बिपिनचंद्र जयसिंहभाई शाह बनाम प्रभावती (1957)

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यह लेख Subhangee Biswas द्वारा लिखा गया है। इस लेख में वैवाहिक कानून, विशेष रूप से परित्याग (डीजर्शन) के आधार पर तलाक की पृष्ठभूमि में बिपिनचंद्र जयसिंहभाई शाह बनाम प्रभावती (1957) के फैसले पर चर्चा की गई है। इस लेख में मामले के तथ्यों और पृष्ठभूमि को बताते हुए, उठाए गए मुद्दों और पक्षों द्वारा प्रस्तुत किए गए विवादों को शामिल किया गया है, साथ ही मामले से संबंधित कानूनी पहलुओं की व्याख्या की गई है। अंत में, लेख सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के साथ समाप्त होता है, जो पूरे फैसले में एक निष्कर्ष जोड़ता है। इस लेख का अनुवाद Revati Magaonkar द्वारा किया गया है। 

Table of Contents

परिचय

भारत में विवाह को पवित्र माना जाता है। समय के साथ, समाज में तलाक को भी स्वीकार किया जाने लगा है। वर्तमान में, सभी कानूनी प्रणालियाँ कुछ आधारों पर तलाक का दावा करने का अधिकार प्रदान करती हैं। भारत में तलाक एक लंबी और समय लेने वाली प्रक्रिया है क्योंकि न्यायपालिका हमेशा विवाह को बचाने का प्रयास करती है। यह केवल तभी होता है जब विवाह पूरी तरह से टूट चुका हो या मजबूत आधार साबित हो गए हों जो विवाह के अस्तित्व को असंभव बनाते हैं, तब न्यायालय पक्षों को तलाक देता है। 

सभी वैवाहिक कानूनों के तहत परित्याग तलाक का आधार है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955, की धारा 13(1) के तहत परित्याग को तलाक के आधार के रूप में मान्यता दी गई है। सरल शब्दों में परित्याग का अर्थ है त्याग। हम इस लेख के आगे के भाग में इस शब्द को विस्तार से समझेंगे। 

यदि कोई व्यक्ति अपने जीवनसाथी को, बिना किसी कारण के और दूसरे की सहमति के बिना, काफी लम्बे समय के लिए छोड़ देता है, तो छोड़ा गया जीवनसाथी उस आधार पर तलाक का दावा कर सकता है, बशर्ते कि वह कानून के तहत दूसरे जीवनसाथी की ओर से वैध परित्याग को साबित कर सके। 

बिपिनचंद्र जयसिंहभाई शाह बनाम प्रभावती (1957) का वर्तमान मामला भारतीय परिवार और वैवाहिक कानून में एक ऐतिहासिक मामला है। यह मामला अनिवार्य रूप से परित्याग की अवधारणा से संबंधित है। इस मामले में, वादी ने अपनी पत्नी की ओर से परित्याग के आधार पर तलाक का दावा किया था, लेकिन वह परित्याग के आवश्यक तत्वों, विशेष रूप से, परित्याग के इरादे, जिसे लैटिन में एनिमस रिवर्टेंडी भी कहा जाता है, इसके अस्तित्व को साबित करने में विफल रहा। इसी कारण स्वरूप, सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को खारिज कर दिया और वादी को तलाक देने से इनकार कर दिया।

इस मामले ने इस तथ्य का एक उदाहरण प्रस्तुत किया कि यदि कोई पति या पत्नी वैवाहिक घर छोड़ने या त्यागने के इरादे से निकलता है, लेकिन बाद में वापस आने की इच्छा रखता है या इच्छा प्रदर्शित करता है, और यदि उन्हें पति या पत्नी द्वारा वापस आने से रोका जाता है तो उन्हें परित्याग का दोषी नहीं माना जाएगा। आइए इस मामले पर विस्तार से चर्चा करें।

मामले का विवरण

  • मामले का नाम: बिपिनचंद्र जयसिंहभाई शाह बनाम प्रभावती।
  • मामले का अनुक्रमांक: दिवानी अपील संख्या 247/1953.
  • मामले का उद्धरण (सायटेशन): 1957 एआईआर 176, 1956 एससीआर 838।
  • संबंधित कानून: बॉम्बे हिंदू तलाक अधिनियम, 1947 की धारा 3(1)(D)।
  • न्यायालय: सर्वोच्च न्यायालय।
  • पीठ: न्यायमूर्ति भुवनेश्वर पी. सिन्हा, न्यायमूर्ति बी. जगन्नाथदास और न्यायमूर्ति टी.एल. वेंकटराम अय्यर।
  • वादी: बिपिन चंद्र जयसिंहभाई शाह।
  • प्रतिवादी: प्रभावती
  • निर्णय की तिथि: 19.10.1956.
  • अंतिम निर्णय: अपील खारिज कर दी गई।

बिपिनचंद्र जयसिंहभाई शाह बनाम प्रभावती (1957) के तथ्य 

वादी और प्रतिवादी का विवाह जैन समुदाय के हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार 20 अप्रैल 1942 को हुआ था। दोनों पक्ष और उनके परिवार गुजरात के पाटन शहर से ताल्लुक रखते हैं। दोनों पक्ष मुंबई में वादी के परिवार के साथ रहते थे, जिसमें वादी के माता-पिता और दो बहनें शामिल थीं। प्रतिवादी के माता-पिता मुंबई के पूर्वी खानदेश जिले में रहते थे। दोनों पक्षों को अपनी शादी से एक बच्चा हुआ जिसका नाम किरीत रखा गया, जिसका जन्म 10 सितंबर 1945 को हुआ। महेंद्र नाम का एक तीसरा पक्ष, जो एक पारिवारिक मित्र था, सेना से छुट्टी मिलने के बाद 1946 में वादी के परिवार के साथ उनके मुंबई के घर में रहने लगा। वादी 8 जनवरी 1947 को व्यापार के लिए इंग्लैंड चला गया। 

वादी ने आरोप लगाया कि जब वह मुंबई मे अनुपस्थित था, तो उसकी पत्नी यानी प्रतिवादी, महेंद्र के साथ अंतरंग (इंटीमेट) हो गई। जब प्रतिवादी वादी के जाने के बाद पाटन आई, तब भी वह महेंद्र के संपर्क में रही, जो वादी के परिवार के साथ मुंबई में ही रहा।

वादी 20 मई 1947 को मुंबई वापस लौटा। प्रतिवादी सहित उसका पूरा परिवार उसे लेने गया था। उसके आने पर वादी के पिता ने वादी को एक पत्र सौंपा, जिसकी लिखावट प्रतिवादी की लिखावट से मिलती-जुलती थी। यह पत्र प्रतिवादी ने महेंद्र को अप्रैल 1947 में लिखा था, जब वह पाटन में वादी के घर में अपनी सास के साथ रह रही थी।

