सुनाया।
  • अभियुक्त ने फैसले को चुनौती देने के लिए पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष एक रिट याचिका दायर की। उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी।
  • अभियुक्त (अपीलकर्ता) ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील दायर की।
  • अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि उच्च न्यायालय के निर्णय और आदेश के साथ-साथ न्यायाधिकरण का पंचाट (अवॉर्ड) 1958 के अधिनियम के तहत रद्द किए जाने योग्य है।
  • बैंक (प्रतिवादी) की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि उक्त अधिनियम के तहत इस तरह का लाभ केवल सजा को खत्म करता है, दोषसिद्धि के तथ्य को नहीं। इसलिए, बैंक के कर्मचारी को नैतिक अधमता से जुड़े अपराध का दोषी ठहराया जाता है। इसके अलावा, उक्त बैंक के लिए उसे सेवा से बर्खास्त करना भी स्वीकार्य है। यह अपील खारिज किये जाने योग्य है।

मुद्दे

  1. क्या अपीलकर्ता के कार्य में नैतिक अधमता शामिल है?
  2. क्या 1958 के अधिनियम के तहत अपीलकर्ता को दिया गया लाभ उसे सेवा में बहाल करने का अधिकार देता है?

निर्णय

विभिन्न प्रमुख निर्णयों और सबूतों का हवाला देते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अपीलकर्ता ने नैतिक अधमता से जुड़ा अपराध किया है। इस न्यायालय ने यह भी माना कि नैतिक अधमता से जुड़े अपराध के लिए दोषसिद्धि एक कर्मचारी को रोजगार जारी रखने के लिए अयोग्य घोषित कर देती है। इसलिए, इस न्यायालय ने अपील खारिज कर दी।

सुनील दहिया बनाम राज्य (एन.सी.टी. दिल्ली) (2016)

तथ्य

  • इस मामले में, सुनील दहिया विग्नेश्वरा ग्रुप ऑफ कंपनीज (वीजीसी) के प्रबंध निदेशक थे। इसके अलावा, उनके भाई वित्त प्रमुख थे और उनके पिता अध्यक्ष थे।
  • सुनील दहिया गुड़गांव और मानेसर में आईटी पार्क के निर्माण की दो परियोजनाओं में शामिल थे। उन्होंने अपने भाई और पिता के साथ मिलकर इस संबंध में निम्नलिखित कंपनियों को शामिल किया था:
  1. मेसर्स विग्नेश्वरा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड;
  2. विग्नेश्वर डेवेलपवेल प्राइवेट लिमिटेड; और
  3. मेसर्स एक्वेरियस बिल्डकॉन प्राइवेट लिमिटेड

(उपर्युक्त कंपनियों के अलावा, उन्होंने 15 अन्य कंपनियों को भी शामिल किया था। इन सभी कंपनियों को एक साथ वी.जी.सी. कहा जाता था।)

  • सुनील दहिया को इन दोनों परियोजनाओं के लिए हरियाणा राज्य औद्योगिक और बुनियादी ढांचा विकास निगम (एचएसआईआईडीसी) और हरियाणा सरकार के टाउन एंड कंट्री प्लानिंग निदेशालय से मंजूरी मिल गई थी।
  • इसके बाद, उन्होंने परियोजनाओं में निवेश के लिए आम जनता से आवेदन आमंत्रित किए। उन्होंने प्रिंट मीडिया, टीवी और एफएम रेडियो में विज्ञापनों के जरिए ऐसे आवेदन आमंत्रित किए।
  • पंजाब नेशनल बैंक (पी.एन.बी.) ने उक्त परियोजनाओं में निवेश किया था।
  • सुनील दहिया ने वर्ष 2006-2008 के बीच निवेशकों के साथ समझौते किए। उन्होंने उपर्युक्त कंपनियों की ओर से इन समझौतों को निष्पादित किया।
  • उन्होंने निवेशकों को आश्वासन दिया कि निर्माण समझौते की तारीख से 60 महीने के भीतर और सरकारी प्राधिकरण से पूर्णता प्रमाण पत्र प्राप्त होने के बाद पूरा किया जाएगा।
  • इसके अलावा, उन्होंने निवेशकों को 9% से 12% प्रति माह की दर से सुनिश्चित रिटर्न की गारंटी दी।
  • निवेशकों ने निम्नलिखित आधारों पर शिकायतें दर्ज कीं:
  • 60 महीने बीत जाने के बावजूद, सुनील दहिया और उनके परिवार (आरोपी) ने परियोजना स्थलों पर निर्माण पूरा नहीं किया था;
  • मांगों के बावजूद, उन्होंने (आरोपी) फरवरी 2014 से सुनिश्चित रिटर्न का भुगतान नहीं किया है;
  • उन्होंने मिलीभगत करके, साजिश रचकर और निवेशकों के पैसे से अवैध लाभ उठाकर 600 करोड़ रुपये से अधिक की हेराफेरी की है;
  • उन्होंने निवेशकों (शिकायतकर्ताओं) के स्वामित्व वाली विभिन्न संपत्तियों को इस आश्वासन पर खरीदा कि आरोपी उन्हें मुआवजे के रूप में खरीदी गई संपत्ति के मूल्य के बराबर संपत्ति आवंटित करेंगे। लेकिन, आरोपी ने शिकायतकर्ताओं को ऐसी संपत्ति की अनुमति नहीं दी;
  • अभियुक्तों ने शिकायतकर्ताओं को भुगतान की गई राशि (अर्थात्, वह राशि जो शिकायतकर्ताओं को अभियुक्तों को अपनी संपत्ति बेचने के बाद प्राप्त हुई थी) को अपनी परियोजनाओं में निवेश किया;
  • आरोपियों ने निवेशित राशि की वापसी से संबंधित मुख्य धारा को बदलकर उक्त समझौतों को जाली बना दिया था;
  • आरोपी ने एक विज्ञापन में कहा कि पी.एन.बी. और बैंक ऑफ इंडिया (बी.ओ.आई.) ने उनकी परियोजनाओं की रेटिंग की थी, जो झूठी थी;
  • सुनील दहिया और उनके परिवार के सदस्य आदतन अपराधी थे और उन पर कई एफ.आई.आर. में कई निवेशकों को धोखा देने का आरोप लगाया गया था;
  • उन्होंने आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी और जालसाजी की है जो आईपीसी की धारा 34 के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 406, 420, 467, 468 और 471 के तहत दंडनीय हैं।
  • उपर्युक्त आधार पर आईपीसी की धारा 409/ 420/ 423/ 467/ 471/ 120B के तहत एफ.आई.आर. दर्ज की गईं थी।
  • आरोप पत्र से पता चला कि 1,500 से अधिक निवेशक थे। इसके अलावा, आरोप पत्र में कहा गया है कि सुनील दहिया (प्रबंध निदेशक) न केवल उक्त कंपनी के एजेंट के रूप में कार्य कर रहे थे, बल्कि कंपनी की संपत्ति के सरपरस्त (ट्रस्टी) भी थे। वह अपने भाई और पिता के साथ कंपनी के रोजमर्रा के कामकाज के साथ-साथ दीर्घकालिक नीतियों की योजना भी बना रहे थे।
  • विचारणीय अदालत ने सुनील दहिया और उनके परिवार के सदस्यों को उक्त धाराओं के तहत दोषी ठहराया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
  • सुनील दहिया ने सीआरपीसी की धारा 439 के तहत अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष तीन जमानत याचिकाएं दायर कीं। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने इन जमानत आवेदनों (1212/2016, 1221/2016 और 1222/2016) को खारिज कर दिया था।
  • इसके बाद, सुनील दहिया ने सीआरपीसी की धारा 439 के तहत दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष तीन जमानत याचिकाएं दायर कीं।
  • आवेदक (सुनील दहिया यानी आरोपी) की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने कहा कि आवेदक का उक्त परियोजनाओं के कार्यान्वयन के संबंध में कोई बेईमान इरादा नहीं था। मानेसर में परियोजना पूरी होने की कगार पर है। जहां तक गुड़गांव में परियोजना का सवाल है, कंपनी सरकारी अधिकारियों से प्रासंगिक मंजूरी और अनुमोदन के अभाव में आगे नहीं बढ़ सकी। हालाँकि, आवेदक 21 महीने से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में था।
  • अतिरिक्त लोक अभियोजक (ए.पी.पी.) ने प्रस्तुत किया कि मानेसर में परियोजना के संबंध में छह टावरों में से केवल एक का निर्माण किया गया था। लोहे की छड़ में जंग लगने के कारण काफी समय से कोई निर्माण कार्य नहीं हुआ था। कंपनी (वी.जी.सी.) के निदेशकों की मंशा परियोजनाओं को समय पर पूरा करने की नहीं थी।
  • ए.पी.पी. ने आगे कहा कि गुड़गांव परियोजना स्थल पर निर्माण शुरू नहीं किया जा सका क्योंकि आवेदक के पास कोई लाइसेंस नहीं था। यह पाया गया कि इस स्थल पर खाई खोदने के अलावा कोई निर्माण गतिविधि नहीं हुई थी।
  • ए.पी.पी. ने यह भी प्रस्तुत किया कि निवेशकों को उनकी निवेशित राशि चुकाने के बजाय, आवेदक ने अपनी विलासिता और आराम के लिए करोड़ों रुपये का दुरुपयोग किया था।

