फास्ट ट्रैक मध्यस्थता

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Fast track arbitration

इस लेख में, Pallavi Tiwari ने फास्ट ट्रैक मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) कार्यवाही पर चर्चा करी हैं। इसे Sakshi Kuthari ने आगे अद्यतन (अपडेट) किया है । यह लेख मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 29B, इसकी आवश्यक विशेषताओं और प्रक्रिया की विस्तृत व्याख्या से संबंधित है। इस लेख का अनुवाद Ayushi Shukla द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय 

भारत में फास्ट ट्रैक मध्यस्थता को मध्यस्थता और सुलह संशोधन अधिनियम 2015 द्वारा पेश किया गया था। जैसे मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996, 1940 के मध्यस्थता अधिनियम में सुधार था, वैसे ही 2015 का संशोधन भी है। 1996 के बाद इसमें बड़े बदलाव हुए हैं जैसे व्यवसाय के प्रकार, व्यवसाय करने का तरीका, भारत में विदेशी निवेश, आदि। विधायी (लेजिस्लेटिव) मंशा (इंटेंट) व्यवसाय के माहौल को सरल बनाना और त्वरित (एक्सपीडिएट) और पारदर्शी विवाद समाधान प्रणाली के लिए मध्यस्थता की प्रक्रिया में तेजी लाना था। प्रारंभ में, इंटरनेशनल चैंबर्स ऑफ कॉमर्स इस विचार के साथ आया और नियमों के अनुच्छेद 30 और अनुबंध (एनेक्सर) V में इसे आत्मसात (इंबाइब) करते हुए कई मामलों में इसका उपयोग कर रहा है। भारत में, फास्ट ट्रैक मध्यस्थता की अवधारणा को मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2015 (संक्षिप्तता के लिए इसके बाद ‘संशोधन अधिनियम, 2015’ के रूप में संदर्भित किया गया है) की धारा 29 B में परिभाषित किया गया है। यह एक प्रक्रिया है जो यह अनुमति देती है की मध्यस्थता पक्षों को एक समझौते में प्रवेश करना होगा और मध्यस्थ न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) द्वारा संदर्भ (रेफरेंस) में प्रवेश करने की तारीख से 6 महीने की अवधि के भीतर अपने विवादों को हल करने के लिए लिखित रूप में सहमत होना होगा और इसमें मौखिक कार्यवाही के लिए कोई प्रावधान नहीं है, इसके बजाय लिखित दलीलें मामले के लिए पर्याप्त हैं। 

फास्ट ट्रैक मध्यस्थता की आवश्यक विशेषताएं

  1. यह मुख्य रूप से सख्त समय सीमा नीतियों द्वारा शासित होता है जिसका अनुपालन मध्यस्थों और पक्षों दोनों को करना होता है। मूल रूप से, इसका मतलब मध्यस्थ कार्यवाही में तेजी लाना और मामले को यथासंभव कम से कम समय सीमा तक हल करना है।  
  2. यदि समय सीमा का पालन नहीं किया जाता है तो मध्यस्थ (आर्बिट्रेटर) का जनादेश (मैंडेट) समाप्त हो जाएगा, जब तक कि अदालत ने समय अवधि नहीं बढ़ा दी हो। यदि अवधि बढ़ाते समय अदालत को पता चलता है कि देरी बिना किसी ठोस कारण के हुई है, तो देरी के प्रत्येक महीने के लिए मध्यस्थ की शुल्क  में पांच प्रतिशत से अधिक की कमी नहीं की जाती है। इस दंड प्रक्रिया का उल्लेख मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 15 के तहत किया गया है।
  3. यह तत्वों (एलिमेंट्स) या प्रक्रियाओं का एक निश्चित सेट प्रदान नहीं करता है जैसा कि निम्नलिखित शीर्ष में उल्लिखित सामान्य मध्यस्थ कार्यवाही में किया जाता है, कोई भी अभ्यास जो समस्या को जल्द से जल्द हल करने में मदद करता है उसे फास्ट ट्रैक मध्यस्थता के तहत स्वीकार किया जाता है।
  4. मध्यस्थता के लिए अधिकतर फास्ट ट्रैक प्रक्रियाओं में, किसी मौखिक कार्यवाही की आवश्यकता नहीं होती है और केवल लिखित प्रस्तुतियों पर ही भरोसा किया जाता है।
  5. पक्ष एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त कर सकती हैं और प्रस्तुतियाँ मुख्य रूप से लिखी जानी चाहिए।
  6. यह किसी भी कानून का उल्लंघन किए बिना लागत (कॉस्ट), गति (स्पीड) और समय की रक्षा करता है और कभी-कभी गवाह की परीक्षा जैसी प्रक्रियाओं से भी बच जाता है।

फास्ट ट्रैक मध्यस्थता कार्यवाही सामान्य मध्यस्थता कार्यवाही से किस प्रकार भिन्न है?