वादी ने अपनी पत्नी से इस विषय के संदर्भ बात करने का फैसला किया। उसने पत्र की छायाप्रति (फोटोकॉपी) करवाने के लिए एक छायाचित्रकार (फोटोग्राफर) को पत्र सौंप दिया। उसी दिन शाम को उसने पत्र के बारे में अपनी पत्नी से बात की, जिसे उसने पहले तो नकार दिया। उसने उसे पत्र की छायाप्रति करवाने के बारे में बताया। छायाप्रति मिलने के बाद उसने अपनी पत्नी को पत्र की छायाप्रत दिखाई। वादी ने आरोप लगाया कि इस समय पत्नी यानी प्रतिवादी ने पत्र लिखने की बात स्वीकार की। उसने आगे दावा किया कि महेंद्र एक बेहतर इंसान था और वे एक-दूसरे से प्यार करते थे।

24 मई 1947 की सुबह, जब वादी अपने कार्यालय जा रहा था, प्रतिवादी ने उसे बताया कि उसे जलगांव जाना है, क्योंकि उसके पिता के परिवार में शादी होने वाली है। वादी ने उसे कार भेजने और उसके खर्च का भुगतान करने की पेशकश की, लेकिन उसने इनकार कर दिया।

जब वादी अपने कार्यालय में था, तब प्रतिवादी जलगांव के लिए रवाना हो गयी वादी का दावा है कि जब वह वापस आया, तो उसने पाया कि प्रतिवादी अपने साथ सब कुछ ले गई थी और पीछे कुछ भी नहीं छोड़ा। वादी के बेटे किरीत को वादी की मां के साथ कुछ दिन पहले पाटन ले जाया गया था। वादी का आरोप है कि प्रतिवादी उसके पास कभी वापस नहीं आई, उससे संपर्क नहीं किया, या जलगांव से उसे कोई पत्र नहीं भेजा। इस बीच, वादी ने 15 जुलाई 1947 को अपने वकील के माध्यम से प्रतिवादी को संबोधित एक पत्र भेजा, जिसमें उस पर उसके और महेंद्र के बीच विकसित हुई अंतरंगता का आरोप लगाया गया और अपने बच्चे को वापस भेजने की मांग की गई।

नवंबर 1947 में वादी की मां पाटन से वापस आई और वादी को बताया कि प्रतिवादी कुछ दिनों में वापस आ सकती है। वादी ने नवंबर 1947 में अपने ससुर को एक टेलीग्राम भेजा, जिसमें उनसे प्रतिवादी को वापस न भेजने के लिए कहा गया। 

वादी ने एक पत्र प्रस्तुत किया, जो उसने कथित तौर पर 13 नवंबर 1947 को अपने ससुराल वालों को लिखा था। वादी ने पत्र के माध्यम से वर्तमान स्थिति और अपने बच्चे की खातिर सुलह करने के अपने प्रयासों को भी बताया था। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उन्हें प्रतिवादी की वापसी पर कोई आपत्ति नहीं है और अगर उसे अपनी गलती का एहसास होता है और वह पश्चाताप करती है तो वह उसे व्यक्तिगत रूप से वापस लाने के लिए तैयार है। हालांकि, प्रतिवादी और उसके पिता दोनों ने ऐसा कोई पत्र प्राप्त होने की बात से इनकार किया।

दो दिन बाद, वादी के पिता ने प्रतिवादी के पिता को एक पत्र लिखा जिसमें बताया गया कि दोनों पक्षों की माताओं ने प्रतिवादी को वापस मुंबई भेजने के बारे में बातचीत की थी, साथ ही इस तथ्य का भी उल्लेख किया कि वादी ने 13 नवंबर को एक टेलीग्राम भेजा था। आगे यह भी उल्लेख किया गया कि प्रतिवादी को मुंबई वापस भेजने से पहले वादी की सहमति लेना “बिल्कुल आवश्यक” था। हालाँकि, इस पत्र का भी कोई उत्तर नहीं मिला। 

वादी ने 4 जुलाई 1951 को मुंबई उच्च न्यायालय में इस आधार पर शिकायत दर्ज कराई कि प्रतिवादी ने 24 मई 1947 से उसे बिना किसी उचित कारण के, उसकी सहमति के बिना और उसकी इच्छा के विरुद्ध चार साल से अधिक समय तक छोड़ दिया है। उन्होंने विवाह विच्छेद (डिजोल्यूशन) के लिए डिक्री की मांग की और अपने नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा (कस्टडी) की भी मांग की।

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उठाया गया मुद्दा

  • क्या प्रतिवादी ने वादी को उसने मुकदमा दायर करने से पहले लगातार चार वर्षों तक छोड़ रखा था?

पक्षों द्वारा प्रस्तुत तर्क 

वादी 

  • वादी ने दलील दी कि इस तथ्य पर विचार करते हुए कि प्रतिवादी ने 24 मई 1947 को बिना किसी उचित कारण या वादी की सहमति के अपने वैवाहिक घर को छोड़ दिया था, तथा उसके बाद चार वर्षों से अधिक समय तक अपने वैवाहिक घर में वापस नहीं लौटी, इसलिए वह परित्याग की दोषी है। 
  • वादी ने प्रतिवादी से वापस लौटने के लिए कहा, लेकिन प्रतिवादी ने मना कर दिया। मई 1948 में, वह पाटन गया और वहाँ प्रतिवादी से मिला। उसने उससे कहा कि अगर वह अपने बच्चे और खुद के हित में अपने किए पर पश्चाताप करती है, तो वह उसके पास वापस आ सकती है और फिर से साथ रह सकती है। इस पर, प्रतिवादी ने कथित तौर पर जवाब दिया था कि, अपने पिता और समुदाय के दबाव के कारण, उसने वापस जाने पर विचार किया लेकिन फिर ऐसा न करने का फैसला किया। 
  • वादी ने आगे तर्क दिया कि वे दूसरी बार 1948 के उत्तरार्ध (लैटर हाफ) में यह जानते हुए कि प्रतिवादी टाइफाइड से पीड़ित थी इसलिए उससे पाटन में मिलने गए थे। इस दौरान भी, प्रतिवादी ने वादी के पास वापस न लौटने की इच्छा व्यक्त की।
  • वादी ने तर्क दिया कि वे तीसरी और अंतिम बार अप्रैल-मई 1949 में जलगांव में मिले थे, जहां प्रतिवादी ने वादी के अनुरोध को फिर से अस्वीकार कर दिया जब उसने उसे कम से कम अपने बच्चे की खातिर वापस आने के लिए कहा।

प्रतिवादी 

प्रतिवादी के मामले को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा संक्षेपित किया जा सकता है:

