कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 241

0
1155
Companies Act 2013

यह लेख कानूनी पेशेवर Anjali Sinha द्वारा लिखा गया है। यह लेख दमन (ऑप्रेशन) और कुप्रबंधन (मिसमैनेजमेंट) के बारे में बात करता है जैसा कि अधिनियम के अध्याय XVI के तहत प्रदान किया गया है। इस लेख में संबंधित प्रावधान, इसके आवेदन, और विवादों का समर्थन करने और व्याख्या करने वाले ऐतिहासिक निर्णय को भी बताया गया है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

Table of Contents

परिचय

कंपनी अधिनियम, 2013 का अध्याय XVI, जिसमें धारा 241246 शामिल है, एक कंपनी में दामन और कुप्रबंधन को रोकने के लिए वैधानिक प्रावधान शामिल करता है।

हालांकि अधिनियम विशेष रूप से ‘दमन’ या ‘कुप्रबंधन’ को रेखांकित नहीं करता है, एक पीड़ित शेयरधारक धारा 241 के तहत राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) (इसके बाद एनसीएलटी के रूप में संदर्भित है) को एक प्रस्ताव दे सकता है, अगर यह विश्वास करने का कोई कारण है कि कंपनी के मामलों को कंपनी/ जनता की चिंता के प्रतिकूल तरीके से चलाया जा रहा है या यह इसके या किसी अन्य सदस्य (सदस्यों) के प्रतिकूल है।

इसी तरह, ऐसा प्रस्ताव भी शुरू किया जा सकता है यदि शेयरधारक का मानना ​​है कि कंपनी के प्रबंधन या नियंत्रण में न्यूनतम परिवर्तन हुआ है, जो शेयरधारकों की चिंता का विषय नहीं है और कंपनी के मामलों को कंपनी या उसके सदस्यों के हितों के प्रतिकूल तरीके से चलाने के लिए भी नेतृत्व कर सकता है। इसमें मंडल (बोर्ड), प्रबंधकों, में बदलाव या प्रतिस्थापन (सब्सटीट्यूशन) या कंपनी के शेयरों के स्वामित्व में परिवर्तन शामिल है।

धारा 241 की विस्तृत व्याख्या

खंड (1) का विश्लेषण प्रदान करता है कि धारा 241 को इस प्रकार वर्णित किया जा सकता है:

  • कंपनी के प्रशासन के प्रभारी व्यक्ति द्वारा शक्तियों का दुरुपयोग।
  • एक अपर्याप्त प्रशासन के परिणामस्वरूप दमन नहीं होता है, लेकिन अधिनियम की धारा 241 के तहत कंपनी के कुप्रबंधन के बराबर हो सकता है।
  • जब कंपनी को बहुसंख्यक शेयरधारकों के विचारों और चिंताओं के खिलाफ संचालित किया जाता है, कंपनी को महंगे मुकदमों में शामिल किया जाता है, तो प्रबंधन को कंपनी के हितों के प्रति पूर्वाग्रहपूर्ण (प्रेजुडिसिएल) माना जा सकता है।
  • अगर ऐसी कोई असामान्य प्रथा है, तो कंपनी के सदस्य न्यायाधिकरण से संपर्क कर सकते हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना उचित है कि सदस्य के पास अधिनियम की धारा 244 के तहत इस अध्याय के तहत एक आदेश का अधिकार होना चाहिए।

खंड (2) के विश्लेषण में प्रावधान है कि अगर केंद्र सरकार की राय है कि कंपनी के मामले या अन्य प्रथाएं सार्वजनिक हित के विपरीत हैं, तब न्यायाधिकरण के पास इस मुद्दे को हल करने या इस अधिनियम के तहत उल्लिखित प्रावधानों के तहत कानूनी कार्रवाई करने के लिए जाया जा सकता है। इसके अलावा, इस उपधारा के तहत एक आवेदन न्यायाधिकरण की प्रधान पीठ (प्रिंसिपल बेंच) के समक्ष किया जा सकता है, और वे आवेदन कंपनी या कंपनियों के वर्ग से संबंधित होने चाहिए जिन्हें निर्दिष्ट किया जा सकता है।