मुद्दे

  1. क्या आईपीसी की धारा 409 के तहत आवेदक (अभियुक्त) के खिलाफ सजा का आदेश उचित था?
  2. क्या अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने जमानत अर्जियां खारिज करके सही किया?

निर्णय

दिल्ली उच्च न्यायालय ने पाया कि सुनील दहिया और उनके परिवार के सदस्यों का सांठगांठ से काम करना एक समान उद्देश्य और समान इरादे थे। हालाँकि, आवेदक पर धोखाधड़ी और भारी मात्रा में सार्वजनिक धन के दुरुपयोग से जुड़े आर्थिक अपराधों का आरोप लगाया गया था। इसलिए, ऐसे अपराध गंभीर प्रकृति के होते हैं। अत: दोषसिद्धि का उक्त आदेश उचित था।

इस उच्च न्यायालय ने माना कि एजेंटों द्वारा आपराधिक विश्वासघात आदि के मामलों में नियमित जमानत देने से आपराधिक न्याय प्रणाली को नुकसान होगा। यह निम्नलिखित स्थितियों में संभव है:

  1. यदि ऐसे अपराध बड़ी संख्या में व्यक्तियों को प्रभावित करते हैं; और
  2. यदि सार्वजनिक धन की भारी हानि होती है।

न्यायालय ने यह भी कहा कि आर्थिक अपराध गंभीर हैं क्योंकि ये देश के वित्तीय स्थिति के लिए गंभीर खतरा हैं।

इसके अलावा, दिल्ली उच्च न्यायालय ने पाया कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जमानत आवेदनों को खारिज करने में सही थे। इस न्यायालय ने आवेदक (अभियुक्त) द्वारा दायर सभी तीन जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया था।

ललिता सैनी बनाम राज्य (2019)

तथ्य

  • इस मामले में, आरोपी (प्रतिवादी नंबर 2) अन्य सह-अभियुक्त व्यक्तियों के साथ एक वेदांत वेलफेयर सोसाइटी के शासी निकाय/प्रबंध समिति का सदस्य था।
  • उन्होंने पीड़ितों (ललिता सैनी और उनके परिवार के सदस्यों) को गलत बताया कि सोसायटी, 700 सदस्यों को सदस्यता आवंटित करने के बाद, सोसायटी की सदस्यता को 850 सदस्यों तक बढ़ाने के लिए और अधिक भूमि प्राप्त करने की प्रक्रिया में थी।
  • नए सदस्यों को जमीन की पूरी कीमत जमा करनी थी जो तीन बेडरूम वाले फ्लैट के लिए लगभग 11 लाख रुपये थी।
  • पीड़ितों ने मांगी गई राशि (लगभग 33,95,000 रुपये) का भुगतान किया, लेकिन आरोपियों ने पीड़ितों को न तो कोई शेयर प्रमाणपत्र आवंटित किया और न ही कोई सदस्यता प्रदान की। उन्होंने रकम भी वापस नहीं की।
  • पीड़ितों ने आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ थाना सुभाष प्लेस, नई दिल्ली में एफ.आई.आर. दर्ज कराई। दर्ज एफ.आई.आर. आईपीसी की धारा 506/ 409/ 420/ 120B के तहत थी। हालाँकि, पुलिस ने प्रतिवादी नंबर 2 को गिरफ्तार कर लिया था।
  • जांच अधिकारी की रिपोर्ट के अनुसार उक्त सोसायटी के नाम पर कोई संपत्ति पंजीकृत नहीं थी। इसके अलावा, उक्त सोसायटी को कभी भी कोई प्राधिकार पत्र जारी नहीं किया गया था और सोसायटी के पास भूमि खरीदने के लिए सार्वजनिक धन एकत्र करने का कोई अधिकार नहीं था।
  • राज्य की ओर से दायर स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, ललिता सैनी के अलावा 47 और पीड़ितों ने आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ अपनी शिकायत दर्ज कराई थी।
  • प्रतिवादी नंबर 2 ने सीआरपीसी की धारा 167(2) के तहत “डिफ़ॉल्ट जमानत” की मांग के लिए मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट (सी.एम.एम.) के समक्ष जमानत याचिका दायर की थी। प्रतिवादी नंबर 2 ने दावा किया कि अभियोजन पक्ष पहली रिमांड की तारीख से 60 दिनों के भीतर आरोप पत्र दाखिल करने में विफल रहा। हालांकि, सी.एम.एम. ने जमानत अर्जी खारिज कर दी थी।
  • प्रतिवादी नंबर 2 ने सीएमएम के आदेश को चुनौती देने के लिए सत्र न्यायालय के समक्ष एक पुनरीक्षण याचिका दायर की। जिला एवं सत्र न्यायाधीश (उत्तर-पश्चिम), रोहिणी, दिल्ली ने प्रतिवादी को डिफ़ॉल्ट जमानत (वैधानिक जमानत) दी और माना कि सीआरपीसी की धारा 167(2)(a)(ii) के अनुसार आरोप पत्र दाखिल करने की निर्धारित अवधि 60 दिन थी। 
  • ललिता सैनी ने सीआरपीसी की धारा 482 और सीआरपीसी की धारा 439(2) के तहत दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका दायर की। यह याचिका जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश को चुनौती देने के लिए थी।
  • याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि आरोप पत्र दाखिल करने की निर्धारित अवधि 90 दिन है।
  • ललिता सैनी (याचिकाकर्ता) के विद्वान वकील ने प्रस्तुत किया कि याचिकाकर्ता ने केवल बैंकिंग चैनलों के माध्यम से लगभग 12 लाख रुपये जमा किए थे।
  • प्रतिवादी नंबर 2 के विद्वान वकील ने प्रस्तुत किया कि आरोप दायर करने की निर्धारित अवधि 60 दिन है।

मुद्दे

  1. आईपीसी की धारा 409 के तहत दंडनीय अपराध के लिए आरोप पत्र दाखिल करने की निर्धारित अवधि 60 दिन है या 90 दिन?
  2. क्या जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश उचित था?

