आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 40A

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1986
Income Tax Act

यह लेख गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, मुंबई में कानून की छात्रा Divya Raisharma द्वारा लिखा गया है। यह लेख आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 40A, इसकी उप-धाराओं के अपवादों (यदि कोई हो) और धारा 40A के अपवादों के बारे में विस्तार से बताता है। इसमें प्रासंगिक निर्णयों और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों (एफ.ए.क्यू.) का भी उल्लेख है। इस लेख का अनुवाद Divyansha Saluja द्वारा किया गया है।

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परिचय

कोई भी व्यक्ति जो व्यवसाय या पेशे को चलाने से कोई लाभ या मुनाफा अर्जित करता है, वह आयकर अधिनियम, 1961 के अनुसार, अर्जित लाभ से स्वीकार्य व्यय (एक्सपेंडिचर) को घटाने के लिए पात्र है, लेकिन वेतन आय के मामले में इसके विपरीत होता है। यह प्रावधान कर देनदारी को काफी कम करता है और व्यवसायियों और पेशेवरों को एक महत्वपूर्ण बोझ से राहत प्रदान करता है। हालाँकि, क्योंकि किसी भी लाभकारी योजना का दुरुपयोग किया जा सकता है, इसलिए करदाताओं के खर्चों में कटौती करने के काफी मामले सामने आए हैं जिनकी अनुमति नहीं दी जाती है, जो की व्यक्तिगत, अत्यधिक, काल्पनिक या अनुचित है। इस तरह के व्यय को निर्धारण अधिकारी (एसेसिंग ऑफिसर) द्वारा कटौती के रूप में अस्वीकार कर दिया जाता है, जो निर्धारिती (एसेसी) के आयकर रिटर्न का निर्धारण करता है। यह अस्वीकृति तब होती है जब निर्धारण अधिकारी की राय यह होती है कि व्यय माल के उचित बाजार मूल्य के संबंध में अत्यधिक या अनुचित है, व्यवसाय या पेशे की वैध आवश्यकताओं से परे है, या ऐसे सामानों, सेवाओं या सुविधाओ से प्राप्त लाभ से भी परे है। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि पूरी राशि ही अस्वीकृत हो जाए। यहां तक ​​कि व्यय के एक हिस्से को भी नामंज़ूर किया जा सकता है अगर निर्धारण अधिकारी द्वारा इसे अनुचित या अत्यधिक पाया जाता है।

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 40A के तत्व

धारा 40A, आयकर अधिनियम के अध्याय IV से संबंधित है, जो “व्यवसाय या पेशे से लाभ और मुनाफे” शीर्षक के तहत कुल आय की गणना से संबंधित है। यह व्यापार या पेशे से लाभ और मुनाफे के तहत कुल आय की गणना करते समय लागू होता है। धारा 40A में कई उप-धाराएं भी हैं, इसलिए शोध प्रबंध (डिसर्टेशन) इन उप-धाराओं को पढ़कर किया जाएगा। 

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 40A(1)

आयकर अधिनियम की धारा 40A(1) एक गैर-विरोधी (नॉन ओब्सटेंट) खंड है, जो एक ओवरराइडिंग खंड को संदर्भित करता है, अर्थात जो अन्य खंडों से श्रेष्ठ होता है। 

इस खंड के बीच किसी भी ओवरलैप या असामंजस्य (डिशार्मोनी) के मामले में, अन्य खंड को उनके लिए रास्ता बनाना होगा; आयकर आयुक्त (कमिश्नर) बनाम भारत विजय मिल्स लिमिटेड (1980) के मामले में इसकी पुष्टि की गई है।

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 40A(2)

धारा 40A(2)(a)

व्यवसायों में व्यावसायिक और व्यक्तिगत संबंध पूर्वाग्रह (बाइस) की धारणाओं को जन्म दे सकते हैं। उदाहरण के लिए, परिवार के सदस्यों को स्वाभाविक रूप से एक दूसरे के प्रति अनुकूल पक्षपाती माना जाता है। कुछ रिश्तों और पूर्वाग्रहों की निकटता के कारण लोग एक-दूसरे को अत्यधिक या अनुचित मौद्रिक (मॉनेटरी) लाभ प्रदान करते हैं। हालांकि, इस तरह के लाभों की कानूनों द्वारा अनुमति नहीं दी जाती है, और इस नियम का कार्यान्वयन (इंप्लीमेंटेशन) धारा 40A(2)(a) में देखा जा सकता है। 

यह खंड उन लोगों पर कार्रवाई है जो न केवल निर्दिष्ट व्यक्तियों को अतिरिक्त या अनुचित लाभ देते हैं बल्कि उस पर कर कटौती भी करते हैं। पक्षों के बीच एक विशेष संबंध के अभाव में, लेन-देन उचित होना चाहिए। लेकिन इस तरह, लोग न केवल अपने रिश्तेदारों की जेब भरते हैं बल्कि अतिरिक्त राशि के उचित कराधान में भी बाधा डालते हैं, जिस पर अन्यथा कर लगेगा। 

हालांकि, निर्दिष्ट व्यक्तियों के साथ सभी लेन-देन को अत्यधिक या अनुचित नहीं माना जाता है। इसे साबित करने की जिम्मेदारी निर्धारण अधिकारी की होती है। उसी के लिए एक प्रासंगिक मामला मरघाभाई किशाभाई पटेल एंड कंपनी बनाम आयकर आयुक्त (1976) का है।

जब निर्धारिती कोई व्यय करता है जिस का भुगतान किया जाता है या ऐसे व्यक्तियों को देय होता है जिन्हे नीचे निर्दिष्ट किया गया है और उनके द्वारा किया गया व्यय (निर्धारण अधिकारी की राय में) के संबंध में अत्यधिक या अनुचित है: 

  • माल, सेवाओं या सुविधाओं का उचित बाजार मूल्य;
  • व्यवसाय या पेशे की वैध ज़रूरतें, या
  • निर्धारिती द्वारा प्राप्त/उपार्जित (एक्रूड) लाभ,