  • प्रतिवादी ने 4 फरवरी, 1952 को दायर लिखित बयान में तर्क दिया कि वादी द्वारा इंग्लैंड से लौटने के बाद उसके साथ किए गए व्यवहार के कारण जिससे उसका जीवन असहनीय हो गया था उसे अपनी इच्छा के विरुद्ध अपना वैवाहिक घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। उसने आगे कहा कि वह वैवाहिक घर छोड़ना नहीं चाहती थी, न ही वह अपने पति को छोड़ने का इरादा रखती थी।
  • प्रतिवादी ने अपने और महेंद्र के बीच किसी भी तरह के अंतरंग संबंध से इनकार किया; बल्कि, उसने महेंद्र के साथ भाई-बहन जैसा रिश्ता होने का दावा किया। उसने वादी द्वारा लिखे गए पत्र को लेकर किसी भी तरह के टकराव/विवाद की घटना से भी इनकार किया।
  • प्रतिवादी ने वकील का पत्र प्राप्त करने की बात स्वीकार की तथा यह भी स्वीकार किया कि उसने अपने पिता की सलाह पर पत्र का उत्तर नहीं दिया। 
  • प्रतिवादी ने कहा कि उसके मामा और उनके बेटे ने मुंबई में वादी से मुलाकात कर प्रतिवादी को वापस ले जाने का अनुरोध किया था, जिसे वादी ने अस्वीकार कर दिया था। 
  • प्रतिवादी ने आगे कहा कि वह वादी की मां के साथ या उनके मुंबई लौटने के कुछ दिनों बाद मुंबई लौटने के लिए सहमत हो गई थी। लेकिन नवंबर 1947 में वादी द्वारा भेजे गए टेलीग्राम और वादी के पिता के 15 नवंबर 1947 के पत्र के कारण उसने अपना मन बदल लिया। हालांकि, प्रतिवादी और उसके पिता दोनों ने वादी से 13 नवंबर, 1947 का पत्र मिलने से इनकार किया।
  • प्रतिवादी ने कहा कि वह हमेशा वापस लौटने के लिए तैयार और इच्छुक थी, लेकिन वादी लगातार उसे वापस स्वीकार करने या उसके साथ रहने से इनकार कर रहा था। उसने कहा कि उसके और वादी के बीच जो तीन मुलाकातें हुईं, वे इसलिए हुईं क्योंकि वादी बच्चे को ले जाना चाहता था और उसे वापस घर नहीं ले जाना चाहता था।
  • प्रतिवादी ने तर्क दिया कि वह और उसका बेटा किरीत बीच-बीच में कुछ अंतराल के साथ चार महीने से अधिक समय तक पाटन में वादी के परिवार के साथ रहे।

बिपिनचंद्र जयसिंहभाई शाह बनाम प्रभावती (1957) की पृष्ठभूमि  

बॉम्बे उच्च न्यायालय में एकल न्यायाधीश पीठ के समक्ष सुनवाई

विचारणीय न्यायालय ने उपर बताए गए मुद्दे पर सकारात्मक जवाब दिया और वादी के पक्ष में तलाक का आदेश पारित कर दिया। 

विचारणीय न्यायालय ने पाया कि महेंद्र को संबोधित प्रतिवादी द्वारा लिखा गया पत्र प्रेम पत्र जैसा प्रतीत होता है। न्यायालय ने पत्र की व्याख्या की और निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादी ने महेंद्र के साथ दुर्व्यवहार किया होगा और बाद में उसे दोषी महसूस हुआ होगा। 

गवाहों के कठघरे में पक्षों की गवाही के संबंध में, वादी की गवाही पर भरोसा किया गया। इस प्रकार, न्यायालय ने माना कि विरक्ती/एनिमस डेसेरेन्डी की उपस्थिति में परित्याग हुआ था, जिसका अर्थ है कि परित्याग करते वक्त पति या पत्नी का वैवाहिक घर और विवाह छोड़ने का दृढ़ इरादा होना। प्रतिवादी अपने वैवाहिक घर में लौटने के अपने इरादे को साबित करने में विफल रही; इस प्रकार, यह देखा गया कि कोई एनिमस रिवर्टेंडी नहीं था, जिसका अर्थ है स्थानांतरित करने का इरादा नहीं था। हालाँकि, बच्चे की अभिरक्षा वादी को दिए जाने की प्रार्थना पर विचारणीय न्यायालय ने विचार नहीं किया।

मुंबई उच्च न्यायालय में खंडपीठ के समक्ष अपील

प्रतिवादी ने अपील दायर की, जिसकी सुनवाई न्यायमूर्ति सी. जे. चागला और न्यायमूर्ति भगवती की खंडपीठ ने की। खंडपीठ ने अपील स्वीकार कर ली और विचारणीय न्यायालय के फैसले को खारिज कर दिया। 

यह माना गया कि प्रतिवादी परित्याग का दोषी नहीं थी, और यह वादी ही था जिसने प्रतिवादी का परित्याग किया था। वादी की ओर से 15 जुलाई 1947 को वकील द्वारा जारी किए गए पत्र से भी इसकी पुष्टि होती है।

अपीलीय न्यायालय ने यह भी कहा कि भले ही यह मान लिया जाए कि 24 मई को हुई घटना के परिणामस्वरूप प्रतिवादी ने अभियोग त्याग दिया था, लेकिन वादी द्वारा अपने वकील के माध्यम से 15 जुलाई 1947 को लिखे गए पत्र से परित्याग समाप्त हो गया। 

महेंद्र को संबोधित प्रतिवादी द्वारा लिखा गया पत्र वादी के मन में अपनी पत्नी के अपराध के बारे में कोई उचित संदेह पैदा करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं था। इसके अलावा, प्रतिवादी के मौखिक साक्ष्य से यह साबित हो गया कि पत्नी अपने पति के पास वापस जाने को तैयार थी, लेकिन पति उसे वापस न लेने पर अड़ा था।

उच्च न्यायालय में अपील करने की अनुमति

वादी ने मुंबई उच्च न्यायालय में एक आवेदन दायर किया। वादी द्वारा अपील की अनुमति के लिए आवेदन को मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति दीक्षित की खंडपीठ ने अस्वीकार कर दिया। इसके कारण वादी ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

निर्णय 

सर्वोच्च न्यायालय ने मुंबई उच्च न्यायालय की खंडपीठ के निर्णय को बरकरार रखा। इसने माना कि प्रतिवादी परित्याग की दोषी नहीं थी और वादी प्रतिवादी के खिलाफ परित्याग का अपना मामला साबित करने में विफल रहा। चूंकि परित्याग का कोई मामला नहीं था, इसलिए न्यायालय ने “इरादे” के अस्तित्व की जांच करने से इनकार कर दिया और वादी द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में पहले से ही दो अदालतों द्वारा लिए गए विपरीत विचारों के कारण निर्णय लेने में बढ़ी हुई कठिनाई की ओर इशारा किया था। दोनों ही निर्णय वादी और प्रतिवादी की मौखिक गवाही पर बहुत हद तक निर्भर थे, और कई स्थितियों में, और उसमे गवाही की पुष्टि नहीं की गई थी। 

