मानव शरीर के खिलाफ अपराध

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Indian Penal Code
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यह लेख स्कूल ऑफ एक्सीलेंस इन लॉ, चेन्नई की छात्रा Sujitha S द्वारा लिखा गया है। यह लेख भारतीय दंड संहिता के तहत निर्धारित किए गए मानव शरीर के खिलाफ अपराधों पर चर्चा करता है। यह कुछ महत्वपूर्ण एतिहासिक मामलों के साथ उनसे संबंधित कानूनी प्रावधानों को और विस्तृत करता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

‘मानव शरीर के खिलाफ अपराध’ में आपराधिक कार्यों की एक विस्तृत श्रृंखला (वाइड रेंज) शामिल है, जिसमें आम तौर पर शारीरिक हिंसा, शारीरिक नुकसान का डर, या किसी व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध किए गए अन्य प्रकार के कार्य शामिल हैं। धारा 299 से धारा 377 तक मानव शरीर से संबंधित कई अपराधों के प्रावधान प्रदान किए गए है। इस लेख में इन में से सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों के ऊपर चर्चा की गई है।

भारतीय दंड संहिता (1860) की धारा 11 के अनुसार, ‘व्यक्ति’ शब्द के अंतर्गत कोई भी कंपनी या संघ (एसोसिएशन) या व्यक्तियों का निकाय (बॉडी) शामिल होता है, चाहे वह निगमित (इनकॉर्पोरेटेड) हो या न हो। इसके अलावा ‘पुरुष’ और ‘महिला’ शब्द को आई.पी.सी. की धारा 10 के तहत परिभाषित किया गया है। ‘पुरुष’ शब्द का अर्थ, किसी भी आयु के मानव नर को दर्शाता है और ‘महिला’ शब्द किसी भी उम्र की मानव नारी को दर्शाता है। ये अपराध आमतौर पर किसी को शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाकर या किसी अन्य व्यक्ति पर बल का प्रयोग करके किए जाते हैं। ऐसे अपराधों की प्रकृति को आमतौर पर चार श्रेणियों के तहत विभाजित किया जाता है, जो इस प्रकार हैं:

  • घातक (फ़ेटल),
  • जो घातक नहीं हैं,
  • यौन (सेक्शुअल), और
  • जो यौन नहीं हैं।

गैर इरादतन मानव वध (कल्पेबल होमिसाइड) और हत्या, हमला और आपराधिक बल, स्वतंत्रता से वंचित करना, यौन अपराध (जैसे की बलात्कार), घरेलू हिंसा, यह सब मानव शरीर के खिलाफ अपराधों के कुछ उदाहरण हैं।

मानव शरीर के खिलाफ अपराध

गैर इरादतन मानव वध (धारा 299)

  • मानव वध अर्थात होमिसाइड शब्द दो लैटिन शब्दों से मिलकर बना है: होमो और सीडो। होमो मानव का प्रतीक है, और सीडो मानव हत्या को दर्शाता है। मानव वध को किसी व्यक्ति द्वारा, किसी अन्य व्यक्ति की हत्या के रूप के तहत परिभाषित किया जाता है। हत्या वैध या गैर कानूनी दोनों हो सकती है। वैध मानव वध के तहत उन उदाहरणों को संदर्भित किया जा सकता है जिसमें एक व्यक्ति, जो किसी अन्य व्यक्ति की हत्या का कारण बना है, लेकिन उसे उस व्यक्ति की मृत्यु के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। उदाहरण के लिए, निजी प्रतिरक्षा (प्राइवेट डिफेंस) के अधिकार का प्रयोग करते समय (धारा 96) करना या भारतीय दंड संहिता के तहत प्रदान किए गए सामान्य अपवादों के अध्याय IV में वर्णित अन्य मामलों में, अर्थात धारा 76 से 106 के तहत कोई कार्य करना।
  • अंग्रेजी कानून के तहत, गैर इरादतन मानव वध को हत्या के रूप में माना जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में गैर इरादतन मानव वध को सेकंड डिग्री मर्डर के कानूनी नाम से जाना जाता है, जबकि हत्या के अपराध को फर्स्ट डिग्री मर्डर कहा जाता है।
  • गैर इरादतन मानव वध के दो प्रकार होते हैं:
  1. गैर इरादतन मानव वध जो हत्या के स्तर तक नहीं बढ़ता है (धारा 299)।
  2. गैर इरादतन मानव वध (धारा 300)

आपराधिक मानव वध, जैसा कि धारा 299 और 300 के तहत परिभाषित किया गया है, उन अतिरिक्त तत्वों को संदर्भित करता है जो गैर इरादतन मानव वध को एक हत्या बनाते हैं। यह परिभाषा किसी कार्य को करने के शारीरिक और मानसिक दोनों तत्वों पर जोर देती है, जिसमे मौत कारित (कॉज) करने का उद्देश्य है, या इस ज्ञान के साथ किया गया है कि अपराधी जो कार्य करने जा रहा है वह किसी की मृत्यु कर सकता है, या ऐसी शारीरिक क्षति करित कर सकता है जिसके परिणामस्वरूप एक व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है।

गैर इरादतन मानव वध और हत्या दोनों ही संज्ञेय (कॉग्निजेबल) अपराध हैं, जो जमानती या कंपाउंडेबल नहीं हैं। दोनों पर केवल सत्र न्यायालय (सेशन कोर्ट) में ही मुकदमा चलाया जा सकता है।

परिभाषा

भारतीय दंड संहिता की धारा 299 के अनुसार, “जो भी कोई व्यक्ति, किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु कारित करने के इरादे से, या ऐसी शारीरिक क्षति पहुँचाने के इरादे से जिससे मृत्यु होना संभावना हो, या यह जानते हुए कि यह संभावना है कि ऐसे कार्य से मृत्यु होगी, कोई कार्य करके मृत्यु कारित करता है, तो वह आपराधिक मानव वध का अपराध करता है।”

धारा 299 को अच्छे से समझने के बाद, गैर इरादतन मानव वध की निम्नलिखित बुनियादी विशेषताओं का पता चलता है:

  1. आरोपी ने कोई कार्य किया होगा।
  2. वह कार्य निम्नलिखित में से एक या अधिक इरादों या ज्ञान के साथ किया जाना चाहिए:
  • किसी को मारने के इरादे के साथ।
  • शारीरिक क्षति कारित करने के इरादा के साथ, जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु होने की संभावना है।
  • यह ज्ञान के साथ कि मृत्यु का परिणाम होने की संभावना है।
  1. पीड़ित की मृत्यु आरोपी के किसी कार्य से होनी चाहिए।

उदाहरण: A को पता है कि Z एक झाड़ी के पीछे छिपा हुआ है। B इससे पूरी तरह अनजान था। A ने B को झाड़ी में गोली मारने को कहा, इस इरादे के साथ की मृत्यु कारित हो सकती है, या यह जानते हुए है कि इससे मृत्यु होने की संभावना है। Z, B की गोली से मारा जाता है। इस मामले में, B ने कोई अपराध नहीं किया हो सकता है, लेकिन A ने गैर इरादतन मानव वध किया है।

गैर इरादतन मानव वध से संबंधित प्रमुख मामले 

री: पलानी गौंडन बनाम अज्ञात (1919) के मामले में, आरोपी ने अपनी पत्नी के सिर में हल से प्रहार किया, जिसने मौत का कारण बनने की संभावना के रूप में प्रदर्शित न होने पर, उसे बेहोश कर दिया था, और आरोपी विश्वास कर रहा था की वह मृत हो गई है और इसलिए उस ने, रस्सी से पीड़िता का गला घोंट दिया, जिससे उसकी गला घोंटकर मौत हो गई। प्रतिवादी को गैर इरादतन मानव वध का दोषी नहीं पाया गया, इसके बजाय, उसे न्यायालय द्वारा गंभीर क्षति (ग्रीवियस हर्ट) का दोषी पाया गया था।

जोगिंदर सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब (1979) के मामले में, एक व्यक्ति जो किसी अन्य व्यक्ति का पीछा कर रहा था, उसे गैर इरादतन मानव वध का दोषी नहीं पाया गया था, क्योंकि जब एक आदमी का, खुले मैदान में उसके दुश्मनों द्वारा पीछा किया जा रहा था, जिन्होंने पहले ही एक घटना में उसके एक रिश्तेदार को मार डाला था, तो वह खुद को बचाने के लिए एक कुएं में कूद गया और इस कारण वह मर गया था, तो यह निर्धारित किया गया था कि आरोपी के कार्यों को यह नही माना जा सकता है कि यह, भारतीय दंड संहिता की धारा 299 के तहत निर्दिष्ट इरादे या ज्ञान के साथ किया गया एक कार्य है, और इसलिए उसे बरी कर दिया गया था।

हत्या (धारा 300)

गैर इरादतन मानव वध जो हत्या की श्रेणी में आते है (कल्पेबल होमिसाइड अमाउंटिंग टू मर्डर)

गैर इरादतन मानव वध जो हत्या की श्रेणी मे आते हैं उनकी कार्रवाई धारा 300 के तहत  की जाती है। दूसरे शब्दों में, इस धारा में कहा गया है कि कुछ परिस्थितियों में गैर इरादतन मानव वध को हत्या माना जाता है। जिसके परिणामस्वरूप, हत्या के रूप में वर्गीकृत (कैटेगराइज) होने के लिए, एक कार्य को पहले गैर इरादतन मानव वध के सभी मानदंडों को पूरा करना होता है।

धारा 300 में प्रदान किया गया है कि, निम्नलिखित परिस्थितियों के तहत, गैर इरादतन मानव वध को हत्या माना जाता है: 