  1. पहला अंतर सामान्य मध्यस्थ कार्यवाही में तीन मध्यस्थों की उपस्थिति के बारे में है। मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11(3) के तहत प्रत्येक पक्ष एक मध्यस्थ नियुक्त करता है, और फिर ये दो नियुक्त मध्यस्थ तीसरे मध्यस्थ को नियुक्त करते हैं, जो पीठासीन (प्रिसीडिंग) मध्यस्थ के रूप में कार्य करता है। जबकि, फास्ट ट्रैक मध्यस्थता अधिनियम की धारा 29B(2) के तहत मध्यस्थता न्यायाधिकरण के लिए पक्षों द्वारा नियुक्त एकमात्र मध्यस्थ का प्रावधान करती है।
  2. एक सामान्य मध्यस्थ पंचाट (अवॉर्ड) के लिए, अधिनियम की धारा 29A(1) में प्रावधान है कि यह पंचाट मध्यस्थ न्यायाधिकरण द्वारा संदर्भ में प्रवेश करने की तारीख से बारह महीने की अवधि के भीतर दिया जाएगा। यदि निर्णय मध्यस्थ न्यायाधिकरण द्वारा संदर्भ पर प्रवेश करने की तारीख से छह महीने की अवधि के भीतर दिया जाता है, तो मध्यस्थ न्यायाधिकरण पक्षों की सहमति के अनुसार अतिरिक्त शुल्क की इतनी राशि प्राप्त करने का हकदार होगा। समयावधि को बढ़ाया जा सकता है लेकिन छह महीने से अधिक नहीं। फास्ट ट्रैक मध्यस्थता के लिए धारा 29B(4) के तहत, इस धारा के तहत पंचाट मध्यस्थ न्यायाधिकरण द्वारा संदर्भ पर प्रवेश करने की तारीख से छह महीने की अवधि के भीतर दिया जाएगा। यदि निर्दिष्ट अवधि के भीतर पंचाट पारित नहीं किया जाता है तो धारा 29A के प्रावधान यहां भी लागू होंगे, अर्थात सामान्य मध्यस्थ कार्यवाही होगी।
  3. धारा 29B(6) के तहत फास्ट-ट्रैक कार्यवाही में, मध्यस्थ को देय शुल्क और शुल्क के भुगतान का तरीका ऐसा होगा जिस पर मध्यस्थ और पक्षों के बीच सहमति हो सकती है। जबकि धारा 11(14) के अनुसार सामान्य कार्यवाही में, मध्यस्थ न्यायाधिकरण को लागत के भुगतान के नियम उच्च अदालत द्वारा निर्धारित किए जाएंगे, क्योंकि दरें (रेट्स) अधिनियम की चौथी अनुसूची में प्रदान की गई हैं।
  4. एक सामान्य मध्यस्थ कार्यवाही के लिए, मौखिक कार्यवाही आयोजित की जाए या दस्तावेजों के आधार पर पंचाट पारित किए जाएं, इसका निर्णय मध्यस्थ न्यायाधिकरण द्वारा किया जाएगा। धारा 24 के तहत यह प्रावधान है कि जब पक्ष अनुरोध करता है तो न्यायाधिकरण द्वारा एक विशेष चरण में मौखिक सुनवाई की अनुमति दी जा सकती है। फास्ट ट्रैक प्रक्रियाओं के लिए धारा 29B के तहत, कार्यवाही के लिए लिखित प्रस्तुतियों पर भरोसा किया जाता है और जब तक पक्ष द्वारा अनुरोध नहीं किया जाता तब तक किसी भी मौखिक कार्यवाही की सराहना नहीं की जाती है।