इन मामलों में, इस तरह के अत्यधिक या अनुचित व्यय की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इसलिए, एक निर्धारण अधिकारी व्यय को अत्यधिक होने की अनुमति नहीं दे सकता है। कटौती किए गए व्यय के केवल अतिरिक्त या अनुचित हिस्से को अस्वीकार किया जाता है। हालाँकि, यह पूरे व्यय की अस्वीकृति के बारे में नहीं बोलता है, भले ही यह मुद्रा स्फ़ीति (इनफ्लेटेड) हो गया हो। उदाहरण के लिए, यदि किसी वस्तु का उचित बाजार मूल्य 100 है, लेकिन निर्धारिती ने उसके लिए 120 की कटौती की है, तो केवल 20 की अतिरिक्त राशि की अनुमति नहीं है, जबकि निर्धारिती को 100 की कटौती करने की अनुमति है। 

धारा 40A(2)(b)

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, धारा 40A(2)(a) केवल कुछ निर्दिष्ट व्यक्तियों पर ही लागू

 होती है। व्यक्तियों की यह सूची खंड (b) में प्रदान की गई है, और इसे निम्नानुसार तैयार किया गया है:

निर्धारिती की प्रकृति निर्दिष्ट व्यक्ति
व्यक्ति रिश्तेदार 
कंपनी कंपनी के निदेशक (डायरेक्टर) और उनके रिश्तेदार।
फर्म फर्म के भागीदार और उनके रिश्तेदार।
व्यक्ति का संघ व्यक्तियों के संघ के सदस्य और उनके रिश्तेदार 
हिन्दू अविभाजित परिवार (एच.यू.एफ.) परिवार के सदस्य और उनके रिश्तेदार।
कोई भी निर्धारिती व्यवसाय या पेशे में पर्याप्त रुचि रखने वाले व्यक्ति और उनके कोई भी रिश्तेदार 
कोई भी निर्धारिती व्यवसाय या पेशे में पर्याप्त रुचि रखने वाली कंपनी, कंपनी के निदेशक, निदेशकों के रिश्तेदार और उपरोक्त कंपनी में पर्याप्त रुचि रखने वाली कोई भी कंपनी।
कोई भी निर्धारिती व्यवसाय या पेशे में पर्याप्त रुचि रखने वाली एक फर्म, फर्म का एक भागीदार और एक भागीदार का रिश्तेदार।
कोई भी निर्धारिती व्यवसाय या पेशे में पर्याप्त रुचि रखने वाले व्यक्तियों का संघ, संघ के सदस्य और सदस्यों के रिश्तेदार।
कोई भी निर्धारिती हिंदू अविभाजित परिवार (एच.यू.एफ.) व्यवसाय या पेशे में पर्याप्त रुचि के साथ, परिवार के सदस्य और सदस्यों के रिश्तेदार।
कोई भी निर्धारिती कंपनी जिसके एक निदेशक की निर्धारिती के व्यवसाय या पेशे में पर्याप्त रुचि है। उदाहरण के लिए, श्री एप्पल की निर्धारिती के व्यवसाय में पर्याप्त रुचि है, और श्री एप्पल, कंपनी Y के निदेशक हैं। इसलिए, कंपनी Y एक निर्दिष्ट व्यक्ति है।
कोई भी निर्धारिती उपरोक्त कंपनी के अन्य निदेशक और उनके रिश्तेदार। उदाहरण के लिए, X की निर्धारिती के व्यवसाय में पर्याप्त रुचि है, और X कंपनी Y के निदेशक हैं। B भी कंपनी Y के निदेशक हैं। इसलिए, B एक निर्दिष्ट व्यक्ति हैं।
कोई भी निर्धारिती फर्म जिसका एक भागीदार निर्धारिती के व्यवसाय या पेशे में पर्याप्त रुचि रखता है।
कोई भी निर्धारिती अन्य भागीदार उपर्युक्त फर्मों और उनके रिश्तेदारों से संबंधित हैं।
कोई भी निर्धारिती व्यक्तियों का संघ, जिनमें से एक सदस्य की निर्धारिती के व्यवसाय या पेशे में पर्याप्त रुचि है।
कोई भी निर्धारिती उपरोक्त संघ के अन्य सदस्य और उनके रिश्तेदार।
कोई भी निर्धारिती हिंदू अविभाजित परिवार जिसके सदस्य का निर्धारिती के व्यवसाय या पेशे में पर्याप्त हित है।
कोई भी निर्धारिती उपरोक्त परिवार के अन्य सदस्य और उनके रिश्तेदार।
व्यक्ति  वह व्यक्ति जिसके व्यवसाय या पेशे में निर्धारिती या उसके रिश्तेदार का पर्याप्त हित हो।
कंपनी वह व्यक्ति जिसके व्यवसाय या पेशे में निर्धारिती, उसके निदेशक, या निदेशक के रिश्तेदार का पर्याप्त हित है।
व्यक्तियों का संघ वह व्यक्ति जिसके व्यवसाय या पेशे में निर्धारिती, उसके सदस्य या सदस्य के रिश्तेदार का पर्याप्त हित हो।
फर्म वह व्यक्ति जिसके व्यवसाय या पेशे में निर्धारिती, उसके भागीदार या साझेदार के रिश्तेदार का पर्याप्त हित है।
हिंदू अविभाजित परिवार वह व्यक्ति जिसके व्यवसाय या पेशे में निर्धारिती, उसके सदस्य या सदस्य के रिश्तेदार का पर्याप्त हित हो।

अधिनियम की धारा 2(41) के तहत, “रिश्तेदार” का अर्थ है निर्धारिती का पति/पत्नी, भाई, बहन, या कोई पारंपरिक पूर्वज या वंशज।

एक व्यक्ति को निम्नलिखित स्थितियों में निर्धारिती के व्यवसाय या पेशे में पर्याप्त रुचि रखने के लिए कहा जाता है:

निर्धारण व्यक्ति
कंपनी बीस प्रतिशत से कम वोटिंग शक्ति वाले इक्विटी शेयरों का लाभार्थी स्वामी
अन्य कोई व्यक्ति जो लाभकारी रूप से निर्धारिती के व्यवसाय या पेशे के मुनाफे के बीस प्रतिशत से कम का हकदार नहीं है।