पत्र लिखने में प्रतिवादी का दोषी इरादा

प्रतिवादी ने जिरह (क्रॉस एग्जामिनेशन) के दौरान महेंद्र को पत्र लिखने की बात स्वीकार की थी। प्रतिवादी ने आगे कहा कि वह महेंद्र को प्रेमी नहीं बल्कि भाई मानती है। हालांकि, प्रतिवादी कुछ वाक्यांशों जैसे “ऐसा मामला” और “मुझे बाद में अपने मन में बहुत पछतावा हुआ” के इस्तेमाल के लिए औचित्य प्रदान करने में विफल रही। इसके अलावा, उसने स्वीकार किया कि पत्र लिखते समय उसने यह सुनिश्चित किया कि कोई भी उसे ऐसा लिखते हुए न देख ले। वह पत्र के बारे में इस्तेमाल किए गए शब्दों के अर्थ के बारे में उत्तर देने में विफल रही।

फिर, प्रतिवादी ने महेंद्र से कम से कम एक पत्र प्राप्त करने की बात भी स्वीकार की। हालांकि यह संदेह था कि उसे और भी पत्र मिले थे, लेकिन उसने कहा कि उसने कोई भी पत्र सुरक्षित नहीं रखा। 

सर्वोच्च न्यायालय ने उचित स्पष्टीकरण के अभाव में यह अनुमान लगाया कि पत्र को पढ़ने वाला कोई भी व्यक्ति इस धारणा के तहत होगा कि प्रतिवादी और महेंद्र के बीच कुछ ऐसा था जिसे वह गुप्त रखना चाहती थी। न्यायालय ने पत्र के संबंध में प्रतिवादी की गवाही को बदनाम करने के विचारणीय न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा। सर्वोच्च न्यायालय ने सहमति व्यक्त की कि पत्र ने प्रतिवादी और महेंद्र के बीच पत्राचार को साबित कर दिया और उसके स्पष्टीकरण को खारिज कर दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने वादी की प्रतिक्रिया का समर्थन किया और उसके कार्यों को सही माना, यह मानते हुए कि उसका संदेह स्वाभाविक था और इसलिए उसका विरोध भी स्वाभाविक था। यह स्वीकार किया गया कि पत्र ने वादी को अपनी पत्नी से सवाल करने पर मजबूर किया, और इसके कारण वादी ने उसी के बारे में पूछताछ की, और जवाब में, उसकी पत्नी ने कबूल किया कि वह महेंद्र से प्यार करती है और उसे वादी से बेहतर आदमी मानती है।  

अदालत ने आगे कहा कि प्रतिवादी पत्र के संबंध में दोषी है, और यह इस तथ्य से साबित होता है कि शुरू में उसने पत्र लिखने से इनकार किया था। दूसरी ओर, वादी ने सबूत के तौर पर पत्र की एक छायाप्रती पेश की, और तब प्रतिवादी ने पत्र लिखने की बात स्वीकार की।

हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने पत्र में लिखी गई बातो से एकमात्र व्याख्या निकालने के विचारणीय न्यायालय के मत से सहमति नहीं जताई, जो यह है कि प्रतिवादी ने वादी की अनुपस्थिति में महेंद्र के साथ दुर्व्यवहार करने के बाद खुद को दोषी महसूस किया। न्यायालय ने बताया कि यह तथ्य कि एक विवाहित महिला ने दूसरे पुरुष को ऐसे पत्र लिखे हैं, पति के लिए पत्नी की बेवफाई पर संदेह करने के लिए पर्याप्त है। न्यायालय ने माना कि वादी ने अपने कार्यों में न्यायोचित कदम उठाया।

इसके बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने अपीलीय न्यायालय की टिप्पणियों की जांच की। न्यायालय ने अपीलीय न्यायालय से इस बात पर सहमति नहीं जताई कि पत्र को दो विवाहित व्यक्तियों के बीच “अध्यात्मिक प्रेम” के सबूत के रूप में माना जाए, जो अपने वैवाहिक दायित्वों से बंधे हुए हैं और इस प्रकार केवल एक-दूसरे के प्रति प्रेम और समर्पण दिखाना चाहते हैं। न्यायालय ने अपीलीय न्यायालय से इस बात पर भी असहमति जताई कि वादी पक्ष ने ऐसे प्रश्न पूछे थे जिनसे पता चलता था कि प्रतिवादी ने महेंद्र के साथ संभोग किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया कि मामला व्यभिचार (एडल्ट्री) से संबंधित नहीं था और यहां तक ​​कि अधिनियम भी व्यभिचार को तलाक के आधार के रूप में मान्यता नहीं देता है। हालांकि, जिरह में ऐसे प्रश्न पूछना उचित था क्योंकि वादी यह साबित करने की कोशिश कर रहा था कि ऐसे बयानों वाले पत्र की खोज ही वह कारण था जिसके कारण प्रतिवादी ने वादी को छोड़ने का फैसला किया।

प्रतिवादी की ओर से परित्याग साबित करने में वादी की विफलता

न्यायालय ने स्वीकार किया कि इस पृष्ठभूमि में, प्रतिवादी की स्वाभाविक प्रतिक्रिया भागना होती, इस तथ्य को देखते हुए कि उसका प्रेम पत्र उसके पति को मिल गया था। यद्यपि प्रतिवादी ने वादी की ओर से “रचनात्मक (कंस्ट्रक्टिव) परित्याग” के लिए दलील दी थी, लेकिन यह साबित नहीं हुआ क्योंकि वह अपने तर्क का समर्थन करने के लिए विश्वसनीय साक्ष्य प्रदान करने में विफल रही। उसके इस तर्क की पुष्टि न तो परिस्थितियों से हुई और न ही उसकी प्रत्यक्ष गवाही से। यहाँ तक कि उसके पिता और परिवार के अन्य सदस्यों ने भी उसका उल्लेख नहीं किया, यह कहते हुए कि वादी ने उसे जलगाँव आने पर घर से बाहर निकाल दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने लैंग बनाम लैंग (1955) के मामले का उल्लेख किया था और कहा था कि यदि वादी द्वारा प्रतिवादी को जबरन घर से बाहर निकाला जाता तो वादी-पति “रचनात्मक परित्याग” का दोषी होता। इस प्रकार, प्रतिवादी द्वारा “रचनात्मक परित्याग” का आरोप विफल हो गया। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वादी चार वर्षों की निरंतर अवधि के लिए प्रतिवादी द्वारा परित्याग को उचित संदेह से परे साबित करने में सफल रहा। 

इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि वादी ने प्रतिवादी के नाम से अपने वकील के माध्यम से एक पत्र भेजा था, जो किसी भी तरह से प्रतिवादी को वैवाहिक घर में वापस बुलाने के लिए वादी की इच्छा को नहीं दर्शाता है। परित्यक्त जीवनसाथी पति या पत्नी को वैवाहिक कर्तव्यों के अपने हिस्से को पूरा करने के लिए तैयार होना चाहिए, यह आवश्यक शर्तों में से एक वादी द्वारा पूरी नहीं की गई थी। पत्र में, वादी की ओर से यह स्पष्ट था कि वह प्रतिवादी को वैवाहिक घर में वापस ले जाने के लिए तैयार नहीं था।