भारत में फास्ट ट्रैक मध्यस्थता कार्यवाही को विनियमित करने वाले कानून

भारत में, फास्ट ट्रैक मध्यस्थता की अवधारणा 5 अगस्त 2014 को 246वें विधि आयोग की रिपोर्ट की सिफारिशों के साथ सामने आई, जिसमें त्वरित (स्पीडी) कार्यवाही का लाभ प्रदान करने के लिए कई मामलों का उल्लेख किया गया था। इसके बाद, 2015 का संशोधन अधिनियम आया, जहां मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 29B में संशोधन के साथ, फास्ट ट्रैक मध्यस्थता के लिए शामिल प्रक्रिया के बारे में बात की गई। धारा 29B फास्ट ट्रैक मध्यस्थता के लिए शामिल प्रक्रिया और पालन किए जाने वाले नियमों के बारे में बात करती है। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बनाम कोच्चि क्रिकेट प्राइवेट लिमिटेड (2018) के मामले में माननीय सर्वोच्च अदालतने माना कि उक्त अधिनियम की धारा 29B के प्रावधानों को केवल 2015 के संशोधन के बाद यानी 23 अक्टूबर, 2015 से शुरू की गई मध्यस्थता कार्यवाही पर लागू किया जा सकता है। 

इसके अलावा, नियम 44 के तहत घरेलू (डोमेस्टिक) वाणिज्यिक (कमर्शियल) मध्यस्थता के नियमों के लिए भारतीय मध्यस्थता परिषद फास्ट ट्रैक प्रक्रिया पर चर्चा कर रही है, जहां पक्ष फास्ट ट्रैक मध्यस्थता का विकल्प चुन सकते हैं और मध्यस्थता कार्यवाही शुरू होने से पहले, एक निश्चित तरीके से मुद्दे को तय करने के लिए 3 से 6 महीने की समय सीमा में मध्यस्थता न्यायाधिकरण से अनुरोध कर सकते हैं। यहां मध्यस्थ न्यायाधिकरण बिना किसी मौखिक सुनवाई के केवल लिखित दलील के आधार पर मुद्दे का फैसला कर सकता है और स्पष्टीकरण भी मांग सकता है। यदि दोनों पक्ष संयुक्त अनुरोध करते हैं या यदि मध्यस्थता न्यायाधिकरण किसी विशेष मामले में मौखिक सुनवाई को आवश्यक मानता है, तो मौखिक सुनवाई आयोजित की जा सकती है, और न्यायाधिकरण इसे शीघ्रता से आगे बढ़ाने के लिए सभी उपायों के साथ सुनेगा।

फास्ट ट्रैक मध्यस्थता के लिए कब आवेदन करें

मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2015 की धारा 29 B के तहत, जो लोग मध्यस्थता समझौते के पक्षकार हैं, वे दो तरीकों से फास्ट-ट्रैक मध्यस्थता के लिए आवेदन कर सकते हैं: 

  1. पक्षों द्वारा मध्यस्थता न्यायाधिकरण की नियुक्ति से पहले,
  2. या पक्षों द्वारा मध्यस्थता न्यायाधिकरण की नियुक्ति के समय।

इसे पक्षों को लिखित रूप में प्रस्तुत करना होगा कि वे फास्ट-ट्रैक प्रक्रिया द्वारा शासित (गवर्न्ड) होना चाहते हैं।

  1. वे न्यायाधिकरण के लिए उनके द्वारा चुने जाने वाले एकमात्र मध्यस्थ के लिए भी सहमत होंगे।

फास्ट ट्रैक मध्यस्थता की आधारशिला (कॉर्नरस्टोन) मामले के पक्षकारों को अपने मध्यस्थों के लिए निर्णय लेने की एकमात्र स्वायत्तता (ऑटोनोमी) देना है। यह पक्षों को मध्यस्थ की नियुक्ति और पंचाट के प्रवर्तन (एनफोर्समेंट) के समय उत्पन्न होने वाली विलंबित (डाइलेटरी) रणनीति (टैक्टिक्स), सावधानी की कमी और बाधाओं से रोकने के लिए किया जाता है। 

फास्ट ट्रैक मध्यस्थता कार्यवाही की प्रक्रिया

2015 के अधिनियम की धारा 29B के तहत निर्धारित निम्नलिखित नियमों द्वारा फास्ट-ट्रैक प्रक्रिया के माध्यम से मुद्दे को हल करने के लिए पक्ष एक-दूसरे से सहमत होंगे-

