मध्यस्थता अधिनियम की धारा 16

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Arbitration and Conciliation Act

यह लेख Arundhati Pawar द्वारा लिखा गया है, जो पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज से ग्रेजुएट हैं और वर्तमान में पुणे में वकालत कर रही हैं। इस लेख में, मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) अधिनियम की धारा 16 के तहत अधिकार क्षेत्र की अवधारणा और इसके दायरे पर चर्चा की गई है। इस लेख का अनुवाद Sakshi Gupta द्वारा किया गया है।

परिचय

मध्यस्थता संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्चुअल) समझौतों से उत्पन्न होने वाले विवादों को हल करने का एक निजी अभ्यास है जिसके तहत पक्ष पारस्परिक रूप से एक या एक से अधिक निजी व्यक्तियों, यानी मध्यस्थों (आर्बिट्रेटर) द्वारा अपने विवादों को सुलझाने का निर्णय लेते हैं, न कि कानून की अदालत द्वारा। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जहां पक्ष न्यायपालिका की औपचारिक (फॉर्मल) कार्यप्रणाली यानी अदालत में आए बिना विवादों को सुलझाते हैं।

मध्यस्थता और सुलह (कॉन्सिलिएशन) अधिनियम, 1996 की धारा 16, अधिकार क्षेत्र पर शासन करने के लिए मध्यस्थ न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) की क्षमता पर जोर देती है। यह पक्षों को न्यायिक प्रश्न उठाने का अधिकार देता है। यूनिसिट्रल मॉडल कानून में धारा 16 के प्रावधान स्थापित किए गए हैं। धारा 16 “कोम्पेटेन्ज़-कोम्पेटेन्ज़” के सिद्धांत को वैधानिक मान्यता देती है।

धारा का दायरा

धारा 16 निर्दिष्ट करती है कि मध्यस्थ न्यायाधिकरण के पास यह तय करने की शक्ति है कि क्या उसके पास विवाद का न्यायनिर्णयन (एडजुडिकेट) करने का अधिकार है या नहीं। यह प्रावधान 1996 के मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 5 के साथ पढ़ा जाता है। यह परिकल्पना करता है कि सिविल अदालतों के पास हस्तक्षेप करने की कोई शक्ति नहीं है, सिवाय इसके कि यह विशेष रूप से कहा गया है। मध्यस्थ एक निर्णायक (कंक्लूसिव) निर्णय लेने के हकदार हैं जो उनके अधिकार क्षेत्र को परिभाषित करता है।

2015 के संशोधन अधिनियम से पहले, सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने आर्सेलर मित्तल निप्पॉन स्टील इंडिया बनाम एस्सार बल्क टर्मिनल लिमिटेड (2021) में कहा था कि मध्यस्थता की कार्यवाही शुरू होने पर अधिकार क्षेत्र के मुद्दों पर फैसला किया जाना चाहिए। इसका फैसला धारा 11 के तहत होना चाहिए। इस निर्णय को बाद में उलट दिया गया था, और बाद में उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम लिमिटेड बनाम नॉर्दर्न कोल फील्ड लिमिटेड (2018) में कोम्पेटेन्ज़-कॉम्पेटेन्ज़ के सिद्धांत को बनाए रखा गया था। इसने कहा कि सीमा का मुद्दा एक न्यायिक मुद्दा है, जिसे धारा 16 के तहत मध्यस्थ द्वारा तय किया जाना आवश्यक होगा, न कि अधिनियम की धारा 11 के तहत उच्च न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिए। एक बार जब मध्यस्थता समझौता दोनों पक्षों द्वारा निर्विवाद रूप से स्वीकार कर लिया जाता है, तो अधिकार क्षेत्र के प्रश्न सहित सभी मुद्दों का निर्णय मध्यस्थ द्वारा किया जाता है।

धारा 16 की आवश्यक विशेषताएं

भारतीय किसान उर्वरक (फर्टिलाइजर) सहकारी लिमिटेड बनाम भद्रा प्रोडक्ट्स (2018) के मामले में अधिकार क्षेत्र को एक नए प्रकाश में व्याख्यायित किया गया है और सक्षम अधिकार क्षेत्र तय करने के लिए विशेषताओं को निर्धारित किया गया है। जब तक इन शर्तों को पूरा नहीं किया जाता है, तब तक न्यायाधिकरण के पास मामले पर निर्णय लेने का अधिकार क्षेत्र नहीं है।