अदालत ने उस घटना को याद किया जब वादी की मां पाटन से लौटी और प्रतिवादी के आने की सूचना दी। यह सुनकर, वादी ने एक टेलिग्राम भेजा, और उसके पिता ने भी एक पत्र भेजा, जिसमें दोनों ने उसे वापस लेने की अनिच्छा व्यक्त की। इन दोनों दस्तावेजों ने वादी की गवाही का खंडन किया, जिसने कहा कि वह प्रतिवादी को वापस लेने के लिए तैयार और इच्छुक था। हालांकि, यह भी बताया गया कि वादी का यह कथन कि वह प्रतिवादी से पश्चाताप दिखाने और उसे वापस लेने से पहले अपनी गलती स्वीकार करने की अपेक्षा करता है, जो दी गई परिस्थितियों में उचित है।

इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिवादी को वापस आने के लिए मनाने के लिए वादी द्वारा किए गए तीन प्रयासों की जांच की। हालांकि तीनों मुलाकातों को दोनों पक्षों ने स्वीकार किया था, लेकिन दोनों ने मुलाकात के उद्देश्य और उनके बीच हुई बातचीत के बारे में अलग-अलग बयान दिए हैं। जबकि वादी ने कहा कि वह उसे वापस लाने के लिए गया था, प्रतिवादी ने कहा कि वादी उनके बच्चे को ले जाने के लिए गया था। 

इस बिंदु पर, प्रतिवादी के चचेरे भाई और उसके पिता द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य को ध्यान में रखना आवश्यक समझा गया। उनके अनुसार, वादी से पत्र प्राप्त करने के बाद, वे दोनों मुंबई में वादी से मिलने गए और उनसे प्रतिवादी को वापस लेने का अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने उसे वापस न लेने की इच्छा व्यक्त की।

एक और घटना जो उजागर हुई वह यह थी कि प्रतिवादी अपने माता-पिता के साथ पाटन में वादी की मां से मिलने गई थी और चर्चा के बाद वे इस बात पर सहमत हुए थे कि प्रतिवादी को उसके ससुराल मुंबई वापस भेजने की व्यवस्था की जाए। लेकिन इस बारे में कोई भी कार्रवाई करने से पहले वादी की ओर से आए टेलीग्राम और पत्र के कारण इस विचार को छोड़ दिया गया।

प्रतिवादी के रिश्तेदारों के गवाहों ने उसके इस दावे की पुष्टि की कि वह हमेशा वापस जाने और वादी के साथ अपने वैवाहिक संबंध को फिर से शुरू करने के लिए तैयार थी। इसके अलावा, यह तथ्य कि वह वादी के परिवार के साथ, खासकर बच्चे के साथ पाटन में उसकी माँ के साथ रही, उसके मामले को और पुख्ता करता है।

यह भी कहा गया कि प्रतिवादी की सास ने प्रतिवादी को सलाह दी थी कि वह अपने बच्चे को वापस बॉम्बे भेज दे ताकि वादी को उसे वापस आने के लिए प्रेरित किया जा सके। बच्चे ने कुछ सप्ताह रहने के बाद अपनी माँ के बिना रहने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने आश्वासन दिया कि एक माँ अपने तीन साल के बच्चे को अकेले मुंबई जाने की अनुमति केवल इस उम्मीद में देगी कि इससे उसके और उसके पति के बीच सुलह हो सकती है। ऐसे सभी साक्ष्य इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि प्रतिवादी हमेशा से अपने वैवाहिक घर लौटने के लिए तैयार और इच्छुक थी।

प्रतिवादी के रिश्तेदारों द्वारा दिए गए गवाहों पर विश्वास किया गया क्योंकि उनका पक्षों के बीच सुलह के पक्ष में होना स्वाभाविक है। वादी के साक्ष्य अपुष्ट थे; अदालत में उसकी गवाही और उसके द्वारा भेजे गए पत्र एक दूसरे के विपरीत हैं। 

इस प्रकार, प्रतिवादी का मामला स्वीकार कर लिया गया क्योंकि वह अपने वैवाहिक घर में होने वाले समारोहों के पूरा होने के बाद अपने वैवाहिक घर में वापस आने के लिए तैयार और इच्छुक थी। यह माना गया कि भले ही पत्नी ने शारीरिक रूप से पति का घर छोड़ दिया था, लेकिन वह परित्याग में नहीं थी। यह भी स्वीकार किया गया कि प्रतिवादी ने अपने पति के घर वापस जाने के लिए कई प्रयास किए थे। दूसरी ओर, वादी अपनी पत्नी द्वारा परित्याग के मामले को साबित करने में विफल रहा। 

प्रासंगिक कानूनों पर चर्चा

पूरा मामला तलाक के लिए एक आधार के रूप में परित्याग के इर्द-गिर्द घूमता है। उस समय प्रचलित कानून के अनुसार, जो बॉम्बे हिंदू तलाक अधिनियम, 1947 है, प्रासंगिक धारा अधिनियम की धारा 3(1)(d) थी। आइए पहले अधिनियम की थोड़ी पृष्ठभूमि के बारे में जाने, फिर हम परित्याग की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

बॉम्बे हिंदू तलाक अधिनियम, 1947

यह उल्लेख करना उचित है कि बॉम्बे हिंदू तलाक अधिनियम, 1947, अब हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 द्वारा निरस्त (रिपील) कर दिया गया है। लेकिन जिस समय यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आया, उस समय बॉम्बे हिंदू तलाक अधिनियम, 1947 लागू था। 1947 के अधिनियम के प्रावधानों के संदर्भ हैं। यह अधिनियम केवल तत्कालीन मुंबई प्रांत में ही लागू था और वैवाहिक संबंधों से संबंधित कानूनों को बदलने की दिशा में पहला कदम था। 

अधिनियम की प्रस्तावना में कहा गया है कि अधिनियम का उद्देश्य “कुछ परिस्थितियों में हिंदुओं के सभी समुदायों के बीच तलाक का अधिकार प्रदान करना” है। अधिनियम की धारा 3 में तलाक के आधार बताए गए हैं। 

यह मामला मुख्य रूप से बॉम्बे हिंदू तलाक अधिनियम, 1947 की धारा 3(1)(d) पर आधारित है। धारा 3(1)(d) में अन्य आधारों के अलावा निम्नलिखित आधार शामिल हैं जिनके आधार पर पति या पत्नी तलाक के लिए मुकदमा कर सकते हैं:

“प्रतिवादी ने वादी को लगातार चार वर्षों तक त्याग दिया है।”

हिंदू विवाह अधिनियम के विपरीत, इस अधिनियम के तहत परित्याग की अवधि चार वर्ष है, और यह निरंतर होनी चाहिए। दूसरी ओर, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत यह प्रावधान है कि परित्याग कम से कम दो वर्ष की अवधि के लिए होना चाहिए। 