  1. विवाद का निर्णय पक्षों द्वारा प्रदान किए गए दस्तावेजों और प्रस्तुतियों के उपयोग के साथ लिखित दलील के आधार पर किया जाएगा और पक्षों के हित के आधार पर और उसके कौशल (स्किल) और दक्षता (एफिशिएंसी) पर भरोसा करते हुए एक एकमात्र मध्यस्थ होगा।
  2. कोई मौखिक सुनवाई नहीं होगी।
  3. न्यायाधिकरण मुद्दे को सुलझाने के मामले में मदद के लिए पक्षों से कोई अन्य जानकारी या किसी भी प्रकार का स्पष्टीकरण मांग सकता है।
  4. यदि पक्ष न्यायाधिकरण से अनुरोध करते हैं या यदि न्यायाधिकरण मुद्दों को हल करना आवश्यक समझता है तो मौखिक सुनवाई का प्रावधान है।
  5. तकनीकी औपचारिकताओं के उपयोग के साथ, न्यायाधिकरण ऐसे मुद्दों को हल करेगा और मामले के शीघ्र निपटान के लिए जो भी आवश्यक होगा वह करेगा।
  6. न्यायाधिकरण द्वारा मामले का संज्ञान (कॉग्नाइजेंस) लेने की तारीख से छह महीने के भीतर पंचाट दिया जाएगा और यदि ऐसा निर्णय निर्धारित समय के भीतर पारित नहीं किया जाता है तो 29A के तहत प्रदान की गई समय विस्तार की प्रक्रिया का पालन किया जाता है।
  7. यदि फास्ट ट्रैक मध्यस्थता के लिए निर्धारित समय अवधि, जो कि छह महीने है, में पंचाट नहीं दिया जा सका, तो छह महीने की विस्तार अवधि प्रदान की जाती है। यह विस्तार अवधि अधिनियम की धारा 29A के तहत प्रदान की जाती है जैसा कि आमतौर पर सामान्य मध्यस्थ कार्यवाही के लिए प्रदान किया जाता है। यदि छह महीने की समय अवधि समाप्त होने से पहले अदालत ने अवधि नहीं बढ़ाई है तो मध्यस्थ का अधिकार समाप्त हो जाएगा।
  8. यदि मध्यस्थ न्यायाधिकरण की त्रुटि के कारण कार्यवाही में देरी हुई है और इस प्रकार विस्तार की आवश्यकता है तो अदालत मध्यस्थ को दी जाने वाली शुल्क में कमी का आदेश दे सकता है।
  9. अवधि बढ़ाते समय, अदालत मध्यस्थ को प्रतिस्थापित (सब्सटीट्यूट) कर सकता है और यदि ऐसा होता है तो कार्यवाही उसी चरण से जारी रहेगी जिस चरण पर वह पहले ही पहुँच चुकी है, और मध्यस्थ को पहले से ही प्रस्तुत साक्ष्य और सामग्री का ज्ञान होना माना जाएगा।
  10. मध्यस्थ को भुगतान की जाने वाली शुल्क  पक्षों और मध्यस्थ के बीच तय की जाएगी।

केवल दस्तावेज़ों वाली मध्यस्थता प्रक्रियाएँ

मध्यस्थता की कार्यवाही समझौते के पक्षकारों को अपने विवादों का सबसे तेज़ और सबसे लागत प्रभावी समाधान प्राप्त करने के लिए उनकी परिस्थितियों के लिए सबसे उपयुक्त प्रक्रिया चुनने की अनुमति देती है। ऐसी ही एक प्रक्रिया ‘केवल दस्तावेज़ मध्यस्थता’ है, जो अधिकतर मध्यम से निम्न मूल्य के विवादों, जैसे डोमेन-नाम विवाद, बौद्धिक संपदा अधिकार विवाद, उपभोक्ता विवाद, आदि और बड़े और जटिल मध्यस्थता पर भी लागू होती है। भले ही मध्यस्थों के पास किसी विशेष मामले की प्रक्रिया से संबंधित निर्देश देने का विवेक है, लेकिन उनके पास पक्षों पर केवल दस्तावेज़-मध्यस्थता प्रक्रियाओं को लागू करने का अधिकार नहीं हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि किसी देश के अधिकांश राष्ट्रीय कानून और उनके नियम विशेष रूप से प्रदान करते हैं कि प्रत्येक पक्ष को सुनवाई का अधिकार है जब तक कि पक्ष सुनवाई के अपने अधिकार को त्याग न दें। यदि मध्यस्थों की राय है कि किसी विवाद को पक्षों पर थोपने के बजाय केवल दस्तावेज़ीकरण के आधार पर हल किया जा सकता है, तो पक्षों को उस आधार पर आगे बढ़ने के लिए सहमत होने के लिए आमंत्रित करना उचित है। इस प्रकार, केवल दस्तावेज़ प्रक्रिया यह दर्शाती है कि न्यायाधिकरण अपने निर्णय केवल लिखित प्रस्तुतियों और दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित करते हैं और वकील से सुनने या मौखिक सुनवाई में गवाहों से साक्ष्य लेने का कोई अवसर नहीं छोड़ते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता अभ्यास दिशानिर्देश प्रदान करते हैं कि केवल दस्तावेजों के लिए मध्यस्थता प्रक्रियाओं के लिए निर्देश देने पर विचार करते समय एक मध्यस्थ द्वारा निम्नलिखित चरणों का पालन किया जाना चाहिए।