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 40A(3)

उपरोक्त प्रावधानों के साथ, धारा 40A(3) अस्वीकृत व्यय की एक अन्य श्रेणी प्रदान करती है। यह प्रावधान डिजिटल इंडिया पहल को प्रोत्साहित करता है और कर-बचत उद्देश्यों के लिए नकली एंट्री को रोकने के लिए कर अधिकारियों के उद्देश्य को पूरा करता है। इस प्रावधान के कारण, कोई भी व्यक्ति एक ही दिन में 10,000 रुपये से अधिक के व्यय का दावा नहीं कर सकता है। यह राशि एक लेन-देन या एकाधिक लेन-देन के योग से हो सकती है। हालांकि, यह किसी बैंक पर आहरित (ड्रॉन) अकाउंट पेयी चेक या अकाउंट पेयी बैंक ड्राफ्ट द्वारा किए गए लेनदेन पर लागू नहीं होता है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इस उप-धारा के द्वारा भुगतान के केवल दो तरीकों को प्रतिबंध से बाहर रखा गया है, और इसलिए, नकद, डेबिट कार्ड, या यू.पी.आई., आदि द्वारा किया गया कोई भी भुगतान प्रतिबंध से नहीं छूटेगा। इस प्रावधान का उद्देश्य भुगतान के स्रोतों (सोर्स) का खुलासा करना है, जो बदले में कर चोरी पर नियंत्रण रखता है।

हालांकि, अधिकारियों ने नियम 6DD और आयकर नियम, 1962 को लागू करके इस प्रावधान के प्रभाव को और कम कर दिया है। 

वित्त अधिनियम, 1968 की धारा 7 के अनुसार, “चेक” की परिभाषा परक्राम्य लिखत (नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट) अधिनियम, 1881 से ली जाती है। इस अधिनियम की धारा 6 के तहत, एक “चेक” को एक विशिष्ट बैंकर पर आहरित और केवल मांग पर देय विनिमय (एक्सचेंज) के बिल के रूप में परिभाषित किया गया है। एक चेक में एक छोटे चेक की इलेक्ट्रॉनिक छवि और इलेक्ट्रॉनिक रूप में एक चेक शामिल हो सकता है। 

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 40A(3 A)

हालांकि धारा 40A(3A) के तहत, विचाराधीन व्यय पिछले वर्ष से संबंधित और किए गए व्यय थे, यह उस परिदृश्य (सिनेरियो) के बारे में बात करता है जहां निर्धारिती पिछले वर्ष के व्यय से संबंधित निर्धारण वर्ष में भुगतान करता है। ठीक जैसा ऊपर दिया गया है में, यदि कुल भुगतान 10,000/- रुपये से अधिक है तो ऐसे में अतिरिक्त भुगतान की अनुमति नहीं दी जाती है और इसे बाद के वर्ष के व्यापार या पेशे से लाभ या मुनाफे के रूप में माना जाता है। हालाँकि, यह अस्वीकृति आयकर नियम, 1962 के नियम 6DD द्वारा शामिल की गई परिस्थितियों को प्रभावित नहीं करेगी। 

नोट करने के लिए एक महत्वपूर्ण बिंदु, 10,000 रुपये से 35,000 रुपये तक की भुगतान सीमा के विस्तार के संबंध में उप-धारा में स्पष्ट प्रावधान दिया गया है, जब उक्त भुगतान माल के प्लाई, भाड़े या पट्टे (लीज) के लिए किया जाता है।

आयकर नियम, 1962 के नियम 6ABBA के अनुसार अन्य इलेक्ट्रॉनिक मोड की परिभाषा

नियम 6ABBA के अनुसार, अन्य इलेक्ट्रॉनिक मोड का अर्थ निम्नलिखित है:

  • क्रेडिट कार्ड
  • डेबिट कार्ड; 
  • नेट बैंकिंग;
  • आई.एम.पी.एस. (तत्काल भुगतान सेवा);
  • यू.पी.आई. (यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस);
  • आर.टी.जी.एस. (रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट); 
  • एन.ई.एफ.टी. (नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर); और
  • भीम (भारत इंटरफेस फॉर मनी) आधार पे;

अपवाद: आयकर नियम, 1962 के नियम 6DD

आयकर नियम, 1962 का नियम 6DD, धारा 40A(3) और 40A(3A) का अपवाद है। यह नियम उन परिस्थितियों को निर्धारित करता है जिनमें उप-धारा लागू नहीं होती है। इस नियम के अनुसार, 

कोई भी भुगतान जो:

  • भारतीय रिजर्व बैंक
  • बैंकिंग विनियमन (रेगुलेशन) अधिनियम, 1949 की धारा 5 (c) के तहत बैंकिंग कंपनी
  • भारतीय स्टेट बैंक या उसके सहायक बैंक
  • सहकारी बैंक या भूमि बंधक बैंक
  • बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 56 के तहत प्राथमिक कृषि ऋण समिति या कोई भी प्राथमिक ऋण समिति
  • भारतीय जीवन बीमा निगम (एल.आई.सी.) 
  • लीगल टेंडर के तहत सरकार
  • कुटीर उद्योग (कॉटेज इंडस्ट्री) में बिजली की सहायता के बिना निर्मित या संसाधित (प्रोसेस्ड) उत्पादों को ऐसे उत्पादों के निर्माता से खरीदें
  • कृषि या वन उत्पादों, पशुपालन (एनिमल हसबेंडरी) के उत्पादों या डेयरी या कुक्कुट पालन (पोल्ट्री फार्मिंग), मछली या मछली उत्पादों और बागवानी या मधुमक्खी पालन के उत्पादों की खरीद के लिए कृषक, उगाने वाले या उत्पादक
  • एक कर्मचारी या कर्मचारी के उत्तराधिकारी (हायर), सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट), छंटनी (रिट्रेंचमेंट), त्यागपत्र, बर्खास्तगी या ऐसे कर्मचारी की मृत्यु के संबंध में, उपदान (ग्रेच्युटी), छंटनी मुआवजा या इसी तरह के सेवांत लाभ के कारण और इस तरह की कुल राशि 50,000 रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए। 

द्वारा भुगतान किया गया:

  • एक बैंक के माध्यम से साख व्यवस्था (क्रेडिट अरेंजमेंट) का पत्र
  • बैंक के माध्यम से मेल या टेलीग्राफिक ट्रांसफर
  • एक बैंक खाते से दूसरे खाते में पुस्तक समायोजन (बुक एडजस्टमेंट)
  • बैंक को देय विनिमय बिल
  • निर्धारिती द्वारा ऐसे भुगतानकर्ता को आपूर्ति किए गए किसी सामान या प्रदान की गई सेवाओं के लिए प्राप्तकर्ता द्वारा किए गए किसी भी दायित्व की राशि के विरुद्ध समायोजन का तरीका।

किसी ऐसे गांव या कस्बे में किया गया भुगतान जहां भुगतान की तारीख को कोई बैंक काम नहीं करता है, और ऐसा भुगतान किसी ऐसे व्यक्ति को किया जाता है जो: 

  • आमतौर पर रहता है, या 
  • ऐसे किसी गाँव या कस्बे में कोई व्यवसाय, पेशा कर रहा हो।

अधिनियम की  धारा 192 (अर्थात स्रोत पर कटौती – वेतन) के प्रावधानों के अनुसार आयकर काटने के बाद एक निर्धारिती द्वारा अपने कर्मचारी को वेतन भुगतान, और

  • ऐसे कर्मचारी को अस्थायी रूप से 15 दिन या उससे अधिक की अवधि के लिए अपने सामान्य कार्य स्थान के अलावा किसी अन्य स्थान पर या किसी जहाज पर तैनात किया जाता है; और 
  • ऐसे स्थान या जहाज पर कर्मचारी का किसी भी बैंक में कोई खाता नहीं है।

किसी भी व्यक्ति द्वारा अपने एजेंट को किया गया भुगतान, जिसे व्यापार के सामान्य क्रम में विदेशी मुद्रा या ट्रैवेलर्स चेक की खरीद के खिलाफ ऐसे व्यक्ति या अधिकृत (ऑथराइज) डीलर या मनी चेंजर की ओर से माल या सेवाओं के लिए नकद में भुगतान करना आवश्यक है। 

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 40A(4)

धारा 40A(4) को, एक समय पर लागू अन्य कानूनों और यहां तक ​​कि अनुबंधों पर भी ओवर राइडिंग प्रभाव दिया गया है। यह आगे धारा 40 (3) और 40A(3A) का उद्देश्य प्रदान करती है, और साथ ही मुकदमों या कार्यवाही (जैसे अनुबंध का उल्लंघन) से निर्धारितियों की रक्षा भी करती है। इसलिए, भले ही एक अनुबंध को एक दिन में 10,000 रुपये से अधिक के निष्पादन (एग्जिक्यूशन) नकद भुगतान की आवश्यकता हो लेकिन निर्धारिती इस भुगतान को बैंक पर आहरित अकाउंट पेयी चेक, अकाउंट पेयी बैंक ड्राफ्ट, या बैंक खाते के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक क्लियरिंग सिस्टम के माध्यम से करना चुन सकता है और मुकदमेबाजी से सुरक्षित रह सकता है, भले ही अनुबंध के भुगतान के तरीके की अवधि अपने आप में पूरी नहीं हुई थी। 

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 40A(7)

इसमें दो खंड शामिल हैं जो एक दूसरे के पूरक (कंप्लीमेंटरी) हैं और इसलिए इन्हें एक साथ पढ़ा जाता है। धारा 40A(7)(a) एक नकारात्मक खंड है, और धारा 40A(7)(b) इसके अपवाद के रूप में कार्य करती है। 

धारा 40A(7)(a) के अनुसार, कर्मचारियों को उनकी सेवानिवृत्ति या समाप्ति पर उपदान के भुगतान के किसी भी प्रावधान के संबंध में कोई कटौती की अनुमति नहीं दी जाएगी। हालांकि, खंड a में कुछ भी धारा 40A(7)(b) के प्रावधान पर लागू नहीं होता है, जिसमें पिछले वर्ष में देय अनुमोदित उपदान निधि (फंड) के लिए योगदान राशि का भुगतान या उपदान देयता का भुगतान, जो पिछले वर्ष के दौरान उत्पन्न हुआ था, की अनुमति कटौती के रूप में है।

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 40A(9)

यह नियोक्ताओं और कर्मचारियों के लिए कर कटौती के रूप में एक कर्मचारी के सेवा निवर्तन (सुपरएन्नुएशन) निधि, भविष्य निधि (प्रोविडेंट फंड) और उपदान निधि में योगदान की अनुमति देता है। यह इन निधियों के उद्देश्य को आगे बढ़ाने और नियोक्ताओं को प्रोत्साहन देकर इन निधियों में योगदान करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए किया जाता है। हालांकि, उपरोक्त योजना का लाभ लेने के लिए इस प्रणाली का दुरूपयोग करने वाले लोगों के कई उदाहरण सरकार के जानकारी में आए है। उदाहरण के लिए, अपरिवर्तनीय विवेकाधीन ट्रस्ट जो बिना किसी योजना या सुरक्षा उपायों के कर्मचारियों के लाभ के लिए ट्रस्ट की संपत्ति का उपयोग करने के लिए ट्रस्टियों को पूर्ण विवेक देते हैं। 

ये ट्रस्ट योगदान के रूप में पर्याप्त मात्रा में प्राप्त करते हैं और इसके परिणामस्वरूप, ऐसे योगदानों के संबंध में कटौती का दावा करके कर चोरी के लिए एक वाहन के रूप में उपयोग किया जाता है, जो जमा या शेयरों में निवेश आदि के रूप में नियोक्ता के पास वापस आ सकता है। 

इस तरह की दुरूपयोग को हतोत्साहित करने के लिए सरकार ने इसे एक नियंत्रण के रूप में डाला है। उप-धारा 9, किसी भी निधि, ट्रस्ट, कंपनी, व्यक्तियों के एक संघ, व्यक्तियों के निकाय, या सोसायटी पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत सोसायटी की स्थापना या गठन, या योगदान के लिए भुगतान की गई राशि या धारा 36(1) के खंड (iv), (iv) और (v) में उल्लिखित उद्देश्य के लिए बनाई गई संस्थाओं को छोड़कर कोई अन्य संस्थान के लिए भुगतान की गई राशि को प्रतिबंधित करता है।