निर्णय

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि जब कोई अपराध निम्नलिखित के साथ दंडनीय हो तो सीआरपीसी की धारा 167(2)(a)(ii) के अनुसार आरोप पत्र दाखिल करने की निर्धारित अवधि 60 दिन होगी:

  • न्यूनतम सज़ा: 10 वर्ष से कम;
  • अधिकतम सज़ा: न तो मौत और न ही आजीवन कारावास।

उपरोक्त स्थिति में, आरोप पत्र दाखिल न होने की स्थिति में अभियुक्त 60 दिनों के बाद डिफ़ॉल्ट जमानत के लिए पात्र है।

इसके अलावा, जब कोई अपराध निम्नलिखित के साथ दंडनीय हो तो सीआरपीसी की धारा 167(2)(a)(i) के अनुसार आरोप पत्र दाखिल करने की निर्धारित अवधि 90 दिन होगी:

  • न्यूनतम सज़ा: 10 वर्ष या अधिक तक कारावास;
  • अधिकतम सज़ा: मौत या आजीवन कारावास।

उपरोक्त स्थिति में, आरोप पत्र दाखिल न होने की स्थिति में आरोपी 90 दिनों के बाद डिफ़ॉल्ट जमानत के लिए पात्र है।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि आईपीसी की धारा 409 के तहत अपराध के लिए आजीवन कारावास या 10 साल तक की कैद के साथ जुर्माना भी हो सकता है। ऐसा अपराध गंभीर प्रकृति का है और आरोप पत्र दाखिल करने के लिए विस्तारित समय की आवश्यकता है।

हालाँकि, इस न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष को धारा 409 के तहत अपराध के लिए 90 दिनों के भीतर आरोप पत्र दाखिल करना होगा। अदालत ने यह भी माना कि प्रतिवादी नंबर 2 सीआरपीसी की धारा 167 के तहत डिफ़ॉल्ट जमानत के लिए पात्र नहीं है क्योंकि आरोप पत्र 90 दिनों के भीतर दायर किया गया था। इसलिए जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश उचित नहीं था।

न्यायालय ने ललिता सैनी द्वारा दायर याचिका को स्वीकार कर लिया और उपरोक्त आदेश को रद्द कर दिया था।

एन. राघवेंद्र बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, सी.बी.आई. (2021)

तथ्य

  • इस मामले में, एन. राघवेंद्र (अभियुक्त नंबर 1; ए1) ने मई 1990 से सितंबर 1995 तक श्री राम ग्रामीण बैंक, निज़ामाबाद शाखा में शाखा प्रबंधक के रूप में काम किया था।
  • ए. संध्या रानी (अभियुक्त संख्या 2; ए2) ने 1991-1996 तक उसी बैंक में क्लर्क-कम-कैशियर के रूप में काम किया और वह क्रेडिट और डेबिट वाउचर की तैयारी से संबंधित चालू और बचत खातों में दिन-प्रतिदिन के लेनदेन में भी शामिल हुई।
  • सी. विनय कुमार (अभियुक्त नंबर 3; ए3) निशिता एजुकेशनल एकेडमी के कोषाध्यक्ष थे और ए1 के बहनोई हैं।
  • ए3 ने उक्त अकादमी के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता की हैसियत से उक्त बैंक में चालू खाता संख्या 282 खोला। खाता  5,00,000 रुपये की प्रारंभिक जमा राशि के साथ खोला गया था।
  • अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि ए1 और ए2 ने बैंक में अपने संबंधित पद का दुरुपयोग किया और अकादमी के खाते से 10,00,000 रुपये तक की राशि की निकासी की अनुमति देकर ए3 के साथ साजिश रची। ऐसी निकासी के लिए खाते में आवश्यक धनराशि थी।
  • इसके अलावा, आरोप यह था कि ए1 ने एक शाखा प्रबंधक के रूप में 23 अप्रैल 1994 को लूज़-लीफ़ चेक जारी किए। इसके बाद, रु 2,50,000 निकाल लिए गए और डेबिट को जानबूझकर लेजर बुक में दर्ज नहीं किया गया। ऐसा ही एक और लेनदेन 30 जून 1994 को 4,00,000 रुपये की राशि के लिए हुआ। लेकिन डेबिट को बैंक की लेजर शीट में दर्ज नहीं किया गया था। ए1 ने 30 जुलाई 1994 को एक बंद खाते का एक और चेक जारी किया और 3,50,000 रुपये निकाले गए। यह भुगतान ए3 के पक्ष में था और चेक पर हस्ताक्षर ए3 से मेल नहीं खा रहे थे।
  • ए1 पर 24 फरवरी 1995 और 25 फरवरी 1995 को दो एफडीआर को समय से पहले बंद करने का भी आरोप लगाया गया था, जो क्रमशः 10,00,000 रुपये और 4,00,000 रुपये की राशि के लिए थे। ये एफडीआर बी सत्यजीत रेड्डी के नाम पर थे।
  • बैंक द्वारा जारी वाउचर के अनुसार, खाता संख्या 282 में कुल 14,00,000 रुपये जमा किए गए थे, लेकिन खाता बही में केवल 4,00,000 रुपये दिखाए गए थे। शेष 10,00,000 रुपये वर्ष 1994 के दौरान उक्त खाते से गुप्त रूप से निकाल लिए गए।
  • अभियोजन पक्ष का मामला यह भी था कि ए1, ए2 और ए3 ऐसे लेनदेन को अंजाम देने के लिए एक साथ काम कर रहे थे, जिसके परिणामस्वरूप बैंक और उसके जमाकर्ताओं को गलत नुकसान हुआ।
  • बैंक के अध्यक्ष ने हैदराबाद में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सी.बी.आई.) के पुलिस अधीक्षक को एक लिखित शिकायत दर्ज की थी।
  • सी.बी.आई. ने ए1, ए2 और ए3 के खिलाफ आईपीसी की धारा 409, 477(a) और 120B और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(2) के साथ पठित 13(1)(c) और (d) के तहत मामला दर्ज किया।
  • अदालत में, अभियोजन पक्ष द्वारा कुल 11 गवाहों (पी.डब्ल्यू.1 से पी.डब्ल्यू. 11) की जांच की गई थी, और दस्तावेजी साक्ष्य भी सामने रखे गए थे। अदालत ने माना कि अभियोजन ने ए1 के खिलाफ अपना मामला पर्याप्त रूप से साबित कर दिया है।
  • हालाँकि, विद्वान विशेष न्यायाधीश ने माना कि ए1 आईपीसी की धारा 409, 420 और 477A और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (पी.सी. अधिनियम) की धारा 13(1)(d) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 13(2) के तहत अपराधों का दोषी था। न्यायाधीश ने उसे प्रत्येक अपराध के लिए विभिन्न जुर्माने के साथ पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। हालाँकि, न्यायाधीश ने ए2 और ए3 को सभी आरोपों से बरी कर दिया था।
  • ए1 ने आपराधिक अपील दायर करके हैदराबाद में आंध्र प्रदेश के उच्च न्यायालय के समक्ष अपनी दोषसिद्धि और सजा को चुनौती दी। यह उच्च न्यायालय विचारणीय अदालत के निष्कर्षों से सहमत हुआ और अपील खारिज कर दी।
  • उपरोक्त उच्च न्यायालय के फैसले से दुखी होकर, ए1 ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक आपराधिक अपील दायर की।
  • ए1 (अपीलकर्ता) की ओर से उपस्थित विद्वान वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि वर्तमान मामले में कोई आपराधिक मामला नहीं था क्योंकि अपीलकर्ता द्वारा कोई लाभ नहीं लिया गया था, भले ही नकद ए3 को सौंप दिया गया हो। उपरोक्त उच्च न्यायालय के निष्कर्ष स्व-विरोधाभासी थे।
  • वरिष्ठ वकील ने यह भी तर्क दिया कि अपीलकर्ता इन आधारों पर आईपीसी की धारा 420, 409 और 477A या पी.सी. अधिनियम के प्रावधानों के तहत दंडनीय नहीं है:
  1. अपीलकर्ता ने विचलित चेक का उपयोग किया; और
  2. उन पर चालू खाता संख्या 282 के बहीखाते में प्रासंगिक प्रविष्टियाँ दर्ज न करने का आरोप था।
  • वरिष्ठ वकील ने आगे तर्क दिया कि यह घोर प्रशासनिक कदाचार का मामला था जिसके लिए अपीलकर्ता को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था और उसके पेंशन लाभों से इनकार कर दिया गया था। इस न्यायालय को उपरोक्त आरोपों को इस तथ्य के आलोक में प्रतिबिंबित करना चाहिए कि बैंक को कोई नुकसान नहीं हुआ है।
  • अभियोजन पक्ष, सी.बी.आई. की ओर से उपस्थित विद्वान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ए.एस.जी.) ने तर्क दिया कि उपरोक्त धाराओं के तहत आपराधिक मामला स्थापित करने के लिए, यह साबित करना आवश्यक है कि अपीलकर्ता ने लाभ प्राप्त किया था या बैंक को कोई नुकसान पहुंचाया था। अपीलकर्ता को उन कर्तव्यों के लिए पूरी ज़िम्मेदारी लेनी होगी जिन्हें वह निर्वहन करने में विफल रहा था। इसके अलावा, उसे यह दिखाना होगा कि उसने सभी लेनदेन का ईमानदारी से अनुपालन किया है और सभी आवश्यकताओं या शर्तों का पालन किया गया है।

मुद्दे

  • क्या अपीलकर्ता के विरुद्ध दोषसिद्धि और सजा उचित थी?
  • क्या अपीलकर्ता द्वारा न्यायालय (अर्थात् उच्चतम न्यायालय) के समक्ष दायर की गई आपराधिक अपील लागू करने योग्य थी?

निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि न तो विचारणीय अदालत और न ही आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने आईपीसी की धारा 409, 420 और 477A की सामग्री पर चर्चा की है। इसके अलावा, न्यायालय उन विशिष्ट साक्ष्यों को संदर्भित करने का कोई प्रयास करने में विफल रहे जो ऐसे अवयवों को संतुष्ट कर सकते थे।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी देखा कि बैंक या बी. सत्यजीत रेड्डी या बैंक के किसी भी ग्राहक को कोई आर्थिक हानि नहीं हुई थी। इस न्यायालय के समक्ष साक्ष्य से आरोपी व्यक्तियों के बीच किसी भी साजिश का खुलासा नहीं हुआ। अपीलकर्ता की ओर से कर्तव्यों में कदाचार के बावजूद, उसके किसी भी कृत्य से यह साबित नहीं हुआ कि उसने आईपीसी की धारा 409, 420, 477A और पी.सी. अधिनियम के प्रावधानों के तहत अपराध किया है।

इस न्यायालय ने आईपीसी की धारा 409 के संबंध में फैसला सुनाया। फैसले में दी गयीं टिप्पणियाँ निम्नलिखित थीं:

  1. अभियुक्त को लोक सेवक, बैंकर, व्यापारी या एजेंट होना चाहिए;
  2. सार्वजनिक संपत्तियों को सौंपना अनिवार्य है; और
  3. धारा 405 के तहत दिए गए तरीके से इसका बेईमानी से दुरुपयोग या उपयोग होना चाहिए।

इसके अलावा, न्यायालय ने यह भी माना कि ग्राहक ऋणदाता हैं और बैंक उधारकर्ता हैं। बैंक ग्राहकों द्वारा जमा किए गए पैसों को भरोसे पर नहीं रखते। वह पैसा बैंकरों के कोष (फन्ड) का हिस्सा बन जाता है। यदि ग्राहक इसकी मांग करते हैं तो बैंक उन्हें वह पैसा देने के लिए उत्तरदायी हैं। जब तक ग्राहक उस पैसे की मांग नहीं करते, बैंक इसका इस्तेमाल मुनाफा कमाने के लिए कर सकते हैं। हालाँकि, धन के दुरुपयोग के पुख्ता सबूत होने चाहिए। ऐसे साक्ष्य के बिना अपराधी पर मुकदमा चलाना असुरक्षित है।

इसलिए, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अपीलकर्ता के खिलाफ उक्त दोषसिद्धि और सजा उचित नहीं थी। इस न्यायालय ने उपरोक्त अपील को स्वीकार कर लिया क्योंकि यह लागू करने योग्य थी।

बृज नंदन और अन्य बनाम पंजाब राज्य (2022)

तथ्य

  • इस मामले में, पांच आरोपी व्यक्ति थे जिनके नाम राकेश कुमार मल्होत्रा (आरक्षण पर्यवेक्षक), परवेश वालिया (टिकट पर्यवेक्षक), बृज नंदन, अनवर अंसारी और जरनैल सिंह थे।
  • वे रेलवे विभाग में भ्रष्टाचार में लिप्त थे। दोनों ने मिलकर राम सिंह मीना नामक व्यक्ति के खिलाफ साजिश रची क्योंकि उसने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।
  • उपरोक्त तथ्य के कारण, उन्होंने डीएवी, स्कूल, खन्ना के शिक्षक सोहन लाल और रेलवे विभाग के अन्य कर्मचारियों से राम सिंह मीना के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।
  • उपरोक्त शिकायत के आधार पर राम सिंह मीना को जिला सरहिन्द से जिला रोपड़ स्थानांतरित कर दिया गया। स्थानांतरण के बाद, आरोपी व्यक्तियों बृज नंदन, राकेश मल्होत्रा और अनवर अंसारी ने समय-समय पर उसके रिकॉर्ड का निरीक्षण किया लेकिन सब कुछ ठीक पाया गया था।
  • बृज नंदन और राकेश कुमार मल्होत्रा लगातार राम सिंह मीना के खिलाफ तरह-तरह की शिकायतें दर्ज करा रहे थे।
  • 4 अगस्त 2018 को, आरोपी व्यक्तियों ने श्रीमती चंचल बाला से राम सिंह मीना की सेवा अवधि के संबंध में प्रासंगिक रिकॉर्ड छीन लिया। इसके अलावा, आरोपी व्यक्तियों ने उक्त रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ की, जिसका विवरण इस प्रकार है:
  1. एल.सी. नंबर 370416 रिकॉर्ड फ़ाइल, अग्रेषण (फॉर्वर्डिंग) नोट और आई.डी. प्रमाण ग़लत थे;
  2. एल.सी. नंबर 370431, आई.डी. प्रूफ बदला गया; और
  3. एल.सी. नंबर 370448 से 49, सभी अग्रेषण नोट और आई.डी. प्रूफ हटा दिए गए थे।

आरोपी व्यक्तियों ने राम सिंह मीना को एक मामले में शामिल करने के लिए उपरोक्त कार्य किया और उसी के परिणामस्वरूप उनके खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया था।

  • राम सिंह मीना द्वारा आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ दायर की गई शिकायत में कहा गया है कि उन्होंने विभिन्न अपराध किए हैं।
  • उपरोक्त शिकायत और उसके बाद की जांच के आधार पर उपरोक्त सभी पांच आरोपियों के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज की गई थी। एफ.आई.आर. आईपीसी की धारा 409 और 120B को लेकर थी।
  • जांच एजेंसी ने विस्तृत जांच की। पुलिस स्टेशन जी.आर.पी., श्रीहिंद जिला फतेहगढ़ साहिब के प्रभारी ने बृज नंदन, अनवर अंसारी और जरनैल सिंह के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 173 के तहत रिपोर्ट प्रस्तुत की।
  • अतिरिक्त सिविल न्यायाधीश (सीनियर डिवीजन) सह मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, फतेहगढ़ साहिब की अदालत ने बृज नंदन और अनवर अंसारी पर आईपीसी की धारा 409/120 B के तहत आरोप लगाया। लेकिन, इस अदालत ने जरनैल सिंह को बरी कर दिया था।
  • बृज नंदन और अनवर अंसारी ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, फतेहगढ़ साहिब के समक्ष दो आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाएं दायर कीं। इसके अलावा, राम सिंह मीना ने राज्य के साथ मिलकर अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, फतेहगढ़ साहिब के समक्ष एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। यह याचिका उक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए थी क्योंकि जरनैल सिंह को आरोपमुक्त कर दिया गया था।
  • अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, फतेहगढ़ साहिब ने उपरोक्त तीन याचिकाओं का फैसला किया। न्यायाधीश ने दोनों आरोपियों की याचिका खारिज कर दी और राम सिंह मीना की याचिका पर विचार किया। न्यायाधीश ने जरनैल सिंह के मामले को नये सिरे से विचार के लिए भेज दिया।
  • बृज नंदन और अनवर अंसारी (याचिकाकर्ता) ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष एक आपराधिक विविध याचिका दायर की। यह याचिका मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के उक्त आदेशों को रद्द करने के लिए थी।
  • याचिकाकर्ताओं के विद्वान वकील ने तर्क दिया कि रेलवे विभाग ने याचिकाकर्ताओं पर मुकदमा चलाने के लिए (धारा 197 सीआरपीसी के तहत) मंजूरी देने से इनकार कर दिया, विचारणीय अदालत उनके खिलाफ आरोप तय नहीं कर सका। इसके अलावा, रेलवे विभाग ने उक्त दस्तावेजों को छीनने या उनके साथ छेड़छाड़ करने की कोई शिकायत दर्ज नहीं की। इसलिए, एफ.आई.आर. और उसके बाद की कार्यवाही को रद्द किया जाना चाहिए।

मुद्दे

  1. क्या याचिकाकर्ताओं (बृज नंदन और अनवर अंसारी) के खिलाफ उक्त एफ.आई.आर. और उसके बाद की कार्यवाही उचित थी?
  2. क्या याचिकाकर्ता आईपीसी की धारा 409/120B के तहत उत्तरदायी थे?
  3. क्या याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर आपराधिक विविध याचिका लागू करने योग्य थी?