अधिनियम में धारा 2(b) के अंतर्गत तलाक के प्रयोजन के लिए “परित्याग” की परिभाषा के साथ-साथ “विवाह”, “पति” और “पत्नी” की परिभाषा भी दी गई है, जो इस प्रकार है:

  • परित्याग: परित्याग का अर्थ है बिना उचित कारण के और बिना सहमति के या जीवनसाथी की इच्छा के विरुद्ध परित्याग करना।”
  • विवाह: “हिंदुओं के बीच विवाह, चाहे इस अधिनियम के लागू होने से पहले हुआ हो या बाद में।”
  • पति: पति का तात्पर्य हिंदू पति से है।
  • पत्नी: पत्नी का तात्पर्य हिंदू पत्नी से है।

परित्याग का अर्थ

इस मामले में शामिल कानूनों को समझने के लिए, हमें “परित्याग” का अर्थ और सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में “परित्याग” की परिभाषा के संबंध में क्या उल्लेख किया है यह समझने की आवश्यकता है। 

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने परित्याग की परिभाषा के लिए दो पुस्तकों का हवाला दिया है। 

पहला है “रेडन ऑन डिवोर्स” (पृष्ठ 128, 6वां संस्करण (एडिशन)), जहाँ “परित्याग” को इस प्रकार परिभाषित किया गया है:

“एक पति या पत्नी का दूसरे से अलग होना, जिसमें परित्यक्त जीवनसाथी पति या पत्नी की ओर से बिना किसी उचित कारण के तथा दूसरे पति या पत्नी की सहमति के बिना सहवास को स्थायी रूप से समाप्त करने का इरादा हो; लेकिन एक पति या पत्नी द्वारा शारीरिक रूप से अलग होने का कृत्य आवश्यक रूप से उस पति या पत्नी को परित्यक्त जीवनसाथी पक्ष नहीं बनाता।”

इस परिभाषा से निम्नलिखित तत्व निकाले जा सकते हैं:

  1. एक पति या पत्नी का दूसरे से अलग होना,
  2. परित्याग करने वाले पक्ष में सहवास समाप्त करने का इरादा होना चाहिए,
  3. सहवास की समाप्ति एक स्थायी अवधि के लिए होती है,
  4. ऐसा इरादा बिना किसी उचित कारण के होना चाहिए,
  5. ऐसा करनेवाले पति या पत्नी सहवास की समाप्ति पर सहमति नहीं देते है।

दूसरी पुस्तक जिसका उल्लेख किया गया है वह है हैल्सबरी का इंग्लैंड के कानून (तीसरा संस्करण, खंड 12, पृष्ठ संख्या 241 से 243, पैराग्राफ 453 और 454), जो “परित्याग” को इस प्रकार परिभाषित करता है 

“अपने सार में, परित्याग का अर्थ है एक पति या पत्नी द्वारा दूसरे की सहमति के बिना और बिना किसी उचित कारण के जानबूझकर स्थायी रूप से त्यागना और छोड़ देना। यह विवाह के दायित्वों का पूर्ण खंडन है। इसमें शामिल परिस्थितियों और जीवन के तरीकों की विविधता को देखते हुए, न्यायालय ने परित्याग को परिभाषित करने के प्रयासों को हतोत्साहित किया है; क्योंकि यह सभी मामलों पर लागू होने वाला कोई सामान्य सिद्धांत नहीं है।

परित्याग किसी स्थान से दूर होना नहीं बल्कि किसी स्थिति से दूर होना है, क्योंकि कानून जो लागू करना चाहता है वह विवाहित राज्य के सामान्य दायित्वों की मान्यता और निर्वहन (डिस्चार्ज) है; चीजों की स्थिति को आमतौर पर संक्षेप में ‘घर’ कहा जा सकता है। पक्षो द्वारा पहले सहवास किए बिना या विवाह संपन्न हुए बिना परित्याग हो सकता है। 

जो व्यक्ति वास्तव में सहवास से पीछे हटता है, जरूरी नहीं कि वह परित्यागी पक्ष ही हो। यह तथ्य कि पति अपनी पत्नी को भत्ता देता है, जिसे उसने त्याग दिया है, यह परित्याग के आरोप का उत्तर नहीं है। 

परित्याग का अपराध आचरण का एक ऐसा तरीका है जो अपनी अवधि से स्वतंत्र रूप से अस्तित्व मे रहता है, लेकिन तलाक के आधार के रूप में, इसे याचिका की प्रस्तुति से ठीक पहले या जहां अपराध पार आरोप के रूप में प्रकट होता है, तब से कम से कम तीन साल की अवधि के लिए मौजूद होना चाहिए। तलाक के आधार के रूप में परित्याग व्यभिचार और क्रूरता के वैधानिक आधारों से अलग है, क्योंकि इससे परित्याग का अपराध होने के पीछे के कारण पूरी तरह से स्थापित नहीं होते है, बल्कि वे मुकदमा गठित होने तक अपूर्ण होते है। परित्याग एक सतत अपराध है ।

इस परिभाषा से निम्नलिखित तत्व निकाले जा सकते हैं:

  1. परित्याग जानबूझकर किया जाना चाहिए,
  2. यह स्थायी होना चाहिए,
  3. यह उनके पति या पत्नी की सहमति के बिना होना चाहिए,
  4. यह बिना किसी उचित कारण के होना चाहिए,
  5. इसमे वैवाहिक दायित्वों का पूर्णतः खंडन किया जाता है,
  6. परित्याग किसी वस्तुस्थिति से पीछे हटना है,
  7. तलाक के लिए आधार बनाने के लिए, तलाक के लिए याचिका प्रस्तुत करने से ठीक पहले कम से कम तीन साल तक परित्याग मौजूद होना चाहिए,
  8. परित्याग एक सतत अपराध है।

परिभाषा में यह भी उल्लेख किया गया है कि यह आवश्यक नहीं है कि परित्याग करने वाला पक्ष ही सहवास से पीछे हट जाए। 

अब, यदि हमें “परित्याग” की एक सरल परिभाषा देनी हो, तो यह उल्लेख करना पर्याप्त होगा कि यह एक पति या पत्नी द्वारा दूसरे की संगति से अलग हो जाने का कृत्य है:

  1. एक स्थायी अवधि के लिए, 
  2. अपने पति या पत्नी की सहमति के बिना, और,
  3. बिना किसी उचित कारण के।

हम हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत दिए गए स्पष्टीकरण में भी परित्याग की परिभाषा पा सकते हैं, जिसमें कहा गया है कि,

“परित्याग से तात्पर्य विवाह के दूसरे पक्ष द्वारा बिना किसी उचित कारण के और बिना सहमति के या ऐसे पक्ष की इच्छा के विरुद्ध याचिकाकर्ता का परित्याग करने से है, और इसमें विवाह के दूसरे पक्ष द्वारा याचिकाकर्ता की जानबूझकर उपेक्षा करना भी शामिल है…”