एक मान्यता प्राप्त भविष्य निधि या एक अनुमोदित सेवा निवर्तन निधि के लिए नियोक्ता का योगदान, निम्नलिखित के अधीन है:

  • भविष्य निधि की मान्यता या सेवा निवर्तन निधि के अनुमोदन की निर्धारित सीमा, और 
  • ऐसी शर्तें जो बोर्ड उन मामलों में ठीक समझ सकता है जहां योगदान निश्चित राशि के वार्षिक योगदान या किसी निश्चित आधार पर निर्धारित वार्षिक योगदान की प्रकृति में नहीं हैं, जो मुख्य वेतन, योगदान या सदस्यों की संख्या के तहत प्रभार्य (चार्जेबल) आय के संदर्भ में हैं।

पेंशन योजना के लिए नियोक्ता के योगदान को पिछले वर्ष में कर्मचारी के वेतन के 10% की सीमा तक धारा 80CCD (केंद्र सरकार की पेंशन योजना में योगदान के संबंध में कटौती) में संदर्भित किया गया है। यहां, वेतन गणना में महंगाई भत्ता शामिल है, यदि रोजगार की शर्तें प्रदान करती हैं, लेकिन इसमें कोई अन्य भत्ते और अनुलाभ (परक्विसाइट) शामिल नहीं हैं।

एक अपरिवर्तनीय ट्रस्ट के तहत कर्मचारियों के विशेष लाभ के लिए बनाई गई अनुमोदित उपदान निधि के लिए नियोक्ता का योगदान है।

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 40A(10)

यह धारा यह प्रावधान करती है कि, धारा 40A(9) के संबंध में, यदि निर्धारण अधिकारी संतुष्ट है कि व्यय वास्तविक है या कर्मचारियों के कल्याण के लाभ के लिए खर्च किया गया है, तो पिछले वर्ष के लिए “व्यवसाय या पेशे के लाभ और मुनाफे” शीर्षक के तहत आय की गणना करते समय राशि को कटौती के रूप में अनुमति दी जानी चाहिए जिसमें निर्धारिती ने व्यय निर्धारित किया था। यह सदाशयी (बोना फाइड) मामलों के लिए एक राहत प्रदान करने वाली धारा है। 

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 40A(11)

इस पूरी धारा को एक साथ पढ़ने पर, कुछ लोगों को यह प्रतीत हो सकता है कि धारा 40A(11) अन्य प्रावधानों के साथ बिल्कुल फिट नहीं बैठती है। जबकि धारा के बाकी प्रावधान गैर-कटौती योग्य खर्चों या भुगतानों के बारे में बात करते हैं, यह चुकौती दावों के बारे में बात करती है। हालांकि इस और अन्य उप-धाराओं के बीच कोई संबंध प्रतीत नहीं हो सकता है, धारा 40A(11) कानून के पैमाने को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

यह प्रावधान करती है कि जब एक निर्धारिती ने उपधारा (9) में संदर्भित संस्थानों को किसी राशि का भुगतान किया है, तब, किसी अन्य कानून या किसी लिखत में निहित किसी बात के होते हुए भी, वह निम्नलिखित का हकदार होगा:

  • इन संस्थानों को भुगतान की गई, लेकिन अप्रयुक्त राशि के पुनर्भुगतान का दावा करने के लिए। इस परिदृश्य में, अप्रयुक्त राशि को जल्द से जल्द चुकाया जाना चाहिए।
  • निर्धारिती द्वारा भुगतान किए गए धन में से उप-धारा 9 में संस्थानों द्वारा अर्जित या निर्मित संपत्ति (भूमि, भवन, मशीनरी, संयंत्र (प्लांट) या फर्नीचर के रूप में) के हस्तांतरण (ट्रांसफर) का दावा करने के लिए। जब इस तरह का दावा किया जाता है, तो संपत्ति जल्द से जल्द निर्धारिती को हस्तांतरित कर दी जाएगी। इस मामले में, उपरोक्त परिदृश्य की तुलना में निर्धारिती द्वारा भुगतान की गई राशि संस्थानों के पास एक संपत्ति के रूप में मौजूद है, जिसमें उक्त भुगतान का उपयोग संस्थानों द्वारा नहीं किया जाता है।

इसने एक समय सीमा भी निर्धारित की है ताकि केवल वास्तविक मामले ही लाभ प्राप्त कर सकें। यह समय सीमा उप-धारा 9 में संदर्भित किसी संस्थान को राशि का भुगतान करने के संबंध में है।

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 40A(13)

यह धारा प्रदान करती है कि धारा 36 की उप-धारा (1) के उप खंड (xviii) के तहत स्वीकार्य व्यय को छोड़कर, बाजार के लिए चिह्नित नुकसान या अन्य अपेक्षित नुकसान के संबंध में कोई कटौती या भत्ता की अनुमति नहीं दी जाती है। इस धारा की जड़ को धारा 36 और “मार्क-टू-मार्केट” के रूप में सूचीबद्ध किया जा सकता है।

मार्क-टू-मार्केट

किसी संपत्ति के मूल्य में संपत्ति के प्रकार, उपयोग, स्थिति, होल्डिंग अवधि और बहुत कुछ के आधार पर उतार-चढ़ाव होता रहता है। इसके लिए विभिन्न मूल्यांकन (वैल्यूएशन) विधियों का विकास भी किया गया है। उनमें से एक को बाजार के लिए चिह्नित किया गया है। “मार्क टू मार्केट” एक परिसंपत्ति के मूल्यांकन का एक लेखा तरीका है जो संपत्ति के उचित और सटीक मूल्य का प्रतिनिधित्व करता है। इसका मूल रूप से मतलब है कि संपत्ति को उसके बाजार मूल्य के लिए चिह्नित या मूल्यवान किया जा रहा है। इसे और अधिक समझने के लिए, “संपत्ति के मूल्यांकन” में तल्लीन (डेल्व) करना महत्वपूर्ण है और फिर यह देखना कि वास्तव में “बाजार हानि के लिए चिह्नित” क्या है।