खंड (3) के विश्लेषण से पता चलता है कि अगर केंद्र सरकार की राय है कि कुछ परिस्थितियों में, एक व्यक्ति कंपनियों के संचालन और प्रबंधन से जुड़े रहने के लिए एक उपयुक्त और उचित व्यक्ति है, तो केंद्र सरकार एक कार्यवाही शुरू कर सकती है और उसे न्यायाधिकरण को मामले की जांच करने और व्यक्ति की योग्यता के संबंध में निर्णय दर्ज करने के अनुरोध के साथ संदर्भित कर सकती है। परिस्थितियाँ इस प्रकार हैं:

  • कंपनी के प्रबंधन और कार्यों में शामिल कोई भी व्यक्ति धोखाधड़ी, कदाचार (मिसकंडक्ट) या लापरवाही और कर्तव्यों और कार्यों को करने में विफलता का दोषी है या रहा है।
  • कंपनी के मामलों का प्रबंधन किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा नहीं किया जा रहा है जिसे व्यावसायिक सिद्धांतों और प्रथाओं का अच्छा ज्ञान है।
  • कंपनी के मामलों का प्रबंधन दुर्भावनापूर्ण इरादे रखने वाले व्यक्ति द्वारा किया जा रहा है।

खंड (4) का एक विश्लेषण प्रदान करता है कि कोई भी व्यक्ति जिसके खिलाफ उप-धारा (3) के आधार पर आवेदन किया जाता है, उसे आवेदन के प्रतिवादी के रूप में जोड़ा जाएगा।

इसी तरह, खंड (5) प्रदान करता है कि उप-धारा (3) के आधार पर किए गए प्रत्येक आवेदन में उन तथ्यों और परिस्थितियों का संक्षिप्त विवरण होता है जिन्हें केंद्र सरकार जांच करते समय ध्यान में रखती है। साथ ही, हस्ताक्षर और सत्यापन (वेरिफिकेशन) प्रक्रियाएं सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अनुसार होंगी।

धारा 241 के तहत आवेदन कैसे किया जा सकता है

यदि अधिकृत (ऑथराइज्ड) सदस्यों, जमाकर्ताओं, या उनके वर्गों में से किसी का मानना ​​है कि कंपनी का प्रबंधन इस तरह से कार्य कर रहा है जो कंपनी के हितों के प्रतिकूल है, तो न्यायाधिकरण को एक आवेदन प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

धारा 241-242 में परिकल्पित वैधानिक उपाय एक पीड़ित निवेशक जिसके हितों को नुकसान पहुँचाया गया है, के लिए एक प्रभावी विकल्प है। हालांकि यह कोई समय-बाधित प्रक्रिया नहीं है। धारा के तहत वैधानिक उपाय के रूप में परिकल्पित कार्रवाई अंतरिम (इंटरीम) या अंतिम उपाय दिए जाने तक प्रभावी हो सकती है।

साथ ही, इस तरह की कार्यवाही के दौरान एक पीड़ित पक्ष तत्काल राहत के लिए एनसीएलटी से संपर्क कर सकता है। यदि कार्रवाई के दौरान ऐसी कोई तत्काल या अंतिम राहत प्रदान की जाती है, तो यह उसी रूप में लागू होगी।

एनसीएलटी के पास अधिनियम के भीतर शक्तियों की एक विस्तृत श्रृंखला है, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण न्यायसंगत (जस्ट) और न्यायोचित (इक्विटेबल) राहत देने की शक्ति है। इसके अलावा, उन व्यक्तियों पर कोई प्रतिबंध नहीं है जो कार्यवाही के पक्ष हो सकते हैं। एनसीएलटी द्वारा दी गई राहतें भी विशेष व्यक्तियों तक सीमित नहीं हैं और यह मूल आधार पर संचालित हो सकती हैं।

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 241 के तहत कौन आवेदन कर सकता है