  1. मध्यस्थों को लागू मध्यस्थता नियमों और मध्यस्थता के स्थान के कानून के अधीन, मध्यस्थता में सभी या कुछ मुद्दों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना चाहिए।
  2. यदि मध्यस्थता का कोई पक्ष केवल दस्तावेज़ प्रक्रिया के लिए अनुरोध करता है, तो मध्यस्थ इसमें शामिल मुद्दों को देखते हैं, दूसरे पक्ष से परामर्श करते हैं और आगे बढ़ने से पहले उनकी सहमति लेते हैं।
  3. इस प्रक्रिया के दौरान, मध्यस्थ पक्षों को संबंधित मुद्दों पर निर्णय लेने के लिए आवश्यक कदमों के बारे में निर्देश देते हैं, जो केवल दस्तावेजों पर उस प्रक्रिया के अधीन होता है। 
  4. मध्यस्थों द्वारा समानता के न्यायोचित (जस्ट), निष्पक्ष (फेयर) और वाजिब (रीजनेबल) सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए ताकि दोनों पक्षों को केवल दस्तावेज़ प्रक्रिया के अधीन शामिल मुद्दों के संबंध में अपना मामला प्रस्तुत करने का समान अवसर मिल सके।
  5. मामले के पक्षों के पास मध्यस्थता प्रक्रिया चुनने का विवेक है जब तक कि यह अनिवार्य कानूनों और सार्वजनिक नीति के विपरीत न हो। पक्षों की असहमति के अभाव में और प्रक्रिया अनुचित नहीं होने पर, मध्यस्थ पक्षों के समझौते का सम्मान करने के लिए बाध्य हैं। इस मामले में, उनके पास उस प्रक्रिया को व्यवस्थित करने का विवेक (डिस्क्रीशन) है जो वे उचित समझते हैं।
  6. यदि मामले के पक्ष मध्यस्थ के सुझाव से सहमत होते हैं, तो मध्यस्थ पक्षों के समझौते को रिकॉर्ड करते हैं। यदि कोई पक्ष सुझाव से सहमत नहीं है, तो वे मध्यस्थता समझौते की प्रारंभिक शर्तों के साथ आगे बढ़ना जारी रखते हैं। मध्यस्थ कार्यवाही के किसी भी चरण में मामले की सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस्तीफा देने का विकल्प चुन सकते हैं, यदि पक्ष उन्हें अनुचित (अनरीजनेबल) न्यायिक (एडज्यूडिकेटरी) मानकों के लिए सहमत कराती हैं। मध्यस्थों के इस्तीफे से उनकी नियुक्ति से जुड़े मध्यस्थता समझौते और मध्यस्थता के स्थान पर लागू कानून के आधार पर उनकी व्यक्तिगत देनदारी (लायबिलिटी) बढ़ सकती है।
  7. यह प्रक्रिया मामलों के शीघ्र निपटान और मध्यस्थता प्रक्रियाओं की लागत को कम करने के लिए प्रभावी है।
  8. यह निर्धारित करते समय ध्यान में रखे जाने वाले कारक कि क्या कुछ या सभी मुद्दे केवल दस्तावेज़ प्रक्रिया द्वारा समाधान के लिए उपयुक्त (सुटेबल) हैं- मामले की प्रकृति, मुद्दों की जटिलता, शामिल समय और लागत, साक्ष्य की प्रकृति और पक्षों द्वारा प्रस्तुत तर्क।
  9. दस्तावेज़-मात्र प्रक्रिया को अपनाने का निर्णय लेने के उद्देश्य से, मध्यस्थों को पक्षों को विस्तृत (डिटेल्ड) निर्देश देना चाहिए कि उन्हें क्या लेना है और किस तारीख तक लेना है। यह मध्यस्थों को केवल दस्तावेज़ प्रक्रिया के अधीन, एक निर्दिष्ट तिथि तक मुद्दों पर निर्णय लेने के लिए आवश्यक प्रस्तुतियाँ और साक्ष्य (मसौदे (ड्रॉफ्ट) के रूप में) प्राप्त करने में सक्षम बनाता है।
  10. यदि मध्यस्थों की राय है कि केवल दस्तावेज़ प्रक्रिया उचित है, तो उन्हें मसौदा निर्देश शामिल करना चाहिए और सभी पक्षों की सहमति लेनी चाहिए। यदि पक्ष सहमत हैं, तो मध्यस्थ समझौते और इस तथ्य को रिकॉर्ड करते हैं कि पक्षों ने मध्यस्थता में शामिल कुछ या सभी मुद्दों के संबंध में सुनवाई का अपना अधिकार छोड़ दिया है। मध्यस्थों के प्रक्रियात्मक आदेश में उन मुद्दों को परिभाषित किया जाना चाहिए जिन पर पक्ष सुनवाई के अपने अधिकार को छोड़ने पर सहमत हुए हैं।