संपत्ति का मूल्यांकन

संपत्तियों को कई अलग-अलग कीमतों पर बैलेंस शीट में महत्व दिया जा सकता है, जैसे उनकी ऐतिहासिक लागत, पुस्तक मूल्य, बाजार मूल्य और आदि। मान लीजिए, एक संपत्ति की ऐतिहासिक लागत 10 रुपये की है, लेकिन इसका वर्तमान बाजार मूल्य 14 रुपये है। इन मूल्यांकनों में से एक को बैलेंस शीट में दर्ज किया जाएगा, और जिसके परिणामस्वरूप, मूल्यवृद्धि/मूल्यह्रास (डिप्रेसिएशन) की गणना इस मूल्यांकन के साथ इसके कारकों में से एक के रूप में की जाएगी। नतीजतन, हर अलग मूल्यांकन एक अलग तस्वीर पेश करता है। प्रकटीकरण (डिस्क्लोजर) में एकरूपता के लिए, यह मूल्यांकन पद्धति लागू लेखांकन मानकों (अकाउंटिंग स्टैंडर्ड) द्वारा तय की जाती है। एक उदाहरण देने के लिए, अल्पकालिक (शॉर्ट टर्म) निवेश का मूल्य उनके वर्तमान बाजार मूल्य पर होता है जबकि इमारतों और मशीनरी का मूल्य उनकी ऐतिहासिक लागत पर होता है।

बाजार नुकसान के लिए चिह्नित

हालांकि, जैसे-जैसे साल बीतते जाते हैं, वैसे वैसे संपत्ति की स्थिति और होल्डिंग की स्थिति बदल सकती है, जो बैलेंस शीट में संपत्ति की मूल्यांकन राशि में बदलाव की गारंटी देता है। उदाहरण के लिए, एक दीर्घकालिक के निवेश को एक अल्पकालिक के निवेश में परिवर्तित किया जाता है और इसके विपरीत भी किया जा रहा सकता है। जब एक दीर्घकालिक के निवेश को एक अल्पकालिक के निवेश में परिवर्तित किया जाता है, तो ‘मार्क-टू-मार्केट’ की अवधारणा काम आती है। हालाँकि, यह अवधारणा अल्पकालिक निवेशों के वार्षिक लेखांकन में भी लागू होती है क्योंकि उन्हें प्रत्येक वित्तीय वर्ष के अंत में उनके बाजार मूल्य पर चिह्नित किया जाता है। ‘मार्क-टू-मार्केट’ जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है, यानी की संपत्ति को उसके बाजार मूल्य पर चिन्हित करना या मूल्यांकन करना। उदाहरण के लिए,

  • स्टॉक के अल्पकालिक निवेश का मूल्य पिछले वित्तीय वर्ष की बैलेंस शीट मे 100 रुपये का था। इस चल रहे वित्तीय वर्ष के अंत में, इसकी बाजार कीमत 90 रुपये तक गिर गई है। तो अब अल्पकालिक निवेश का मूल्य 90 रुपये होगा।
  • 100 रुपये के डिबेंचर में दीर्घकालिक निवेश वित्तीय वर्ष के अंत से तीन महीने में रिडीम किया जा रहा है। होल्डिंग अवधि में इस बदलाव के कारण निवेश को अल्पकालिक निवेश में परिवर्तित कर दिया गया। इसकी मौजूदा कीमत 105 रुपये है। इसलिए यहां निवेश का मूल्य 105 रुपये होगा।

उपर्युक्त परिदृश्यों में, पहला परिदृश्य ‘बाजार नुकसान के लिए चिह्नित’ का एक उदाहरण है, जिसे ‘मार्क-टू-मार्केट लॉस’ के रूप में भी जाना जाता है। यहां, विशुद्ध रूप से लेखा बही में, निर्धारिती को 10 रुपये का नुकसान हुआ है। यहां निर्धारिती को अपने निवेश पर 10 रुपये की वास्तविक तरल हानि का सामना नहीं करना पड़ा है क्योंकि उसने अभी तक निवेश नहीं बेचा है। यह नुकसान निर्धारिती की लेखा बही की पुस्तकों में ‘लाभ और हानि खाते’ और ‘निवेश खाते’ में दर्ज किया जाएगा। कैश या बैंक की पुस्तकों में इसकी कोई एंट्री नहीं मिलेगी। दूसरे परिदृश्य के मामले में भी, अगर मौजूदा कीमत 90 रुपये की थी, तो पहले परिदृश्य का वही उपर्युक्त कामकाज लागू होगा। 

इसलिए, निष्कर्ष के तौर पर, एक निर्धारिती किसी मार्केड-टू-मार्केट हानि या अन्य अपेक्षित हानि की कटौती नहीं ले सकता है, जब तक कि इस तरह के नुकसान आय गणना और प्रकटीकरण मानकों को निर्धारित करने वाली आधिकारिक सरकारी गैजेट अधिसूचनाओं (नोटिफिकेशन) के अनुसार न हों।

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 40A के अपवाद

एक निर्दिष्ट घरेलू लेन-देन, जो सन्निकट (आर्म लेंथ) की कीमत पर आयोजित किया जाता है, को उचित बाजार मूल्य के अत्यधिक या अनुचित होने के आधार पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता है, जब लेनदेन 1 अप्रैल 2016 को या उससे पहले शुरू होने वाले आकलन वर्ष के लिए हो।

सन्निकट की कीमत

इस अपवाद के लिए सन्निकट मूल्य को धारा 92F(ii) में निर्धारित परिभाषा का पालन करना होगा। इसके अनुसार, सन्निकट मूल्य लागू मूल्य है या अनियंत्रित परिस्थितियों में संबद्ध उद्यमों (एसोसिएटेड एंटरप्राइजेज) के अलावा अन्य व्यक्तियों द्वारा किए गए लेनदेन में लागू मूल्य के लिए प्रस्तावित है।