जहां वैध मध्यस्थता समझौता मौजूद है

मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 16 मध्यस्थ को मध्यस्थता खंड के अस्तित्व के बारे में निर्णय लेने में सक्षम बनाती है। प्रदीप वी. नाइक बनाम सुलक्षणा एनाईक (2015), में यह माना गया था कि एक मध्यस्थता समझौते के अस्तित्व के बारे में मुद्दा केवल एक मध्यस्थ द्वारा अधिनियम की धारा 16 के तहत तय किया जा सकता है, न कि धारा 11 के तहत जब तक पक्ष साक्ष्य का नेतृत्व नहीं करते। मध्यस्थता खंड अनुबंध का एक स्वतंत्र हिस्सा है और इसे एक अलग समझौते के रूप में माना जाना चाहिए। संपूर्ण अनुबंध, यदि शून्य समझा जाता है, तो भी यह मध्यस्थता खंड को अमान्य नहीं करेगा। मध्यस्थता खंड को ही वैध मध्यस्थता समझौते के रूप में संदर्भित किया जाएगा।

जहां मध्यस्थ न्यायाधिकरण का गठन ठीक से किया गया है

मध्यस्थ न्यायाधिकरण का गठन मध्यस्थता समझौते के अनुसार पक्षों की आपसी सहमति से होना चाहिए। यह एक मध्यस्थ या मध्यस्थों के समूह का गठन कर सकता है।

जहां विषयवस्तु मध्यस्थता के योग्य है

विषयवस्तु मध्यस्थता के योग्य होनी चाहिए और समझौते के अनुसार होनी चाहिए। आपराधिक मामलों, वैवाहिक विवादों, किरायेदारी विवादों और दिवाला (इंसोलवेंसी) विवादों से संबंधित विवाद मध्यस्थता योग्य नहीं हैं। यह कानून या सार्वजनिक नीति द्वारा वर्जित नहीं होना चाहिए।

इसके अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति

धारा 16(2) में कहा गया है कि अधिकार क्षेत्र के बारे में किसी भी आपत्ति को बचाव का बयान दाखिल करने से पहले उठाया जाना चाहिए। इस प्रावधान का उद्देश्य समय की बर्बादी से बचना है और कार्यवाही के प्रारंभ चरण में न्यायिक मुद्दों को स्वीकार करना है। ये सीमाएँ मध्यस्थ को दी गई शक्ति के अधीन हैं, जो प्रदान करती है कि न्यायाधिकरण दोनों में से किसी भी मामले में बाद की याचिका को स्वीकार कर सकता है यदि वह देरी को उचित मानता है।

यदि न्यायाधिकरण पक्षों द्वारा उठाई गई आपत्ति को स्वीकार करता है, तो ऐसी स्थिति में मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 37 के तहत अपील की जा सकती है। यदि न्यायाधिकरण पक्षों द्वारा की गई आपत्ति को खारिज कर देता है, तो मध्यस्थ न्यायाधिकरण अपनी कार्यवाही जारी रखता है, और पक्ष अधिनियम की धारा 34 के तहत अवार्ड को रद्द करवा सकते है।

मध्यस्थता अधिनियम की धारा 16 की आलोचना

धारा 16 के तहत अपील का अभाव

धारा 16 के तहत अपील का कोई प्रावधान नहीं है। यदि न्यायाधिकरण यह निर्णय लेता है कि उसके पास सक्षम अधिकार क्षेत्र नहीं है, तो याचिका को खारिज करने का निर्णय अधिनियम की धारा 37 के तहत अंतिम अवॉर्ड के समय ही आगे रखा जा सकता है। यह पक्षों को मध्यस्थ नियुक्त करते समय आपत्तियां उठाने के लिए मजबूर करता है, जिससे अनुचित देरी होती है।

प्रारंभिक मुद्दा

अधिनियम यह निर्दिष्ट नहीं करता है कि उठाई गई आपत्ति को अंतरिम (इंटरिम) मुद्दे के रूप में माना जाना चाहिए या अंतिम अवॉर्ड के रूप में। चूंकि यह स्थिति तय नहीं है, न्यायाधिकरण उन मामलों में पक्षों के समय और धन को बर्बाद कर देता है जहां इसका अधिकार क्षेत्र नहीं है। पक्षों द्वारा इस प्रावधान का व्यापक रूप से दुरुपयोग किया जाता है, जिससे उन्हें कार्यवाही को लंबा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जिससे अधिनियम के तहत त्वरित सुनवाई का उद्देश्य विफल हो जाता है।