पहले कंपनी अधिनियम, 1956 में, धारा 397 दमन और कुप्रबंधन के खिलाफ आवेदनों से संबंधित थी। कंपनी अधिनियम, 2013, धारा 241 के तहत दमन के खिलाफ एक आवेदन के प्रावधान प्रदान करता है। कंपनी अधिनियम का अध्याय XVI स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है कि कौन शिकायत कर सकता है और किन परिस्थितियों में दमन या कुप्रबंधन की शिकायत की जा सकती है।

पहले ऐसी स्थिति पर विचार करें जहां कंपनी का कोई सदस्य कंपनी के मामलों के बारे में शिकायत दर्ज करता है जब मामला आम जनता या कंपनी के हित को प्रभावित करता प्रतीत होता है, या जब कंपनी के मामले प्रकृति में दमनकारी हों और शिकायतकर्ता सदस्य या कंपनी के किसी अन्य सदस्य के खिलाफ हों।

सदस्य कंपनी के प्रबंधन या नियंत्रण में किसी महत्वपूर्ण परिवर्तन के संबंध में भी शिकायत दर्ज कर सकता है जो कंपनी के लिए प्रतिकूल प्रतीत हो सकता है। केंद्र सरकार स्वयं किसी कंपनी के खिलाफ न्यायाधिकरण में दमन और कुप्रबंधन के लिए एक आवेदन ला सकती है यदि वह मानती है कि कंपनी के मामले प्रतिकूल हैं।

इसके अलावा, कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 244 बताती है कि इस तरह का आवेदन करने का अधिकार किसके पास है। अन्य सदस्यों की ओर से आवेदन करने के लिए कंपनी और सदस्य की पात्रता के बीच अधिकार व्यापक रूप से साझा किया जाता है।

एक कंपनी में, शेयर पूंजी रखने वाली कंपनियों और शेयर पूंजी नहीं रखने वाली कंपनियों के बीच अधिकार को अलग किया जा सकता है। संख्यात्मक शब्दों में, यह कुल सदस्यों का 100 या 1/10 होना चाहिए, और मूल्य के संदर्भ में, यह शेयर पूंजी मूल्य का 1/10 रखने वाले सदस्य होने चाहिए। बिना शेयर पूंजी वाली कंपनियों के मामले में, सदस्यों की कुल संख्या का ⅕ आवेदन कर सकता है।

इसके अलावा, एक सदस्य का अन्य सदस्यों की ओर से अनुरोध करने के अधिकार के लिए एकमात्र शर्त यह है कि ऐसा करने वाले व्यक्ति के पास दूसरों की लिखित सहमति हो।

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 241 से संबंधित ऐतिहासिक निर्णय

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज लिमिटेड बनाम साइरस इंवेस्टमेंट्स प्राईवेट लिमिटेड और अन्य (2021)

इस ऐतिहासिक मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने दमन और कुप्रबंधन के मुद्दे की जांच की थी।

तथ्य– साइरस मिस्त्री को शेयरधारक बैठकों में पारित प्रस्तावों के बाद, टाटा समूह की अन्य कंपनियों में निदेशक के साथ साथ टाटा संस के गैर-कार्यकारी निदेशक (नॉन एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर) के रूप में हटा दिया गया था। बाद में, टाटा समूह में शेयर रखने वाली दो कंपनियों ने भेदभाव के लिए धारा 241, 242 और 243 के तहत शिकायत दर्ज की।

मुद्दा– धारा 241, 242 और 243 के तहत की गई शिकायत पर, एनसीएलटी को इन आरोपों को साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं मिला, लेकिन एनसीएलएटी ने इसे उलट दिया, जिसने मिस्त्री को समूह के भीतर विभिन्न कंपनियों के निदेशक के रूप में बहाल कर दिया।

निर्णय- आगे, माननीय सर्वोच्च न्यायालय में अपील पर, यह माना गया कि प्रबंधन में न्यायसंगत विश्वास की कमी के कारण धारा 242 के तहत समापन के लिए कोई मामला मौजूद नहीं था, और केवल बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक (माइनोरिटी) शेयरधारकों के बीच विश्वास की कमी पर्याप्त आधार नहीं होगी; और न ही धारा 241 और 242 बहाली के लिए शक्ति प्रदान करती हैं; न ही धारा 241 के तहत न्यायाधिकरण द्वारा कंपनी के विधानपत्र (आर्टिकल ऑफ़ एसोसिएशन) से उत्पन्न होने वाले भविष्य के आचरण की आशंका का निर्णय लिया जा सकता है।

