आई.पी.सी.,1860 की धारा 354 D का विश्लेषण 

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Indian Penal Code
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यह लेख उस्मानिया विश्वविद्यालय के के.वी.आर.आर. लॉ कॉलेज के M.Manaswini Reddy द्वारा लिखा गया है। इसमें आई.पी.सी. की धारा 354 D यानी पीछा करने (स्टॉकिंग) की विस्तृत व्याख्या की गई है। यह लेख महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक कानूनी प्रावधान के रूप में इस धारा को उजागर करता है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja के द्वारा किया गया है।

परिचय

अपराध को एक ऐसे कार्य या चूक के रूप में परिभाषित किया जाता है जो कानून का उल्लंघन करता है और जिससे बड़े पैमाने पर समाज प्रभावित होता है। भारतीय दंड संहिता, 1860 विभिन्न प्रावधान प्रदान करता है ताकि महिलाओं को अपराधों के खिलाफ सुरक्षा दी जा सके। यह संहिता अनिवार्य रूप से किसी अपराध को दंडित करने के लिए एक्टस रीअस और मेन्स रीआ को देखती है। आम तौर पर पीछा करने का मतलब है कि किसी व्यक्ति की सहमति के बिना या तो ऑनलाइन या शारीरिक रूप से उसका पीछा करना ताकि ऐसे व्यक्ति के साथ व्यक्तिगत बातचीत स्थापित की जा सके, भले ही वे इससे असहमत हों। भारतीय दंड संहिता के तहत पीछा करना एक दंडनीय अपराध है, हालांकि संहिता केवल महिलाओं के खिलाफ पीछा करने के अपराध के लिए सजा का प्रावधान करता है। भारतीय दंड संहिता के तहत पीछा करने के अपराध को एक संज्ञेय (कॉग्निजेबल), जमानती और गैर-शमनीय (नॉन कंपाउंडेबल) अपराध के रूप में मान्यता प्राप्त है। पीछा करने से महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। ज्यादातर पीड़ितों को तनाव और सामाजिक चिंता का सामना करना पड़ता है, क्योंकि उन्हें यह सब, अलग स्थानों पर स्थानांतरित (ट्रांसफर) होने, नौकरी बदलने, आपातकालीन संपर्क और अघोषित (अनडिस्क्लोज्ड) हथियारों के साथ पीछा किए जाने के आघात (ट्रॉमा) के परिणामस्वरूप सहना पड़ता है। यह लेख भारतीय दंड संहिता की धारा 354 D और इसके प्रत्येक आवश्यक तत्वों का एक अवलोकन (ओवरव्यू) देता है।

पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड)

आपराधिक न्याय प्रणाली में बदलाव लाने के लिए एक समिति का गठन किया गया था। 23 दिसंबर 2013 को गठित इस समिति में अध्यक्ष के रूप में न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा, न्यायमूर्ति लीला सेठ और वरिष्ठ अधिवक्ता (सीनियर एडवोकेट) गोपाल सुब्रमण्यम शामिल थे। इन परिवर्तनों का उद्देश्य महिलाओं से संबंधित चरम (एक्सट्रीम) प्रकृति के यौन उत्पीड़न के अपराधों के लिए परीक्षण और दंड के मामले में आपराधिक न्याय प्रणाली को तेज करना था। यह कुख्यात दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामले के परिणामस्वरूप किया गया कार्य था, जिसमें महिलाओं के खिलाफ अपराधों की बढ़ती संख्या और उनके शील (मोडेस्टी) भंग को उजागर किया गया था। आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013 के तहत समिति द्वारा धारा 354 D के तहत पीछा करने के अपराध को पेश किया गया था और 23 जनवरी 2013 को एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी।

आई.पी.सी. की धारा 354 D 

कोई भी पुरुष जो किसी महिला का पीछा करता है, उससे संपर्क करता है या व्यक्तिगत बातचीत के लिए उससे बार-बार संपर्क करने का प्रयास करता है, भले ही महिला ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया हो कि उसे, उससे बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं है, तो इसे धारा 354 D के अनुसार पीछा करना कहा जाता है। इस धारा में ऑनलाइन माध्यम से पीछा करना यानी किसी महिला के इंटरनेट, ई मेल या इलेक्ट्रॉनिक संचार (कम्युनिकेशन) के अन्य रूपों के उपयोग पर निगरानी रखना भी शामिल है। 