  • यदि कोई कार्य किसी को मारने के इरादे से किया जाता है। हत्या के लिए उच्च स्तर के इरादे की आवश्यकता होती है। इरादा मौजूद होना चाहिए, और इस इच्छा के कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु होनी चाहिए, केवल क्षति या कोई गंभीर नुकसान नहीं होनी चाहिए, जो किसी को मारने के इरादे के बिना पहुंचाई गई हो।
  • किसी को शारीरिक नुकसान कारित करना, जो अपराधी जानता था कि उस व्यक्ति की मृत्यु का परिणाम हो सकता है। दूसरे परिदृश्य (सिनेरियो) में एक अपराधी होता है, जिसे पीड़ित के स्वास्थ्य के बारे में विशेष ज्ञान होता है और वह इस ज्ञान का उपयोग पीड़ित को इस तरह से नुकसान पहुंचाने के लिए करता है, जिस से व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। इसके लिए, कोई धारा 300 का उल्लेख कर सकता है, जिसमें कहा गया है कि अपराधी यह जनता था की इस कार्य से मृत्यु कारित होने की संभावना है’।
  • शारीरिक क्षति पहुंचाना जिसके परिणामस्वरूप, प्रकृति के मामूली अनुक्रम (कोर्स) में मृत्यु हो जाती है। इन उदाहरणों में शारीरिक क्षति से जुड़े कार्य शामिल हैं, जो घटनाओं के सामान्य अनुक्रम में, व्यक्ति की मृत्यु में का कारण बन सकते है।
  • बिना किसी वैध कारण के आसन्न (कंपेंडिंग) जोखिम भरा कार्य करने से मृत्यु या शारीरिक क्षति होगी जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु होनी चाहिए। इस श्रेणी में ऐसे कार्य शामिल होते हैं जो इतने खतरनाक हैं कि यदि वे किए जाते हैं, तो उनके परिणामस्वरूप मृत्यु या शारीरिक क्षति लग सकती है जिसके परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, और वे बिना किसी कानूनी औचित्य (जस्टिफिकेशन) के किए जाते हैं।

जब गैर इरादतन मानव वध हत्या की श्रेणी में आता है

  1. निम्नलिखित स्थितियों में, गैर इरादतन मानव वध को हत्या नहीं माना जाता है:
  • गैर इरादतन मानव वध को हत्या नहीं माना जाता है, यदि यह धारा 300 के संबंधित खंड (क्लॉज) के अतिरिक्त मानकों (स्टैंडर्ड) को पूरा नहीं करता है।
  • यदि धारा 300 के पांच अपवादों में से एक के तहत, एक गैर इरादतन मानव वध किया जाता है, तो इसे हत्या नहीं माना जाता है।

2. धारा 300 के अपवाद नीचे सूचीबद्ध हैं।

  • गंभीर और अचानक उत्तेजना (ग्रेव एंड सडन प्रोवोकेशन)।
  • निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग अधिकता में करना।
  • यादि लोक सेवक कानून द्वारा उसे दी गई शक्तियों से अधिक में कार्य करता है।
  • पहले किए गए किसी सोच विचार के बिना, अचानक लड़ाई में किसी की मृत्यु करना।
  • 18 वर्ष से अधिक आयु के मृतक की सहमति के बाद मृत्यु कारित करना।

अपवाद (एक्सेप्शन) I

गंभीर और अचानक उत्तेजना

गैर इरादतन मानव वध को हत्या नहीं माना जाता है यदि अपराधी गंभीर और अचानक उत्तेजना के परिणामस्वरूप खुद को नियंत्रित करने की अपनी क्षमता को खो देता है और उस व्यक्ति की मृत्यु कारित कर देता है जिसने उसे या किसी अन्य व्यक्ति को गलती या दुर्घटना से उकसाया था। यह सिर्फ एक अपराध के आरोप में होने के जोखिम को कम करता है। आपराधिक अपराध से बचने की कोई पूर्ण उन्मुक्ति (इम्यूनिटी) नहीं है।

के.एम. नानावटी बनाम स्टेट ऑफ़ बॉम्बे (1961), के मामले में, जिसे नानावती मामले के रूप में भी जाना जाता है, में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि-

  • भारत में, कुछ शब्द और कार्य गंभीर और अचानक उत्तेजना को भड़का सकते हैं।
  • जब याचिका गंभीर और अचानक उत्तेजना के लिए होती है, तो पीड़ित के पहले के कार्यों से उत्पन्न मानसिक पृष्ठभूमि (बैकड्रॉप) पर विचार किया जा सकता है।
  • पीड़ित के कार्य की प्रकृति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। अदालत को यह निर्धारित करना चाहिए कि क्या आरोपी के समान सामाजिक वर्ग का एक उचित व्यक्ति, यदि उसी स्थिति में रखा जाता है, तो उसे आत्म-नियंत्रण खोने के तत्व पर प्राकृतिक उत्तेजना के अधीन किया जाता है या नहीं।
  • घातक प्रहार का पता, स्पष्ट रूप से उत्तेजना से प्रेरित क्रोध से लगाया जा सकता है। जुनून के समाप्त हो जाने के बाद, एक घातक प्रहार को अचानक और गंभीर उत्तेजना के आधार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। अपवाद 1 का लाभ तब नहीं प्रदान किया जा सकता जब पहले से सोच विचार और गणना के लिए समय और गुंजाइश हो।

अपवाद II

सद्भाव (गुड फेथ) में निजी प्रति रक्षा के अधिकार के प्रयोग में कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं से अधिक कार्य कर देना

आपराधिक मानव वध हत्या की श्रेणी में नहीं आता है यदि अपराधी, सद्भाव में किसी व्यक्ति या संपत्ति की निजी प्रति रक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुए, कानून द्वारा उसे दी गई शक्ति से अधिक कार्य कर जाता है और उस व्यक्ति को मार देता है जिसके खिलाफ वह अधिकार का प्रयोग करता है।

इस अपवाद का लाभ तब प्राप्त किया जा सकता है जब यह भी प्रदर्शित (डिमॉन्स्ट्रेट) किया जाता है कि अपराधी ने बिना सोचे-समझे या आवश्यकता से अधिक नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से मृत्यु कारित की है।

अपवाद III

जब लोक सेवक कानून द्वारा उसे दी गई शक्तियों से अधिक में कार्य करता है

  • यदि अपराधी लोक सेवक के रूप में कार्य करते हुए या लोक न्याय प्रदान करने में लोक सेवक की सहायता करते हुए, कानून द्वारा उसे दिए गए अधिकार से अधिक में कार्य कर देता है और मृत्यु कारित कर देता है, तो गैर इरादतन मानव वध को हत्या की श्रेणी में नहीं रखा जाता है।
  • इस अपवाद के लाभ का दावा केवल तभी किया जा सकता है जब कार्य सद्भाव में और इस विश्वास में किया गया हो कि यह उसके कर्तव्यों के उचित निर्वहन में कानूनी और आवश्यक था। यह भी प्रदर्शित किया जाना चाहिए कि अपराधी की मृतक से कोई दुश्मनी नहीं थी।

अपवाद IV

अचानक हुई मार पीट से हुई मौत

  • गैर इरादतन मानव वध को हत्या नहीं माना जाएगा यदि यह अचानक हुई मार पीट के दौरान जोश में और अपराधी द्वारा स्थिति का लाभ उठाए बिना या किसी क्रूर या असामान्य तरीके से कार्य किए बिना किया जाता है।
  • इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस मामले में कौन कार्य करने के लिए उकसाता है या हमला करता है।

अपवाद V

18 वर्ष से अधिक आयु के मृतक की सहमति

गैर इरादतन मानव वध को हत्या की श्रेणी में नहीं रखा जाता है यदि मारे गए व्यक्ति की आयु 18 वर्ष से अधिक है और वह अपनी सहमति से मृत्यु कारित करने के लिए कहता है या मृत्यु का जोखिम उठाता है।

हत्या और गैर इरादतन मानव वध के बीच का अंतर

  1. आपराधिकता की डिग्री ही हत्या और गैर इरादतन मानव वध के बीच मुख्य अंतर है। हत्या के मामले में, आपराधिकता का स्तर गैर इरादतन मानव वध के मामले की तुलना में अधिक है।
  2. प्रत्येक मानव वध सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण एक जिम्मेदार हत्या है। हालांकि, हर गैर इरादतन मानव वध हत्या नहीं होती। दूसरे शब्दों में कहें तो, मानव वध एक जीनस है, जबकि हत्या केवल एक प्रजाति है।
  3. ‘हत्या’ शब्द को धारा 300 के तहत परिभाषित किया गया है। यह आपराधिक संहिता की धारा 302 के तहत अवैध है। गैर इरादतन मानव वध एक कम गंभीर अपराध है जिसे भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत दंडित किया जाता है।
  4. गैर इरादतन मानव वध और हत्या के बीच एक संकीर्ण (नैरो) रेखा है, फिर भी यह स्पष्ट है। धारा 300 के अलग-अलग खंडों में निहित महत्वपूर्ण शब्दों को दो अपराधों की पहचान करने के लिए नोट किया जाना चाहिए।
  5. स्टेट ऑफ़ आंध्र प्रदेश बनाम आर. पुन्नय्या (1975) के मामले में, यह माना गया था कि-
  • गैर इरादतन मानव वध के तीन अंश या प्रकार हैं जिसे संहिता द्वारा मान्यता प्राप्त हुई है।
  • धारा 300 में प्रथम श्रेणी में गैर इरादतन मानव वध को हत्या के रूप के तहत परिभाषित किया गया है। यह गैर इरादतन मानव वध का सबसे गंभीर प्रकार है।
  • दूसरी डिग्री के गैर इरादतन मानव वध को गैर इरादतन मानव वध के रूप में जाना जाता है। इसे धारा 304, खंड I के तहत दंडित किया जाता है।
  • गैर इरादतन मानव वध का सबसे कम स्तर तीसरी डिग्री में गैर इरादतन मानव वध है। यह धारा 304, खंड II के तहत दंडित किया जाता है।
  • अदालतों को पहले यह निर्धारित करना चाहिए कि क्या विचाराधीन मौत आरोपी के कार्यों के कारण हुई थी। यदि आरोपी की कार्रवाई सकारात्मक है, तो धारा 300 पर विचार किया जाना चाहिए।

