वैवाहिक अधिकार क्या हैं? इसके लिए कौन फाइल कर सकता है? कहां फाइल करें? इससे जुड़ी शर्तें क्या हैं

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Hindu Marriage Act
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वैवाहिक अधिकारों के विषय पर यह लेख Simmi Chadda द्वारा लिखा गया है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय (इंट्रोडक्शन)

विवाह व्यक्तिगत कानूनों द्वारा प्रशासित (एडमिनिस्टर) होता है जो तलाक, भरण-पोषण, हिरासत और वैवाहिक अधिकारों की बहाली (रेस्टिट्यूशन ऑफ कॉनजूगल राइट्स) जैसी शर्तों को प्रशासित करता है।

वैवाहिक अधिकारों का अर्थ है एक साथ रहने का अधिकार

हिंदू विवाह अधिनियम (हिंदू मैरिज एक्ट), 1955 की धारा 9 कहती है कि यदि पति या पत्नी में से कोई भी उचित बहाने के बिना, दूसरे से अलग रहता है और समाज से हट जाता है तो पीड़ित पक्ष वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।

धारा 9 शादी को बचाने के लिए है।

वैवाहिक अधिकार शब्द को बिना किसी उचित कारण के दूसरे पक्ष से दूर रहने के दोषी पति या पत्नी के विरुद्ध रखा जा सकता है। अगर सूट सफल होता है तो जोड़े को साथ रहने की जरूरत होती है।

वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री उस पक्ष के साथ रहने के लिए नहीं दी जा सकती है जो दूसरे पक्ष को छोड़कर दूर चला गया है और जिसने बहाली के लिए याचिका दायर की है।

धारा 9 के लिए तीन महत्वपूर्ण आवश्यकताएं पूरी की जाती हैं

  • पति-पत्नी को साथ नहीं रहना चाहिए।
  • एक पक्ष को दूसरे पक्ष से बिना किसी उचित आधार के अलग रहना चाहिए।
  • पीड़ित पक्ष को वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए आवेदन (एप्लाई) करना चाहिए।

किन आधार पर वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए याचिका खारिज की जा सकतीसकती है?

  1. यदि प्रतिवादी (रिस्पॉन्डेंट) किसी वैवाहिक राहत का दावा करने में सक्षम है।
  2. यदि याचिकाकर्ता (पेटीशनर) स्वीकार करता है कि उसने कोई वैवाहिक कदाचार (मिसकंडक्ट) किया है।
  3. यदि याचिकाकर्ता के कार्य प्रतिवादी के लिए उसके साथ रहना असंभव बना देते है।

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत दायित्व (ओनस)

मुख्य रूप से, याचिकाकर्ता पर यह साबित करने का भार होता है कि प्रतिवादी ने उसे छोड़ दिया है। जब याचिकाकर्ता इसे सफलतापूर्वक साबित कर देता है, तो यह साबित करने के लिए कि प्रतिवादी याचिकाकर्ता के समाज से दूर क्यों चला गया, इसका समर्थन करने के लिए एक उचित आधार है।

इसकी शिकायत कहां करें?

सिविल कोर्ट में जिसके अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिसडिक्शन) में –

  1. पक्षों की शादी संपन्न हुई।
  2. पति-पत्नी साथ रहते हो।
  3. पति-पत्नी आखिरी बार रहे हो।

पीड़ित पक्ष क्या कर सकता है?

पीड़ित पक्ष डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में याचिका (पेटिशन) फाइल कर सकता है। जब कोर्ट पीड़ित पक्ष के तर्कों से संतुष्ट हो जाती है और जब कोर्ट को कोई कारण नहीं मिलता है कि पीड़ित के आवेदन का समर्थन क्यों नहीं किया जाना चाहिए, तो कोर्ट पीड़ित पक्ष के पक्ष में वैवाहिक अधिकारों की बहाली का फैसला कर सकती है।

अगला कदम क्या हो सकता है?

वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री की सुनवाई सिविल प्रोसीजर कोड, 1908 के अनुसार की जाएगी।

पीड़ित पक्ष लोअर कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।

क्या इस अवधि के दौरान पत्नी भरण-पोषण की मांग कर सकती है?

हां;  पत्नी हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत भरण-पोषण का दावा कर सकती है। इस डिक्री का पालन न करने पर कोर्ट निर्णय-देनदार (जजमेंट डेटर) की संपत्ति अटैच करेगा। इसके अलावा, यदि इस डिक्री का पालन एक वर्ष से अधिक की समय सीमा के लिए नहीं किया जाता है, तो डिक्री की तारीख के बाद तलाक का आधार बनाया जाता है।

भारत में शादी को सबसे पवित्र रस्म माना जाता है। शादी के पक्ष के बाद के जीवन और उनकी खुशियों से संबंधित ढेर सारी उम्मीदें और सपने होते हैं। लेकिन कई बार चीजें सोची-समझी नहीं होती हैं और इस तरह पक्षों को उनके बीच असहमति और झगड़े होते हैं, जिससे वे तलाक के लिए जाने का फैसला करते हैं। जब पति या पत्नी में से एक को लगता है कि कुछ भी गलत नहीं था, लेकिन कुछ मूर्खतापूर्ण बातें थीं तो पति या पत्नी एक नई शुरुआत करने के लिए वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए एक आवेदन फाइल करते हैं।

वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए दोनों विवाह पक्षों को एक साथ रहने और सहवास (कोहैबिट) करने की आवश्यकता है। लेकिन इस उपाय का कई बार दुरुपयोग भी हुआ है, जिससे जीवन के अधिकार, निजता (प्राइवेसी) के अधिकार और समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है और इसलिए यह असंवैधानिक (अनकांस्टीट्यूशनल) है।

बहुत से लोग इस उपाय का उपयोग अपने पति या पत्नी को धमकाने के लिए करते हैं ताकि उनका जीवनसाथी अपना मामला वापस ले ले या अस्वीकार्य मौद्रिक (मॉनेटरी) नुकसान को स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाए।

यह अत्यधिक विचारणीय (डिबेटेबल) विषय है। कुछ का मानना ​​है कि यह विवाह को संरक्षित (प्रिजर्व) करने के लिए है जबकि कुछ का कहना है कि दूसरे पक्ष को पीड़ित पक्ष के साथ रहने के लिए मजबूर करने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि वे बिल्कुल भी रुचि नहीं रखते हैं। यह ध्यान रखना बहुत महत्वपूर्ण है कि इस उपाय का दुरुपयोग नहीं किया जा रहा है।

वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए फाइल करने के लिए एक अच्छे वकील से परामर्श करें।

 

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