निर्णय

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ताओं ने उक्त दस्तावेज (यानी, अग्रेषित नोट, आई.डी. प्रमाण, आदि) छीन लिए थे। उन्होंने आईपीसी की धारा 409 के तहत अपराध किया था क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर उन दस्तावेजों का दुरुपयोग किया था।

उच्च न्यायालय ने यह भी पाया कि निम्नलिखित में कोई अवैधता नहीं थी:

  • एफ.आई.आर. का पंजीकरण;
  • उक्त आरोपों का निर्धारण; और
  • अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा उक्त आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं को खारिज किया गया।

इसलिए, उच्च न्यायालय ने उक्त आपराधिक विविध याचिका को खारिज कर दिया क्योंकि यह लागू करने योग्य नहीं थी।

उच्च न्यायालय ने माना कि आईपीसी की धारा 409 के तहत अपराध करना आधिकारिक कर्तव्य से संबंधित नहीं है। न्यायालय ने यह भी माना कि धारा के तहत आरोपी पर मुकदमा चलाने के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं है।

योगेश जगिया बनाम जिंदल बायोकेम प्राइवेट लिमिटेड (2022)

तथ्य

  • इस मामले में, जिंदल बायोकेम प्राइवेट लिमिटेड (इसके बाद “निजी कंपनी”) नाम की एक रियल एस्टेट डेवलपमेंट कंपनी थी। उक्त कंपनी के चार प्रमोटर थे, राजिंदर कुमार जिंदल, अत्तर सिंह, करतार सिंह और ए.पी. सिंह।
  • 2005 में, उन्होंने संयुक्त रूप से V4 इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड(इसके बाद “V4”) को बढ़ावा दिया। V4 के निगमन से पहले, उन्होंने एक निजी कंपनी को धन का योगदान दिया और दिल्ली विकास प्राधिकरण से कड़कड़डूमा सामुदायिक केंद्र, दिल्ली में एक वाणिज्यिक (कमर्शियल) भूमि का अधिग्रहण (एक्वायर) किया। V4 ने 24 फरवरी 2005 के एक विकास समझौते के तहत उक्त भूखंड को विकसित किया था। हालांकि, प्रमोटर उक्त भूखंड पर बोली लगाना चाहते थे।
  • 2008 में, प्रवर्तकों के बीच कुछ विवाद उत्पन्न हुए। दो प्रमोटरों ने V4 से बाहर निकल कर अपने इक्विटी शेयर शेष प्रमोटरों यानी राजिंदर कुमार जिंदल और अत्तर सिंह को बेच दिए। इसके बाद, राजिंदर कुमार जिंदल V4 से बाहर निकल गए और अपने शेयर अत्तर सिंह को बेच दिए थे।
  • शेयर की खरीद के समझौते तैयार किये गये थे। उक्त विवादों के निपटारे के लिए, प्लॉट नंबर 228, सेक्टर-9, द्वारका (V4 द्वारा विकसित) पर स्थित वाणिज्यिक संपत्ति का एक हिस्सा सहमति के आधार पर निजी कंपनी को बेचने पर सहमति हुई। इस उद्देश्य के लिए, निजी कंपनी और V4 (दोनों दिनांक 7 अक्टूबर 2009) के बीच दो अलग-अलग खरीदार समझौते निष्पादित (एक्जीक्यूट) किए गए थे।
  • उपरोक्त समझौतों के निष्पादन के लिए, योगेश जगिया (1991 से बार काउंसिल ऑफ दिल्ली में नामांकित एक प्रैक्टिसिंग वकील) को नियुक्त किया गया था।
  • विवादों के निपटारे के लिए, नीचे दिए गए अनुसार दो संप्रेषण विलेख (कन्वेयंस डीड) निष्पादित किए गए:
  1. 24 फरवरी 2005 के विकास समझौते के अनुसार, कड़कड़डूमा में संपत्ति के लिए V4 के पक्ष में; और
  2. V4 द्वारा दिनांक 7 अक्टूबर 2009 के खरीदार समझौते के अनुसार द्वारका संपत्ति के हिस्से के लिए निजी कंपनी के पक्ष में।
  • मौखिक अनुरोध पर, दोनों संस्थाओं (V4 और निजी कंपनी) ने योगेश जगिया के साथ एक एस्क्रो खाता बनाया।
  • V4 एक एस्क्रो खाते में द्वारका संपत्ति के लिए कब्ज़ा पत्र सौंपने पर सहमत हुआ। हालाँकि, निजी कंपनी द्वारा तय शर्तों का अनुपालन नहीं करने के कारण कब्जा पत्र जमा नहीं किया गया। हालांकि, निजी कंपनी ने आरोप लगाया कि कब्ज़ा पत्र सौंपे गए थे लेकिन योगेश जगिया ने संजय पाल और अतर सिंह को अवैध रूप से जारी कर दिए।
  • 2010 में, निजी कंपनी ने 23 जुलाई 2010 के पत्र के माध्यम से एक एस्क्रो खाता बनाने की पुष्टि की और योगेश जगिया ने कब्जे के पत्र को छोड़कर उक्त पत्र में उल्लिखित दस्तावेजों को स्वीकार किया। निजी कंपनी ने 21 मई 2011 के पत्र में एस्क्रो खाते में रखे दस्तावेजों की दोबारा पुष्टि की थी।
  • निजी कंपनी ने आरोप लगाया कि योगेश जगिया (अभियुक्त संख्या 1; ए1), संजय पाल (अभियुक्त संख्या 2; ए2) और अतर सिंह (अभियुक्त संख्या 3; ए3) ने मिलकर अंतरिक्ष खरीदार समझौतों में बदलाव करने की साजिश रची। ए1 ने विश्वास का आपराधिक उल्लंघन किया और निजी कंपनी को रोकने के लिए सौंपे गए दस्तावेजों में सुधार किया।
  • निजी कंपनी ने 5 जनवरी 2011 को पुलिस स्टेशन सफदरजंग एन्क्लेव और आर्थिक अपराध शाखा (ई.ओ.डब्ल्यू.), दिल्ली के समक्ष ए1 के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज की। आरोप इस प्रकार थे:
  1. संपूर्ण सहमत बिक्री विचार प्राप्त करने के बावजूद, ए2 और ए3, V4 के निदेशक होने के नाते, बिक्री विलेख निष्पादित करने में विफल रहे; और
  2. ए1 ने मिलीभगत करके एस्क्रो खाते से दस्तावेज़ ए2 और ए3 को जारी कर दिए। इसलिए, ए1 ने आईपीसी की धारा 409 के तहत आपराधिक विश्वासघात किया था।
  • इसके अलावा, निजी कंपनी (शिकायतकर्ता/प्रतिवादी) ने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत एक आवेदन दायर किया जिसे खारिज कर दिया गया था। शिकायतकर्ता ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष इस तरह की बर्खास्तगी को चुनौती दी और आवेदन फिर से खारिज कर दिया गया था।
  • सबूतों की जांच और रिकॉर्ड पर अन्य सामग्री पर विचार करने के बाद, ए1 को मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, साउथ साकेत, नई दिल्ली (यानी विचारणीय अदालत) द्वारा बुलाया गया था। अदालत के आदेश के अनुसार, ए1 आईपीसी की धारा 409 के तहत उत्तरदायी था जबकि ए2 और ए3 आईपीसी की धारा 420/34 के तहत उत्तरदायी थे।
  • इसके बाद, ए1 ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष सीआरपीसी की धारा 482 के तहत एक याचिका दायर की। यह याचिका उपरोक्त समन आदेश को रद्द करने के लिए थी।
  • ए1 (याचिकाकर्ता) के विद्वान वरिष्ठ वकील ने प्रस्तुत किया कि:
  1. प्रतिवादी आईपीसी की धारा 409 के तहत किसी भी अपराध के घटित होने का प्रथम दृष्टया मामला बनाने में विफल रहा;
  2. प्रतिवादी और उसके निदेशक (राजिंदर कुमार जिंदल) ने याचिकाकर्ता के खिलाफ विरोधाभासी बयानों वाली कई शिकायतें दर्ज कीं। उन्होंने जानबूझकर भौतिक तथ्यों को छुपाया;
  3. पुलिस ने स्थिति रिपोर्ट में कहा था कि प्रतिवादी के पास आरोपों को साबित करने के लिए कोई दस्तावेजी सबूत नहीं था। इसलिए, विचारणीय अदालत द्वारा पारित समन आदेश प्रकृति में विवादित था;
  4. विचारण अदालत ने यह देखते हुए कोई कारण या आधार नहीं बताया कि याचिकाकर्ता ने आईपीसी की धारा 409 के तहत अपराध किया है;
  5. प्रतिवादी और अन्य प्रमोटरों ने दस्तावेजों को याचिकाकर्ता के एस्क्रो खाते में जमा कर दिया। दस्तावेज़ जारी करने के लिए दोनों पक्षों की संयुक्त सहमति अनिवार्य थी;
  6. प्रतिवादी और V4 के बीच विवाद पूरी तरह से नागरिक थे, जिसमें याचिकाकर्ता को जानबूझकर घसीटा गया था; और
  7. आक्षेपित सम्मन आदेश निरस्त किये जाने योग्य था।
  • उत्तरदाताओं के विद्वान वरिष्ठ वकील (जिंदल बायोकेम प्राइवेट लिमिटेड और राजिंदर कुमार जिंदल) ने प्रस्तुत किया कि:
  1. याचिकाकर्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 409 के तहत कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार मिलने पर समन आदेश पारित किया गया था;
  2. सभी साक्ष्य, साथ ही रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सामग्री, शिकायतकर्ता के मामले का समर्थन करती है;
  3. याचिकाकर्ता ए1, ए2 और ए3 ने मिलकर शिकायतकर्ता के दस्तावेजों को उनके द्वारा अनुपालन सुनिश्चित किए बिना V4 को सौंपने की साजिश रची;
  4. याचिकाकर्ता ने खरीदार समझौतों के नियमों और शर्तों को बदल दिया; और
  5. याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ताओं को निम्नलिखित दस्तावेज़ नहीं सौंपे:
  1. मूल बिक्री समझौता (मूल्य रु. 7.75 करोड़),
  2. द्वारका संपत्ति की दूसरी मंजिल और भूतल (3 दुकानें) से संबंधित कब्ज़ा पत्र, और
  3. निपटान दस्तावेज (संक्षिप्त इतिहास) दिनांक 22 अगस्त 2009, जिसमें प्रतिवादी/शिकायतकर्ता को रुपये से वंचित किया गया। उनके सद्भावना हिस्से के लिए 1 करोड़।