संबद्ध उद्यम

संबद्ध उद्यमों का एक सामान्य अवलोकन (ओवरव्यू) देने के लिए, आयकर अधिनियम के तहत इसकी परिभाषा को संदर्भित करना विवेकपूर्ण होगा। एक संबद्ध उद्यम की परिभाषा धारा 92A के तहत दी गई है। एक संबद्ध उद्यम को अन्य उद्यमों से उसके संबंध के अनुसार वर्णित किया जाता है, जिसका अर्थ है:

  1. अन्य उद्यमों के प्रबंधन (मैनेजमेंट), नियंत्रण या पूंजी में भाग लेने वाला एक उद्यम, जो या तो प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से, या, एक या अधिक मध्यस्थों (इंटरमीडियरीज) के माध्यम से भाग लेता है।
  2. एक उद्यम जिसमें एक या अधिक व्यक्ति उद्यम के प्रबंधन, नियंत्रण या पूंजी में भाग लेते हैं: प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से, या एक या अधिक मध्यस्थों के माध्यम से और वह वही व्यक्ति हैं जो दूसरे उद्यम के प्रबंधन, नियंत्रण या पूंजी में (प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से, या एक या अधिक मध्यस्थों के माध्यम से) भाग लेते हैं।

विशिष्ट घरेलू लेनदेन

जहां तक ​​अपवाद के मुख्य तत्व की बात आती है, हम धारा 92BA के तहत इसकी परिभाषा पाते हैं। धारा 92BA के अनुसार, एक विशिष्ट घरेलू लेनदेन में निम्नलिखित तत्व शामिल होते हैं:

  • लेन-देन की गैर-अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति,
  • पिछले वर्ष में लेन-देन की कुल राशि बीस करोड़ रुपये से अधिक है, और
  • यह नीचे उल्लिखित लेनदेन में से एक है:
  1. धारा 40A की उप-धारा (2) के खंड (b) में संदर्भित व्यक्ति को कोई भी व्यय जिसके संबंध में भुगतान किया गया है या किया जाना है;
  2. धारा 80A (कुल आय में कटौती) के संदर्भित मे लेन-देन, या 
  3. धारा 80-I A (8) में संदर्भित सामान या सेवाओं का स्थानांतरण, जो कि:
  • योग्य व्यवसाय के लिए रखे गए सामान या सेवाएं जो निर्धारिती के किसी अन्य व्यवसाय में स्थानांतरित की जाती हैं;
  • किसी अन्य व्यवसाय के लिए रखे गए सामान या सेवाएँ जिन्हें बाद में एक योग्य व्यवसाय में स्थानांतरित कर दिया जाता है।

4. निम्नलिखित के तहत किसी भी धारा में संदर्भित कोई भी लेनदेन 

  • अध्याय VI-A (कुल आय की गणना में की जाने वाली कटौती) या 
  • धारा 10AA (विशेष आर्थिक क्षेत्रों में नव स्थापित इकाइयों के संबंध में विशेष प्रावधान), जिसके लिए धारा 80-IA की उप-धारा (8) या उप-धारा (10) के प्रावधान लागू होते हैं;

5. धारा 80-IA(10): कोई भी व्यवसाय निर्धारिती और एक व्यक्ति के बीच लेन-देन करता है जो या तो:

  • निर्धारिती के साथ घनिष्ठ संबंध रखता है, या 
  • उनके बीच व्यवसाय द्वारा उत्पन्न लाभ सामान्य और अपेक्षित लाभ से अधिक है, जो व्यवसाय में उत्पन्न हो सकता है।

6. निर्दिष्ट घरेलू लेनदेन के रूप में निर्धारित कोई भी लेनदेन।

महत्वपूर्ण मामले

प्रधान आयकर आयुक्त बनाम नियो स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्ट प्राइवेट लिमिटेड (2019)

तथ्य

इस मामले में, निर्धारिती का मैसर्स निंबस कम्युनिकेशन लिमिटेड के साथ एक समझौता था, जिसमे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बी.सी.सी.आई.) द्वारा आयोजित टेलीविजन पर क्रिकेट मैचों के प्रदर्शन के लिए निर्धारिती भारत और इंग्लैंड के बीच ऐसे 8 मैचों को अंजाम देने के लिए निंबस को कुल 124.98 करोड़ रुपये का भुगतान करेगा। प्रति मैच भुगतान की राशि 24.99 करोड़ (राउंड ऑफ) आई। उसी वर्ष, निर्धारिती को भारत-श्रीलंका-वेस्टइंडीज सीरीज के बीच 7 मैचों को शामिल करने के लिए निंबस को 136.89 करोड़ रुपये का भुगतान करना पड़ा।

भारत और इंग्लैंड के बीच एक मैच रद्द करना पड़ा जिसके लिए निर्धारिती को निंबस से 24.99 रुपये का क्रेडिट नोट मिला। उसी वर्ष, भारत-श्रीलंका-वेस्टइंडीज सीरीज में एक अतिरिक्त मैच खेला गया था, जिसके लिए निर्धारिती द्वारा 19.55 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि देय थी। 

हालांकि, निर्धारिती और निंबस के बीच एक समझौते से, निर्धारिती ने अतिरिक्त मैच के लिए 19.55 करोड़ रुपये की अतिरिक्त फीस की मांग नहीं करने के बदले में 24.99 करोड़ रुपये का दावा छोड़ दिया। 5.45 करोड़ रुपये का यह अंतर, जो निर्धारिती को निंबस से प्राप्त करना था, लेकिन वह नहीं कर पाया, वह निर्धारिती की आय में अधिनियम की धारा 40A(2) का उपयोग कर निर्धारण अधिकारी द्वारा जोड़ा गया था।

उठाया गया मुद्दा

क्या निर्धारण अधिकारी धारा 40A(2) को लागू करके निर्धारिती की आय में 5.45 करोड़ रुपये जोड़ने में सही था।

निर्णय

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने माना कि निर्धारण अधिकारी ने ऐसा करके गलती की है।