  11. यदि कोई पक्ष सुनवाई के अधिकार को छोड़ने से इनकार करता है, तो मध्यस्थ सुनवाई के समय और लागत को बचाने के लिए संबोधित किए जाने वाले महत्वपूर्ण मुद्दों की पहचान करने के लिए प्रक्रियात्मक आदेश के माध्यम से सुनवाई के दायरे पर पहले से ध्यान केंद्रित करते हैं।
  12. मध्यस्थों के निर्देशों को आवश्यक प्रकटीकरण (डिस्क्लोजर) के मामलों से निपटना चाहिए, जैसे कि उत्पादित किए जाने वाले दस्तावेजों का दायरा और सीमा, और कार्यवाही के समय उन्हें उत्पादित करने का समय और तरीका।
  13. यदि समझौते के पक्षकारों द्वारा इस बात पर सहमति व्यक्त की गई है कि सभी या कुछ मुद्दों को केवल दस्तावेज़ प्रक्रिया पर आयोजित किया जाएगा, तो मध्यस्थों के लिए निरीक्षण करना उचित होगा, उदाहरण के लिए, एक साइट, एक संपत्ति, आदि। वे इस आशय के निर्देश दे सकते हैं और बता सकते हैं कि इसे कैसे आयोजित किया जाना है, किसे उपस्थित रहना है और निरीक्षण के दौरान क्या होगा।
  14. मध्यस्थता के स्थान पर अनिवार्य नियमों और प्रचलित अभ्यास के अधीन, मध्यस्थों का यह कर्तव्य है कि वे मामले के पक्षों के साथ समान व्यवहार करें और उन्हें अपना मामला प्रस्तुत करने, अपनी प्रस्तुतियाँ तैयार करने और विरोधी दल की प्रस्तुतियों का जवाब देने का उचित अवसर दें। 
  15. प्रामाणिकता (ऑथेंटिसिटी) की जांच करने और उन्हें दस्तावेजों में विवाद या मुद्दों पर निर्णय लेने में सक्षम बनाने के लिए मध्यस्थों द्वारा मामले के पक्षों की प्रस्तुतियाँ और साक्ष्य की समीक्षा की जाती है। यदि मध्यस्थ पक्षों द्वारा प्रस्तुत प्रस्तुतियों या साक्ष्यों से संतुष्ट नहीं हैं, तो वे उचित समय के भीतर विशिष्ट मुद्दों को संबोधित करने के लिए पक्षों को आगे प्रस्तुतियाँ देने और/या लिखित रूप में अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित करते हैं।
  16. यदि पक्ष पहले सुनवाई के अपने अधिकार को छोड़ने पर सहमत हुए थे और दस्तावेज़-केवल मध्यस्थता कार्यवाही के दौरान, एक या अधिक पक्ष सुनवाई के लिए अनुरोध करते हैं, तो मध्यस्थ को इस पर विचार करना चाहिए कि क्या विवादों में मुद्दों की प्रकृति में कोई बदलाव है, ऐसी परिस्थितियाँ या साक्ष्य जिन्हें प्रस्तुत करने की आवश्यकता है जो उन्हें इस निष्कर्ष पर ले जाएँ कि सुनवाई होनी चाहिए या नहीं। यदि मध्यस्थों को कार्यवाही सुनने के लिए पक्ष(पक्षों) की दलीलें उचित लगती हैं, तो मध्यस्थ अन्य पक्षों की सहमति के साथ सुनवाई के लिए उनकी सहमति चाहते हैं।
  17. यदि समझौते के किसी भी पक्ष ने केवल दस्तावेज़-प्रक्रिया के लिए सुनवाई और सहमति का अनुरोध नहीं किया है और मध्यस्थों को सुनवाई करना आवश्यक लगता है, तो मध्यस्थों को पक्षों को पर्याप्त उचित कारण समझाना चाहिए और सुनवाई के लिए उनकी सहमति लेनी चाहिए। यदि पक्ष इस पर सहमति नहीं देते हैं, तो मध्यस्थ केवल दस्तावेज़ प्रक्रिया के आधार पर आगे बढ़ना जारी रखेंगे, जैसा कि पहले मध्यस्थता समझौते के गठन के समय सहमति व्यक्त की गई थी।
  18. जब मध्यस्थ केवल दस्तावेज़ प्रक्रिया से संबंधित एक पंचाट का मसौदा तैयार करते हैं, तो उन्हें उस प्रक्रिया के लिए पक्षों के समझौते और प्रक्रियात्मक कदमों को रिकॉर्ड करना चाहिए जिनका पालन किया गया था ताकि निर्णय को चुनौती दिए जाने के जोखिम से बचा जा सके। 