भारत संघ बनाम दिल्ली जिमखाना क्लब (2021)

यह दमन और कुप्रबंधन से संबंधित एक और उल्लेखनीय निर्णय है।

तथ्य- दिल्ली जिमखाना कंपनी अधिनियम की धारा 8 के तहत पंजीकृत 107 साल पुराना क्लब है। एमओए में उल्लिखित क्लबों के अलावा अन्य क्लबों का मुख्य उद्देश्य खेल और मनोरंजन को बढ़ावा देना है। क्लब की 5600 स्थायी सदस्यों की सीमित सदस्यता है।

मुद्दा– सरकार की एक शिकायत के बाद, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने क्लब के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने का फैसला किया और क्लब के कुप्रबंधन और मामलों को सार्वजनिक हित के प्रतिकूल तरीके से संचालित करने का आरोप लगाते हुए एनसीएलटी में चले गए।

निर्णय– इस मामले में धारा 241(2) के तहत भारत सरकार द्वारा दमन व कुप्रबंधन का आवेदन दाखिल किया गया था। एनसीएलएटी ने धारा 241(2) के दायरे पर चर्चा की और निम्नलिखित टिप्पणियां कीं:

यदि केंद्र सरकार उपरोक्त धारा के तहत शिकायत दर्ज करती है, तो उसे सार्वजनिक हित के लिए प्रतिकूल तरीके से संचालित किए जा रहे कंपनी के मामलों पर अपनी स्थिति दर्ज करनी होगी, और धारा 241(2) के तहत आवेदन करने के लिए ऐसी स्थिति की रिकॉर्डिंग एक आवश्यक शर्त है।

न्यायाधिकरण उस सामग्री की पर्याप्तता या अन्यथा की समीक्षा (रिव्यू) नहीं कर सकता है जिसके आधार पर सरकार ने अपनी राय बनाई है, खासकर तब जब केंद्र सरकार पर कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा नहीं लगाया गया हो।

भारत के सभी नागरिकों को शामिल करने के लिए ‘सार्वजनिक हित’ वाक्यांश का विस्तार नहीं किया जा सकता है। यह पर्याप्त होगा यदि समाज के एक हिस्से के अधिकार, सुरक्षा, आर्थिक कल्याण, स्वास्थ्य और सुरक्षा – जैसे कि सामान्य नागरिक की श्रेणी से सदस्यता चाहने वाले उम्मीदवार – प्रभावित होते हैं।

श्रीमती श्रेयांस शाह बनाम लोक प्रकाशन लिमिटेड और अन्य

इस मामले में एनसीएलएटी ने कहा कि अगर प्रथम दृष्टया मामला बनता है तो न्यायाधिकरण धारा 242 के तहत अंतरिम आदेश पारित कर सकता है। उन्होंने बताया कि न्यायाधिकरण द्वारा धारा 242(4) के दायरे से परे एक प्रारंभिक व्यादेश (इंजंक्शन) जारी करना एक ऐसी स्थिति को दर्शाता है जहां कंपनी के मामलों को कानून के प्रावधानों और विधानपत्र के अनुसार संचालित नहीं किया जाता है। एक प्रथम दृष्टया मामला बनाने के लिए, दमन और कुप्रबंधन का आरोप लगाने वाले सदस्य को यह प्रदर्शित करना चाहिए कि उसने कंपनी की याचिका में न्यायोचित मुद्दों को उठाया है जिसकी जांच की आवश्यकता है।

अरुणा ओसवाल बनाम पंकज ओसवाल और अन्य

इस मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि चूंकि नामांकन के आधार पर शेयरों में अधिकार, शीर्षक और हित के प्रश्न सिविल न्यायालय के समक्ष लंबित थे, जिसने सर्वोच्च न्यायालय मामले के संबंध में यथास्थिति का आदेश दिया था, शेयरधारक, जिनके शेयरों पर शीर्षक विवाद में था और धारा 244 के प्रस्ताव पर बने रहने के लिए अपात्र हो गया, धारा 244 की छूट की मांग सहित दमन और कुप्रबंधन के प्रस्ताव के माध्यम से विवादित शेयरों से संबंधित मामलों को आंदोलन करने में सक्षम नहीं होगा।