मुद्दे

  1. क्या उक्त सम्मन आदेश लागू करने योग्य है?
  2. क्या याचिकाकर्ता आईपीसी की धारा 409 के तहत उत्तरदायी था?
  3. क्या याचिकाकर्ता द्वारा दायर याचिका सुनवाई योग्य थी?

निर्णय

दिल्ली उच्च न्यायालय ने निम्नलिखित टिप्पणी की:

  1. विचारणीय अदालत ने मामले के तथ्यों पर ठीक से विचार नहीं किया। इसके अलावा, विचारणीय अदालत ने याचिकाकर्ता को बुलाने का कोई कारण नहीं बताया। अतः, सम्मन आदेश रद्द किये जाने योग्य था; और
  2. रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के अनुसार याचिकाकर्ता ने एस्क्रो खाते में जमा किए गए दस्तावेजों और धन का दुरुपयोग नहीं किया था। इसलिए, वह आईपीसी की धारा 409 के तहत उत्तरदायी नहीं था।

तदनुसार, उच्च न्यायालय ने उक्त याचिका को स्वीकार कर लिया और निम्नलिखित को रद्द कर दिया:

  1. मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश; और
  2. जिंदल बायोकेम प्राइवेट लिमिटेड (शिकायतकर्ता/प्रतिवादी) द्वारा शिकायत दर्ज की गई। 

हालाँकि, उच्च न्यायालय ने माना कि मजिस्ट्रेट मुकदमे के किसी भी चरण में अपराधियों को बरी कर सकते हैं। यह तभी संभव है जब मजिस्ट्रेट यह मानें कि आरोप अनुचित हैं।

सीएच के.एस. प्रसाद @ के.एस. प्रसाद बनाम कर्नाटक राज्य (2023)

तथ्य

  • इस मामले में सीएच के.एस. प्रसाद 2012 से 13 सितंबर 2017 तक मेसर्स वासन हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड के कर्मचारी थे।
  • उन्होंने उक्त कंपनी में कई भूमिकाएँ निभाईं। वह कुछ समय के लिए मानव संसाधन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष थे। उनके पास कर्मचारी भविष्य निधि (ई.पी.एफ.) के फॉर्म सहित कंपनी के व्यवसाय से संबंधित कुछ फॉर्म पर हस्ताक्षर करने का अधिकार था।
  • अगस्त 2014 से मई 2015 की अवधि के दौरान कंपनी ने कर्मचारियों के वेतन से ई.पी.एफ. काटा। लेकिन, कंपनी ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ई.पी.एफ.ओ.) के पास उक्त राशि (95,58,104 रुपये) जमा नहीं की थी।
  • 6 अगस्त 2015 को, IV अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, बेंगलुरु के समक्ष सीएच के.एस.प्रसाद (आरोपी) के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई थी। शिकायत आईपीसी की धारा 406 और 409 के तहत अपराध के संबंध में थी। पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया था।
  • आपराधिक कार्यवाही (यानी आईपीसी की धारा 406 और 409 के तहत अपराधों के लिए) चतुर्थ अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, बेंगलुरु (प्रतिवादी 1) के समक्ष लंबित थी।
  • सभी दस्तावेज़ सुरक्षित करने पर, आरोपी ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के समक्ष सीआरपीसी की धारा 482 के तहत एक आपराधिक याचिका दायर की। यह याचिका आरोपियों के खिलाफ उक्त आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के लिए थी।
  • आरोपी (याचिकाकर्ता) की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि 15 सितंबर 2016 को प्रवर्तन अधिकारी, ईपीएफओ (प्रतिवादी 2) ने उक्त कंपनी और उसके अध्यक्ष ए.एम. के खिलाफ लगभग 21 शिकायतें दर्ज की थीं। आर्थिक अपराध के लिए विशेष अदालत के समक्ष अरुण ने उपरोक्त राशि का भुगतान न करने का आरोप लगाया। हालाँकि, उक्त अध्यक्ष को सभी मामलों में बरी कर दिया गया है और इस न्यायालय द्वारा पारित आदेश के अनुसार याचिकाकर्ता को उसके स्थान पर नियुक्त किया गया है। आर्थिक अपराध की विशेष अदालत से याचिकाकर्ता को भी बरी कर दिया गया। वर्तमान मामला कंपनी को कार्यवाही में आरोपी बनाए बिना अकेले याचिकाकर्ता के खिलाफ है। कथित अपराध कभी भी याचिकाकर्ता के विरुद्ध नहीं किये जा सकते।
  • प्रतिवादी 2 की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ईपीएफओ को धनराशि जमा न करने के लिए उत्तरदायी था। आर्थिक अपराधों के लिए कार्यवाही से मुक्ति मात्र से याचिकाकर्ता आईपीसी के तहत अपराधों से मुक्त नहीं हो जाएगा। अत: उपरोक्त याचिका खारिज किये जाने योग्य है।

मुद्दे

  1. क्या याचिकाकर्ता (अभियुक्त) आईपीसी की धारा 409 के तहत उत्तरदायी था?
  2. क्या सीआरपीसी की धारा 482 के तहत उक्त याचिका लागू करने योग्य थी?