परित्याग की अवधारणा को दो आवश्यक शर्तों तक सीमित किया जा सकता है जिन्हें पूरा किया जाना आवश्यक है:

  1. अलगाव का तथ्य, और
  2. इसका उद्देश्य सह-अस्तित्व को स्थायी रूप से समाप्त करना है, जिसे एनिमस डेसेरेन्डी के नाम से भी जाना जाता है।

दूसरी ओर, दो तत्व हैं जिन्हें परीत्यागीत जीवनसाथी की ओर से पूरा किया जाना आवश्यक है, जो हैं:

  1. जिस पति या पत्नी को छोड़ दिया गया है, उसकी ओर से सहमति का अभाव, और
  2. ऐसी किसी कार्रवाई का अभाव, जो उनके महत्वपूर्ण जीवनसाथी को उन्हें छोड़ने या उनसे दूर होने का इरादा विकसित करने के लिए कुछ उचित कारण पैदा कर सके।

परित्याग का अपराध तब शुरू होता है जब अलगाव और एनिमस डेसेरेन्डी की भावना एक साथ मौजूद होती है, हालांकि हो सकता है कि वे एक ही समय पर शुरू न हुई हों।

बॉम्बे हिंदू तलाक अधिनियम, 1947 के अनुसार, परित्याग के दो तत्व चार साल की अवधि के दौरान जारी रहने चाहिए। यदि परित्याग करने वाला पति या पत्नी पश्चाताप करता है और वैवाहिक संबंध को फिर से शुरू करने के इरादे से वापस आने का फैसला करता है और चार साल की वैधानिक अवधि समाप्त होने से पहले ऐसा करने की पेशकश करता है, इसलिये अगर यह अवधि समाप्त भी हो जाती है, तो तलाक की कार्यवाही शुरू होने तक परित्याग समाप्त हो जाता है।

अब, अगर जिस पति या पत्नी को छोड़ दिया गया है, वह बिना किसी उचित कारण के अपने पति या पत्नी को वापस लेने से इनकार करता है, तो यह माना जाएगा कि अब विवाह क दुसरे पक्ष के पति या पत्नी द्वारा परित्याग किया जा रहा है। इस प्रकार, जिस पति या पत्नी को छोड़ दिया गया है, उसे विवाह के पक्ष में खड़ा होना चाहिए और हमेशा दूसरे पति या पत्नी को वापस लेने और उचित शर्तों के तहत विवाहित जीवन को फिर से शुरू करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

यदि मामला ऐसा है कि एक पति या पत्नी अपने शब्दों या आचरण से अपने पति या पत्नी को वैवाहिक घर छोड़ने के लिए मजबूर करता है, तो पहले पति या पत्नी को परित्याग का दोषी माना जाएगा, भले ही बाद वाला पति या पत्नी शारीरिक रूप से घर छोड़कर चला गया हो। 

बिपिनचंद्र जयसिंहभाई बनाम प्रभावती (1957) मामले में संदर्भित निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने परित्याग की अवधारणा के बारे में अधिक स्पष्टता देने के लिए कुछ निर्णयों का हवाला दिया था। निम्नलिखित निर्णयों का हवाला दिया गया है:

  1. थॉमस बनाम थॉमस (1924): इस मामले में, यह कहा गया है कि परित्याग एक ऐसा कार्य नहीं है जो अपने आप में पूर्ण हो। एक पक्ष द्वारा विवाह के दुसरे पक्ष को छोड़ने के पीछे कोई उद्देश्य होना चाहिए। केवल अस्थायी (टेम्पररी) रूप से अलग होना, जब तक कि कोई उद्देश्य न हो, परित्याग नहीं माना जाता है। 
  2. विल्किन्सन बनाम विल्किन्सन (1894): इस मामले में कहा गया कि परित्याग कोई विशिष्ट कार्य नहीं बल्कि आचरण का एक क्रम है।
  3. सिकर्ट बनाम सिकर्ट (1899): इस मामले में यह माना गया कि वह पक्ष जो सहवास को समाप्त करने का इरादा रखता है और जिसके आचरण के परिणामस्वरूप ऐसा समापन होता है, वह परित्याग करता है।
  4. प्रैट बनाम प्रैट (1939): इस मामले में, यह कहा गया है कि तलाक पाने के लिए याचिकाकर्ता को यह साबित करना होगा कि परित्याग के लिए आवश्यक संपूर्ण वैधानिक अवधि के दौरान, प्रतिवादी बिना किसी कारण के परित्याग में रहा है। साथ ही यह साबित करना होगा कि परित्याग करने वाले पति या पत्नी का उस अवधि के दौरान लगातार परित्याग करने का इरादा था।
  5. बोवरन बनाम बोवरन (1925): इस मामले से, जिस प्रासंगिक हिस्से पर प्रकाश डाला गया है, वह यह है कि यह आवश्यक नहीं है कि दोषी पक्ष ही वैवाहिक घर छोड़ता है। बल्की वह पक्ष जो सहवास को समाप्त करने का इरादा रखता है और जिसका आचरण सहवास की समाप्ति का कारण बनता है, वह परित्याग करता है। परित्याग के मामले में, किसी को अपने वास्तविक इरादों का निष्कर्ष निकालने के लिए पति-पत्नी के आचरण पर विचार करना चाहिए।
  6. लैंग बनाम लैंग (1955): इस मामले में, ऑस्ट्रेलिया के उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध प्रिवी काउंसिल की न्यायिक समिति में अपील की गई थी। यह माना गया कि, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में, परित्याग को स्थापित करने के लिए दो चीजों को साबित करने की आवश्यकता है:
  • परित्याग का तथ्य, जो कि कुछ बाहरी या दृश्यमान आचरण है, और
  • एनिमस डेसेरेन्डी, जो आचरण के पीछे वैवाहिक संबंध को समाप्त करने का इरादा है।

परित्याग का मतलब सिर्फ़ वैवाहिक घर छोड़ना है। ऐसे मामले में इरादे पर विचार किया जाना चाहिए, यानी कि क्या परित्याग करने वाला पक्ष घर से हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ने के लिए गया था या फिर उसका इरादा कुछ समय के लिए घर छोड़ने का था।

बिपिनचंद्र जयसिंहभाई शाह बनाम प्रभावती (1957) का आलोचनात्मक विश्लेषण 

बिपिनचंद्र जयसिंहभाई शाह बनाम प्रभावती के मामले से परित्याग की अवधारणा में एक महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन हुआ कि यदि परित्याग करने वाले पक्ष ने सुलह करने की इच्छा व्यक्त की है, और यह दूसरा पक्ष है जो उन्हें वापस लेने से इनकार करता है, तो उस पर परित्याग का अपराध आरोपित नहीं किया जा सकता।

वर्तमान मामले में, हालांकि वादी ने दावा किया था कि यह प्रतिवादी ही था जिसने मामले को सुलझाने के उनके प्रयासों के प्रति नकारात्मक रवैया दिखाया था, लेकिन कार्यवाही के दौरान यह साबित नहीं हुआ। वादी केवल एक ही सबूत पेश कर सका, वह था प्रतिवादी द्वारा महेंद्र को संबोधित पत्र। 