पीछा करने के अपवाद

  • यदि किसी अपराध का पता लगाने या किसी कार्य को होने से रोकने के लिए, राज्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी के तहत किसी पुरुष द्वारा महिला का पीछा किया जाता है,;
  • कानून द्वारा अधिकृत (ऑथराइज्ड) व्यक्ति द्वारा दी गई किसी भी शर्त या कानून का पालन करना;
  • अन्य परिस्थितियाँ जो उसके आचरण को उचित रूप से न्यायसंगत (जस्टिफिएबल) बना सकती हैं।

पीछा करने के अपराध के लिए इस धारा द्वारा निर्धारित सजा, पहली सजा पर, तीन साल की अवधि के लिए साधारण या गंभीर कारावास और जुर्माना और दूसरी सजा पर पांच साल की कैद और जुर्माना है।

आई.पी.सी. की धारा 354 D की व्याख्या अन्य प्रावधानों के साथ

  • भारतीय दंड संहिता की धारा 354 A में एक महिला के प्रति यौन प्रगति (एडवांसेज) और अवांछित या स्पष्ट शारीरिक संपर्क, यौन संबंध बनाने के लिए मांग या अनुरोध, महिला की इच्छा के विरुद्ध साहित्य/पुस्तकें दिखाने और यौन रूप से अश्लील टिप्पणी करने की चर्चा है। इन सभी को यौन उत्पीड़न के रूप में वर्गीकृत किया गया है और धारा 354 D से पहले इस धारा का इस्तेमाल पीछा करने के लिए भी किया जाता था क्योंकि यौन उत्पीड़न के अधिकांश मामले पीछा करने से ही शुरू होते हैं।

उदाहरण के लिए, छेड़खानी, यदि एक लड़की पर अश्लील टिप्पणी की जाती है या यौन संबंध बनाने की मांग और अनुरोध किया जाता है, तो ऐसे मामलों में आई.पी.सी. की धारा 354 A को धारा 354 D (1) (I) के साथ पढ़ा जाएगा।

  • धारा 354B– यह धारा किसी महिला की इच्छा के बिना उसको निर्वस्त्र करने के इरादे से आपराधिक बल के प्रयोग या हमले के बारे में बात करती है। यह धारा ऐसे अपराध के लिए उकसाने पर भी दंड देती है।

यह ध्यान देने योग्य है कि एक महिला को निर्वस्त्र करने का अर्थ है महिला के कपड़े उसकी इच्छा के विरुद्ध उतारना या उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने कपड़े उतारने के लिए मजबूर करना। यह भी एक महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध छेड़ने और उसका पीछा करने के इरादे से छेड़खानी करने का एक रूप है। यह एक महिला की शील भंग करने के साथ-साथ धारा 354D(1)(i) दोनों को आकर्षित करता है। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां एक पुरुष एक महिला का पीछा करता है, फिर उसे घेर लिया जाता है, और आपराधिक बल का प्रयोग किया जाता है या उस पर हमला किया जाता है, उसे निर्वस्त्र करने के लिए मजबूर किया जाता है या उसकी इच्छा के विरुद्ध उसको निर्वस्त्र करने का प्रयास किया जाता है।

  • धारा 354C– इस धारा के तहत दृश्यरतिकता (वॉयरिज्म) को स्पष्ट किया गया है, जिसका सीधा मतलब है कि किसी व्यक्ति को नग्न या यौन गतिविधियों में लिप्त देखकर यौन सुख प्राप्त करना। भारतीय दंड संहिता किसी भी पुरुष को दंडित करती है जो किसी महिला की निजता पर आक्रमण करके उसकी तस्वीरें खींचता है या देखता है, अनिवार्य रूप से जब वह नग्न होती है जिसका अर्थ है कि उसके जननांग (जेनिटल), पश्च (पोस्टीरियर) और स्तन उजागर हो जाते हैं या जब वह किसी ऐसे निजी कार्य में लिप्त होती है जिसे वह आमतौर पर सार्वजनिक रूप से नहीं करती है। यह धारा इस वाक्य का उपयोग करके – “वह अपनी निजता के समय किसी के द्वारा देखे जाने की उम्मीद नहीं करेगी”, यह स्पष्ट करती है कि इस तरह का कार्य दंडनीय है यदि यह महिला की सहमति के बिना किया जाता है। यह धारा महिला के ऐसे चित्रों को प्रसारित करने को दंडित करती है।