जिस व्यक्ति की मृत्यु का इरादा था, उसके अलावा किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु कारित करके गैर इरादतन मानव वध करना

भारतीय दंड संहिता की धारा 301 के तहत-

  • आरोपी ने योजना बनाई होगी या उसे पता होगा कि उसके कार्यों के परिणामस्वरूप किसी की मृत्यु होने की संभावना है।
  • उसके कार्य के परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, भले ही अपराधी को इस बात का कोई इरादा या ज्ञान नहीं था कि उसके कार्य के परिणामस्वरूप उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाएगी।
  • इस से पहले वाली स्थिति में, आरोपी को उसी तरह की सजा का सामना करना पड़ेगा जैसे कि उसने उस व्यक्ति कारित की थी, जिसकी हत्या वह करना चाहता था, उसको ज्ञान था, या मारने की संभावना थी।
  • स्थानांतरित द्वेष (ट्रांसफर्ड मेलिस) का सिद्धांत धारा 301 में निहित धारणा के लिए व्यापक नाम है। इस सिद्धांत के अनुसार, जब कोई व्यक्ति दुर्घटना या किसी त्रुटि के कारण किसी अन्य व्यक्ति को क्षति पहुंचाता है, जिसे वह क्षति पहुंचाने का इरादा नहीं रखता था लेकिन इससे उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो अपराधी अपराध के लिए उत्तरदायी होगा।
  • जिस व्यक्ति का मामला धारा 301 के तहत आता है, उस को स्थिति के आधार पर धारा 302 या 304 के तहत दंड दिया जाता है।

दहेज हत्या

यह एक महिला के खिलाफ किया गया अपराध है। दहेज एक ऐसा अपराध है जो भारतीय सभ्यता में सैकड़ों वर्षों से मौजूद है और तमाम कोशिशों के बाद भी इस बुराई को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका है। भारतीय दंड संहिता की धारा 304 B के तहत ‘दहेज’ शब्द का वही अर्थ है जो दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 2 में है, जो इस तरह परिभाषित किया गया है: 

“कोई ऐसी संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति अभिप्रेत है जो विवाह के समय या उसके पूर्व [या पश्चात्‌ किसी समय] –

  1. विवाह के एक पक्षकार द्वारा विवाह के दूसरे पक्षकार को ; या
  2. विवाह के किसी भी पक्षकार के माता-पिता द्वारा या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा विवाह के किसी भी पक्षकार को या किसी अन्य व्यक्ति को,
  3. उक्त पक्षकारों के विवाह के संबंध में, 

या तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दी जाती है या दी जाने के लिए सहमति की गई है।

धारा 304B के तहत दहेज हत्या का मामला बनाने के लिए महिला की शादी के सात साल के भीतर जलने या अन्य शारीरिक क्षति लगने या अन्य सामान्य परिस्थितियों के कारण मृत्यु होनी चाहिए। उसकी मृत्यु से कुछ समय पहले दहेज की मांग के संबंध में उसे उसके पति या ससुराल वालों द्वारा क्रूरता या उत्पीड़न का शिकार होना चाहिए।

कामेश पंजियार बनाम स्टेट ऑफ़ बिहार (2005) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने दहेज हत्या (धारा 304B, आई.पी.सी.) के प्रमुख तत्वों को इस प्रकार बताया:

  • एक महिला की मृत्यु जलने, शारीरिक क्षति या किसी अन्य असामान्य घटना के कारण होनी चाहिए।
  • उसकी शादी के पहले सात वर्षों के दौरान उसकी मृत्यु हो जानी चाहिए थी।
  • उसके पति या उसके पति के किसी भी रिश्तेदार ने उसके साथ क्रूर व्यवहार किया होगा या उसे परेशान किया होगा।
  • ऐसी क्रूरता या उत्पीड़न दहेज की मांग के जवाब में या उसके संयोजन (कंजंक्शन) में होना चाहिए।
  • यह साबित किया जाना चाहिए कि महिला को उसकी मृत्यु से कुछ समय पहले इस तरह की क्रूरता या उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा था।

क्षति पहुंचाना (हर्ट) (धारा 319-338)

क्षति, जो सरल या गंभीर हो सकती है, मानव शरीर के खिलाफ कई अपराधों में से एक है।

  • धारा 319338 क्षति और उसके कई रूपों से संबंधित है।
  • ‘क्षति’ शब्द को धारा 319 के तहत परिभाषित किया गया है, जबकि धारा 320 क्षति के प्रकारों को निर्दिष्ट करती है जिन्हें गंभीर के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

साधारण क्षति

धारा 319 साधारण क्षति को परिभाषित करती है जिसके अनुसार जो कोई किसी व्यक्ति को शारीरिक पीड़ा, रोग या दुर्बलता कारित करता है, उसे क्षति कारित करने वाला कहा जाता है।

‘शारीरिक दर्द’ शब्द इंगित करता है कि दर्द मानसिक के बजाय शारीरिक होना चाहिए। नतीजतन, किसी को मानसिक या भावनात्मक नुकसान पहुंचाने को धारा 319 के तहत क्षति नहीं माना जाएगा। हालांकि, इस धारा के तहत आने के लिए पीड़ित को कोई भी दिखने वाली क्षति लगने की कोई आवश्यकता नहीं है। भारतीय दंड संहिता की धारा 319 के अनुसार, जो कोई भी किसी अन्य व्यक्ति को शारीरिक परेशानी, बीमारी या अक्षमता कारित करता है, उसे क्षति पहुंचाने वाला माना जाता है।

आवश्यक तत्व

  1. शारीरिक दर्द, बीमारी, या दुर्बलता (इनफिरमिटी) होनी चाहिए

शारीरिक दर्द एक प्रकार का नुकसान है, मामूली नुकसान को छोड़कर, जिसके लिए किसी को आपत्ति नहीं होगी। किसी नुकीली चीज से चुभना, जैसे कि सुई, किसी के चेहरे पर प्रहार करना, या किसी महिला के बाल खींचना शारीरिक दर्द के कुछ उदाहरण हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दर्द कितने समय तक रहता है। जब किसी का अंग नियमित रूप से काम करने में असमर्थ होता है, तो उसे दुर्बलता कहा जाता है। यह या तो कुछ समय के लिए या लंबे समय तक के लिए हो सकता है। इसमें हिस्टीरिया या पैनिक जैसी मानसिक स्थितियाँ भी शामिल हैं।

2. यह आरोपी की अपनी मर्जी का नतीजा होना चाहिए

माराना गौदान बनाम अज्ञात (1940) में आरोपी, मृतक से पैसे चाहता था, जो उस पर बकाया था। मृतक ने कहा कि वह बाद में भुगतान करेगा। इसके बाद आरोपी ने उसके पेट में लात मारी, जिससे पीड़ित गिरकर मर गया। आरोपी को शारीरिक नुकसान पहुंचाने का दोषी पाया गया क्योंकि इस बात का कोई सबूत नहीं था कि उसके पास इरादा या ज्ञान था कि पेट पर लात मारने से जान को खतरा होगा।

गंभीर क्षति (धारा 320)

इस धारा के अनुसार केवल निम्न प्रकार की क्षति को गंभीर के रूप में नामित किया गया है:

  • पुंस्त्वहरण (एमेस्कुलेशन) (किसी व्यक्ति को यौन रूप से अक्षम या कमजोर बनाना)।
  • दोनों में से किसी भी आंख की दृष्टि का स्थायी विच्छेद (लॉस)।
  • एक या दोनों कानों में सुनने की स्थायी विच्छेद।
  • किसी भी अंग या जोड़ का विच्छेद।
  • किसी भी अंग या जोड़ की शक्तियों का नाश या स्थायी हानि।
  • सिर या चेहरे की स्थायी विकृति।
  • हड्डी या दांत का फ्रैक्चर या अव्यवस्था
  • कोई भी क्षति जो पीड़ित के जीवन को खतरे में डालती है या गंभीर शारीरिक दर्द के कारण उसे बीस दिनों की अवधि के लिए उसकी सामान्य गतिविधियों को करने में असमर्थ बनाती है।

स्वेच्छा से क्षति पहुँचाना (धारा 321)

  1. धारा 321 के अनुसार, जो कोई भी किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने के इरादे से कुछ करता है और स्वेच्छा से ऐसा करने में सफल होता है, वह क्षति कारित करता है।
  2. ऐसा कार्य किया गया होगा:
  • नुकसान पहुंचाने के इरादे से।

धारा 321 के तहत अपराध, धारा 323 के तहत दंडनीय है (या तो एक साल की जेल या एक हजार रुपये तक का जुर्माना, या दोनों)। यह गैर-संज्ञेय (नॉन कॉग्निजेबल), जमानती, कंपाउंडेबल है और एक मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।

उत्तेजना पर क्षति होना (धारा 334) या गंभीर क्षति होना (धारा 335)

धारा 334 उन परिस्थितियों के बारे में बताती है जिनमें किसी को उत्तेजित करने के परिणामस्वरूप नुकसान होता है। यदि नुकसान का स्वैच्छिक कारण गंभीर और अचानक उत्तेजना से संबंधित है, तो सज़ा एक महीने की जेल या 500/- रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकता है।

  • जो कोई भी किसी अन्य व्यक्ति को गंभीर नुकसान पहुंचाने के लक्ष्य से कुछ भी करता है और स्वतंत्र रूप से ऐसा करने में सफल हो जाता है, तो वह गंभीर नुकसान पहुंचाता है।
  • एक व्यक्ति जो जानबूझकर दूसरे व्यक्ति को भयानक नुकसान पहुंचाता है और फिर उस व्यक्ति को गंभीर नुकसान पहुंचाता है, तो यह माना जाता है की उसने स्वतंत्र रूप से उस व्यक्ति को गंभीर नुकसान पहुंचाया है।
  1. आरोपी ने जरूर कोई अपराध किया होगा।
  2. ऐसा कार्य किया गया होगा:
  • गंभीर नुकसान पहुंचाने के इरादे से; या
  • यह जानते हुए कि नुकसान होने की संभावना है; तथा
  • इसके परिणामस्वरूप किसी भी व्यक्ति को गंभीर नुकसान हो सकता है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 335 के तहत, यदि अपनी इच्छा से गंभीर नुकसान पहुंचाना, गंभीर और अचानक उत्तेजना से संबंधित है, तो ऐसे में सज़ा या तो चार साल के कारावास या 2000/- रुपये तक के जुर्माने की हो सकती है या दोनों।