आपत्ति उठाने में विफलता

मान लें कि पक्ष कार्यवाही शुरू होने पर अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति जताते हुए एक आवेदन दायर करने में विफल रहता है। उस मामले में, धारा 34 के तहत एक मध्यस्थ अवॉर्ड को रद्द करने के लिए आवेदन करके अंतिम सुनवाई में ऐसा करने की अनुमति दी जाती है। इस तरह के एक अवॉर्ड को रद्द करने की समय-सीमा अवॉर्ड की तारीख से 3 महीने है और आगे नहीं है। यह प्रावधान यूनिसिट्रल मॉडल कानून के अनुच्छेद 16 से लिया गया है, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र आयोग द्वारा अपनाया गया है। यदि आपत्ति स्वीकार कर ली जाती है, तो मध्यस्थ न्यायाधिकरण आगे नहीं बढ़ेगा, और अधिनियम की धारा 37 के अनुसार कार्यवाही बंद कर दी जाएगी।

मैसर्स लायन इंजीनियरिंग कंसल्टेंट्स बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य (2015), में अपीलकर्ता के पक्ष में निर्णय दिया गया था, और प्रतिवादी ने विचारणीय (ट्रायल) अदालत द्वारा उनकी अस्वीकृति के तीन साल बाद अपने आवेदनों में संशोधन करने की मांग की थी। यह माना गया था कि “सीमा से परे” संशोधन की अनुमति नहीं है। लेकिन अधिनियम की धारा 34 के तहत आपत्ति के माध्यम से उठाए जाने वाले अधिकार क्षेत्र के प्रश्न का अनुरोध करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, भले ही अधिनियम की धारा 16 के तहत ऐसी कोई आपत्ति नहीं उठाई गई हो।

निष्कर्ष

अधिकार क्षेत्र के संबंध में भारत में मध्यस्थता कानून की स्थिति स्थिर नहीं है। ऊपर उल्लिखित विभिन्न निर्णयों ने असंगत निष्कर्ष सामने रखे हैं। उठाए गए अधिकार क्षेत्र संबंधी मुद्दों में कमियां हैं जिन्हें कार्यवाही को धीमा करने के लिए इस प्रावधान के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक ठोस स्थिति की आवश्यकता है। मध्यस्थता और सुलह अधिनियम ने न्यायाधिकरण की कार्यवाही में तेजी लाने के लिए धारा 16 का प्रावधान पेश किया है। न्यूनतम न्यायिक हस्तक्षेप के साथ मध्यस्थ न्यायाधिकरण को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करने के लिए अपने स्वयं के अधिकार क्षेत्र पर शासन करने की शक्ति निर्धारित है। अदालतों द्वारा लिया गया उदार (लिबरल) दृष्टिकोण त्वरित उपाय को बाधित करता है, जिससे इस धारा के पीछे विधायी इरादा विफल हो जाती है। इसलिए, इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए धारा 16 को संशोधित किया जाना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (एफएक्यू)

क्या ट्रिब्यूनल को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में धारा 16 के तहत एक आपत्ति पर शासन करना चाहिए?

कैडर एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड बनाम सुलोचना गोयल और अन्य (2010) में दिल्ली उच्च न्यायालय ने माना है कि अधिकार क्षेत्र के बारे में किसी भी प्रकार की आपत्ति बचाव पक्ष के बयान को दाखिल करने से पहले उठाई जानी चाहिए। अगर मध्यस्थ न्यायाधिकरण उचित देरी के बारे में न्यायोचित (जस्टीफाइड) है, तो अधिनियम बाद की तारीख में पक्ष को इस तरह की दलील देने से रोकता नहीं है।

न्यायाधिकरण धारा 16 के तहत आवेदन को खारिज कर सकता है और आगे मध्यस्थता की कार्यवाही जारी रख सकता है। न्यायाधिकरण के फैसले पर आपत्ति जताने वाला पक्ष धारा 34 के तहत मध्यस्थता अवॉर्ड को रद्द करने पर आपत्ति जता सकता है। अधिनियम धारा 16 के खिलाफ अपील के लिए एक अलग प्रावधान प्रदान नहीं करता है।

महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय और अन्य बनाम आनंद कॉर्पोरेशन एल/सी सोसायटी लिमिटेड और अन्य (2007), में यह माना गया था कि न्यायालय अपने विवेक पर यह तय करने के लिए है कि कार्यवाही की शुरुआत में या अंतिम अवॉर्ड के समय न्यायिक प्रश्न तय करना है या नहीं। न्यायालय द्वारा यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि प्रारंभिक चरण में अधिकार क्षेत्र के मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए न्यायालय/न्यायाधिकरण पर कोई बाध्यता नहीं है और इसे अंतिम निर्णय के समय तय किया जा सकता है।

पंकज अरोड़ा बनाम ए.वी.वी हॉस्पिटैलिटी एल.एल.पी और अन्य (2020), में धारा 16 के तहत एक आपत्ति उठाई गई थी कि मध्यस्थ के पास प्रति-दावों (काउंटर क्लेम) पर निर्णय लेने के लिए अपेक्षित अधिकार क्षेत्र नहीं था। आपत्ति का निस्तारण (डिस्पोज) कर दिया गया था और अंतिम तर्क के स्तर पर निर्णय लिया जाना था। यह माना गया था कि, हालांकि धारा के तहत एक आवेदन पर निर्णय को साक्ष्य की रिकॉर्डिंग के बाद तक के लिए टाला जा सकता है, इस मुद्दे को “अंतिम मध्यस्थ अवॉर्ड करने से पहले” तय किया जाना चाहिए, न कि अंतिम अवॉर्ड में।

एम.एस.पी इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम एम.पी.आर.डी.सी लिमिटेड (2014) में यह कहा गया था कि अधिकार क्षेत्र का सवाल या तो धारा 16 के तहत या अंतिम अवॉर्ड के स्तर पर उठाया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने एम.एस.पी इन्फ्रास्ट्रक्चर के फैसले को खारिज कर दिया और कहा कि अधिनियम की धारा 34 के तहत आपत्ति उठाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। आपत्ति पहली बार में या अवॉर्ड की अन्तिम स्थिति में उठाई जा सकती है।

कैडर एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड बनाम सुलोचना गोयल और अन्य (2010) और महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय और अन्य बनाम आनंद कॉर्पोरेशन एल/सी सोसाइटी लिमिटेड और अन्य (2007) में न्यायालय ने माना कि मध्यस्थ को पूर्ववर्ती (प्रीसेडिंग) मुद्दे के रूप में अधिकार क्षेत्र तय करना है, जबकि पंकज अरोड़ा बनाम ए.वी.वी हॉस्पिटैलिटी एल.एल.पी और अन्य (2020), का मामला यह निर्धारित करता है कि कार्यवाही शुरू होने पर अधिकार क्षेत्र तय करने के लिए ऐसा कोई मानक (मैंडेट) नहीं है।

क्या धारा 16 के तहत न्यायाधिकरण का निर्णय एक आदेश या एक अवॉर्ड का गठन करता है?

मध्यस्थता अधिनियम कानून की इस स्थिति को स्पष्ट नहीं करता है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारत संघ और अन्य बनाम मैसर्स ईस्ट कोस्ट बोट बिल्डर्स (1998) के मामले में इस मुद्दे पर चर्चा की है। जहां यह माना गया था कि धारा 16 के तहत आदेश दो अलग-अलग स्थितियों में अपनी प्रकृति को बदल देगा, अगर आदेश किसी अधिकार क्षेत्र की प्रार्थना को खारिज नहीं करता है, तो यह एक अंतरिम अवॉर्ड बन जाता है; यदि मध्यस्थ न्यायाधिकरण किसी अधिकार क्षेत्र की दलील की अनुमति नहीं देता है, तो यह अंतरिम अवॉर्ड नहीं है और केवल अपील योग्य है। इसलिए, यह आसानी से समझा जा सकता है कि किसी भी मामले में, यह केवल प्रारंभिक आदेश है और अंतरिम अवॉर्ड नहीं है।

इरादा यह प्रतीत होता है कि ऐसे मामले में, मध्यस्थ न्यायाधिकरण मध्यस्थता की कार्यवाही जारी रखेगा और बिना किसी देरी के अवॉर्ड देगा और उस चरण में किसी भी अदालत द्वारा उनकी पर्यवेक्षी (सुपरविजन) भूमिका में मध्यस्थता प्रक्रिया में हस्तक्षेप किए बिना।

संदर्भ

 

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