दृश्यरतिकता को भी अक्सर धारा 354(1)(i) के साथ पढ़ा जाता है क्योंकि इसमें एक पुरुष शामिल होता है जो एक महिला का पीछा करता है और उसकी तस्वीरें खींचता है या देखता है, जिससे उसकी निजता भंग होती है।

  • धारा 509– शब्दों, इशारों या कार्यों का उपयोग करके किसी महिला की शील का अपमान करना। इस धारा का मुख्य तत्व यह है कि अपराधी को कोई शब्द बोलने चाहिए, ध्वनि या इशारा करना चाहिए या किसी वस्तु का प्रदर्शन करना चाहिए और यह इस इरादे से किया जाना चाहिए कि इसे सुना जाए या देखा जाए या महिला की निजता पर इससे प्रभाव पड़ सके। धारा 509 को अक्सर 354D(1)(i) के साथ पढ़ा जाता है क्योंकि एक महिला का पीछा करते हुए उसके शील का अपमान करने के इरादे से अकसर छेड़खानी की घटनाएं हुई हैं।

आई.पी.सी. की धारा 354 D और साइबर स्टॉकिंग

धारा 354 D(1)(ii) में उल्लेख किया गया है कि इंटरनेट या ई मेल या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक संचार के उपयोग के द्वारा किसी की निगरानी करना, भले ही उसने बातचीत करने के लिए अपनी अनिच्छा और असहमति व्यक्त की हो, तो यह ऑनलाइन माध्यम से पीछा करने के बराबर है।

एक महिला से संपर्क करने की कोशिश करना और एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपनी अरुचि, मानहानि, बदनामी (स्लेंडर) और परिवाद (लिबल) दिखाने के बाद भी व्यक्तिगत परिचित बनाने को भी साइबर स्टॉकिंग माना जाता है। उदाहरण के लिए: एक लड़की के अकाउंट पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजना, भले ही उसने उसे कई अकाउंट से रिजेक्ट कर दिया हो।

साइबर स्टॉकिंग को आमतौर पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट) 2000 की धारा 66E, 67, 67A और 67B के तहत निपटाया जाता है और साथ ही 354D(1)(ii) के साथ भी पढ़ा जाता है।

  • आई.टी. अधिनियम की धारा 66 E: जबकि धारा 354C, धारा 354 D(1)(i) के साथ पढ़ी जाती है, जो दृश्यरतिकता के साथ शारीरिक रूप से पीछा करना होता है, धारा 66E इंटरनेट के माध्यम से किए गए दृश्यरतिकता के बारे में बात करती है जो आमतौर पर साइबर स्टॉकिंग का परिणाम है। यह धारा किसी व्यक्ति की तस्वीरें खींचने, प्रकाशित करने और निजता का उल्लंघन करने को दंडित करती है।
  • आई.टी. अधिनियम की धारा 67: यह धारा अश्लील सामग्री को इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रसारित करने के लिए निर्धारित दंड के बारे में बात करती है, इस धारा को आई.पी.सी. की धारा 292 और धारा 354 D (1) (i) के साथ पीछा करने और अश्लील, निर्लज्ज सामग्री भेजने के साथ पढ़ा जाता है।
  • आई.टी.अधिनियम की धारा 67A और 67B: जबकि धारा 67A एक वयस्क महिला का पीछा करने और यौन रूप से स्पष्ट सामग्री भेजने, स्पष्ट सामग्री को प्रकाशित करने और प्रसारित (ट्रांसमिट) करने से संबंधित है, 67B उपरोक्त समान स्थिति में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से संबंधित है। ये दोनों धाराएं 354 D(1)(i) के दायरे को कवर करती हैं।

पीछा करने के खिलाफ शिकायत कैसे पहचानें और दर्ज करें?