गलत तरीके से प्रतिबंधित करना (रॉन्गफुल कन्फाइनमेंट) (धारा 340)

भारतीय दंड संहिता की धारा 340 के अनुसार, जो कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को गलत तरीके से इस तरह से प्रतिबंधित करता है कि वह उस व्यक्ति को कुछ निश्चित सीमाओं से आगे बढ़ने से रोक सके, तो ऐसे व्यक्ति को ‘गलत तरीके से प्रतिबंधित करना’ कहा जाता है।

दृष्टांत (इलस्ट्रेशन)

  1. A, Z को दीवार से घिरे हुए स्थान पर ले जाता है और उसे वहीं बंद कर देता है। जिसके नतीजतन, Z दीवार की परिसीमा से परे किसी भी दिशा में नहीं जा सकता। Z को A द्वारा गलत तरीके से प्रतिबंधित किया गया है।

आवश्यक तत्व

  1. किसी व्यक्ति को गैर कानूनी तरीके से प्रतिबंधित करना, और
  2. प्रतिबंधित करने का उद्देश्य उस व्यक्ति को उस विशिष्ट परिसीमा से आगे जाने से रोकना चाहिए, जिसके आगे जाने का उसे कानूनी अधिकार है। उसे पूर्ण तरह से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए, आंशिक रूप से नहीं।

धारा 342 में गलत तरीके से प्रतिबंधित करने की सजा की चर्चा की गई है। धारा 342 के तहत, जो कोई भी किसी व्यक्ति को गलत तरीके से प्रतिबंधित करता है, उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास, जिसे एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, या एक हजार रुपए तक का जुर्माना या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

दीप चंद बनाम राजस्थान (1961) के मामले में पीड़ित एक धनी व्यापारी का बेटा था। एक दिन दो नकाबपोश लोग उसके अपार्टमेंट में घुसे, उनमें से एक के पास रिवॉल्वर थी। उसने शोर मचाया तो दोनों लोगों ने उसे गोली मारने की धमकी दी। वे उसे बाहर ले गए, जहाँ दो ऊंट खड़े थे। पीड़ित के चेहरे पर कपड़ा बंधा हुआ था। वे उसे आरोपी के घर ले जाने से पहले कुछ दूरी तक ऊंट पर बिठाकर ले गए, जहां उसे 17 दिनों तक रखा गया। उसने पीड़ित के पिता को तीन पत्र लिखकर 50 हजार रुपये की फिरौती की मांग की थी। फिरौती देने के बाद उन्होंने पीड़ित को छोड़ दिया। उसके बाद, अपराधियों की पहचान की गई और उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 347, 365, 382 और 452 के तहत आरोपित किया गया।

गलत तरीके से दबाव डालना (रॉन्गफुल रिस्ट्रेन्ट) (धारा 339-341)

धारा 339 के अनुसार, गलत तरीके से दबाव डालने को परिभाषित किया गया है, जो कोई भी अपनी इच्छा से किसी व्यक्ति को किसी भी दिशा में आगे बढ़ने से रोकने के लिए उस व्यक्ति पर दबाव डालता है, जिसमें उस व्यक्ति को आगे बढ़ने का अधिकार है, तो यह माना जाता है की ऐसे व्यक्ति ने दुसरे व्यक्ति पर गलत तरीके से उस दबाव डाला होगा। 

दृष्टांत

A के सद्भावपूर्ण विश्वास के बावजूद कि Z को ऐसा करने का अधिकार है, वह उस रास्ते को अवरुद्ध (ब्लॉक) कर देता है जिसका उपयोग करने का Z को अधिकार है। जिसके परिणामस्वरूप, Z वहां से जा नहीं पाता है। Z पर, A द्वारा अवैध रूप से दबाव डाला गया है।

गलत तरीके से दबाव डालने के लिए सजा

धारा 341– जो कोई भी किसी अन्य व्यक्ति पर गलत तरीके से दबाव डालता है, उसे एक महीने से अधिक की अवधि के लिए साधारण कारावास, या पांच सौ रुपये से अधिक का जुर्माना, या दोनों से दंडित किया जाएगा।

आवश्यक तत्व

धारा 339 के तहत गलत तरीके से दबाव डालने को परिभाषित किया गया है। गलत तरीके से दबाव डालने के मूल तत्व निम्नलिखित हैं:

  • एक व्यक्ति पर स्वेच्छा से दबाव डालना, और
  • अवरोध ऐसा होना चाहिए कि यह व्यक्ति को किसी भी दिशा में आगे बढ़ने से रोकता है, जिसमें उसे आगे बढ़ने का अधिकार है।

राजा राम बनाम स्टेट ऑफ़ हरियाणा (1972) के मामले में, एक मां और एक 13 वर्षीय बच्चे को पूछताछ के लिए थाने बुलाया गया था। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के प्रावधान में कहा गया है कि 15 वर्ष से कम उम्र के किसी भी महिला या पुरुष को पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन नहीं बुलाया जाना चाहिए। इसके बजाय, उनसे उनके स्थान पर पूछताछ की जानी चाहिए। आरोपी जो की एक पुलिस अधिकारी था, को आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के उल्लंघन का दोषी पाया गया था। इसके आलोक में एक महिला और एक 13 साल के बच्चे को थाने में हिरासत में रखना गलत तरीके से दबाव डालने के तहत लाया गया। आरोपी को धारा 341 के तहत दोषी पाया गया था, लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा 342 के तहत नहीं।

आपराधिक बल (क्रिमिनल फोर्स) (धारा 350)

धारा 350 के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ, उस व्यक्ति की सहमति के बिना किसी अपराध को करने के लिए बल का प्रयोग करता है, या ऐसा करने का इरादा रखता है या जानता है कि इस तरह के बल का उपयोग करके, वह उस व्यक्ति को क्षति, भय या क्षोभ (एनॉयंस) का कारण बन सकता है, तो यह कहा जाता है की ऐसे व्यक्ति ने  उस दूसरे व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक बल का प्रयोग किया है।

दृष्टांत

  1. Z एक नदी के किनारे रस्सी से बंधी हुई नाव पर बैठा था। A जानबूझकर रस्सियों को उद्बन्धित (लूसन) कर देता है और उस प्रकार नाव को धार में साशय बहा (डाउन स्ट्रीम) देता है। यहां A, Z को साशय गतिमान (मोशन) करता है, और वह रसायनों (केमिकल्स) को इस तरह से नदी मे डाला किसी और से कोई कार्य किए बिना गति उत्पन्न होती है। A ने जानबूझकर Z के खिलाफ बल का प्रयोग किया है; और यदि उसने ऐसा Z की सहमति के बिना किया है, तो कोई अपराध करने के लिए, या तो इरादा होना चाहिए या यह जानते हुए किया जाना चाहिए कि बल के इस प्रयोग से Z को क्षति, भय या क्षोभ होने की संभावना है, तो A ने Z के खिलाफ आपराधिक बल का इस्तेमाल किया है।

आवश्यक तत्व

अंग्रेजी कानून में, आपराधिक बल ‘बैटरी’ के बराबर है, जो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति पर उसकी सहमति के बिना जानबूझकर बल के प्रयोग को संदर्भित करता है।

  • धारा 349 द्वारा परिभाषित बल का प्रयोग;
  • ऐसे बल का प्रयोग उद्देश्यपूर्ण ढंग से किया जाना चाहिए;
  • किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध करने के लिए बल का प्रयोग किया जाना चाहिए; तथा
  • बल का प्रयोग उस व्यक्ति की इच्छा के बिना किया होना चाहिए जिसके विरुद्ध इसका प्रयोग किया गया है।
  • बल का उपयोग उस व्यक्ति को क्षति, भय या क्षोभ पैदा करने के इरादे से किया जाना चाहिए जिसके खिलाफ इसका इस्तेमाल किया गया है।

हमला (असॉल्ट)

धारा 351 के अनुसार, जो कोई भी इस आशय या ज्ञान के साथ कोई संकेत या तैयारी करता है कि इस तरह के संकेत या तैयारी से उपस्थित किसी व्यक्ति को संदेह होगा कि वह उस व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक बल का प्रयोग करने वाला है, तो उसे हमला कहा जाता है।

दृष्टांत

  1. A इस आशय से या यह जानते हुए, Z को मुक्का दिखाता है की, संभवतः Z यह मान लेगा कि A, Z पर वार करने की तैयारी कर रहा है। इस मामले में, A ने हमला किया है।

आवश्यक तत्व

हमले के आवश्यक तत्व निम्नलिखित हैं:

  • आरोपी आपराधिक बल का प्रयोग करने के लिए एक संकेत या तैयारी करता है;
  • ऐसा संकेत या तैयारी उस व्यक्ति की उपस्थिति में की जाती है जिसके संबंध में इसे बनाया जाता है;
  • आरोपी के पास इरादा या ज्ञान होना चाहिए कि इस तरह के संकेत या तैयारी से पीड़ित के मन में यह आशंका पैदा होगी कि उसके खिलाफ आपराधिक बल का इस्तेमाल किया जाएगा; तथा
  • इस तरह के संकेत या तैयारी का पीड़ित पर शारीरिक प्रभाव पड़ता है।