निष्कर्ष

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 29B को मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2015 की धारा 15 के माध्यम से शामिल किया गया था। उक्त अधिनियम की धारा 29B की उपधारा (1) में प्रावधान है कि मध्यस्थता समझौते के पक्षकार मध्यस्थ न्यायाधिकरण की नियुक्ति से पहले या उसके समय किसी भी स्तर पर फास्ट-ट्रैक प्रक्रिया द्वारा अपने विवाद को हल कर सकते हैं। उक्त अधिनियम की धारा 29B(2) में प्रावधान है कि मुकदमे के पक्षकार मौखिक सुनवाई के बिना अपने विवादों का समाधान कर सकते हैं, जब तक कि पक्षकारों या मध्यस्थ न्यायाधिकरण द्वारा इसके विपरीत सहमति न दी जाए। विवाद को छह महीने की अवधि के भीतर हल किया जाना चाहिए, यानी, जिस तारीख से न्यायाधीकरण संदर्भ पर प्रवेश करता है, उसी दिन से पंचाट दिया जाना चाहिए। धारा 29B(4) “केवल दस्तावेज़ मध्यस्थता प्रक्रिया” का प्रावधान करती है। इस उपधारा में जो खामी है वह यह है कि यह एक मौद्रिक सीमा प्रदान नहीं करती है जो फास्ट-ट्रैक प्रक्रिया के कार्यान्वयन (इंप्लीमेंटेशन) को अनिवार्य बनाती है। समय बीतने के साथ, 2015 के संशोधन ने उक्त अधिनियम के कार्यान्वयन में कठिनाइयों को देखा और धारा 29B उनमें से एक थी। मध्यस्थता कार्यवाही में अदालत का लगातार हस्तक्षेप रहा, जिससे कार्यवाही के निपटारे में देरी हुई।

भले ही धारा 29B को विवादों के त्वरित निपटान की सुविधा के लिए जोड़ा गया था, धारा 29B (1) दलीलें पूरी होने के बाद, यानी दावे (क्लेम), बचाव (डिफेंस), प्रतिदावा (काउंटरक्लैम) या सेट-ऑफ के बाद फास्ट-ट्रैक प्रक्रिया का विकल्प चुनने का प्रावधान नहीं करती है। 2015 विधेयक के उद्देश्यों और कारणों के विवरण के पैराग्राफ 6 (vii) को विवाद के पक्षों को फास्ट ट्रैक प्रक्रिया के माध्यम से अपने विवाद को हल करने के लिए किसी भी स्तर पर प्रदान करने के लिए पेश किया गया था। हालाँकि, आवेदन में, धारा 29B केवल मध्यस्थ न्यायाधिकरण के गठन के चरण तक ही सीमित है, उसके बाद नहीं। अधिनियम की धारा 19(2) में प्रावधान है कि मध्यस्थता कार्यवाही का संचालन करते समय मध्यस्थता समझौते के पक्षकार पालन की जाने वाली प्रक्रिया को निर्धारित और सहमत कर सकते हैं, ऐसा न होने पर मध्यस्थता न्यायाधिकरण कार्यवाही का संचालन करने का निर्णय ले सकता है क्योंकि वह उचित समझ सकता है। इसके विपरीत, धारा 29B(1) के गैर-अस्थिर (नॉन ऑब्सटेंट) खंड (क्लॉज) पर विचार करते हुए, इस प्रावधान में संशोधन करना उचित होगा ताकि यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि मध्यस्थता समझौते के पक्षकार “किसी भी स्तर मौखिक साक्ष्य पर दलीलों के पूरा होने तक और शुरू होने से पहले” फास्ट ट्रैक प्रक्रिया का पालन करके मध्यस्थता का संचालन कर सकता है। 

मध्यस्थता अधिनियम की धारा 23(3) के तहत दावे और बचाव के बयान को उस तारीख से छह महीने के भीतर पूरा करने का आदेश है, जिस दिन मध्यस्थ को उनकी नियुक्ति की लिखित सूचना प्राप्त होती है। धारा 29B(4) को यह स्पष्ट करने के लिए संशोधित किया जा सकता है कि यदि दलीलों के पूरा होने के बाद, मध्यस्थता के पक्ष फास्ट-ट्रैक प्रक्रिया के लिए सहमत होते हैं, तो फैसला दलीलों के पूरा होने की तारीख से तीन महीने बाद पारित किया जाएगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

मध्यस्थता समझौते की अनिवार्यताएँ क्या हैं?