निर्णय

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता के खातों में पर्याप्त धनराशि थी और उसका उक्त धनराशि का भुगतान करने का इरादा था। कंपनी की ओर से कोई जानबूझकर चूक नहीं की गई। हालाँकि, कंपनी की संपत्तियों को आयकर विभाग के अधिकारियों ने जब्त कर लिया था, जो कंपनी के नियंत्रण से परे थी। इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में आपराधिक मनःस्थिति के अभाव के कारण याचिकाकर्ता आईपीसी की धारा 409 के तहत उत्तरदायी नहीं था।

इस न्यायालय ने माना कि कंपनी की ओर से कोई जानबूझकर चूक की गई होगी। अन्यथा, कंपनी का उपाध्यक्ष आईपीसी की धारा 409 के तहत उत्तरदायी नहीं है। इसके अलावा, अदालत ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत याचिका को स्वीकार कर लिया और चतुर्थ अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, बेंगलुरु के समक्ष लंबित कार्यवाही को रद्द कर दिया।

चंदा कोचर बनाम आई.सी.आई.सी.आई. बैंक लिमिटेड (2022) और चंदा कोचर बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो (2023)

तथ्य

  • 2022 के मामले में, श्रीमती चंदा कोचर (श्रीमती कोचर) को 17 अप्रैल 1984 को आई.सी.आई.सी.आई. बैंक में एक प्रशिक्षु (ट्रेनी) अधिकारी के रूप में भर्ती किया गया था। अंततः उन्हें समय-समय पर पदोन्नत किया गया। 1 मई 2009 को, उन्हें आई.सी.आई.सी.आई. बैंक के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में भर्ती किया गया था। इसके बाद, उन्हें 31 मार्च 2019 को समाप्त होने वाले कार्यकाल के लिए समय-समय पर फिर से नियुक्त किया गया।
  • अपने रोजगार के दौरान, उन्होंने आई.सी.आई.सी.आई. बैंक की विभिन्न नीतियों पर हस्ताक्षर किए और स्वीकार किए, जिनमें एक आचार संहिता, हितों के टकराव से निपटने के लिए एक रूपरेखा, अनुबंधों के लिए विलेख और एक क्लॉबैक समझौता शामिल था।
  • इसके अलावा, उन्हें कंपनी अधिनियम 1956, कंपनी अधिनियम 2013, बैंकिंग विनियमन अधिनियम 1949, सेबी (लिस्टिंग दायित्व और प्रकटीकरण) विनियम 2015 और ऋण पर आरबीआई मास्टर परिपत्र के अनुपालन में विभिन्न खुलासे करने की भी आवश्यकता थी।
  • उन्हें अप्रैल 2007 से मार्च 2017 के बीच कर्मचारी स्टॉक स्वामित्व योजना (ई.एस.ओ.पी.) प्रदान की गई थी, प्रत्येक अनुदान सेबी दिशानिर्देशों के बाद आई.सी.आई.सी.आई. बैंक द्वारा तैयार किए गए कर्मचारी स्टॉक विकल्प (ई.एस.ओ.) के साथ पढ़े गए पुरस्कार पुष्टिकरण पत्र की शर्तों के तहत दिया गया था। प्रत्येक अनुदान प्रदर्शन, निरंतर अच्छे आचरण और आई.सी.आई.सी.आई. बैंक को उसके द्वारा किए गए अभ्यावेदन/खुलासे पर आधारित था।
  • जुलाई 2016 में, समाचार लेखों के अनुसार उनके खिलाफ भाई-भतीजावाद के आरोप लगाए गए थे। ऐसे आरोप वीडियोकॉन समूह/श्री वेणुगोपाल धूत से संबद्ध कंपनियों को ऋण की मंजूरी के संबंध में थे। इन ऋणों का उद्देश्य श्री वेणुगोपाल धूत या उनके सहयोगियों द्वारा न्यूपावर रिन्यूएबल्स प्राइवेट लिमिटेड में निवेश करना था। लिमिटेड (एनआरपीएल), श्रीमती कोचर के पति (श्री दीपक कोचर) द्वारा प्रवर्तित कंपनी।
  • 26 दिसंबर 2016 को, आई.सी.आई.सी.आई. बैंक ने उपरोक्त आरोपों की स्वतंत्र जांच करने के लिए एक प्रतिष्ठित कानूनी फर्म को नियुक्त किया।
  • उक्त पूछताछ में श्रीमती कोचर और उनके पति ने जानकारी और दस्तावेज उपलब्ध कराए, जिससे संकेत मिलता है कि श्री वेणुगोपाल धूत और उनके सहयोगियों द्वारा एनआरपीएल में कोई निवेश नहीं किया गया था। इसके बाद, लॉ फर्म ने आई.सी.आई.सी.आई. बैंक को अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें कहा गया कि आरोपों में कोई दम नहीं है।
  • अप्रैल 2018 में, आई.सी.आई.सी.आई. बैंक को पत्र प्राप्त हुए जिसमें श्रीमती कोचर द्वारा पद के दुरुपयोग और वीडियोकॉन समूह और श्री दीपक कोचर के बीच व्यापारिक लेनदेन का आरोप लगाया गया।
  • हालाँकि, श्री दीपक कोचर ने 30 अप्रैल 2018 को एक पत्र के माध्यम से श्री वेणुगोपाल धूत/वीडियोकॉन समूह के साथ अपने व्यापारिक लेनदेन का खुलासा किया।
  • 29 मई 2018 को, आई.सी.आई.सी.आई. बैंक के निदेशक मंडल ने श्रीमती कोचर के खिलाफ आरोपों की जांच करने का निर्णय लिया। 30 मई 2018 को, आई.सी.आई.सी.आई. बैंक ने स्टॉक एक्सचेंज को उक्त आरोपों की जांच करने के अपने निर्णय के बारे में सूचित किया।
  • 6 जून 2018 को, आई.सी.आई.सी.आई. बैंक की ऑडिट कमेटी ने श्री न्यायमूर्ति बी.एन. को नियुक्त किया। श्रीकृष्ण (सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश) को उपरोक्त जांच करने के लिए कहा गया है।
  • 18 जून 2018 को आई.सी.आई.सी.आई. बैंक की मंडल बैठक हुई जिसमें श्रीमती कोचर ने कहा कि उन्होंने जांच पूरी होने तक छुट्टी पर जाने का फैसला किया है। मंडल ने उनके फैसले को स्वीकार कर लिया और स्टॉक एक्सचेंज को आवश्यक खुलासे किए।
  • 3 अक्टूबर 2018 को, श्रीमती कोचर ने आई.सी.आई.सी.आई. बैंक के निदेशक मंडल से उन्हें शीघ्र सेवानिवृत्ति देने का अनुरोध किया। इस उद्देश्य से उसने जांच लंबित रहने के दौरान एक पत्र भेजा था।
  • आई.सी.आई.सी.आई. बैंक ने 4 अक्टूबर 2018 को अपने पत्र द्वारा मंडल की मंजूरी की धमकी दी और शीघ्र सेवानिवृत्ति योजना (ई.आर.एस.) के तहत लाभ का हवाला दिया। आई.सी.आई.सी.आई. बैंक ने श्रीमती कोचर द्वारा हस्ताक्षरित दिनांक 19 जुलाई 2016 का एक वचन पत्र (श्रीमती कोचर के रोजगार अनुबंध के संबंध में) संलग्न (एन्क्लोज़्ड) किया।
  • अक्टूबर 2018 और जनवरी 2019 के बीच, श्रीमती कोचर ने 6,90,000 ई.एस.ओ.पी. का उपयोग किया और 4 अक्टूबर 2018 के पत्र के अनुसार अन्य लाभ प्राप्त किए। यह जांच लंबित होने के दौरान हुआ।
  • श्रीमती कोचर ने उपरोक्त पूछताछ में भाग लिया। दिसंबर 2018 में, उसने मौखिक और लिखित प्रस्तुतियाँ प्रस्तुत कीं।
  • न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण (सेवानिवृत्त) ने 27 जनवरी 2019 को आई.सी.आई.सी.आई. बैंक को एक जांच रिपोर्ट सौंपी। जांच रिपोर्ट में माना गया कि श्रीमती कोचर ने लंबे समय तक आचार संहिता का घोर/गंभीर उल्लंघन किया था।
  • 30 जनवरी 2019 को, आई.सी.आई.सी.आई. बैंक ने श्रीमती कोचर को एक ईमेल भेजा जिसमें उन्हें आई.सी.आई.सी.आई. बैंक के निदेशक मंडल द्वारा लिए गए निर्णय के बारे में बताया गया। ईमेल में कहा गया है कि श्रीमती कोचर को शीघ्र सेवानिवृत्ति लाभ के संबंध में 4 अक्टूबर 2018 को किया गया संचार 30 जनवरी 2019 को व्यावसायिक घंटों की समाप्ति से रद्द कर दिया गया है। इसके अलावा, उन्हें आवंटित निहित और गैर-निहित ईएसओपी को रद्द कर दिया गया और आईसीआईसीआई बैंक की विभिन्न नीतियों के अनुसार ईएसओपी के IA-1014-2022-307-2020.DOC सामान्य पूल में वापस कर दिया गया।
  • 1 फरवरी 2019 को, आई.सी.आई.सी.आई. बैंक के समूह मुख्य मानव संसाधन अधिकारी ने श्रीमती कोचर को एक पत्र भेजकर दोहराया कि आई.सी.आई.सी.आई. बैंक से उनके अलग होने को ‘कारण के लिए समाप्ति’ माना जाएगा। अप्रैल 2009 और मार्च 2018 के बीच आई.सी.आई.सी.आई. बैंक द्वारा श्रीमती कोचर को भुगतान किया गया बोनस 7,41,36,777 रुपये था। यह राशि उनसे कारणवश उक्त समाप्ति के कारण वसूल की गई थी।
  • श्रीमती कोचर ने 30 जनवरी 2019 के ईमेल और 1 फरवरी 2019 के पत्र का जवाब 4 फरवरी 2019 के एक पत्र के माध्यम से दिया। पत्र में तर्क दिया गया कि आई.सी.आई.सी.आई. बैंक और श्रीमती कोचर के बीच नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध समाप्त हो गया क्योंकि मंडल ने अक्टूबर 2018 में उनकी समयपूर्व सेवानिवृत्ति स्वीकार कर ली थी।
  • 13 मार्च 2019 को, आरबीआई ने बैंकिंग विनियमन अधिनियम,1949 की धारा 35B(1)(b) के तहत “नियुक्ति की समाप्ति” के लिए आई.सी.आई.सी.आई. बैंक के अनुरोध को मंजूरी दे दी।
  • हालाँकि, आई.सी.आई.सी.आई. बैंक ने श्रीमती कोचर को पत्र भेजकर कहा कि उन्हें अप्रैल 2009 और मार्च 2018 के बीच उन्हें दिए गए बोनस का भुगतान करना होगा। ऐसे पत्रों के जवाब में, उन्होंने कथित तौर पर 4 अक्टूबर 2018 दिनांकित पत्र के अनुसार उन्हें दिए गए सभी लाभों की बहाली की मांग की।
  • 20 नवंबर 2019 को, श्रीमती कोचर ने आई.सी.आई.सी.आई. बैंक और आरबीआई के खिलाफ 2019 की रिट याचिका संख्या 33151 दायर की। उन्होंने घोषणा की कि आई.सी.आई.सी.आई. बैंक द्वारा भेजा गया 4 अक्टूबर 2018 का पत्र वैध, मान्य और आई.सी.आई.सी.आई. बैंक पर बाध्यकारी है। 30 जनवरी 2019 का ईमेल और 1 फरवरी 2019 का पत्र अवैध, नॉन एस्ट (लापता), शून्य अब इनिटियो (शुरुआत से शून्य) था। 13 मार्च 2019 का संचार गैर-कानूनी, अवैध और प्रारंभ से ही अमान्य था। उन्होंने रिट याचिका में परिणामी राहत की मांग की।
  • उपरोक्त याचिका के लंबित रहने के दौरान, आई.सी.आई.सी.आई. बैंक ने श्रीमती कोचर के खिलाफ मुकदमा (2020 का मुकदमा संख्या 313) दायर किया। 5 मार्च 2020 को बॉम्बे उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने उक्त रिट याचिका को खारिज कर दिया।
  • श्रीमती कोचर ने उपरोक्त बर्खास्तगी को चुनौती देने के लिए एक विशेष अनुमति याचिका दायर की। उसे भी बर्खास्त कर दिया गया। इसके बाद, उसने एक मुकदमा (2022 का मुकदमा संख्या 114) दायर किया। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस मुकदमे को भी ख़ारिज कर दिया।
  • 2023 के मामले में, श्री दीपक कोचर और श्रीमती चंदा कोचर के खिलाफ आईपीसी की धारा 420 और 120B और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 7, 13(2) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 13(1)(d) के तहत एफ.आई.आर. दर्ज की गई थी। 23 दिसंबर 2022 को सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इसलिए उन्होंने अंतरिम राहत के माध्यम से हिरासत से रिहाई की मांग की।
  • 9 जनवरी 2023 को बॉम्बे उच्च न्यायालय ने उन्हें अंतरिम जमानत पर रिहा कर दिया।
  • 24 दिसंबर 2022 को, सी.बी.आई. ने श्रीमती कुचर के खिलाफ आईपीसी की धारा 409 जोड़ने की मांग करते हुए विशेष सी.बी.आई. अदालत का दरवाजा खटखटाया। 14 जनवरी 2023 को न्यायमूर्ति एमआर पुरवार ने सी.बी.आई. को उक्त धारा जोड़ने की इजाजत दे दी। इसके अलावा, न्यायाधीश ने कहा कि एक जांच अधिकारी (आईओ) अपने द्वारा एकत्र की गई सामग्री के आधार पर धाराएं जोड़ने या हटाने के लिए स्वतंत्र है। इसके लिए किसी न्यायालय की अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
  • इसके बाद, सी.बी.आई. ने श्रीमती कोचर के खिलाफ उपरोक्त एफ.आई.आर. में आपराधिक विश्वासघात (धारा 409 आईपीसी) का आरोप जोड़ा।