शारीरिक रूप से पीछा करना

इन प्रावधानों के आधार पर, कोई यह पहचान सकता है कि धारा 354D(1)(i) के तहत उनका किस तरह से पीछा किया जा रहा है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि पीछा करने की कुछ क्रियाओं के परिणामस्वरूप यौन-स्पष्ट प्रकृति का उत्पीड़न भी होता है, जिसे धारा 354A, 354B, 354C और 509 के तहत निर्धारित किया जाना चाहिए। यह समझना और निर्धारित करना महत्वपूर्ण है कि क्या आपके साथ हो रहे कार्य इस धारा के अनुसार है, अर्थात्:

  • यदि आपका पीछा किया जा रहा है या किसी व्यक्ति द्वारा संपर्क किया जा रहा है,
  • वह पुरूष व्यक्तिगत संपर्क बनाने के इरादे दिखाता है,
  • आपने अरुचि का संकेत दिया है,
  • पहचानें कि क्या पीछा करने के साथ-साथ कोई अन्य कार्य हो रहा है। उदाहरण के लिए, यौन उत्पीड़न, दृश्यरतिकता (सहमति के बिना तस्वीरें लेना), हमला करना, शब्दों या हरकतों से शील भंग करने की कोशिश करना और जबरदस्ती कपड़े उतारने की कोशिश करना।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि पीछा करने की कुछ क्रियाओं के परिणामस्वरूप यौन-स्पष्ट प्रकृति का उत्पीड़न भी होता है, जिसे धारा 354A, 354B, 354C और 509 के तहत निर्धारित किया जाना चाहिए।

  • इन कार्यों के खिलाफ नजदीकी पुलिस स्टेशन में एफ.आई.आर. या शिकायत दर्ज करें।
  • यदि आप अपने खुद के राज्य में नहीं हैं, तो एक शून्य प्राथमिकी (ज़ीरो एफ.आई.आर.) दर्ज की जा सकती है। एक शून्य प्राथमिकी आपको शिकायत दर्ज करने की अनुमति देती है, भले ही अपराध कही भी किया गया हो और बाद में ऐसी शिकायत को उस अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) के पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित कर दिया जाता है जहां अपराध किया गया है।
  • यह स्थापित करना कि अपराध संज्ञेय है या गैर-संज्ञेय है, यह समझने में मदद करता है कि अपराधी को गिरफ्तार करने के लिए अदालत की मंजूरी या वारंट की आवश्यकता होगी या नहीं।
  • चूंकि 354 D एक संज्ञेय अपराध है, तो पुलिस अपराधी को अदालत की मंजूरी के बिना गिरफ्तार कर सकती है, जिसके बाद जांच शुरू होती है।

साइबर स्टाकिंग

साइबर स्टॉकिंग को 354 D(1)(ii) के तहत निपटाया जाता है: तो सबसे पहले पहचानें और सुनिश्चित करें कि आप इस धारा में उल्लिखित अनिवार्यताओं के माध्यम से साइबर स्टॉकिंग का सामना कर रहे हैं।

  • यदि आपका पीछा किया जा रहा है या किसी व्यक्ति द्वारा संपर्क किया जा रहा है
  • वह पुरुष व्यक्तिगत संपर्क बनाने के इरादे दिखाता है,
  • आपने अरुचि का संकेत दिया है,
  • आपके इंटरनेट के उपयोग पर नज़र रखता है,
  • पहचानें कि क्या पीछा करने के साथ-साथ कोई अन्य कार्य हो रहा है। उदाहरण के लिए, यौन उत्पीड़न, दृश्यरतिकता (सहमति के बिना तस्वीरें लेना/प्रकाशित करना), शब्दों या इशारों से शील भंग करने की कोशिश करना, अश्लील साहित्य दिखाना या स्पष्ट सामग्री भेजना।
  • इंटरनेट से संबंधित आपराधिक गतिविधि, जो साइबर अपराध है, से निपटने वाले साइबर सेल में शिकायत दर्ज की जा सकती है।
  • शिकायत या तो ऑनलाइन या प्राथमिकी के जरिए दर्ज की जा सकती है।
  • गुमनाम रूप से शिकायत दर्ज करने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग के साथ एक ऑनलाइन शिकायत सेल का प्रावधान है जो फिर मामले को स्थानीय पुलिस को भेज देता है।
  • सोशल मीडिया ऐप्स और साइटें ऐसी किसी भी गतिविधि की रिपोर्ट करने का विकल्प प्रदान करती हैं जिसे स्पष्ट जानकारी माना जाता है जो आपत्तिजनक हो सकती है। यह विकल्प दिशानिर्देश नियम (इंटरमीडियर गाइडेंस रूल), 2011 के अनुसार 36 घंटों के भीतर आपत्तिजनक जानकारी को हटाने में मदद करता है।