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 7 में प्रावधान है कि पक्ष –

  • उसी अर्थ में समझौते पर सहमत हों, यानी कंसेंसस–एड–आइडेम;
  • समझौता लिखित रूप में होना चाहिए;
  • समझौते में मध्यस्थता के वर्तमान या भविष्य के अंतर का उल्लेख होना चाहिए।

मध्यस्थ के समक्ष दावा दायर करने की सीमा क्या है?

मध्यस्थता अधिनियम, 1996 की धारा 11(6) एक मध्यस्थ की नियुक्ति का प्रावधान करती है जो आवेदन दाखिल करने के लिए कोई समय अवधि निर्धारित नहीं करती है।

मध्यस्थ के रूप में किसे नियुक्त नहीं किया जा सकता है?

सातवीं अनुसूची के साथ पढ़े गए मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 12 (5) के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जिसका पक्षों या वकील या विवाद के विषय के साथ संबंध है, मध्यस्थ के रूप में नियुक्त होने के लिए अयोग्य है।

मध्यस्थ पंचाट कब और कैसे लागू किया जा सकता है?

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 36 में प्रावधान है कि यदि उक्त अधिनियम की धारा 34 के तहत आवेदन करने का समय समाप्त हो गया है, या समय पर किए गए आवेदन को अस्वीकार कर दिया गया है, तो पंचाट सिविल प्रक्रिया संहिता,1908 को उसी तरह से लागू किया जाएगा जैसे कि यह अदालतकी डिक्री हो। 

अदालत द्वारा किसी मध्यस्थ पंचाट को कब रद्द किया जा सकता है?

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34(2) (A) और (B) में प्रावधान है कि मध्यस्थता पंचाट को अदालत द्वारा रद्द किया जा सकता है, यदि पक्ष निम्नलिखित में से कोई भी साबित करता है –

  • पक्ष की अक्षमता;
  • मध्यस्थता समझौता शून्य है, अर्थात, उस कानून के अनुसार नहीं है जिसके अधीन समझौते के पक्षकार हैं;
  • कार्यवाही के किसी भी पक्ष को कार्यवाही की कोई उचित सूचना नहीं दी गई है;
  • कार्यवाही में किसी भी पक्ष को मध्यस्थ की नियुक्ति की कोई उचित सूचना नहीं दी गई है;
  • पंचाट को उस सक्षम प्राधिकारी (ऑथोरिटी) द्वारा निलंबित या माफ कर दिया गया है जिसमें इसे दिया गया था;
  • भारतीय कानून के तहत इस मुद्दे को मध्यस्थता द्वारा हल नहीं किया जा सकता है;
  • मध्यस्थ न्यायाधिकरण की संरचना पक्षों के समझौते के अनुसार नहीं है;
  • पंचाट  को लागू करना भारतीय सार्वजनिक (पब्लिक) नीति (पॉलिसी) के विरुद्ध है।

उक्त अधिनियम की धारा 13 में यह भी प्रावधान है कि किसी मध्यस्थ के पास स्वतंत्रता या योग्यता या तटस्थता (न्यूट्रॅलिटी) का अभाव होने पर मध्यस्थता पंचाट को रद्द किया जा सकता है।

मध्यस्थ के अधिकार क्षेत्र को कब चुनौती दी जा सकती है?

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 12(3) में प्रावधान है कि जब स्वतंत्रता या निष्पक्षता का प्रश्न उठता है तो मध्यस्थ के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी जा सकती है।

किसी मामले का निर्णय करने के लिए मध्यस्थ न्यायाधिकरण द्वारा कौन सी प्रक्रिया अपनाई जाती है?

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 18 में प्रावधान है कि मामले के पक्षों के साथ समान व्यवहार किया जाएगा और उन्हें मामला पेश करने का पूरा अवसर दिया जाना चाहिए। मध्यस्थ न्यायाधिकरण से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है और यदि वे ऐसा करने में विफल रहते हैं तो अदालत फैसले को रद्द कर सकती है। इस प्रकार न्यायाधिकरण अपना कार्य ईमानदारी एवं निष्पक्षता से करते हैं।

संदर्भ

 

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