मुद्दे

  1. क्या श्रीमती कोचर ने वीडियोकॉन समूह को ऋण स्वीकृत करके आई.सी.आई.सी.आई. बैंक के धन का दुरुपयोग किया था?
  2. क्या श्रीमती कोचर आईपीसी की धारा 409 के तहत उत्तरदायी थीं?

निर्णय

चंदा कोचर मामले पर अभी तक फैसला नहीं हुआ है और यह अभी भी बॉम्बे उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है। इस मामले का अंतिम फैसला आना अभी बाकी है।

जहां तक मेरी राय है, श्रीमती चंदा कोचर ने वीडियोकॉन समूह को 3,250 करोड़ रुपये का ऋण स्वीकृत किया था। उनके कार्य ने आई.सी.आई.सी.आई. बैंक और आरबीआई दिशानिर्देशों के नियमों का उल्लंघन किया। उन्हें आई.सी.आई.सी.आई. बैंक के ग्राहकों को ऋण स्वीकृत करने की शक्ति सौंपी गई थी।

उन्होंने दलील दी कि वीडियोकॉन समूह ने समय पर ऋण चुकाया था। इस प्रकार, इससे बैंक को ‘शून्य अंतिम हानि’ हुई। हालाँकि, यह एक स्थापित कानून है कि ‘शून्य अंतिम हानि’ किसी व्यक्ति को आईपीसी की धारा 409 के तहत दायित्व से मुक्त नहीं करती है।

इसके अलावा, इस मामले के तथ्यों से यह स्पष्ट है कि श्रीमती चंदा कोचर ने वीडियोकॉन समूह में अपने पति की भागीदारी और श्री वेणुगोपाल धूत के साथ अपने संबंधों को छुपाया। इस तरह की छुपाव ने आरबीआई के मास्टर सर्कुलर दिशानिर्देशों और धारा 405 के तहत दिए गए “कानून के निर्देश” का उल्लंघन किया।

इसलिए, न्यायालय का निर्णय संभवतः यह होगा कि श्रीमती कोचर आईपीसी की धारा 409 के तहत उत्तरदायी हैं।

संदर्भ

  • रतनलाल और धीरजलाल, भारतीय दंड संहिता, 36वां संस्करण, 2020।

 

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