दूसरी ओर, यह कहा जा सकता है कि प्रतिवादी ने अपने पत्र की खोज के कारण पैदा हुए कठिन माहौल से बचने के लिए अपने वैवाहिक घर से छुट्टी लेकर अपने पिता के घर में शरण लेना सही समझा। हालाँकि, कुछ महीने बीतने के बाद, उसने चीजों को ठीक करने और अपने वैवाहिक घर वापस जाने का इरादा दिखाया। वादी के दावों के विपरीत, प्रतिवादी अपने रिश्तेदारों और यहाँ तक कि अपने ससुराल वालों की गवाही के साथ उसके लौटने के अपने इरादे का समर्थन कर सकती है। 

वकील के पत्र और वादी के पिता द्वारा संबोधित पत्र ने वादी की इस गवाही का खंडन किया कि वह हमेशा प्रतिवादी को वापस लेने के लिए तैयार था। दोनों ने स्पष्ट सबूत दिए जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वादी प्रतिवादी के साथ अपने वैवाहिक संबंध को जारी नहीं रखना चाहता था।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय लिया कि, यद्यपि, इस मामले के तथ्यों के अनुसार, प्रारंभिक दोष प्रतिवादी का था कि उसने अपना वैवाहिक घर छोड़ दिया, लेकिन इसके साथ परित्याग का इरादा नहीं था, अर्थात, एनिमस डेसिरेन्डी। यह महेंद्र को उसके प्रेम पत्र के खुलासे के कारण अपराधबोध और शर्मिंदगी के कारण था। इसके बाद, उसने लौटने की इच्छा दिखाई, लेकिन यह वादी था जिसने इसका विरोध किया। यह आवश्यक है कि परित्याग करने वाले पक्ष में परित्याग का इरादा होना चाहिए, इस प्रकार, न्यायालय संतुष्ट नहीं हुआ। 

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया था कि यह “स्थायित्व” की गुणवत्ता है जो परित्याग को जानबूझकर अलग होने से भिन्न करती है। यह कथन वर्तमान मामले में प्रासंगिक है क्योंकि यह देखा जा सकता है कि प्रतिवादी ने अपने वैवाहिक संबंध को समेटने के लिए कई बार प्रयास किया। यह आम बात है कि क्रोध, घृणा या अभिभूत (ओव्हरव्हेल्म्ड) महसूस करने के कारण, एक पति या पत्नी दूसरे को छोड़ देता है, लेकिन यह एक अस्थायी अवधि के लिए होता है। ऐसे परिदृश्य में, परित्याग करने वाले पक्ष का सहवास को स्थायी रूप से समाप्त करने का इरादा नहीं होता है, और इस प्रकार, इस तरह के परित्याग को परित्याग नहीं कहा जा सकता है।

अंत में, सर्वोच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले मे कोई परित्याग नहीं हुआ था, यह देखते हुए कि पत्नी सुलह करने के लिए तैयार थी लेकिन वादी उसे वापस लेने के लिए तैयार नहीं था। इस प्रकार, वादी परित्याग के अपने मामले को संतुष्ट करने में विफल रहा, और तलाक की उसकी याचिका असफल रही।

निष्कर्ष

इस मामले ने वैवाहिक कानून के क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले गए, विशेष रूप से, तलाक के लिए आधार के रूप में परित्याग। सबसे आवश्यक निष्कर्ष यह है कि परित्याग का इरादा यह पता लगाने में निर्णायक कारक है कि परित्याग हुआ था या नहीं। परित्याग करने वाले पक्ष की ओर से स्थायी रूप से त्यागने के इरादे की अनुपस्थिति में, यह तय करने की कोई आवश्यकता नहीं है कि अन्य आवश्यक शर्तें पूरी हुई हैं या नहीं।

इस मामले से एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि यदि परित्यागीत पति या पत्नी संबंधित कानून में परित्याग की अवधि समाप्त होने से पहले सुलह करने की कोशिश करते हैं और परित्यागीत पति या पत्नी ऐसा नहीं करते हैं, तो परित्याग का अपराध परित्यागीत पति या पत्नी पर आ जाता है। यह कारक इस सवाल के बारे में भ्रम को दूर करता है कि परित्याग का दोषी किसे माना जाए।

इसके अलावा, जिस तरह से सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल मामले के तथ्यों का बल्कि निचली अदालतों की टिप्पणियों का भी विस्तृत तरीके से विश्लेषण किया है, उससे हमें साक्ष्य और उस साक्ष्य की पुष्टि के महत्व के बारे में पता चलता है। केवल एक पक्ष की गवाही पर भरोसा करने से बचना चाहिए, खासकर तब जब उसका कोई समर्थन न हो। 

इस प्रकार, यह मामला काफी हद तक परित्याग की पेचीदगियों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

बिपिनचंद्र जयसिंहभाई शाह बनाम प्रभावती (1957) मामला किस बारे में है?

यह मामला परित्याग से जुड़ा है। वादी ने इस आधार पर तलाक के लिए आवेदन किया था कि उसकी पत्नी ने उसे चार साल पहले छोड़ दिया था।

परित्याग से क्या तात्पर्य है?

सरल शब्दों में, परित्याग वह कार्य है जिसमें एक पति या पत्नी, अपने पति या पत्नी को उनकी सहमति के बिना तथा बिना किसी कारण के, जानबूझकर एक स्थायी अवधि के लिए छोड़ देते हैं, ताकि उनका सहवास समाप्त हो सके।

परित्याग के लिए आवश्यक बातें क्या हैं?

परित्याग के पांच अनिवार्य तत्व हैं:

  • अलगाव का तथ्य,
  • एनिमुमस डेसेरेन्डी (सहवास को समाप्त करने का इरादा) का अस्तित्व ,
  • किसी भी उचित कारण का अभाव,
  • अपने पति या पत्नी की सहमति का अभाव, और,
  • अलगाव की स्थायी प्रकृति। 

किसे परित्याग करने वाला कहा जाता है?

जिस पति या पत्नी के आचरण के कारण सहवास समाप्त हो जाता है, उस पर परित्याग का आरोप लगाया जाता है। 

क्या यह आवश्यक है कि त्यागने वाले पक्ष पर हमेशा ही परित्याग का आरोप लगाया जाए?

यदि ऐसा आचरण दूसरे पक्ष की ओर से हुआ है, तो वापस जाने वाला पक्ष परित्याग का दोषी नहीं माना जाता। इसी तरह, यदि परित्याग करने वाला पक्ष वापस आने और सहवास फिर से शुरू करने की इच्छा दिखाता है और परित्यागीत पक्ष ऐसी वापसी का विरोध करता है, तो दुसरे पक्ष को परित्याग करने वाला कहा जाता है, न कि पहले वाले को।

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