किसी भी तरह का पीछा करने के लिए दायर की गई शिकायतो को मानने से अगर मना कर दिया जाता है तो पीड़ित सीधे न्यायिक मजिस्ट्रेट से कानूनी सहायता ले सकता है। दर्ज की गई शिकायत को, पीड़ित की पहचान को भी गोपनीय रखना चाहिए।

साइबर स्टॉकिंग की रोकथाम

साइबर स्टॉकिंग को रोकने के लिए यहां कुछ सुझाव दिए गए हैं:

  • यह सलाह दी जाती है कि अपने सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत विवरण जैसे फोन नंबर, ई मेल या घर के पते का खुलासा करने से बचना चाहिए।
  • व्यक्तिगत और पेशेवर ऑनलाइन उपस्थिति के लिए अलग-अलग अकाउंट होने से बहुत सारे जोखिम कम हो जाते हैं।
  • यह सुनिश्चित करना कि आपके उपकरणों (डिवाइस) का जी.पी.एस. बंद है और साथ ही जब भी आवश्यकता न हो, लाइव स्थानों को साझा न करना, सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।
  • निजता सेटिंग्स की जाँच करने और अज्ञात कॉल या संदेशों का जवाब न देने की सलाह दी जाती है।
  • वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क के साथ अपने आई.पी.पते को सुरक्षित रखें, अपने उपकरणों में एंटी-वायरस सॉफ़्टवेयर स्थापित करने से भी मदद मिलती है।

आई.पी.सी. की धारा 354 D से संबंधित महत्वपूर्ण मामले

सबसे अधिक विचार किए जाने वाले मामलों में से एक, जिसमें प्रावधान 354 D लागू किया गया था वह: संतोष कुमार सिंह बनाम स्टेट थ्रू सी.बी.आई. (2010) का मामला है, जहां प्रियदर्शिनी मट्टू, एक 25 वर्षीय कानून की छात्रा का पीछा किया गया था, उसके साथ बलात्कार किया गया और उसकी नई दिल्ली में उसके आवास पर हत्या कर दी गई थी। कानून के तीसरे वर्ष की छात्रा का कई बार पीछा किया गया था और एक पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी के बेटे संतोष सिंह, जो दिल्ली में कैंपस लॉ सेंटर में उससे बड़ा था, के द्वारा उसे परेशान किया गया था। उसके खिलाफ पीछा करने, परेशान करने, धमकी देने और अश्लील अनुरोध करने के कई मामलों में उसके खिलाफ शिकायतें दर्ज की गईं थी। मौरिस नगर पुलिस स्टेशन में धारा 354 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी, अपराधी को गिरफ्तार कर जमानत पर रिहा कर दिया गया था। विश्वविद्यालय के डीन के पास शिकायत दर्ज कराई गई थी, जिन्होंने आरोपी को ऐसी गतिविधियां न करने के लिए कहा, स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पीड़ित को व्यक्तिगत सुरक्षाकर्मी भी सौंपे गए था।