आपराधिक बल, हमला और क्षति के बीच अंतर

आई.पी.सी. में, ‘हमला’, ‘आपराधिक बल’ और ‘क्षति’ शब्दों के अलग-अलग अर्थ और परिभाषाएँ हैं। एक हमला, हिंसा के खतरे से ज्यादा कुछ नहीं है जो गैरकानूनी बल का उपयोग करने की इच्छा और ऐसा करने की क्षमता को प्रदर्शित करता है। जब बल का प्रयोग किया जाता है, तो यह आपराधिक बल में परिवर्तित हो जाता है। अब, आपराधिक बल को अपराध करने के लिए या कारण या ज्ञान की इससे क्षति, भय, या चिढ़ हो सकती है, के इरादे से व्यक्ति की सहमति के बिना गति, गति में परिवर्तन, या गति को रोकने के कार्य के रूप मे परिभाषित किया गया है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जो अनुचित तरीके से अपनी बाहों को एक महिला की कमर के चारों ओर लपेटता है, किसी व्यक्ति पर पानी छिड़कता है, या कुत्ते को किसी व्यक्ति पर हमला करने का आदेश देता है, बिना किसी शारीरिक नुकसान या क्षति के अवैध बल का उपयोग करता है, तो उसे आपराधिक बल का अपराध कहा जाता है। हालांकि, अगर इस तरह के गैरकानूनी बल के इस्तेमाल से शारीरिक पीड़ा या चोट लगती है, तो इसे ‘क्षति’ माना जाता है, जो भारतीय दंड संहिता की धारा 323 के तहत अपराध है।

उत्पीड़न

किसी महिला की लज्जा को भंग करने के उद्देश्य से किसी भी आपराधिक बल का कार्य, भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत आता है। आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम (2013) ने चार अतिरिक्त प्रावधानों को शामिल करके धारा 354 के दायरे का विस्तार किया है। धारा 354 A, धारा 354 B, धारा 354 C, और धारा 354 D इसकी नई धाराएं हैं। स्टेट ऑफ़ पंजाब बनाम मेजर सिंह (1966) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ‘एक महिला की लज्जा भंग करना एक अपराध है- महिला की उम्र नहीं बल्कि अभद्र (इनडिसेंट) व्यवहार, लज्जा भंग करने के अपराध को परिभाषित करने की परीक्षा है, जिसे धारा 354, आई.पी.सी. के तहत दंडित किया जाता है।

  • धारा 354A: यौन उत्पीड़न और उसके लिए सजा
  • धारा 354B: कपड़े उतारने के इरादे से महिला पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग
  • धारा 354C: दृश्यरतिकता (वॉयरिज्म)
  • धारा 354D: पीछा करना

यौन उत्पीड़न और उसके लिए सजा : धारा 354 A

एक पुरुष जो निम्नलिखित में से कोई भी व्यवहार करता है:

  • अवांछित (अनवेलकम) और स्पष्ट यौन प्रस्ताव; या
  • यौन अनुग्रह के लिए अनुरोध या मांग; या
  • एक महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध अश्लीलता के लिए उजागर करना; या
  • अश्लील टिप्पणी (कमेंट) करना।

उसे यौन उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

कोई भी व्यक्ति जो पैरा (1) के खंड (i), (ii), या (iii) में वर्णित अपराध करता है, उसे तीन साल तक के कठोर कारावास, या जुर्माने, या दोनों से दंडित किया जाना चाहिए।

कोई भी व्यक्ति जो उपधारा (1) के पैरा (iv) में वर्णित अपराध करता है, उसे एक वर्ष तक की अवधि के लिए किसी भी प्रकार के कारावास, जुर्माना या दोनों से दंडित किया जाना चाहिए।

विशाखा बनाम स्टेट ऑफ़ राजस्थान (1997)

विशाखा बनाम स्टेट ऑफ़ राजस्थान (1997) कार्यस्थल पर एक महिला के यौन उत्पीड़न के जघन्य (हीनियस) अपराध से संबंधित एक महत्वपूर्ण मामला है। अहम सवाल यह था कि क्या महिलाओं को काम पर यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए नियमों को लागू करना जरूरी था। अदालत ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 21 के तहत हर व्यापार या पेशा कर्मचारियों को सुरक्षित काम करने का माहौल प्रदान करेगा। इसने जीवन के अधिकार के साथ-साथ गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को भी बाधित किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि महिलाओं को कार्यस्थल में होने वाले यौन उत्पीड़न से मुक्त होने का मूल अधिकार है। इसने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से बचने के लिए कर्मचारियों द्वारा पालन किए जाने वाले कई महत्वपूर्ण सिद्धांतों को भी रेखांकित किया था। अंत में, 2013 में, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न अधिनियम, 2013 लागू किया गया, था जिससे कई आवश्यक सुरक्षा को प्रकाश में लाया गया था।

कपड़े उतारने के इरादे से महिला पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग : धारा 354 B

यह प्रावधान स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट करता है कि एक पुरुष जो एक महिला के कपड़े उतारने के लिए आपराधिक बल का उपयोग करता है, उसे एक निर्धारित अवधि के लिए दंडित किया जाएगा। इस धारा का उल्लंघन भी एक संज्ञेय (कॉग्निजेबल) अपराध है, हालांकि यह कारावास से दंडनीय नहीं है।

दृश्यरतिकता : धारा 354C

कोई भी पुरुष, एक निजी कृत्य में लगी महिला की छवि को उन परिस्थितियों में देखता है, कैमरा में खींचता है, जहां वह सामान्य रूप से अपराधी या अपराधी की पहल पर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा देखे न जाने की उम्मीद नही करती है, या यदि वह व्यक्ति ऐसे चित्र को प्रसारित करता है, तो उसे उसकी पहली दोषसिद्धि (कनविक्शन) पर दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष से कम नहीं होगी, लेकिन जिसे तीन वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, से दंडित किया जाएगा और वह जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा। दूसरी या बाद की दोषसिद्धि पर, अपराधी को कम से कम तीन साल की अवधि के लिए कारावास की सजा दी जाएगी, लेकिन उसे सात साल से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता, साथ ही साथ वह जुर्माना देने के लिए भी उत्तरदायी होगा।

पीछा करना : धारा 354 D

कोई भी पुरूष जो-

  • एक महिला का पीछा करता है और उसकी स्पष्ट अनिच्छा के बावजूद, अंतरंग संबंधों को प्रोत्साहित करने के लिए लगातार उससे संपर्क करता है या उससे संपर्क करने का प्रयास करता है; या
  • एक महिला के इंटरनेट, ईमेल, या इलेक्ट्रॉनिक संचार के अन्य रूपों पर नज़र रखता है;

तो वह पीछा करने का अपराध करता है।

व्यपहरण (धारा 359-363)

व्यपहरण, किसी भी रूप में, व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करता है। यह अनिवार्य रूप से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के साथ-साथ मानव अधिकारों द्वारा दिए गए जीवन के अधिकार का उल्लंघन करता है। यह लोगों के मन में डर पैदा करता है और सभ्य समाज पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 359 के अनुसार, व्यपहरण दो प्रकार का होता है: भारत में से व्यपहरण और वैध संरक्षकता (गार्जियनशिप) से व्यपहरण।

धारा 360 के अनुसार, किसी कार्य को भारत में से व्यपहरण तब कहा जाता है, जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को, उसी की, या उस व्यक्ति की ओर से सहमति देने के लिए वैध रूप से प्राधिकृत (ऑथराइज्ड) किसी व्यक्ति की सहमति के बिना, भारत की सीमाओं से परे ले जाता है।

धारा 361 के अनुसार, वैध संरक्षकता से व्यपहरण तब होता है जब कोई व्यक्ति सोलह वर्ष से कम आयु के किसी भी नाबालिग को, या अठारह वर्ष से कम आयु की किसी भी महिला, या विकृत दिमाग के किसी भी व्यक्ति को, ऐसे अभिभावक की सहमति के बिना या विकृत दिमाग के व्यक्ति के वैध अभिभावक की सहमति के बिना ले जाता है या बहकाता है। 

आवश्यक तत्व

  • नाबालिग या विकृत दिमाग के व्यक्ति को ले जाना या बहलाना;
  • ऐसे नाबालिग की आयु सोलह वर्ष से कम होनी चाहिए, यदि वह पुरुष है, या अठारह वर्ष से कम हो, यदि वह महिला है;
  • ले जाना या बहलाना नाबालिग या व्यक्ति के वैध अभिभावक की संरक्षकता से बाहर होना चाहिए; तथा
  • ऐसा ले जाना या लुभाना अभिभावक की सहमति के बिना होना चाहिए।

एस वरदराजन बनाम स्टेट ऑफ मद्रास (1964) के मामले में, वयस्कता की उम्र में आ रही एक लड़की ने स्वेच्छा से अपने पिता का घर छोड़ दिया, एक विशिष्ट स्थान पर आरोपी से मिलने की योजना बनाई, और रजिस्ट्रार के उप-कार्यालय में गई जहां आरोपी और लड़की ने एक विवाह के समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस बात का कोई सबूत नहीं था कि आरोपी ने उसे उसके माता-पिता की कानूनी देखभाल से बाहर कर दिया था क्योंकि आरोपी ने उसे घर छोड़ने के लिए राजी करने में कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभाई थी। यह निर्णय लिया गया था कि इस धारा के तहत अपराध का कोई सबूत नहीं है।

अपहरण (धारा 362)

भारतीय दंड संहिता की धारा 362 के तहत, जो कोई भी बलपूर्वक, या किसी भी धोखे से किसी भी व्यक्ति को किसी भी स्थान से जाने के लिए प्रेरित करता है, तो यह माना जाता है की उस व्यक्ति ने अपहरण किया है।

आवश्यक तत्व

  • जबरन जबरदस्ती, या भ्रामक तरीकों से प्रलोभन, और
  • ऐसी विवशता या प्रलोभन का आशय किसी व्यक्ति को किसी स्थान से हटाना होना चाहिए।

बल

शब्द ‘बल’, जैसा कि आई.पी.सी. की धारा 362, के तहत परिभाषित किया गया है, वास्तविक बल के उपयोग को संदर्भित करता है, न कि केवल धमकी या बल का प्रदर्शन। इस धारा के अनुसार, यदि कोई आरोपी पीड़ित को अपने साथ जाने के लिए मजबूर करने के लिए पिस्तोल से पीड़िता को धमकी देता है, तो यह अपहरण होगा।