निष्कर्ष

कंपनी का प्रबंधन बहुसंख्यक के शासन पर आधारित है, लेकिन साथ ही अल्पसंख्यक के हितों को पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। जब हम बहुमत और अल्पसंख्यक के बारे में बात करते हैं, तो हम संख्यात्मक बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक के बारे में बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक मतदान शक्तियों के बारे में बात कर रहे हैं। इस अंतर का कारण यह है कि शेयरधारकों का एक छोटा समूह बहुमत शेयर धारण कर सकता है, जबकि अधिकांश शेयरधारक उनके बीच शेयर पूंजी का बहुत कम प्रतिशत रख सकते हैं।

एक बार नियंत्रण में आने के बाद, बहुसंख्यक, सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए, वस्तुतः बिना किसी नियंत्रण या निरीक्षण के कंपनी के साथ जो चाहे कर सकते हैं, क्योंकि जब आम बैठक में उनके कार्यों के बारे में उनसे सवाल किया जाता है, तब भी वे हमेशा अपनी महान मतदान शक्ति के कारण विजयी होते हैं। इस प्रकार, आधुनिक कंपनी कानूनों में कंपनियों में अल्पसंख्यक हितों की रक्षा के लिए बड़ी संख्या में प्रावधान हैं।

दुनिया भर में प्रमुख कंपनियों और निगमों के हाल के पतन ने ऐसी संस्थाओं को कंपनी मामलों के प्रति अपने कार्यों के बारे में सावधानी से सोचने पर मजबूर कर दिया है। अधिकारियों के दमन और कुप्रबंधन के कार्यों के लिए उनके खिलाफ लाए गए मुकदमों के उपयोग के माध्यम से दायित्व में वृद्धि हुई है। कंपनी के व्यक्तिगत शेयरधारकों और अल्पसंख्यक शेयरधारकों को दमन और कुप्रबंधन के तहत अधिकारियों द्वारा शक्ति और अधिकार के अनधिकृत (अनऑथराइज्ड) दुरुपयोग के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया था। एक व्यक्ति अदालत में एक आवेदन दायर कर सकता है और प्रमुख कर्मचारियों द्वारा उसके या कंपनी के किसी अन्य शेयरधारक के प्रति किए गए दमन और कुप्रबंधन की रिपोर्ट कर सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या बिना नोटिस के वाद दायर किया जा सकता है?

वाद दायर करने से पहले नोटिस जारी करने की कोई अनिवार्य आवश्यकता नहीं है। यह वैकल्पिक है क्योंकि सेवा की कोई वैधानिक आवश्यकता नहीं है और न ही ऐसे नोटिस के लिए वैधानिक निश्चित अवधि है।

क्या कोई कंपनी किसी कर्मचारी के खिलाफ मामला दर्ज कर सकती है?

कंपनी के मामलों के हितों के लिए अपने कर्तव्यों और कार्यों को करने में लापरवाही करने वाले नियोक्ता (एंप्लॉयर) द्वारा किसी कर्मचारी के खिलाफ सिविल न्यायालय या श्रम अदालत में वाद दायर किया जा सकता है।

एक निदेशक के खिलाफ क्या कार्रवाई की जा सकती है?

अगर किसी निदेशक को कंपनी के प्रति अपने प्रत्ययी (फिड्यूशियरी) कर्तव्यों का उल्लंघन करते हुए पाया जाता है, तो कंपनी निदेशक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर सकती है।

क्या निदेशकों को व्यक्तिगत रूप से भुगतान करने के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है?

आमतौर पर, कंपनी का दायित्व निदेशकों को हस्तांतरित (ट्रांसफर) नहीं किया जाता है। हालाँकि, निदेशकों को कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के तहत व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, यदि कोई प्रत्ययी कर्तव्य का उल्लंघन या धोखाधड़ी का उदाहरण है।

संदर्भ

 

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here