23 जनवरी 1996 को जब कानूनी समझौता करने के कारण पीड़िता घर पर अकेली थी, तो अपराधी ने उसके साथ मारपीट की। फिर उसने अपने हेलमेट से उसे 14 बार मारा, उसके साथ बलात्कार किया और तार से गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी। मुकदमे की सुनवाई निचली अदालत ने की और आरोपी को संदेह का लाभ दिया गया क्योंकि सी.बी.आई. ने झूठे सबूत बनाए थे, और कानून की प्रक्रियाओं के अनुसार सबूत एकत्र नहीं किया गए थे।

जब इस मामले को उच्च न्यायालय में उठाया गया तो आरोपी को मृत्युदंड दिया गया, जिसे बाद में 10 दिसंबर को उच्चतम न्यायालय ने आजीवन कारावास की सजा में कम कर दिया था।

श्री देउ बाजू बोडके बनाम स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र (2016) के मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक महिला द्वारा आत्महत्या के मामले पर निर्णय लिया था, जिसने अपनी आत्महत्या का कारण यह बताया था कि अपराधी द्वारा उसका लगातार उत्पीड़न और पीछा किया जा रहा था। जब वह काम पर थी तब न केवल आरोपी ने उसे परेशान किया और उसका पीछा किया, बल्कि उसकी अनिच्छा और असहमति के बावजूद उससे शादी करने की भी मांग की। उच्च न्यायालय ने आरोपी को दंडित करने के लिए आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के साथ-साथ धारा 354 D दर्ज करना अनिवार्य बताया था।

अरविंद कुमार गुप्ता बनाम स्टेट 2018, के मामले में, एक व्यक्ति, एक महिला के पीछे उसके कार्यालय तक पहुंच गया और जब तक वह काम से नहीं लौटती, वह उसकी बगल में ही खड़ा रहता था। यह एक साल तक जारी रहा जब तक कि महिला के भाई ने उस आदमी का सामना नहीं किया जिसने कहा कि लड़की ने उसे किसी की याद दिला दी और वह उससे शादी करने का इरादा रखता है। महिला ने एक प्राथमिकी दर्ज की और मुकदमे में वह व्यक्ति अपना बचाव नहीं कर सका। अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) पक्ष यह साबित करने में सक्षम था कि महिला के द्वारा दिलचस्पी न लेने के बाद भी लगातार उसका पीछा किया गया था। अदालत द्वारा यह निर्णय लिया गया था कि धारा 354 D(1)(i) के तहत वह पुरुष, महिला का पीछा करने का दोषी है, वह बिना किसी संदेह के उसकी असहमति व्यक्त करने के बाद भी उससे बातचीत करना चाहता था। अदालत ने उसे साधारण कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी।

आई.पी.सी. की धारा 354 D का विश्लेषण एनालिसिस

धारा 354 D, हालांकि ज्यादा से ज्यादा हद तक पीछा करने पर चर्चा करती है, लेकिन यह केवल महिलाओं के साथ ही होने वाले पीछा करने के अपराध का प्रावधान करती है। पीछा करने का अपराध, एक ऐसा अपराध है जो कभी भी किसी के भी साथ हो सकता है और तकनीक के आविष्कार के बाद से सभी लिंग के लोग संचार के माध्यम से किए जा रहे अपराध के शिकार हो सकते हैं। तो यहां पर इस प्रावधान को और अधिक लिंग-समावेशी (जेंडर इन्क्लूसिव) बनाने की बात उठती है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 354 D के तहत पीछा करना पहली बार में एक जमानती अपराध है जिसका मतलब है कि आरोपी जमानत पर जाने के लिए स्वतंत्र है। ऐसी जमानत के लिए न्यायालय द्वारा अनुमोदित (अप्रूव) होना आवश्यक नहीं है; न ही आरोपी को अदालत के सामने पेश होने की जरूरत है। जबकि वास्तव में इसे गैर-जमानती बनाने की अत्यधिक आवश्यकता है क्योंकि इसका अक्सर पुरुषों द्वारा दुरुपयोग किया जाता है। पीछा करना न केवल अपने आप में एक अपराध है बल्कि यह कुछ अन्य अपराधों का भी कारण है, जिनमें सबसे अधिक यौन उत्पीड़न होता है। उपरोक्त मामलों से पता चलता है कि पीछा करने से बलात्कार सहित महिलाओं के खिलाफ कई गंभीर अपराध हो सकते हैं।