निर्धारण अधिकारी ने निर्धारिती और बी.सी.सी.आई. के बीच आपसी समझ के अस्तित्व पर संदेह नहीं किया था, जिसने निर्धारिती को लाइव मैचों के प्रसारण का अधिकार दिया था। इतना ही नहीं, कर निर्धारण अधिकारी ने अधिनियम की धारा 40(a) के तहत टी.डी.एस. के गैर-निर्देशन के लिए कोई जोड़ भी नहीं दिया था, बल्कि यह माना गया था कि विचाराधीन खर्च स्वीकार्य नहीं है क्योंकि यह पक्षों के बीच किसी भी व्यक्त समझौते के अभाव में किया गया है। 

न्यायालय ने अपीलीय न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) की अस्वीकृति टिप्पणियों को भी नोट किया था, जिसमें यह पाया गया था कि संपूर्ण लेनदेन राजस्व (रिवेन्यू) आय को समायोजित (एडजस्ट) करने के उपाय के रूप में संशोधित परिस्थितियों में एक नए व्यापार लेनदेन की प्रकृति में था।

आयकर उपायुक्त (डेप्युटी कमिश्नर) (ओ.एस.डी.), मुंबई बनाम सारस्वत सहकारी बैंक लिमिटेड (2016)

तथ्य

इस मामले में निर्धारिती ने सॉफ्टवेयर और डेटा प्रविष्टि से संबंधित सेवाओं के प्रावधान के साथ-साथ बैंक के संपूर्ण आई.टी. बुनियादी ढांचे के रखरखाव और प्रबंधन के लिए संबंधित उद्यम को 13,44,73,913 रुपये का भुगतान किया था। निर्धारिती अपने संबंधित उद्यम को “प्रति लेनदेन के आधार” पर भुगतान करता है। 

निर्धारिती ने अपने संबंधित उद्यम को 1.38 रुपये प्रति लेनदेन के लेनदेन शुल्क का भुगतान किया, जबकि निर्धारिती द्वारा वर्तमान लागत और संबंधित उद्यम की अनुमानित परिचालन (ऑपरेशनल) लागत के साथ-साथ अनुमानित निवेश के आधार पर प्रति लेनदेन समान शुल्क का भुगतान किया गया था। प्रति लेनदेन रीवर्क शुल्क 4 रुपये प्रति लेनदेन था।

निर्धारण अधिकारी ने देखा कि निर्धारिती द्वारा भुगतान की गई ये लागतें अधिनियम की धारा 40A(2)(b) के प्रावधानों के तहत अनुचित और अत्यधिक हैं क्योंकि भुगतान संबंधित उद्यम को किए गए हैं।

धारा 40A(2)(a) के प्रावधानों को लागू करके निर्धारिती द्वारा 7.95 करोड़ रुपये तक के अत्यधिक खर्च का दावा करदाता की आय में जोड़ा गया था।

मुद्दे 

क्या सहकारी समिति धारा 40A(2) के अंतर्गत आती है।

निर्णय

अपीलीय न्यायाधिकरण पीठ ने माना कि धारा 40A(2) के प्रावधान सहकारी समितियों पर लागू नहीं होते हैं और इसलिए, कुछ सेवाओं का लाभ उठाने के लिए संबंधित उद्यमों को भुगतान करने के लिए व्यय की अस्वीकृति टिकाऊ नहीं थी।

निष्कर्ष

हालांकि आयकर अधिनियम ने व्यापार मालिकों और पेशेवरों को कर कटौती और छूट के रूप में कर बचाने के लिए कई रास्ते दिए हैं, लगाए गए लाभों के दुरुपयोग को रोकने के लिए इस पर कुछ अंकुश आवश्यक हैं। धारा 40A निर्धारण अधिकारी को जांच में रखने और कर चोरी के इरादे से दिखाए गए व्यय को अस्वीकार करने के लिए आधार देती है। इसलिए, निर्धारण अधिकारियों को विवेक दिया जाता है क्योंकि प्रत्येक मामले एक दूसरे से भिन्न होते है। हालाँकि, निर्णयों को देखकर हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि, न्यायपालिका ने बार-बार संतुलन के पैमाने को बनाए रखा है और इस शक्ति के दुरुपयोग को रोका है। 

हम निर्धारितियों के लिए कर कानूनों के ज्ञान के महत्व को भी देख सकते हैं क्योंकि 3 और 3A जैसे उप-खंड कुछ प्रकार के व्यय की अनुमति नहीं देते हैं, जो निर्धारिती अनजाने में पूरे वर्ष केवल कर की कमी के कारण होने वाली कर हानि की खोज के लिए कर सकते हैं। इसलिए, पिछले वर्ष की शुरुआत से ही किसी व्यक्ति पर लागू कर कानूनों से अवगत होने की अत्यधिक अनुशंसा की जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफ.ए.क्यू.)

क्या धारा 40A उन निर्धारितियों पर लागू होती है, जिनकी ‘व्यवसाय या पेशे से लाभ और मुनाफे’ आय नहीं है?

धारा 40A “व्यवसाय या पेशे से लाभ और मुनाफे” आय वाले व्यक्ति के अलावा किसी अन्य निर्धारिती पर लागू नहीं होती है। इसके पीछे कानूनी तर्क एन.एम. अन्नियाह बनाम आयकर आयुक्त (1975) के मामले में पाया जा सकता है।

क्या धारा 40A(9) के तहत कोई सामान्य धारणा है?

धारा 40A(9) के तहत कोई सामान्य धारणा नहीं है। इसलिए, इसके तहत किसी भी व्यय को अस्वीकार करने के लिए, निर्धारण अधिकारी को अस्वीकृति के समर्थन में कुछ साक्ष्य या सबूत की आवश्यकता होती है।

क्या धारा 40A(3) और धारा 40A(3A) के तहत अस्वीकार करना क्रास्ड चेक या बियरर चेक के मामले में लागू होता है?

हां, क्रॉस चेक या बियरर चेक के माध्यम से भुगतान की गई कोई भी राशि धारा 40A(3) और धारा 40A(3A) के तहत अस्वीकार्य है क्योंकि उन्हें नकद भुगतान के रूप में वर्गीकृत किया गया है। धारा 40A(3) और धारा 40A(3A) के तहत केवल अकाउंट पेयी चेक को अस्वीकृति से छूट प्राप्त है।

संदर्भ

  • Chaturvedi and Pithisaria: Income Tax Law

 

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