धोखा

इस प्रावधान के तहत किसी व्यक्ति को धोखे से स्थान छोड़ने के लिए प्रेरित करना भी अपराध है। ‘बल के प्रयोग’ के विकल्प के रूप में धोखे का प्रयोग किया जाता है। जिसके नतीजतन, एक व्यक्ति बल का प्रयोग कर सकता है, या वैकल्पिक रूप से, किसी अन्य व्यक्ति को एक स्थान छोड़ने के लिए धोखा दे सकता है। किसी भी मामले में, इसे अपहरण के रूप में माना जाता है।

कहीं से भी जाने के लिए 

किसी व्यक्ति को किसी भी स्थान को छोड़ने के लिए मजबूर करना या समझाना अपहरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह एक वैध अभिभावक की संरक्षकता से होना जरूरी नहीं है, जैसा कि व्यपहरण के मामले में होता है। व्यपहरण, अपहरण के विपरीत, एक सतत (कंटीन्यूअस) अपराध है। जब किसी व्यक्ति को भारत से या किसी अभिभावक की वैध संरक्षकता से हटा दिया जाता है, तो व्यपहरण का अपराध किया जाता है। हालांकि, अपहरण के मामले में, एक व्यक्ति का न केवल तब अपहरण किया जाता है जब उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है, बल्कि तब भी जब उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है।

व्यपहरण की सजा, भारतीय दंड संहिता की धारा 363 के तहत आती है। इसमें कहा गया है कि जो कोई भी भारत से या वैध संरक्षकता से किसी भी व्यक्ति का अपहरण करता है, उसे एक अवधि के कारावास की सजा भुगतनी होगी, जिसे सात साल तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माना भी देना होगा।

यौन अपराध (धारा 375-376D)

बलात्कार

भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अनुसार, संभोग छह खंडों में से एक के तहत होना चाहिए। जब कोई पुरुष किसी महिला के साथ संभोग करता है:

  • उसकी इच्छा के विरुद्ध; या
  • उसकी सहमति के बिना; या।उसकी सहमति से, उसे मृत्यु या हानि के भय में डालकर; या
  • उसकी सहमति से, जब वह पुरुष जानता है कि वह उसका पति नहीं है और उसकी सहमति दी गई है क्योंकि वह मानती है कि वह एक अन्य पुरुष है जिससे उसने कानूनी रूप से शादी की है; या
  • उसकी सहमति से, यदि वह उस की प्रकृति और परिणामों को समझने में असमर्थ है जिसके लिए वह पागलपन, नशा, या उसके द्वारा व्यक्तिगत रूप से या किसी अन्य के माध्यम से इस तरह की सहमति के समय किसी भी हानिकारक पदार्थ के नशे के कारण सहमति देती है; या
  • चौदह वर्ष से कम आयु की महिला की सहमति से या उसके बिना।

सर्वोच्च न्यायालय ने तुलसीदास कनोलकर बनाम स्टेट ऑफ़ गोवा (2003) में स्पष्ट रूप से घोषित किया कि मानसिक रूप से विकलांग लड़की द्वारा दी गई सहमति को संभोग के लिए ‘सहमति’ नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह अपनी स्वीकृति के प्रभाव को समझने में असमर्थ थी।

वैवाहिक बलात्कार पर वाद विवाद

पति या पत्नी की इच्छा के विरुद्ध, अपने पति या पत्नी के साथ संभोग का कार्य वैवाहिक बलात्कार के रूप में जाना जाता है। दुनिया भर में, 195 में से 140 देशों ने पहले ही वैवाहिक बलात्कार को एक आपराधिक कार्य बना दिया है। सूची में शामिल देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और रूस शामिल हैं। भारत उन कुछ देशों में से एक है जहां वैवाहिक बलात्कार अभी भी अवैध नहीं है। इसकी कानूनी जड़ों को भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में वापस खोजा जा सकता है, जो बलात्कार से संबंधित है और इसमें एक “अपवाद” है, जिसमें कहा गया है, “यदि पत्नी की उम्र पंद्रह वर्ष से कम नहीं है, तो एक पुरुष द्वारा, उसकी पत्नी के साथ किया गया संभोग, बलात्कार नहीं है।”

मार्च 2000 में, भारत के विधि आयोग (लॉ कमीशन) ने “बलात्कार कानूनों की समीक्षा (रिव्यू)” पर अपनी 172वीं रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें कहा गया था कि यह धारा 375 में अपवाद खंड को समाप्त करने का प्रस्ताव नहीं करेगा “क्योंकि यह वैवाहिक संबंधों के साथ अनुचित हस्तक्षेप हो सकता है। “

2015 में, आर.आई.टी. फाउंडेशन की याचिका ने “विवाह अपवाद” की वैधता को चुनौती दी थी। 2022 में फाइनल राउंड के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय इस पर सुनवाई करेगा। एक अन्य महत्वपूर्ण मामला इंडिपेंडेंट थॉट बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2017) का था, जिसमें विवाद का सवाल यह था कि क्या एक पति को अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध रखने पर बलात्कार किया माना जा सकता है यदि पत्नी की उम्र 15 से 18 साल के बीच है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और  21 चर्चा के विषय थे। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि पत्नी की आयु 18 वर्ष से कम है, तो आई.पी.सी. की धारा 375 के अपवाद 2 को लागू नहीं किया जा सकता है।

वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण (क्रिमिनलाइजेशन) के खिलाफ तर्क

  • चूंकि इस तरह के मुद्दों को घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 के तहत नियंत्रित किया जाता है, वैवाहिक बलात्कार को कवर करने या आई.पी.सी. की धारा 375 से इस अपवाद को हटाने के लिए एक अलग कानून की आवश्यकता नहीं है।
  • कई व्यक्तियों, न्यायविदों (ज्यूरिस्ट्स) और यहां तक ​​कि पुरुषों के अधिकारों की रक्षा करने वालों ने भी एक प्रमुख कारक के रूप में, इस कानून के गलत उपयोग का हवाला देते हुए वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण पर चिंता व्यक्त की है।
  • सबूत का बोझ एक बड़ी समस्या है जिसने वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण को रोक दिया है।
  • वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने के खिलाफ सबसे प्रमुख कारणों में से एक यह है कि इससे विवाह के बंधन टूट सकते है, पत्नियां पतियों पर अन्यायपूर्ण आरोप लगा सकती हैं।

वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण के लिए तर्क

  • अपवाद के तहत विवाहित और अविवाहित महिलाओं के बीच असमानता को मनमाना और अप्राकृतिक माना गया और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन किया गया, जो कानून के तहत समान सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
  • यह भी तर्क दिया गया था कि वैवाहिक बलात्कार के अपवाद ने विवाहित महिलाओं के अनुच्छेद 21 के तहत स्वायत्तता (ऑटोनोमी) और गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन किया और धारा 375 के तहत सुरक्षा ना प्रदान करके, अनुच्छेद 15 के तहत उनके गैर-भेदभाव के अधिकार का उल्लंघन किया।
  • यह एक सांख्यिकीय (स्टेटिस्टिकली) रूप से सिद्ध तथ्य है कि अधिकांश यौन हमले उन लोगों द्वारा किए जाते हैं जो पीड़ित से परिचित होते हैं – अक्सर पति या पत्नी।
  • महिलाओं के खिलाफ वैवाहिक बलात्कार की वास्तविकता और व्यापकता, जो इसकी सजा की आवश्यकता को रेखांकित करती है, को कानूनी दुरूपयोग के मुद्दे से अलग किया जाना चाहिए।

सामूहिक बलात्कार

भारतीय दंड संहिता की धारा 376D में कहा गया है कि जब एक महिला का बलात्कार, एक या एक से अधिक लोगों द्वारा किया जाता है जो एक समूह का हिस्सा हैं या एक समान लक्ष्य के लिए मिलकर कार्य कर रहे हैं, तो उनमें से प्रत्येक व्यक्ति को बलात्कार का दोषी माना जाता है और उसे न्यूनतम बीस साल की कारावास जिसे अजीवन तक बढ़ाया जा सकता है, की सजा दी जा सकती है, जिसका अर्थ है कि वे अपने शेष जीवन के लिए कैद हो जाएंगे, और जुर्माना के साथ भी दंडित किया जाएगा।

प्रदीप कुमार बनाम यूनियन एडमिनिस्ट्रेटर, चंडीगढ़ (2006) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अभियोजन (प्रॉसिक्यूटर) पक्ष को यह साबित करना होगा कि:

  • ऐसे व्यक्तियों का एक समूह था जिन्होंने पीड़िता के साथ बलात्कार करने के सामान्य इरादे के साथ मिलकर कार्य करने का निर्णय लिया,
  • समूह के एक से अधिक व्यक्तियों ने पूर्व-व्यवस्थित (प्री अरेंज्ड) योजना के साथ बलात्कार के कार्य में भाग लिया, और
  • समूह के सामान्य उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए समूह के एक या अधिक सदस्यों (जरूरी नहीं कि सभी) द्वारा बलात्कार का कार्य किया गया हो।

ऐसे में माना जाता है कि बलात्कार को समूह के सभी सदस्यों ने अंजाम दिया है। एक सामान्य इरादे का अस्तित्व ही दोष का सार है। किसी व्यक्ति की एक मात्र उपस्थिति, जब कोई दूसरा बलात्कार कर रहा हो, यह स्थापित करने के लिए अपर्याप्त है कि वह अन्य लोगों के साथ पहले से ही ऐसा करने के लिए सहमत था, और इस प्रकार उसे सामूहिक बलात्कार का दोषी ठहराया जा सकता है।

अप्राकृतिक अपराध (धारा 377)

अंत में, मानव शरीर के खिलाफ छठा प्रकार का अपराध एक अप्राकृतिक अपराध है। धारा 377 अप्राकृतिक अपराधों को परिभाषित करती है:

जो कोई भी अपनी इच्छा से किसी भी पुरुष, महिला या जानवर के साथ प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ शारीरिक संभोग करता है, उसे आजीवन कारावास से या 10 साल की सजा और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।

यह धारा सोडॉमी और पशुता के लिए दंड से संबंधित है। एक पुरुष द्वारा एक अन्य पुरुष के साथ प्राकृतिक व्यवस्था के खिलाफ, या एक महिला के द्वारा अन्य महिला के साथ, या एक पुरुष या महिला द्वारा किसी जानवर के साथ किसी भी तरह से किए गए शारीरिक संभोग को अपराध माना जाता है। प्रवेश, भले ही यह केवल एक मामूली संकेत हो, बलात्कार में महत्वपूर्ण है। इस धारा के तहत किसी मामले में सहमति इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है। वह व्यक्ति जो निष्क्रिय भूमिका निभाता है, वह उतना ही दोषी है जितना कि वह व्यक्ति है जो सक्रिय (एक्टिव) रूप से एक दुष्प्रेरक के रूप में कार्य में भाग लेता है।

धारा 377 की संवैधानिक वैधता

नाज़ फाउंडेशन बनाम एन.सी.टी. ऑफ़ दिल्ली सरकार (2009) में, एक गैर-सरकारी संगठन ने दिल्ली उच्च न्यायालय में धारा 377 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। नाज़ ने तर्क दिया कि धारा 377, निजी तौर पर दो वयस्कों के बीच सहमति से संभोग को शामिल करके, अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 में दिए गए संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन करती है। इस बात पर जोर दिया गया था कि धारा 377, कानून के समक्ष समानता का अधिकार (जो तर्कहीन तर्कसंगतता के आधार पर किसी भी वर्गीकरण (क्लासिफिकेशन) को प्रतिबंधित करता है) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार (जिसमें गोपनीयता, गरिमा (डिग्निटी) और व्यक्तिगत स्वायत्तता का अधिकार शामिल है) जो, क्रमशः संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 द्वारा गारंटीकृत है, की भावना के खिलाफ जाती है। इसमें कहा गया था कि धारा 377 संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने उचित संवैधानिक प्रावधानों और आकांक्षाओं के आलोक में उनके तर्कों और प्रतिवादों की जांच के बाद सभी पक्षों की दलीलों को स्वीकार कर लिया; देश और विदेश से न्यायिक घोषणाएं और न्यायिक राय; सहमति से समलैंगिकता के (गैर) अपराधीकरण के लिए और उसके खिलाफ नैतिक औचित्य (मॉरल जस्टिफिकेशन); और निजी तौर पर दो इच्छुक वयस्कों के बीच यौन क्रिया से संबंधित विदेशी कानून में किए गए सुधार। इसने धारा 377 को आंशिक रूप से असंवैधानिक रूप से निर्धारित किया। इसने फैसला किया कि धारा 377 अवैध है, क्योंकि यह वयस्कों (अर्थात, 18 वर्ष और उससे अधिक आयु के व्यक्तियों) के यौन कार्यों को निजी तौर पर अपराध बनाती है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 14,15 और 21 का उल्लंघन करती है।

आई.पी.सी. में धारा 377 को बनाए रखने के खिलाफ और समान रूप से बाध्यकारी कारणों को सुनने के बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के नाज़ फाउंडेशन के निर्णय को खारिज कर दिया और सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन (2013) में आई.पी.सी. की धारा 377 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। 

2018 में, नवतेज सिंह जौहर और अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) के ऐतिहासिक फैसले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिक यौन संबंध सहित वयस्कों के बीच सभी सहमति से बनाए यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। न्यायालय ने धारा 377 के प्रावधानों को बनाए रखा जो जानवरों पर सहमति के बिना किए गए कार्यों या यौन कार्यों को अवैध बनाते हैं।

आपराधिक कानून संशोधन विधेयक (क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट बिल), 2019

  • निर्भया कांड के परिणामस्वरूप महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों से निपटने वाले कानूनों में सुधार ने महिलाओं की सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जिसके नतीजतन, आपराधिक कानून (संशोधन) विधेयक, 2019 का उद्देश्य सभी प्रकार के यौन उत्पीड़न को दंडित करने वाले लिंग-तटस्थ घटक (जेंडर न्यूट्रल कंपोनेंट) की वकालत करके प्रगति करना है।
  • यह विधेयक आई.पी.सी. की धारा 2 में “लज्जा” की परिभाषा जोड़ने का प्रयास करता है। यह किसी भी पुरुष, महिला या ट्रांसजेंडर व्यक्ति से संबंधित व्यक्तित्व विशेषता के रूप में इसका वर्णन करने का प्रयास करता है, जो आमतौर पर नैतिकता, शालीनता और भाषण और व्यवहार की अखंडता (इंटीग्रिटी) में विश्वास रखता है।
  • आई.पी.सी. की धारा 354, 354A, 354B, 354C और 354D में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है। महिलाओं की लज्जा भंग करना, यौन उत्पीड़न, कपड़े उतारने का इरादा, दृश्यरतिकता और पीछा करना सभी प्रतिबंधित हैं। बलात्कार के अपराधी और पीड़िता के लिंग को ध्यान में रखते हुए इन कानूनों में संशोधन किया जाएगा। शब्द “लड़का” या “कोई भी पुरुष जो” को “कोई भी” से बदलने की योजना है, जबकि “एक महिला” को “किसी भी व्यक्ति” से बदलने का प्रस्ताव है।
  • भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में बदलाव किया गया है। विधेयक में “किसी भी व्यक्ति” या “अन्य व्यक्ति” जैसे सर्वनामों को “किसी भी व्यक्ति” या “अन्य व्यक्ति” जैसे शब्दों से बदलने का प्रस्ताव है, जिससे बलात्कार को एक लिंग-तटस्थ अपराध बनाने का इरादा है है।
  • यह विधेयक “लिंग (पेनिस)” और “योनि (वजीना)” शब्दों को “जननांग (जेनिटल)” शब्द के साथ जोड़ने का भी प्रयास करता है, जिसे स्पष्टीकरण 1 में लिंग और योनि के रूप के तहत परिभाषित किया गया है।
  • यह विधेयक, एक नई धारा 375A का प्रस्ताव करता है, जो यौन हमले को जानबूझकर जननांगों, गुदा (एनस), या स्तनों को छूने के रूप में परिभाषित करता है, या किसी अन्य व्यक्ति को, बिना उसकी सहमति के दूसरे व्यक्ति के ऐसे हिस्सों को छूने के लिए मजबूर करता है, या अवांछित शब्दों या इशारों का उपयोग करता है जो एक “कार्रवाई योग्य प्रकृति का अवांछित खतरा बनाते हैं” और ऐसे कार्यों के लिए तीन साल तक की कारावास की सजा और / या जुर्माना हो सकता है।
  • हिरासत में महिलाओं और बच्चों के बलात्कार से निपटने वाली विशेष उप-धाराओं के अलावा, इस विधेयक का उद्देश्य “महिला” शब्द को “किसी भी व्यक्ति” के साथ बदलकर आई.पी.सी. की धारा 376 A, 376 B, 376 C और 376 D में सूचीबद्ध अपराधों को लिंग-तटस्थ करना है।”

मानव शरीर के विरुद्ध अपराधों के लिए दंड

आई.पी.सी. की धारा 53 में पांच प्रकार की सजा का प्रावधान है:

  • मृत्यु दंड,
  • आजीवन कारावास,
  • कारावास (कठोर/साधारण),
  • संपत्ति की जब्ती, और
  • जुर्माना।

भारतीय दंड संहिता 1860 का अध्याय 3, जिसका शीर्षक सजा है, धारा 53 से लेकर 75 तक विभिन्न प्रकार की सजाओं से संबंधित है।

मृत्यु दंड

किसी अपराध के लिए दंड के रूप में अपराधी के जीवन को छीन लेने को मृत्युदंड के रूप में जाना जाता है। यह केवल भारत में दुर्लभतम मामलों (रेयरेस्ट ऑफ रेयर) में ही दिया जाता है। इसे निम्नलिखित अपराधों के लिए दंड के रूप में लगाया जा सकता है:

  • भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ना (धारा 121),
  • विद्रोह का दुष्प्रेरण (एबेटमेंट ऑफ़ म्यूटिनी) (धारा 132),
  • झूठे सबूत गढ़ने के लिए दिया जा सकता है, जिस पर एक निर्दोष व्यक्ति को मौत की सजा का सामना करना पड़ा हो (धारा 194),
  • हत्या (धारा 302),
  • आजीवन कारावास से दंडित दोषियों द्वारा हत्या (धारा 303),
  • नाबालिग या पागल या नशे में धुत व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाना (धारा 305), और;
  • हत्या के साथ डकैती (धारा 396),
  • फिरौती के लिए व्यपहरण (धारा 364A)।

कारावास

साधारण कारावास

यह एक प्रकार की सजा है जिसमें अपराधी को सिर्फ कैद किया जाता है और काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जाता है। साधारण कारावास से दंडित किए जाने वाले कुछ अपराध हैं:

  • गलत तरीके से दबाव डालना (धारा 341),
  • किसी स्त्री की मर्यादा को ठेस पहुंचाने के आशय से कोई ध्वनि या इशारा करने पर कोई शब्द बोलना (धारा 509),
  • नशे में व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक स्थान पर दुराचार (मिसकंडक्ट) (धारा 510)
  • मानहानि (डिफेमेशन) (धारा 500, 501, 502),
  • संपत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग (मिसअप्रोप्रिएशन) (धारा 403)।

कठोर कारावास

इस प्रकार के कारावास में, अपराधी को अन्य कार्यों के अलावा, अनाज पीसने, खुदाई करने और लकड़ी काटने जैसे शारीरिक श्रम करने के लिए मजबूर किया जाता है। स्टेट ऑफ़ गुजरात बनाम गुजरात उच्च न्यायालय (1998) के मामले में, कठोर कारावास से गुजर रहे कैदियों पर कड़ी मेहनत का आरोप संवैधानिक पाया गया था। इसे निम्नलिखित अपराधों में दिया जा सकता है:

आजीवन कारावास

आजीवन कारावास का अर्थ है कि अपराधी को उसके शेष प्राकृतिक जीवन के लिए कैद किया जाएगा। धारा 57 के अनुसार आजीवन कारावास की सजा 20 साल की सजा के बराबर है। हालांकि, सजा की अवधि के अंशों (फ्रैक्शंस) की गणना (कैलकुलेट) करने के उद्देश्य के लिए, आजीवन कारावास 20 साल के कारावास के बराबर है; अन्यथा आजीवन कारावास की सजा असीमित अवधि की होती है।

संपत्ति की जब्ती

सजा के तौर पर संपत्ति की जब्ती का अतीत बहुत पुराना है। भारतीय दंड संहिता की धारा 53, सजा की एक विधि के रूप में संपत्ति को जब्त करने की अनुमति देती है। इसे भारतीय दंड संहिता (संशोधन) अधिनियम 1921 (1921 का 16) द्वारा निरस्त (रिपील) कर दिया गया था, जिसने संहिता की धारा 61 और 62 को हटा दिया था। अपराधी की संपत्ति की पूर्ण जब्ती अब सजा का एक तरीका नहीं है। दूसरी ओर, भारतीय दंड संहिता में तीन अपराध हैं, जिसके लिए अपराधी अपनी संपत्ति को जब्त करने के लिए उत्तरदायी है। वे इस प्रकार हैं:

  • भारत सरकार से मैत्री (एलायंस) या शांति का संबंध रखने वाली किसी शक्ति के राज्यक्षेत्र (टेरिटरी) में लूटपाट करने के लिए, ऐसी लूटपाट करने के लिए उपयोग में लाई गई या उपयोग में लाए जाने के लिए इरादा होने वाली, या ऐसी लूटपाट द्वारा अर्जित संपत्ति, इसकी जब्ती से दंडनीय है (धारा 126)।
  • युद्ध या लूटपाट के दौरान ली गई संपत्ति को प्राप्त करना उस संपत्ति की जब्ती द्वारा दंडनीय है (धारा 127)।
  • एक सार्वजनिक अधिकारी जो अवैध रूप से अपने नाम पर या किसी अन्य के नाम पर संपत्ति की खरीद या बोली लगाता है, उसकी संपत्ति को जब्त कर लिया जाता है (धारा 169)।

जुर्माना

सजा लगाने से संबंधित लगभग हर प्रावधान में दंड के रूप में जुर्माना होता है। जहां एक राशि निर्दिष्ट की जाती है, जिस पर जुर्माना लगाया जा सकता है, हालांकि, धारा 63 में कहा गया है कि अपराधी जिस जुर्माने के लिए उत्तरदायी है, वह असीमित हो सकता है, लेकिन अत्यधिक नहीं हो सकता।

सोमन बनाम स्टेट ऑफ़ केरल (2012) में, सर्वोच्च न्यायालय ने आनुपातिकता (प्रोपोर्शनेलिटी), प्रतिरोध और पुनर्वास सहित सजा के विवेक का प्रयोग करते समय कई मानदंडों पर विचार किया है। न्यायालय ने कहा कि शमन करने वाले और उत्तेजित करने वाले तत्वों को आनुपातिकता विश्लेषण का हिस्सा माना जाना चाहिए।

अपराधों की रोकथाम: आगे क्या किया जा सकता है

भारत में, अपराधों में हत्या, मनी लॉन्ड्रिंग, धोखाधड़ी और मानव तस्करी जैसे अपराधों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है। इन अपराधों में विभिन्न सांख्यिकीय प्रवृत्तियां (टेंडेंसी) होती हैं जो समय के साथ बदलती हैं, जो मानव विचार के विकसित होने से बदलती हैं। वर्तमान में, अपराध अब सामाजिक मुद्दों का एक घटक नहीं रह गया है; बल्कि, यह एक राष्ट्र के लिए एक सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दे के रूप में विकसित हुआ है। उनके विभिन्न कारणों को प्रभावित करने के लिए हस्तक्षेप करके, अपराध की रोकथाम के तरीके और पहल अपराध होने की संभावना को कम करने का प्रयास करते हैं, साथ ही साथ व्यक्तियों और समाज पर उनके संभावित प्रतिकूल प्रभाव, विशेष रूप से अपराध के डर को कम करने का प्रयास करते हैं।

सरकारी हस्तक्षेप

समन्वय (को-ऑर्डिनेशन)

समन्वय राष्ट्रीय अपराध रोकथाम निदान (डायग्नोसिस) और रणनीतियों के लिए स्थानीय आपराधिक समस्याओं और अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध के बीच संबंधों को शामिल करने की आवश्यकता को संदर्भित करता है।

अधिकारियों की भूमिका

अधिकारियों का प्राथमिक ध्यान उन स्थितियों को रोकने पर होना चाहिए जो आपराधिकता की ओर ले जाती हैं और अंत में, अपराधों का संचालन करती हैं। यह एक व्यवस्थित, एकीकृत (इंटीग्रेटेड) और समन्वित रणनीति द्वारा पूरा किया जा सकता है, जिसमें दंडात्मक उपायों का उपयोग केवल अंतिम विकल्प के रूप में किया जाता है। सरकारों को दमन (सप्रेशन) और रोकथाम के बीच संतुलन की स्थिति के साथ-साथ पुनर्वास पहल के आधार पर एक प्रणाली विकसित करने का प्रयास करना चाहिए जो लोगों की मानसिकता पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगा, और इसलिए आपराधिकता को कम करेगा।

मानवाधिकार उपकरण (ह्यूमन राइट्स इंस्ट्रूमेंट)

यह सुनिश्चित करते है कि अंतरराष्ट्रीय संधियों (ट्रीटीज), कानून और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अन्य उपायों का पालन किया जाता है और उनकी निगरानी की जाती है।

प्रतिबद्धता (कमिटमेंट)

अपराध के कारणों की व्यापक प्रकृति और उन्हें संबोधित करने के लिए आवश्यक कौशल (स्किल) और जिम्मेदारियों को देखते हुए, प्रभावी अपराध रोकथाम के लिए एक संस्थागत ढांचे को बनाने और बनाए रखने के लिए सभी स्तरों पर सरकार की प्रतिबद्धता की आवश्यकता है।

जवाबदेही

केवल कार्यक्रमों की स्थापना और रखरखाव और मूल्यांकन के लिए पर्याप्त संसाधन, साथ ही वित्तपोषण (फाइनेंसिंग), कार्यान्वयन (इंप्लीमेंटेशन), मूल्यांकन और वांछित परिणामों की उपलब्धि के लिए स्पष्ट जवाबदेही ही स्थिरता और जवाबदेही सुनिश्चित कर सकती है।

नीतियां और कार्यक्रम

ज्ञान-आधारित रणनीतियों, नीतियों और कार्यक्रमों को ज्ञान के व्यापक विषय के आधार पर स्थापित किया जाना चाहिए, साथ ही विशिष्ट अपराध मुद्दों, कारणों और सिद्ध दृष्टिकोणों (एप्रोच) के साक्ष्य पर भी स्थापित किया जाना चाहिए।

गैर-सरकारी हस्तक्षेप

  • लागू सामाजिक और आर्थिक नीतियों में अपराध की रोकथाम को शामिल करने की आवश्यकता के साथ-साथ जोखिम वाले समुदायों, बच्चों, परिवारों और युवाओं के सामाजिक एकीकरण पर जोर देने को सामाजिक-आर्थिक विकास और समावेशन (इंक्लूजन) कहा जाता है।
  • गैर सरकारी संगठन कार्यक्रम जोखिम में रह रहे युवाओं या पूर्व-अपराधियों और उनके परिवारों के साथ-साथ पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन), प्रशिक्षण (ट्रेनिंग), कैरियर की संभावनाएं, माइक्रोक्रेडिट, और बचे लोगों के लिए समर्थन के साथ-साथ सहकर्मी शिक्षा प्रशिक्षण और जागरूकता बढ़ाने के लिए मल्टीमीडिया प्रशिक्षण प्रदान कर सकते हैं।
  • जबकि ज्यादातर देशों में सरकारें विशिष्ट नीतियों और कानूनों के माध्यम से अपराध की रोकथाम में सक्रिय भूमिका निभाती हैं, गैर-सरकारी संगठनों (एन.जी.ओ.) को सुरक्षित और अपराध-मुक्त समुदायों के निर्माण में सहायता करने में बढ़ती दिलचस्पी दिखानी चाहिए।
  • गैर-सरकारी हस्तक्षेप कार्यक्रम जो सार्वजनिक-निजी भागीदारी का आकार लेते हैं, उन्हें बहुत सफलता मिलती है। प्रशिक्षण और पुनर्वास पर ध्यान देने के साथ ज्यादातर गैर-सरकारी गतिविधियां विकास पर आधारित होनी चाहिए।

निष्कर्ष

हर देश में अपराध होते हैं, और अपराध मुक्त राज्य जैसी कोई चीज नहीं होती है। अपराध एक ऐसी बीमारी की तरह है जिसका कोई इलाज नहीं है और जिसे दुनिया से पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता है, लेकिन इसे गंभीरता और आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) में कम किया जा सकता है, जिसमें कहा गया है कि अपराधों के लिए दंड ऐसा होना चाहिए कि वे उन लोगों के मन में भय पैदा करें जो उन्हें करते हैं, इस प्रकार उन्हें करने से रोकते हैं। क्योंकि यह एक सच्चाई है कि आज के दौर में व्यक्ति इस हद तक कार्यों को अंजाम दे सकते हैं कि उन्हें मानव जीवन की कीमत चुकानी पड़ सकती है, जो ईश्वर का एक मूल्यवान उपहार है, तभी मानव व्यवहार को विनियमित, संयमित और शांति के सामान्य लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अच्छे विश्वास में चलाया जा सकता है। 

संदर्भ

 

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