महिला को प्रताड़ित किया जाता है, यौन अश्लील टिप्पणियों से बुलाया जाता है, छेड़ा जाता है, यौन संबंध बनाने और मांग के लिए कहा जाता है। चूंकि इंटरनेट की पीढ़ी तेज है, इसलिए पीछा करने का अपराध जिससे यौन उत्पीड़न होता है, यह ऑनलाइन मोड में काफी प्रचलित (प्रीवेलेंट) है। ऐसे सभी कार्यों का महिला के आत्म-सम्मान, स्वतंत्र होने के आत्म विश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। महिलाओं के खिलाफ अधिकांश अपराध पीछा करने से शुरू होते हैं और गंभीर अपराधों की ओर बढ़ते हैं, विशेष रूप से इस गुस्से से कि पीड़िता ने मामला दर्ज कराया है। पीछा करने वाले को गिरफ्तार होने के बावजूद जमानत पर स्वतंत्र रूप से घूमने की अनुमति दी जाती है।

आई.पी.सी. की धारा 354 D की आलोचना (क्रिटिसिज्म)

जबकि राष्ट्रीय अपराध रिपोर्ट ब्यूरो ने अनुमान लगाया है कि 2017 में अपराध के रूप में पीछा करना तेजी से बढ़ा है, केवल 26% सजा दर के साथ कोई मदद नहीं कर सकता है, लेकिन विश्लेषण करें की पीछा करने से रोकने के लिए पर्याप्त कानून हैं। भारतीय दंड संहिता, 1860, सूचना और प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के साथ पीछा करने के लिए सजा का प्रावधान करती है, हालांकि रोकथाम के बारे में कोई चर्चा नहीं हुई है। यह इंगित करता है कि आपराधिक न्याय प्रणाली को सुरक्षात्मक तरीके के बजाय महिलाओं से संबंधित प्रावधानों को निवारक तरीके से देखने की आवश्यकता है। अर्थात बुराई को जड़ से खत्म करने की आवश्यकता है।

ऐसे कार्यों को मजबूत करने की आवश्यकता है जो एक अपराध के रूप में पीछा करने के तहत आते हैं क्योंकि यह केवल एक महिला का पीछा करने और उसके असहमति व्यक्त करने पर भी उसके साथ संपर्क स्थापित करने की कोशिश करने की बात करता है। इसमें उन कार्यों के बारे में कुछ भी उल्लेख नहीं किया गया है जो पीछा कर सकते हैं या पीछा करने का एक तरीका है जैसे, किसी व्यक्ति को घूरना, झूठी अफवाहें फैलाना, कॉल करना या किसी व्यक्ति के निवास के आसपास छिपना।

निष्कर्ष

भारतीय दंड संहिता ने महिलाओं के लिए प्रावधानों की रूपरेखा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संहिता सभी उम्र की महिलाओं के खिलाफ सभी अपराधों को कवर करने का प्रयास करती है, जन्म के पूर्व चरण से लेकर बचपन, किशोरावस्था, प्रजनन (रिप्रोडक्टिव) आयु और बुजुर्ग महिलाओं के खिलाफ अपराध, उदाहरण के लिए, विधवाओं के उत्पीड़न के कई मामले सामने आए हैं।

पीछा करने के ज्यादातर मामलों पर किसी का ध्यान नहीं जाता है क्योंकि महिलाएं घूमने-फिरने में सक्षम होने की स्वतंत्रता को जोखिम में नहीं डालना चाहती हैं और कई प्रत्यक्षदर्शी (आईविटनेसेज) इसे अनदेखा कर देते हैं, इन सब ने अपराध को गंभीरता से नहीं लिया है, भले ही इसे दंडित करने का प्रावधान हो। अपराध की रिपोर्ट करने के लिए धारा 354 D लागू करने या पीछा किए जाने की स्थितियों में प्रतिक्रिया करने के बारे में जागरूकता और शिक्षा के साथ, एक प्राथमिकी दर्ज करने और सही अधिकारियों से संपर्क करने के द्वारा, एक बदलाव लाया जा सकता है।

संदर्भ

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